सनातनी सरकार औरतों के पक्ष में नहीं

हम लोग भी लिव इन रिलेशनशिप के पक्ष में बहुत कुछ लिखते रहते हैं पर यह रिलेशनशिप बहुत से खतरों से दूर नहीं क्योंकि कानूनी ढांचा इस तरह बना है जिस में कोई भी अधिकार कानूनन विवाह करने पर ही मिलता है. लिव इन रिलेशनशिप को कोई भी कानूनी संरक्षण देने को न सरकार तैयार है न अदालतें और न ही जोड़े आपस में कोई कौंट्रैक्ट कर सकते हैं.

गुजरात का मैत्री करार एक पुराना तरीका है पर यह भी कानूनन मान्य नहीं है क्योंकि सोशल पौलिसी के खिलाफ किया गया कौंट्रैक्ट कौंट्रैक्ट ही नहीं है.

हां, अब लिव इन रिलेशनशिप में रहने को गैरकानूनी अपराध नहीं माना गया है और यदि दोनों बालिग, शादीशुदा हों या न हों साथ रह सकते हैं. शादीशुदा हों तो दूसरे का जीवनसाथी द्वारा हद से हद ऐडल्ट्री के नाम पर तलाक मांग ही सकती है.

एक मुश्किल तब आई जब एक विवाहिता को लिव इन रिलेशनशिप के बाद बच्चा हुआ. उस ने चाहा कि बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट पर लिव इन पार्टनर और बायोलौजिकल फादर का नाम आए पर न मुंबई की म्यूनिसिपल राजी हुई, न मजिस्टे्रट की अदालत और न ही शायद हाई कोर्ट राजी होगा. इस की बड़ी वजह यह है कि शादी के दौरान हुए बच्चे कानूनन पति के होते हैं चाहे स्पर्म किसी का भी हो. पहले यह सुविधाजनक था और अब स्पर्म डोनरों की बढ़ती गिनती के कारण और ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गया है कि बच्चा नाजायज न कहलाए. उसे उस पुरुष की संपत्ति में पूरा हक मिलेगा जिस में कंसीव होते समय उस की मां लीगली शादीशुदा थी.

उस बच्चे का भरणपोषण लीगल पिता को करना होगा न कि बायोलौजिकल फादर को. अगर यह न हो तो तलाक के हर मामले में पति कह सकता है कि उस के बेटेबेटी उस के हैं ही नहीं. अगर वास्तव में न भी हों तो भी जिम्मेदारी उन्हीं की होगी.

लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली लड़कियों को डोमैस्टिक वायलैंस से भी संरक्षण नहीं मिलता. पार्टनर की मारपीट पर पुलिस आनाकानी करे कि डोमैस्टिक वायलैंस ऐक्ट नहीं लगेगा तो गलत नहीं. हां, आईपीसी का साधारण मारपीट वाला मुकदमा चल सकता है जिस में तुरंत जेल की गारंटी नहीं होती. हाई कोर्ट के कुछ जज तो लिव इन रिलेशनशिप के बहुत खिलाफ हैं और कुछ बहुत उदार.

लिव इन रिलेशन में दोनों परिवारों के रिश्तेदार कट जाते हैं और दोनों पक्षों को अपने रिश्तेदारों के यहां अकेले जाना होता है. विवाहित रिश्तेदार कम घर आते हैं क्योंकि अभी भी समाज में दोनों पार्टनरों को छुट्टा सांड या छुट्टी औरत सम?ा जाता है जो किसी पर डोरे डालने में स्वतंत्र है.

क्या इस पर कोई कानून बनाना चाहिए? हमारी राय तो यही है कि नहीं क्योंकि कानूनी लिव इन रिलेशनशिप असल में एक शादी ही होगी जो दोनों की इच्छा नहीं है. हद से हद दोनों को कौंट्रैक्ट करने दिए जाएं पर उस के लिए जो कौंट्रैक्ट ऐक्ट आज हैं उन्हीं के अंतर्गत रहने की सुविधा हो. कौंट्रैक्ट का एक फायदा तो यह होना चाहिए कि फीमेल रेप का चार्ज न लगा सके और दूसरा यह कि जब रिलेशनशिप टूटे तो जौइंट खरीदे सामान को बांटने में आसानी हो. कौंट्रैक्ट के आधार पर ही लिव इन के दौरान के बच्चों का खर्च और विजिटिंग राइट्स तय होने चाहिए, वे केवल मां की जिम्मेदारी नहीं हो सकते.

हमारे पुराणों में लिव इन रिलेशनशिप के उदाहरण भरे पड़े हैं. मेनका और विश्वमित्र का लिव इन वाली संतान शकुंतला का बेटा भी दुष्यंत से एक रात की लिव इन रिलेशनशिप की देन था जिसे दुष्यंत ने 3 साल बाद अपना लिया क्योंकि उस के पास राज था पर वारिस नहीं. उन दोनों के ही पुत्र का नाम भारत था, जो अब सनातनी सरकार देश का अकेला रखना चाहती है और इंडिया हटाना चाहती है.

इसे पाप कहना तो बिलकुल गलत है. यह न अनैतिक है और

न गैरसामाजिक. हां, कुछ हद तक अव्यावहारिक है पर यदि लड़की

में दमखम है तो गलत नहीं. फिल्म ‘जवान’ में शाहरुख खान का विवाह ऐसी ही लड़की से होता है जिसे बेटी लिव इन रिलेशनशिप में हुई.

इस से पहले अमिताभ बच्चन और अभिषेक बच्चन की फिल्म ‘पा’ में विद्या बालन से पुत्र लिव इन रिलेशनशिप में हुआ था और दर्शकों ने कोई आपत्ति नहीं की थी. यह एक सभ्य उदार समाज की निशानी है जिसे कुछ कट्टरपंथी समाप्त करना चाहते हैं और वैलेंटाइन डे पर लाठियां ले कर जोड़ों को पीटते रहते हैं कि या तो अलग हो जाओ या फिर यहीं शादी कर लो.

असल में यूनिफौर्म सिविल कोड मुसलिम समाज के पुरुषोंस्त्रियों के लिए नहीं चाहिए जिन का कानून हमेशा से वैसे भी औरतों के पक्ष में काफी है, कम से कम 1956 से पहले हिंदू सनातनी विवाह और विरासत के कानून से. उन में खुली मैरिज भी है जो एक तरह से लिव इन रिलेशनशिप को कानूनी ढांचा देती है. लेकिन हमारी सनातनी सरकार औरतों के पक्ष में कभी कानून नहीं बनाएगी. उन के लिए तो सीता जैसी देवी भी लक्ष्मणरेखा में रखने लायक है.

मेरे हाथ हमेशा फट जाते है ऐसे मैं क्या करुं?

सवाल

मेरी उम्र 29 साल है. मेरे हाथ सर्दियों में तो फट ही जाते हैं गरमियों में भी रूखे रहते हैं. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

सब से पहले तो इस बात का ध्यान रखें कि नहाने व हाथ वगैरह धोने के लिए जो साबुन का इस्तेमाल करती हैं चैक करें कहीं वह हाथों को ड्राई करने वाला तो नहीं. आप जो वाशिंग पाउडर का इस्तेमाल करती हैं उसे भी चैक करें कि क्या वह आप के हाथों को ड्राई तो नहीं करता. अगर ऐसी कोई बात है तो साबुन और वाशिंग पाउडर बदल कर देखें. मौइस्चराइजर युक्त साबुन का इस्तेमाल करें.

अपने बाथरूम व किचन में मौइस्चराइजिंग क्रीम जरूर रखें ताकि जब भी आप पानी का काम करें तो काम खत्म होते ही टौवेल से हाथों को सुख लें और बिना भूले मौइस्चराइजर लगा लें. रात को सोते हुए किसी किस्म की पोषक क्रीम का इस्तेमाल जरूर करें. घर में हाथों को मौइस्चराइज करने के लिए नीबू के रस में चीनी और थोड़ा शहद डाल कर अपने हाथों पर धीरेधीरे रगड़े ताकि चीनी के दाने खुल जाएं. उस के बाद ताजा पानी से हाथ धो लें.

