Diwali Special: मेहमानों को परोसें कश्मीरी पनीर टिक्का

फैस्टिव सीजन के मौके पर अगर आप मेहमानों और अपनी फैमिली के लिए स्टार्टर में पनीर की डिश परोसना चाहते हैं तो कश्मीरी पनीर टिक्का की आसाना रेसिपी ट्राय करना ना भूलें.

सामग्री

800 ग्राम पनीर

10 हरीमिर्चें

1/2 छोटा चम्मच कालानमक

1 बड़ा चम्मच अदरकलहसुन का पेस्ट

100 ग्राम प्रौसैस्ड चीज

1 कप क्रीम

100 ग्राम काजू

2 छोटे चम्मच केसर का पानी

1 बड़ा चम्मच तेल

कालीमिर्च स्वादानुसार

नमक स्वादानुसार.

विधि

पनीर को 2 इंच के क्यूब्स में काट लें और अदरकलहसुन के पेस्ट, कालीमिर्च और नमक के मिश्रण से मैरिनेट करें. फिर चीज, काजू, क्रीम को ग्राइंड कर मिश्रण तैयार कर लें. इस मिश्रण में स्वादानुसार कालीमिर्च और नमक भी डालें. फिर इस मिश्रण में पनीर के टुकड़ों को मैरिनेट करें और ऊपर से केसर का पानी भी डालें. इस के बाद पनीर के टुकड़ों को स्कीवर्स में लगा कर तंदूर में रोस्ट कर सर्व करें.

मां- भाग 1 : क्या बच्चों के लिए ममता का सुख जान पाई गुड्डी

‘‘मम्मीजी, पिंकू केक काटने के लिए कब से आप का इंतजार कर रहा है.’’

बहू दीप्ति का फोन था.

‘‘दीप्ति, ऐसा करो…तुम पिंकू से मेरी बात करा दो.’’

‘‘जी अच्छा,’’ उधर से आवाज सुनाई दी.

‘‘हैलो,’’ स्वर को थोड़ा धीमा रखते हुए सुमनलता बोलीं, ‘‘पिंकू बेटे, मैं अभी यहां व्यस्त हूं. तुम्हारे सारे दोस्त तो आ गए होंगे. तुम केक काट लो. कल का पूरा दिन तुम्हारे नाम है…अच्छे बच्चे जिद नहीं करते. अच्छा, हैप्पी बर्थ डे, खूब खुश रहो,’’ अपने पोते को बहलाते हुए सुमनलता ने फोन रख दिया.

दोनों पत्रकार ध्यान से उन की बातें सुन रहे थे.

‘‘बड़ा कठिन दायित्व है आप का. यहां ‘मानसायन’ की सारी जिम्मेदारी संभालें तो घर छूटता है…’’

‘‘और घर संभालें तो आफिस,’’ अखिलेश की बात दूसरे पत्रकार रमेश ने पूरी की.

‘‘हां, पर आप लोग कहां मेरी परेशानियां समझ पा रहे हैं. चलिए, पहले चाय पीजिए…’’ सुमनलता ने हंस कर कहा था.

नौकरानी जमुना तब तक चाय की ट्रे रख गई थी.

‘‘अब तो आप लोग समझ गए होंगे कि कल रात को उन दोनों बुजुर्गों को क्यों मैं ने यहां वृद्धाश्रम में रहने से मना किया था. मैं ने उन से सिर्फ यही कहा था कि बाबा, यहां हौल में बीड़ी पीने की मनाही है, क्योंकि दूसरे कई वृद्ध अस्थमा के रोगी हैं, उन्हें परेशानी होती है. अगर आप को  इतनी ही तलब है तो बाहर जा कर पिएं. बस, इसी बात पर वे दोनों यहां से चल दिए और आप लोगों से पता नहीं क्या कहा कि आप के अखबार ने छाप दिया कि आधी रात को कड़कती सर्दी में 2 वृद्धों को ‘मानसायन’ से बाहर निकाल दिया गया.’’

‘‘नहीं, नहीं…अब हम आप की परेशानी समझ गए हैं,’’ अखिलेशजी यह कहते हुए उठ खडे़ हुए.

‘‘मैडम, अब आप भी घर जाइए, घर पर आप का इंतजार हो रहा है,’’ राकेश ने कहा.

सुमनलता उठ खड़ी हुईं और जमुना से बोलीं, ‘‘ये फाइलें अब मैं कल देखूंगी, इन्हें अलमारी में रखवा देना और हां, ड्राइवर से गाड़ी निकालने को कहना…’’

तभी चौकीदार ने दरवाजा खटखटाया था.

‘‘मम्मीजी, बाहर गेट पर कोई औरत आप से मिलने को खड़ी है…’’

‘‘जमुना, देख तो कौन है,’’ यह कहते हुए सुमनलता बाहर जाने को निकलीं.

गेट पर कोई 24-25 साल की युवती खड़ी थी. मलिन कपडे़ और बिखरे बालों से उस की गरीबी झांक रही थी. उस के साथ एक ढाई साल की बच्ची थी, जिस का हाथ उस ने थाम रखा था और दूसरा छोटा बच्चा गोदी में था.

सुमनलता को देखते ही वह औरत रोती हुई बोली, ‘‘मम्मीजी, मैं गुड्डी हूं, गरीब और बेसहारा, मेरी खुद की रोटी का जुगाड़ नहीं तो बच्चों को क्या खिलाऊं. दया कर के आप इन दोनों बच्चों को अपने आश्रम में रख लो मम्मीजी, इतना रहम कर दो मुझ पर.’’

बच्चों को थामे ही गुड्डी, सुमनलता के पैर पकड़ने के लिए आगे बढ़ी थी तो यह कहते हुए सुमनलता ने उसे रोका, ‘‘अरे, क्या कर रही है, बच्चों को संभाल, गिर जाएंगे…’’

‘‘मम्मीजी, इन बच्चों का बाप तो चोरी के आरोप में जेल में है, घर में अब दानापानी का जुगाड़ नहीं, मैं अबला औरत…’’

उस की बात बीच में काटते हुए सुमनलता बोलीं, ‘‘कोई अबला नहीं हो तुम, काम कर सकती हो, मेहनत करो, बच्चोें को पालो…समझीं…’’ और सुमनलता बाहर जाने के लिए आगे बढ़ी थीं.

‘‘नहीं…नहीं, मम्मीजी, आप रहम कर देंगी तो कई जिंदगियां संवर जाएंगी, आप इन बच्चों को रख लो, एक ट्रक ड्राइवर मुझ से शादी करने को तैयार है, पर बच्चों को नहीं रखना चाहता.’’

‘‘कैसी मां है तू…अपने सुख की खातिर बच्चों को छोड़ रही है,’’ सुमनलता हैरान हो कर बोलीं.

