‘‘तुम ने पूछा नहीं कि गौरिका यहां से क्यों चली गई?’’
‘‘पूछा था, पर वह तो आप को ही बुराभला कहने लगी, कहती है कि आप के कठोर अनुशासन में उस का दम घुटने लगा था.’’
‘‘स्वयं को सही साबित करने के लिए कुछ तो कहेगी ही. पर मैं तुम से कुछ नहीं छिपाऊंगा. आगे तुम्हें जो उचित लगे करना. हम बीच में नहीं पड़ेंगे,’’ श्याम बोले.
‘‘ऐसी क्या बात है भैया? मेरा दिल बैठा जा रहा है,’’ श्यामला घबरा उठी.
‘‘इस तरह कमजोर पड़ने की जरूरत नहीं है. तुम्हें युक्ति से काम लेना पड़ेगा.’’
‘‘पर बात क्या है भैया?’’
‘‘गौरिका यहां आई तो 2-3 सप्ताह तो सब ठीक रहा, पर फिर उस के ढेरों मित्र आने लगे. रात के 12-12, 1-1 बजे तक पार्टियां चलतीं, कानफोड़ू संगीत बजता. पहले तो हम ने कुछ नहीं कहा, पर जब पड़ोसी भी शिकायत करने लगे तो कहना पड़ा कि हमारी भी कोई मर्यादा है,’’ श्याम ने विस्तार से बताया.
‘‘आप से क्या छिपाना श्यामला दीदी. मैं ने स्वयं गौरिका के मित्रों को नशीली दवा तथा शराब लेते देखा है. इन युवाओं के व्यवहार के संबंध में क्या कहूं… उन्हें खुलेआम शालीनता की सभी सीमाएं लांघते देखा जा सकता था,’’ नीता ने भी अपनी बात कह डाली.
श्यामला को कुछ क्षण ऐसा लगा जैसे हवा भी थम गई हो. श्याम बाबू और नीता ने उन के चेहरे का रंग उड़ते और बदलते देखा.
‘‘श्यामला क्या हुआ? इस तरह चुप क्यों हो? कुछ तो कहो,’’ श्याम घबरा गए.
‘‘बोलूंगी भैया, अवश्य बोलूंगी, पर सब से पहले तो आप दोनों यह भलीभांति सम झ लीजिए कि मु झे गौरिका पर अटूट विश्वास है. आप को अपना सम झ कर उसे आप के साथ रहने को मनाया था. वह तो किसी संबंधी के साथ रहना ही नहीं चाहती थी,’’ श्यामला हर शब्द चबाचबा कर बोलीं.
‘‘क्या कह रही हो दीदी? गौरिका हमारी बेटी जैसी है. हम क्या उस पर झूठे आरोप लगा रहे हैं?’’ नीता ने कहा.
‘‘बेटी जैसी है न पर बेटी तो नहीं है. इसीलिए तो आप लोग जलते हैं उस से. है कोई लड़की मेरी गौरिका जैसी पूरी बिरादरी में? हर कक्षा में सर्वप्रथम रही है वह. आज इतनी सी आयु में इतनी ऊंची नौकरी कर रही है, इसीलिए सब बौखला गए हैं,’’ और फिर श्यामला रो पड़ीं.
श्याम बाबू सन्न रह गए. उन की छोटी बहन उन पर ऐसा आरोप लगाएगी,
उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था.
‘‘नीता, जाओ चायनाश्ते का प्रबंध करो. अब इस संबंध में हम कोई बात नहीं करेंगे,’’ किसी प्रकार श्याम के मुंह से निकला.
‘‘नहीं खूब बात कीजिए. मेरी गौरिका को बदनाम किए बिना आप को चैन नहीं मिलेगा. आप ने हमारी बहुत सहायता की है. पूरा हिसाबकिताब कर लीजिए हम पाईपाई चुका देंगे. गौरिका का विवाह इतनी धूमधाम से करूंगी कि सब की आंखें खुली की खुली रह जाएंगी,’’ श्यामला अब भी स्वयं को शांत नहीं कर पा रही थीं.
‘‘चलो, मान लिया तुम्हारी गौरिका जैसी कोई नहीं है. हमारी शुभकामनाएं हैं कि वह दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करे. तुम्हारा बड़ा भाई हूं. अब क्षमा भी कर दो,’’ श्याम बाबू ने हाथ जोड़ कर प्रार्थना की तो श्यामला ने किसी प्रकार स्वयं को संभाला.
चायनाश्ते और इधरउधर की बातों के बीच कब शाम हो गई और गौरिका श्यामला को लेने आ गई, पता ही नहीं चला.
‘‘अब क्या होगा श्याम? असली बात तो श्यामला दीदी को बताई ही नहीं,’’ श्यामला के जाते ही नीता ने चिंता जताई.
‘‘क्यों, अभी कुछ और सुनना बाकी है क्या? गांधीजी की शिक्षा का पालन करो. बुरा न देखो, न सुनो, न बोलो. हम कुछ कहें भी तो वह कब सुनने वाली है. उसे पुत्री मोह के आगे कुछ नहीं सू झेगा,’’ श्याम ने पत्नी को दोटूक शब्दों में बताया.
‘‘मिल आईं अपने भाईभाभी से?’’ घर पहुंचते ही गौरिका ने प्रश्न किया.
‘‘मिल आई और खरीखरी भी सुना आई. वे होते कौन हैं मेरी बेटी पर आरोप लगाने वाले?’’ श्यामला गुस्से से भरे स्वर में बोलीं.
‘‘मैं कहती तो थी कि वे हम से ईर्ष्या करते हैं,’’ गौरिका को मां श्यामला की बात सुन कर बड़ी खुशी हुई.
‘‘चिंता न कर बेटी. ऐसा जवाब दे कर आई हूं कि भविष्य में कभी तेरी बुराई करने का साहस नहीं जुटा सकेंगे.’’
‘‘ऐसा क्या कह आईं आप?’’
‘‘जो मन में आया सुना दिया. भैया तो लगे हाथ जोड़ कर माफी मांगने. मैं तो यह सोच कर चुप रह जाती थी कि बड़े भाई हैं और कई बार सहायता करते रहे हैं पर हर बात की एक सीमा होती है.’’
‘‘मम्मी, अब गुस्सा थूक भी दो और तैयार हो जाओ. आज डिनर बाहर ही करेंगे,’’ गौरिका की खुशी उस के चेहरे पर साफ झलक रही थी.
‘‘अब तो बस एक ही इच्छा है कि तेरे लिए ऐसा घरवर ढूंढ़ूं कि सभी मित्रों, संबंधियों की आंखें चौंधियां जाएं.’’
‘‘आप ऐसा कुछ नहीं करेंगी मां. अपने जीवनसाथी का चुनाव मैं स्वयं करूंगी और वह भी पूरी तरह जांचनेपरखने के बाद.’’