ऐसा आप रोज कर सकती हैं. इस से आप के हाथ मौइस्चराइज हो जाएंगे और ड्राइनैस नहीं लगेगी. महीने में 1 या 2 बार किसी अच्छे ब्यूटी क्लीनिक में मैनीक्योर जरूर करवा ले. इस से हाथों की मृत त्वचा हटेगी और कोमलता आएगी. इस के अलावा आप रोज नहाने से पहले हाथों को बेबी तेल से मसाज करें और नहाने के बाद मौइस्चराइजर जरूर लगाएं. हफ्ते में 1 या 2 बार उबटन का भी इस्तेमाल कर सकती हैं. उबटन घर में बनाने के लिए चोकर, बेसन हनी, मलाई व हलदी मिला कर धीरेधीरे हाथों पर मलें और फिर 3-4 मिनट बाद हाथों को धो लें.

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मैं 24 साल की हूं. अभी से मेरे चेहरे पर बहुत झुर्रियां पड़ गई हैं. मुझे लगता है कि मैं बहुत ही कम उम्र में बुढि़या जैसी दिखने लगूंगी. कृपया मेरी मदद करें झुर्रियों का सब से बड़ा कारण है रूखी त्वचा.

इस किस्म की त्वचा के भीतर उपस्थित फाइबर की लचक कम होती है जिस के कारण ?ार्रियां जल्दी आ जाती हैं. रूखी त्वचा या तो जन्मजात होती है या फिर नमी और तेल की कमी से त्वचा में रूखापन आ जाता है जिस से फाइबर्स के सिरे सूख जाते हैं और लचक कम होने से वहां की त्वचा ढीली पड़ जाती है. कम उम्र में ?ार्रियां पड़ना आप की अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही को दर्शाता है. आप प्रोटीन, विटामिन ए बी सी और आयरन युक्त पौष्टिक आहार लें. इस के लिए आप दूध, दही, अंकुरित अनाज, अंडे और हरी सब्जियां पालक, मेथी, खीरा, बंदगोभी आदि प्रचुर मात्रा में लें.

एक अन्य कारण अल्ट्रावायलेट रेज भी हैं. आप खुद को  धूप से बचा कर रखें. जब भी घर से निकलें शरीर के खुले हिस्सों पर सनस्क्रीन लगाना न भूलें. धूप का चश्मा और छाते का भी इस्तेमाल करें. मानसिक तनाव के कारण भी झुर्रियां पड़ जाती हैं. अपनी चिंता का कारण ढूंढ़ें और समस्या को हल करें. हमेशा खुश रहने की कोशिश करें. लगातार बीमार रहने और ज्यादा अंगरेजी दवाइयां खाने के कारण भी झुर्रियां पड़ जाती हैं. कोशिश करें कि सिरदर्द या हलकी सी शारीरिक तकलीफ में अंगरेजी दवा लेने की जगह घरेलू इलाज खोजें. हां, अगर समस्या गंभीर है तो दवाइयां लेनी ही पड़ेंगी.

जो लोग हमेशा एसी में रहते हैं उन की त्वचा में लगातार नमी कम होती जाती है. इस से भी झुर्रियां पड़ने का खतरा रहता है. ऐसे में आप मौइस्चराइजर जरूर लगाएं.घरेलू इलाज के तौर पर खूबानी मसल कर चेहरे और गरदन पर लगा लें. 10 मिनट बाद उसे धो लें. 2 चम्मच पका केला और2 चम्मच मलाई मिला कर चेहरे पर लगा लें. 10 मिनट बाद धो लें. रूखी त्वचा की झुर्रियों के लिए चेहरे और गरदन पर जैतून के तेल की मालिश करें. गरदन पर हमेशा नीचे से ऊपर की तरफ मालिश करें.

 

 

9 टिप्स लाइफ में बनाएं बैलेंस

रितु कितना भी कोशिश कर ले, दफ्तर का तनाव उस पर हावी ही रहता है. जैसे ही कोई काम आता है उसे करना आरंभ कर देती है. जब वह कार्य के मध्य तक पहुंचती है तो बौस के निर्देश बदल जाते हैं. नतीजतन रितु चिड़चिड़ाहट से भर उठती है. वह इतना अधिक चिड़चिड़ाती है कि घरपरिवार में भी उस की लड़ाई हो जाती है. इस तनाव के कारण वह बहुत बार गलत डिसीजन भी ले लेती है. खुल कर हंसना क्या होता है वह भूल चुकी है.

चाह कर भी रितु खुद को कंट्रोल नहीं कर पाती है. जैसे ही कोई कार्य आता है वह बिना सोचेसम?ो उसे करने में जुट जाती है. थके मन से कार्य करने के कारण उस की वर्क ऐफिशिएंसी जीरो हो गई.

रितु का मन सोचता नहीं बल्कि दौड़ता है, उस के आसपास आने से लोग कतराते हैं. उधर घर में भी रितु सारे कार्य खुद के ही सुपरविजन में करवाती. घर के कामों के लिए किसी पर विश्वास नहीं कर पाती है.

रितु हाई ब्लड प्रैशर, डायबिटीज की मरीज बन चुकी है. दफ्तर और घर के लोग अब उस से कन्नी काटते हैं. आज भी रितु तनाव में जी रही है पर अब तनाव काम से हट कर सेहत का हो गया है.

पूजा को भी यही बीमारी है. दफ्तर से ले कर घर का हर कार्य खुद ही करने की उस की आदत हो गई है. लगता है कि उस के बिना कोई काम ठीक से नहीं हो सकता है पूजा को हर काम खुद करना भी होता और फिर सब के सामने रोना भी होता कि घर और दफ्तर में कोई भी कार्य उस के बिना नहीं हो सकता है.

इस का नतीजा यह निकला कि आसपास के लोगों में पूजा हंसी का पात्र बन गई है. सब को लगता है पूजा लाइमलाइट में रहने के लिए ऐसा करती है. इसलिए अब उस के रोने का न घर में और न ही दफ्तर में किसी पर असर होता है. जब भी कोई काम होता है तब सब को पूजा की याद आती है. खाली समय पूजा को भी काटने को दौड़ता है क्योंकि उसे खुद नहीं पता है कि खुद के साथ समय कैसे व्यतीत होता है. वह एक प्रोग्राम्ड रोबोट बन गई है.

कुमुद घर की सब से बड़ी बहू थी. वह एक भरे पूरे परिवार में रहती थी. धीरेधीरे वह कब कुमुद से भाभी, चाची, ताई और मामी बन गई उसे खुद ही नहीं पता चला. परिवार की हर शादी और हर फंक्शन में वह बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी.

कुमुद अपनेआप को तो कहीं पीछे छोड़ आई थी. अपने बुटीक का सपना परिवार की जिम्मेदारियों में कहीं स्वाहा हो गया था. मगर जब कुमुद का संयुक्त परिवार अलग हो गया तो उस के पास बहुत अधिक समय हो गया. उस ने अपने पुराने सपने को फिर से जिंदा करा और अपने घर में ही छोटा सा बुटीक खोल लिया था और देर से ही सही खुद का सपना पूरा कर लिया.

आप को अपने परिवार में या दफ्तर में ऐसे उदाहरण देखने को आराम से मिल जाएंगे जो पूरे दफ्तर या घर की धुरी को संभाल कर रखते हैं. हर कार्य चाहे छोटा हो या बड़ा उन के बिना पूरा नहीं होता है. काम करतेकरते वे इतने ओवरवर्कड हो जाते हैं कि उन की खुद की प्रोडक्टिविटी जीरो हो जाती है.

रिश्तों के नाम पर, शौक के मामले में, हर तरह से वे शून्य हो जाते हैं. इंसान हो कर भी वे मशीन का जीवन जीते हैं.

क्या करें और कैसे करें ताकि आप अपनी प्रोफैशनल, पर्सनल और सोशल लाइफ में बैलेंस बना सकें?

