धन्नो: जब अनु की सहायता से बदली भानुमती की किस्मत

भानुमती नाम था उन का. निम्नमध्य- वर्गीय परिवार, परिवार माने पूरे डेढ़ दर्जन लोग, कमाने वाला इकलौता उन का पति और वे स्वयं राजस्थान के एक सरकारी स्कूल की शिक्षिका.

‘‘जब देखो तब घर में कोहराम छिड़ा रहता है,’’ वे अकसर अनु से कहती थीं. अनु उन से आधी उम्र की थी. उस की नियुक्ति प्रिंसिपल के पद पर हुई थी. भानुमती अकसर देर से स्कूल आतीं और जब आतीं तो सिर पर पट्टी बंधी रहती. सिर में उन के सदैव दर्द रहता था. चिड़चिड़ा स्वभाव, स्कूल आती थीं तो लगता था किसी जंग के मैदान से भाग कर आई हों.

उन्हें अनुशासन में बांधना असंभव था. अनु उन से एक सुहृदया बौस की तरह पेश आती थी. यही कारण था कि सब की अप्रिय, भानुमतीजी अपने जीवन की पोथी उस के सामने खोल कर बैठ जाती थीं.

एक दिन प्रार्थना सभा में वे चक्कर खा कर गिर पड़ीं. तुरंत चिकित्सा आदि की गई तो पता चला कि पिछले 24 घंटे से उन्होंने एक बूंद पानी भी नहीं पिया था. वे 7 दिन से व्रत कर रही थीं. स्कूल आना बेहद जरूरी था क्योेंकि परीक्षा चल रही थी. समय ही नहीं जुटा पाईं कि अपना ध्यान रख सकें. जब उन्हें चाय आदि पिला कर स्वस्थ किया गया तो एकदम से फफक पड़ीं.

‘‘आज घर में 10 रुपए भी नहीं हैं. 7 अपने बच्चे, 2 हम, सासससुर, 1 विधवा ननद व 4 उस के बच्चे. सब के तन पर चादर तानतेतानते चादर ही फट गई है, किसकिस का तन ढकूं? किसकिस के पेट में भोजन डालूं? किसकिस के पैरों को पत्थरकंकड़ चुभने से बचाऊं? किस को पढ़ाऊं, किस को नहीं? सब जरूरी हैं. एक का कुरता सिलता है तो दूसरे की सलवार फट जाती है. एक की रोटी सिंकती है तो दूसरे की थाली खाली हो जाती है. और ये लक्ष्मीमाता मेरे घर के दरवाजे की चौखट से कोसों दूर…वहां विष्णु के पैर दबा रही हैं. खुद तो स्वर्णजडि़त ताज पहने, कमल के फूल पर विराजमान हैं और यहां उन के भक्तों को कांटों के गद्दे भी नसीब नहीं होते…’’

न मालूम क्याक्या बड़बड़ा रही थीं. उस दिन तो जैसे किसी वेगवती नदी का बांध टूट गया हो. उन्होंने किसी को नहीं छोड़ा. न ऊपर वाले को न नीचे वाले को….

थोड़ा स्वस्थ होने पर बोलीं, ‘‘चाय का यह घूंट मेरे गले में दिन भर बाद उतरा है पर किसी को फिक्र है मेरी? पति तो इस भीड़ में ऐसे खो गए हैं कि मेरी शक्ल देख कर भी मुझे पहचान नहीं पाएंगे. बस, बच्चे पैदा कर डाले, वह भी 7. आज के जमाने में जहां लोगों के घर 1 या 2 बच्चे होते हैं, मेरे घर में दूसरों को देने लायक ऐक्स्ट्रा बच्चे हैं. 6 बेटियां हैं, परंतु उन्हें तो बेटा चाहिए, चाहिए तो बस चाहिए, आखिर 7वां बेटा हुआ.

‘‘सच पूछो तो मैडम, मुझे अपनी कोखजनों से कोई लगाव नहीं है, कोई ममता नहीं है. आप कहेंगी कि कैसी मां हूं मैं? बस, मैं तो ऐसी ही हूं…रूखी. पैसे का अभाव ब्लौटिंग पेपर की तरह समस्त कोमल भावनाओं को सोख गया है. पानी सोख लेने वाला एक पौधा होता है, ठीक उसी तरह मेरे इस टब्बर ने पैसों को सोख लिया है,’’ वे रोती जा रही थीं और बोलती जा रही थीं.

‘‘जीवन में कुछ हो न हो, बस पैसे का अभाव नहीं होना चाहिए. मुझे तो आजकल कुछ हो गया है, पेड़ों पर लगे पत्ते रुपए नजर आते हैं. मन करता है, उन्हें तोड़ लाऊं. सड़क पर पड़े ईंट के टुकड़े रुपयों की गड्डी नजर आते हैं और नल से पानी जब खाली लोहे की बालटी में गिरता है तो उस में भी पैसों की खनक जैसी आवाज मुझे सुनाई देती है.’’

उस दिन उन की यह दशा देख कर अनु को लगा कि भानुमतीजी की मानसिक दशा बिगड़ रही है. उस ने उन की सहायता करने का दृढ़ निश्चय किया. मैनेजमैंट के साथ मीटिंग बुलाई, भानुमतीजी की सब से बड़ी लड़की जो कालेज में पढ़ रही थी, उसे टैंपोररी नौकरी दिलवाई, दूसरी 2 लड़कियों को भी स्कूल के छोटे बच्चों के ट्यूशन दिलवाए.

अनु लगभग 8 साल तक उस स्कूल में प्रिंसिपल रही और उस दौरान भानुमतीजी की समस्याएं लगभग 50 फीसदी कम हो गईं. लड़कियां सुंदर थीं. 12वीं कक्षा तक पढ़ कर स्वयं ट्यूशन करकर के उन्होंने कुछ न कुछ नौकरियां पकड़ लीं. सुशील व कर्मठ थीं. 4 लड़कियों की सहज ही बिना दहेज के शादियां भी हो गईं. 1 बेटी डाक्टरी में निकल गई और 1 इंजीनियरिंग में.

ननद के बच्चे भी धीरेधीरे सैटल हो गए. सासससुर चल बसे थे, पर उन का बुढ़ापा, भानुमतीजी को समय से पहले ही बूढ़ा कर गया था. 47-48 साल की उम्र में 70 साल की प्रतीत होती थीं भानुमतीजी. जब कभी कोई बाहर से सरकारी अफसर आता था और शिक्षकों का परिचय उन से करवाया जाता था, तो प्राय: कोई न कोई अनु से प्रश्न कर बैठता था :

‘‘आप के यहां एक टीचर काफी उम्र की हैं, उन्हें तो अब तक रिटायर हो जाना चाहिए.’’

उन की उम्र पता चलने पर, उन के चेहरे पर अविश्वास के भाव फैल जाते थे. जहां महिलाएं अपनी उम्र छिपाने के लिए नईनई क्रीम, लोशन व डाई का प्रयोग करती हैं वहीं भानुमतीजी ठीक इस के विपरीत, न बदन पर ढंग का कपड़ा न बालों में कंघी करना. लगता है, वे कभी शीशे में अपना चेहरा भी नहीं देखती थीं. जिस दिन वे मैचिंग कपड़े पहन लेती थीं पहचानी नहीं जाती थीं.

‘‘महंगाई कितनी बढ़ गई है,’’ वे अकसर कहती रहती थीं. स्टाफरूम में उन का मजाक भी उड़ाया जाता था. उन के न मालूम क्याक्या नाम रखे हुए थे… उन्हें भानुमतीजी के नाम से कोई नहीं जानता था.

एक दिन इंटरस्कूल वादविवाद प्रतियोगिता के सिलसिले में अनु ने अपने नए चपरासी से कहा, ‘‘भानुमतीजी को बुला लाओ.’’

वह पूरे स्कूल में ढूंढ़ कर वापस आ गया. तब अनु ने उन का पूरा नाम व क्लास लिख कर दिया, तब कहीं जा कर वे आईं तो अनु ने देखा कि चपरासी भी हंसी को दबा रहा था.

अनु ने वादविवाद का विषय उन्हें दे दिया और तैयारी करवाने को कहा. विषय था : ‘टेलीविजन धारावाहिक और फिल्में आज साहित्य का स्थान लेती जा रही हैं और जिस प्रकार साहित्य समाज का दर्पण होता जा रहा है वैसे ही टेलीविजन के धारावाहिक या फिल्में भी.’

वादविवाद प्रतियोगिता में बहुधा टीचर्स की लेखनी व वक्ता का भावपूर्ण भाषण होता है. 9वीं कक्षा की नीति प्रधान, भानुमतीजी की क्लास की थी. उस ने ओजपूर्ण तर्क रखा और समस्त श्रोताओं को प्रभावित कर डाला. उस ने अपना तर्क कुछ इस प्रकार रखा था :

‘टेलीविजन धारावाहिक व फिल्में समाज का झूठा दर्पण हैं. निर्धन किसान का घर, पांचसितारा होटल में दिखाया जाता है. कमरे में परदे, सोफासैट, खूबसूरत पलंग, फर्श पर कालीन, रंगीन दीवारों पर पेंटिंग और बढि़या स्टील के खाली डब्बे. भारी मेकअप व गहनों से लदी महिलाएं जेवरात की चलतीफिरती दुकानें लगती हैं.’

व्यंग्यात्मक तेवर अपनाते हुए नीति प्रधान पुरजोर पौइंट ढूंढ़ लाई थी, टेलीविजन पर गरीबी का चित्रण और वास्तव में गरीबी क्या होती है?

‘गरीब के नए कपड़ों पर नए कपड़ों का पैबंद लगाया दिखाते हैं. वे तो अकसर ऐसे लगते हैं जैसे कोई बुटीक का डिजाइन. गरीबी क्या होती है? किसी गरीब के घर जा कर देखें. आजकल के युवकयुवतियां घुटनों पर से फटी जीन्स पहनना फैशन मानते हैं, तब तो गरीब ही सब से फैशनेबल हैं. बड़ेबड़े स्टेटस वाले लोग कहते हैं :

‘आई टेक ब्लैक टी. नो शुगर प्लीज.’

‘अरे, गरीब के बच्चे सारी जिंदगी ब्लैक टी ही पीते रहे हैं, दूध और शक्कर के अभाव में पलतेपलते वे कितने आधुनिक हो गए हैं, उन्हें तो पता ही नहीं चला. आजकल अकसर लोग महंगी होलव्हीट ब्रैड खाने का ढोल पीटते हैं. अरे, गरीब तो आजीवन ही होलव्हीट की रोटियां खाता आया है. गेहूं के आटे से चोकर छान कर रोटियां बनाईं तो रोटियां ही कम पड़ जाएंगी. और हां, आजकल हर वस्तु में रिसाइक्ंिलग शब्दों का खूब इस्तेमाल होता है, गरीब का तो जीवन ही रिसाइकल है. सर्दी की ठिठुरती रातों में फटेपुराने कपड़ों को जोड़ कर जो गुदड़ी सिली जाती है उसे कोई फैशनेबल मेमसाहब अपना बटुआ खाली कर खरीद कर ले जाएंगी.’

धन के अभाव का ऐसा आंखोंदेखा हाल प्रस्तुत करने वाला और कौन हो सकता था? प्रतियोगिता में नीति प्रथम घोषित हुई थी.

अनु को दिल्ली आए अब 10-12 वर्ष हो गए थे. अब तो वह शिक्षा मंत्रालय में, शिक्षा प्रणाली के योजना विभाग में कार्य करने लगी थी. अत: उस स्कूल के बाद छात्रों व अध्यापकों के साथ उस की नजदीकियां खत्म हो गई थीं. अकसर अनु को वहां की याद आती थी. उस स्कूल की लगभग सभी अध्यापिकाएं….सब के जीवन में कहीं न कहीं कोई न कोई कमी तो थी ही. कोई स्वास्थ्य से परेशान तो कोई अपने पति को ले कर दुखी. कोई समाज से तो कोई मकान से.

जहां सब सुख थे, वहां भी हायतौबा. मिसेज भंडारी बड़े हंसमुख स्वभाव की महिला थीं, संपन्न, सुंदर व आदरणीय. उन्हें ही अनु कार्यभार सौंप कर आई थी. वे अकसर अपनी सास के बारे में बात करती और कहती थीं, ‘‘मेरी सास के पास कोई दुख नहीं है, फिर भी वे दुख ढूंढ़ती रहती हैं, वास्तव में उन्हें सुखरोग है.’’

