कम सेक्स करना बन सकता है प्री मेनोपोज़ का कारण

सेक्स शादीशुदा लोगो के लिए उनके रिश्ते में मजबूती देने में एक अहम भूमिका निभाता है. यह हमारी पर्सनल लाइफ के साथ साथ शारारिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रखने में बेहद कारगर सिद्ध होता है लेकिन आज के समय का लाइफस्टाइल ऐसा हो गया है की लोग अपनी व्यस्तता के चलते सेक्स को  तवज्जो नहीं देती और सेक्स को सिर्फ वंश बढ़ाने का उद्देश्य मनने लगते हैं तो कुछ महिलएं  कामकाजी होने के कारण अपने काम को प्राथमिकता देना पसंद करती है और थकान के कारण सेक्स करने से बचने लगती हैं लेकिन एक स्टडी में पाया गया है की सेक्स हमारे काम करने की क्षमता को बढ़ता है और जो महिलाऐं सेक्स करने से बचती है उन में तनाव की बढ़ोतरी होती है देखा जाए तो पुरुष सेक्स के  मामले में महिलाओं से अधिक रूचि रखतें हैं और महिलाऐं कम अहमियत देती हैं इस  कारण महिलाओं में  मेनोपॉज़ की समस्या उम्र से पहले होने लगती है.

 मेनोपॉज़ होने का कारण

जिस तरह किशोरावस्था यानि  12 से 15  कि उम्र में  महिलाओं के पीरियड्स शुरू हो जाते हैं. पीरियड्स का होने  का संकेत है कि महिला के शरीर में हार्मोनल बदलाव होने लगे है और अब वह गर्भधारण करना चाहे  तो अब वह इस के लिए शारारिक रूप से तैयार होने लगी है लेकिन 45  कि उम्र के बाद महिलाओं में पीरियड्स बंद होने लगते है जिसे मेनोपोज़ कहा जाता है इसे रजोनिवृत्ति भी कहते हैं. लेकिन अब देखा जा रहा है कि जो महिलाएं सेक्सुअली कम एक्टिव होती हैं, उनको 35 की  उम्र में ही मेनोपोज़ कि समस्या का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि कम सेक्स करने के कारण उनका शरीर ओव्यूलेशन बंद करने के जल्दी संकेत देने लगता है, जिसके कारण उनका मेनोपॉज़ समय से पहले हो जाता है. सेक्स कि कमी के कारण प्रजनन की प्रक्रिया में कमी आने लगती है जिस कारण अंडों का बनना बंद होने लगता है , इसलिए ओवरी प्रजनन की क्षमता बिल्कुल खो देती है।और मेनोपॉज़ हो जाता है.

 जल्दी मेनोपोज़ बन सकता है समस्या

जनन शक्ति या गर्भ धारण की क्षमता खत्म हो जाती  है. खून में असंतुलन के कारण गर्मी लगती है, दिल तेज धड़कता है, रात में पसीना आता है, नींद नहीं आती है.  हड्डी कमजोर होने लगती है इसके कारण जोड़ों, पीठ और मांसपेशियों में दर्द का अनुभव होता है. तनाव, चिड़ाचिड़ापन, उदासी, कुछ भी न करने की इच्छा, याद न रहना, जैसी मानसिक समस्या भी होने लगती हैं

प्री मेनोपॉज  से बचाव है जरूरी

महिलाओं को शारारिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है कि  हफ़्ते में एक बार सेक्स अवश्य करें , ऐसा करने से उनमें मेनोपॉज़ होने की संभावना, उन महिलाओं की तुलना में 28% कम होता है, जो महिलाएं महीने में एक बार सेक्स करती हैं.

शारारिक व मानसिक रूप  से स्वस्थ रहने के लिए सेक्स एक अहम रोल अदा  करता है यह सिर्फ मेनोपोज़ से ही नहीं बल्कि आपको फिट और हेल्दी रखने में भी मदद करता है साथ ही आपके रिश्ते को मजबूती भी देता

मेरे पति नसबंदी कराना चाहते हैं, इसका वैवाहिक जीवन पर कोई असर तो नहीं होगा?

सवाल

मैं 29 वर्षीय और 2 बच्चों की मां हूं. हम आगे बच्चा नहीं चाहते और इस के लिए मेरे पति स्वयं पुरुष नसबंदी कराना चाहते हैं. कृपया बताएं कि इस से वैवाहिक जीवन पर कोई असर तो नहीं होगा?

जवाब

आज जबकि सरकारें पुरुष नसबंदी को प्रोत्साहन दे रही हैं, आप के पति का इस के लिए स्वयं पहल करना काफी सुखद है. आमतौर पर पुरुष नसबंदी को ले कर समाज में अफवाहें ज्यादा हैं. आप को यह जान कर आश्चर्य होगा कि भारत में पुरुष नसबंदी कराने वालों का प्रतिशत काफी निराशाजनक है.

दरअसल, पुरुष नसबंदी अथवा वासेक्टोमी पुरुषों के लिए सर्जरी द्वारा परिवार नियोजन की एक प्रक्रिया है. इस क्रिया से पुरुषों की शुक्रवाहक नलिका अवरुद्ध यानी बंद कर दी जाती है ताकि शुक्राणु वीर्य (स्पर्म) के साथ पुरुष अंग तक नहीं पहुंच सकें.

यह बेहद ही आसान व कम खर्च में संपन्न होने वाली सर्जरी है, जिस में सर्जरी के 2-3 दिनों बाद ही पुरुष सामान्य कामकाज कर सकता है. सरकारी अस्पतालों में तो यह सर्जरी मुफ्त की जाती है. अपने मन से किसी भी तरह का भय निकाल दें और पति के इस निर्णय का स्वागत करें.

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मैं 26 वर्षीय युवती हूं. मेरा एक बौयफ्रैंड है, जिसे मैं बेहद पसंद करती हूं. एकांत में वह मेरी ब्रैस्ट को सहलाना चाहता है. मेरे ब्रैस्ट सामान्य से बड़ी है और मैं ने सुना है कि शादी से पहले ब्रैस्ट दबाने अथवा सहलाने से वह बड़ी हो जाती है. मुझे डर है कि यह बेडौल न हो जाए. इसी डर से जब मैं बौयफ्रैंड को मना करती हूं, तो वह नाराज हो जाता है. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब

सैक्स से जुड़े मिथकों में यह भी एक आम मिथक है कि ब्रैस्ट को दबाने, सहलाने व चूमने आदि से वह बड़ी होती है. वास्तव में सैक्स के दौरान फोरप्ले में ब्रैस्ट को छूने, सहलाने से वे कड़े जरूर हो जाते हैं और आमतौर पर ऐसा उत्तेजना की वजह से और ब्रैस्ट की नसों में रक्तसंचार बढ़ने की वजह से होता है.

ब्रैस्ट इंप्लांट के अलावा ऐसा कोई जरीया नहीं है जिस से ब्रैस्ट का साइज बड़ा हो जाए. हां, नियमित ऐक्सरसाइज से बौडी को सही शेप जरूर मिलती है पर ब्रैस्ट बड़ी नहीं होती. वह आकर्षक जरूर दिखने लगती है. अत: बौयफ्रैंड को केवल इस वजह से मना न करें और अपने मन से यह भय निकाल दें.

यह कैसा प्रेम- भाग 1 : आलिया से क्यों प्यार करता था वह

वह मुझ से प्रेम करती थी, अगाध प्रेम. जैसा एक स्त्री एक पुरुष से करती है. और हम दोनों ही जानेअनजाने पगलाए रहते हैं. प्रेम में डूबे रहते हैं. सुधबुध सब खो बैठते हैं. दुनियाजहान से अलग कर लेते हैं. बिलकुल वैसा ही प्रेम वह मुझ से करती थी. उस के प्रेम में लेशमात्र भी बनावटीपन न था. न दिखावा, न आग्रह, न संकोच. बस, कभीकभार रूठ जाया करती उतनी देर, जब तक मैं जीभर लाड़मनुहार कर उसे मना न लूं. उस के बाद तो उस का प्रेम और परवान चढ़ जाया करता. जैसे कोई लता वृक्ष की आगोश में समा जाती है, बिलकुल वैसे ही उस की भावनाएं मुझ में समा जातीं.

वह खुद को मुझ में तलाशती और जब पा लेती तो चहक उठती. न पाने पर उदास हो जाती, यह सोचती कि मुझे उस की परवा नहीं.

मैं सब समझती रही और आनंद से अंतस को भिगोती रही. धीरेधीरे उस का मुझ में इस कदर आसक्त होना मुझे अच्छा लगने लगा था. उस की कमी खलने लगी थी. उस से मिलने को, बातें करने को मन करता और फिर फोन पर आवाज सुनते ही चंद मिनटों मे ही मन खिल जाता, ऐसा सब से पहले उस ने ही मुझे बताया था. उस के बाद मुझे भी वही लगने लगा.

धीरेधीरे ही सही, प्रगाढ़ता बढ़ती गई. इस प्रगाढ़ता का समय के साथ सुद्रढ़ हो जाना उसी तरह था जैसा दो लताओं का परस्पर आपस में एक हो जाना और जीवनपर्यंत उसी तरह से समाहित रहना. जलजला, विशालकाय वृक्षों को जड़ से उखाड़ फेंकता है, मगर लिपटी हुई लताओं को छू भी नहीं पाता.