‘‘नहीं, मम्मीजी, अपने सुख की खातिर नहीं, इन बच्चों के भविष्य की खातिर मैं इन्हें यहां छोड़ रही हूं. आप के पास पढ़लिख जाएंगे, नहीं तो अपने बाप की तरह चोरीचकारी करेंगे. मुझ अबला की अगर उस ड्राइवर से शादी हो गई तो मैं इज्जत के साथ किसी के घर में महफूज रहूंगी…मम्मीजी, आप तो खुद औरत हैं, औरत का दर्द जानती हैं…’’ इतना कह गुड्डी जोरजोर से रोने लगी थी.

‘‘क्यों नाटक किए जा रही है, जाने दे मम्मीजी को, देर हो रही है…’’ जमुना ने आगे बढ़ कर उसे फटकार लगाई.

नशा: भाग 2- क्या रेखा अपना जीवन संवार पाई

क्लब का अंदर का दृश्य देख कर वह दंग रह गई थी. रंगीन जोड़े फर्श पर थिरक रहे थे. लोग जाम पर जाम लगा रहे थे यानी शराब पी रहे थे. सब नशे में चूर थे. ऐसा तो उस ने फिल्मों में ही देखा था. वह एकटक सब देख रही थी. दीपा के कहने पर उस ने शराब पी थी और वह भी पहली दफा. फिर तो हर दिन उस का औफिस में बीतता, तो शाम क्लब में बीतती.

दीपा शुरू में तो उस को अपने पैसे से पिलाती थी, बाद में उसी के पैसे से पीती थी. शनिवार और इतवार को वे दोनों रेखा के घर में ही पीतीं. रेखा जानती है कि वह गलत कर रही है, वहीं वह यह भी जानती है कि उस को अपने को रोक पाना अब उस के वश में नहीं है. शाम होते ही हलक सूखने लगता है उस का.

कई बार फूफी कह चुकी है- ‘इस दीपा का अपना घरबार नहीं है, यह दूसरों का घर बरबाद कर के ही दम लेगी. अरे, रेखा बीबी, इस औरत का साथ छोड़ो. बड़ी बुरी लत है शराब की. मेरा पति तो शराब पीपी के दूसरी दुनिया में चला गया. तभी तो मुझ फूफी ने इस घर में उम्र गुजार दी. बड़ी बुरी चीज है शराब और शराबी से दोस्ती.’

फूफी के ताने रेखा को न भाते. जी करता धक्के मार कर घर से बाहर निकाल दे. लेकिन नहीं कर सकती ऐसा. यह चली गई तो घर कौन संभालेगा.

आज उसे घबराहट हो रही है, जब से अम्माजी ने सब बताया कि वे रिटायर होने वाली हैं. व्याकुल मन के साथ बड़ी देर तक बिस्तर पर करवटें बदलती रही. न जाने कब सोई, पता ही नहीं लगा. उधर, देवेश को जब से रेखा के बारे में पता लगा है, उस की व्याकुलता का अंत नहीं है. वहां जरमनी में स्त्रीपुरुष सब शराब पीते हैं, ठंडा मुल्क है. पर हिंदुस्तान में लोग इसे शौकिया पीते हैं. स्त्रियों का यों क्लबरैस्त्रां में पीना दुश्चरित्र माना जाता है.

देवेश को अम्मा ने जब से रेखा के बारे में बताया है, जरमनी में हर स्त्री उसे रेखा सी दिखती है. वह रैस्त्रां के आगे से गुजरता है तो लगता है, रेखा इस रैस्त्रां में शराब पी रही होगी. दूसरे ही क्षण सोचता- यहां रेखा कैसे आ सकती है?

औफिस में भी देवेश बेचैन रहता है. दिनरात सोतेजागते ‘रेखा शराबी’ का खयाल उस से जुड़ा रहता है. देवेश का जी करता है, अभी इंडिया के लिए फ्लाइट पकड़े और पत्नी के पास पहुंच जाए, बांहों में भर कर पूछे, ‘रेखा, तुम्हें जीवन में कौन सा दुख है जो शराब का सहारा ले लिया.’ देवेश कितनी खुशियां ले कर आया था जरमनी में. इंडिया में घर खरीदेंगे, मियांबीवी ठाट से रहेंगे. फिर बच्चे के बारे में सोचेंगे. मां भी साथ रहेंगी. किंतु क्यों? ये सब क्या हुआ, कैसे हुआ? किस से पूछे वह? जरमनी में तो उस का अपना कोई सगा नहीं है जिस से मन की बात कह भी सके.

वह इतना मजबूर है कि न तो रेखा से कुछ पूछ सकता है और न ही अम्मा से. बस, मन की घायल दशा से फड़फड़ा कर रह जाता है. उसे लग रहा है कि वह डिप्रैशन में जा रहा है. दोस्तों ने उस की शारीरिक अस्वस्थता देख उसे अस्पताल में भरती करा दिया था.

कुछ स्वस्थ हुआ तो हर समय उसे पत्नी का लड़खड़ाता अक्स ही दिखाई देता. घबरा कर आंखें बंद कर लेता. और, अम्माजी, उस दिन बेटे से बात करने के बाद ऊपर से तो सामान्य सी दिख रही थीं किंतु अंदर से उन को पता था वे कितनी दुखी हैं. पूरी रात सो न सकी थीं. बेचारी क्या करतीं. आज सुबह वे हमेशा की तरह जल्दी न उठीं.

रेखा जब औफिस चली गई तो बेमन से उठीं और स्टोर में घुस गईं. स्टोर कबाड़ से अटा पड़ा था. किताबें, कौपियां, न्यूजपेपर्स और न जाने क्याक्या पुराना सामान था. कबाड़ी को बुला कर सारा सामान बेच दिया सिर्फ एक बंडल को छोड़ कर. इसे फुरसत में देखूंगी क्या है.

सब काम खत्म कर के बंडल को झाड़झूड़ कर खोला. उन्हें लगता था किसी ने हाथ से कविताएं लिखी हैं. शायद यह रेखा की राइटिंग है. कविताएं ही थीं. देखा एक नहीं, 30-35 कविताएं थीं. उन्हें पढ़ कर वे स्तब्ध थीं.

सुंदर शब्दों के साथ ज्वलंत विषयों पर लिखी कविताएं अद्वितीय थीं. यानी, बहू कविताएं भी लिखती है. इस बंडल मे 2-3 पुस्तकें भी थीं. सभी रेखा की कृतियों का संग्रह थीं. अम्माजी कभी कविता संग्रह पढ़तीं, तो कभी हस्तलिखित रचनाओं को. इतनी गुणी है उन की बहू और वे इस से अब तक अनजान रहीं.

झाड़पोंछ कर उन्हें कोने में टेबल पर रख दिया. सोचा, शाम को बात करूंगी. क्यों बहू ने इस गुण की बात हम से छिपाई? कभीकभी हम अपने टेलैंट को छोड़ कर इधरउधर भटकते हैं. दुर्गुणों में फंस कर जीवन को दुश्वार बना लेते हैं.

रेखा के घर आने से पहले उन्होंने कई जगह फोन किए. दोपहर को बेटे देवेश का फोन आ गया, ‘‘कैसी हो अम्मा?’’

‘‘ठीक हूं.’’

‘‘और रेखा?’’