एक दिन अनु दिल्ली के एक फैशनेबल मौल में शौपिंग करने गई थी. वहां अचानक उसे एक जानापहचाना चेहरा नजर आया. करीने से कढ़े व रंगे बाल, साफसुथरा, मैचिंग सिल्क सलवार- सूट, हाथों में पर्स. पर्स खोल कर रुपयों की गड्डी निकाल कर काउंटर पर भुगतान करते हुए उन के हाथ और हाथों की कलाइयों पर डायमंड के कंगन.

‘‘भानुमतीजी, आप…’’अविश्वास के बीच झूलती अनु अपलक उन्हें लगभग घूर रही थी.

‘‘अरे, अनु मैडम, आप…’’

दोनों ने एकदूसरे को गले लगाया. भानुमती के कपड़ों से भीनीभीनी परफ्यूम की खुशबू आ रही थी.

अनु ने कहा, ‘‘अब मैं मैडम नहीं हूं, आप सिर्फ अनु कहिए.’’

अनु ने देखा 4-5 बैग उन्हें डिलीवर किए गए.

‘‘आइए, यहां फूडकोर्ट में बैठ कर कौफी पीते हैं,’’ अनु ने आग्रह किया.

‘‘आज नहीं,’’ वे बोलीं, ‘‘बेटी आज जा रही है, उसी के लिए कुछ गिफ्ट खरीद रही थी. आप घर आइए.’’

अनु ने उन का पता और फोन नंबर लिया. मिलने का पक्का वादा करते हुए दोनों बाहर निकल आईं. अनु ने देखा, एक ड्राइवर ने आ कर उन से शौपिंग बैग संभाल लिए और बड़ी सी गाड़ी में रख दिए. अनु की कार वहीं कुछ दूरी पर पार्क थी. दोनों ने हाथ हिला कर विदा ली.

भानुमतीजी की संपन्नता देख कर अनु को बहुत खुशी हुई. सोचने लगी कि बेचारी सारी जिंदगी मुश्किलों से जूझती रहीं, चलो, बुढ़ापा तो आराम से व्यतीत हो रहा है. अनु ने अनुमान लगाया कि बेटा होशियार तो था, जरूर ही अच्छी नौकरी कर रहा होगा. समय निकाल कर उन से मिलने जरूर जाऊंगी. भानुमतीजी के 3-4 फोन आ चुके थे. अत: एक दिन अनु ने मिलने का कार्यक्रम बना डाला. उस ने पुरानी यादों की खातिर उन के लिए उपहार भी खरीद लिया.

दिए पते पर जब अनु पहुंची तो देखा बढि़या कालोनी थी. गेट पर कैमरे वाली सिक्योरिटी. इंटरकौम पर चैक कर के, प्रवेश करने की आज्ञा के बाद अनु अंदर आई. लंबे कौरीडोर के चमकते फर्श पर चलतेचलते अनु सोचने लगी कि भानुमतीजी को कुबेर का खजाना हाथ लग गया है. वाह, क्या ठाटबाट हैं.

13 नंबर के फ्लैट के सामने दरवाजा खोले भानुमतीजी अनु की प्रतीक्षा में खड़ी थीं. खूबसूरत बढि़या परदे, फर्नीचर, डैकोरेशन.

‘‘बहुत खूबसूरत घर है, आप का.’’

कहतेकहते अचानक अनु की जबान लड़खड़ा गई. वह शब्दों को गले में ही घोट कर पी गई. सामने जो दिखाई दिया, उसे देखने के बाद उस में खड़े रहने की हिम्मत नहीं थी. वह धम्म से पास पड़े सोफे पर बैठ गई. मुंह खुला का खुला रह गया. गला सूख गया. आंखें पथरा गईं. चश्मा उतार कर वह उसे बिना मतलब पोंछने लगी. भानुमतीजी पानी लाईं और वह एक सांस में गिलास का पानी चढ़ा गई. भानुमतीजी भी बैठ गईं. चश्मा उतार कर वे फूटफूट कर रो पड़ीं.

‘‘देखिए, देखिए, अनुजी, मेरा इकलौता बेटा.’’

हक्कीबक्की सी अनु फे्रम में जड़ी 25-26 साल के खूबसूरत नौजवान युवक की फोटो को घूर रही थी, उस के निर्जीव गले में सिल्क के धागों की माला पड़ी थी, सामने चांदी की तश्तरी में चांदी का दीप जल रहा था.

‘‘कब और कैसे?’’

सवाल पूछना अनु को बड़ा अजीब सा लग रहा था.

‘‘5 साल पहले एअर फ्रांस का एक प्लेन हाइजैक हुआ था.’’

‘‘हां, मुझे याद है. अखबार में पढ़ा था कि पायलट की सोच व चतुराई के चलते सभी यात्री सुरक्षित बच गए थे.’’

‘‘जी हां, ग्राउंड के कंट्रोल टावर को उस ने बड़ी चालाकी से खबर दे दी थी, प्लेन लैंड करते ही तमाम उग्रवादी पकड़ लिए गए थे परंतु पायलट के सिर पर बंदूक ताने उग्रवादी ने उसे नहीं छोड़ा.’’

‘‘तो, क्या वह आप का बेटा था?’’

‘‘हां, मेरा पायलट बेटा दुष्यंत.’’

‘‘ओह,’’ अनु ने कराह कर कहा.

भानुमतीजी अनु को आश्वस्त करने लगीं और भरे गले से बोलीं, ‘‘दुष्यंत को पायलट बनने की धुन सवार थी. होनहार पायलट था अत: विदेशी कंपनी में नौकरी लग गई थी. मेरे टब्बर का पायलट, मेरी सारी जिंदगी की जमापूंजी.’’

‘‘उस ने तो बहुत सी जिंदगियां बचा दी थीं,’’ अनु ने उन के दुख को कम करने की गरज से कहा.

‘‘जी, उस प्लेन में 225 यात्री थे. ज्यादातर विदेशी, उन्होंने उस के बलिदान को सिरआंखों पर लिया. मेरी और दुष्यंत की पूजा करते हैं. हमें गौड तुल्य मानते हैं. भूले नहीं उस की बहादुरी और बलिदान को. इतना धन मेरे नाम कर रखा है कि मेरे लिए उस का हिसाब भी रखना मुश्किल है.’’

अनु को सब समझ में आ गया.

‘‘अनुजी, शायद आप को पता न होगा, उस स्कूल की युवा टीचर्स, युवा ब्रिगेड ने मेरा नाम क्या रख रखा था?’’

अस्वस्थ व अन्यमनस्क होती हुई अनु ने आधाअधूरा उत्तर दिया, ‘‘हूं… नहीं.’’

‘‘वे लोग मेरी पीठ पीछे मुझे भानुमती की जगह धनमती कहते थे, धनधन की माला जपने वाली धन्नो.’’

अनु को उस चपरासी की शरारती हंसी का राज आज पता चला. ‘‘कैसी विडंबना है, अनुजी. मेरे घर धन आया तो पर किस द्वार से. लक्ष्मी आई तो पर किस पर सवार हो कर…उन का इतना विद्रूप आगमन, इतना घिनौना गृहप्रवेश कहीं देखा है आप ने?’’

तंत्र मंत्र का खेला: बाबा के जाल से निकल पाए सुजाता और शैलेश

‘‘यह क्या है शैलेश? तुम्हें मना किया था न कि अगली बार लेट होने पर क्लास में एंट्री नहीं मिलेगी,’’ प्रोफैसर महेंद्र सिंह गुस्से से चीख उठे.

‘‘सौरी सर, आज आखिरी दिन था मजार में हाजिरी लगाने का, आज 40 दिन पूरे हो गए हैं, कल से मैं समय से पहले ही हाजिरी दर्ज करा लूंगा.’’

‘‘यह क्या मजार का चक्कर लगाते रहते हो? इतना पढ़नेलिखने के बाद भी अंधविश्वासी बने हो,’’ प्रोफैसर ने व्यंग्य किया.

‘‘सर, ऐसा न कहिए,’’ एक छात्र बोल उठा. ‘‘सर, आप को रेलवे स्टेशन पर बनी मजार की ताकत का अंदाजा नहीं है,’’ दूसरे छात्र ने हां में हां मिलाई. ‘‘सर, आप ने देखा नहीं, मजार 2 प्लेटफौर्म्स के बीच में बनी है, तीसरे, चौथे, 5वें प्लेटफौर्म्स जगह छोड़ कर बनाए गए हैं,’’ एक कोने से आवाज आई.

‘‘सर, अंगरेजों के जमाने से ही इस मजार का बहुत नाम है, 40 दिनों की नियम से हाजिरी लगाने पर हर मनोकामना पूरी हो जाती है,’’ किसी छात्र ने ज्ञान बघारा.

आज भौतिकी की क्लास में मजार का पूरा इतिहासभूगोल ही चर्चा का विषय बना रहा. प्रोफैसर भी इस वार्त्तालाप को सुनते रहे.

महेंद्र सिंह का पूरा छात्रजीवन व नौकरी के शुरू के वर्ष भोपाल में बीते हैं. पिछले वर्ष उन्हें इस छोटे से जिले से प्रोफैसर का औफर आया तो वे अपनी पत्नी को ले कर इस कसबेनुमा जिले परसिया में चले आए, जहां सुविधा व स्वास्थ्य के मूलभूत साधन भी उपलब्ध नहीं हैं. इस कसबे को जिले में बदलने के 5 वर्ष ही हुए हैं, इसलिए विकास के नाम पर तहसील, जिला अस्पताल व सड़कों का विस्तार कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है.

सरकारी अस्पताल में जरूरी उपकरण और विशेषज्ञ डाक्टर्स की कमी बनी हुई है. बेतरतीब तरीकों से बने मकानों के बीच में, कहींकहीं सड़कें बन गई हैं तो सीवर और नाली का अभी कोईर् अतापता नहीं है.

आसपास के गांवों के समर्थ लोग इस शहर में मकान बना कर रहने तो लगे हैं पर मानसिकता और आचरण से वे

अभी भी गंवई विचारधारा से जुड़े हैं. केवल 3 से 4 किलोमीटर के दायरे में इस कसबेनुमा शहर की हद सिमट कर रह गई है. इस दायरे से बाहर नदी है, जंगल हैं और हैं शुद्ध प्राकृतिक हवा के संग हरेभरे खेतखलिहान के नजारे. जो भी बैंक, तहसील व दूसरे विभागों से ट्रांसफर हो कर, दूरदराज से यहां आते हैं, वे अच्छे बाजार, संचार साधनों की असुविधा, यातायात के साधनों की कमी से उकता कर जल्दी ही इस जगह से भाग जाना चाहते हैं.

नए खुले आईटीआई में महेंद्र सिंह को उन के अनुभव के आधार पर प्रोफैसर के पद का औफर मिला, तो वे मना न कर सके और भोपाल के अपने संयुक्त परिवार को छोड़ कर अपनी पत्नी को साथ लिए यहां चले आए. पत्नी सुजाता बेहद आधुनिक व उच्च शिक्षित है, इसीलिए कभीकभार वह भी कालेज में गैस्ट फैकल्टी बन क्लास लेने आ जाती.

सुजाता जब भी कालेज में आती, छात्रों की बांछें खिल जातीं. वैसे तो यह कोएड इंस्टिट्यूट है किंतु लड़कियों की संख्या उंगलियों में गिनी जा सकती है. लड़कियां साधारण ढंग से तैयार हो कर कालेज आती हैं. फैशन से उन का दूरदूर तक कोई नाता नहीं हैं. बस, बालों की खजूरी चोटी या पफ उठा बाल बना भर लेने से उन का शौक पूरा हो जाता है.

नीले कुरते और सफेद सलवारदुपट्टा डाले 18 से 20 वर्षीया सहपाठिनों के सामने 35 वर्षीया सुजाता भारी पड़ती. नाभि दिखने वाली साड़ी, खुले और करीने से कटे बाल, गहरी लिपस्टिक से सजे होंठ और आंखों में गहरा काजल सजाए वह जब भी क्लास लेने आती, लड़कों में मैम को प्रभावित करने की होड़ मच जाती. वे उसे फिल्मी हीरोइन से कम न समझते.

महेंद्र सिंह अपने साथी शिक्षकों के बीच गर्व से गरदन अकड़ा कर घूमते, मानो चुनौती सी देते हों कि मेरी बीवी से बढ़ कर तुम्हारी बीवियां हैं क्या. साथी शिक्षक पीठ पीछे सुजाता और महेंद्र का मजाक बनाते, मगर उन के सामने उन की जोड़ी की तारीफ में कसीदे काढ़ते.