‘‘क्या कह रही है? कहीं किसी को पसंद तो नहीं कर लिया?’’ मन की बात तुरंत ही शब्दों में ढल गई.
‘‘नहीं मां ऐसा कुछ नहीं है. जांचनेपरखने में समय लगता है. अभी तो खोज शुरू हुई है,’’ गौरिका ने हंसी में बात टालनी चाही पर श्यामला का दिल दहल गया.
गौरिका डिनर के लिए उन्हें एक क्लब में ले गई. वहां उपस्थित युवकयुवतियों से वह ऐसे घुलमिल रही थी मानो उन्हें सदियों से जानती हो. गौरिका उन्हें जूस का गिलास थमा कर अपने मित्रों के साथ व्यस्त हो गई, जो तेज संगीत की धुन पर एकदूसरे में डूबे थिरक रहे थे.
खापी कर घर लौटते रात के 12 बज रहे
थे. तभी कार में अजीब गंध ने श्यामला को
चौंका दिया, ‘‘यह क्या है गौरिका? तुम ने पी रखी है क्या?’’
‘‘उफ मां, अपनी मध्यवर्गीय मानसिकता से बाहर निकलो. उच्चवर्ग में साथ देने के लिए थोड़ीबहुत पीने को बुरा नहीं मानते… यह तो आधुनिकता की निशानी है.’’
‘‘भाड़ में जाए ऐसी आधुनिकता… हमारे समाज में तो लड़कों का भी पीना अच्छा नहीं सम झा जाता लड़कियों की बात तो दूर रही.’’
‘‘आप तो श्याम मामा और मामीजी की तरह बात करने लगीं. थोड़ी सी पीने से कोई शराबी नहीं हो जाता. अगली बार मैं आप को क्लब के पब में ले जाऊंगी. वहां देखिएगा कितनी लड़कियां बैठी रहती हैं.’’
‘‘मु झे नहीं देखना कुछ भी. अच्छा हुआ कि तुम्हारा असली चेहरा सामने आ गया. मैं भी कितनी मूर्ख हूं. तुम्हारी बातों में आ कर मैं श्याम भैया से भी झगड़ा कर बैठी,’’ और श्यामला रो पड़ीं.
अगले कुछ दिन श्यामला ने अपने अकेलेपन से जू झते हुए बिताए. वे गौरिका का एक नया ही रूप देख रही थीं. उस के काम पर जाने के बाद नभेश से बात कर के वे मन हलका कर लेती थीं.
सप्ताहांत में गौरिका अकसर आधी रात को घर लौटती. वे कुछ कहतीं
तो उस का यही घिसापिटा उत्तर होता कि वह उन की तरह चौकेचूल्हे में अपना जीवन नहीं गंवा सकती.
बस, एक चिनगारी से भक् से आग भड़क गई. सोच कर ही डर लगता है. भभक उठी आग. हम दोनों एकसाथ चीखे थे. तरुण ने मेरी साड़ी खींची. मुझ पर मोटे तौलिए लपेटे हालांकि इस प्रयास में उस के भी हाथ, चेहरा और बाल जल गए थे. मुझे अस्पताल में भरती करना पड़ा और तरुण के हाथों पर भी पट्टियां बंध चुकी थीं तो रिद्धि व सिद्धि को किस के आसरे छोड़ते. अम्माजी को बुलाना ही पड़ा. आते ही अम्माजी अस्पताल पहुंचीं. ‘देख, तेरी वजह से तरुण भी जल गया. कहते हैं न, आग किसी को नहीं छोड़ती. बचाने वाला भी जलता जरूर है.’ जाने क्यों अम्मा का आना व बड़बड़ाना मुझे अच्छा नहीं लगा. आंखें मूंद ली मैं ने. अस्पताल में तरुण नर्स के बजाय खुद मेरी देखभाल करता. मैं रोती तो छाती से चिपका लेता. वह मुझे होंठों से चुप करा देता. बिलकुल ताजा एहसास.
अस्पताल से डिस्चार्ज हो कर घर आई तो घर का कोनाकोना एकदम नया सा लगा. फूलपत्तियां सब निखर गईं जैसे. जख्म भी ठीक हो गए पर दाग छोड़ गए, दोनों के अंगों पर, जलने के निशान. तरुण और मैं, दोनों ही तो जले थे एक ही आग में. राजीव को भी दुर्घटना की खबर दी गई थी. उन्होंने तरुण को मेरी आग बुझाने के लिए धन्यवाद के साथ अम्मा को बुला लेने के लिए शाबाशी भी दी. तरुण को महीनों बीत चले थे भोपाल गए हुए. लेकिन वहां उस की शादी की बात पक्की की जा चुकी थी. सुनते ही मैं आंसू बहाने लगी, ‘‘मेरा क्या होगा?’’ ‘परी का जादू कभी खत्म नहीं होता.’ तरुण ने पूरी तरह मुझे अपने वश में कर लिया था, मगर पिता के फैसले का विरोध करने की न उस में हिम्मत थी न कूवत. स्कौलरशिप से क्या होना जाना था, हर माह उसे घर से पैसे मांगने ही पड़ते थे. तो इस शादी से इनकार कैसे करता? लड़की सरकारी स्कूल में टीचर है और साथ में एमफिल कर रही है तो शायद शादी भी जल्दी नहीं होगी और न ही ट्रांसफर. तरुण ने मुझे आश्वस्त कर दिया. मैं न सिर्फ आश्वस्त हो गई बल्कि तरुण के संग उस की सगाई में भी शामिल होने चली आई. सामान्य सी टीचरछाप सांवली सी लड़की, शक्ल व कदकाठी हूबहू मीनाकुमारी जैसी.
एक उम्र की बात छोड़ दी जाए तो वह मेरे सामने कहीं नहीं टिक रही थी. संभवतया इसलिए भी कि पूरे प्रोग्राम में मैं घर की बड़ी बहू की तरह हर काम दौड़दौड़ कर करती रही. बड़ों से परदा भी किया. छोटों को दुलराया भी. तरुण ने भी भाभीभाभी कर के पूरे वक्त साथ रखा लेकिन रिंग सेरेमनी के वक्त स्टेज पर लड़की के रिश्तेदारों से परिचय कराया तो भाभी के रिश्ते से नहीं बल्कि, ‘ये मेरे बौस, मेरे गाइड राजीव सर की वाइफ हैं.’ कांटे से चुभे उस के शब्द, ‘सर की वाइफ’, यानी उस की कोई नहीं, कोई रिश्ता नहीं. तरुण को वापस तो मेरे ही साथ मेरे ही घर आना था. ट्रेन छूटते ही शिकायतों की पोटली खोल ली मैं ने. मैं तैश में थी, हालांकि तरुण गाड़ी चलते ही मेरा पुराना तरुण हो गया था. मेरा मुझ पर ही जोर न चल पाया, न उस पर. मौसम बदल रहे थे. अपनी ही चाल में, शांत भाव से. मगर तीसरे वर्ष के मौसमों में कुछ ज्यादा ही सन्नाटा महसूस हो रहा था, भयावह चुप्पियां. आंखों में, दिलों में और घर में भी.