  1. हर समय अवेलेबल न रहें

कुछ लोगों की आदत होती है कि वे हर समय काम करने के लिए तत्पर रहते हैं. घर हो या दफ्तर वे हर काम को करने के लिए अवेलेबल रहते हैं. जानेअनजाने सारे काम का भार उन के सिर पर ही आ जाता है. थके हुए मन और तन से वे कितना काम कर पाएंगे? धीरेधीरे उन की प्रोडक्टिविटी जीरो हो जाती है. छुट्टी के दिन और नौर्मल दिन में उन के लिए कोई फर्क नहीं रह जाता है. नतीजतन ऐसे लोग हर समय चिड़चिड़ाने लगते हैं.

2. खुद को थोड़ा रिलैक्स रखें

24 घंटे काम में ध्यान न लगाएं, थोड़ी देर आंखें बंद कर के यों ही बैठ जाएं. अगर बहुत सारे काम पाइपलाइन में हैं तो कामों को प्रायोरिटाइज करें. अगर कुछ काम छूट जाते हैं तो उन्हें छोड़ दे. आप हर काम के लिए जिम्मेदार नहीं हैं. कुछ जिम्मेदारी अपने लिए भी लें.

3. हर समय लीड न करें

घर हो या दफ्तर हर समय लीड लेने से बचें. कभीकभी दूसरों को भी नेतृत्व करने का मौका दें. जिन लोगों को लीड लेने की आदत होती है वे अकसर अपनी टीम में दोगुना काम करते हैं. काम उतना ही करें जितना आप का शरीर इजाजत दे.

4. दफ्तर का तनाव दफ्तर में ही रखें

दफ्तर में तनाव हो सकता है मगर उसे घर पर मत ले कर आएं. जैसे आप दफ्तर में घर का काम नहीं करती हैं वैसे ही दफ्तर का काम घर पर मत ले कर आएं. दफ्तर का तनाव वहां ही छोड़ आएं, अपने बच्चों या परिवार के सदस्यों पर बेवजह गुस्सा न करें. याद रहे घर में आप के टाइम पर उन का पूरा हक है.

5. घर में करें काम विभाजित

जैसे दफ्तर में हर काम को विभाजित करा जाता है वैसे ही घर पर भी करें. खुद को अपनी मां या सास से कंपेयर न करें. घर के जितने काम के लिए आप जिम्मेदार हैं उतनी ही जिम्मेदारी अपने पति को भी दें. खुद को देवी नहीं, एक औरत ही रहने दें.

6. पौजिटिव वोकैबुलरी का करे प्रयोग

कोशिश करें कि नकारात्मक शब्दावली का प्रयोग कम से कम करें. आप जो बोलते हैं उस की ऐनर्जी आप के चारों तरफ रहती है. अपनी वोकैबुलरी में बस सकारात्मक शब्दों को ही स्थान दें. आप जैसे बोलेंगे वैसा ही सोचेंगे और जैसा सोचेंगे वैसा ही हो जाएगा.

7. न कहना सीखें

अपनेआप को वरीयता दें, खुद को हर समय अवेलेबल न रखें. फिर चाहे घर हो या दफ्तर. जो काम करना नहीं चाहती हैं, उसे न कहना सीख लें. अपनेआप को वरीयता देना सीखें. हमेशा दूसरों को खुश करने के चक्कर में कहीं खुद को ही नाराज न कर दें.

8. हर काम में परफैक्शन न ढूंढें

अगर आप को हर काम में परफैक्शन ढूंढ़ने की आदत है तो आप हमेश ही नाखुश रहने वाले हैं. काम को काम की तरह ही करें, उस के लिए अपनेआप को स्वाहा न कीजिए. परफैक्शन ढूंढ़ने वाले लोग हमेशा परेशान ही रहते हैं. कुछ काम को सीधेसादे ढंग से करना होता है और कुछ काम को बहुत परफैक्टली करना ही होता है. अगर आप ऐसा करना सीख लेंगी तो आप की जिंदगी आसान हो जाएगी.

9. बदलाव का करें स्वागत

जिंदगी में एक ही चीज स्थाई है और वह है बदलाव यानी चेंज. कोई रिश्ता, कोई काम कभी भी एक सा नहीं रहता है. आप आज अपने बच्चों के लिए जरूरी होंगे मगर कल उन के लिए आप शायद फालतू बन जाएं, इस बात को याद रखें और खुद को वरीयता देना सीखें वरना बाद में आप की जिंदगी रोतेबिसूरते ही बीतेगी. दूसरों को भी समय दें मगर खुद की जिम्मेदारी उठाना और खुद के लिए समय देना बेहद जरूरी है.

प्यार की धूपछांव: भाग 1- जब मंदा पर दौलत का खुमार चढ़ गया

तेज स्पीड में भागी जा रही गाड़ी एक झटके के साथ रुक गई, पूर्वी ने कंबल से गरदन बाहर निकाल कर खिड़की से झंका. बाहर गुप्प अंधेरा था. उस ने मन ही मन सोचा इस का मतलब है अभी सवेरा नहीं हुआ है. उस ने अपने इर्दगिर्द कस कर कंबल लपेटा और सोने की कोशिश करने लगी. नींद तो जैसे किसी जिद्दी बच्चे की तरह रूठी बैठी थी. पहली बार घर से अकेली इतने लंबे सफर पर निकली थी. हालांकि उस के पापा ने कई बार कहा था इतनी दूर अकेली कैसे जाओगी मैं छोड़ आता हूं परंतु उस ने भी जिद पकड़ ली थी.

‘‘अरे पापा अब मैं इतनी छोटी भी नहीं हूं. वैसे भी होस्टल में रह कर पढ़ाई करनी है तो आनाजाना तो लगा ही रहेगा.’’

पूर्वी वरेली से मुंबई वहां के फेमस इंस्टिट्यूट से इंटीरियर डिजाइनर का कोर्स करने जा रही थी. अब मन ही मन पछता रही थी, नाहक ही पापा को साथ आने से रोका, कम से कम यह सफर तो आराम से कटता.

उस ने एक बार फिर से सोने की कोशिश की. कुछ देर की झपकी लेने के बाद इस बार नींद फिर कानों में टकराती गरमगरम चाय की आवाज से खुली. दिन निकल आया था. पता नहीं कौन सा स्टेशन था परंतु एसी कंपार्टमैंट के कारण ठंड भी लग रही थी, साथ ही चाय पीने की तलव भी जोर मार रही थी. उस के मन में झंझलाहट सी भर गई कि इन ऐसी कंपार्टमैंट में बस खिड़की से झंकते रहो, शीशा खोल कर कुछ ले नहीं सकते. यदि जनरल बोगी होती तो झट से खिड़की खोल कर अपनी सीट पर बैठेबैठे ही चाय ले लेती. अब करे भी तो क्या करे. तभी उस की नजर सामने वाली बर्थ पर पड़ी. जब वह ट्रेन में चढ़ी थी तो सामने वाली बर्थ खाली थी परंतु शायद रात में कोई आया होगा.

सामने की बर्थ पर एक लड़का सो रहा था. वह सोच में पड़ गई कि पता नहीं कैसा हो. वैसे भी गर्ल्स कालेज से पढ़ाई करने के कारण अभी तक लड़कों से बातचीत का कोई मौका नहीं पड़ा था. गरमगरम चाय की आवाज के साथ उस लड़के ने भी अपनी आंखें खोलीं और मुसकराते हुए पूर्वी की तरफ देख कर हाय, गुड मौर्निंग कहा और तुरंत डब्बे से नीचे उतर गया. जब लौट कर आया तो उस के हाथ में चाय के 2 सकोरे थे.

सलिल ने एक कप पूर्वी की तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लीजिए, गरमगरम चाय का आनंद लीजिए, वैसे भी यहां की चाय बहुत मशहूर है और सकोरे में चाय पीने का जो मजा है वह कप से चाय पीने में कहां.’’

पूर्वी ने भी संकोच त्याग कर चाय का कप ले लिया.

‘‘मैं सलिल मुंबई जा रहा हूं. वहां एक इंस्टिट्यूट से एमबीए कर रहा हूं, यह मेरा आखिरी साल है. अपना परिचय नहीं देंगी?’’ सलिल ने कहा.