उस दिन महेंद्र जब घर लौटे तो चाय पीते हुए, दिनभर की चर्चा में मजार का जिक्र करना न भूले. यह सुनते ही निसंतान सुजाता की आंखें एक आस से चमक उठीं कि हो सकता है कि इसीलिए ही समय उसे यहां परसिया खींच लाया है.

सुजाता जितनी वेशभूषा से  आधुनिक थी उतनी ही धार्मिक  थी. आएदिन घर में महिलाओं को बुला कर धार्मिक कार्यक्रम करवाना उस की दिनचर्या में शामिल था. इसी वजह से वह अपने महल्ले वालों में काफी लोकप्रिय हो गईर् थी.

आसपास के मकानों में ज्यादातर नजदीकी गांव से आ कर बसने वाले परिवार थे. वे दोचार सालों के भीतर ही परसिया में अपने छोटेबड़े बच्चों को पढ़ाने के लिए घर बना कर रहने आ गए थे. उन में से कुछ पंडित, कुछ पटेल तो एकदो राठौर परिवार थे.

कुछ परिवारों की महिलाएं अंगूठाछाप हैं तो कुछ 10वीं या 12वीं तक पढ़ी हैं किंतु इस के बाद विवाह हो जाने के कारण वे आगे न पढ़ सकीं. अभी तक यहां 16-17 वर्ष में शादी और 20-21 वर्ष में गौना कर देने का चलन रहा है.

ऐसे परिवारों के बीच सुजाता को कार्यक्रम करवाने के लिए इन महिलाओं से बढ़ कर कौन मिलता. ये महिलाएं, जो गांव में दिनभर किसी न किसी कार्य में व्यस्त रहती थीं, यहां परसिया में घर से बाहर, कुरसियां डाले, दिनभर गाउन पहन कर बतियाती रहतीं. गाउन पहनना उन के लिए आधुनिकता की निशानी है. बस, इतना ही फैशन करना आता है इन को.

सुजाता का शुरू में तो यहां बिलकुल मन नहीं लगता था मगर धीरेधीरे उस ने अपनेआप को साथी महिलाओं के साथ सामूहिक कार्यक्रम में व्यस्त कर लिया. उसे रहरह कर भोपाल याद आता. वहां की चमचमाती सड़कों की लौंग ड्राइव, किट्टी पार्टी, बड़े ताल का नजारा, क्लब और अपनी आधुनिक सखियों का साथ.

शादी के 10 वर्षों बाद सारी शारीरिक जांचों के परिणामों से उसे मालूम हो गया था कि वह कभी मां नहीं बन सकती. वह अपने खाली समय को किसी न किसी तरह व्यस्त रखती ताकि खाली दिमाग में कोई खुराफात न पैदा हो जाए.

जहां भोपाल में वह किट्टी, क्लब और सोशल वर्क में बिजी थी वहीं यहां के माहौल में वह पूरी तरह रम गई थी. हां, मगर नियम से, वह यहां के एकलौते ब्यूटीपार्लर में जाना न भूलती. यहां की ब्यूटीशियन से ज्यादा तो उसे ब्यूटी नौलेज थी, इसीलिए उसे भी वह तरहतरह के ब्यूटी टिप्स देती रहती.

ब्यूटीशियन रमा जबलपुर में अपनी मौसी के घर रह कर,  6 महीने का कोर्स कर के परसिया में अपना पार्लर खोल कर बैठ गई थी. यहां युवतियां थ्रेडिंग और फेशियल खूब करवाती थीं. उस का पार्लर चल निकला. परंतु सुजाता के आने के बाद रमा को वैक्ंिसग, मैनीक्योर, पैडिक्योर, हेयर कटिंग के नए तरीके जानने को मिले. वह सुजाता को देखते ही खिल उठती और सोचती, कितनी उच्चशिक्षित है मगर स्वभाव उतना ही सरल है.

इधर, सुजाता का मन मजार के चक्कर लगाने को मचलने लगा. वह सोचती सारे वैज्ञानिक तरीके अपना कर देख ही लिए हैं, कोई परिणाम नहीं मिला. अब इस मजार के चक्कर लगा कर भी देख लेती हूं. जब इस विषय में महेंद्र की राय लेनी चाही तो उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया, शायद उन्होंने भी सुजाता की आंखों में आशा की चमक को देख लिया था. महेंद्र से कोई भी जवाब न पा कर सुजाता सोच में पड़ गई. उस ने अपने पड़ोसियों से इस विषय में बात करने का मन बना लिया.

दूसरे दिन हमेशा की तरह दोपहर में जब सारी महिलाएं अपने चबूतरे पर या प्लास्टिक की कुरसियां डाल कर गपों में मशगूल हो गईं, सुजाता ने मजार का जिक्र छेड़ दिया. फिर क्या था, सभी के पास तर्क निकल आए कि मजार इतनी महत्त्वपूर्ण क्यों है? सभी सवर्र्ण और पिछड़े वर्ग के परिवारों की महिलाओं में वैसे तो पूजापाठ के नियमों में बहुत अंतर था मगर मजार के विषय में वे सभी एकमत थीं.

लगेहाथ महिलाओं ने सुजाता की दुखती रग पर हाथ रखते हुए उसे भी संतान की मनौती मांगने के लिए 40 दिन मजार का फेरा लगाने का सुझाव दे ही दिया. कुछ का तो कहना था कि 40 दिन पूरे होने से पहले ही उस की गोद हरी हो जाएगी. जितने मुंह उतनी बातें सुन कर सुजाता ने तय कर लिया कि वह कल सुबह से ही मजार जाने लगेगी. महेंद्र उस के इस फैसले से खुश तो नहीं हुआ, किंतु उस ने उसे उस के विश्वास के साथ फैसला लेने को स्वतंत्र कर दिया.

मजार का रास्ता रेलवे स्टेशन के ओवरब्रिज से गुजर कर 2 प्लेटफौर्म्स के बाद है. छोटा सा  स्टेशन होने के कारण, बहुत ही कम यात्रीगाड़ी के फेरे लगते हैं. दिनभर पास के अंचल से कोयला खदानों का कोयला लाद कर गुजरने वाली मालगाडि़यों का ही तांता लगा रहता है, जो ज्यादातर तीसरे प्लेटफौर्म से गुजरती हैं.

दूसरे और तीसरे प्लेटफौर्म के बीच में ही मजार है, जिसे चारों तरफ से घेर कर ओवरब्रिज की सीडि़यों से जोड़ दिया गया है. जिस से लोगों की मजार में आवाजाही से रेलवे स्टेशन के सुरक्षा प्रबंधन पर कोई असर नहीं पड़ता. लोगों का आनाजाना एक ओर से लगा ही रहता.

जब से यह जगह जिले में परिवर्तित हुई है तब से भीड़ बढ़ने लगी और एक बाबा की मौजूदगी भी. वह हफ्ते में 3 दिन मजार में, शेष 4 दिन स्टेशन के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे बैठा मिलता. कोई कहता कि बाबा मुसलिम है तो कोई उस के हिंदू होने का दावा करता. मगर बाबा से जाति पूछने की हिम्मत किसी में नहीं थी. बाबा से लोग अपनी परेशानियां जरूर बताते जिन्हें वह अपने तरीके से हल करने के उपाय बताता.

बाबा बड़ा होशियार था, वह शाकाहारियों को नारियल तोड़ने तो मांसाहारियों को काला मुरगा काट कर चढ़ाने का उपाय बताता. लोगों के बुलावे पर उन के घर जा कर भी झाड़फूंक करता. जो लोग उस के उपाय करवाने के बाद मनमांगी मुराद पा जाते, वे खुश हो उस के मुरीद हो जाते. लेकिन जो लोग सारे उपाय अपना कर भी खाली हाथ रह जाते, वे अपने को ही दोषी मान कर चुप रहते. इसीलिए, बाबा का धंधा अच्छा चल निकला.

सुजाता सुबह के समय जब घर से निकली उस समय जाड़े के मौसम के कारण कोहरा छाया हुआ था. वह तेज कदमों से स्टेशन की ओर निकल गई. उस के घर और स्टेशन के बीच एक किलोमीटर का ही फासला तो था.

अभी मजार में अगरबत्ती सुलगा कर पलटी ही थी कि बाबा से सामना हो गया. उस ने प्रणाम करने को झुकना चाहा पर उस की मंशा भांप कर बाबा दो कदम पीछे हट गया. मेरे नहीं, इस के पैर पकड़ो, वह जो इस में समाया है. उस ने उंगली से मजार की तरफ इशारा करते हुए कहा, जिस मंशा से यहां आई हो, वह जरूर पूरी होगी. बस, अपने मन में कोई शंका न रखना.

सुजाता गदगद हो गई. आज सुबह  इतनी सुहावनी होगी, उस ने  सोचा न था. उसे पड़ोसिनों ने बताया तो था यदि मजार वाले बाबा का आशीर्वाद भी मिल जाए तो फिर तुम्हारी मनोकामना पूरी हुई ही समझो.

खुश मन से सुजाता ने जब घर में प्रवेश किया, तो उस का पति चाय की चुस्की के साथ अखबार पढ़ने में तल्लीन था. सुजाता गुनगुनाते हुए घर के कार्यों में व्यस्त हो गई. महेंद्र सब समझ गया कि वह मजार का चक्कर लगा कर आई है, मगर कुछ न बोला.

वह सोचने लगा कितने सरल स्वभाव की है उस की पत्नी, सब की बातों में तुरंत आ जाती है, अब अगर मैं वहां जाने से रोकूंगा तो रुक तो जाएगी मगर उम्रभर मुझे दोषी भी समझती रहेगी कि मैं ने उस के मन के अनुसार कार्य न कर के, उसे संतान पाने के आखिरी अवसर से भी वंचित कर दिया. आज जा कर आई है तो कितनी खुश लग रही है वरना कितनी बुझीबुझी सी रहती है. चलो, कोई नहीं, 40 दिनों की ही तो बात है, फिर खुद ही शांत हो कर बैठ जाएगी. मेरे टोकने से इसे दुख ही पहुंचेगा.

दिन बीतते देर नहीं लगती, 40 दिन क्या 4 महीने बीत गए, मगर सुजाता का मजार जाना न रुका. अब वह गैस्ट फैकल्टी के कार्य में भी रुचि नहीं लेती, न ही आसपड़ोस की महिलाओं के संग कार्यक्रम में मन लगाती. अपने कमरे को अंदर से बंद कर, घंटों न जाने कैसे तंत्रमंत्र अपनाती. इन सब बातों से बेखबर एक दिन अचानक रमा उस महल्ले से गुजरी. उस ने सोचा, सुजाता भाभी की खबर भी लेती चलूं, अरसा हो गया उन्हें, वे पार्लर नहीं आईं.

दोपहर का समय, दरवाजे की घंटी सुन सुजाता को ताज्जुब हुआ कि इस समय कौन है? दरवाजा खोलते ही रमा को देख कर खुशी से चहक उठी. उसे लगभग खींचते हुए भीतर ले गई.

मगर रमा उसे देख कर हैरान थी कि क्या यह वही सुजाता है जो कितनी सजीसंवरी रहती थी. सामने मैलेकुचैले गाउन में, कालेसफेद बेतरतीब बालों की खिचड़ी के साथ, न मांग में सिंदूर, न मंगलसूत्र, न चूडि़यां, न बिंदी पहने सुजाता किसी सड़क पर घूमती पगली से कम नहीं लगी. ‘‘भाभी, आप को क्या हो गया है? तबीयत तो ठीक है न आप की? भाईसाहब ठीक तो हैं न?’’ रमा ने हैरानी से पूछा.

‘‘अब आई है, तो बैठ. तुझे सब बताती हूं. मेरी तबीयत को कुछ नहीं हुआ बल्कि मेरे चारों तरफ भूतों का डेरा हो गया है. कोई मेरी बात का विश्वास नहीं करता. यहां देख मैं इसे सोफे पर रातभर जाग कर टीवी देखती रहती हूं. अगर झपकी आई तो सो गई वरना पूरी रात यों ही कट जाती है. ये भूत दिनरात मेरे चारों तरफ मंडराते रहते हैं. दिन में भी कभी महल्ले के बच्चे के रूप में तो कभी पड़ोसिन के रूप में आ कर बैठ जाते हैं. फिर चाय बनाने या कुछ लेने भीतर जाओ, तो गायब हो जाते हैं.’’