‘‘वह अभी औफिस से लौटने वाली है. आएगी तो बता दूंगी. तू परेशान है उस को ले कर, यह मैं जानती हूं.’’

‘‘नहीं अम्मा, मैं ठीक हूं. बस, आने के दिन गिन रहा हूं.’’

‘‘नहीं, मैं जानती हूं, तू झूठ बोल रहा है. पर वादा करती हूं तेरे आने तक घर को संभालने की पूरी कोशिश करूंगी.’’ अम्मा की आंखों में आंसू आ गए थे.

‘‘अम्मा, ऐसा तो मैं ने कभी नहीं सोचा था कि धन कमाने की होड़ में परिवार को ही खो बैठूंगा.’’

‘‘नहीं बेटा, ऐसा मत सोचो, सब ठीक हो जाएगा, धीरज रखो.’’ इस से आगे बात करना संभव न था. अम्माजी का गला आवेग से भर्रा गया था.

काम से रेखा लौट आई थी. चेहरे पर चिंता व परेशानी झलक रही थी. अम्माजी को रेखा की चिंता का विषयकारण पता था. अम्माजी ने बड़ी हिम्मत कर के कहा, ‘‘आज बहुत थक गई हो, काम ज्यादा था क्या?’’

‘‘नहीं अम्माजी, बस, वैसे ही थोड़ा सिरदर्द था. आराम करूंगी, ठीक हो जाएगा.’’

ऐसे में वे भला कैसे कहतीं कि आज इरा खन्ना से उन्होंने समय लिया है. वे हमारी राह देख रही होंगी.

‘‘अम्माजी, आप कहीं जाने के लिए तैयार हो रही हैं?’’

‘‘रेखा, आज मैं एक सहेली के पास जा रही थी, चाहती थी कि तुम भी साथ चलो.’’

‘‘नहीं, फिर कभी.’’

‘‘ठीक है जब तुम्हारा मन करे. पर वे तुम से ही मिलना चाहती थीं.’’

‘‘अच्छा? आप ने बताया होगा मेरे बारे में, तभी?’’

‘‘हां, मैं ने यही कहा था कि मेरी बहू लाखों में एक है. नेक, समझदार व दूसरों को सम्मान देने वाली स्त्री है. मेरी बहू से मिलोगी तो सब भूल जाओगी. है न बहू?’’ वह सास की बात पर मुसकरा रही थी, मन ही मन कहने लगी, यानी, अम्माजी को पता नहीं कि मैं दुश्चरित्रा हूं, मैं शराब पीती हूं, बुरी स्त्री हूं. यदि वे जान गईं तो घर से निकाल सकती हैं.

वैसे जो बात अभी अम्माजी ने अपनी सहेली से की थी, सुन कर उसे बहुत अच्छा लगा. मैं जरूर उन से मिलूंगी. पता नहीं, कब वह सो गई और अम्माजी, सोफे पर उसे सोया देख सोच रही थीं कि ये उठे तो मैं इस को साथ ले चलूं. फिर वे भी अंदर जा कर लेट गईं.

‘‘एक कप चाय बना दो, फूफी. सिरदर्द से फटा जा रहा है,’’ रेखा सोफे पर बैठी सोच रह थी कि उस की नजर कोने की मेज पर रखे एक बंडल पर पड़ी. बिजली सी चमक की तरह वह उछली, ‘‘फूफी, यह बंडल यहां क्यों रखा है? इसे मैं ने स्टोर में डाला था, क्यों निकाला?’’ वह लगभग चीख पड़ी.

‘‘क्या हुआ, बेटा? यह बंडल स्टोर में था. मैं ने आज स्टोर की सफाई की तो निकाल कर देखा, इस में कविताएं व कुछ और भी था…सारा झाड़कबाड़ बेच दिया, इस को फेंकने का मन न किया. सोचा, तुम आओगी तो तुम से पूछ कर ही कुछ सोचूंगी.’’

‘‘पूछना क्या है, इसे भी कबाड़ में फेंक देतीं. क्या करूंगी इन सब का? अब सब खत्म हो गया.’’

उस के स्वर में वितृष्ण से अम्माजी को समझते देर न लगी कि इस बंडल से जुड़ा कोई हादसा अवश्य है जिसे मैं नहीं जानती, पर जानना जरूरी है.

‘‘बेटा, बोलो, क्या बात है जो इतनी सुंदर रचनाओं को तुम ने रद्दी में फेंक दिया?’’ अम्मा ने फिर पुलिंदा मेज पर ला रखा.

‘‘छोड़ो अम्माजी, इस पुलिंदे को ले कर आप क्यों परेशान हैं? छोड़ो ये सब रचनावचना,’’ कहतेकहते उस की आंखें भर आई थीं.

‘‘बेटा, मैं तेरी सासूमां हूं. क्या बात है जो तू इतनी दुखी है और मुझे कुछ भी नहीं पता? क्या सबकुछ खुल कर नहीं बताओगी?’’

‘‘क्या कहूं अम्माजी. आप को यह तो पता ही है कि मेरे पापा बहुत बड़े साहित्यकार थे. परिवार में साहित्यिक माहौल था. मुझे पढ़ने व लिखने का जनून था. कितने ही साहित्यकारों से मेरे पिता व रचनाओं के जरिए परिचय था. मेरी शादी से पहले मेरे 3 कविता संग्रह व एक कहानी संग्रह छप चुके थे. मेरे काम को काफी सराहा गया था. एक पुस्तक पर मुझे अकादमी पुरस्कार भी मिला था. बहुत खुश थी मैं.’’

नशा: भाग 3- क्या रेखा अपना जीवन संवार पाई

रेखा ने बात जारी रखी, ‘‘सोचती थी देवेश को दिखाऊंगी तो गर्व करेंगे पत्नी पर. शादी के बाद जब मैं ने अपनी रचनाओं तथा पुस्तकों का उन से जिक्र किया तो वे बोले, ‘छोड़ो ये सब, मुझे तो तुम में रुचि है. ये आंखें, ये गुलाबी कपोल, खूबसूरत देह मेरे लिए यही कुदरत की रचना है.’

‘‘‘छोड़ो सब बेकार के काम, तुम्हारे लिए एक अच्छी सी नौकरी ढूंढ़ता हूं. समय भी कट जाएगा और बैंक बैलेंस भी बढ़ेगा.’

‘‘मैं समझ गई कि देवेश की सोच का दायरा बहुत सीमित है. उस वक्त मैं चुप रह गई. हालांकि उन की बात मेरे लिए बहुत बड़ा आघात थी. लेकिन अपने को रोक पाना मेरे लिए मुश्किल था. मेरा अंदर का लेखक तड़पता था.

‘‘छिपछिप कर कुछ रचनाएं लिखीं, भेजीं और छपी भी थीं. छपी हुई रचनाएं जब देवेश को दिखाईं तो वे मुझी पर बरस पड़े, ‘यह क्या पूरी लाइब्रेरी बनाई हुई है. लो, अब पढ़ोलिखो…’ इन्होंने मेरी किताबों को आग के हवाले कर दिया.