भले ही आधुनिक युग में युवावर्ग कुछ तंग शब्द ले कर आया हो जिस में से लैसबियन जैसे शब्द हैं, जो प्रेम को अलग ही तरह से मापते हैं, जबकि उस समय इन शब्दों की, इन के मानों की कोई जगह न थी. दो व्यक्तियों का आत्मसात होना शुद्ध प्रेम का सूचक होता था.

वह हमेशा मुझे मरमिटने वाली शेरोशायरी से भरे खत लिखती. उन में उस की दिनचर्या का ब्योरा होता, जो उस की भीतरी विकलताओं की हलचल समेटे होता.  कुछ सवाल होते जो रोज ही पूछे जाते थे और फिर जवाब का इंतजार भी उसी शिद्दत से करती जैसे व्याकुलता की पोटली बगल में दबाए बैठी हो. मैं ने भी उस के सौम्य प्रेम को बड़े आदर से लिया और यह जताया भी कि मैं भी उस की परवा करती हूं, उसे याद करती हूं. नितांत शांत दिखने वाला मेरा व्यक्तित्व उस की उपेक्षा करने में असमर्थ था. मगर हां, मैं खत लिखने में थोड़ी ढीली जरूर थी. इस की शिकायत करने से वह कभी नहीं चूकती थी. तब मेरे मन के स्वर्णपुष्प कुम्हलाने लगते. मुझे एहसास होता कि अगर रोपे गए पौधे को खादपानी न दिया जाए तो वे मुरझा कर पीले पड़ जाते हैं और एक दिन टहनी से अलग हो कर झड़ जाते हैं.

फोन पर बात करना और खतों को पढ़ने का मिठैला एहसास,  इन दोनों ही चीजों का फर्क हम दोनों ही बखूबी समझते थे.

न जाने क्यों अपनी तारीफ सुन कर चहकने, इतराने के बजाय वह खामोशी अख्तियार कर लेती. बावजूद इस के, उस के खतों में ज्यादातर मेरी तारीफों के कसीदे गढ़े होते और यह भी ‘अगर ऐसा हो जाए तो कैसा रहे? वैसा हो जाए तो कैसा रहे?’ हम साथसाथ रहें?’  फिर वह संजीदा हो कर कह उठती- ‘बस, तुम दूर जाने की बात न किया करो, दी.’

दी, शब्द में एक अलग सा ठहराव होता है. एक ऐसा एहसास जो मुझ जैसी अंतर्मुखी, स्वभाव में सिमटी, तथाकथित दुर्लभ वस्तु की तरह मैं के लिए बड़ा ही खास था.

उस रोज़ लिखतेलिखते उस की याद काले, घटाघोर मेघों की तरह उमड़ पड़ी. तब मैं इतनी भावविभोर हो उठी कि मुझ से रहा न गया. आओ चलें प्रेमांजलिभर बगीचे की सैर कर लो, ह्रदय का आदेश था और  मैं ने तुरंत लैंडलाइन से फोन मिला लिया.

तब काले और बड़े वाले फोन हुआ करते थे जो अपनी जगह पर स्थाई रहा करते थे और एक जगह रखे रहते थे. उन्हें लगवाने के लिए लंबीलंबी तारें खिंचवाई जाती थीं. उस वक्त मोबाइल, इंटरनैट जैसी सुविधाएं थीं ही नहीं. फोन भी सीधे मिलाना संभव न था. पहले दूरसंचार विभाग को फोन मिलाओ, उसे  बताओ कौन सा नंबर चाहिए? फिर वह नंबर मिला कर देता था. तब जा कर बात हो पाती थी. उस पर भी एक भय, विभाग कर्मचारी उन की बातचीत को सुन न ले. शायद वह भी लाइन पर बन रहता था. ऐसा अनुमान था. फिर यह भी, वे लोग रोज हजारों फोन मिलाते होंगे, मुठठीभर कर्मचारी सब की बातें कहां तक और कब तक सुनेंगे?

जैसे ही मैं ने ‘हैलो’ कहा, उधर से मधुर आवाज कानों से टकराई. वह एक गीत गा रही थी जिस ने मेरे दिल को गहरे तक छू लिया. फिल्म ‘कभी-कभी’ का वह गीत आज भी मेरे जेहन में बिलकुल वैसा ही गूंजता है जैसा उस वक्त गूंजा था. गीत तो मुझे केंद्रित कर के गाया ही गया था, इस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण था उस का डूब कर उस में विलीन हो जाना. वह गीत था- ‘दिल आने की बात है जब कोई लग जाए प्यारा, दिल पर किस का जोर है यारो, दिल के आगे हर कोई हारा…’ वह खो गई थी. वह चाहती थी मैं इसे सुनूं और जो वह कहना चाहती है, वह समझ सकूं. यह मजाक नहीं था. वह पहले हंसी, फिर अचानक भावुक हो कर रो पड़ी थी, अगले ही पल संभल गई और खूबसूरती से बात को भी संभाल लिया.

धीरेधीरे वह मुझ में शक्कर की तरह घुलती जा रही थी, जिस का पता मुझे बाद में लगा था.

मुझे नहीं पता था, यह गीत इतना सुंदर है. उस दिन के बाद से आज तक यह गीत मेरी प्रिय सूची में रहा है.

वह उम्र में मुझ से छोटी थी, इसलिए हमेशा कहती तो ‘दी’ थी मगर जान प्रेमियों जैसे दिया करती थी. शायद, वह मेरे लिए पहाड़ से भी कूद जाती. सवाल जो आज तक कौँधते हैं वे ये हैं कि क्यों करती थी वह इतना प्रेम एक स्त्री से? पुरुष से क्यों नहीं? उस ने मुझ में ऐसा क्या देखा होगा? क्या पाती है वह मुझ में? लेकिन फिर भी, मैं ने कभी उस से पूछा नहीं.

उस का नाम था आलिया. बेहद खूबसूरत और संजीदा किस्म की लड़की थी वह. यह बात मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि वह भावुक तो थी ही, ईमानदार भी थी, क्योंकि हमारी पहली मुलाकात का किस्सा इस बात का प्रमाण है. वह मुलाकात बेहद रोचक थी. मुझे लेखन का शौक था, इस के लिए मैं हमेशा एकांत और शांत जगह तलाशती थी जहां दूरदूर तक कोई न हो. भीड़भाड़ से कोसों दूर जहां, बस, पंक्षियों का कलरव हो, हवाओं का संगीत हो, जहां भावों को प्रकृति से जोड़ा जा सके, हरियाली से रस चुराया जा सके और अनुभूति स्पंदन कर सकें.

ऐसे में मैदानी इलाकों को छोड़, मैं अकसर छुट्टियां पहाड़ों पर बिताती. कईकई दिन अकेले रह कर जब वापस लौटती तब दिल में सुकून होता और कागज भरे हुए. उस वक्त आज की तरह लैपटौप या कंप्यूटर नहीं होते थे. इन भरे हुए कागजों में मेरी जान होती, मेरी अमानत होती जिन्हें बड़ा ही संभाल कर रखा जाता. कई उपन्यास, कहानी यों ही रची जाती रहीं.

बेशक शुरुआती दौर में वह मेरे लिए एक कहानी का मसाला भर थी, मगर वह विचार चंद दिन ही ठहर सका. उस के बाद तो हमारा रिश्ता एक फुलवारी की तरह महकने लगा था जिस में पूरा गुलशन समाया हुआ था. उस की बेपरवाह महक हमारे चाहने न चाहने की परवा किए बगैर हर समय हमारे इर्दगिर्द बनी रहती.

बात उन दिनों की है जब मैं शिमला के एक होटल में ठहरी हुई थी. उस रोज मौसम बड़ा खराब हो गया था. आमतौर पर उसे खराब ही माना जाएगा, तेज बारिश जो रुकने का नाम ही न ले रही थी. मेघों की गरज ऐसी कि कलेजा निकाल कर रख दे. दिन में रात जैसा अंधकार और रहरह कर आसमानी बिजली का कड़कना, निश्चिततौर पर भयभीत कर देने वाला था. मगर मेरे लिए वह ऊर्जा का स्रोत था. कुछ रचने का सुअवसर था. तमाम नई कोंपलें फूटने को उद्धत हो रही थीं. जब कोई अंकुर पल्लवित होता है तो बड़ा ही बेपरवाह होता है. सीमाओं से उनमुक्त होता है. धरती का सीना चीर कर रास्तें बना लेता है और फिर नवसृजना की महक से, मन हिलोरे मारता है. संतुष्टि पांव पसार लेती है. मन ही कहां, अंतस भी तो भीगता है. भीगने से मतलब उल्लास से है, जो हर्ष की अनुभूति देता है. ऐसी ही तृप्त ऋतु में  मैं डूबी हुई थी.

कल्पनाओं ने अपना तिलिस्म फैला लिया था एक खूबसूरत से ख्वाब की तरह जो मेरे इर्दगिर्द फैला हुआ था और उस में से तमाम शब्दों ने झांकना शुरू किया था और मैं कागजों में उलझी थी. यह उपन्यास नहीं, बल्कि प्रेमग्रंथ था मेरे लिए जिसे बड़ी तन्मयता से रचा जा रहा था. प्रेम चूंकि प्रेम है, उस पर जितना लिखा जाए कम है. कितने ही शायर, कवि और गीतकार हुए हैं जिन्होंने प्रेम को अपनेअपने तरीके से बयान किया है और अपने दिल को फाड़ती हुई मारक व तपती हुई नगमों से पत्थरों को भी पिघला दिया. मुर्दों मे भी जान फूंक दी और प्रेमियों की तो चांदी ही चांदीं. अकसर जब इजहार के लिए शब्द न हों तो गजलें और रोमांस से भरे गीत ही तो काम आते हैं.