‘‘भाभी, ऐसी बातें कर के मुझे मत डराओ?’’ रमा घबरा गई.

‘‘यह मेरी जिंदगी की सचाई बन गई है. ये देखो, मेरे हाथ में ये निशान. अगर मैं चूड़ी, बिंदी, कुछ भी पहनती हूं तो ऐसे निशान बन जाते हैं. सजनेसंवरने पर मुझे ये भूत बहुत परेशान करते हैं, इसीलिए मैं अब सादगी से रहती हूं, बाल भी नहीं रंगती, मेहंदी भी नहीं लगाती,’’ सुजाता बोली.

‘‘भाईसाहब, आप को कुछ समझाते नहीं हैं क्या?’’ रमा सुजाता की बातें सुन कर उलझन में पड़ गई.

‘‘मेरे पति के अंदर तो खुद ही आत्मा आती है. जब वह आत्मा आती है तो उन की आवाज भर्रा जाती है, चेहरा सर्द हो जाता है, उसी आत्मा ने मुझे सादगी से रहने का आदेश दिया है.’’

‘‘मैं चलती हूं भाभी, बेटे के स्कूल से लौटने का समय हो गया है,’’ कह कर रमा उठ खड़ी हुई. सुजाता की बातें सुन कर रमा के रोंगटे खड़े हो गए. उस ने वहां से निकलने में ही अपनी भलाई समझी.

रमा अपनी स्कूटी स्टार्ट कर ही रही थी कि सामने से शैलेश आता दिखा. शैलेश उसी की गांवबिरादरी का है, रिश्ते में उस का चचेरा भाई लगता है. उसे देख कर वह रुक गई. उसी ने तो 2 महीने पहले उसे स्कूटी चलानी सिखाई थी. उस ने सुजाता के दरवाजे पर नजर डाली. सुजाता ने अपनेआप को फिर से घर में कैद कर लिया था. उस ने शैलेश को अपने पीछे बैठने का इशारा किया और वहां से सीधा अपने घर को चल पड़ी.

शैलेश ने जो बताया उसे सुन कर रमा हैरान रह गई. ‘‘सुजाता जब पहली बार मजार में गई थी तो उसी दिन बाबा ने उस के बारे में पूरी जानकारी उस से जुटा ली. सुजाता धीरेधीरे बाबा की कही बातों का आंख मूंद कर विश्वास करने लगी थी. किंतु 40 दिन बीतने के बाद भी जब कोई परिणाम न मिला तो बाबा ने उसे समझाया कि यह सब तुम्हारे पति की शंका करने की वजह से हो रहा है. जब तक वे भी सच्चे मन से इस ताकत को नमन नहीं करेंगे, तब तक तुम अपने लक्ष्य को नहीं पा सकतीं. यह सुन कर सुजाता ने अपने पति को भी मजार लाने का फैसला किया और रोधो कर, गिड़गिड़ा कर, उसे यहां तक लाने में सफल हो ही गई. लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या, शैलेश? रमा की उत्सुकता चरम पर थी.’’

‘‘लेकिन जब मैं ने महेंद्र सर से कहा तो वे गुस्से से लालपीले हो कर कहने लगे, ‘ये सारी बातें बकवास हैं, ये फेरे लगाने से कुछ नहीं होता बल्कि अब तो सुजाता घरेलू कार्य में भी रुचि नहीं लेती. बीमारों की तरह पूरे दिन वह लेटी रहती है. चलो, मैं भी वहां का नजारा देख कर आता हूं.

‘‘उस दिन बाबा स्टेशन से पहले पीपल के पेड़ के नीचे बैठे आसपास से आए आदिवासियों को घेर कर बैठे थे. उस दिन मजार का मेला भी था जो मजार पर न लग कर बाहर पास के मैदान में लगता है. उस दिन की भीड़ को देखते हुए किसी को भी स्टेशन की सुरक्षा के लिहाज से मजार तक जाने नहीं दिया जाता. इसलिए जो भी भक्त, चादर, अगरबत्ती, धूप जो भी चढ़ाना चाहे, वह बाबा को सौंप देता है. इसीलिए बाबा के चारों तरफ भीड़ जुटी थी. जिस में गरीब आदिवासी महिलाएं, उन की बेटियां बहुत श्रद्धा के साथ हाथ जोड़ लाइन से आगे बढ़ती जा रही थीं.’’

‘‘सर, उन सब को बड़े ध्यान से देख रहे थे. थोड़ी देर में जब बाबा की नजर मेरे साथ खड़े सर पर पड़ी तो वे समझ गए कि ये सुजाता मैम के पति होंगे. उन्होंने उन्हें दूसरे दिन आ कर बात करने को कहा. सर मेरे साथ वापस आ गए.

‘‘तब तक तो मैं भी नहीं जानता था कि मैं खुद बाबा के हाथों का मोहरा बन कर रह गया हूं. वह एकतरफ सुजाता मैम को बच्चे के ख्वाब दिखा कर बरगला रहा था तो दूसरी तरफ प्रोफैसर को दूसरी शादी के सब्जबाग दिखाने लगा. इन दोनों को अपनी बातों का विश्वास दिलाने को, बाबा जब न तब, मुझे और मेरे दोस्तों को बुला कर हमारी मनोकामनाओं के पूरी होने के उदाहरण देता. हम भी उस की बात में हां में हां मिलाते, क्योंकि हमें बाबा की ताकत पर भरोसा भी था और डर भी.’’

‘‘धीरेधीरे उस ने मैम के दिमाग में यह बात भर दी कि उस का रहनसहन, पहनावा आकर्षक होने के कारण, पीपल के पेड़ के भूत, उस पर आसक्त हो गए हैं. इसलिए उसे सब से पहले अपने आप को सादगी में रखना होगा. दूसरी तरफ, प्रोफैसर को दूसरी शादी के लिए रिश्ते दिखाने लगा. उन्हीं में से एक रिश्ते में 16 साल की एक गरीब की लड़की का रिश्ता भी था, जो प्रोफैसर को बहुत ही भा गया.

‘‘आजकल सर के बहुत चक्कर लग रहे हैं उस लड़की के गांव के. यहां से 15 किलोमीटर पर ही तो है वह गांव. वहां आदिवासी परिवार हैं. उन के वहां अभी भी बालविवाह, बहुविवाह का चलन है. अब क्या है, सर की पांचों उंगलियां घी में हैं. वे भी बस लगता है अपनी बीवी के पूरी पागल होने के इंतजार में हैं ताकि उसे पागलखाने भेज कर, उस की सहानुभूति भी बटोर लें और फिर उस कन्या से विवाह कर संतान भी पैदा कर लें.

‘‘मेरी गलती, बस, यही है कि मैं बाबा और सर की चालों को पहले समझ ही नहीं पाया वरना मैम की कुछ मदद कर देता. मगर अब उन की मानसिक स्थिति को केवल किसी मानसिक रोग विशेषज्ञ से मिल कर ही संभाला जा सकता है.’’

लेकिन मानसिक रोग विशेषज्ञ इस शहर में मौजूद ही नहीं हैं और दूसरे बड़े शहर में ले जा कर इलाज कराने के मूड में प्रोफैसर हैं ही नहीं. शैलेश के मुख से यह सब सुन रमा घोर चिंता में आ गई.

बेचारी सुजाता भाभी, यह मक्कार बाबा जब प्रोफैसर को अपनी बातों में न उलझा पाया तो उस ने दूसरा जाल फेंका जिस में बड़ेबड़े ऋ षिमुनि न पार पा पाए. तो फिर उस जाल में यह प्रोफैसर कैसे बच पाता. वह दूसरी शादी करने के लिए अपनी पहली पत्नी को भूल गया, मौकापरस्त आदम जात. यह सोच कर रमा अपना सिर पकड़ कर बैठ गई.

कर ले तू भी मुहब्बत- भाग 1

यह कहानी है दिल्ली के प्रसिद्ध लेडी श्रीराम कालेज की, जहां मुसकान अपनी 3 सीनियर्स के साथ गर्ल्स होस्टल में रहती थी. उस का पहली मेरिट लिस्ट में ही एडमिशन हो गया था. वह बहुत ऐक्साइटेड थी, क्योंकि लाखों युवा दिलों की तरह उस का भी सपना था कि वह इस कालेज में पढ़ कर अपने सपने पूरे कर पाए. वह मेरठ से थी.

शुरू में तो उसे महानगर की चकाचौंध का हिस्सा बनने में वक्त लगा था, पर उस की रूममेट्स के अत्यधिक कूल होने के कारण जल्दी ही उस की तीनों के साथ अच्छी जमने लगी थी. कौफी बनाना, बाजार से छोटेमोटे सामान लाना, यहां तक कि अपनी दीदी के कपड़े धोना तक के काम उस के ही हिस्से में थे. वे उस की मेंटर, गाइड और बड़ी बहनें थीं. उन की गाइडेंस में ही उस की फुल जींस घुटनों तक की शार्ट्स और टौप्स की साइज कटते हुए क्रॉप टौप पर और आस्तीन तो गायब ही हो गई थी.

सालभर में ही वह अपने नए हैयरस्टाइल और स्वैग के साथ अपनी घरेलू और डेढ़ फुटी इमेज से बाहर निकल कर एक बेहद ही खूबसूरत दोशीजा में बदल गई थी… जिसे देखते ही किसी के भी मुंह से अनायास ही ‘सो क्यूट’ निकल जाया करता था. ऊपर वाले ने उसे बला की खूबसूरती से नवाजा
था. वह सिर्फ जबान से ही नहीं बोलती थी… उस की बोलती तीखी आंखों के साथ उस के कानों में पहनी जाने वाली बड़ीबड़ी बालियां भी उस के बोलने पर, मुसकराने पर चहक उठती थीं. वह अन्य लड़कियों से बिलकुल अलग थी. लड़कों से कतराने वाली, कालेज कैंपस की रंगीन चकाचौंध से अलगथलग रहने वाली और हर वक्त किताबों में डूबी रहने वाली.

उस दिन कालेज की फेयरवैल पार्टी थी. वहां की फिजाओं में मानो एक नशा सा घुल गया था. कालेज कैंपस में उस की तीनों सीनियर्स की आखिरी रात थी. मौसम में जुदाई की एक कसक सी थी, पर उदास हो कर कोई भी इस पल को खोना नहीं चाहता था. पार्टी के बाद हग्ज और किसेज की बौछारें हो रही थीं. कुछ फिर से मिलने की… तो कुछ सोशल मीडिया से जुड़े रहने की… तो कुछ जिंदगीभर एकदूसरे का साथ निभाने का वादा किए बिछुड़ रहे थे. रूम में आ कर भी पार्टी की खुमारी उतरने का नाम नहीं ले रही थी.

मुसकान ने मोबाइल की घड़ी पर नजर डाली. रात के एक बज रहे थे. पर तीनों में से कोई भी सो कर अपना वक्त जाया नहीं करना चाहती थीं. वो तीनों एक ही पलंग पर औंधे पड़े आपस में कोई वीडियो शेयर कर रही थीं और एकदूसरे से इशारों में बातें कर रही थीं और कभी मुंह पर हाथ लगा कर जोर से हंस पड़तीं. जैसे ही मुसकान उन के पास कौफी के मग ले कर आई और उस ने वीडियो के बारे में उत्सुकता दिखाई, “आप लोग क्या देख रहे हो?”

“बेबी… ये पोर्नवोर्न तेरे बस की बात नहीं है… तू टीवी पर डोरेमोन देख,” कहते हुए तीनों हाई फाइव देते हुए जोर से हंस पड़ीं.

‘इस में इतना हंसने वाली कौन सी बात है?’ वह मन ही मन बुदबुदा उठी. इस बीच फ्रेंच किस… वाइल्ड सैक्स, फक, क्रश जैसे शब्द उस के कान से टकराए थे, जो उस की डिक्शनरी में बिलकुल नए थे. उन शब्दों का अर्थ गूगल पर सर्च कर उन का मतलब जान लेने के बाद उस के दिल की बगिया में भी खुशबूदार फूल खिलने लगे थे.

‘बस, अब बहुत हो गया जिंदगी को सीधी चाल से चलते हुए… अब मैं भी सब को दिखा दूंगी कि मैं भी बड़ी हो गई हूं.’