‘‘मेरी आंखों में खून उतर आया लेकिन चुप रही. आप बताइए जो व्यक्ति जनून की हद तक किसी टेलैंट को प्यार करता हो, उस का जीवनसाथी ऐसा व्यवहार करे तो परिणाम क्या होगा?

‘‘सपना था मेरा प्रथम श्रेणी की लेखिका बनने का, पर वह बिखर गया. हताश हो मैं ने इस बंडल को इस स्टोर में डाल फेंका.

‘‘पति के जरमनी जाने के बाद कई बार सोचा कि फिर से शुरू करूं, अकेलापन दूर करने का यही एक साधन था मेरे पास. लेकिन इसी बीच दीपा से मेरा संपर्क हुआ. और मैं नशे में डूबती चली गई. अब तो पढ़नेलिखने का जी ही नहीं करता. अम्माजी, यह है इस बंडल की कहानी.’’ रेखा की आंखें डबडबा गई थीं.

अम्माजी को लगा कि आज पहली बार उस ने नशे की बात को स्वीकारा है. निश्चय ही जो यह कह रही है, वह सच है. जरा भी मिलावट नहीं है. और बेटे देवेश के लिए जो इस ने कहा, वह भी सच ही होगा. सुन कर उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि शुरू से देवेश को सिर्फ पैसे से प्यार है. पैसे के अभाव में उस ने मुश्किल के दिन देखे हैं, सो, उस के जीवन का मकसद सिर्फ पैसा कमाना है.

इस के अलावा यह हो सकता है कि आघात पाने के बाद, रेखा ने सोचा हो, शराब में अपने को डुबो कर वह पति से बदला लेगी. या शायद अकेलेपन से घबरा कर उस ने यह रास्ता अपनाया हो.

यह तो अम्माजी को पता था कि एक बार बच्चे को ले कर दोनों में काफी खींचातानी हुई थी. देवेश बच्चा नहीं चाहता था, ‘जब तक घर अपना नहीं होगा मैं बच्चा नहीं चाहता.’ जबकि रेखा का कहना था, ‘बच्चा घर में होगा तो मैं व्यस्त रहूंगी, खालीपन मुझे काटने को दौड़ता है.’ जो भी हो, इस वक्त तो कोई रास्ता निकालना ही पड़ेगा कि जिस से रेखा के पीने की आदत पर रोक लग सके.

यहां मैं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि पति की उस के टेलैंट के प्रति उपेक्षा सब से बड़ा कारण है. उत्साह व बढ़ावा देने की जगह देवेश ने उस की मानसिक जरूरत पर ध्यान नहीं दिया है, बस उसी का परिणाम ‘पीना’ लगता है. यह सोचतेसोचते अम्माजी ने एक बार फिर बड़े प्यार से उस से कहा, ‘‘बेटा, तुम मेरे साथ इरा के घर चलोगी? बड़ी समझदार महिला हैं, साथ ही मेरी बचपन की सहेली भी. वे तुम से मिलने को उत्सुक हैं.’’

‘‘ठीक है, चलती हूं.’’

कुछ देर बाद दोनों इरा के सामने थीं. वह इरा को देख कर अवाक थी. ये तो इतनी जबरदस्त लेखिका हैं, इन से तो लोग मिलने के लिए लाइन लगा कर खड़े होते हैं. ये मुझ से मिलना चाहती थीं. लोग अपनी पुस्तक के लिए इन से दो लाइनें लिखाने को घंटों इंतजार करते हैं. अम्माजी ने रेखा का परिचय कराया तो रेखा कहे बिना न रह सकी, ‘‘इराजी को कौन नहीं जानता, सारे साहित्य जगत में इन के लेखन की धूम है.’’ तभी अम्माजी ने वह बंडल इरा की मेज पर रखा, ‘‘इरा, मैं ने तुझे बताया था कि मेरी बहू भी लिखती है.’’

‘‘हां, बताया था.’’

‘‘ये हैं इस की कुछ रचनाएं और कुछ पुस्तकें.’’

रेखा लगातार इरा को देख रही थी. इरा रेखा की रचनाओं को पढ़ रही थीं. पढ़ने के बाद मुसकरा कर बोलीं, ‘‘अद्भुत. मैं हैरान हूं इतनी सी उम्र में, इतना सुंदर शब्द चयन, विषय चयन, और प्रस्तुति. मैं ने तो कितनी ही किताबें छपवाई हैं पर ऐसी रचनाएं… वाह.

‘‘बेटा, इस को आप मेरे पास छोड़ जाओ. कल तुम्हें फोन पर डिटेल बताऊंगी. फिर भी अल्पना, मैं यह भविष्यवाणी करती हूं कि ऐसे ही ये लिखती रही तो एक दिन ये उभरती हुई रचनाकारों की श्रेणी में उच्चतम स्तर पर होगी.’’

इरा से मुलाकात के बाद सासूमां के साथ रेखा लौट आई. रेखा को रास्ते भर यही लगा कि इराजी अभी भी वही वाक्य दोहरा रही हैं, ‘ऐसे ही ये लिखती रही…’

घर पहुंच कर वह अपने मन को टटोलती रही थी. यह कैसी भविष्यवाणी थी जिस ने उस के मन में खुशियां और उत्साह के फूल बरसाए थे. इतनी बड़ी लेखिका के मुंह से ऐसी तारीफ. सपने में भी वह आज की मुलाकात के मीठे सपने देखती रही थी.

सुबहसवेरे, आज उस ने अटैची में रखी कुछ और रचनाओं को निकाला था. उन्हें भी ठीकठाक कर के मेज पर छोड़ा था. तभी फोन की घंटी बज उठी-

‘‘मैं इरा बोल रही हूं. कल आप जिन रचनाओं को छोड़ गई थीं उन्हें मैं ने एक पुस्तक के रूप में सुनियोजित करने को दे दी हैं. पुस्तक का नाम मैं अपने अनुसार रखूं तो आप को आपत्ति तो नहीं होगी?’’

‘‘नहीं मैम, नहीं, कभी नहीं.’’

‘‘हां, एक बात और, साहित्यकार मीनल राज और प्रिया से इन कविताओं के लिए दो शब्द लिखवाने का निश्चय हम ने किया है. बाकी मिलोगी, तो बताऊंगी.’’

उसे लगा वह सपना देख रही है- मीनल राज और प्रिया, इतने दिग्गज लेखक हैं दोनों. खुशी उस के अंगअंग से फूट रही थी. वह बैठेबैठे मुसकरा रही थी.

‘‘अरे, क्या हुआ? किस का फोन था?’’ अम्माजी ने पूछ ही लिया, ‘‘इतनी क्यों खुश है?’’

‘‘वो, इरा मैम का फोन था. वे कह रही थीं…’’ उस ने सारी बात सासूमां को बताई.

उस के चेहरे पर थिरकती प्रसन्नता इस बात का सुबूत थी कि वह इसी की तलाश में थी. और उस ने रास्ता पा लिया है अपने खोए जनून और टेलैंट के लिए.

