शारदा मैम: भाग 1- आखिर कार्तिक को किसने ब्लैकमेल किया ?

मुंबई, सपनों की ऊंची उड़ान मुंबई, सपनों का शहर मुंबई, कहते हैं मुंबई शहर में व्यक्ति भूखा उठता है, लेकिन भूखा सोता नहीं है. लाखों युवकयुवतियां आंखों में सपनों के दीप जलाए मुंबई पहुंचते हैं. लेकिन कुछ युवकयुवतियों के सपने पूरे होते हैं और कुछ के सपने दम तोड़ देते हैं. कई मौत को भी गले लगा लेते हैं क्योंकि यथार्थ का धरातल बड़ा कठोर होता है. संघर्ष से घबरा जाते हैं. प्रेम, प्यार, रोमांस संघर्ष और सपनों का गवाह बनता है मुंबई का मरीन ड्राइव. प्रेमियों और संघर्षरत लोगों की मनपसंद जगह मरीन ड्राइव.

आज मरीन ड्राइव की भीड़ में शाम के समय एक युवक बैठा था. सड़क की तरफ पीठ किए समंदर की तरफ चेहरा. समंदर की लहरें किनारों से टकरा कर शोर मचाती हुई वापस समंदर में मिल जाती थीं. कुछ लहरें ज्यादा जोशीली हुईं तो युवक के पैरों को भिगो कर चली जातीं. छोटीछोटी चट्टानों के पीछे छिपे केकड़े रहरह कर ?ांक लेते थे समंदर को, फिर दुबक जाते थे बड़ेबड़े पत्थरों के पीछे.

लगभग 25 वर्ष के उस युवक का नाम कार्तिक था. चेहरे पर चिंता और सोच की परछाईं थी. हवा उस के माथे पर बिखरे बालों को थोड़ा और बिखेर देती थी. चेहरे पर हलकीहलकी

दाढ़ी थी. लंबी नाक, कमान सी खिंची आंखों में तनाव भी झलक रहा था. खिलता हुआ रंग और लंबा कद.

रोशनी से झिलमिल करती गगनचुंबी इमारतें. समंदर का पानी रोशनी में झिलमिल कर रहा था. कार्तिक शायद खयालों में इतना डूबा था कि उसे बज रहे मोबाइल की आवाज भी सुनाई नहीं दे रही थी. मोबाइल की मधुर ध्वनि लगातार शोर कर रही थी. तभी फेरी वाला लड़का जो वहीं घूमघूम कर पौपकौर्न बेच रहा था, वह रुक गया. एक पल रुका फिर कार्तिक के पास जा कर बोला, ‘‘साहब, आप का मोबाइल बज रहा है उठाते क्यों नहीं? मरने के इरादे से बैठे हो क्या?’’

कार्तिक अचानक हड़बड़ा गया. देखा तो सामने फेरी वाला था, ‘‘क्यों

मरने का क्यों सोचूंगा?’’ कार्तिक गुस्से में बोला.

‘‘अरे साहब, कितनी देर से इधर बैठे हैं आप. बहुत से लोग आते हैं मरने को यहां.’’

‘‘तो फिर मोबाइल उठाओ,’’ फेरी वाला बोला और फिर आवाज लगाता हुआ चला गया.

‘‘हां ठीक है,’’ कार्तिक ने मोबाइल उठा लिया, मोबाइल पर शारदा मैम का नाम चमक रहा था, ‘‘डार्लिंग कहां हो?’’

कार्तिक का मन हुआ मोबाइल उठा कर समंदर में फेंक दे और खुद भी समंदर में कूद जाए. फिर बोला, ‘‘बोलिए मैम.’’

‘‘कब तक आओगे? प्यास लगी है.’’

‘‘घंटेभर में आऊंगा,’’ कार्तिक बोला.

‘‘ओके मैं इंतजार करती हूं.’’

कार्तिक ने अपनी बाइक उठाई, मुंबई की लंबीलंबी सड़कों पर बाइक हवा से बातें करने लगी. साथ ही साथ वह सोचता जा रहा था, काश, मेरी बाइक किसी बड़ी गाड़ी से टकरा जाए, मैं मर जाऊं. क्या करूं? खुद ही गाड़ी किसी गाड़ी से भिड़ा देता हूं. तभी अचानक उस के दिमाग ने सवाल किया कि अपनी जान क्यों गंवाना चाहता है? शारदा मैम को निबटा दें.