बस यह खयाल बारबार उस के मन को छूने लगा था. फेसबुक और इंस्टा पर तो उस का अकाउंट था ही… इस बार उस ने टिंडर पर अपना अकाउंट बनाने की सोची, जिस में उस की साथ वाली लड़कियों ने तो महारत हासिल कर रखी थी. वह सेल्फी स्टिक उठा लाई और अलगअलग पोज और आउटफिट्स में कम से कम सौ क्लिक्स ले डालीं. फिर उन में से सब से अच्छी फोटो पसंद कर टिंडर पर अपनी प्रोफाइल बनाई और लौगइन कर दिया. इस के साथ ही उस की स्क्रीन पर कई प्रोफाइल उभरे… प्रोफाइल्स काफी इंट्रेस्टिंग थी. उस ने थोड़ी हिम्मत कर, ऊपर वाले का नाम ले उस ने एक प्रोफाइल पर राइट स्वाइप कर उसे सुपर लाइक कर दिया. उस का दिल जोरों से धकधक करने लगा. डर के मारे उस ने अपनी आंखें भींच लीं. कुछ ही पलों में ‘इट्स अ मैच’ का नोटिफिकेशन उस की मोबाइल स्क्रीन पर उभरा और अगले ही पल एक मैसेज आ गया, “व्हाट अ ब्यूटीफुल स्माइल… इट परफेक्ट मैचेस विद योर नेम सैक्सी.”

सैक्सी विशेषण उस के लिए बिलकुल नया था. वह एक बार को तो घबराई, पर फिर एक स्माइली के साथ रिप्लाई किया, ” थैंक्स…”

“मुझे थैंक्स नहीं, कुछ और चाहिए …” मुसकान की स्क्रीन पर फिर से एक मैसेज पौपअप हुआ.

“क्या…?”

“मुसकान… तो फिर कौफीहाउस पर मिलते हैं स्वीटहार्ट.”

“मिलना… डूड, आप शायद भूल रहे हैं… इट्स अवर फर्स्ट चैट… कुछ सेकंड पहले तो हम जुड़े हैं और आप मिलने की बात कर रहे हैं.”

“जान, आप भी शायद भूल रही हैं. आप टिंडर पर हैं और यह एक डेटिंग ऐप है.”

‘ज्ज्ज्जान…’ उसे लगा, यह शब्द सुन कर तो उस की जान ही निकल जाने वाली है, पर उस ने कुछ हिम्मत दिखाते हुए रिप्लाई किया, “क्यों ना हम पहले एफबी पर फ्रेंडशिप करते हैं… फिर डेटिंग करेंगे…”

“क्या बेबी… तुम भी… ओके. एनीथिंग फोर यू, पर मेरी एक शर्त है.”

“क्या शर्त है…?”

“तुम मुझे वीडियो काल कर एक किस करोगी.”

मुसकान को समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे रीऐक्ट करे? वह बड़ी असमंजस में थी… घबराहट के मारे उस के हाथ कांपने लगे थे. उस ने बाय कह कर फोन डिसकनेक्ट कर दिया. पर उस के बाद दोनों के बीच फेसबुक पर चैट का सिलसिला चल पड़ा, जो एक हफ्ते तक चला. पर आकाश ने 8वें दिन उसे मिलने के लिए राजी कर ही लिया.

उस ने अपनी जिंदगी की पहली डेटिंग के लिए पिंक ट्यूनिक पसंद की थी. आकाश पहले से ही कैफे में बैठा उस का इंतजार कर रहा था. उस पर नजर पड़ते ही अपने होंठों के बीच दबी सिगरेट को निकाल जूतों से मसल दी और लपक कर उसे बांहों में भर कानों पर… गालों पर किस करने लगा.

सिगरेट की असहनीय बदबू के भभके ने उसे आकाश से खुद को अलग करने के लिए मजबूर कर दिया. वैसे भी वो इन सब के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थी.

“तुम हर लड़की से इसी तरह मिलते हो क्या?”

“हर लड़की से नहीं. तुम तो मेरी गर्लफ्रेंड हो… तो मेरा तुम पर हक है,” कहते हुए वह फिर से उस के होंठों को चूमने लगा.

मुसकान ने धीरे से खुद को अलग किया और ठगी हुई सी आकाश की ओर ताकने लगी. उस की आंखों में आंसू थे, जिन्हें देख कर आकाश को भी कुछ झुंझलाहट सी होने लगी थी.

“तुम इन सब में इंट्रेस्टेड नहीं थी, तो डेटिंग पर आई ही क्यों?”

“मुझे फर्स्ट डेटिंग पर ये सब एक्सपेक्टेड नहीं था.”

“और मुझे भी लेडी श्रीराम कालेज की लड़की से इतना दकियानूसीपन और पिछड़ापन एक्सपेक्टेड नहीं था,” कहते हुए उस ने अपनी बाइक स्टार्ट की और तेजी से वहां से निकल गया, मुसकान को और उस की भीगी पलकों को बहुत पीछे छोड़ कर.

पर दूसरी तरफ, पूरे 2 दिन लगे थे मुसकान को इन सब से उबरने में.

2 दिन बाद जब वह सामान्य हुई, तो उस ने अपना टिंडर का अकाउंट खोल आकाश को मैसेज करना चाहा, तो उसे पता चला कि वो आकाश द्वारा ब्लौक कर दी गई थी.

उस ने पहली बार ब्रेकअप के बाद की उदासी का स्वाद चखा था.

 

हेल्दी टिफिन हेल्दी किड्स कॉम्पटीशन

हेल्दी टिफिन बच्चों को हेल्दी रखने में सहायक होते हैं. हालांकि खाने में स्वाद और स्वास्थ्य दोनों को संतुलित करना मुश्किल है. ये एक ऐसी समस्या है, जिसका मदर्स हमेशा से समाधान निकालने की कोशिश में लगी रहती हैं. टिफिन सिर्फ हेल्दी फूड सर्व करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसे साफ हेल्दी लंच बौक्स में परोसना भी जरूरी होता है. एंटी बैक्टीरियल एक्सो, सिर्फ सफाई नहीं करता, बल्कि गंदे बर्तनों पर 10 सेकंड में 700 पर्सेंट बढ़ने वाले बैक्टीरिया का खात्मा भी करता है और लंच बौक्स को साफ करके टिफिन बौक्स को भी हेल्दी बनाता है.

आइए आपको बताते हैं कुछ मजेदार रेसिपीज के बारे में…

1. दलिया बौल्स

1/2 कप मूंग दाल को धो कर पानी में भिगोए.1 कप दलिया में उबला आलू, 1 प्याज कटा,1/2 शिमला मिर्च कटी, थोड़ी गाजर कटी, हरीमिर्च व नमक मिलाकर छोटी बौल्स बनाकर 2 बड़े चम्मच कॉर्न फ्लोर में डस्ट करें और फिर गर्म तेल में सुनहरा होने तक तल लें. दाल में नमक डाल कर उसे उबालें फिर उसके बाद मिक्सी में पीस लें. बाउल में निकालकर नींबू रस मिला लें. इसमे दलिया बौल्स डाल कर सर्व करें.

2. मखनी पनीर रोल

1 कप मैदे में थोड़ा सा नमक और मक्खन डाल कर पानी के साथ गूंध लें. कड़ाही में घी गरम कर 2 कटे टमाटर भूनें. इन में थोड़ी कटी शिमलामिर्च, हरीमिर्च व नमक डाल कर भून लें. भुनने पर 1 कप मैश पनीर डालकर अच्छी तरह मिलाकर, पका कर ठंडा होने दें. मैदे के छोटे पेड़े बना कर चौकोर बेलें. इन में पनीर की फिलिंग डाल कर रोल कर लें. गरम ओवन में 10-15 मिनट तक बेक कर सौस के साथ गरमगरम परोसें.

हमें अपने हेल्दी और टेस्टी लंच बौक्स रेसिपीज को grihshobha@delhipress.biz पर भेजें या 9650966493 पर व्हाट्सऐप करें. ताकि आप दूसरी मदर्स की मदद कर सकें और यहां आपको अपनी हेल्दी रेसिपीज को फीचर करने का मौका मिल सकें.

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EXO
रेसिपी भेजने की अंतिम तिथि: 25 नवंबर 2023

चयनित रेसिपीज को पत्रिका में प्रकाशन और 1000/- का अमेजन गिफ्ट वाउचर जीतने का मौका.

तोहफा: भाग 2- रजत ने सुनयना के साथ कौन-सा खेल खेला

‘‘इस में बुराई ही क्या है विदेशों में इस का बहुत चलन है. शादी अब ओल्ड फैशन और आउटडेटेड हो गई. किसी से प्यार हो गया तो साथसाथ रहने लगे. जब एक का दूसरे से मन भर जाए गया तो अलग हो गए. न किसी तरह खिचखिच न और किसी तरह का बखेड़ा.’’

‘‘और यदि बच्चे हुए तो?’’

‘‘तो बात अलग है. बच्चों की खातिर और उन्हें जायज करार देने के लिए विवाह बंधन में बंधा जा सकता है.’’

सुनयना सोच में पड़ गई. उस के माथे पर बल पड़ गए.

‘‘अगर तुम मानों तो हम दोनों कल से ही साथसाथ रह सकते हैं. मेरा खुद का फ्लैट है पाली हिल, बांद्रा में. हम वहां शिफ्ट हो सकते हैं,’’

‘‘नहीं,’’  सुनयना ने एक उसांस भरी, ‘‘मेरे मांबाप पुराने खयालात के हैं. वे इस बात के लिए कतई राजी नहीं होंगे.’’

‘‘तो एक और विकल्प है.’’

‘‘वह क्या?’’

‘‘क्यों न हम एक कौंट्रैक्ट मैरिज कर लें

1-2 साल के लिए. उस के बाद हमें ठीक लगे तो कौंट्रैक्ट को बढ़ा लेंगे. नहीं तो दोनों अलग हो जाएंगे. क्यों क्या खयाल है?’’

‘‘नहीं,’’ सुनयना ने आंसू बहाते हुए कहा, ‘‘मुझे यह ठीक नहीं लगता. मुझ में और एक कालगर्ल में फिर फर्क ही क्या रह जाएगा? आज इस के साथ तो कल किसी और के साथ, इस में बदनामी के सिवा और कुछ हासिल होने वाला नहीं है. इस सौदे में लड़की घाटे में ही रहेगी. वह एक असुरक्षा के भाव से घिरी रहेगी. लड़के का कुछ नहीं बिगड़ेगा.’’

‘‘डार्लिंग हम 21वीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं. तुम इतनी पढ़ीलिखी हो कर भी गंवारों जैसी बातें करती हो. खैर, अब इस पब्लिक प्लेस में यों रो कर एक तमाशा तो न खड़ा करो. चलो घर चलते हैं.’’

गाड़ी में सुनयना ने कहा, ‘‘रजत, तुम्हारे विचार जान कर मुझे बड़ा डर लग रहा है. शादी तुम करना नहीं चाहते और तुम्हारे दूसरे प्लान से मैं सहमत नहीं हूं. तब हमारा क्या होगा?’’

रजत ने उसे अपनी बांहों में ले लिया और बोला, ‘‘फिक्र क्यों करती हो, क्या तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं? 4 साल से हम दोनों साथसाथ हैं. क्या यह तुम्हारे लिए कुछ माने नहीं रखता? हम दोनों एकदूसरे के कितने करीब हैं. 2 तन 1 जान हैं. मैं तो कहता हूं कि हम यों ही भले हैं. जैसा चल रहा है चलने दो.’’

‘‘तुम्हारे लिए यह कहना आसान है पर मेरी तो शादी की उम्र बीती जा रही है. तुम्हारा क्या बिगड़ेगा, तुम तो रोज लड़की से दिल बहला सकते हो. पर हम स्त्रियों की तो हर तरह से मुसीबत है. हम पर बदनामी का ठप्पा लगते देर नहीं लगती. शादी के बिना तुम्हारे साथ घर बसाऊंगी तो आवारा बदचलन कही जाऊंगी और अगर तुम से कौंट्रैक्ट मैरिज की और अवधि

खत्म होने पर तुम ने मुझे फटी जूती की तरह निकाल फेंका, तो मैं कहां जाऊंगी? कौन शरीफजादा मुझे अपनाएगा?’’