तूफान तो आएंगे ही, एक नहीं, कईकई तूफान. वक्त को पंख लग चुके थे और हमारी स्थिति पंखकटे प्राणियों की तरह होती लग रही थी. मुझे लग रहा था समय को किस विध बांध लूं? तरुण की शादी की तारीख आ गई. सुनते ही मैं तरुण को झंझोड़ने लगी, ‘‘मेरा क्या होगा?’’ ‘परी का जादू कभी खत्म नहीं होगा,’ इस बार तरुण ने मुझे भविष्य की तसल्ली दी. मैं पूरा दिन पगलाई सी घर में घूमती रही मगर अम्माजी के मुख पर राहत स्पष्ट नजर आ रही थी. बातों ही बातों में बोलीं भी, ‘अच्छा है, रमेश भाईसाहब ने सही पग उठाया. छुट्टा सांड इधरउधर मुंह मारे, फसाद ही खत्म…खूंटे से बांध दो.’ मुझे टोका भी, कि ‘कौन घर की शादी है जो तुम भी चलीं लदफंद के उस के संग. व्यवहार भेज दो, साड़ीगहना भेज दो और अपना घरद्वार देखो. बेटियों की छमाही परीक्षा है, उस पर बर्फ जमा देने वाली ठंड पड़ रही है.’ अम्माजी को कैसे समझाती कि अब तो तरुण ही मेरी दुलाईरजाई है, मेरा अलाव है. बेटियों को बहला आई, ‘चाची ले कर आऊंगी.’ बड़े भारी मन से भोपाल स्टेशन पर उतरी मैं. भोपाल के जिस तालाब को देख मैं पुलक उठती थी, आज मुंह फेर लिया, मानो मोतीताल के सारे मोती मेरी आंखों से बूंदें बन झरने लगे हों. तरुण ने बांहों में समेट मुझे पुचकारा. आटो के साइड वाले शीशे पर नजर पड़ी, ड्राइवर हमें घूर रहा था. मैं ने आंसू पोंछ बाहर देखना शुरू कर दिया. झीलों का शहर, हरियाली का शहर, टेकरीटीलों पर बने आलीशन बंगलों का शहर और मेरे तरुण का शहर.
आटो का इंतजार ही कर रहे थे सब. अभी तो शादी को हफ्ताभर है और इतने सारे मेहमान? तरुण ने बताया, मेहमान नहीं, रिश्तेदार एवं बहनें हैं. सब सपरिवार पधारे हैं, आखिर इकलौते भाई की शादी है. सुन कर मैं ने मुंह बनाया और बहनों ने मुझे देख कर मुंह बनाया. रात होते ही बिस्तरों की खींचतान. गरमी होती तो लंबीचौड़ी छत थी ही. सब अपनीअपनी जुगाड़ में थे. मुझे अपना कमरा, अपना पलंग याद आ रहा था. तरुण ने ही हल ढूंढ़ा, ‘भाभी जमीन पर नहीं सो पाएंगी. मेरे कमरे के पलंग पर भाभी की व्यवस्था कर दो, मेरा बिस्तरा दीवान पर लगा दो.’ मुझे समझते देर नहीं लगी कि तरुण की बहनों की कोई इज्जत नहीं है और मां ठहरी गऊ, तो घर की बागडोर मैं ने संभाल ली. घर के बड़ेबूढ़ों और दामादों को इतना ज्यादा मानसम्मान दिया, उन की हर जरूरतसुविधा का ऐसा ध्यान रखा कि सब मेरे गुण गाने लगे. मैं फिरकनी सी घूम रही थी. हर बात में दुलहन, बड़ी बहू या भाभीजी की राय ली जाती और वह मैं थी. सब को खाना खिलाने के बाद ही मैं खाना खाने बैठती. तरुण भी किसी न किसी बहाने से पुरुषों की पंगत से बच निकलता. स्त्रियां सभी भरपेट खा कर छत पर धूप सेंकनेलोटने पहुंच जातीं. तरुण की नानी, जो सीढि़यां नहीं चढ़ पाती थीं, भी नीम की सींक से दांत खोदते पिछवाड़े धूप में जा बैठतीं. तब मैं और तरुण चौके में अंगारभरे चूल्हे के पास अपने पाटले बिछाते और थाली परोसते. आदत जो पड़ गई है एक ही थाली में खाने की, नहीं छोड़ पाए. जितने अंगार चूल्हे में भरे पड़े थे उस से ज्यादा मेरे सीने में धधक रहे थे. आंसू से बुझें तो कैसे? तरुण मनाते हुए अपने हाथ से मुझे कौर खिला रहे थे कि उस की भांजी अचानक आ गई चौके में गुड़ लेने…लिए बगैर ही भागी ताली बजाते हुए, ‘तरुण मामा को तो देखो, बड़ी मामीजी को अपने हाथ से रोटी खिला रहे हैं. मामीजी जैसे बच्ची हों. बच्ची हैं क्या?’
शहनाई की सुमधुर ध्वनियां, बैंडबाजों की आवाजें, चारों तरफ खुशनुमा माहौल. आज आस्था की शादी थी. आशा और निमित की इकलौती बेटी थी वह. आईएएस बन चुकी आस्था अपने नए जीवन में कदम रखने जा रही थी. सजतेसंवरते उसे कई बातें याद आ रही थीं.
वह यादों की किताब के पन्ने पलटती जा रही थी.
उस का 21वां जन्मदिन था.
‘बस भी करो पापा…और मां, तुम भी मिल गईं पापा के साथ मजाक में. अब यदि ज्यादा मजाक किया तो मैं घर छोड़ कर चली जाऊंगी,’ आस्था नाराज हो कर बोली.
‘अरे आशु, हम तो मजाक कर रहे थे बेटा. वैसे भी अब 3-4 साल बाद तेरे हाथ पीले होते ही घर तो छोड़ना ही है तुझे.’
‘मुझे अभी आईएएस की परीक्षा देनी है. अपने पांवों पर खड़ा होना है, सपने पूरे करने हैं. और आप हैं कि जबतब मुझे याद दिला देते हैं कि मुझे शादी करनी है. इस तरह कैसे तैयारी कर पाऊंगी.’