इस के बाद वह कई बार इरा मैम के पास गई. कभीकभी सारा दिन उन की लाइब्रेरी में पढ़ती रहती. पुस्तकों व रचनाओं को ले कर इरा मैम से विचारविमर्श करती.

इस बीच, दीपा कई बार उस के घर आई पर रेखा की सासू मां ने कहा, ‘‘बेटा, वह अब तुम्हारे चंगुल में कभी नहीं फंसेगी, जाओ…’’

2 महीने बाद, रेखा को एक लिफाफा मिला. उस में 20 हजार रुपए का एक ड्राफ्ट था और एक पत्र भी. पत्र में लिखा था-

‘‘प्रिय रेखा,

‘‘तुम्हारी 2 पुस्तकों के प्रकाशन कौपीराइट की कीमत है, स्वीकार लो. अगले महीने हम और तुम जयपुर पुस्तक मेले में जा रहे हैं.

‘‘एक और खुशखबरी है, समीक्षा हेतु तुम्हारी दोनों

पुस्तकों को कुछ पत्रपत्रिकाओं में भेजी है. ये पत्रिकाएं भी तुम्हारे पास जल्द ही पहुंचेंगी.

‘‘शुभकामनाओं सहित

इरा.’’

ड्राफ्ट देख उस की बाछें खिल गईं. ‘अम्माजी के हाथ में दूंगी, यह उन की मेहनत का फल है.’ यह सोच कर रेखा पीछे मुड़ी तो पाया, उस के हाथ में ड्राफ्ट देख अम्माजी मुसकरा रही थीं, ‘‘मिल गया ड्राफ्ट?’’

‘‘आप को कैसे पता?’’

‘‘कल शाम को इरा का फोन आया था. उस ने मुझे इस ड्राफ्ट के बारे में बताया था.’’

वे अभी भी मुसकरा रही थीं, शायद अपनी जीत पर.

‘‘लेट्स सैलीब्रेट, अम्माजी,’’ रेखा की खुशी देखते ही बनती थी.

‘‘अरे, आज तो खुल जाए बोतल,’’ अम्माजी ने चुटकी ली.

‘‘छोड़ो अम्माजी, जितना नशा मुझे आज चढ़ा है इस ड्राफ्ट से, उतना बोतल में कहां? आज हम दोनों डिनर बाहर करेंगे, आप की प्रिय मक्की की रोटी और सरसों का साग. साथ में…’’ वह अम्माजी की ओर देख रही थी. ‘‘मक्खन मार के लस्सी…’’ अम्माजी ने उस की बात पूरी की और खुशी से बहू को सीने से लगा लिया.

औकात से ज्यादा: सपनों की रंगीन दुनिया के पीछे का सच जान पाई निशा

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आसान नहीं शादी की राह

आजकल शादी करते हुए युवाओं को कुछ ज्यादा समझदारी और होशियारी से काम लेना होगा. अक्तूबर के पहले सप्ताह में एक पति ने आगरा के पुलिस थाने में गुहार लगाई कि उस की नईनवेली पत्नी पैसे और जेवर ले कर भाग गई और अब मायके वालों की सहमति से अपने किसी प्रेमी के साथ रह रही है.

पति ने बताया कि उसे शादी से पहले बता दिया गया था कि लड़की के पीछे कोई मजनूं पड़ा है पर युवक की हिम्मत नहीं हुई कि वह संबंध को तोड़े. फिर ऐसे मामलों में सैक्स आकर्षण ऐसा होता है कि अधिकांश युवक होने वाली पत्नी की हर सच्ची झूठी बात को मान लेते हैं.

बाद में पति को छोड़ कर गई लड़की की उस प्रेमी से भी नहीं बनी. अब दोनों पतिपत्नी अधर में लटके हैं और पुलिस थानों के चक्कर काट रहे हैं. कब पुलिस किसे गिरफ्तार कर ले, यह भी नहीं कहा जा सकता.

इसी तरह बिहार के वैशाली जिले में एक विवाहित साली और जीजा ने मिल कर साली के पति को गोली से मरवा दिया ताकि जीजासाली का संबंध बना रहे. साली को यह चिंता नहीं कि उस की बहन का क्या होगा. उसे तो आदमी को पाना था जिस की शादी कुछ महीने पहले हुई थी.

शादी से पहले के संबंध किस के किस के साथ थे और कैसे थे, यह जानना जरूरी है पर आज जब लड़कों को लड़कियां नहीं मिल रहीं और लड़कियों को लड़के तो यह सोचने की फुरसत किसी को नहीं होती कि खुद साथी ढूंढ़ें या मांबाप के ढूंढ़े साथी की बैक चैक करें.

भारत में आजकल 1,500 मैट्रिमोनियल साइट्स हैं और बहुतों ने एक से ज्यादा साइट्स पर अपने अकाउंट खोले हुए हैं. करोड़ों युवा अपना जीवनसाथी ढूंढ़ रहे हैं. उस के लिए वे अपना पैसा रजिस्ट्रेशन में खर्च करते हैं और फिर खुद की अपग्रेड कराने में ताकि बेहतर नाम मिल सके. मैट्रिमोनियल साइट्स 20 अरब रुपए का धंधा कर रही हैं जो इस लड़कालड़की ढूंढ़ने की समस्या का एक पहलू बताता है.

विवाह पर पहले छानबीन न करो तो ऊपर के 2 मामलों की तरह जीवन के कई कीमती साल अदालतों, जेलों, वकीलों के साथ गुजर सकते हैं. मैट्रिमोनियल साइट्स या परिचित पंडित भी अब जम कर धोखा देते हैं क्योंकि वे भी कमीशन बेसिस पर काम करते हैं और उन्होंने बड़ी मार्केटिंग टीम रखी है.

जब युवकयुवतियों की इस तरह की कमी हो तो कल जिस ने हां की उस की जांचपड़ताल का जोखिम कौन कैसे ले सकता है? जो थोड़ीबहुत डिटैक्टिव ऐजेंसियां हैं वे भी फ्रौड करती हैं और नकली रिपोर्ट बना कर उस से पैसे ले लेती हैं. पतिपत्नी के होने वाले संबंध में जांचपड़ताल पहले ही खटास पैदा कर देती है.

वैवाहिक अपराधों के लिए इंडियन पीनल कोड की धाराएं 415, 416, 417 व 419 हैं पर कानून की किताब में कुछ लिखे होने का मतलब यह नहीं होता कि सबकुछ ठीक हो जाएगा या अदालत ठीक करा देगी. अदालती दखल आमतौर पर दोनों पक्षों को और रिजिड बना देता है और संबंध बनाए रखने के बजाय ईगो आगे आ जाता है.

विवाह को चाहे जितना ईश्वर की देन समझ जाए और चाहे जितनी उस पर धार्मिक लागलपेट की जाए पौराणिक युग से ले कर आज तक विवाह का संबंध पहले दिन से ही प्रगाढ़ और विश्वसनीय बन जाए जरूरी नहीं है. हर विवाह में बहुत से तथ्यों को देखना होता है जो न घर वाले देखते हैं, न बिचौलिए पंडित, न मैट्रिमोनियल साइट्स बैक चैक करने में विश्वास रखती हैं.