सुनयना रात में अपने कमरे में रोती रही. उसे अपना भविष्य अंधकारमय नजर आता था. उस की आशाओं का महल धराशायी हो गया था. उस ने अपने मन की गहराइयों से रजत से प्यार किया था. उस के साथ घर बसाने के सपने देखे थे. पर उस ने एकबारगी ही उस के सपने चकनाचूर कर दिए थे. अब वह क्या करे? रजत से मिलना छोड़ दे? उस से नाता तोड़ ले? रजत से बिछड़ने की कल्पना से ही उस का मन उसे कचोटने लगा, लेकिन उसे पाना भी अब एक मृग मरीचिका के समान था. इतने दिन वह अपनेआप को छलती आई थी. वह भलीभांति जानती थी कि रजत एक प्लेबौय है. वह ऐयाश फितरत का था, इसलिए भौंरे के समान कलीकली का रसपान करना चाहता था. यानी स्वच्छंद रहना चाहता था और किसी भी तरह की जिम्मेदारी से बचना चाहता था. इसीलिए वह शादी के बंधन में भी नहीं बंधना चाहता था.

सुबह सुनयना की मां ने उस के चेहरे पर अपनी सवालिया नजरें गड़ा दीं. पर उस की सूजी आंखें और चेहरा देख कर वे वस्तुस्थिति भांप गईं.

2 दिन बाद रजत का फोन आया,‘‘कल क्या कर रही हो? मुझे अपने व्यापार के सिलसिले में रशिया जाना पड़ रहा है. मैं चाहता था कि जाने से पहले तुम से मिल लूं.’’

‘‘कल तो मैं फ्री नहीं हूं. मेरी होटल में ड्यूटी लगी है.’’

‘‘मैं 3 हफ्ते के लिए जा रहा हूं. इतने दिन तुम्हें देखे बिना कैसे रह पाऊंगा?’’

सुनयना पिघलने लगी, लेकिन फौरन उस ने अपना मन कठोर कर लिया,‘‘क्या किया जाए मजबूरी है. नौकरी जो ठहरी.’’

‘‘तुम्हारी ड्यूटी कितने बजे खत्म होगी?’’

‘‘रात को 2 बजे.’’

रजत ना सुनने का आदी न था, बोला, ‘‘ठीक है,  मैं तुम्हें लेने आऊंगा. बाहर गाड़ी में बैठा तुम्हारा इंतजार करूंगा.’’

सुनयना ने चुपचाप फोन रख दिया.

सुनयना हमेशा चहकती रहती थी पर आज चाहने पर भी वह हंसबोल नहीं रही थी उस का मन अवसाद से भरा था.

रजत ने कहा, ‘‘आज तुम जरूरत से ज्यादा गंभीर हो.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है,’’ सुनयना ने सफाई दी, ‘‘आज मैं बहुत थकी हुई हूं.’’

‘‘चलो आज थोड़ी देर के लिए मेरे फ्लैट पर चलो.’’

जीवनसाथी: भाग 2- विभोर को अपनी पत्नी वसु से नफरत क्यों हुई

शुरू में तो वसु ने सोचा शांत रहेगी तो विभोर का ग़ुस्सा कम हो जाएगा. लेकिन वसु का शांत मृदु स्वभाव भी विभोर में कोई परिवर्तन नहीं ला पा रहा था.

रोज अपने और विभोर के बीच स्नेहसूत्र पिरोने का प्रयास करती लेकिन विभोर किसी पत्थर की तरह अपने विचारों पर अडिग रहता. वसु औफिस जाने के पहले सारे काम निबटा रही होती और विभोर आराम से टीवी पर नित्य नए बाबाओं की बेमानी बातें बड़े ध्यान से सुनता जो उस के मानसपटल पर अंकित हो उस के पुरुष अहम को पोषित करतीं. हर बात में सुनीसुनाई उन्हीं बातों को करता. कभी वसु कोई काम

कहती भी तो गुस्से में चिल्ला कर उस का अपमान करता. आज वसु सुबह जल्दी उठ गई थीप्त उसे औफिस जल्दी जाना था. उस ने अपने साथ सब की चाय बना ली और विभोर को देते हुए कहा, ‘‘विभोर, मैं ने दीदी की चाय भी बना दी है. मैं नहाने जा रही हूं. मुझे आज औफिस जल्दी जाना है. दीदी उठे तो आप उन्हें गरम कर के दे देना.’’

वसु की ननद भी अपने छोटे बच्चे के साथ रहने आई हुई थी.

इतना सुनते ही विभोर का मूड उखड़ गया. चिल्ला कर बोला, ‘‘वसु, मैं देख रहा

हूं, तुम मां को इगनोर कर रही हो, मां का नाश्ता तुम बना कर केसरोल में रख दोगी और आज तो तुम्हें छुट्टी लेनी चाहिए थी, सुमन आई हुई है.’’

‘‘मैं शाम को जल्दी आने की कोशिश करूंगी विभोर मगर छुट्टी नहीं ले सकती. मेरी प्रमोशन डियू है और विभोर आप चिल्ला क्यों रहे हो? शांति से भी तो कह सकते हो. अच्छा नहीं लगता जब आप चिल्लाते हो वह भी सब के सामने.’’

‘‘क्यों सब के सामने की क्या बात है? यहां बाहर का है ही कौन? मां हैं, मेरे भाईबहन हैं.’’

‘‘नहीं विभोर बात करने का तरीका होता है, इस विषय पर सोचना,’’ कह कर वसु औफिस निकल गई.

जब भी वसु औफिस को निकलती विभोर कुछ काम जरूर बता देता. वसु को कर के जाना होता, जिस वजह से अकसर औफिस के लिए देर हो जाती और फिर बौस की डांट पड़ती.

वसु की हमेशा कोशिश होती कि बात को समझ कर सुलझा लिया जाए, वह वैसे भी मुसकराती रहती थी. सोचती थी, पिता के असमय जाने से शायद स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ गया है, प्यार से धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. आशा की किरण उस के होंठों पर मुसकान बिखेर देती. कितनी भी बात हो वसु कभी मुंह बना कर नहीं घूमती. लेकिन इन कोशिशों में विभोर की स्त्री के प्रति अवमानना उस के रिश्ते में जहर घोल रही थी.

मार्च का महीना था. काम ज्यादा ही होता है, रात के 8 बजने को आए, वसु जल्दीजल्दी काम निबटाने में लगी हुई थी तभी फोन बज उठा, ‘‘क्या बात है अभी तक घर नहीं पहुंची?’’ विभोर कठोर स्वर में बोला.

‘‘बस निकल ही रही हूं विभोर.’’

‘‘क्या 8 बजे भी तुम औफिस में हो? खाने का समय हो रहा है, कब बनेगा? मैं कुछ करने वाला नहीं, जल्दी घर आओ.’’

‘‘मैं अभी बाहर से और्डर कर देती हूं.’’

‘‘नहीं बाहर का नहीं खाएंगे, तुम अभी चल दो, आ कर बनाओ,’’ कहते हुए विभोर फोन पर ही चिल्ला उठा,

वसु ने आसपास नजर घुमा कर देखा, साथ में काम कर रहे कुलीग ने विभोर की आवाज सुन ली थी. वसु की आंखों में अपमान के आंसू आ गए. वैसे विभोर जब चाहे बाहर से खाना मंगवा लेता लेकिन अगर वसु कहती तो कभी नहीं मंगवाता.

थकीहारी वसु घर में घुसी तो सब बैठे आराम से टीवी पर बाबाओं के प्रवचन सुन रहे थे. उस के घुसते ही सब ने ऐसी उदासीन सी नजर डाली जैसे वह घूम कर आ रही हो. फिर पुन: टीवी देखने लगे, जिस में अकसर चर्चा होती कि आजकल ये स्त्रियां जो घर से बाहर काम करने निकलती हैं वे सिर्फ एक बहाना है कि स्वतंत्रता से घूम सकें और काम से बच जाए, फैशन कर सकें. इसीलिए बाहर काम का बहाना ले कर जाती हैं. ये सब बातें सुन कर विभोर वसु के काम करने से चिढ़ा रहता था.

आज विभोर का पारा 7वें आसमान पर था क्योंकि उस की बहन आई हुई थी. वसु ने लैपटौप का बैग रख कर जल्दी से हाथमुंह धो कर चाय चढ़ा दी. थकान इतनी थी कि खाना बनाने की हिम्मत नहीं हो रही थी. लेकिन बनाना तो था ही. चाय पी कर वसु खुद को थोड़ा फ्रैश फील करती थी. फिर सोचा जा कर सब से पूछ ले कोई अगर चाय पीना चाहे तो.

‘‘मांजी, विभोर दीदी आप लोग चाय पीओगे क्या? मैं अपने लिए बना रही हूं,’’ उस ने पूछा.

‘‘अरे शाम के 7 बज रहे हैं यह कोई टाइम है चाय पीने का? जल्दी खाना बनाओ और हां मां ने अभी तक दवा नहीं ली है, वह भी ला कर दे दो,’’ विभोर बोला.

थकान और पति का आदेशात्मक स्वर वसु को तोड़ गया. जानती थी पति नहीं चाहता है वह औफिस में काम करे, उस के हिसाब से तो घर में ही स्त्री को कार्य करना चाहिए. बाहर निकल कर स्वच्छंद हो जाएगी. वसु चुप रही. उसे पता था नौकरी किसी भी कीमत पर नहीं छोड़नी है. उस ने ला कर मां को दवाई और पानी दे दिया. फिर चाय बनाने के साथ ही खाने की तैयारी शुरू कर दी. अभी बात को बढ़ाना ठीक नहीं समझ. शारीरिक थकान और विभोर की बातें मन को परेशान कर रही थीं.

समय अपनी रफ्तार से बढ़ने लगा. वसु शांत रहने की कोशिश करती, सब को मुसकरा कर ही जवाब देती. जब भी उस के चेहरे पर मुसकराहट होती जाने क्यों विभोर अजीब सी प्रतिक्रिया देता और अकसर ढीठ की संज्ञा से विभूषित करते, आज वसु खाना बनाते हुए गुनगुनाने लगी, गाना गाते हुए वसु की बोरियत दूर होती थी, मन भी हलका भी हो जाता था.

विभोर ने सुना तो बोला, ‘‘अम्मां, देखना कैसी ढीठ है, अभी डांट पड़ी है, अब गा रही है… जरा भी लिहाज नहीं.’’

असल में थोड़ी देर पहले विभोर उस को कपड़ों के लिए चिल्ला चुका था, उसे वही शर्ट पहननी थी जो गंदी थी, जबकि वसु इतवार को ही वाशिंगमशीन चलाती थी.

वसु ने सुन लिया. रसोई से आ कर बोली, ‘‘क्या मुंह बना कर घूमती रहूं, वह भी तो आप को अच्छा नहीं लगेगा.’’

वैसे भी 3 भाइयों में सब से छोटी वसु चंचल, खिलखिलाने वाली हंसमुख लड़की थी.

शादी के 4 साल बाद भी विभोर में कोई बदलाव नहीं था. अब वसु को लगने लगा था, उस से कहीं भूल तो नहीं हो गई. उस ने सोचा था पिता कि अनुपस्थिति ने विभोर को शालीन, जिम्मेदार बनाया होगा, पर वसु की सोच उसे झूठा साबित कर रही थी.

छुट्टी का दिन था, सास के पैर में दर्द था विभोर औफिस गया था, थोड़ी देर में विभोर आ गया और आते ही बोला, ‘‘अरे वसु, तुम ने अम्मां के सामने सिर पर पल्ला नहीं किया? सिर झुका सास के पैरों को तल्लीनता से दबाती वसु को ये भी पता नहीं चला विभोर औफिस से कब आ गया और जाने कब उस के सिर से पलला सरक गया.’’

अचानक विभोर ने एक तमाचा वसु के गाल पर मार दिया.

कराह उठी वसु, ‘‘तुम्हारी ढीठता को तो

2 मिनट में ठीक कर दूंगा, मां के सामने सिर पर पल्ला नहीं है, इतनी छोटी बात भी बतानी पड़ेगी.’’

वसु ने आंखों में आश्चर्यमिश्रित प्रश्न समेटते हुए पति की ओर देखा, शादी के इतने समय बाद सिर पर पल्ले की बात कही है पहले कभी कही ही नहीं थी. वह खुद ही सिर पर पल्ला रख रही थी और अगर सिर से हट भी गया तो उस के लिए तमाचा, उस का सारा अस्तित्व ही हिल गया.

वसु ने दर्द को पीते हुए सास की ओर  देखा, शायद सास ही बोल दे कि सेवा कर रही थी, पल्ला हट भी गया तो क्या हुआ? लेकिन वहां निस्तब्धता पसरी थी. ऐसा लग रहा था जैसे सास वहां हैं ही नहीं. वसु को इतने पराएपन की उम्मीद नहीं थी.