आस्था रोंआसी हो गई और मुंह को दोनों हाथों से ढक कर सोफे पर बैठ गई. मां और पापा उसे रुलाना नहीं चाहते थे. इसलिए चुप हो गए और उस के जन्मदिन की तैयारियों में लग गए. एक बार तो माहौल एकदम खामोश हो गया कि तभी दादी पूजा की घंटी बजाते हुए आईं और आस्था से कहा, ‘आशु, जन्मदिन मुबारक हो. जाओ, मंदिर में दीया जला लो.’
‘मां, दादी को समझाओ न. मैं मूर्तिपूजा नहीं करती तो फिर क्यों हर जन्मदिन पर ये दीया जलाने की जिद करती हैं.’
‘आस्था, तू आंख की अंधी और नाम नयनसुख जैसी है, नाम आस्था और किसी भी चीज में आस्था नहीं. न ईश्वर में, न रिश्तों में, न परंपराओं…’
दादी की बात को बीच में ही काट कर उस ने अपनी चिरपरिचित बात कह दी, ‘मुझे पहले अपनी पढ़ाई और कैरियर पर ध्यान देने दो. मेरे लिए यही सबकुछ है. आप के रीतिरिवाज सब बेमानी हैं.’
‘लेकिन आशु, सिर्फ कैरियर तो सबकुछ नहीं होता. न जाने भगवान तेरी नास्तिकता कब खत्म होगी.’
तभी दरवाजे पर घंटी बजी. आस्था खुशी में उछलते हुए गई, ‘जरूर रंजना मैडम का खत आया होगा,’ उस ने उत्साह से दरवाजा खोला. आने वाला विवान था, ‘ओफ, तुम हो,’ हताशा के स्वर में उस ने कहा. वह यह भी नहीं देख पाई कि उस के हाथों में उस के पसंदीदा जूही के फूलों का एक बुके था.
‘आस्था, हैप्पी बर्थडे टू यू,’ विवान ने कहा.
‘ओह, थैंक्स, विवान,’ बुके लेते हुए उस ने कहा, ‘तुम्हें दुख तो होगा लेकिन मैं अपनी सब से फेवरेट टीचर के खत का इंतजार कर रही थी लेकिन तुम आ गए. खैर, थैंक्स फौर कमिंग.’
आस्था को ज्यादा दोस्त पसंद नहीं थे. एक विवान ही था जिस से बचपन से उस की दोस्ती थी. उस का कारण भी शायद विवान का सौम्य, मृदु स्वभाव था. विवान के परिजनों के भी आस्था के परिवार से मधुर संबंध थे. दोनों की दोस्ती के कारण कई बार परिवार वाले उन को रिश्ते में बांधने के बारे में सोच चुके थे किंतु आस्था शादी के नाम तक से चिढ़ती थी. उस के लिए शादी औरतों की जिंदगी की सब से बड़ी बेड़ी थी जिस में वह कभी नहीं बंधना चाहती थी.
इस सोच को उस की रंजना मैडम के विचारों ने और हवा दी थी. वे उस की हाईस्कूल की प्रधानाध्यापिका होने के अलावा नामी समाजसेविका भी थीं. जब आस्था हाईस्कूल में गई तो रंजना मैडम से पहली ही नजर में प्रभावित हो गई थी. 45 की उम्र में वे 30 की प्रतीत होती थीं. चुस्त, सचेत और बेहद सक्रिय. हर कार्य को करने की उन की शैली किसी को भी प्रभावित कर देती.
आस्था हमेशा से ऐसी ही महिला के रूप में स्वयं को देखती थी. उसे तो जैसे अपने जीवन के लिए दिशानिर्देशक मिल गया था. रंजना मैडम को भी आस्था विशेष प्रिय थी क्योंकि वह अपनी कक्षा में अव्वल तो थी ही, एक अच्छी वक्ता और चित्रकार भी थी. रंजना मैडम की भी रुचि वक्तव्य देने और चित्रकला में थी.
आस्था रंजना मैडम में अपना भविष्य तो रंजना मैडम आस्था में अपना अतीत देखती थीं. जबतब आस्था रंजना मैडम से भावी कैरियर के संबंध में राय लेती, तो उन का सदैव एक ही जवाब होता, ‘यदि कैरियर बनाना है तो शादीब्याह जैसे विचार अपने मस्तिष्क के आसपास भी न आने देना. तुम जिस समाज में हो वहां एक लड़की की जिंदगी का अंतिम सत्य विवाह और बच्चों की परवरिश को माना जाता है. इसलिए घरपरिवार, रिश्तेनातेदार, अड़ोसीपड़ोसी किसी लड़की या औरत से उस के कैरियर के बारे में कम और शादी के बारे में ज्यादा बात करते हैं. कोई नहीं पूछता कि वह खुश है या नहीं, वह अपने सपने पूरे कर रही है या नहीं, वह जी रही है या नहीं. पूछते हैं तो बस इतना कि उस ने समय पर शादी की, बच्चे पैदा किए, फिर बच्चों की शादी की, फिर उन के बच्चों को पाला वगैरहवगैरह. यदि अपना कैरियर बनाना है तो शादीब्याह के जंजाल में मत फंसना. चाहे दुनिया कुछ भी कहे, अपने अस्तित्व को, अपने व्यक्तित्व को किसी भी रिश्ते की बलि न चढ़ने देना.’
आस्था को भी लगता कि रंजना मैडम जो कहती हैं, सही कहती हैं. आखिर क्या जिंदगी है उस की अपनी मां, दादी, नानी, बूआ या मौसी की. हर कोई तो अपने पति के नाम से पहचानी जाती है. उस का यकीन रंजना मैडम की बातों में गहराता गया. उसे लगता कि शादी किसी भी औरत के आत्मिक विकास का अंतिम चरण है क्योंकि शादी के बाद विकास के सारे द्वार बंद हो जाते हैं.
रंजना मैडम ने भी शादी नहीं की थी और बेहद उम्दा तरीके से उन्होंने अपना कैरियर संभाला था. वे शहर के सब से अच्छे स्कूल की प्राचार्या होने के साथसाथ जानीमानी समाजसेविका और चित्रकार भी थीं. उन के चित्रों की प्रदर्शनी बड़ेबड़े शहरों में होती थी.
आस्था को मैडम की सक्रिय जिंदगी सदैव प्रेरित करती थी. यही कारण था कि रंजना मैडम के दिल्ली में शिफ्ट हो जाने के बाद भी आस्था ने उन से संपर्क बनाए रखा. कालेज में दाखिला लेने के बाद भी आस्था पर रंजना का प्रभाव कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ा ही.
हमेशा की तरह आज भी उन का खत आया और आस्था खुशी से झूम उठी. आस्था ने खत खोला, वही शब्द थे जो होने थे :
‘प्रिय मित्र, (रंजना मैडम ने हमेशा अपने विद्यार्थियों को अपना समवयस्क माना था. बेटा, बेटी कह कर संबोधित करना उन की आदत में नहीं था.)