पूर्वी कुछ झेंप सी गई, ‘‘नहीं वह बात नहीं है. मैं भी मुंबई के फेमस इंस्टिट्यूट एसएनडीटी से इंटीरियर डैकोरेशन का कोर्स करने जा रही हूं. मैं बरेली से हूं और पहली बार मुंबई जा रही हूं. बहुत सुना है मुंबई के बारे में कि सपनों की नगरी है. सभी के सपने पूरे होते हैं यहां. देखती हूं मेरा क्या बनता है,’’ पूर्वी एक ठंडी सांस छोड़ते हुए बोली.

‘‘अरे, यार इतना डरने की क्या जरूरत है, कम से कम मुसकरा तो दो क्योंकि मुसकराने के लिए कोई पैसा यानी रोकड़ा नहीं बस अच्छा थोबड़ा चाहिए, फिर वह तो विद गाड ग्रेस तुम्हारे पास है ही, फिर मुसकराने में इतनी कंजूसी क्यों भला. आधे काम तो आप की प्यारी सी मुसकराहट से ही बन जाते हैं.’’

पूर्वी ने सलिल की ओर आंख उठा कर देखा. वह आकर्षक व्यक्तित्व का ही नहीं था, स्वभाव से मिलनसार व व्यवहारकुशल भी था. इसलिए जल्द ही दोनों घुलमिल गए और छिटपुट बातों ने गति पकड़ ली.

एकदूसरे के परिवार की संक्षिप्त जानकारी लेने के बाद बातचीत का रुख एकदूसरे की पसंदनापसंद की ओर मुड़ गया.

‘‘अच्छा यह कोर्स करने के बाद कहीं सर्विस करने का इरादा है या अपना ही औफिस खोलने का? वैसे भी इस क्षेत्र में काफी स्कोप है. अधिकतर अमीर लोग अपने घरों को आजकल इंटीरियर डैकोरेशन वालों से ही सजवाते हैं.

‘‘मेरी कजिन ने भी यही कोर्स किया है और आजकल अपना औफिस खोल कर काफी अच्छा अर्न भी कर रही है. यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हें उस का फोन नंबर दे सकता हूं, शायद तुम्हारी कुछ मदद हो जाए.’’

सलिल की इतनी साफगोई व मदद भरी बातें सुन कर पूर्वी को काफी राहत मिली. उस ने मन ही मन सोचा, जैसा वह सलिल को देख कर डर रही थी, यह वैसा बिलकुल नहीं है बल्कि यह तो मेरी मदद करने की कोशिश कर रहा है. उस ने मन ही मन राहत की सांस ली.

बातचीत का सिलसिला दोबारा भी सलिल ने ही शुरू किया, ‘‘भई मैं ने तो सोचविचार कर लिया है, एमबीए करने के बाद पहले 2-3 साल किसी अच्छी सी एमएनसी में जौब कर के कुछ ऐक्सपीरियंस जमा करूंगा, फिर अपनी कंसल्टैंसी खोलूंगा. वह क्या है कि किसी की नौकरी करना मेरी फितरत में नहीं है. मैं तो अपना खुद का ही बौस बनना चाहता हूं.’’

‘‘अरे वाह, आप का तो एकदम क्लीयर कौंसैप्ट है अपनी लाइफ के बारे में,’’ पूर्वी ने कहा.

‘‘हां सो तो है, पर देखो न मौम की तबीयत ठीक नहीं रहती है और अगले साल ही पापा का रिटायरमैंट भी है. वैसे भी पुलिस में डीएसपी हैं तो उन से बातचीत करने में थोड़ी घबराहट हो ही जाती है, हां, माई मौम इज वैरी कूल. सो दोनों ने अभी से ऐलान कर दिया है कि एमबीए की डिगरी ले कर लाइफ में सैटल होने के बारे में सोचो ताकि हम लोग घर की जिम्मेदारियों से मुक्त हो सकें यानी सीधे शब्दों में कहें तो तुम शादी कर के घर बसा लो. रिश्ते तो अभी से आने लगे हैं परंतु अभी तो मैं यह कह कर उन लोगों की बात को टालता आ रहा हूं कि पहले मुझे अपने पैरों पर तो खड़ा होने दो, कोई अच्छी नौकरी होगी तभी तो छोकरी को खुश रख पाऊंगा,’’ कह कर जोर से हंस पड़ा.

मैं ने पूर्वी ने ध्यान से पहली बार उस के चेहरे की तरफ देखा. बिलकुल शाहरुख खान की तरह उस के भी दोनों गालों पर डिंपल पड़ रहे थे. कुछ देर तक पूर्वी उस की तरफ देखती रही और फिर सोचने लगी कि जैसा उस ने मन में सोच रखा था कि उस का होने वाला पति गालों में डिंपल पड़ने वाला हो तो कितना अच्छा हो क्योंकि शाहरुख खान पूर्वी का पसंदीदा हीरो जो था. यह सोच कर उस के गाल शर्म से लाल हो गए.

‘‘यू नो हम मध्यवर्गीय पेरैंट्स का बस एक ही फंडा होता है कि बच्चों की पढ़ाई पूरी होते ही उन की शादी कर के अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो लो. मगर शादीविवाह कोई मजाक थोड़े ही है, कोई मन भाता मिलना भी तो चाहिए, आखिर पूरी जिंदगी का सवाल है.’’

अब तक की हुई बातचीत से पूर्वी भी सलिल से कुछ खुल गई थी और वे दोनों मित्रवत ऐसे बातचीत कर रहे थे मानो काफी दिनों से एकदूसरे को जानते हों.

‘‘हां, यह बात तो एकदम ठीक कही आप ने मेरे मांबाबूजी भी बस यही रट लगाए हुए हैं कि बस बहुत हो गई पढ़ाईलिखाई, शादी कर के अपने घरपरिवार को संभालो.’’

‘‘यह आपआप क्या लगा रखा है पूर्वी, वी आर फ्रैंड नाऊं. वैसे भी ट्रेन में जब सहयात्री दोनों ही यंग हों तो अपनेआप उन के बीच की दूरियां सिमट कर छोटी हो जाती हैं. वैसे पूर्वी शादी के बारे में क्या विचार हैं तुम्हारे? तुम्हें अरेंज्ड मैरिज पसंद है या लव मैरिज?’’ सलिल ने सीधा उस की आंखों में देखते हुए पूछा.

‘‘हां मन तो मेरा भी लव मैरिज करने का है क्योंकि मन पसंद जीवनसाथी के साथ जिंदगी जीने का आनंद कुछ अलग ही होता है,’’ पूर्वी ने कहा.

‘‘तो वंदा हाजिर है आप की नजरों के सामने,’’ सलिल ने भी शरारतभरी मुसकान चेहरे पर लाते हुए कहा.

‘‘वाकई, तुम बातें बहुत अच्छी व दिलचस्प करते हो.’’

‘‘लेकिन यह मेरे प्रश्न का जवाब नहीं,’’ सलिल ने कहा, ‘‘तो क्या तुम मुझे पसंद नहीं करतीं?’’

सलिल ने पूर्वी की आंखों में झंका तो उस ने शरमा कर अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन उस के सुर्ख होते गालों ने उस के मन की चुगली कर ही दी.

‘‘अच्छा पूर्वी तुम ने वह डायलौग तो सुना ही होगा कि जब कोई किसी को शिद्दत से चाहे तो पूरी कायनात उन्हें मिलाने में जुट जाती है?’’

‘‘लगता है तुम फिल्में बहुत देखते हो, फिल्मी लव स्टोरी व असल जिंदगी की लव स्टोरी में बहुत फर्क होता है सलिल,’’ पूर्वी ने कहा.

‘‘क्या फर्क होता है? ये फिल्म वाले भी अपनी फिल्म की स्टोरी असल जिंदगी से ही तो उठाते हैं. बस उसे मनोरंजक बनाने के लिए कुछ ट्विस्ट डाल देते हैं.’’