हां, यही सही है. इन विचारों में डूबतेउतराते उसे भूख महसूस होने लगी. उस ने बाइक को चौपाटी की तरफ मोड़ दिया.

चौपाटी पर तो मेला सा लगा रहता है. उस ने बाइक एक स्टाल पर रोकी और भेलपूरी और कुछ सैंडविच का और्डर दिए. एक ठंडे पानी की बोतल का और्डर दिया. लड़का ठंडे पानी की बोतल ले आया. सब से पहले उस ने पानी की बोतल खोल कर आधी बोतल से खुद का चेहरा धो लिया, फिर आधी बोतल का पानी पी गया. फैला हुआ पानी रेत में समा गया था. तब तक लड़का प्लेटें टेबल पर सजा गया था. उस ने एक थम्सअप भी मंगवाई. फिर स्नैक्स खाने लगा. खातेखाते उस की आंखों के सामने शारदा मैम का चेहरा घूमने लगा कि यहां से जाते ही शारदा मैम की वासना की आग ठंडी करनी पड़ेगी. उसे घिन सी महसूस होने लगी.

‘‘साहब कुछ और लाऊं?’’ लड़के ने पूछा.

‘‘नहींनहीं, अब कुछ नहीं,’’ कह कर कार्तिक ने स्टाल वाले को पैसे दिए और चल दिया.

जब ग्रांट रोड के उस अपार्टमैंट में पहुंचा तो बहुत देर हो चुकी थी. उस ने सोचा शारदा मैम सो गई होगी. थर्ड फ्लोर पर उस का घर था. सैकंड फ्लोर पर शारदा मैम का. उस 7 माले के अपार्टमैंट ‘प्लाजा’ में जीवन जाग रहा था. यों भी मुंबई नहीं सोती.

वह जल्दीजल्दी सीढि़यां चढ़ने लगा थर्ड माले पर जाने के लिए लिफ्ट की क्या जरूरत? सैकंड माला क्रौस करने वाला ही था कि मोबाइल बज उठा, ‘‘कहां पहुंचे डार्लिंग?’’ शारदा मैम की आवाज आई.

मजबूरन फिर वह सैकंड माले पर फ्लैट नंबर 204 के सामने खड़ा था.

‘‘चले आओ दरवाजा खुला है तुम्हारे इंतजार में,’’ शारदा मैम ड्राइंगरूम में ही सोफे पर अधलेटी थी. सामने शराब की बोतल थी. मतलब आधी बोतल पी चुकी है. कार्तिक घबराया.

‘‘सोच क्या रहे हो? आओ, बची हुई शराब तुम्हारा इंतजार कर रही है,’’ शारदा ने अपनी ?ानी नाइटी को थोड़ा ऊंचा किया पैरों की तरफ से.

‘‘मुझे नहीं पीनी शराब,’’ कार्तिक बोला.

‘‘कोई बात नहीं, मत पीयो… आओ मेरी बांहों में,’’ शारदा बेशर्मी से बोली.

‘‘मुझे फ्री करो मैम, तुम्हारे कारण मैं टैंशन में हूं,’’ कार्तिक गिड़गिड़ाया, ‘‘मेरा वीडियो डिलीट करो.’’

‘‘अरे, हो जाएगा डिलीट वीडियो. आओ, ऐंजौय कर लो,’’ कह कर शारदा उसे कंधे से पकड़ कर बैडरूम में घसीट सी ले गई.

लगभग घंटेभर बाद जब कार्तिक अपने घर जाने के लिए सीढि़यां चढ़ रहा था तो शर्म से गड़ा जा रहा था. फ्लैट की कौलबैल पर उंगली रखता तब तक दरवाजा खुल गया था. मां इंतजार कर रही थी.

कार्तिक मां से नजरें बचाता हुआ अपने रूम में चला गया. कार्तिक की मां दीपा बेटे को परेशान देख बोली, ‘‘बेटा बात क्या है क्यों टैंशन में है?’’

‘‘कुछ नहीं मां,’’ कार्तिक बोला.

‘‘देख बेटा, तू रिश्ता टूटने से टैंशन में है. बहुत से रिश्ते आएंगे. रिश्ते तो बनते और बिगड़ते हैं. हो सकता है कहीं दूसरी लड़की का रिश्ता ज्यादा अच्छा हो.’’