‘जन्मदिन मुबारक हो.
‘आज तुम्हारा 21वां जन्मदिन है जो तुम अपने परिवार के साथ मना रही हो और 5वां ऐसा जन्मदिन जब मैं तुम्हें बधाई दे रही हूं. इस साल तुम ने अपना ग्रेजुएशन भी कर लिया है. निश्चित ही, तुम्हारे मातापिता तुम्हारी शादी के बारे में चिंतित होंगे और शायद साल, दो साल में तुम्हारे लिए लड़का ढूंढ़ने की प्रक्रिया भी शुरू कर देंगे. यदि एक मूक भेड़ की भांति तुम उन के नक्शेकदम पर चलो तो.
जहां तक मेरी आंखें देख सकती थीं, समुद्र फैला हुआ था. पानी का रंग कभी नीला कभी हरा दिख रहा था और इस अलग रंग के मिश्रण को देख कर मुझे अजीब सा लगा. शाम का समय था. सूरज ढल रहा था. उस से निकल रही लाल, पीली, नारंगी किरणें सागर की लहरों पर पड़ कर दिल को लुभा रही थी.
दूर 2 पहाडि़यां, समुद्र के बीच मूर्ति की तरह खड़ा जहाज. मैं जिस जगह पर खड़ा हूं उस का नाम गो ग्रेटन है.
बैंकौक के आसपास के कई द्वीप प्राकृतिक सुंदरता से घिरे हुए हैं जो कई विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं और ‘गो ग्रेटन’ भी उन में से एक है.
बैंकौक से ‘ट्रंप’ के लिए 1 घंटे की उड़ान के बाद वहां से 1 घंटे की ड्राइव पर आप बोटयार्ड पहुंच जाएंगे. वहां से समुद्र के पार एक नाव की सवारी ‘गो ग्रेटन’ तक आप को पहुंचा जाएगी. मैं उस जगह के समुद्र के तट पर खड़ा हूं.
थाईलैंड के पूरे रास्ते में सब से खूबसूरत हरियाली देखने को मिली. यह जगह लगभग जंगल है. लेकिन, अच्छी आधुनिक सुविधाओं वाले रिजौर्ट हैं. ऐसी जगह मैं अकेला आ कर रहा हूं.
ठीक है, जगह के बारे में बहुत कुछ बता दिया. अब मेरे बारे में बताए बिना कहानी आगे कैसे बढ़ेगी.
मैं… नहीं… मेरा नाम जानना चाहते हैं? मेरा नाम स्नेहन है. मैं एक मशहूर मल्टीनैशनल कंपनी का ऐग्जीक्यूटिव हूं. मेरा काम चेन्नई, भारत में है. मैं 50 साल का हूं. मेरी जिंदगी के 2 पहलू हैं. एक है मेरी पैदाशी से 50 साल तक की मेरी जिंदगी. मैं अपने बचपन से ले कर अपनी 50वीं उम्र तक सफलता के शिखर तक बिना किसी रुकावट ही पहुंच गया. यह चमत्कार देख कर मैं भी अकसर सोचता था शायद मेरा जन्म बहुत ही उचित समय में हुआ था. अपने व्यवसाय में मेरी सफलता ने नई ऊंचाइयों को छूआ. मेरी ताबड़तोड़ सफलता को देख कर सब लोग सम झते थे कि मेरे पास एक सुनहरा स्पर्श है. मैं सीना चौड़ा कर गर्व के साथ कह सकता था कि मैं एक सफल इंसान हूं.
आप के मन में शायद यह शक पैदा हुआ होगा कि इतना सफल आदमी इस सौंदर्य जगह पर सागर के किनारे अकेला क्यों बैठा है?
मेरे यहां अकेले आने और इस समुद्र को देखने के पीछे एक बहुत बड़ी त्रासदी छिपी हुई है.
आप अचंबित हैं कि एक इंसान जो खुद को सफल घोषित कर रहा था अब त्रासदी के बारे में बात कर रहा है. हां, यही मेरी जिंदगी का दूसरा पहलू है. मेरी जिंदगी ने पूरी की पूरी पलटी मारी और सफलता से मेरा नाता अचानक टूट गया. मेरे काम के क्षेत्र में और मेरी निजी जिंदगी दोनों में मु झे एक के बाद एक झटके लगने लगे.
सफलता ने मुझे कितनी खुशी दी उस से ज्यादा दुख असफलता ने मु झे दिया. जिंदगी में सिर्फ सफलता को ही देख कर परिचित हुए मेरे मन ने इस असफलता को अपनाने से इनकार कर दिया.
मेरा बेटा जो एक निजी इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ रहा था, नशे का आदी होने की वजह से कालेज से निकाल दिया गया था.
मेरी बेटी जो मेरे बेटे से बड़ी है वह कंप्यूटर कंपनी में काम कर रही थी और हमारी इच्छा के विरुद्ध किसी दूसरे राज्य के लड़के से शादी रचाने के लिए हमारी जानकारी के बिना चेन्नई छोड़ विदेश चली गई. मेरी पत्नी इस सदमे को सहन नहीं कर सकी और मानसिक अवसाद में डूब गई.
इतनी बुरी परिस्थिति में भी मैं ने अपना मानसिक संतुलन नहीं खोया, यह सोच कर कभीकभी मैं खुद हैरान हो जाता हूं. दुख कभी अकेला नहीं आता यह कहावत शायद मेरे लिए ही लिखी होगी.
अब तक हर क्षेत्र में सफलता चख कर उस का आनंद लेने के बाद मेरे पास इस लगातार असफलताओं के बो झ को सहन करने की ताकत, मानसिक शक्ति नहीं थी.
नतीजा यह हुआ कि मैं इस सुनसान टापू की तलाश में अकेला ही आ गया. मेरे पास अब जीवन में कुछ भी नहीं है. हर तरफ अंधेरा ही दिख रहा. मुझे नहीं पता कि इस हालत को कैसे संभालूं?
मेरा मन बारबार एक ही रास्ता बता रहा था. इन लोगों और दुनिया को देखे बिना इस जगह पर खुद को मिटा देना हां आत्महत्या कर डालना…
इसे सुन कर आप और हैरान होंगे कि पागल अपने ही शहर में एक सैकंड में ऐसा करने के कई तरीके हैं, तुम्हें इतनी दूर आने की क्या जरूरत है?
मृत्यु पर विजय प्राप्त करना मनुष्य की पहुंच से परे एक हार है. मैं जानता था कि मृत्यु को गले लगाना एक प्रकार का पराजय ही है और उसे मैं जानपहचान वाले लोगों के सामने कर के खुद एक मजाक नहीं बनना चाहता था. मैं इस अनदेखी जगह में आ कर आत्महत्या करूंगा तो किसी को पता ही नहीं चलेगा.