फुल टाइम मेड: क्या काजोल के नखरे झेलने में कामयाब हुई सुमी ?

रितु यों मुझे कभी इतना इसरार कर के नहीं बुलाती थी. लेकिन आज उस ने ऐसा किया. मुझ से कहा कि शाम की चाय पर मैं उस के घर आ जाऊं, तो मुझे लगा कि कहीं नया एलसीडी टीवी तो नहीं खरीद लिया रितु ने या फिर नया फ्रिज, सोफा अथवा जरूर हीरे का सैट खरीदा होगा.

उस के घर पहुंची तो दरवाजा सलवारकमीज पहने एक युवती ने खोला.

मुझे देखते ही सिर झुका कर बोली,

‘‘गुड ईवनिंग.’’

मैं सकपकाई कि कौन हो सकती है यह बाला? रितु की बहन तो है नहीं, जहां तक मुझे पता है ननद भी नहीं है. इस से पहले कि मैं कुछ कहती, वह बड़े अदब से बोली, ‘‘प्लीज, कम इन, मैडम आप का वेट कर रही हैं.’’

मैं अपनेआप को संभालती कमरे में आई. मुझे देखते ही रितु उठ खड़ी हुई और गले लगाते हुए बोली, ‘‘क्या यार, बड़ी देर कर दी,’’ फिर बोली, ‘‘ममता, जल्दी से समोसे गरम कर ले आ. ब्रैडपकौड़े तल लेना और हां, 2 तरह की चटनी भी बना लेना.’’

मैं बेवकूफों की तरह उस का मुंह ताकने लगी. रितु ने हाथ पकड़ कर मुझे बैठाते हुए कहा, ‘‘सुमी, बड़ा आराम हो गया है, ममता के आने के बाद. ममता, मेरी फुल टाइम मेड, हर तरह का खाना बनाना जानती है. अपनी घरेलू बाइयों की तरह कोई खिटपिट नहीं. यहीं रहती है, जब चाहो, जो चाहो हाजिर.’’

और ममता मिनटों में समोसे और ब्रैडपकौड़े ले आई, तमीज से ट्रे में रख कर. साथ में एक मीठी चटनी और एक पुदीने की तीखी चटनी. इतनी स्वादिष्ठ कि मन हुआ ममता के हाथ चूम लूं. ‘तो यह थी वह नगीना, जिसे दिखाने के लिए रितु ने मुझे टी पार्टी पर बुलाया था,’ मैं ने मन ही मन सोचा.

समोसे का एक कौर खाने के बाद रितु मुझे विस्तार से जलाने लगी, ‘‘देख सुमी, अपनी काम वालियों से आप इसी बात की उम्मीद नहीं कर सकते कि वे मेहमानों की आवभगत करें. फिर स्टेटस की भी बात है.

मुझे घर का एक काम नहीं करना पड़ता. सुबहसवेरे बैड टी हाजिर. बाजार से सब्जी वगैरह लाने का काम भी यह कर देती है. हम तो भई सुबह बैड टी पी कर जिम जाते हैं. लौटते हैं तो गरमगरम नाश्ता तैयार होता है. दोपहर को लजीज खाना, शाम को चाय के साथ नाश्ता और रात को शाही डिनर. कभी चाइनीज, तो कभी मुगलई, कभी साउथ इंडियन तो कभी पंजाबी.’’

मैं रितु के उस नगीने पर से नजरें नहीं हटा पा रही थी. मुझे अपनी काम वाली की 100 कमियां सिरे से सताने लगीं. आज सुबह वह मुझ से पगार बढ़ाने की बात कह चुकी थी. हर सप्ताह 1 या 2 दिन गायब रहती. सुबह

6 बजे उस के 1 बार घंटी बजाने पर दरवाजा न खोलूं, तो वह तुरंत दूसरे घर चली जाती. फिर उस के दर्शन होते दोपहर बाद. अगर सिंक में कभी बरतनों की संख्या 2-4 अधिक हो जाए, तो वह कांच की एकाध आइटम तोड़ने के बाद भी बुदबुदाना जारी रखती मानो हमें बरतन की जगह पत्तलों में खाना चाहिए.

साफसफाई में अगर कभी कोई मीनमेख निकाल दो, तो झाड़ू वहीं पटक कर पूरा हिसाब देने बैठ जाती है कि उस से बेहतर काम कोई कर ही नहीं सकता.

रितु का भी महीने भर पहले तक कमोबेश यही हिसाब था, लेकिन आज उस की स्थिति ऐसी थी मानो वह जनरल मैनेजर हो और मैं उस की कंपनी में एक साधारण क्लर्क.

समोसे, ब्रैडपकौड़े और चाय गटकने के बाद मैं ने पूछ ही लिया, ‘‘तुम यह नगीना कहां से लाई हो?’’

रितु ने भेद भरे अंदाज में कहा, ‘‘यों तो मैं किसी को बताती नहीं, पर तुम मेरी बैस्ट फ्रैंड हो, इसलिए बता रही हूं. शहर में मेड सप्लाई करने वाली कई एजेंसियां हैं, लेकिन इस एजेंसी की बात ही अलग है. सारी लड़कियां ट्रैंड हैं.’’

मैं मुद्दे पर आती हुई पूछ बैठी, ‘‘पैसा तो बहुत लेती होगी?’’

रितु ने मुझ पर बेचारगी से निगाह डाली, फिर बोली, ‘‘सुमी, तुम जाने दो. तुम एफोर्ड नहीं कर पाओगी. मेरी बात अलग है. हसबैंड का प्रमोशन हुआ है, फिर मुझे…’’

मैं खीज कर बोली, ‘‘अब बता भी दो.’’

रितु ने धीरे से कहा, ‘‘डिपैंड करता है कि तुम अपनी मेड से क्याक्या करवाना चाहती हो. सिर्फ इंडियन खाना बनाने वाली थोड़ा कम चार्ज करती है. अगर उसी से तुम घर का सारा काम भी करवाओगी तो कुछ ज्यादा खर्च करना होगा. अब मैं तुम्हें ममता का रेट तो नहीं बता सकती, एजेंसी वाले मना करते हैं. हां, तुम चाहो तो मैं तुम्हें एजेंसी का फोन नंबर दे सकती हूं, साथ भी चल सकती हूं.’’

रितु के घर से लौटते हुए मेरी आंखों के आगे बस ममता ही घूम रही थी. घर पहुंचतेपहुंचते मैं ने तय कर लिया कि चाहे जो हो जाए, मुझे फुलटाइम मेड चाहिए ही चाहिए. बस दिक्कत थी, अपने पतिदेव को पटाने की और उस काम में तो मैं माहिर थी ही.

रितु के साथ मैं एजेंसी पहुंच गई मेड लेने. मैं इस तरह तैयार हो कर गई थी मानो शादी में जा रही हूं. मेड और एजेंसी वालों पर इंप्रैशन जो जमाना था. एजेंसी क्या थी, पूरा फाइव स्टार होटल था. जाते ही हमारे सामने कोल्ड ड्रिंक आ गया. फिर हम एसी की हवा खाने लगे.

तभी हीरो जैसे दिखने वाले एक व्यक्ति ने मेरे सामने एक फार्म रखा और फिर बड़ी मीठी आवाज में शुद्ध अंगरेजी में मेरा इंटरव्यू लेने लगा. मैं कहां तक पढ़ी हूं, कितने कमरों के घर में रहती हूं, पति क्या करते हैं, ऊपरी आमदनी है या नहीं, घर अपना है या किराए का, हम दिन में कितनी दफा खाते हैं, सप्ताह में कितनी बार मेहमान आते हैं, मेहमान किस किस्म का खाना खाते हैं, घर में कोई पानतंबाकू खाने वाला तो नहीं है, सब्जीभाजी वाले से 5-10 रुपए के लिए चिकचिक तो नहीं करते. वगैरहवगैरह.

फिर उस ने रेट कार्ड देते हुए कहा,

‘‘यह रहा हमारा रेट कार्ड, इस में देख कर टिक लगा दीजिए.’’

भारतीय खाना पकवाने के 2 हजार रुपए, चाइनीज के ढाई हजार, अगर कभीकभार मुगलई या कौंटीनैंटल बनवाना हो तो 3 हजार रुपए, इस के अलावा नाश्ते की आइटम के लिए हजार रुपए अलग से.

मैं ने सकपका कर रितु की तरफ देखा. रितु ने फिर से कुहनी मारी, बोली, ‘‘सुमी, तुम सिर्फ इंडियन खाने के लिए रख लो. मुगलई और चाइनीज बनवा कर क्या करोगी?’’

मेरे अहम को इतना जबरदस्त धक्का लगा कि मैं ने तुरंत लपक कर मुगलई वाले में टिक लगा दिया. हीरो ने हिसाबकिताब लगाना शुरू किया और अब की बार थोड़ी विनम्रता से बोला, ‘‘मैडम, आप को हर महीने मेड को

4 हजार रुपए देने होंगे. हफ्ते में 1 दिन की पूरी छुट्टी. साल में 15 दिन की अतिरिक्त तनख्वाह और गांव आनेजाने का सैकंड एसी का किराया. इस के अलावा हमें आप 2 महीने की तनख्वाह डिपौजिट के रूप में देंगी. अगर बीच में कभी आप मेड को निकाल देंगी, तो हम यह पैसा वापस नहीं करेंगे. अगर यह खुद छोड़ कर चली जाएगी, तो डिपौजिट वापस हो जाएगा.’’