हालांकि टैंशन उन को भी था, लेकिन बेटे के सामने जाहिर नहीं करना चाहती थी. महीनाभर पहले कार्तिक के रिश्ते के लिए लड़की वाले आए थे. सब फाइनल हो गया था. कार्तिक ने भी लड़की पसंद कर ली थी, लेकिन लड़की वालों ने अचानक बिना किसी कारण के रिश्ता तोड़ दिया. लेकिन कार्तिक जानता था कि लड़की वाले रिश्ता क्यों तोड़ रहे हैं.

‘‘मां अब मैं सोना चाहता हूं,’’ कार्तिक बोला.

‘‘ठीक है बेटा, लेकिन टैंशन मत रख, जौब जौइन करने वाला है, उसी की चिंता कर,’’ कह कर दीपा अपने रूम में चली गई.

कार्तिक ने दरवाजा बंद किया और सीधा वाशरूम में गया. बहुत देर तक नहाता रहा और रोता रहा, लेकिन आंसू पानी में मिल कर पानी जैसे ही हो गए. नहा कर आया तो थोड़ा सा मन हलका था. कार्तिक बिस्तर पर लेटा तो लगभग सालभर पहले के वे पुराने दिन याद आ गए. संडे का दिन था. मां और बाबूजी सुबह ही लोनावाला के लिए निकले थे.

अगले 2 दिन वहीं रहने वाले थे. उन के एक फैमिली मित्र भी वहां सपरिवार आने वाले थे तो इन 3 दिनों में कार्तिक फ्री था. जौब के लिए कोशिश जारी थी. उसे पता था कि जौब के बाद तो वही रूटीन लाइफ हो जाएगी इसलिए वह 3 दिन अपने दोस्तों के साथ घूमनेफिरने में बिताना चाहता था. वह कुछ साल पहले ही मुंबई आ कर रहने लगे थे. बाबूजी का पुश्तैनी मकान आदि वाराणसी के पास गांव में था. बाबूजी वाराणसी में सरकारी जौब में थे. कार्तिक इकलौता बेटा था. वह मुंबई में रहना चाहता था. जौब के लिए भी वहीं कोशिश कर रहा था. इसलिए बेटे का मन रखने के लिए अपनी नौकरी के रिटायरमैंट के बाद ग्रांट रोड पर उन्होंने एक फ्लैट खरीद लिया था. कभीकभी गांव भी चले जाते थे.

कार्तिक वाशरूम से नहा कर निकला ही था कि सैकंड फ्लोर पर रहने वाली शारदा मैम दरवाजा धकेल कर सीधी घर में घुस गई. भीगेभीगे से कार्तिक को देखती रही. 25 वर्षीय कार्तिक उसे भा गया. वह लगभग 62 वर्षीय महिला थी. पति उस के विदेश में थे बेटे के पास. वे कभीकभी आते थे. सभी उन को शारदा मैम कह कर बुलाते थे तो कार्तिक भी शारदा मैम कहता था.

‘‘जी बोलिए,’’ कार्तिक ने पूछा.

‘‘मम्मी कहां है तुम्हारी?’’ शारदा ने पूछा.

‘‘लोनावाला गए हैं,’’ कार्तिक का जवाब था.

‘‘मेरी किचन में सिलैंडर खत्म हो गया है उसे चेंज करना है,’’ शारदा मैम बोली.

‘‘आप चलिए मैं आता हूं,’’ कार्तिक बोला और फिर थोड़ी देर बाद चेंज करने के बाद शारदा मैम के घर पहुंच गया.

रसोई में जा कर गैस सिलैंडर बदला और हाथ धोने के लिए वाशरूम में गया ही था कि पीछे से शारदा मैम ने उसे पकड़ लिया.

‘‘अरेअरे यह क्या है?’’ कार्तिक बोला.

‘‘क्या होता है यह, नहीं समझते,’’ कह कर शारदा मैम ने उस पर चुंबनों की बरसात शुरू कर दी थी.

‘‘शर्म नहीं आती, आप को,’’ कार्तिक बोला, ‘‘मैं बेटे के बराबर हूं आप के.’’

‘‘कैसी शर्म? अकेली लेडीज समझ कर रेप की कोशिश कर रहे थे,’’ शारदा ने रंग बदला.