‘‘हां, सो तो है… कह तो तुम एकदम सही रहे हो.’’

ट्रेन की स्पीड कुछ धीमी हो चली थी. सलिल ने खिड़की से झंका और बोला, ‘‘लगता है ट्रेन मुंबई पहुंचने वाली है. अच्छा पूर्वी यहां मुंबई में तुम्हारा कोई लोकल गार्जियन है क्या?’’

‘‘नहीं… इसीलिए तो मन में थोड़ा डर व घबराहट है कि इतनी बड़ी मुंबई नगरी में कहीं कुछ हो गया मेरे साथ तो मदद के लिए किसे कहूंगी.’’

‘‘अरे, इतना क्यों घबरा रही हो, वंदा हाजिर है न,’’ सलिल ने फिर हंसते हुए कहा तो पूर्वी उस के गाल के डिंपल देख कर शरमा कर लाल हो गई.

‘‘अच्छा, मैं ऐसा करता हूं पहले तुम्हें तुम्हारे होस्टल छोड़ देता हूं. इस बहाने होस्टल भी देख लूंगा और तुम्हारा रूम नंबर भी पता चल जाएगा.’’

ट्रेन के रुकते ही दोनों ने मिल कर सामान उतारा और टैक्सी स्टैंड की ओर बढ़ चले.

रास्ते में सलिल ने पूर्वी से उस का फोन नंबर ले लिया और अपना फोन नंबर भी उसे दे दिया. तभी टैक्सी एक बड़ी सी बिल्डिंग के सामने रुकी, जिस के ऊपर बड़ेबड़े शब्दों में एसएनडीटी का बोर्ड लगा था.

पूर्वी अभी तक खिड़की से मुंबई की ऊंचीऊंची इमारतों को ही ताक रही थी.

‘‘यह देखो तुम्हारी मंजिल तो आ गई. चलो मैं तुम्हें तुम्हारे रूम तक छोड़ देता हूं. हां, उस से पहले एक सैल्फी तो बनती है ताकि जब तुम्हें मिस करूं, तुम्हारा चेहरा देख सकूं,’’ कह कर सलिल एक बार फिर खिलखिला कर हंस दिया.

अंतिम पड़ाव का सुख- भाग 3: क्या गलत थी रेखा की सोच

‘सुधीर, धैर्यपूर्वक मेरी बात सुनो. और लता, तुम भी गौर करो,’ मैं बोलने लगी, ‘देखो, तुम ने हमेशा अपनी मां को सिर्फ ‘मां’ के रूप में ही देखा है, पर कभी तुम ने यह भी सोचा है कि वे मां होने के साथसाथ एक औरत भी हैं. कभी तो उन्हें इस नजर से भी देखना चाहिए. एक औरत की कुछ भावनाएं होती हैं. उन्होंने मां की जिम्मेदारी तो पूरी तरह निभा दी है. अब अगर वे एक औरत के रूप में जीना चाहती हैं तो इस में बुराई क्या है?’

‘अगर उन्हें किसी मर्द की जरूरत थी तो पहले ही विवाह कर लेतीं. अब इस उम्र में यह सब करना क्या ठीक है?’ लता कुछ रुष्ट होते हुए बोली.

‘अगर पहले विवाह कर लेतीं तो आज सुधीर की दशा कुछ और ही होती. लता, समझने की कोशिश करो. तुम भी एक औरत हो. मर्द हो या औरत, जवानी के दिन तो फिर भी निकल जाते हैं, पर प्रौढ़ावस्था में ही एकदूसरे की जरूरत महसूस होती है. हो सकता है, यही जरूरत उन दोनों को करीब लाई हो. जवानी तो संघर्षों के कारण बीत गई, पर अब जब सुधीर भी अपने पद पर स्थायी हो गया है, सुमन भी अपनी हमउम्र सहेलियों के साथ व्यस्त हो गई है तो अकेलापन तो तुम्हारी मां को ही महसूस होता होगा.’

‘तुम बेकार की बातें कर रही हो,’ सुधीर बोला, ‘दुनिया क्या कहेगी कि जवान बेटी घर पर बैठी है और मां की शादी हो रही है.’

‘कभी तो समाज का भय छोड़ कर अपने प्रियजनों के हित के बारे में सोचने की आदत डालो. समाज का क्या है, वह तो राई का पहाड़ बना देता है, शादी हो जाने के बाद कोई कुछ नहीं कहेगा. अगर कोई कहेगा तो थोड़े दिन बोलेगा, फिर अपनेआप ही सब चुप हो जाएंगे.’

‘लोग चुप नहीं होंगे, उलटे, सुमन की शादी करनी मुश्किल हो जाएगी.’

‘ठीक है, तुम्हें अगर सिर्फ यही फिक्र है तो सुमन की शादी के बाद सोच लेना. उस व्यक्ति से बात तो कर के देखो.’

‘उस का नाम मत लो. उस को देखते ही मुझे नफरत होने लगती है. और उसे मैं बाप बोलूंगा, हरगिज नहीं.’

‘मैं मानती हूं कि एकाएक उसे पिता का स्थान देना बहुत कठिन है, पर धीरेधीरे कोशिश करने पर सब सामान्य हो जाएगा. शादी के बाद सप्ताह में एक बार मुलाकात करना, फिर देखना तुम्हारी नफरत कैसे मिट जाती है. अपरिचित व्यक्ति भी कुछ दिन साथ रहने पर अपना लगने लगता है, फिर वह तो कुछ हक भी रखेगा.’

‘हक? मैं उसे कोई हक नहीं देने वाला,’ सुधीर अभी भी अपनी बात पर अड़ा हुआ था.

‘मैं जानती हूं कि हम जिसे प्यार करते हैं, उस पर किसी और की हिस्सेदारी बरदाश्त नहीं कर पाते. पर तुम एक बार अपनी मां के बारे में सोचो, सिर्फ एक बार,’ मैं उसे समझाते हुए बोली.

‘ठीक है, कभी सोचेंगे,’ सुधीर हथियार डालते हुए बोला.

‘अच्छा, मेरी बातों पर गौर करना.’

‘हां, भई हां, तुम्हारी मूल्यवान बातों को मैं कैसे भूल सकता हूं. खैर, कब वापस जा रही हो?’

‘अगले मंगलवार को.’

‘बस, इतने ही दिन?’

‘हां, मेरे पति के चाचा जा रहे हैं, उन का साथ मिल जाएगा.’

‘हम तुम्हें छोड़ने के लिए एयरपोर्ट आएंगे,’ सुधीर ने कहा.

इतने में सुमन के टीचर भी चले गए. फिर हम काफी देर तक बातें करते रहे. करीब 6 बजे मैं घर लौटी.

समय अपनी गति से चल रहा था. मेरे जाने का समय भी आ गया था. भावभीनी विदाई के बाद मैं विमान में चढ़ गई. अपनी गलियों, महल्लों को छोड़ते बहुत दुख हो रहा था. पति के यहां स्थायी रूप से रहने के कारण मुझे भी यहां रहना पड़ रहा था, वरना मन तो हमेशा भारत में ही भटकता रहता था.

सुधीर का यह तीसरा पत्र था. 2 पत्र वह पहले भी भेज चुका था. पहले पत्र में अपनी उन्नति के बारे में लिखा था और दूसरे पत्र में सुमन के विवाह के बारे में.

मैं ने फिर से उस पत्र को गौर से देख कर पढ़ना शुरू किया, जिस में लिखा था:

‘‘प्रिय रेखा,

‘‘असीम याद

‘‘आशा है, तुम पूरी तरह स्वस्थ व सुखी होगी. तुम्हें याद है, एक साल पहले की वह घटना, जब तुम ने मां की शादी करने के लिए लंबाचौड़ा भाषण दिया था.

‘‘आज तुम्हारा दिया हुआ वह भाषण काम आ गया है. तुम्हें जान कर हार्दिक खुशी होगी कि मैं ने मां का विवाह उसी व्यक्ति के साथ संपन्न करा दिया है. तुम सोच रही होगी कि यह सब कैसे हुआ.