तो क्या हुआ, जो मुझे अपनी नई स्कूल की नौकरी में इस मेड के बराबर तनख्वाह मिलती है, स्टेटस भी तो कोई चीज है. मैं अपने साथ सिर्फ 5 हजार रुपए लाई थी, बाकी रितु से उधार ले कर उसे थमाए, तो उस ने मेरे सामने एक सांवली, दुबलीपतली लड़की पेश कर दी.

‘‘मैडम, यह हमारी खास मेड है. नाम है काजोल. एक बार इस के हाथ का पका खाना  खाएंगी, तो बारबार हमें याद करेंगी.’’

काजोल अपना सूटकेस ले कर आई, तो रितु ने धीरे से टोका, ‘‘इसे टैक्सी में आने के पैसे दो. यह तुम्हारे साथ टू व्हीलर पर कैसे जाएगी?’’

मैं ने पर्स से एक आखिरी बचा 100 का नोट निकाल कर काजोल को थमा दिया.

रितु को उस के घर छोड़ते हुए मैं काजोल के संग घर आ गई. मेरा घर देख कर काजोल खास खुश नहीं दिखी. घर देखने के बाद पूछा, ‘‘मैडमजी, मैं कहां रहूंगी?’’

मैं ने घर के बाहर बने कमरे की ओर इशारा किया तो उस ने नाकभौं सिकोड़ते हुए कहा, ‘‘मैडम, कुछ तो मेरी इज्जत का खयाल करो. ऐसे अंधेरे कमरे में मुझे नहीं रहना. मुझे अटैच्ड बाथरूम वाला कमरा दो.’’

उस की निगाहें मेरे कमरे पर थीं. मैं ने सकुचा कर कहा, ‘‘काजोल, ऐसा तो कोई कमरा है नहीं. वैसे दिन भर हम हसबैंडवाइफ तो बाहर ही रहेंगे. तुम ऐसा करो, ड्राइंगरूम में रह लेना. यहां तो कूलर भी है.’’

काजोल को बात पसंद तो नहीं आई, पर उस ने सामान ड्राइंगरूम के कोने में रख दिया. मुझे लगा कि आते ही वह रसोई देखना चाहेगी, पर वह देखना चाहती थी बाथरूम. मेरे बाथरूम में देर तक नहाने के बाद वह बोली, ‘‘मैडम, चाय पीने का मन हो रहा है. रसोई कहां है?’’

मैं खुश हो गई, ‘‘हांहां, चाय के साथ समोसे भी बना लो. हसबैंड भी घर लौटते होंगे.’’

उस का मुंह बन गया, ‘‘मैडम, आज सुबह की ट्रेन से आई हूं. आज चाय पी कर रेस्ट करूंगी. रात को खाने पर कुछ सिंपल बनवा लेना.’’

मुझे बोलने का मौका ही नहीं दिया उस ने. खैर, मुझ से पूछपूछ कर उस ने चाय बनाई. उसे चूंकि ज्यादा दूध वाली चाय पसंद थी, इसलिए वह चाय मुझे पीनी पड़ी. इस के बाद वह ड्राइंगरूम में एक चादर बिछा कर लेट

गई. मुझे हिदायत दे गई कि 8 बजे से पहले उसे न उठाऊं.

पतिदेव घर पर पधारे. जैसे ही ड्राइंगरूम में उन के चरण पड़े, मैं ने उन्हें रोक लिया और मेड की तरफ इशारा किया, ‘‘देखो, कौन आया है.’’

पतिदेव ने मेरी तरफ बेचारगी वाली निगाह डाली और कहा, ‘‘चाय मिलेगी?’’

अभी 8 नहीं बजे थे, इसलिए चाय मैं ने ही बनाई, यह कहते हुए कि रात से पूरा काम मेड करेगी.

8 बजे तक किसी तरह जज्ब किया अपने को. ठीक 8 बजे उसे उठाया तो वह कुनमुन करती उठी, ‘‘मैडम, यह क्या, इतना शोर मचा दिया. मेरा तो सिर दर्द करने लगा.’’

खैर, मेरे बाथरूम में हाथमुंह धो कर वह किचन में आई. तब तक मैं घर में बची सब्जियां, लौकी, तुरई और आलू निकाल चुकी थी.

काजोल ने जैसे ही सब्जियों की तरफ निगाह डाली, हिकारत से बोली, ‘‘मैडम, आप को एजेंसी वाले ने बताया नहीं कि मैं लौकी और तुरई जैसी सब्जियां न बनाती हूं, न खाती हूं?’’

मैं ने बात संभालते हुए कहा, ‘‘मैं आज सुबह से बिजी थी न, इसलिए दूसरी कोई सब्जी ला नहीं पाई. जाने दो, आज दालचावल खा लेंगे, वैसे भी सुबह का खाना रखा है फ्रिज में.’’

जब मैं पतिदेव को दिन का खाना माइक्रोवेव में गरम कर के खिलाने लगी, तो उन्होंने मेरी तरफ करुणा भाव से देखा और बोले, ‘‘सुमी, कोई बात नहीं. मुझे तो जो खिला दोगी, खा लूंगा.’’

मैं ने कुछ मनुहार से कहा, ‘‘बस, आज की बात है. कल से रोज तुम्हें चाइनीज, कौटीनैंटल और मुगलई खाना मिला करेगा.’’

कल के सपनों में खोई जो सोई, तो नींद दरवाजा खटखटाने की आवाज से भी नहीं खुली. पतिदेव जाग गए. दरवाजा खोला तो सामने काजोल खड़ी थी.

‘‘सर, मुझे जमीन पर लेट कर नींद नहीं आ रही, आप कहें तो सोफे पर सो जाऊं?’’

पतिदेव ने हां में सिर हिला दिया. करते भी क्या. सुबह उठी, तो ड्राइंगरूम में सोफे पर काजोल को सोया देख, पारा चढ़ने लगा. इस से पहले मैं कुछ कहती, पतिदेव ने मेरा हाथ दबा कर धीरे से कहा, ‘‘बेचारी को जमीन पर नींद नहीं आ रही थी, मुझ से पूछा तो मैं ने ही कहा कि…’’

मैं चुप रह गई. चाय का पानी चढ़ा कर काजोल को आवाज लगाई. सुबह का नाश्ता कौन बनाएगा?

काजोल की मरी सी आवाज आई, ‘‘मैडम, देखिए बुखार आ गया है मुझे.’’

स्कूल से लौटी, तो काजोल सुबह वाली अवस्था में मुंह ढांपे सो रही थी. मैं ने घर के अंदर कदम रखा, तो लगा पता नहीं किस के घर आई हूं. रात से गंदा पड़ा घर वैसा ही था. कमरे में कूड़ा, ड्राइंगरूम में अस्तव्यस्त मेड का बिस्तर, किचन में हर तरफ गंदगी, सिंक में जूठे बरतन.

मैं ने किसी तरह अपने को नियंत्रित कर मेड एजेंसी में फोन घुमाया. हीरो लाइन पर आया, तो उसे अपने मन की पीड़ा बताई कि यह क्या, मेड तो घर आते ही बीमार पड़ गई.

हीरो ने उत्तेजित आवाज में कहा,

‘‘मैडम, हम ने तो आप को मेड बिलकुल सहीसलामत दी थी. आप उसे जल्दी से अच्छा करिए. वैसे भी हम डिफैक्टिव पीस वापस नहीं लेते.’’

मैं भन्नाती हुई रसोई में पहुंची. काजोल लड़खड़ाती हुई उठी, ‘‘मैडम, सुबह से चक्कर आ रहे हैं. लगता है आप के घर का पानी मुझे सूट नहीं किया.’’

मैं उस के सामने बरतन साफ करने लगी. पर उस ने उफ तक नहीं की. मैं ने

मरता क्या न करता की शैली में अपनी कालोनी के डाक्टर को घर बुलवा लिया. डाक्टर पुराने थे, पर काजोल की बीमारी नई थी. वे थक कर बोले, ‘‘वैसे तो कोई बीमारी नहीं लगती, पर एहतियात के लिए 2-4 गोलियां लिख देता हूं.’’

दवा खाने के बाद वह फिर सो गई. शाम ढली और रात की बारी आ गई. मुगलई, चाइनीज के सपने देखती हुई मैं बुरी सी शक्ल बनाती हुई रितु ऐंड फैमिली की बाट जोहने लगी. अब बाहर से खाना मंगवाने के अलावा चारा क्या था?

ठीक समय पर मेहमान आए. घर की हालत देख रितु पहले तो चौंकी, फिर मुझे कोने में बुला कर आवाज को भरसक मुलायम बनाते हुए बोली, ‘‘सुमी, देखो कुछ लोग होते हैं, जो नौकरों से काम निकलवाते हैं और कुछ लोग नौकरों के लिए काम करते हैं.’’