आज के युवाओं के लिए यह एक बड़ी समस्या बनती जा रही है कि कब किस से शादी करें. हर मामले में कोई पेंच नजर आता है. हमारे यहां तो जाति, उपजाति, गोत्र, भाषा, धर्म का मामला भी है. 140 करोड़ के देश में एक युवक या युवती को मनचाहा साथी मिल जाए यह बड़ी बात है. फिर भी विवाह हो रहे हैं. अरबों उन पर खर्च किए जा रहे हैं, यही खुशी की बात है.

Diwali Special: फैस्टिव सीजन में बनाएं रसमलाई

फेस्टिव सीजन में अगर आप दुकानों वाली रसमलाई का स्वाद चखना चाहते हैं तो ये रेसिपी आपके काम की है, जिसे आप आसानी से परोस सकते हैं.

सामग्री

8 छेने के रसगुल्ले

1/2 लिटर दूध

20 ग्राम चीनी

1/2 छोटा चम्मच इलायची पाउडर

2-3 बूंदें केवड़ा वाटर

गार्निशिंग के लिए जरूरतानुसार बादाम व पिस्ते के टुकड़े

विधि

रसगुल्लों को हलके हाथों से प्रैस कर के उन का रस निकाल कर अलग कर लें. दूध को कुछ देर उबालने के बाद चीनी व इलायची पाउडर मिला दें.

फिर इस में रसगुल्ले डाल कर कुछ देर और उबालें. अब केवड़ा वाटर मिला कर आंच से उतार लें. पिस्ता व बादाम से सजा कर परोसें.

Diwali Special: वैक्‍सिंग से नहीं होगा दर्द

जब आप पहली बार वैक्सिंग कराती हैं तो आपको ज्यादा दर्द होता है और आपको वैक्सिंग शब्द से डर लगने लगता है.

वैक्सिंग के दौरान जब बाल स्किन से अलग होता है तो काफी दर्द होता है. फिर आपको लगता है कि क्या इस दर्द को कम किया जा सकता है? तो इसका जबाब है हाँ, हो सकती है. इन उपायों की मदद से आप अपनी वैक्सिंग दर्द रहित बना सकते हैं.

1. सुबह कॉफी ना पीएं

जिस दिन आपको वैक्सिंग करवानी है उस दिन सुबह कॉफी न पीएं. ऐसा करने से दर्द थोड़ा कम हो सकता है. कॉफी में कैफीन मौजूद होता है जो इस के दोनों छोरों को उत्तेजित करता है और वैक्सिंग में जब बाल खिंचते हैं तो काफी दर्द होता है.

2. पीरियड के दौरान वैक्सिंग न कराएं

पीरियड के दौरान वैक्सिंग नहीं करानी चाहिए क्योंकि इस समय आपकी त्वचा काफी संवेदनशील रहती है. वैक्सिंग कराने का सबसे सही समय है जब आपका पीरियड खत्म हो गया हो क्योंकि तब आपका शरीर नार्मल हो जाता है और वैक्सिंग सही तरीके से हो सकती है.

3. वैक्सिंग सेशन को सही रखने के लिए एक्सफोलिएट कर लें

इससे शरीर से डेड सेल निकल जाते हैं और वह बाल जो डेड स्किन सेल के अंदर रहते हैं वह भी निकल जाते हैं. जब यह हो जाता है तब बालों का निकलना दर्दभरा नहीं होता.

4. गर्म स्नान

वैक्सिंग कराने से पहले ठंडे नहीं बल्कि गर्म पानी से नहाएं. गर्म पानी से नहाने से आपकी त्वचा के रोमक्षिद्र खुल जाएंगे और त्वचा की ऊपरी परत कोमल हो जायेगी.

5. ढ़ीले कपड़े

वैक्सिंग के दौरान ढ़ीले कपड़े पहनें ताकि वैक्सिंग में कोई परेशानी ना हो. वैक्सिंग के बाद आपकी त्वचा कुछ समय के लिए काफी संवेदनशील रहती है. आपको ढ़ीले कपड़े पहनने चाहिए क्योंकि टाइट कपड़ों से त्वचा में खुजली या अन्य परेशानी हो सकती है. नेचुरल फाइबर का इस्तमाल करें क्योंकि इससे आपकी त्वचा में परेशानी नहीं होगी और पसीना नहीं आएगा.

6. वैक्स को ठंडा होने दें

यह आपका पहला वैक्सिंग सेशन न हो तब भी आपको वैक्स को अच्छी तरह से ठंडा होने देना चाहिए. कई लोग काफी गर्म वैक्स त्वचा पर लगवा लेते हैं जिससे जलने की समस्या आ सकती है. ज़्यादा गर्म वैक्स का इस्तमाल करने से त्वचा की कुछ परतें निकल कर बाहर आ सकती हैं. इसलिए बिकिनी या ब्राजीलियन वैक्स के समय सचेत रहें.

7. नम्ब करने वाली क्रीम

अगर आपको लगता है कि आपकी त्वचा काफी संवेदनशील है तो आप वैक्सिंग वाली जगह पर नम्ब करने वाली क्रीम का इस्तमाल कर सकते हैं. यह तब ज्यादा असरदार होता है जब आप बिकिनी या ब्राजीलियन वैक्स करवा रहे हों. नम्ब करने वाली क्रीम से शरीर के उस भाग की त्वचा नम्ब हो जाती है जहां आपको वैक्सिंग करवानी है और आपको दर्द रहित वैक्सिंग का एहसास होता है. इस क्रीम को आपको वैक्सिंग कराने से आधे घंटे पहले लगाना होता है.

8. दर्द से मुक्ति

अगर आपको लगता है कि आपका वैक्सिंग सेशन खराब होने वाला है तो अंतिम उपाय है कि आप दर्द से मुक्ति के लिए दवाई ले लें. अंतिम समय में एडविल, इबुप्रोफेन, एस्पिरिन जैसी दवाइयां ली जा सकती हैं. वैक्सिंग से आधा घंटा पहले इन्हें खाएं ताकि आपका वैक्सिंग सेशन सही रहे.

9. एलो वेरा जेल

जब आपकी वैक्सिंग हो जाए तो एक्सपर्ट से कहकर एलो वेरा जेल या कोई ऐसा ही जेल लगवा लें ताकि त्वचा पर लाल निशान न पडें. एलो वेरा जेल लगाने से आपकी त्वचा को अच्छा लगेगा और यह त्वचा को हाइड्रेट भी करती है.

10. चार हफ्ते पहले तक शेव न किया हो

जब वैक्स करवाने जाएं तो यह सुनिश्चित कर लें कि आपने तीन से चार हफ्ते पहले तक शेव न किया हो. ऐसा कहते हैं कि कम से कम एक इंच बाल रहने चाहिए तभी वैक्सिंग में सुविधा होती है. इसका मतलब है कम से कम एक महिना बिना शेव किये हुए रहें. काफी छोटे बालों को निकालना काफी मुश्किल होता है जैसे काफी लंबे बालों को निकालने में दर्द होता है.