इस दुनिया में मेरे जाने पर रोने वाला कोई नहीं. न मेरा बेटा आंसू बहाएगा न मेरी बेटी. मेरी पत्नी तो उसे सम झने की मानसिक स्थिति में है ही नहीं. मगर खुद को खत्म कहां और कैसे करूं? मैं दुनिया की नजरों के लिए अदृश्य होना चाहता हूं.
आज की रात मेरे इरादे को पूरा करने के लिए एकदम सही रात है. मु झे बस इतना करना है कि सीधे समुद्र में चलें.
मैं ने अपनी बगल वाले कमरे में एक विदेशी महिला को देखा. कौन इस द्वीप पर रात में घूमने जा रहा है जहां दिन के समय में भी भीड़ नहीं होती है?
बॉलीवुड में अपने हुनर से जगह बनाने वाली एक्ट्रेस शहनाज गिल की थैंक यू फॉर कामिंग’ मूवी जल्द ही सिनेमाघरों में दस्तक देने वाली है. इस फिल्म को लेकर शहनाज काफी चर्चाओं में आए है. फिल्म ‘थैंक यू फॉर कामिंग’ में वह एकता कपूर के प्रोडक्शन में काम कर रही हैं. इस फिल्म में शहनाज के साथ भूमी पेडनकर, कुशा कपिला, डॉली सिंह और शिबानी बेदी अहम भूमिकाओं मे नजर आ रही है. एक इंटरव्यू में शहनाज ने बताया कि फिल्म में काम करने का अनुभाव क्या रहा है.
शहनाज ने बताया सेट का अनुभाव
वैसे तो शहनाज गिल के दिल में जो होता वह सब कह देती है. बिग बॉस में भी बेबाकी से लोगों के दिलों अपनी जगह बनाई है. अब वह एकता कपूर के साथ सेक्स कॉमेडी ‘थैंक यू फॉर कामिंग’ में काम करने का मौका मिला है. वहीं शहनाज ने एक मीडिया इंटरव्यू में उन्होंने फिल्मों में काम करने का अनुभाव शेयर किया है. उनसे पूछा गया कि क्या बराबरी से व्यवहार हुआ? इस पर शहनाज ने कहा कि, हां इस सेट में तो सीरियसली मुझे ऐसा फीलिंग आई. मुझे लगा जैसे…होगा इधर भी कि बड़े लोगों को अलग दिखाया जाता है और छोटे लोगों का साइड किया जाता है. लेकिन इधर ऐसा कुछ नहीं था.
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मैं क्या ही बोलूं अब
शहनाज आगे बताती है कि प्रोडक्शन का भी बहुत बड़ा रोल है. इन्होंने एक परसेंट भी फील नहीं होने दिया ये लड़की मेन लीड है, तुम कैरेक्टर्स हो साइड के. बिल्कुल ना. पूरी वैनिटी में भी अच्छा था. उसी समय बुलाते थे जब शॉट होता था, यह बहुत ही इम्पॉर्टेंट चीज है. हर चीज में बराबरी से ट्रीट किया गया है, मैं अब क्या ही बोलूं.
शहनाज ने बताया, हर सेट में ऐसा नहीं होता. मुझे ये चीज अच्छी लग रही है कि मैं एक्सपीरियेंस कर रही हूं. जरूरी नहीं है कि लोग बोलते हैं ना अच्छे लोग नहीं होते बॉलीवुड में, ऐसा नहीं है. बहुत अच्छे लोग हैं. वो डिपेंड करता है लोग कौन हैं. बता दें कि इससे पहले शहनाज गिल ने सलमान खान के साथ किसी का भाई किसी की जान में काम किया था.
बॉलीवुड एक्ट्रेस अनन्या पांडे और एक्टर आदित्य रॉय कपूर काफी समय से दोनों एक-साथ स्पॉट होते रहते है. पिछले महीने से दोनों एक-दूसरे को डेट कर रहे है. कभी वह वीकेशन तो कभी लांच और डिनर डेट के लिए अक्सर साथ नजर आते है. हालांकि दोनों ने इस रिश्ते को अभी ऑफिशियल नहीं किया है. लेकिन बॉलीवुड इंडस्ट्री में इनके प्यार की काफी चर्चा है. अभी हील ही में बीते मंगलवार को दोनों ही साथ में स्पॉट हुए है.
आदित्य और अनन्या मूवी देखने पहुंचे
बॉलीवुड का नया कपल आदित्य रॉय कपूर और अनन्या पांडे मंगलवार को ‘थैंक यू फॉर कमिंग’ की स्क्रीनिंग पर पहुंचे थे. इस शानदार स्क्रीनिंग पर बॉलीवुड के तमाम सितारे नजर आए थे. जिसमें ये दोनों कपल भी साथ नजर आए थे.
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आदित्य रॉय कपूर-अनन्या लोगों ने बेस्ट कपल
अनन्या पांडे-आदित्य रॉय कपूर की इन तस्वीरों को देखने के बाद लोगों ने उन्हें बेस्ट कपल तक बता डाला. आपको बता दें कि अनन्या पांडे-आदित्य रॉय कपूर के अफेयर को लेकर कई दिनों से खबरें आ रही हैं.
दरअसल, साल की शुरुआत में पहली बार आदित्य रॉय कपूर और अनन्या पांडे एक फैशन वीक के रैंप वॉक पर एक साथ नजर आए थे. वहीं फरवरी में कियारा आडवाणी और सिद्धार्थ मल्होत्रा के मुंबई रिसेप्शन में भी उन्हें एक साथ देखा गया था. उसके बाद आदित्य की बेव सीरिज की स्क्रीनिंग के दौरान अनन्या पांडे एक्टर की चीयर करती नजर आई थी.
पुर्तगाल में रोमांटिक अंदाज में नजर आए थे
अनन्या और आदित्य ने पुर्तगाल में एकदूसरे के साथ अच्छा समय गुजारा था. वहीं स्पेन में लाइव कॉन्सर्ट के बाद लिस्बन के एक रेस्तरां में एक-साथ देखा गया था. इससे पहले लिस्बन से कई तस्वीरें खूब वायरल हुई थी, जिसमें आदित्य अनन्या को हग करते नजर आए थे. इन्हीं तस्वीरों से दोनों ने अपने रिलेशनशिप पर मुहर लगाई थी.
अनन्या की फिल्में
अनन्या पांडे की वर्कफ्रंट की बात करें तो हाल ही में एक्ट्रेस ड्रीम गर्ल 2 में नजर आई थी. इसके बाद वह खो गए हम कहां में नजर आएंगी. वहीं विक्रमादित्य मोटावानी की अपकमिंग साइबर थ्रिलर कंट्रोल में नजर आएंगी. वहीं आदित्य मेट्रो इन दिनों में दिखाई देंगे.
