वह मरीन ड्राइव पर असमंजस में खड़ी थी एक गाड़ी उस के पास आ कर रुकी.
‘‘अरे सुनयना?’’ मोहित ने कहा, ‘‘तुम यहां कैसे?’’
‘‘मैं यहां किसी काम से आई थी और अचानक जोरों की बारिश शुरू हो गई. कोई टैक्सी भी दिखाई नहीं दे रही.’’
‘‘तो यहां खड़ी भीग क्यों रही हो? मैं इसी बिल्डिंग में रहता हूं. चलो मेरे यहां चल कर थोड़ी देर बैठो. बारिश रुक जाए तो चली जाना.’’
मोहित के घर उस की मां ने उस का स्वागत किया. थोड़ी देर बाद चाय के साथ हलवा और मठरी ले कर आई.
‘‘ओहो आंटीजी इतना कष्ट क्यों किया?’’
‘‘तुम पहली बार हमारे यहां आई हो. ऐसे कैसे जाने दूं. यह लो हलवा खाओ.’’
‘‘मेरी मां बहुत स्वादिष्ठ खाना बनाती हैं,’’ मोहित ने कहा, ‘‘अरे हां, इस शनिवार को मेरा जन्मदिन है. तुम्हें आना है.’’
‘‘आऊंगी,’’ सुनयना सूखे कंठ से बोली, ‘‘अच्छा अब चलती हूं.’’
मोहित ने घर पर पार्टी रखी थी. उस की मां ने खाना बना कर मेज पर सजा दिया और कहा, ‘‘अब तुम बच्चे लोग ऐंजौय करो.’’
पार्टी में खूब शोरशराबा हुआ. मोहित ने कहा, ‘‘आज मैं अपने यार रजत को बहुत मिस कर रहा हूं. अरे हां, अच्छा याद आया. उस ने कहा था कि वह मेरे लिए एक तोहफा भेज रहा है. एक सरप्राइज गिफ्ट.’’
सुनयना का चेहरा फक पड़ गया.
‘‘लगता है भूल गया. आने दो वापस बच्चू को. तोहफा मय सूद वसूल लूंगा.’’ फिर जब उस ने जाना कि सुनयना नरीमन प्वाइंट स्थित एक होटल में काम करती है, तो बोला, ‘‘अरे तब तो हम पड़ोसी हुए. किसी दिन मैं तुम से मिलने आऊंगा.’’
‘‘अवश्य, मुझे भी मेहमाननवाजी का मौका दो.’’
एक दिन मोहित आया तो दोनों ने इकट्ठे चाय पी. फिर वे मरीन ड्राइव पर टहलते हुए चौपाटी की ओर निकल गए. फिर वे करीब रोज ही मिलने लगे. कभी चौपाटी पर चाट खाते, कभी समंदर के किनारे चट्टानों पर बैठे घंटों बातें करते. बातों के दौरान मोहित ने उसे बताया कि कालेज के दिनों से ही वह उसे चाहता था. वह बोला, ‘‘मुझे अभी तक याद है वह दिन, जब तुम ने स्टेज पर मौडलिंग की थी. हम चारों दोस्त तुम्हारे लिए पागल थे. पर रजत ने कहा ‘हैंड्स अप यह शिकार मेरा है.’ जब वह मैदान में कूद पड़ा तो हम पीछे हट गए, क्योंकि हम जानते थे कि उस से मुकाबला करना आसान नहीं था. वह जब किसी चीज को हासिल करने का मन बना लेता है तो कोई उस के आड़े नहीं आ सकता.’’
सुनयना हलके से मुसकराई. उस का मन हुआ कि वह मोहित को अपने बारे में बता दे कि कैसे रजत के प्यार में पड़ कर वह अधर में लटकी है. पर उस ने चुप्पी साथ ली.
रशिया से 2-4 बार रजत का ईमेल आया. एक बार उस ने लिखा था कि मुझे यहां शायद 3 महीने तक रहना पड़ेगा. फिर अचानक वह आ पहुंचा और आते ही उसने सुनयना को फोन किया, ‘‘हम कब मिल रहे हैं? मैं तुम्हें देखने को तरस गया. इस रविवार को तुम फ्री हो?’’
‘‘नहीं, रविवार को तो मैं फ्री नहीं हूं.’’
‘‘क्यों?’’
‘‘उस रोज मेरी मंगनी है.’’
‘‘क्या?’’ रजत मानों आसमान से गिरा, ‘‘ये क्या कह रही हो? तुम मेरी हो. किसी और से तुम्हारी मंगनी कैसे हो सकती है? मैं तुम्हें किसी और की नहीं होने दूंगा.’’