Diwali Special: चुटकियों में करें कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड का संतुलन

त्योहारों का मौसम सभी के लिए उत्साह से भरा होता हैं, क्योंकि इस दौरान मुंह में पानी लाने वाले व्यंजनों को खाने का मौका भी मिलता हैं, लेकिन इसमें शामिल खाद्यपदार्थ ज्यादातर शुगर के साथ तैलीय भी होते है, ऐसे पदार्थ स्वास्थ्य के लिए बडे हानिकारक हो सकते हैं. इस बारें में औरंगाबाद के डॉ.हेडगेवार अस्पताल के चिकित्सा निदेशक डॉ. अनंत पंढरे कहते है कि उच्च ट्राइग्लिसराइड के स्तर और कोलेस्ट्रॉल जैसी स्वास्थ्य स्थितियों को बढावा देनेवाले पदार्थ आगे जाकर हृदय रोगों की जोखिम को बढ़ाते हैं.हालाँकि 2 साल कोविड 19 से परेशान होने और घर से न निकल पाने की वजह से इस बार हर कोई किसी भी त्यौहार को जमकर मना रहे है.

ये अच्छी बात है कि परिवार के साथ त्यौहार खूब जमकर मनाये, लेकिन कुछ बातों पर अवश्य ध्यान रखें, ताकि आप कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड के स्तर को संतुलन बनाए रखने में समर्थ हो,यहां कुछ सरल लेकिन प्रभावी उपाय निम्न हैं:

अधिक चीनी के सेवन से बचे

फ्रुक्टोज, शर्करा का विशेष रुप हैं. इससे शरीर का ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ता हैं. इसलिए, त्योहारों के दौरान बाहर जाने पर, कैंडी, बेक्ड गुड्स और आइसक्रीम सहित अतिरिक्त चीनी से बने खाद्य पदार्थों से बचें. शुगर फ्री मिठाईमें फ्रुक्टोज होता हैं और इससे फैट बढने की संभावना अधिक होती हैं. चाहे वह सामान्य मिठाई हो या चीनी मुक्त मिठाई, हमेशा याद रखेंकि वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है.

रिफाईन्ड खाद्य पदार्थों का करें विरोध

सफेद ब्रेड, चावल, पास्ता, आदि जैसे खाद्य पदार्थ जो अक्सर फूड काउंटर पर आसानी से मिल जाते हैं. ये अधिक आसानी से चीनी में परिवर्तित हो जाते हैं.इसका परहेज कर और अनाज वाले खाद्य पदार्थों को चुनकर,आसानी से अपने ट्राइग्लिसराइड के स्तर को बनाए रख सकते हैं.

आहार में करें शामिल फाइबर

उत्सव से दिनोंमें घर पर फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ का सेवन करें.एक शोध के अनुसार, फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों में जटिल कार्बोहाइड्रेट सामग्री होती है, जो शरीर के लिए फायदेमंद होती हैं. यह ट्राइग्लिसराइड की वृद्धि को नियंत्रित करने में भी मदद करता है, जो भोजन के तुरंत बाद बढ़ता है. भोजन में सलाद और सब्जियों को हमेशा शामिल करें. फाइबर, अनाज और पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों जैसे फलों और सब्जियों में अधिक पाया जाता है.

सही फैट का सेवन

ट्राइग्लिसराइड्स और कोलेस्ट्रॉल को स्वाभाविक रूप से बनाए रखने का एक आसान तरीका है,सालमन, जैतून के तेल और डाइटरी प्रोडक्ट आदि का प्रयोग करना, जो सप्लीमेंटकी तरह होता है जिसमे ओमेगा -3 फैटी एसिड होता हैं.  इसके अलावा सॅच्युरेटेड फैट जो मांस और अन्य खाद्य पदार्थों में मिलता है, जैसे आइसक्रीम, पनीर आदि से कुल दैनिक कैलोरी के रूप में 5 से 6 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए और कोलेस्ट्रॉल का दैनिक सेवन 300 मिलीग्राम से अधिक उपयोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है. इसके अलावाएक बार प्रयोग किये गएफ्राइंग तेल का पुन: उपयोग न करें.

रेड मीट की जगह चुनें मछली

ओमेगा -3हार्ट हेल्थ के लिए फायदेमंद हैं और ट्राइग्लिसराइड्स को भी कम करने में मदद करता है. जब आप किसी बाहर खाना खाने जा रहे हों, तो मछली के सेवन को अधिक प्राथमिकता दें, डॉक्टर्स का सुझाव है कि जिन मछलियों में ओमेगा-3 की मात्रा अधिक होती है, उन्हें हफ्ते में दो बार खाना चाहिए.

नियमित रूप से करें व्यायाम

नियमित व्यायाम करना सभी के लिए आवश्यकहोता है,खासकर हाई ट्राइग्लिसराइड्स वाले लोगों के लिए वर्कआउट बहुत अधिक जरुरी होता है. इससे रक्त में शुगर की मात्रा कम होने के अलावा शरीर की क्षमता को बढाने में मदद मिलता है और शरीर द्वारा ट्राइग्लिसराइड्स में परिवर्तित होने वाली शर्करा की मात्रा को कम करता है. मध्यम एरोबिक व्यायाम से भी हृदय रोग वाले लोगों में ट्राइग्लिसराइड्स को कम करने में काफी सहायक होती है. हर दिन कम से कम 30 मिनट की मध्यम शारीरिक गतिविधि अवश्य करें.

वजन नियंत्रित रखें

वजन को नियंत्रित रखने की जरूरत हमेशा से ही होता आया है,हालाँकि कुछ लोगों की सोच है कि मोटापे से अगर उन्हें कोई तकलीफ नहीं, तो उन्हें इसे कम करने की जरुरत नहीं. कम उम्र में भले ही इसके साइड इफ़ेक्ट न दिखे, लेकिन उम्र के बढ़ने के साथ अधिक वजन होने से शरीर में शुगर की मात्रा बढ़ने लगती है. साथ ही मेटाबोलिक प्रक्रिया की काम करने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे उच्च ट्राइग्लिसराइड्स होता है. हेल्दी कैलोरीज का सेवन करस्वस्थ वजन बनाए रखें और ट्राइग्लिसराइड्स कम करें. त्योहारों के मौसम में खाने को छोड़ने या मिठाई से परहेज करने के बजाय छोटे-छोटे हिस्से में खाना खाएं. इससे वजन ठीक रहेगा और व्यक्ति स्वस्थ अनुभव कर सकेगा.

अंत में यही कहना सही रहेगा कि त्योहारों को तभी एन्जॉय किया जा सकता है, जब शरीर स्वस्थ और मजबूत हो, ऐसे में स्वस्थ जीवन शैली की आदतों को अपनाने की कोशिश करें. याद रखें, भोजन जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन समझदारी से खाना एक कला है. इसलिए अपने पोषण को बुद्धिमता से समझें.