गालों पर छपी उंगलियां जैसे उस के दिल पर अंकित हो गई थीं. चुपचाप उठ कर अपने कमरे में आ गई. आज उसे अपनी हर कोशिश नाकामयाब लग रही थी.

वसु का मन विद्रोह कर उठा कि न जाने क्यों विभोर कुछ सम?ाना ही नहीं चाहता है. उस से भी ज्यादा बुरा लगा. सास का चुप रह जाना. अगर बड़े पहली ही बार में सम?ा दें तो शायद बच्चे आगे गलती न करें. वसु ने महसूस किया मां कभी किसी भी बात पर विभोर को कुछ नहीं कहती हैं. उस के लिए यह थोड़ा अजीब था.

मुझे एतराज नहीं: क्यों शांत थी वह महिला

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कंगना की प्रकाश राज और दीपा मेहता से सोशल मीडिया पर तूतूमैंमैं

2006 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘गैंगस्टर’ से अभिनय कैरियर की शुरूआत करने वाली कंगना रानौट ने अब तक लगभग चालिस फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा दिखाया है.2014 तक उन्होने ‘गैंगस्टर’,‘तनु वेड्स मनू’,‘क्वीन’ और ‘तनु वेड्स मनु रिर्टन’ सहित कुछ बेहतरीन फिल्मों में अभिनय कर अपने आपको  उत्कृष्ट अदाकारा के रूप में स्थापित किया.लेकिन उसके बाद वह धीरे धीरे वर्तमान सरकार की चापलूसी करने लगी.दक्षिणपंथी विचारधाराओं के साथ जुड़कर समय समय पर उन्होंने जो राय व्यक्त की है,उसके चलते उनके व्यक्तिगत और व्यावसायिक संबंधों में लगातार टकराव ने विवादों को जन्म दिया है.पर वह खुद को बिंदास व धाकड़ साबित करने के लिए हर किसी को जवाब देत रहती हैं.फिल्म ‘तेजस’ से उन्होने खुद को देशभक्त व आतंकवादी के सफाए के लिए मर मिटने वाली नारी के रूप में स्थापित करने का असफल प्रयास किया है.फिल्म ‘तेजस’ पूरी तरह से एक नकली फिल्म नजर आती है.

बहरहाल,कंगना रानौट ने  अपनी फिल्म ‘तेजस’ का प्रचार करते हुए मीडिया से दूरी रखकर इजराइल के राजदूत से मिली.रक्षामंत्री राजनाथ सिंह सहित कई भाजपा नेताओं का अपनी फिल्म दिखायी.दशहरे पर दिल्ली में ‘लव कुश रामायण’ पांडाल जाकर रावण दहन किया.उसके बाद अयोध्या जाकर श्रीराम लाल के दर्शन भी किए. लेकिन अति घटिया फिल्म ‘तेजस’ को दर्शक नही मिले.तब कंगना ने दर्शकों के नाम माफीनामानुमा एक वीडियो संदेष जारी किया. जिसमें कंगना ने कोविड के बाद सिनेमाघरों में कम दर्शकों की संख्या के बारे में बात करते हुए अपने दर्शकों से सिनेमाघर जाकर फिल्म ‘तेजस’ को देखने व आनंद लेने का आग्रह किया.मगर कंगना रानौट की घटिया फिल्म ‘‘तेजस’’ देखने के लिए दर्शक नही आए.साठ करोड़ की लागत वाली फिल्म ‘तेजस’ तीन दिन में महज साढ़े तीन करोड़ ही कमा सकी.इससे वह बौखला गयी हैं.

ऐसे वक्त में जब कंगना के वीडियो पर अभिनेता प्रकाश राज ने कंगना के वीडियो को रीट्वीट करते हुए व्यंग्यात्मक टिप्पणी में लिखा, ‘भारत को हाल ही में 2014 में आजादी मिली है…कृपया इंतजार करें.. इसमें तेजी आएगी…’तब कंगना ने विरोधी फिल्म समीक्षकों ,प्रकाश राज और खुद को ट्रोल करने वालों पर कंगना ने एक लंबे पोस्ट के जरिए पलटवार करते हुए लिखा है, ‘वे सभी जो मेरे लिए शुभकामनाएं दे रहे हैं, उनका जीवन हमेशा के लिए दुखी रहेगा क्योंकि उन्हें जीवन भर हर दिन मेरी महिमा देखनी होगी. 15 साल की उम्र में बिना कुछ लिए घर छोड़ने के बाद से मैं लगातार अपने भाग्य को संवार रही हूं और इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि महिला सशक्तीकरण और अपने देश भारत के लिए महत्वपूर्ण काम करना मेरी किस्मत में है….अपने स्वयं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए मैं उनसे मेरे फैन क्लबों में शामिल होने का अनुरोध करती हूं, इस तरह वे बड़ी सार्वभौमिक योजना के साथ जुड़ जाएंगे, मैं चाहती हूं कि मेरे शुभचिंतक उनके प्रति दयालु हों और उन्हें रास्ता दिखाएं.‘

दीपा मेहता पर प्रहार करते हुए कंगना ने सारी मर्यादाएं तोड़ बकी गाली

‘तेजस’ के प्रचार के क्रम में कंगना ने इजराइल के राजदूत नाओर गिलॉन से अपनी मुलाकात का कंगना ने वीडियो जारी किया है.जिसमे कंगना ने कहा है-‘‘“एक हिंदू राष्ट्र के रूप में, सदियों से जारी हिंदू नरसंहार, हम यहूदियों के साथ बहुत पहचान रखते हैं और हम दृढ़ता से मानते हैं कि हम हिंदुओं को समर्पित भारत के हकदार हैं, यहूदी भी एक राष्ट्र के हकदार हैं और वे हमें वह भूमि नहीं दे सकते बल्कि इस्लामी दुनिया बहुत ही अमानवीय और कंजूस है, जहां पूरी दुनिया में उनके पास दूसरे सबसे बड़े देश हैं, जिन पर मुख्य रूप से ईसाई देशों का वर्चस्व है.इसलिए मुझे लगता है कि आप लोग जिसके लिए लड़ रहे हैं, वह सही मायनों में आपका है और हम एक हिंदू राष्ट्र के रूप में इजराइल के समर्थन में खड़े हैं.‘‘

फिल्म सर्जक दीपा मेहता ने इजराइल-हमास युद्ध पर दिए गए कंगना के बयान से असहमत नजर आ रही हैं. उन्होंने इजराइल के राजदूत नाओर गिलॉन के साथ कंगना की मुलाकात का एक वीडियो फिर से साझा किया, साथ ही एक टिप्पणी भी की, ‘ओएमजी, किसने उन्हें खुला छोड़ दिया.‘’

इससे कंगना विफर गयी कंगना ने दीपा मेहता पर उनके निजी विचारों पर टिप्पणी करने के लिए पलटवार किया है. एक्स को संबोधित करते हुए, कंगना ने लिखाः “उसे खुला किसने छोड़ दिया? तुमको क्या औरंगजेब की आत्मा ने अपने हरम में जंजीरों में जकड़ा हुआ गुलाम बनाकर रखा है? मैडम लगता है आज कल रातों में कुछ ज्यादा बीडीएसएम हो रहा है..सुधर जाओ!!”

अब कंगना रानौट के इस कृत्य को ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ कहें या ‘सैंयां भए कोतवाल को डर काहे का…’’ कहा जाए.

नास्तिक बहू: भाग 1- नैंसी के प्रति क्या बदली लोगों की सोच

नलिनी शीशे के सामने खड़ी हो स्वयं को निहारने लगी. खुले गले का ब्लाउज, ढीला जुड़ा, खुला पल्लू, माथे पर अपनी साड़ी के रंग से मिलता हुआ बड़ी सा बिंदी, पिंक कलर की लिपिस्टिक और गले में लंबा सा मंगलसूत्र… इन सब में नलिनी बेहद ही आकर्षक लग रही थी. कल रात ही उस ने तय कर लिया था कि उसे क्या पहनना है और कीर्तन में जाने के लिए किस तरह से तैयार होना है.

सुबह होते ही उस ने अपनी बहू नैंसी से कहा, “नैंसी, जरा बेसन, हलदी और गुलाबजल मिला कर कर लेप तैयार कर लेना, बहुत दिनों से मैं ने लगाया नहीं है. पूजापाठ, भजनकीर्तन और प्रभु चरणों में मैं कुछ इस तरह से लीन हो जाती हूं कि मुझे अपनी ओर ध्यान देने का वक्त ही नहीं मिल पाता.”

नलिनी की बातें सुन नैंसी मंदमंद यह सोच कर मुसकराने लगी कि हर सोमवार मम्मीजी यही सारी बातें दोहराती हैं जबकि वह सप्ताह में 2-3 बार अपने चेहरे पर निखार के लिए लेप लगाती ही हैं और भजनकीर्तन से ज्यादा वह खुद के लुक पर ध्यान देती हैं.

नैंसी होंठों पर मुसकान लिए हुए बोली,”मम्मीजी, इस बार आप यह इंस्टैंट ग्लो वाला पील औफ ट्राई कर के देखिए.”

नैंसी के ऐसा कहते ही नलिनी आश्चर्य से बोली,”क्या सचमुच इंस्टैंट ग्लो आता है?”

“आप ट्राई कर के तो देखिए मम्मीजी…” नैंसी ने प्यार से कहा. वैसे दोनों सासबहू के बीच कोई तालमेल नहीं था. एक पूरब की ओर जाती, तो दूसरी पश्चिम की ओर. नलिनी को खाने में जहां चटपटा, मसालेदार पसंद था, वहीं नैंसी डाइट फूड पर जोर देती. नलिनी चाहती थी कि कालोनी की बाकी बहुओं की तरह नैंसी भी घर पर साड़ी ही पहने लेकिन वह ऐसा नहीं करती क्योंकि उसे काम करते वक्त साड़ी में असुविधा महसूस होती इसलिए वह घर पर सलवार सूट पहन लेती ताकि घर पर शांति बनी रहे और बात ज्यादा न बढ़े लेकिन यह भी नलिनी को नागवार ही गुजरता.

नैंसी की एक और बात नलिनी की आंखों में चुभती और वह थी नैंसी का भजनकीर्तन से दूर भागना. इस बात को ले कर कालोनी की सभी औरतें नलिनी को तानें भी दिया करती थीं कि कैसी बहू ब्याह कर लाई हो, जो पूजापाठ और भजनकीर्तन में भाग लेने के बजाय वहां से भाग लेती है. नलिनी की घनिष्ठ सहेली सुषमा तो उस से क‌ई बार यह कहने से भी नहीं चूकती कि तेरी बहू तो बिलकुल भी संस्कारी नहीं है. यह सुन कर नलिनी का पारा चढ़ जाता और वह नैंसी पर दबाव डालती कि वह भी बाकी बहुओं की तरह सजधज कर पूजाअर्चना में अपनी सक्रिय भूमिका निभाए लेकिन नैंसी साफ मना कर देती क्योंकि वह किसी के भी दबाव में आ कर ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती थी जिसे करने का उस का अपना मन न हो. इसी वजह से क‌ई बार दोनों के मध्य कहासुनी भी हो जाती.

नैंसी का मानना था कि कर्म ही पूजा है और हर इंसान को अपना काम पूरी ईमानदारी से करना चाहिए. नैंसी की इसी सोच की वजह से वह अपना समय औरों की तरह पूजापाठ में नहीं गंवाती, जो कालोनी की महिलाओं को बुरा लगने का एक बहुत ही बड़ा कारण था.

नलिनी और नैंसी के बीच लाख अनबन हो लेकिन जहां फैशन की बात आती दोनों एक हो जातीं और नलिनी, नैंसी के फैशन टिप्स जरूर फौलो करती क्योंकि नैंसी का फैशन सैंस कमाल का था. उस के ड्रैससैंस, मेकअप और हेयरस्टाइल के आगे सब फीका लगता.