‘‘लेकिन तुम भी तो मुझे अपनाना नहीं चाहते,’’ सुनयना ने उलाहना
दिया, ‘‘जब मेरे मातापिता को पता चला कि तुम्हारा मुझ से शादी करने का कोई इरादा नहीं है, तो उन्होंने मुझ पर दबाव डाल कर मुझे इस शादी के लिए राजी कर लिया.’’
‘‘किस से हो रही है मंगनी?’’
‘‘है एक लड़का. और ज्यादा जान कर क्या करोगे?’’
‘‘ऐसा हरगिज नहीं हो सकता. मैं अभी तुम से मिलने होटल आ रहा हूं.’’
‘‘लेकिन मैं ने होटल की नौकरी छोड़ दी है.’’
‘‘तो कहां हो तुम, घर पर?’’
‘‘नहीं और मैं तुम्हें बताऊंगी भी नहीं कि मैं कहां हूं. मैं जानती हूं कि तुम यहां आ कर एक हंगामा खड़ा करोगे. बस अब आइंदा मुझे फोन मत करना और न मिलने की कोशिश करना. हमारातुम्हारा रिश्ता खत्म,’’ कह कर सुनयना ने फोन रख दिया.
थोड़ी देर बाद मोहित का सैलफोन बज उठा.
‘‘यार मैं रजत बोल रहा हूं.’’
‘‘बोलो मेरे बिगडे़ेदिल शहजादे, रशिया से कब लौटे?’’
‘‘कल ही. और सुना तेरी जन्मदिन की पार्टी कैसी रही?’’
‘‘बहुत बढि़या पर तू होता तो और मजा आता. तू तो हर महफिल की जान है.’’
‘‘और मेरा भेजा तोहफा कैसा लगा?’’
‘‘तोहफा? वह तो सचमुच शानदार था, अनूठा था. मुझे बहुत पसंद आया.’’
‘‘सच? है न वह एक लाजवाब चीज?’’
‘‘हां. मैं तो उसे 1 मिनट के लिए भी अपने से अलग नहीं करता हूं.’’
‘‘यह क्या कह रहा है तू?’’
‘‘सच कह रहा हूं. इतनी सुंदर कलाई घड़ी आज तक मैं ने नहीं देखी. हमेशा पहने रहता हूं.’’
‘‘ओह,’’ रजत हंसने लगा, ‘‘मैं कुछ और ही समझ था.’’
‘‘क्या समझा था तू?’’
‘‘छोड़ जाने दे.’’
‘‘रशिया कैसा देश है और मास्को कैसा शहर है?’’
‘‘दोनों बकवास हैं पर वहां की लड़कियां एक से एक बढ़ कर एक हैं. अपने यहां की लड़कियां तो उन के सामने कुछ भी नहीं हैं.’’
‘‘अच्छा…’’
‘‘हां मैं ने तो एकाध को न्योता भी दे दिया भारत आने का. आएगी तो कुछ धमाल करेंगे.
अरे हां, तुम ने सुना अपनी सुनयना शादी कर रही है?’’
‘‘अच्छा, पर उस का तो तेरे साथ चक्कर चल रहा था?’’
‘‘वह सिलसिला खत्म समझे. वह शादी के लिए मेरे पीछे पड़ी थी तो मैं ने उस से पीछा छुड़ा लेने का निश्चय कर लिया. तू तो जानता है मुझे, मैं मस्तमौला हूं. अपनी मरजी का मालिक. मैं बिंदास जिंदगी जीना चाहता हूं. मुझे किसी तरह की बंदिश गवारा नहीं, किसी तरह का बंधन बरदाश्त नहीं. और एक सुनयना गई तो क्या हुआ? तालाब में और भी मछलियां हैं. खैर छोड़, इस रविवार को तू क्या कर रहा है? मेरे घर आ जा अड्डा जमाते हैं, कुछ मौजमस्ती करते हैं.’’
‘‘इस रविवार को तो मैं फ्री नहीं हूं.’’
‘‘क्यों?’’
‘‘उस दिन मेरी सगाई है.’’
‘‘सगाई? ये अचानक सगाई की हवा कैसे बहने लगी? जिसे देखो वही सगाई कर रहा है. खैर, ये बता लड़की कौन है?’’
‘‘है एक…’’
‘‘कहीं सुनयना तो नहीं?’’ रजत ने शंकित हो कर पूछा.
‘‘हां वही है.’’
थोड़ी देर सन्नाटा छाया रहा. फिर रजत ने एक भद्दी गाली दी और जोर से अपना मोबाइल फोन जमीन पर दे मारा.