मेरा चेहरा फक्क पड़ गया. मेरा हाथ दबा कर वह कुछ धीरज बंधाती हुई बोली, ‘‘तुम रहने दो सुमी. तुम से मेड नहीं पाली जाएगी. इस के चोंचलों में चोंच दोगी, तो जल्द ही यह तुम्हारे बैडरूम में सोने लगेगी और तुम इस के कपड़े धोती नजर आओगी.’’

मैं रोआंसी हो उठी. वाकई 2 दिन के जद्दोजहद के बाद मुझे यह समझ में आने लगा कि फुलटाइम मेड नामक बला से निबटना मुझे नहीं आएगा.

जातेजाते रितु मुझे जरूरी टिप दे गई, ‘‘देखो, अगर तुम इसे निकालोगी, तो तुम्हें डिपौजिट के पैसे नहीं मिलेंगे. कुछ ऐसा करो कि यह खुद छोड़ जाए.’’

बात मेरी समझ में आ गई. रात में मैं ने काजोल का बिस्तर बाहर वाले कमरे में डलवा दिया और कुछ सख्त स्वर में कहा, ‘‘डाक्टर कह रहे थे, तुम्हें छूत की बीमारी हो सकती है. तुम अलग रहो. खानापीना मैं तुम्हें कमरे में पहुंचा दूंगी.’’

रितु की तरकीब कामयाब रही. अगले ही दिन काजोल की तबीयत ठीक हो गई. न सिर्फ वापस उस ने ड्राइंगरूम में डेरा जमाना चाहा, बल्कि सुबह उठ कर नाश्ता बनाने को भी तैयार हो गई. मैं ने उस के हाथ का बना मंचूरियन और कोफ्ते खाए, तो लगा कि जल्द ही बिस्तर पर पड़ जाऊंगी.

मैं ने कमर कस ली कि डिपौजिट के पैसे तो वापस ले कर रहूंगी. अत: न मैं ने उसे ड्राइंगरूम में आने दिया, न उसे लौकी और तुरई के अलावा बनाने के लिए कोई तीसरी सब्जी दी. चौथे दिन एजेंसी से फोन आ गया, ‘‘मैडम, आप आ कर डिपौजिट के पैसे वापस ले जाइए. काजोल आप के यहां काम नहीं करना चाहती.’’

इस बार मेरा सीना कुछ चौड़ा हुआ. मैं ने काजोल को बस के पैसे दिए और टू व्हीलर से जा कर अपने डिपौजिट के पैसे वापस ले आई. लौटते हुए मैं ने अग्रवाल स्वीट हाउस से गरमगरम समोसे खरीद लिए. आखिर अपनी औकात पर तो आना ही था.

कर ले तू भी मुहब्बत- भाग 2

 

भले ही आकाश के दिल में उस के लिए कोई जगह नहीं थी, सिर्फ अट्रैक्शन था, पर वह नादान तो आकाश की नशीली बातों को प्यार समझ बैठी थी.

अब वह भी चाशनी में भीगे हुए दुनिया के सब से मीठे अल्फाज… मुहब्बत का स्वाद चख लेना चाहती थी. अपने दिल के कोरे पेपर पर किसी का नाम लिख देना चाहती थी. इसलिए उस ने भी आकाश का नाम अपने दिलोदिमाग और लैपटौप से झटक कर अलग कर दिया और फिर से अपना टिंडर अकाउंट खोल कर बैठ गई.
उस की नजर फ्रेंड सजेशन पर गई. उस ने तुरंत वह प्रोफाइल खोली. नाम था क्रिश और वह एमबीए का छात्र था.

इस बार वह कोई गलती नहीं करना चाहती थी. वो कहते हैं ना, दूध का जला छाछ भी फूंकफूंक कर पीता है. उस ने अपनी समझदारी का परिचय देते हुए क्रिश का फेसबुक और इंस्टा अकाउंट भी खंगाल डाला. इस तहकीकात के दौरान उस ने जाना कि वो एक पढ़ाकू किस्म का लड़का है, जिस ने ओलिंपियाड जैसी कई कंपटीशन का प्रथम खिताब अपने नाम कर रखा था. इस के सिवा वह भी मुसकान की तरह साहित्यप्रेमी था. कई प्रसिद्ध हिंदी और अंगरेजी साहित्यों के रिव्यू उस की वाल पर थे.

मुसकान ने सोचा कि कला प्रेमी है… वह जरूर ही बहुत डीसेंट होगा और प्यार की रूहानी गहराई को समझता होगा… ना कि सिर्फ जिस्मानी संबंध बनाने को इच्छुक होगा. उस ने राइट स्वाइप कर दिया, क्रिश भी जैसे बरसों से इसी पल की तलाश में था, तुरंत इट्स अ मैच का नोटिफिकेशन मुसकान की स्क्रीन पर आ गया.

“मुसकानजी, हम ने आप को आप के कालेज के एन्यूअल फंक्शन में देखा था, तब से ही आप को दिल दे बैठे हैं. और आप हम पर भरोसा रखिएगा… ये सिर्फ फ्लर्ट नहीं हम आप से सच्चीमुच्ची का प्रेम करते हैं.

“आप यकीन मानिएगा, आप हमारा पहला और आखिरी प्यार हैं. टिंडर और फेसबुक पर कब से आप को रिक्वेस्ट भेज कर आप के जवाब में राहों में फूल बिछा कर बैठे हैं.

“आप को एक सीक्रेट बताएं… आप के दीदार के लिए तो कई दीवाने कालेज छूटने के वक्त कालेज गेट के बाहर मंडराते रहते हैं. उन में से एक हम भी हैं…

“और आप इतनी हसीन हैं कि जब आप पास से गुजरती हैं तो लगता है कि इत्र की शीशी खोल कर किसी ने हमारे बीच रख दी हो, जिस में हम डूबतेउतरते रहते हैं,” क्रिश ने शरमाते हुए कहा था.

उस की इस मासूमियत भरी दरियाफ्त पर मुसकान हंसे बिना नहीं रह पाई थी.

“तो आप बिहार से हैं…?”

“ओ… हो… तो आप भी हम में उतनी ही इंट्रेस्टेड हैं और हमारी पूरी कुंडली भी निकाल चुकी हैं .”

“नहीं क्रिश, ऐसी कोई बात नहीं है. इनसान की भाषा उसे खुद ब खुद बयान कर देती है. बाय द वे… आई लव्ड योर नेम… क्रिश.”

“थैंकयू… वैसे, हमारा गुड नेम तो कृष्णा है, पर यहां मुंबई आ कर अपनेआप क्रिश में तबदील हो गया. हम यहां पोपुलर ही इतने हैं. बचपन से ही मैथ्स विषय में हमारी पकड़ बहुत मजबूत रही है. मुश्किल से मुश्किल सवाल भी हम चुटकियों में सोल्व कर जाते हैं.”

“ओ वाउ… दैट्स वंडरफुल .. मे गौड कंटीन्यू टू शावर ब्लेससिंग्स औन यू.”

“हां मुसकानजी, आप को हम सच बताएं, तो यह सब ऊपर वाले से मांगी मनौती का ही परिणाम है,” कहते हुए उस ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए.

मुसकान ने देखा कि उस ने अपने हाथों में ग्रहों को रिझाने के लिए अलगअलग अंगूठी और गले में भी तावीज पहन रखा था. पर फिर भी क्रिश उसे संस्कारी और एक भला लड़का लगा. देखने में भी वह ठीकठाक था, क्योंकि इस से पहले उस का पाला आकाश से पड़ा था, जो अल्ट्राफास्ट था. धीरेधीरे दोनों के बीच चैटिंग बढ़ने लगी. दोनों एकदूसरे के साथ अधिक समय व्यतीत करने लगे.

“अच्छा मुसकानजी बाय… मैं आप से शाम को बात करूंगा,” एक दिन चैट के दरमियान क्रिश ने मुसकान से कहा.

“अरे, अचानक ऐसे क्यों बाय…?” मुसकान ने पूछा.

“वो क्या है ना, मुझे एग्जाम का फार्म भरना है. सवा 6 बजे का समय बहुत अच्छा है और 6 बज कर 10 बज चुके हैं, वरना शुभ समय टल जाएगा.”

डिसकनेक्ट होने के बाद मुसकान सोचने पर मजबूर हो गई थी. अपने कैरियर के लिए सजग होना अच्छी बात है… पर क्रिश का इतना अंधविश्वासी होना उसे रास नहीं आया. उसे लगने लगा कि क्रिश एक नेकदिल लड़का है और दोस्ती के लिए विश्वसनीय भी है, पर उस के सपनों का राजकुमार तो हरगिज नहीं है. अब वह काफी मायूस थी और शायद सीरियस भी…

पर, अब वह हार मानने वाली नहीं थी, वह भी अन्य लड़कियों की तरह अपने कालेज की ऐक्साइटिंग लाइफ जीना चाहती थी, जिस से वह अब तक महरूम थी. बायजू उस के फोन के ऐपस्टोर की लिस्ट में सब से नीचे चला गया था और उस की जगह कुछ महीनों से टिंडर ने ले ली थी.

वह कुछ सोच पाती, तभी उस की नजर अपने मेल बौक्स पर गई. उस में अरविंद के कई मेल्स थे, वह श्रीराम कालेज में पढ़ता था. वैसे तो उस का नाम अरविंद था, पर सब प्यार से उसे अवि बुलाते थे.

“उफ्फ,” उस ने पिछले कई दिनों से अपना मेल बौक्स ही चैक नहीं किया था. अवि ने उसे पोयट्री के सारे चैप्टर्स के नोट्स भेजे थे, जो अगले महीने होने वाले एग्जाम में आने वाले थे.