अनुत्तरित प्रश्न: भाग 3- ज्योति कौन-सा अपमान न भूल सकी

क्या तुम मेरी दोस्ती का इतना भी मान नहीं रखोगी? मेरे इतने अनुनयविनय पर उस ने कहा कि वह सोच कर जवाब देगी. ये पत्र लौटाना शायद यही इंगित करता है कि वह अतीत भुला कर एक नई जिंदगी शुरू करने के लिए अपनेआप को तैयार कर रही है. पर उस ने ये पत्र आप को क्यों लौटाए, ये मेरी समझ नहीं आ रहा है.’’

‘‘अब छोड़ो न,’’ मैं ने पत्र समेटते हुए बात समाप्त करनी चाही. मैं नहीं चाहती थी

कि गड़े मुरदे उखड़ें और मेरा वह कठोर एकतरफा रूप जतिन के सामने आए, ‘‘मैं ये खत जला दूंगी. ज्योति का अतीत यहीं खत्म. अब वह आराम से एक नई जिंदगी की शुरुआत करेगी.’’

‘‘हां मां, काश ऐसा ही हो,’’ जतिन के चेहरे पर प्रसन्नता की रेखा खिंच गई. उस ने सामने रखे खतों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. मैं समझ गई कि ज्योति का अध्याय इस की जिंदगी की किताब से निकल चुका है. संजना लौट आई थी.

जतिन और संजना लौट गए. मैं ज्योति के खत अलमारी से जलाने के लिए निकाल लाई. मैं अच्छी तरह समझ सकती हूं ये खत वह मुझे क्यों दे गई है. मैं ने उस के चरित्र पर आक्षेप लगाते हुए उसे कालेज से निकालने की जो धमकी दी थी, उस से वह उस समय भले ही डर गई हो पर वह अपमान उसे हमेशा कचोटता रहा होगा. शायद अपनी बेगुनाही का सुबूत देने ही वह यहां आई थी. मुझे अपने सभी अनुत्तरित प्रश्नों का जवाब मिल गया था, इसलिए इन पत्रों को जला देना ही उचित था.

मोमबत्ती की लौ में एक के बाद एक पत्र की होली जल रही थी. मेरे मस्तिष्क में विचारों का अंधड़ चल रहा था. मुझे शर्मिंदा करने आई थी यह लड़की. पर गुनहगार तो तुम हो ज्योति वर्मा. अपूर्ण होते हुए भी तुम ने प्यार करने का साहस कैसे किया और वह भी मेरे बेटे से? इन पत्रों को तुम ने अब तक संभाल कर रखा था, इसलिए न कि तुम जतिन से प्यार करती थीं.

अंतिम पत्र हाथ में लेते वक्त मुझे कुछ अजीब सा लगा. यह अन्य पत्रों के लिफाफों से अलग किस्म का लिफाफा था. मैं ने उसे मोमबत्ती की लौ से छुआ तो दिया, लेकिन पते पर नाम पढ़ते ही मुझे करंट सा लगा. यह तो मेरे नाम था. तुरंत मैं ने आग बुझाई. शुक्र है, लिफाफा ही जला था. कांपते हाथों से मैं ने अंदर से खत निकाला. पत्र मुझे संबोधित था:

डियर मैडम, सुना था वक्त के साथ इंसान के जख्म भर जाते हैं, किंतु यदि ये जख्म कटु वचनों ने दिए हैं तो युगों का अंतराल भी इन जख्मों को नहीं भर पाता. आप द्वारा दिए जख्म मेरे सीने

में अब तक हरे हैं. मैं अपनी गलती मानती हूं कि मुझे पढ़ाई पर ही ध्यान देना चाहिए था, लेकिन मुझ पर आरोप लगा कर और अपने

बेटे से एक बार भी पूछताछ किए बिना आप ने जो एकतरफा निर्णय सुना दिया, उस से मेरे दिल में बसी आप की सम्मानित छवि तारतार हो गई.

प्रिंसिपल की कुरसी पर एक पूर्वाग्रहग्रसित मां को बोलते देख मैं अवाक रह गई थी. चाहती तो ये पत्र मैं आप को अगले दिन ही ला कर दिखा सकती थी, लेकिन क्या फायदा? आप को मुझ पर विश्वास ही कहां था? आप ने मुझे अपनी सफाई पेश करने का एक मौका भी नहीं दिया. सीधा मुझे चरित्रहीन ठहराते हुए कालेज से निकालने की धमकी दे डाली. मामामामी के पास पल रही मुझ अनाथ के लिए अपमान का घूंट पी जाने के अलावा अन्य कोई चारा न था. जतिन को कहती, तो वह आप के खिलाफ विद्रोह पर उतर आता. मांबाप के प्यार को तरसती यह अनाथ मांबेटे के बीच दीवार नहीं बनना चाहती थी. प्यार तो और भी मिल सकता है, मां नहीं. इसलिए मैं ने एक मनगढ़ंत झूठ बोल कर जतिन से किनारा कर लिया…

पत्र थामे मेरे हाथ कांपने लगे थे पर नजरें उसी पर टिकी रहीं…

और देखिए संजना के रूप में जतिन को दूसरा प्यार भी मिल गया और मां भी साथ है. मेरा क्या, जिस के खाते में कोई प्यार नहीं लिखा, उसे कैसे मिल सकता है? मैं विदेश चली गई. नाम, दौलत सब कमा लेने के बावजूद जीवन में एक खालीपन सा महसूस होता रहा. शायद उसे ही भरने इंडिया लौट आई. दोस्त के रूप में जतिन से मिल कर अच्छा लगा, लेकिन दोस्त के रूप में उस की मुझ से जो अपेक्षाएं हैं वे शायद मैं पूरी नहीं कर पाऊंगी. मैं न तो उसे सच बता सकती हूं, न उस का प्रस्ताव मान सकती हूं. शायद मेरा इंडिया लौटने का निर्णय ही गलत था. मैं किसी को खुशी नहीं दे सकती, इसलिए मैं हमेशाहमेशा के लिए विदेश लौट रही हूं. जानेअनजाने आप लोगों की जिंदगी में आने और आप लोगों को दुख पहुंचाने के लिए क्षमाप्रार्थी हूं.

ज्योति पत्र समाप्त कर मैं देर तक शून्य में आंखें गड़ाए बैठी रही. अहंकार का किला लड़खड़ा कर धराशायी हो चुका था. मैं जतिन और ज्योति के सच्चे प्यार को नहीं पहचान पाई. बेटे को उस के प्यार से दूर कर दिया. न तो मैं एक अच्छी मां बन पाई और न एक अच्छी प्रिंसिपल. अंधी ममता के वशीभूत एक छात्रा का जीवन बरबाद करने पर उतर आई और एक तरह से कर ही डाला. कुछ प्रश्न दिमाग में फिर से उभरने लगे थे. ज्योति इंडिया क्यों आई थी? क्या इस उम्मीद में कि शायद जतिन अब भी उस का इंतजार कर रहा हो? मेरे बेटे का घर तो बस गया, लेकिन क्या ज्योति बेगुनाह होते हुए भी जिंदगी में कभी किसी का हाथ थाम पाएगी? अनुत्तरित प्रश्नों की बौछार ने मुझे निरुत्तर कर दिया.

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