फैस्टिवल्स में साङी खरीदने का प्लान बना रही हैं, तो बाजार में साड़ियों की कई रेंज उपलब्ध हैं. मगर आजकल सब से अधिक जो साड़ी ट्रेंड में है वह है हैंडलूम साड़ी. हैंडलूम साड़ियां कारीगरों के द्वारा हाथों से बनाई जाती हैं. इन की बड़ी विशेषता यह है कि इन में प्रयोग किया जाने वाला मैटीरियल ईको फ्रैंडली और नैचुरल होता है. साथ ही ये साड़ियां कभी भी आउट औफ फैशन नहीं होतीं.
इसलिए इन पर खर्च किया गया पैसा कभी भी अखरता नहीं है. पर कई बार ऐसा होता है कि हम अच्छीखासी महंगी साड़ी खरीद लाते हैं पर घर आ कर हमें उस का कलर या डिजाइन पसंद नहीं आता.
कुछ इसी तरह की समस्याओं से बचने के लिए हम आप को कुछ टिप्स बता रहे हैं, जिन का ध्यान रख कर आप बेझिझक हैंडलूम साड़ियां खरीद सकती हैं :
क्या होता है हैंडलूम
लकड़ी का लूम जिस पर कई प्रकार और रंगों के धागों के द्वारा कारीगरों के हाथों से साड़ी की बुनाई की जाती है उसे हैंडलूम कहा जाता है. चूंकि लूम पर हाथों से बुनाई की जाती है इसलिए इसे हैंडलूम साड़ी कहा जाता है.
हाथों से बनाए जाने के कारण ही इन साङियों की डिजाइन और क्वालिटी मशीन पर बनी साड़ियों से अलग होती हैं और इसलिए इन्हें पहन कर आप भीड़ में भी अपना अलग व्यक्तित्व बना लेते हैं क्योंकि इन की कभी भी नकल नहीं हो सकती.
कलर हो सब से खास
हर रंग हर इंसान पर नहीं फबता. फेअर या पेल कौंप्लैक्शन पर ब्राइट रंग और मैरून, डार्क पिंक, ग्रीन कलर डस्की या सांवले रंग पर खूब फबते हैं. इसलिए साड़ी खरीदते समय अपनी स्किन टोन का ध्यान जरूर रखें.
बजट निर्धारित करें
हैंडलूम साड़ियां हर रेंज में बाजार में उपलब्ध हैं. खरीदने जाने से पहले आप अपना बजट तय कर लें फिर उसी के अनुसार दुकानदार से साड़ियां दिखाने को कहें क्योंकि कई बार बजट तय न होने पर दुकानदार अधिक रेंज की साड़ियां दिखाना शुरू करता है और हम अपने बजट से अधिक की साड़ी खरीद कर ले आते हैं। फिर बहुत पछताते भी हैं इसलिए बाद में पछताने की अपेक्षा पहले से ही अपना बजट तय कर के जाएं.
बौडी टाइप का रखें ध्यान
दुबलेपतले शरीर पर हैवी बौर्डर वाली, ओवरवेट शरीर पर बिना बौर्डर या एकदम पतले बौर्डर वाली और हैवी बौडी पर प्लेन या माइल्ड प्रिंट की साड़ी फबती है.
जीआई टैग देखें
हैंडलूम की सभी साड़ियों पर हथकरघा विभाग अपना टैग देता है. इसे देख कर ही आप साड़ी खरीदें ताकि आप किसी भी प्रकार की चीटिंग से बचीं रहें. बनारसी और सिल्क की साड़ियों पर सिल्क मार्क देखना भी बेहद जरूरी होता है.
देखभाल सुनिश्चित करें
साड़ी खरीदने के साथ ही दुकानदार से साड़ी की देखभाल के बारे में जरूरी जानकारी ले लें ताकि उस के अनुसार आप अपनी साड़ी को सुरक्षित रख सकें. एक बार पहनने के बाद अच्छी तरह से पोंछ कर फिर साड़ी कवर में रखें। यदि आप ने गरमी में साड़ी पहनी है तो ड्राईक्लीन करा कर ही रखें अन्यथा पसीने का दाग साड़ी को खराब कर सकता है.
रखें इन बातों का भी ध्यान
आमतौर पर महिलाओं को हॉफ स्लीव्स कपड़े पहनना बेहद पसंद होता है. खासकर गर्मियों में हॉफ स्लीव्स कपड़े पहनना सभी को अच्छा लगता है. लेकिन हमारे त्वचा में कई प्रॉब्लम होते है जिस वजह हॉफ स्लीव्स कपड़े पहनने के लिए सोचना पड़ता है. इसी में से एक समास्या है डार्क अंडरआर्म्स की. वैक्सिंग के बावजूद और रेजर के इस्तेमाल करने से अंडरआर्म्स के हेयर्स तो क्लीन हो जाते है लेकिन बाद में स्किन डार्क हो जाती है. बार-बार अंडरआर्म्स के कालेपन से महिलाएं अपने मन मुताबिक कपड़े नहीं पहन पाती. कई बार कालेपन की वजह से शर्मिंदा महसूस होती है. अगर आप भी डार्क अंडरआर्म्स से परेशान तो अपनाएं ये होममेड टिप्स.
डार्क अंडरआर्म्स के ये आसान टिप्स
नींबू विटामिन सी से भरपूर होता है. आप एक नींबू लें उसको दो भाग में काट लें इसके बाद अपने अंडरआर्म्स पर हल्के हाथ से नींबू से स्क्रब करें. नींबू को 5-10 मिनट तक लगे रहने दे. साफ पानी से इसको धो लें.
2. बेकिंग सोडा
बेकिंग सोडा अंडरआर्म्स के कालेपान को दूर करने में सबसे करगार तरीका है. इसके लिए आप दो चम्मच एप्पल साइडर विनेगर में दो चम्मच बेकिंग सोडा डालकर एक पेस्ट तैयार करें. पेस्ट को घोलते वक्त इसमें बुलबुले आने लगेंगे, जब ये बुलबुले कम हो जाएं तो इसे अपने अंडरआर्म पर लगाएं और 5 से 10 मिनट तक सूखने दें. इसके बाद ठंडे पानी से धो लें.
3. हल्दी
हल्दी में एंटी बैक्टीरियल गुण मौजूद होते है इसके साथ ही हल्दी स्किन को चमक देने में मदद करती है. सबसे पहले आप एक कटोरी में हल्दी, शहद और दूध लें. इन सभी को आपस में अच्छी तरह से मिलाएं उसके बाद अंडरआर्म पर लगाएं. 15 मिनट के बाद इसे धो लें.