अवि और उस की पहचान ‘थौट बबल’ नाम के एक फेसबुक ग्रुप, जो लिटरेचर के स्टूडेंट्स द्वारा बनाया गया था, के जरीए हुई थी. वह एमए करने के बाद पीएचडी कर रहा था, इसलिए उस की अन्य स्टूडेंट्स और प्रोफैसर्स से काफी पहचान थी. वह मुसकान के लिए टौपर्स द्वारा बनाए नोट्स मेल कर दिया करता था. वह दूसरे लड़कों से बिलकुल अलग था. जहां दूसरे लड़के सोशल मीडिया पर नईनई गर्लफ्रैंड्स बनाने और आभासी रिश्ते निभाने में व्यस्त रहते थे, वहीं वो पार्टटाइम जौब कर अपना खर्च खुद निकालता था और अपना बचा हुआ समय लाइब्रेरी में बिताता था.

गोराचिट्टा, लंबा, स्मार्ट और बिलकुल स्ट्रेटफोर्वर्ड. पहली बार में ही वह चौकलेटी लगा था मुसकान को. इसलिए वह दिन में कई बार अवि का फेसबुक अकाउंट खोलती थी.

एक साल से ऊपर हो गए थे फेसबुक पर दोनों की दोस्ती हुए, वह मुसकान का कितना खयाल रखता था और मुसकान भी तो उस के मैसेज का, उस के काल्स का कितनी बेसब्री से इंतजार करती थी. यह प्यार नहीं तो और क्या था.

अवि ने लफ्जों से शायद कुछ ना कहा हो, पर वह बिना कहे उस की जरूरतों को, उस की परेशानियों को समझ जाता था. कितनी नासमझ निकली वो, जो उस की फिक्र में छिपे प्यार के कंपन को महसूस ही नहीं कर पाई थी. अकसर हम वही सुनते हैं, जो बात हमारे कान सुन पाते हैं, पर किसी के मौन में छिपे… अनकहे शब्दों को महसूस ही नहीं कर पाते, जो शब्दों से भी अधिक संजीदा होते हैं. उस का बुक कैबिनेट तो रोमांटिक साहित्य का दरिया था, जहां से सिर्फ मुहब्बत के अलगअलग एहसासों की लहरें उठा करती थीं. कैबिनेट में सब से ऊपर रखी किताब, जो उस ने हाल ही में पढ़ी थी, से कुछ पंक्तियां बहती हुई सी आईं और उसे झकझोर गईं…
“राज खोल देते हैं
नाजुक से इशारे अकसर,
कितनी खामोश
मुहब्बत की जबान होती है…”

उसे लगा, उस का साहित्य प्रेम बेकार ही गया… जब वह खुद के दिल में दस्तक दे रही प्यार की आहट को महसूस नहीं कर पाई.

अभी फेयरवैल पार्टी की तो बात है. उस ने अवि को खुद की तरफ अपलक निहारते हुए पकड़ लिया था. वह समझ गई थी कि अवि की पलकों में भी एक नया ख्वाब जन्म ले रहा है. उस के पूरे बदन में एक सिहरन सी दौड़ गई.

“चलो मुसकान, एक सेल्फी हो जाए,” कहते हुए अवि उस का हाथ पकड़ते हुए गार्डन में ले आया. उस के स्पर्श ने मुसकान की रूह को अंदर तक भिगो दिया था. वो दोनो पार्टी के बाद भी कैफे में बैठ कर घंटों बातें करते रहे.

“क्या हम हर संडे यहां कैफे में मिल सकते हैं?” उस के प्रणय निवेदन के साथ ही मुसकान के दिल में भी नई ख्वाहिशें मचलने लगी थीं.

Diwali Special: फैस्टिव मूड में ऐसा हो मेकअप

त्योहारों का मौसम यानी मिलनेजुलने, खुशियां बांटने और सजनेसंवरने का मौका. इस मौके पर बनावशृंगार न केवल आप की खूबसूरती को निखारता है, बल्कि आप के मन में भी उत्सव का भाव उत्पन्न करता है. उत्सव का भाव आप के मन के साथसाथ आप के चेहरे को भी चमकातादमकाता रहे, इस के लिए दिल्ली प्रैस भवन में आयोजित फेब मीटिंग में ब्यूटी ऐक्सपर्ट व हेयरस्टाइलिस्ट सुमन सचदेवा ने दीवाली के अवसर पर मेकअप व हेयरस्टाइल से संबंधित कुछ टिप्स सुझाए ताकि दीवाली पर आप

दिखें खास आपका मेकअप:

चेहरे का मेकअप करने के लिए पहले चेहरे को बेस प्रदान करें. बेस प्रदान करने के लिए चेहरे पर फाउंडेशन लगाएं. फाउंडेशन का चेहरे की स्किन के रंग से 1 टोन हलका शेड लें. तैलीय स्किन के लिए वाटरबेस्ड फाउंडेशन लें तो शुष्क स्किन के लिए मौइश्चराइजरबेस्ड. युवतियां पैनस्टिक लें जबकि मैच्योर व ड्राई स्किन वाली महिलाएं औयलबेस्ड फाउंडेशन लें. चेहरे पर फाउंडेशन लगाने से पहले चेहरे व गरदन को क्लींजर से अच्छी तरह साफ करें. फिर हलके गीले चेहरे पर बेस को एकसार फैलाएं. अब लूज पाउडर व कौंपैक्ट लगाएं.

आंखों का मेकअप

अब बारी आती है आंखों के मेकअप की. दीवाली की जगमगाती रोशनी में रात की पार्टी के लिए. आईमेकअप करने से पहले पलकों पर हलके ब्रश से बारीबारी से फाउंडेशन व लूज पाउडर लगाएं. आईपैंसिल से ऊपर की पलकों पर पतली रेखा खींच कर उसे ब्रश द्वारा फैला दें ताकि आईलिड बड़ी दिखें. यदि आप मल्टीशेड का लहंगा या साड़ी पहन रही हैं, तो एक शेड का आईशैडो लगाएं व दूसरे कलर का लाइनर आंखों पर लगाएं.

आंखों को हाईलाइट करने के लिए सिल्वर कलर का हाईलाइटर लगाएं. पलकों को घना लुक देने के लिए आर्टिफिशियल लैशेज लगा कर कर्लर से कर्ल करें और फिर मैजिक मसकारा का कोट लगाएं. अगर आईलैशेज कुदरती घनी हैं तो मसकारा का एक कोट लगाएं. मसकारा आईब्रोज को ऊपर उठाते हुए ऊपर की ओर लगाएं. इस से यह अच्छी तरह लगेगा. इस के बाद नीचे बोल्ड काजल भी लगाएं व ऊपर से लाइनर लगाएं. इस से काजल पूरी तरह सील हो जाता है.

ग्लो इफैक्ट के लिए

चेहरे पर ग्लो इफैक्ट देने के लिए शिमर और ग्लिटर का प्रयोग करें. होंठों पर लिपस्टिक का डार्क शेड लगाएं व लिप सीलर से सील कर दें. ऐसा करने से लिपस्टिक देर तक टिकी रहेगी. इस के ऊपर ग्लौस लगाएं.

अगर आप इंडोवैस्टर्न ड्रैस पहन रही हैं, तो आंखों की स्मोकी लुक दें. आईलिड पर ग्रेइश ब्लैक या ड्रैस से मैचिंग कोई आईशैडो लगाएं. इंडोवैस्टर्न लुक के लिए चाहें तो टैटू या फैंटैसी मेकअप भी करा सकती हैं.

हेयरस्टाइल:

अगर आप पारंपरिक शृंगार के साथ सिंपल हेयरस्टाइल बनाना चाहती हैं, तो बालों में फं्रट का पफ बना कर साइड फिश चोटी बना सकती हैं और चोटी को स्वरोस्की व कलरफुल बीड्स से सजा सकती हैं या फिर हाईबन बना कर स्टाइलिश हेयर ऐक्सैसरीज से सजा सकती हैं.

दीपिका पादुकोण लुक:

आगे के सारे बालों को बैककौंबिंग कर के पफ बनाएं. पीछे के थोड़े बालों को कर्ल करें व ऊपर की ओर पिनअप करें. बाकी बचे बालों में रबड़बैंड लगा कर चोटी बना लें. चोटी में पिन की सहायता से लंबी स्टफिंग लगाएं. पीछे के बालों से स्टफिंग को कवर करें. बचे बालों में जूड़े वाली स्टफिंग लगाएं व बालों को ट्विस्ट करते हुए जूड़े को ढकें. अंत में स्टोन वर्क वाली हेयर ऐक्सैसरीज से सजाएं.

ध्यान रखें

मेकअप करते समय अपनी स्किन टोन का भी ध्यान रखें. यदि स्किन पिगमैंटेड है, तो फाउंडेशन के साथ कंसीलर का भी प्रयोग करें व ध्यान रखें वह स्किनटोन से लाइट हो.

डार्क मेकअप के लिए हरे, काले, ग्रे पर्पल कलर के आईशैडो का इस्तेमाल करें. मेकअप के साथ मैचिंग ज्वैलरी पहनें. ट्रैडिशनल लुक के लिए हैवी इयरिंग्स व नैकलेस पहनें. माथे पर स्टोन वाली बिंदी लगाएं. हाथों में मैचिंग चूडि़यां पहनें.