‘‘क्या बकवास है?’’ कार्तिक घबराया.

‘‘चलो सैक्स करो मेरे साथ, नहीं तो पुलिस को बुला लूंगी और शोर मचा दूंगी कि तुम ने जबरदस्ती करने की कोशिश की,’’ शारदा मैम बोली.

उस दिन की मजबूरी उस के गले का फंदा बनती चली गई. वह घबरा गया था.

जौब, पुलिस के चक्कर और शारदा के जाल में फंसता चला गया.

औरतों के लिए जरूरी सेवा

देश भर में आटो रिक्शा इस्तेमाल करने वालों को एक बड़ी मुसीबत यह रहती है कि आटो वाले इस तरफ कभी नहीं जाना चाहते जिधर सवारी चाहती है और दूसरी दिक्कत होती है कि मीटर या तो होते ही नहीं या ओवर बात करते हैं. इस के लिए दोषी हमेशा आटो ड्राइवरों को ठहराया जाता है और उन की पूरी कोम को मन ही मन 20 गालियां दे दी जाती हैं.

शहरों को ङ्क्षजदा रखने वाली यह सेवा देने वाले बेइमान हैं तो इस का जिम्मेदार इन के उन पर सारा सिस्टम है. शहर में कोई भी आटो बिना परमिट के नहीं चल सकता और यह परमिट हर साल रिन्यू कराना पड़ता है. सुप्रीम कोर्ट ने न जाने किस वजह से शहर में आटो की संख्या पर सीधा लगा रखी है जो दिल्ली में 1 लाख है. परमिट इशू करने वालों के लिए यह सीधा और हर साल रिन्यूअल एक वरदान है, लक्ष्मी का बेइमानी की सोने की मोहरे देने वाला है.

इस परमिट को पाने के लिए ढेरों रुपया चाहिए होता है. शहर बढ़ रहा है पर परमिटों की संख्या नहीं तो पुराने परमिटों की जमकर बिक्री होती है. जो परमिट होल्डर मर जाए उस का परमिट दूसरे के नाम करने के 15-20 लाख तक लग जाते हैं जिस में ये मुश्किल से 10000 रुपए मृत होल्डर ने परिवार को मिलते हैं.

उवर ओला ने इन नियमों को ताक पर रख कर टैक्नोलौजी के बल पर टैक्सियां तो उतार दी पर वे आटो की संख्या कहीं भी नहीं बढ़वा पाए. बढ़ते फैलते शहरों की जरूरत को हट करने के लिए इस सॢवस के लिए तो सरकार को सब्सिडी देनी चाहिए पर सरकार और सरकार के मुलाजिम लगभग पूरे देश में पैसा बनाते है. यही पैसा आटो रिक्शा वाले सवारियों से बसूलते हैं और इस सॢवस को बहुत नाकभौं ङ्क्षसकोड़ कर लिया जाता है.

आटो रिक्शा अगर मैले, टूटे, बदबूदार है तो इसलिए कि सरकारी अगला जिस में ट्रांसपोर्ट अर्थारिटी से ले कर नुक्कड़ का ट्रैफिक पुलिसमैन शामिल हैं, नियमों के नाम पर भरपूर कमाई करते है और आटो रिक्शा वालों के पास वह पैसा नहीं बचता जो बचाना चाहिए.

आटो रिक्शा ड्राइङ्क्षवग में वैसे भी 50 प्रतिशत औरतों को आना चाहिए ताकि औरतें उन के साथ चलने में उचित समझें. आज औरतों के लिए यह व्यवसाय सहज सुलभ है जिस में वे अपनी मर्जी के घंटों के साथ काम कर सकती हैं और घरों की घुटन भरी सांस से बच सकती है. वे सडक़ों, टै्रफिक से जूझ सकती है और ट्रांसपोर्ट अर्थोरिटियों की माफियानुमा जंजीरों को शायद, नहीं तोड़ सकतीं और इसीलिए कम औरतें ही इस लाइन में आ रही हैं. कभीकभार बड़े मान से औरतों को परमिट दिए जाते है पर लगता है सही ही वे बिकबिका जाते.

आटो रिक्शा सॢवस औरतों के लिए एक बहुत जरूरी सेवा है जो उन्हें घरों की कैद से निकाल सकती है और जब तक यह ठीकठाक न हो, शहर सुरक्षित नहीं होंगे पर शहरों के मालिकों के लिए यह साॢवस वह दुलारू गाय है जो दान में पंडित जी को मिली जिसे छुए और फिर सडक़ों पर छोड़ दो.