4. एलोवेरा
एलोवेरा स्किन को हाइड्रेट रखता है इसमें एंटी बैक्टीरियल पाएं जाते है और यह ठंड़ा होता है. आप नेचुरल एलोवेरा की पत्ती लें उसका जेल निकाल लें. इस जेल को अंडरआर्म्स पर लगाएं. और इसे लगभग 10-15 मिनट तक लगा रहने दें. इसके बाद ठंडे पानी से धो लें.
5. आलू
आलू अंडरआर्म्स कालेपन को दूर करने के लिए सबसे आसान और किफायती तरीका है. सबसे पहले आप एक आलू लें उसे कद्दूकस करके उसका रस निकाल लें. उसके बाद इस रस को कॉटन की मदद से सीधे अंडरआर्म्स पर लगाएं. करीब 10 मिनट बाद इसे ठंडे पानी से धो लें.
जमानाकहां से कहां पहुंच गया पर मिसेज शर्मा अभी भी पुरानी सदी का अजूबा हैं. मगर सम?ाती अपनेआप को मौडर्न. यह बात और है कि नईनई चीजों से उन्हें डर लगता है, पर पंगा घर में आने वाली हर नई वस्तु से लेना होता है. फिर चाहे वह स्मार्ट फोन हो, आईपौड हो या सीडी अथवा डीवीडी प्लेयर. वैसे तो अब ये सब आउट औफ फैशन हो गए हैं.
कितना हसीन था वह दिन जब शर्मा परिवार तैयार हो कर स्मार्ट फोन लेने गया था. एक तूफान से बेखबर बच्चों ने स्मार्ट फोन पसंद कर लिया और घर पहुंचतेपहुंचते उस का असर मिसेज शर्मा के सिर चढ़ कर बोलने लगा था.
जैसे ही फोन की घंटी बजी तो उन्होंने ऐसे चौंक कर उठाया मानो वह कोई बम हो, जो अगर जल्दी नहीं उठाया तो फट जाएगा.
बच्चे भी बातबात पर कहते, ‘‘ममा, क्या होगा आप का?’’
‘‘अब क्या होना,’’ एक लंबी सांस खींच कर वे कहतीं, ‘‘मेरा जो होना था वह हो गया है.’’
बच्चों ने सम?ाया, ‘‘ममा यह स्मार्ट फोन है.’’
‘‘लो अब बोलो. स्मार्ट तो इंसान होते हैं… कहीं फोन भी स्मार्ट होते हैं? अब इस फोन में ऐसा क्या है, जो मु?ा में नहीं?’’ मिसेज शर्मा तुनक कर बोलीं.
तब बच्चों ने सम?ाया, ‘‘इस में सोशल नैटवर्किंग होती है जैसे फेसबुक, ट्विटर, याहू कर सकते हैं.’’
‘‘लो बोलो ‘याहू’ तो मैं भी कर सकती हूं शम्मी कपूर को मैं ने एक पिक्चर में ‘याहू’ करते देखा है. फेसबुक पर क्या होता है?’’ उन्होंने पूछा.
‘‘उस पर हम अपने दोस्तों के साथ चैटिंग कर सकते हैं. कमैंट्स पढ़ते हैं.’’ बच्चों ने बताया.
‘‘अच्छा, हमारी किट्टी पार्टी की तरह.’’
‘‘ममा, क्या होगा आप का? कहां स्मार्ट फोन और कहां किट्टी पार्टी.’’
मिसेज शर्मा ने बच्चों को समझया, ‘‘किट्टी पार्टी में भी तो हम एक
से एक नए कपड़े पहन कर जाते हैं ताकि बाकी तारीफ करने वाली महिलाएं तारीफ करें और जलने वाली जलें… चैटिंग तो हम भी करते हैं. आप लोग जो स्टेटस डालते हो वह तो पुराना हो जाता है. हमारा तो लाइव टैलीकास्ट होता है. जलवा दिखाओ और हैंड टू हैंड कमैंट्स ले लो.’’
‘‘ममा, आप कहां की बात कहां ले जाती हैं.’’
जब बच्चे पहली बार लैप्पी यानी लैपटौप ले कर आए तो फिर उन के दिमाग ने उस के सिगनल पकड़ने शुरू कर दिए.
उन्होंने उसे बड़े प्यार से उठाया और अपनी गोद में बैठाया जैसे छोटे बच्चे को बैठाते हैं. फिर उसे गरदन गिरागिरा कर देखने लगीं. समझ नहीं आ रहा था कि कैसे चलेगा? जब 15-20 मिनट की जद्दोजेहद के बाद भी नहीं चला पाईं तो बच्चों ने फिर ममा, ‘‘क्या होगा आप का?’’ डायलौग दोहराया. फिर उन के प्लीज कहते ही उन्होंने पलक झपकते उसे चला दिया. वे उन के टेक सेवी होने पर बलिहारी हो गईं. पर फिर वही मुसीबत कि अब क्या करूं? कंप्यूटर को तो माउस घुमाघुमा कर चला लेती थीं, गाने सुन लेती थीं, गेम खेल लेती थीं.
पर इस माउस ने उन्हें बहुत दौड़ाया. उन की चीखें निकाली हैं. अकसर उन का और माउस का आमनासामना रसोई में हो जाता था. फिर तो ‘आज तू नहीं या मैं नहीं’ वाली स्थिति उत्पन्न हो जाती थी पर जीत हमेशा उस की ही होती थी. पर कंप्यूटर के माउस को उन्होंने खूब घुमाया और अपना बदला पूरा किया.
अब इस लैप्पी के ‘टचपैड’ को कैसे औपरेट करूं? गाने सुनना चाहती हूं तो वह गेम खोल देता है. सिर खुजाखुजा कर वे परेशान हो गई थीं. तभी हाथ से चाय का प्याला छलका और चाय लैपटौप पर जा गिरी. बच्चों को पता न चले इसलिए फटाफट उसे धोने चली गईं और फिर धो कर अच्छी तरह कपड़े से सुखा दिया.
पर यह क्या? लैप्पी को तो जैसे किसी की नजर लग गई? वह चल ही नहीं रहा था यानी उसे मिसेज शर्मा की हाय. ओ नहीं, चाय लग गई थी. 2 दिन लैप्पी कंप्यूटर क्लीनिक में रह कर आया, बेचारा. तभी चलने लायक हुआ.
तब बच्चों ने फरमान सुनाया, ‘‘ममा, अब आप इस से दूर ही रहना.’’
पर अब लगता है उन का सीपीयू कुछकुछ काम कर रहा है और इस का नैटवर्क अलग ही सिगनल पकड़ रहा है, उड़तीउड़ती खबर सुनी है कि घर में ‘आईपैड’ आने वाला है यानी अब उन का बेड़ा पार है और आईपैड का बंटाधार है.