‘‘दरअसल, बात यह थी कि सुमन की शादी के बाद मां रूखीरूखी सी रहने लगी थीं. धीरेधीरे उन का स्वास्थ्य गिरने लगा. इधर मैं भी अधिक व्यस्त हो चुका था, इसलिए मां को पूरा वक्त नहीं दे पाया.

‘‘मां की बीमारी के चलते लता भी काफी दुखी रहने लगी. वह मुझ पर जोर देती रही कि रेखा की बात मान लो. फिर मां ने जो बिस्तर पकड़ा तो 3 दिनों तक उठ ही न पाईं.

‘‘वह व्यक्ति भी मां से मिलने आया. पहले तो मुझे थोड़ा गुस्सा आया, पर लता के जोर देने पर मैं ने उस से बात की. वह शादी करने को तैयार हो गया. फिर मैं ने मां का विवाह कोर्ट में जा कर करा दिया. सुमन, उस का पति और जापान से उस व्यक्ति का बेटा भी आया था. मैं तुम्हें बता नहीं सकता कि मां उस दिन कितनी सुंदर लग रही थीं. अंतिम पड़ाव में मिले सुख के कारण वे भावविभोर हो गईं. शर्म के चलते वे मुझ से कुछ कह न पाईं और न ही मैं कुछ बोल पाया.

‘‘जापान से आया उस व्यक्ति का बेटा भी मेरे प्रति कृतज्ञता प्रकट करने लगा. उस ने कहा कि वह अब बेफिक्र हो कर जापान में काम कर सकता है. अब हम हर रविवार को मिलते हैं.

‘‘तुम ने सच ही कहा था कि साथ रहने से अपरिचित व्यक्ति भी अपना लगने लगता है. वास्तव में मुझे अब वे अच्छे लगने लगे हैं. उन की गंभीर बातें मेरे दिलोदिमाग में उतर जाती हैं. वे हमारा पूरा खयाल रखते हैं. अगर हम किसी दूसरे को पलभर के लिए भी खुशी दे सकें तो उस से बढ़ कर दूसरा कोई सुख नहीं, फिर मां तो मेरी अपनी ही हैं.

‘‘मेरा लंबाचौड़ा खत पढ़ कर शायद तुम बोर हो गई होगी. पर मैं और लता तुम्हारे प्रति हमेशा कृतज्ञ रहेंगे. जो कुछ तुम ने किया, उस के लिए बहुतबहुत धन्यवाद.

‘‘तुम्हारा दोस्त,

‘‘सुधीर.’’

पत्र मेज पर रख मैं आंखें मूंद कर लेट गई. मुझे खुशी थी कि मैं अपनी जिंदगी में कम से कम एक व्यक्ति को तो सच्ची खुशी प्रदान कर सकी.

अभिनेता निशांत दहिया के सपने क्या सच हुए? पढ़ें इंटरव्यू

‘फिल्म 83’ फेम अभिनेता निशांत दहिया ने मुख्य रूप से हिंदी फिल्मों में काम किया हैं, जिसमे टीटू एमबीए, मुझसे फ्रेंडशिप करोगे, मेरी प्यारी बिंदु आदि फिल्में शामिल हैं. निशांत ने मॉडलिंग से अपने अभिनय की शुरुआत की है और वर्ष 2006 में ग्रासिम मिस्टर इंडिया की प्रतियोगिता में भाग लिया, जिसमे वे फर्स्ट रनर अप रहे. बेस्ट स्माइल और मिस्टर फोटोजेनिक का टाइटल भी जीता. इसके बाद वे मुंबई आये और मॉडलिंग शुरू की. इससे उनकी पहचान इंडस्ट्री में बनी और उन्हें छोटी – छोटी भूमिका मिलने लगी. उन्होंने शुरू में जो भी काम मिला करते गए, क्योंकि इंडस्ट्री में पहचान बनाना आसान नहीं होता.

मध्यप्रदेश के जाट परिवार में जन्मे निशांत के पिता राजेंद्र सिंह इंडियन आर्मी में रहे और उनकी माँ उर्मिला एक हाउसवाइफ है. सरकारी पद पर कार्य करने की वजह से निशांत को देश के विभिन्न स्थानों पर जाना पड़ा. उनका एक बड़ा भाई प्रशांत दहिया भी सेना में है.

मिली प्रेरणा

निशांत कहते है कि मैं एक आर्मी परिवार से हूँ, मेरे पिता आर्मी में कर्नल थे, अब  रिटायर हो चुके है. मेरे दादा कर्नल रहे, वे भी रिटायर्ड है. मेरे बड़े भाई कर्नल है आर्मी में मेरे परिवार की तीसरी पीढ़ी चल रही है, पर मैं नहीं गया , क्योंकि भाई कश्मीर बॉर्डर पर है और पिता चाइना बॉर्डर पर रहे, ऐसे में माँ की इच्छा थी कि मैं उनके साथ रहूँ. उसी वजह से मैं आर्मी में नहीं गया. मैंने इंजीनियरिंग की पढाई पूरी की, फ़ौज में सेलेक्ट भी हुआ, एक छोटी सी नौकरी भी किया, लेकिन अंत में मुंबई एक्टिंग के लिए आ गया, जबकि मैंने अभिनय के बारें में कभी सोचा नहीं था. मुझे परफॉर्म करना पसंद था. मुंबई आकर मैंने छोटे – छोटे काम करने लगा, इससे लोगों ने मुझे जाना और धीरे – धीरे बड़ा काम मिला. इस तरह एक फिल्म से दूसरी और दूसरी से तीसरी फिल्में की.

किये संघर्ष  

निशांत आगे कहते है कि बीच के 3 साल का दौर कभी ऐसा भी था, जब बहुत संघर्ष था और मुझे काम नहीं मिल रहा था. मैंने काफी अच्छे दोस्त खो दिए, रिश्ते टूटे, वित्तीय रूप से भी कमजोर रहा, लेकिन मेरी कोशिश हमेशा जारी रही और माता – पिता के आशीर्वाद से मैं यहाँ तक पहुँच पाया. आगे भी मेरी इच्छा है कि मैं अच्छा काम करू और दर्शकों का प्यार मिलता रहे.

सपना आगे बढ़ने का

निशांत की वेब सीरीज सुल्तान ऑफ़ दिल्ली डिजनी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज हो चुकी है, जिसे सभी पसंद कर रहे है और निशांत खुश है कि उन्हें एक अच्छी वेब सीरीज में काम करने का अवसर मिला. उनका कहना है कि ये वेब सीरीज फिल्म की तरह है. इसकी कहानी बहुत रिलेटेबल है, क्योंकि देखा गया है कि सालों से लोगों का सपना सुल्तान यानि पॉवर को पाने का होता है. जिसमे उनके आपसी रिश्ते बंट जाने के अलावा बिगड़ भी जाते है.

इसके आगे निशांत कहते है कि हर व्यक्ति कामयाब होने का सपना देखता है. मैंने भी देखा है और उसी के अनुसार काम कर रहा हूँ. इसके लिए मुझे हर काम को चुनने से पहले सोच – विचार करना पड़ता है. मैं एक अभिनेता हूँ और अभिनय करना मेरा काम है. मैं अपने निर्णय स्क्रिप्ट को पढने के बाद लेता हूँ. स्क्रिप्ट फिल्म की है या वेब की इस बारें में नहीं पूछता, क्योंकि इतने कम्पटीशन में जहाँ इतने बड़े – बड़े एक्टर्स है, ऐसे में अगर कोई मेरे पास अपनी स्क्रिप्ट लेकर आता है, तो वह मेरे लिए बड़ी बात होती है, ऐसे में स्क्रिप्ट पसंद होने पर मैं कर लेता हूँ.

मैं जब छोटा था तो ओटीटी नहीं थी, थिएटर ही मुख्य था, ऐसे में जब बड़े पर्दे पर एक्टर्स को अभिनय करते हुए देखता था, तो मैं अपने मन में सोचता था कि शायद मैं भी कभी ऐसा काम कर सकूँ, तो मेरे लिए अच्छी बात होगी. ये दूर का सपना था और तब उस ख्याल से खुश हो जाता था. बड़े पर्दे पर दिखना मुझे पसंद रहा, लेकिन एक अच्छी कहानी का हिस्सा बनना ही मुझे बहुत अधिक अपील करती है.