उस का सपना: भाग 1- किस धोखे में जी रही थी तृप्ति?

तृप्ति  बहुत अच्छी तरह तैयार हुई थी. स्लीवलैस, बास्डी हगिंग ब्लू ड्रैस और खुले लंबे स्ट्रेट बालों में उस का आकर्षण और बढ़ गया था. वह बेसब्री से अपने प्रेमी और लिव इन पार्टनर अमित के आने का इंतजार कर रही थी. आज अमित को तरक्की मिली थी और वह इस दिन को खास अपने अंदाज में सैलिब्रेट करने वाली थी.

तभी दरवाजे की घंटी बजी. तृप्ति ने इठलाते हुए दरवाजा खोला. अमित ने एक ?ाटके से तृप्ति को अपनी बांहों में उठाया और दरवाजा बंद कर उसे ले कर बैडरूम में आ गया.

तृप्ति ने अमित के होंठों को चूमते हुए कहा, ‘‘बधाई हो जान.’’

अमित ने उसे अपने करीब खींचते हुए कहा, ‘‘क्या केवल बधाई से काम चलाने का इरादा है? अपनी चाहतों के फूल भी तो बरसाओ.’’

फिर दोनों एकदूसरे की बांहों में खो गए. तृप्ति ने आज अमित को हर तरह से तृप्त कर दिया. वैसे यह पहली बार नहीं था. पिछले 8 महीनों से दोनों लिव इन में रह रहे थे. तनमन से तृप्ति अमित की थी. उस की खुशी में अपनी खुशी देखती. उस के सपनों को अपने सपने मानती. उस की चाहत को अपनी जिंदगी मानती. दोनों देर तक एकदूसरे में खोए रहे. तभी अमित के औफिस से फोन आ गया. वह बात करने लगा. इधर तृप्ति उठ कर बाथरूम चली गई. लौटी तो अमित ने उसे पकड़ कर मिरर के सामने खड़ा कर दिया.

उस के बदन पर जो 1-2 कपड़े बाकी थे उन्हें भी हटाता हुआ बोला, ‘‘जरा गौर से खुद को देखो तृप्ति. यह संगमरमर की तरह तरासा हुआ कोमल बदन, यह दूध सा गोरा रंग, यह काली घटाओं से केशुओं का घना जाल, ये कातिल निगाहें, ये सुर्ख होंठ. कोई तुम्हें एक बार देखे तो मदहोश हो जाए.’’

तृप्ति खुद को देखती हुई शरमा रही थी कि तभी अमित के हाथ उस के कमर पर

आ गए. वह सवालिया नजरों से देखता हुआ बोला, ‘‘तृप्ति, अब जरा अपनी कमर को देखो. पेट का हिस्सा और बाजुओं के ऊपरी हिस्से को देखो. क्या तुम्हें ये हिस्से फैटी नहीं लग रहे? क्या इन्हें और तराशने की जरूरत नहीं है? मैं फोटोग्राफर हूं न. मैं जानता हूं कि तुम्हें कहां अपने फिगर पर थोड़ी और मेहनत करनी है.’’

तृप्ति ने खुद को ध्यान से देखा. उसे अमित की बात सही लगी. वह सिर हिलाती हुई बोली, ‘‘ओके जैसा तुम कहो. वैसे भी तुम मुझे मुझ से भी ज्यादा जानते हो.’’

‘‘मैं यह भी जानता हूं कि तुम थोड़ी सी कोशिश करोगी तो इंडस्ट्री की नंबर वन मौडल या हीरोइन बन सकती हो, ‘‘अमित ने हौसला बढ़ाते हुए कहा.

‘‘सच?’’ तृप्ति खुश हो गई.

‘‘और नहीं तो क्या. सालों से इस फील्ड में काम कर रहा हूं. तुम बस मेरे कहे अनुसार चलो और खुद को मेरी नजरों से देखो फिर देखना कैसे तुम्हारी रंगत बदलती है. सच तो यह है कि यह मेरा सपना है. मैं हमेशा से चाहता रहा हूं कि मेरी पार्टनर एक मौडल हो और मैं

उस के फोटो सैशन करूं, उसे टौप की हीरोइन बनता हुआ देखूं. तुम मेरा यह सपना सच कर सकती हो.’’