नलिनी फेस पैक का डब्बा नैंसी से लेते हुई बोली,”आज कालोनी की सभी औरतें कीर्तन में आएंगी न, इसलिए मुझे भी थोड़ा ठीकठाक तैयार हो कर तो जाना ही पड़ेगा. वैसे तो मैं बाहरी सुंदरता पर विश्वास नहीं रखती, मन की सुंदरता ही मनुष्य की असली सुंदरता होती है लेकिन तुम तो जानती ही हो कि यहां की औरतों को खासकर वह शालिनी न जाने अपनेआप को क्या समझती है. उसे तो ऐसे लगता है जैसे उस से ज्यादा सुंदर इस कालोनी में कोई है ही नहीं और जब से दादी बनी है इतराती फिरती है. हर किसी से कहते नहीं थकती है कि मेरी त्वचा से किसी को मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता. जब तक मैं किसी को न बताऊं कि दादी बन गई हूं, कोई जान ही नहीं पाता. भला कोई जान भी कैसे पाएगा… चेहरे पर इतना मेकअप जो पोत कर आती है. भजन में आती है या फैशन शो में कौन जाने…

नैंसी बिना कुछ कहे नलिनी की बातें सुन कर केवल मुसकरा कर वहां से चली गई क्योंकि नैंसी भलीभांति जानती है कि स्वयं नलिनी भी कालोनी की उन्हीं औरतों में से एक है जो लोगों के सामने खुद को खूबसूरत दिखाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ती. भजनकीर्तन, पूजापाठ, व्रतअनुष्ठान यह सब इस सोसाइटी की ज्यादातर महिलाओं के लिए एक मनोरंजन और टाइमपास का साधन मात्र ही है जिस में दिखावा और ढोंग से ज्यादा कुछ नहीं है. असल में यहां की ज्यादातर महिलाएं केवल सजसंवर कर मंदिर प्रांगण में खुद को सुसंस्कृत साबित करने में लगी रहती हैं. अपनी भव्यता महंगी साड़ियों और गहनों का प्रर्दशन करना ही उन का मुख्य उद्देश्य होता है. आस्था, श्रद्धा जैसे बड़ेबड़े शब्द तो सिर्फ दिखावा व स्वांग मात्र ही है. इस बात से नैंसी पूर्ण रूप से अवगत थी.

हर सोमवार की तरह आज भी दुर्ग शहर के पौश कालोनी साईं परिसर में शाम को सोसाइटी कंपाउंड के मंदिर प्रांगण में भजनकीर्तन का आयोजन रखा गया था. इसलिए नलिनी सुबह होते ही अपने चेहरे पर निखार लाने में जुट गई थी और सारा दिन शाम की तैयारी में ही लगी रही. निर्धारित समय पर पूरी तरह से सजसंवर कर इतराती हुई बुदबुदाई,’आज कीर्तन में सब की नजरें सिर्फ मुझ पर और मुझ पर ही होंगी,’ तभी नलिनी का फोन बजा,”हैलो… नलिनी, भजन संध्या के लिए तैयार हुई या नहीं? मैं और मेरी बहू निकल रहे हैं,” नलिनी की खास सहेली सुषमा बोली जो उसी सोसाइटी की रहने वाली थी.

“हां, बस निकल ही रही हूं. तुम दोनों सासबहू निकलो मैं तुम्हें गेट पर ही मिलती हूं,” नलिनी अपने मेकअप का टच‌अप करती हुई बोली.

“अरे…क्या तुम अकेले ही कीर्तन में आ रही हो, नैंसी क्यों नहीं आ रही है?”

मां- भाग 3 : क्या बच्चों के लिए ममता का सुख जान पाई गुड्डी

‘‘हां, छोड़ रखा है क्योंकि आप का यह आश्रम है ही गरीब और निराश्रित बच्चों के लिए.’’

‘‘नहीं, यह तुम जैसों के बच्चों के लिए नहीं है, समझीं. अब या तो बच्चों को ले जाओ या वापस जाओ,’’ सुमनलता ने भन्ना कर कहा था.

‘‘अरे वाह, इतनी हेकड़ी, आप सीधे से मेरे बच्चों को दिखाइए, उन्हें देखे बिना मैं यहां से नहीं जाने वाली. चौकीदार, मेरे बच्चों को लाओ.’’

‘‘कहा न, बच्चे यहां नहीं आएंगे. चौकीदार, बाहर करो इसे,’’ सुमनलता का तेज स्वर सुन कर गुड्डी और भड़क गई.

‘‘अच्छा, तो आप मुझे धमकी दे रही हैं. देख लूंगी, अखबार में छपवा दूंगी कि आप ने मेरे बच्चे छीन लिए, क्या दादागीरी मचा रखी है, आश्रम बंद करा दूंगी.’’

चौकीदार ने गुड्डी को धमकाया और गेट के बाहर कर दिया.

सुमनलता का और खून खौल गया था. क्याक्या रूप बदल लेती हैं ये औरतें. उधर होहल्ला सुन कर जमुना भी आ गई थी.

‘‘मम्मीजी, आप को इस औरत को उसी दिन भगा देना था. आप ने इस के बच्चे रखे ही क्यों…अब कहीं अखबार में…’’

‘‘अरे, कुछ नहीं होगा, तुम लोग भी अपनाअपना काम करो.’’

सुमनलता ने जैसेतैसे बात खत्म की, पर उन का सिरदर्द शुरू हो गया था.

पिछली घटना को अभी महीना भर भी नहीं बीता होगा कि गुड्डी फिर आ गई. इस बार पहले की अपेक्षा कुछ शांत थी. चौकीदार से ही धीरे से पूछा था उस ने कि मम्मीजी के पास कौन है.

‘‘पापाजी आए हुए हैं,’’ चौकीदार ने दूर से ही सुबोध को देख कर कहा था.

गुड्डी कुछ देर तो चुप रही फिर कुछ अनुनय भरे स्वर में बोली, ‘‘चौकीदार, मुझे बच्चे देखने हैं.’’

‘‘कहा था कि तू मम्मीजी से बिना पूछे नहीं देख सकती बच्चे, फिर क्यों आ गई.’’

‘‘तुम मुझे मम्मीजी के पास ही ले चलो या जा कर उन से कह दो कि गुड्डी आई है…’’

कुछ सोच कर चौकीदार ने सुमनलता के पास जा कर धीरे से कहा, ‘‘मम्मीजी, गुड्डी फिर आ गई है. कह रही है कि बच्चे देखने हैं.’’

‘‘तुम ने उसे गेट के अंदर आने क्यों दिया…’’ सुमनलता ने तेज स्वर में कहा.

‘‘क्या हुआ? कौन है?’’ सुबोध भी चौंक  कर बोले.

‘‘अरे, एक पागल औरत है. पहले अपने बच्चे यहां छोड़ गई, अब कहती है कि बच्चों को दिखाओ मुझे.’’

‘‘तो दिखा दो, हर्ज क्या है…’’

‘‘नहीं…’’ सुमनलता ने दृढ़ स्वर में कहा फिर चौकीदार से बोलीं, ‘‘उसे बाहर कर दो.’’

सुबोध फिर चुप रह गए थे.

इधर, आश्रम में रहने वाली कुछ युवतियों के लिए एक सामाजिक संस्था कार्य कर रही थी, उसी के अधिकारी आए हुए थे. 3 युवतियों का विवाह संबंध तय हुआ और एक सादे समारोह में विवाह सम्पन्न भी हो गया.

सुमनलता को फिर किसी कार्य के सिलसिले में डेढ़ माह के लिए बाहर जाना पड़ गया था.

लौटीं तो उस दिन सुबोध ही उन्हें छोड़ने आश्रम तक आए हुए थे. अंदर आते ही चौकीदार ने खबर दी.

‘‘मम्मीजी, पिछले 3 दिनों से गुड्डी रोज यहां आ रही है कि बच्चे देखने हैं. आज तो अंदर घुस कर सुबह से ही धरना दिए बैठी है…कि बच्चे देख कर ही जाऊंगी.’’

‘‘अरे, तो तुम लोग हो किसलिए, आने क्यों दिया उसे अंदर,’’ सुमनलता की तेज आवाज सुन कर सुबोध भी पीछेपीछे आए.

बाहर बरामदे में गुड्डी बैठी थी. सुमनलता को देखते ही बोली, ‘‘मम्मीजी, मुझे अपने बच्चे देखने हैं.’’

उस की आवाज को अनसुना करते हुए सुमन तेजी से शिशुगृह में चली गई थीं.

रघु खिलौने से खेल रहा था, राधा एक किताब देख रही थी. सुमनलता ने दोनों बच्चों को दुलराया.

‘‘मम्मीजी, आज तो आप बच्चों को उसे दिखा ही दो,’’ कहते हुए जमुना और चौकीदार भी अंदर आ गए थे, ‘‘ताकि उस का भी मन शांत हो. हम ने उस से कह दिया था कि जब मम्मीजी आएं तब उन से प्रार्थना करना…’’

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं, बाहर करो उसे,’’ सुमनलता बोलीं.

सहम कर चौकीदार बाहर चला गया और पीछेपीछे जमुना भी. बाहर से गुड्डी के रोने और चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं. चौकीदार उसे डपट कर फाटक बंद करने में लगा था.

‘‘सुम्मी, बच्चों को दिखा दो न, दिखाने भर को ही तो कह रही है, फिर वह भी एक मां है और एक मां की ममता को तुम से अधिक कौन समझ सकता है…’’

सुबोध कुछ और कहते कि सुमनलता ने ही बात काट दी थी.

‘‘नहीं, उस औरत को बच्चे बिलकुल नहीं दिखाने हैं.’’

आज पहली बार सुबोध ने सुमनलता का इतना कड़ा रुख देखा था. फिर जब सुमनलता की भरी आंखें और उन्हें धीरे से रूमाल निकालते देखा तो सुबोध को और भी विस्मय हुआ.

‘‘अच्छा चलूं, मैं तो बस, तुम्हें छोड़ने ही आया था,’’ कहते हुए सुबोध चले गए.

सुमनलता उसी तरह कुछ देर सोच में डूबी रहीं फिर मुड़ीं और दूसरे कमरों का मुआयना करने चल दीं.

2 दिन बाद एक दंपती किसी बच्चे को गोद लेने आए थे. उन्हें शिशुगृह में घुमाया जा रहा था. सुमन दूसरे कमरे में एक बीमार महिला का हाल पूछ रही थीं.

तभी गुड्डी एकदम बदहवास सी बरामदे में आई. आज बाहर चौकीदार नहीं था और फाटक खुला था तो सीधी अंदर ही आ गई. जमुना को वहां खड़ा देख कर गिड़गिड़ाते स्वर में बोली थी, ‘‘बाई, मुझे बच्चे देखने हैं…’’

उस की हालत देख कर जमुना को भी कुछ दया आ गई. वह धीरे से बोली, ‘‘देख, अभी मम्मीजी अंदर हैं, तू उस खिड़की के पास खड़ी हो कर बाहर से ही अपने बच्चों को देख ले. बिटिया तो स्लेट पर कुछ लिख रही है और बेटा पालने में सो रहा है.’’

‘‘पर, वहां ये लोग कौन हैं जो मेरे बच्चे के पालने के पास आ कर खडे़ हो गए हैं और कुछ कह रहे हैं?’’

जमुना ने अंदर झांक कर कहा, ‘‘ये बच्चे को गोद लेने आए हैं. शायद तेरा बेटा पसंद आ गया है इन्हें तभी तो उसे उठा रही है वह महिला.’’

‘‘क्या?’’ गुड्डी तो जैसे चीख पड़ी थी, ‘‘मेरा बच्चा…नहीं मैं अपना बेटा किसी को नहीं दूंगी,’’ रोती हुई पागल सी वह जमुना को पीछे धकेलती सीधे अंदर कमरे में घुस गई थी.

सभी अवाक् थे. होहल्ला सुन कर सुमनलता भी उधर आ गईं कि हुआ क्या है.

उधर गुड्डी जोरजोर से चिल्ला रही थी कि यह मेरा बेटा है…मैं इसे किसी को नहीं दूंगी.

झपट कर गुड्डी ने बच्चे को पालने से उठा लिया था. बच्चा रो रहा था. बच्ची भी पास सहमी सी खड़ी थी. गुड्डी ने उसे भी और पास खींच लिया.

‘‘मेरे बच्चे कहीं नहीं जाएंगे. मैं पालूंगी इन्हें…मैं…मैं मां हूं इन की.’’

‘‘मम्मीजी…’’ सुमनलता को देख कर जमुना डर गई.

‘‘कोई बात नहीं, बच्चे दे दो इसे,’’ सुमनलता ने धीरे से कहा था और उन की आंखें नम हो आई थीं, गला भी कुछ भर्रा गया था.

जमुना चकित थी, एक मां ने शायद आज एक दूसरी मां की सोई हुई ममता को जगा दिया था.

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