Diwali Special: फैमिली के लिए बनाएं स्वीट हनी ड्राईफ्रूटी राइस

अगर आपको भी ड्राइफ्रूट्स और राइस का कौम्बीनेशन पसंद है तो यह डिश आपके लिए आपके लिए परफेक्ट है. स्वीट हनी ड्राईफ्रूटी राइस बनाना बहुत आसान है. आफ चाहें तो इसे एक डेजर्ट या मिठाई के रूप में भी अपनी फैमिली और फ्रेड्स को परोस सकते हैं.

हमें चाहिए

1 कप बासमती चावल

1/4 कप शहद

2 बड़े चम्मच चीनी

1 कप पानी

1 कप दूध

10-12 केसर

1/2 छोटा चम्मच हल्दी पाउडर

2 बड़े चम्मच देशी घी

2 बड़े चम्मच काजू टुकड़ा

2 बड़े चम्मच किशमिश

1 छोटा चम्मच बादाम

बारीक कटे 3 इलायची छोटी

1 इंच टुकड़ा दालचीनी.

बनाने का तरीका

चावलों को धो कर 1/2 घंटा भिगोए रखें. फिर पानी निथार लें. एक प्रैशरकुकर में 2 बड़े चम्मच घी डालें. उस में काजू व बादाम भून लें.

बचे घी में इलायची, दालचीनी और हलदी का तड़का लगा कर चावल डालें और 1 मिनट भूनें. अब उस में 1 कप कुनकुना पानी और 1 कप कुनकुना दूध डाल दें.

जब चावल उबलने लगे तब चीनी व शहद डाल कर प्रैशरकुकर का ढक्कन लगा दें. 1 सीटी आने तक पकाएं. जब भाप निकल जाए तब सारे ड्राईफ्रूट्स और केसर के धागों को गुलाबजल में घोट कर मिला दें.

Diwali Special: फेस्टिवल में हो घर-घर पार्टी

आज के दौर में सभी पर काम का बोझ अधिक है. ऐसे में औफिस या बिजनैस से त्योहार के दिन भी छुट्टी मिलनी मुश्किल होती है. दीवाली या दशहरा में 1-2 दिनों की छुट्टी ही मिल पाती है. ऐसे में सभी का आपस में मिलना संभव नहीं होता. अगर पूरे फैस्टिवल सीजन में अलगअलग जगहों पर पार्टियों के आयोजन हों तो बहुत सारे लोग आपस में मिल सकते हैं. एक ही जगह पर पार्टी होने से लोगों की संख्या ज्यादा हो जाती है. पार्टी का बोझ भी बढ़ जाता है. अगर छोटीछोटी पार्टियां घरघर में आयोजित हों तो ज्यादा लोगों के आपस में मिलने का अवसर मिलता है.

त्योहारों में कई तरह के संगठनों में मुलाकातें हो जाती है. परेशानी की बात यह है कि ये संगठन जातीय समुदाय के नाम पर बने होते हैं. ऐसे में बाहरी लोगों का इन के साथ तालमेल नहीं रहता. जरूरत इस बात की है कि बिना जातीय या समुदाय की सोच के केवल आपसी दोस्ती के आधार पर यह पार्टी आयोजित की जाए. अलगअलग आयोजनों के होने से एक लाभ यह होता है कि दोस्तों और रिश्तेदारों से बारबार मुलाकात होने लगती है, जिस से कई बार बिगडे़ हुए रिश्ते भी सहज हो जाते हैं.

1. हर घर पार्टी

आज के दौर में घरों में इतनी जगह रहती है कि वहां पर छोटी पार्टी का आयोजन हो सके. ऐसे में बहुत खर्च भी नहीं आता. घर वालों को इस में लगने की जरूरत नहीं होती. खाना बनाने वाले या ऐसे काम करने वाले लोग खाने से ले कर सजावट तक सब मैनेज कर देते हैं. अगर त्योहार में केवल एक बार पार्टी का आयोजन होता है तो आपसी मुलाकात भी एक बार ही हो पाती है. अगर बारबार ऐसे आयोजन होते हैं तो आपसी मुलाकातें बारबार होने की संभावना रहती है.

बारबार मिलने से एकदूसरे के दुखदर्द का ज्यादा पता चलता है. आज के समय में आपस में मिलनाजुलना बेहद कम हो गया है. ऐसे में फैस्टिवल पार्टी के बहाने एकदूसरे से जल्दीजल्दी मिलना हो जाता है. जब बारबार मिलना होता है तो केवल औपचारिक बातें नहीं होतीं, और भी बातें होती हैं.

इस से आपसी संबंध मजबूत होते है. एकदूसरे के घरपरिवार, बच्चों का भी पता चलता है. जिस से केवल दोस्तीभरे रिश्ते ही मजबूत नहीं होते बल्कि कई बार आपस में रिश्तेदारी करने में भी मदद मिल जाती है. आपसी मेलजोल से यह भी पता चलता है कि किस के बच्चे शादी के लायक हो गए हैं, कौन किस से शादी कर सकता है.

2. कारोबार ही नहीं, नातेरिश्ते भी

मेलजोल से कारोबार की संभावनाएं भी पनपने लगती हैं. आज के समय में कारोबार में भरोसेमंद लोगों का मिलना मुश्किल होता है. ऐसे में अगर आपसी मेलजोल अधिक होता है तो बिजनैस पार्टनर के साथ करीबी रिश्ते बनाने में मदद मिलती है. देखने में यह फैस्टिवल पार्टी केवल सामान्य पार्टी जैसी ही दिखती है पर असल में यह आपसी तालमेल को लंबे समय तक बनाए रखने का काम कर सकती है. ऐसी पार्टियों में आपसी औपचारिकता को न रखा जाए ताकि इस में शामिल होने वाले को किसी भी तरह की हिचक न हो.

पार्टी को रोचक बनाने के लिए कुछ गेम्स तैयार किए जा सकते हैं. ये हर उम्र को ध्यान में रख कर तैयार किए जाएं. कोशिश हो कि इस में हर उम्र के लोग शामिल हो सकें. कुछ गेम्स ऐेसे भी हों जिन में महिला और पुरुष एकसाथ हिस्सा ले सकें. इस से आपस में एक अलग किस्म का भरोसा बढ़ता है.

आज के समय में महिलाएं बड़ी संख्या में बिजनैस में हैं. वे केवल बिजनैस में रहती ही नहीं, उस का पूरा हिस्सा होती हैं. उन के फैसलों को पूरा सम्मान मिलता है. अब बिजनैस में महिलाओं की भूमिका रबरस्टैंप से अधिक की हो गई है. ऐसे में महिलाओं को पार्टी में जरूर शामिल किया जाए. महिलाओं को धूम्रपान और ड्रिंक से परेशानी होती है इसलिए पार्टी में इस का प्रयोग न ही किया जाए.

3. धूम्रपान और ड्रिंक से दूरी

महिलाओं के साथ पार्टी में गलत व्यवहार धूम्रपान और ड्रिंक से ही शुरू होता है. ऐसे में इस को पूरी तरह से पार्टी से बाहर किया जाना जरूरी होता है. पार्टी में खाने का मैन्यू भी इस तरह से तैयार हो कि सभी को पसंद आए. यह न हो कि कुछ खाने की चीजें ऐसी हों जो लोग  पसंद न करें. आमतौर पर आज के समय में लोग अपनी हैल्थ को ले कर ज्यादा जागरूक हो गए हैं. जिस से वे तलाभुना या ज्यादा मसालेदार चीजें कम खाते हैं. ऐसे में इन बातों का पूरा ध्यान रखना जरूरी होता है.