तृप्ति अमित से लिपटती हुई बोली, ‘‘ठीक है मेरी जान.’’

इस के बाद शुरू हो गई तृप्ति के ट्रांसफौर्मेशन और उस के सुपर मौडल बनने की जंग. अमित उसे अपने दोस्त के जिम में ले कर पहुंचा. वहां उसे क्याक्या ऐक्सरसाइज करनी है यह सम?ाया गया. इंस्ट्रक्टर ने यह भी चेतावनी दी कि अगर तृप्ति ने बीच में जिम आना छोड़ा तो उस का वजन फिर से बढ़ जाएगा. इसलिए उसे नियम से ऐक्सरसाइज करनी है.

इतना ही नहीं वहां उस की मुलाकात एक डाइटीशियन से भी करवाई गई जिस ने उस के बीएमआई को ध्यान में रखते हुए उस के हिसाब से एक डाइट चार्ट तैयार किया. अमित ने उस ताकीद की कि उसे नियम से यही डाइट फौलो करनी होगी.

यह सब करने की अंदर से तृप्ति की कोई इच्छा नहीं थी. मगर अमित के सपनों के लिए वह सबकुछ करने को तैयार हो गई.

तृप्ति की फिटनैस की जर्नी शुरू हुई. अगले दिन ही औफिस के बाद वह सीधी जिम चली गई. वहां से निकली तो काफी थकान महसूस कर रही थी.

तृप्ति   बहुत अच्छी तरह तैयार हुई थी. स्लीवलैस, बास्डी हगिंग ब्लू ड्रैस और खुले लंबे स्ट्रेट बालों में उस का आकर्षण और बढ़ गया था. वह बेसब्री से अपने प्रेमी और लिव इन पार्टनर अमित के आने का इंतजार कर रही थी. आज अमित को तरक्की मिली थी और वह इस दिन को खास अपने अंदाज में सैलिब्रेट करने वाली थी.

तभी दरवाजे की घंटी बजी. तृप्ति ने इठलाते हुए दरवाजा खोला. अमित ने एक ?ाटके से तृप्ति को अपनी बांहों में उठाया और दरवाजा बंद कर उसे ले कर बैडरूम में आ गया.

तृप्ति ने अमित के होंठों को चूमते हुए कहा, ‘‘बधाई हो जान.’’

अमित ने उसे अपने करीब खींचते हुए कहा, ‘‘क्या केवल बधाई से काम चलाने का इरादा है? अपनी चाहतों के फूल भी तो बरसाओ.’’

फिर दोनों एकदूसरे की बांहों में खो गए. तृप्ति ने आज अमित को हर तरह से तृप्त कर दिया. वैसे यह पहली बार नहीं था. पिछले

8 महीनों से दोनों लिव इन में रह रहे थे. तनमन से तृप्ति अमित की थी. उस की खुशी में अपनी खुशी देखती. उस के सपनों को अपने सपने मानती. उस की चाहत को अपनी जिंदगी मानती.

दोनों देर तक एकदूसरे में खोए रहे. तभी अमित के औफिस से फोन आ गया. वह बात करने लगा. इधर तृप्ति उठ कर बाथरूम चली गई. लौटी तो अमित ने उसे पकड़ कर मिरर के सामने खड़ा कर दिया.

उस के बदन पर जो 1-2 कपड़े बाकी थे उन्हें भी हटाता हुआ बोला, ‘‘जरा गौर से खुद को देखो तृप्ति. यह संगमरमर की तरह तरासा हुआ कोमल बदन, यह दूध सा गोरा रंग, यह काली घटाओं से केशुओं का घना जाल, ये कातिल निगाहें, ये सुर्ख होंठ. कोई तुम्हें एक बार देखे तो मदहोश हो जाए.’’

तृप्ति खुद को देखती हुई शरमा रही थी कि तभी अमित के हाथ उस के कमर पर आ गए. वह सवालिया नजरों से देखता हुआ बोला, ‘‘तृप्ति, अब जरा अपनी कमर को देखो. पेट का हिस्सा और बाजुओं के ऊपरी हिस्से को देखो. क्या तुम्हें ये हिस्से फैटी नहीं लग रहे? क्या इन्हें और तराशने की जरूरत नहीं है? मैं फोटोग्राफर हूं न. मैं जानता हूं कि तुम्हें कहां अपने फिगर पर थोड़ी और मेहनत करनी है.’’