अगर इंडोवैस्टर्न लुक अपना रही हैं तो लौंग गाउन के साथ हाई बन बना कर उसे क्राउन से सजा सकती हैं. चाहें तो हाफ फंकी लुक वाला जूड़ा भी बना सकती हैं, जिस में आगे की ओर फ्रिल्स वाली चोटी लगा सकती हैं. हाथों में ज्वैलरी के तौर पर स्टोन का ब्रेसलेट पहनें. कानों में डैंगलर्स पहन सकती हैं.

Diwali Special: इन टिप्स को फौलों कर दीवाली पर घर को दें नया लुक

घर को सजा कर रखना हर किसी को पसंद आता है, लेकिन फेस्टवल के मौके पर हर कोई घर को खूबसूरत दिखाना चाहता है. घर को सजाने में हर किसा को मजा आता है. हर कोई अपने गेस्ट को घर दिखाने के लिए बेताब रहते हैं. अगर आप भी अपने घर को फेस्टिल लुक देना चाहते हैं तो इन टिप्स को ट्राय करें…

1. पहले से करें तैयारी

घर के परदे झाड़ लें. यदि अधिक मैले हों तो उन्हें धुला कर प्रेस करा लें. किचन के सभी कपबोर्ड अंदरबाहर से चमका कर सभी सामान यथास्थान रख दें. फ्रिज को भी साफ करना न भूलें. किचन के मसालों और दाल वगैरह के सभी डब्बे चमका दें. टाइल्स और सिंक को भी चमकाएं. अगर घर में कुरसियां कम हों तो अपनी पाकेट के हिसाब से दरी, चटाई या कालीन खरीद लें.

2. खुशबू मिट्टी की

मिट्टी या टेराकोटा से बने गमले और अन्य कलाकृतियां आजकल ₹200 से ले कर ₹1000 तक में आसानी से मिल जाती हैं. खूबसूरत रंगों से रंगा, आकार में लंबा लेकिन पतला बांस ले कर उस में लंबी डंडी वाला कृत्रिम फूल रख कर ड्राइंगरूम के कोने में रखें. कमरे का लुक भी बदल जाएगा और इस के लिए अलग से जगह भी नहीं बनानी पड़ेगी.

3. फूलों से गुलजार आशियाना

अनेक फूलों का एक बंच बना कर सैंटर टेबल पर रखने से बेहतर होगा कि अलगअलग रंग के फूलों को 1-1 या 2-2 कर के पारदर्शी बोतलों में पानी भर कर उन में रखें. इन बोतलों को घर की अलगअलग जगहों पर रखें ताकि पूरे घर को फ्रैश लुक मिले.

7. बैठने की व्यवस्था

ड्राइंगरूम में सभी सोफे दीवारों के साथ सटा दें. उन के साथ घर की सारी कुरसियां, मोढ़े आदि रख दें. छोटे स्टूल भी वहीं रख दें, जिन पर मेहमान अपने खाली कपगिलास रख सकें. अगर कुरसियां कम हैं तो ड्राइंगरूम में एक गद्दा बिछा कर उस पर सुंदर सी चादर बिछा दें. गोल सिरहाने और कुशन सजा दें. बच्चों के कमरे से फालतू सामान हटा दें. एक दरी या कालीन बिछा दें. बच्चों को बैठाने की व्यवस्था यहीं कर दें.

नास्तिक बहू: भाग 3- नैंसी के प्रति क्या बदली लोगों की सोच

नैंसी का बस इतना कहना था कि नलिनी ने प्रचंड रूप धारण कर लिया और कहने लगी,”प्रौब्लम यह है कि तुम चाहती ही नहीं हो कि हम तुम्हारे साथ रहें, मैं तुम्हें किसी बात पर रोकटोक करूं, तुम्हें साड़ी पहनने को कहूं, तुम्हें अपने संग भजनकीर्तन में भाग लेने को कहूं, तुम्हें कालोनी की दूसरी बहुओं की तरह संस्कारी बनाने की कोशिश करूं.”

नैंसी आवाक नलिनी को सुनती रही फिर बीच में ही उसे रोकती हुई बोली,”मम्मीजी, यह सब बेबुनियाद बेकार की बातें आप क्यों कह रही हैं?”

“अच्छा… बेबुनियाद बेकार की बातें? तुम कुछ दिन पहले ओल्ड‌ऐज होम ग‌ई थी और वहां से फौर्म भी ले कर आई हो, तुम हमें वृद्धाश्राम भेजना चाहती हो लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगी. हम अपने पुराने मकान में शिफ्ट हो जाएंगे. मैं ने किराएदार से मकान भी खाली करवा लिया है. हम वहीं जा रहे हैं यह उसी की तैयारी है,” नलिनी तमतमाती हुई बोली.

इतना सब सुनने के बाद नलिनी के पति सौरभ चिढ़ते हुए बोले,”यह क्या बकवास कर रही हो. नैंसी ओल्ड‌ऐज होम जरूर गई थी, वहां से वह फौर्म भी ले कर आई है लेकिन हमें ओल्ड‌ऐज होम भेजने के लिए नहीं. नैंसी हर महीने कुछ सेविंग करती है और जब उस के पास अच्छीखासी सेविंग हो जाती है तो वह उन रूपयों से जरूरतमंदों की मदद करती है. कभी किसी गरीब मजदूर बच्चे के स्कूल का फीस भर देती है तो कभी किसी अनाथालय में जा कर उन की सहायता करती है.

“इस बार मैं ने ही उस से कहा कि मेरे दोस्त को सहायता की जरूरत है. मेरे दोस्त के बच्चे उसे वृद्धाश्रम में छोड़ कर, उस से सारे नाते तोड़ कर चले ग‌ए हैं. वह बहुत बीमार है. उस के इलाज के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं इसलिए नैंसी वृद्धाश्रम गई थी और किसी संस्था में रूपए जमा करने के लिए उन की अपनी कुछ औपचारिकताएं होती हैं, उसी का फौर्म ले कर आई है नैंसी, जो तुम ने देखा होगा.”

यह सुनते ही नलिनी गुस्से में बोली,”अगर ऐसी ही बात है तो आप सब ने मुझे क्यों नहीं बताया?”

नलिनी के इस सवाल का जबाव नैंसी ने बड़े प्यार दिया, वह बोली,”मम्मीजी, क्योंकि मैं यह जानती थी कि अगर मैं आप से कहूंगी कि मेरे पास कुछ रूपए हैं और मैं उन्हें किसी अच्छे कामों में लगाना चाहती हूं तो आप कहतीं कि उसे हम मंदिर के किसी ट्रस्ट को दान दे देते हैं, भव्य भजन संध्या का आयोजन करते हैं या किसी मंदिर में अनुष्ठान करा लेते हैं लेकिन मैं ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहती थी, क्योंकि मैं उन पैसों से केवल जरूरतमंदों की सहायता करना चाहती थी और आगे भी यही करना चाहूंगी. और रही बात आप लोगों को वृद्धाश्रम भेजने की तो मैं यह अपने सपने में भी कभी नहीं सोच सकती. आप और पापाजी तो इस घर की शान हैं, इस घर की रौनक हैं. छोटों के सिर पर अपने बड़ों का हाथ होना ही दुनिया की सब से बड़ी दौलत होती है जिसे मैं किसी भी हाल में खोना नहीं चाहती हूं.”

तभी नलिनी का मोबाइल बजा और उस के फोन उठाते ही उस के चेहरे का उड़ता रंग इस बात की पुष्टि कर रहा था कि अवश्य कोई गंभीर बात है. नलिनी के फोन रखते ही सभी ने एक स्वर में कहा,”क्या हुआ?”

नलिनी ने कोई उत्तर नहीं दिया, बस वह नैंसी का हाथ पकड़ कर खींचती हुई बोली,”तू चल मेरे साथ मैं सब बताती हूं,” कहती हुई नलिनी अपनी सहेली सुषमा के घर नैंसी को ले कर पहुंची.

वहां पहुंच कर नैंसी ने जो दृश्य देखा उसे देख कर वह स्तब्ध रह गई. सुषमा और उस के पति का कुछ सामान जमीन पर बिखरे हुए थे. सुषमा रो रही थी, उन के पति खिड़की से बाहर की ओर देखते हुए मौन खड़े थे. बेटा हाथ में हाथ धरे यह सब देख रहा था और सुषमा की सुसंस्कारी बहू उन पर जोरजोर से चिल्ला रही थी.

नलिनी को देखते ही सुषमा भाग कर उस के पास आ गई और उसे गले लगा कर रोती हुई बोली,”नलिनी, देख न रमा क्या कह रही है. यह कह रही है कि हम इस घर को छोड़ कर कहीं और चले जाएं क्योंकि यह घर उस के पति के नाम पर है. इस घर को बनाने के लिए उस के पति ने लोन लिया है. अब तुम ही बताओ इस उम्र में हम अपना घर छोड़ कर कहां जाएंगे?”

यह सुन कर नलिनी ने रमा को बहुत समझाने की कोशिश की कि सासससुर मातापिता के समान होते हैं. यह घर जरूर तुम्हारे पति के नाम पर है लेकिन तुम्हारा पति इन का इकलौता बेटा है. लोन जरूर तुम्हारे पति ने ली है लेकिन इन्होंने भी अपना पुराना घर बेच कर कर इस घर में पैसे लगाया है. अपनी जमापूंजी भी इस घर में लगाई है लेकिन रमा कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी, उलटा वह नलिनी से बदतमीजी पर उतर आई. यह देख नैंसी की आंखें लाल हो गईं और वह रमा पर तनती हुई बोली,”तुम्हें बड़ों से बात करने की तमीज नहीं है यही है तुम्हारे संस्कार.”