मसला परिवार का होता है, ऐसे में युवा और बच्चे भी पार्टी में शामिल हो सकते हैं. बच्चे बडे़ लोगों के साथ सही से एंजौय नहीं कर पाते. ऐसे में उन के लिए कुछ गेम्स की तैयारी कर के रखनी जरूरी होती है. छोटे बच्चे भी अपने हिसाब से खेलते हैं. उन के लिए भी कुछ मनोरंजन का अलग से इंतजाम हो ताकि उन के पेरैंटस बिना किसी चिंता के आपस में भेंटमुलाकात का मजा ले सकें.

पार्टी का समय इस तरह से रखा जाए जिस में ज्यादा से ज्यादा लोग शामिल हो सकें. कई बार समय का चुनाव ठीक से नहीं होता तो लोग पूरी संख्या में शामिल नहीं हो सकते. बेहतर होता है कि छुट्टी के दिन इस को रखें. इस से सभी लोग पार्टी का हिस्सा बन सकते हैं.

4. खर्चा घटाएं, मजा बढ़ाएं

मिलजुल कर त्योहार मनाने से त्योहार में होने वाला खर्च घटता है जबकि मजा बढ़ता है. अपने घरपरिवार से दूर रह कर भी घर जैसे मजे लिए जा सकते हैं.

आज के समय में ज्यादातर लोग अपने शहर और घर से दूर कमाई के लिए दूसरे शहरों में रहते हैं. अपने घर जाने के लिए उन को छुट्टी लेनी होती है. कई बार छुट्टियों में घर जाने के लिए रेलवे, बस और हवाई जहाज के महंगे टिकट लेने पड़ते हैं. मुसीबत उठा कर अपने घर जाना कई बार परेशानी का सबब बन जाता है.

ऐसे में त्योहारों की पार्टी घरघर होने से सब आपस में मिल लेते हैं. इन का आयोजन मिलजुल कर भी कर सकते हैं. इस से सभी लोगों की हर तरह से भागीदारी रहती है और कोई अपने को बोझ नहीं समझता. कम खर्च में अच्छा आयोजन हो जाता है. परिवार के साथ रहने से पति भी दोस्तों के साथ शराब और जुए जैसे खेलों से परहेज करता है.

ऐसे आयोजन होने से त्यौहार का मजा दोगुना हो जाता है. सभी धर्मों के बीच रहने वाले लोग भी इस का हिस्सा बन जाते हैं. इस से अलगअलग जगहों की संस्कृति व खानपान का मजा भी मिलता है.

जिस तरह से आज आपस में दूरियां बढ़ रही हैं उसे कम करने का यह सब से अच्छा माध्यम है कि त्योहारों की खुशियां मिलजुल कर मनाएं. केवल रैजीडैंशियल कौंप्लैक्स में ही नहीं, कसबों, महल्लों, शहरों और गांवों में भी उत्सव के आयोजन मिलजुल कर किए जाने चाहिए. इस से समाज में एक नया प्यार और सौहार्द्र का माहौल बनेगा.

Diwali Special: मस्ती में झूमें पर नींद लेना न भूलें

दीवाली के त्योहारों के दिन खुशी और उल्लास से भरपूर होते हैं, इसलिए चाहे युवा हों या वयस्क सभी इन दिनों खुशी से झूम उठते हैं. डांडिया रास, गरबा नृत्य, दीवाली पार्टियां, दीवाली मेले बहुत कुछ होता है इन दिनों और खुशी का यह माहौल साल में एक बार ही आता है, इसलिए हर कोई अपने आप को इस से सराबोर कर लेना चाहता है.

लेकिन हर खुशी के साथ कोई न कोई परेशानी भी अवश्य आती है. इस दौरान रात्रिजागरण खूब होता है. देर रात तक डांस करना, देर से सोना, देर से जागना, फिर पढ़ना, कालेज या औफिस जाना या घर में काम निबटाना यानी कई काम आप को दिन में करने पड़ते हैं, जिन्हें करना मुश्किल होता है. इस के साथ ही कई दिन नींद न पूरी होने की वजह से बीमार पड़ जाने की आशंका भी रहती है.

फोर्टिस अस्पताल के न्यूरोलौजिस्ट डा. गिरीश नायर का कहना है कि किसी उत्सव या पार्टी को मनाते वक्त व्यक्ति यह भूल जाता है कि उस ने सही नींद नहीं ली है. इस से कई बार तो उस की वह बीमारी जो पहले से है वह बढ़ जाती है या फिर नई बीमारी की शुरुआत हो जाती है.

इस के आगे डाक्टर बताते हैं कि नींद 2 तरह की होती है. गहरी नींद, जिस में व्यक्ति अगर 5 घंटे भी सो ले तो बौडी रिलैक्स हो जाती है. दूसरी कच्ची नींद, जो भले ही 8 घंटे की हो बौडी रिलैक्स नहीं होती. देर रात सोने से बौडी और मस्तिष्क पर जो प्रभाव पड़ता है वह निम्न है:

– देर रात सोने से आप की 6 से 8 घंटे की नींद पूरी नहीं होती, जिस से आप सुबह देर से उठने के बाद भी सुस्त रहते हैं. फ्रैश महसूस नहीं करते.

– नींद पूरी न होने पर ब्लडप्रैशर बढ़ सकता है.

– माईग्रेन यानी सिरदर्द हो सकता है. अगर माइगे्रन पहले से है तो उस के बढ़ने की आशंका रहती है, क्योंकि आप नियमित दिनचर्या से अलग हट कर काम करते हैं.

– नींद पूरी न होने से आप की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो जाती है, जिस से कफ, कोल्ड, बदहजमी जैसी बीमारियां होने लगती हैं.

इन के अलावा देर रात सोने से कई और समस्याएं होती हैं, जिन में खास हैं:

डाइजेस्टिव सिस्टम पर असर पड़ता है, जिस से ऐसिडिटी बढ़ती है. आप हाइपरटैंशन के शिकार हो सकते हैं.

इरिटेबल बाउल सिंड्रोम हो सकता है, जिस में सुबह उठने पर बारबार दस्त होना, पेटदर्द, नौशिया आदि होती है.

अस्थमा के मरीज का अस्थमा बढ़ सकता है, उसे अटैक आ सकते हैं.

हारमोनल बैलेंस बिगड़ता है जिस से मधुमेह की बीमारी का बढ़ना या नई शुरुआत हो सकती है.

फर्टिलिटी पर भी असर पड़ता है. पुरुषों का ‘स्पर्म काउंट’ कम हो सकता है. जबकि महिलाओं के ‘मेंसुरेशन साइकिल’ पर असर पड़ता है.

सुझाव

डा. नायर आगे कहते हैं कि देर रात सोने की आदत हमेशा खराब होती है. पर ग्लोबलाइजेशन या पढ़ाई की वजह से या फिर किसी खास अवसर की वजह से आप रात को देर से सोते हैं, तो निम्न बातों का ध्यान अवश्य रखें:

किसी कारणवश अगर आप देर से सोए हों, और आप की नींद पूरी नहीं हुई हो तो हो सके तो दोपहर में थोड़ी देर नींद ले लें.

खाने पर ध्यान दें. औयली, फ्राइड और प्रोसैस्ड फूड न खा कर घर का भोजन, जिस में फ्रैश फ्रूट्स, सब्जियां और सलाद हो, खाने की कोशिश करें.

कम से कम 3 से 4 लिटर पानी पिएं.

अगर आप अगले दिन फ्रैश न हों तो गाड़ी न चलाएं. देर तक जागने की वजह से आप की एकाग्रता कम होगी, जिस से आप का गाड़ी पर कंट्रोल कम हो सकता है, जो कई बार खतरनाक होता है.

मौजमस्ती, कितनी भी करें, पर अपनी जरूरत की नींद अवश्य पूरी करें, क्योंकि नींद टायर्ड मसल्स को रिलैक्स करती है, जिस से आप दूसरे दिन की भागदौड़ के लिए तैयार होते हैं. नींद आप को सही और तुरंत निर्णय लेने में भी मदद करती है, तब आप एक खुशनुमा जीवन बिता सकते हैं. 

जाने क्यों लोग: क्या हुआ था अनिमेष और तियाशा के साथ

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