तृप्ति ने खुद को ध्यान से देखा. उसे अमित की बात सही लगी. वह सिर हिलाती हुई बोली, ‘‘ओके जैसा तुम कहो. वैसे भी तुम मुझे मुझ से भी ज्यादा जानते हो.’’

‘‘मैं यह भी जानता हूं कि तुम थोड़ी सी कोशिश करोगी तो इंडस्ट्री की नंबर वन मौडल या हीरोइन बन सकती हो, ‘‘अमित ने हौसला बढ़ाते हुए कहा.

‘‘सच?’’ तृप्ति खुश हो गई.

‘‘और नहीं तो क्या. सालों से इस फील्ड में काम कर रहा हूं. तुम बस मेरे कहे अनुसार चलो और खुद को मेरी नजरों से देखो फिर देखना कैसे तुम्हारी रंगत बदलती है. सच तो यह है कि यह मेरा सपना है. मैं हमेशा से चाहता रहा हूं कि मेरी पार्टनर एक मौडल हो और मैं

उस के फोटो सैशन करूं, उसे टौप की हीरोइन बनता हुआ देखूं. तुम मेरा यह सपना सच कर सकती हो.’’ तृप्ति अमित से लिपटती हुई बोली, ‘‘ठीक है मेरी जान.’’

इस के बाद शुरू हो गई तृप्ति के ट्रांसफौर्मेशन और उस के सुपर मौडल बनने की जंग. अमित उसे अपने दोस्त के जिम में ले कर पहुंचा. वहां उसे क्याक्या ऐक्सरसाइज करनी है यह सम?ाया गया. इंस्ट्रक्टर ने यह भी चेतावनी दी कि अगर तृप्ति ने बीच में जिम आना छोड़ा तो उस का वजन फिर से बढ़ जाएगा. इसलिए उसे नियम से ऐक्सरसाइज करनी है.

इतना ही नहीं वहां उस की मुलाकात एक डाइटीशियन से भी करवाई गई जिस ने उस के बीएमआई को ध्यान में रखते हुए उस के हिसाब से एक डाइट चार्ट तैयार किया. अमित ने उस ताकीद की कि उसे नियम से यही डाइट फौलो करनी होगी.

यह सब करने की अंदर से तृप्ति की कोई इच्छा नहीं थी. मगर अमित के सपनों के लिए वह सबकुछ करने को तैयार हो गई.

तृप्ति की फिटनैस की जर्नी शुरू हुई. अगले दिन ही औफिस के बाद वह सीधी जिम चली गई. वहां से निकली तो काफी थकान महसूस कर रही थी.

मेरे पति को कोलैस्ट्रौल है, इसको कंट्रोल करने के लिए मैं क्या करूं?

सवाल

मेरे पति के कोलैस्ट्रौल का स्तर काफी अधिक है. इस के लिए क्या उपचार हैक्या घरेलू उपायों से भी कोलैस्ट्रौल के स्तर को नियंत्रित रखा जा सकता है?

जवाब

कोलैस्ट्रौल को हृदयरोगों का सब से प्रमुख रिस्क फैक्टर माना जाता है. इस के स्तर को नियंत्रित रखने के लिए जीवनशैली में परिवर्तन लाएं. नियमित रूप से ऐक्सरसाइज करें. हलके और सुपाच्य भोजन का सेवन करें जिस में सैचुरेटेड फैट जैसे घी और मक्खन कम मात्रा मेंसब्जियांफल और साबुत अनाज अधिक मात्रा में हों. डीप फ्राई भोजन के सेवन से बचें. बाहर के फास्ट फूड से बचें क्योंकि इन में बारबार एक ही तेल का इस्तेमाल होता है.

कुल कोलैस्ट्रौल 200 से ज्यादा और एलडीएल कोलैस्ट्रौल 130 से ज्यादा है और उम्र 40 वर्ष से अधिक है तो दवा लेनी जरूरी है. दवा कोलैस्ट्रौल के स्तर को 1 महीने में 50त्न तक कम कर देती है.

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मेरे पिताजी का हृदय 60% काम कर रहा है. पूर्ण हार्ट फेल्योर से बचने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं?