नैंसी का इतना कहना था रमा अकड़ती हुई बोली,”तुम संस्कारों के बारे में कुछ जानती भी हो, तुम तो खुद अपने सासससुर को वृद्धाश्रम भेज रही हो और यहां मुझे संस्कारों के पाठ पढ़ाने आई हो.”

“तुम से किस ने कहा कि मैं अपने मम्मीपापा को वृद्धाश्रम भेज रही हूं. तुम जैसी छोटी सोच वाले ही ऐसा सोच सकते हैं और ऐसा कर सकते हैं. मातापिता तो बच्चों के लिए सुरक्षा कवच की तरह होते हैं और अपने सुरक्षा कवच को अपने से अलग नहीं किया जाता, लेकिन तुम्हें यह बात कहां से समझ आएगी, तुम्हारी आंखों पर तो पट्टी बंधी है. तुम एक बात अच्छी तरह से समझ लो कि तुम अंकलआंटी को इस घर से नहीं निकाल सकतीं,” नैंसी ने जोर डालते हुए कहा.

“क्यों? क्यों नहीं निकाल सकती और तुम कौन होती हो मुझे रोकने वाली…” रमा गुर्राती हुई बोली.

“मैं कोई नहीं होती तुम्हें रोकने वाली लेकिन कानून तुम्हें रोक सकता है. बस, एक पुलिस कंप्लैंट की जरूरत है, बेहतर होगा कि तुम अंकलआंटी को ऊपर वाले हिस्से में आराम से रहने दो और तुम अलग रहना चाहती हो तो नीचे के हिस्से में सुकून से रहो और इन्हें भी रहने दो,” नैंसी रमा की ओर उंगली दिखाती हुई बोली.

पुलिस कंप्लैंट की बात सुन कर रमा डर गई और सुषमा और उस के पति का मकान के ऊपरी हिस्से में रहने के लिए मान गई. रमा के मानते ही नैंसी जमीन पर बिखरे सुषमा और उस के पति का सामान उठा कर जमाने लगी. यह देख नलिनी और सुषमा को अपनी सोच पर आज पछतावा हो रहा था. नलिनी को हमेशा इस बात का मलाल था कि उस की बहू नैंसी संस्कारी नहीं है और न तो वह किसी पूजापाठ या भजनकीर्तन में शरीक होती और न ही कोई धर्मकर्म या पुण्य का कार्य करती है लेकिन आज वह समझ गई थी कि असली धर्मकर्म और पुण्य क्या होता है.

सुषमा नलिनी को गले लगाती हुई बोली,”तेरी बहू सच में सुसंस्कारी है, उसे समझने में भूल हम से ही हुई है.”

जीवनसाथी: भाग 3- विभोर को अपनी पत्नी वसु से नफरत क्यों हुई

अगले दिन वसु ने मां से बात की, ‘‘मांजी, कल जब विभोर ने चांटा मारा था आप ने कुछ कहा क्यों नहीं? क्या यह व्यवहार उचित था?’’

मां ने बड़ा सपाट उदासीन सा जवाब दिया, ‘‘वसु, मैं तो कभी किसी को कुछ नहीं कह पाती. इस के पिताजी थे, उन से भी कभी कुछ नहीं कहा.’’

शायद मां भी कभी न बोल पाई हों. अब वसु को खुद ही कुछ सोचना था. ऐसे तो जीवन जीना मुश्किल है.

‘‘मां, मैं कुछ दिनों के लिए मायके जा रही हूं. विभोर को बता देना.’’

‘‘बेटा तू ही बता दे विभोर को,’’ मां ने कहा तो वसु ने न चाहते हुए भी विभोर को फोन कर दिया. विभोर औफिस में था. एक बार नहीं उठाया तो दोबारा मिला दिया.

विभोर बिना कुछ सुने चिल्लाने लगा, ‘‘ऐसी क्या आफत आ गई  जो दोबारा फोन मिला दिया?’’

वसु ने बहुत शांत स्वर में इतना ही कहा, ‘‘मैं मायके जा रही हूं,’’ विभोर और कुछ कहता वसु ने फोन काट दिया. जानती थी वसु, विभोर आदतन चिल्लाएगा ही.

बिना प्रतिक्रिया दिए वसु मायके आ गई. विभोर के घर की व्यवस्था अब चरमराने लगी, जिसे वसु अब तक संभाले हुए थी.

‘‘विभोर मेरी दवाई खत्म हो गई है.’’

‘‘अच्छा मां.’’

‘‘और किचन का सामान, फल भी खत्म हो गए हैं,’’ मां ने धीमे से कहा. जानती थीं अब तक सारा वसु ही करती थी. जैसेतैसे कर इतने दिन बाई के सहारे निकल गए थे. वसु के जाने के बाद विभोर ने वसु को फोन नहीं किया था. अहमवश चाहता था खुद ही वापस आए. लेकिन वसु अब विभोर को सम?ाना चाह रही थी.

एक दिन औफिस से शाम को विभोर लौटा तो आते ही बिस्तर पर लेट गया. मां ने माथा छू कर देखा तो तेज बुखार था. उस का सारा शरीर बुखार में तप रहा था. उस की तबीयत खराब होने से मुश्किलें बढ़ने लगीं.

आज विभोर को वसु की बहुत याद आ रही थी. कितनी सेवा की थी जब पिछले बार विभोर बीमार हुआ था. उस का रातभर जागना, ताजा जूस देना. लेकिन उस ने कभी वसु का सम्मान ही नहीं किया. अब उसे खुद पर गुस्सा

आ रहा था. सभी कुछ उसे बेचैन किए जा रहा था. विभोर ने एक बार बात करने के फोन उठाया फिर उस का अहम सामने आ गया और बिना बात किए ही फोन रख दिया.

दूसरे दिन मां ने कहा, ‘‘बेटा, वसु को ले आ देख मैं भी अब तेरी देखभाल नहीं कर सकती हूं. उम्र हो गई है. गठिया मुझे परेशान करता है. वह तो वसु ही रोज लहसुन के तेल की मालिश करती थी तो चल पा रही थी.’’

विभोर कुछ नहीं बोल सिर झुकाए बैठा था. उस का मन भी वसु के प्रति अपने व्यवहार पर धिक्कार रहा था.

‘‘ऐसे सिर क्यों झुकाए बैठा है. आज सोच रही हूं मैं ने ही तुझे पहली बार रोका होता तो शायद ये दिन न देखने पड़ते,’’ मां ने थोड़ा तेज आवाज में कहा.

विभोर की आंखों के सामने वसु का मासूम चेहरा घूम रहा था. हमेशा हंसती रहने वाली वसु  मौन की चादर ओढ़ चुपचाप मायूस सी रहने लगी थी… उसे यह एहसास उस की अनुपस्थिति में हो रहा था.’’

‘‘चल उठ, अब बहुत हो गया, घर की लक्ष्मी को वापस ला. मुझे भी उस से माफी मांगनी है. मैं ने भी सही का साथ नहीं दिया,’’ मां ने कहा.

विभोर की आंखों में चमक आ गई. सही माने में आज वह अपनी जीवनसाथी को लेने जा रहा था. विभोर ने सोचा फोन किए बिना ही सरप्राइज देगा.

वसु मायके में औफिस से लौट गार्डन में चाय पी रही थी. गेट पर विभोर को खड़े देख

उस का मन प्रसन्न हो गया, किंतु आशंकाओं के बादल मन को डराने लगे कि यदि मुझे ले जा कर फिर पहले जैसा व्यवहार किया तो?

विभोर की आवाज से वसु की तंद्रा भंग हुई, ‘‘अंदर आने को नहीं कहोगी क्या वसु?’’ आज विभोर की आवाज में क्रोध नहीं अनुनय था.

‘‘हां, विभोर अंदर आओ.’’

अंदर आ कर विभोर ने वसु से कहा,

‘‘वसु, मैं प्रौमिस करता हूं, अब कभी तुम्हारा अपमान नहीं करूंगा, टीवी पर फालतू बातें अब नहीं देखता, वास्तव में तुम मेरी अद्धांगिनी हो, मेरी समकक्ष,’’ और विभोर ने वसु के सामने हाथ जोड़ दिए.

वसु ने गंभीर शांत स्वर में कहा, ‘‘मैं चलूंगी किंतु एक शर्त है.’’

‘‘हां, मुझे तुम्हारी हर शर्त मंज़ूर हैं,’’ विभोर ने अधीरता से कहा.

‘‘नहीं पहले सुनो. विभोर एक लड़की जब शादी कर ससुराल जाती है तो उस के लिए नए घर, नए परिवेश और सब के साथ तालमेल

बैठाना बहुत कठिन होता है… तुम्हें इस का अनुभव नहीं है, तो तुम 1 महीना मेरे मायके में रहो. हम दोनों यहीं से औफिस जाएंगे… फिर मैं तुम्हारे साथ चलूंगी.

विभोर ने स्वीकृति में सिर हिला दिया. आगामी जीवन की नींव की परिपक्वता होने को तैयार थी, आंगन का गंधराज हजारों फूलों की खुशबू बिखेर रहा था.

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