जवाब

अगर हृदय की कार्यप्रणाली 50% से अधिक है तो इसे सामान्य माना जाता है. जब हृदय 40त्न से भी कम काम करता है तो इसे हार्ट फेल्योर कहते हैं. इस के कारण सांस फूलनाथकानदिल की धड़कनें तेज होनापैरों में सूजन आना जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं. आप के पिताजी का हृदय 100त्न काम नहीं कर रहा हैतो ऐसे में उन्हें विशेष सावधानी रखने की जरूरत है. उन का रक्तदाबरक्त में शुगर और कोलैस्ट्रौल के स्तर को नियंत्रित रखें. समयसमय पर जरूरी जांचें कराते रहें.

-डा. आनंद कुमार पांडेय

डाइरैक्टर ऐंड सीनियर कंसल्टैंटइंटरनैशनल कार्डियोलौजीधर्मशिला नारायणा सुपर स्पैश्यलिटी हौस्पिटल 

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क्विनोआ से बनने वाली ये 5 रेसिपीज, जो आपके स्वास्थ्य के लिए है फायदेमंद

हम सभी के लिए अपनी सेहत का ध्यान रखना बेहद जरूरी है लेकिन बिजी लाइफ़स्टाइल के चलते हम ऐसा सही से नहीं कर पाते है. अगर आप भी अपनी सेहत को लेकर सीरियस है लेकिन आपके पास समय का अभाव है तो चिंता की बात नहीं है क्योंकि ऐसी कई रेसिपीज है जो आपके स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद और बनाने में आसान होती है. ऐसी रेसिपीज में है क्विनोआ, जो आजकल काफी ट्रेंड में है. क्विनोआ के पोषक तत्व और इसके कई स्वास्थ्य लाभों के कारण इसे लोग अपनी डाइट में शामिल करते हैं। यह वजन को घटाने के लिए एक अच्छा विकल्प है. 100 ग्राम क्विनोआ में 120 कैलोरी, 4.4 ग्राम प्रोटीन और 2.8 ग्राम फाइबर होता है. यहां हम आपको क्विनोआ रेसिपीज के बारे में बताएंगे जो कि आपके लिए स्वास्थ्यवर्धक हैं. जब भी इसकी रेसिपी ट्राई करें तो कुछ बातें ध्यान रखनी जरूरी है जैसे कि इसकी गंदगी निकलने तक इसे बार- बार धोएं. इसे नरम होने तक अच्छे से पकाए और पकाने के बाद कुछ मिनट के लिए ठंडा होने दें. तो आइए जानते हैं इसके बनने वाले व्यंजनों के बारे में-

  1. सलाद

इसके लिए सबसे पहले क्विनोआ को पकाएं. एक बाउल में हरा धनिया, जैतून का तेल, नींबू का रस और सिरके से ड्रेसिंग तैयार करें. अब इसमें पके हुए क्विनोआ और कटी हुई सब्जियां डालें.

2. उपमा

इसे बनाने के लिए सबसे पहले एक चम्मच तेल में राई डाले और फिर प्याज डालकर भूनें. अब इसमें अपनी पसंद की सब्जियां डालें और 5 से 10 मिनट तक भूनें. अच्छी तरह पक जाने के बाद इसमें पानी डालें और 10 मिनट तक पकने दें.

3. पुलाव

इसे बनाने के लिए सबसे पहले एक पैन में थोड़ा घी या तेल डालें और कटी हुई सब्जियां डालकर अच्छी तरह पकने तक भूनें.  अब अदरक और लहसुन का पेस्ट डालें। इसमें क्विनोआ और सब्जियां मिलाएं और इसमें मसाले जैसे नमक, हल्दी, धनिया, पुदीना की पत्तियां डालें और 10 मिनट के लिए पकाएं.

4. नींबू क्विनोआ 

इसे बनाने के लिए सबसे पहले पैन में तेल लें और राई लें. अब इसके बाद उसमें मूंगफली, हरी मिर्च डालें. मूंगफली को अच्छे से भून लीजिए. अब इसमें कटा हुआ प्याज डालें और पके हुए क्विनोआ डालकर कुछ देर तक भून लें. पक जाने के बाद इसमें नींबू का रस मिलाएं.

5. दही क्विनोआ

इसे बनाने के लिए सबसे पहले बाउल में कद्दूकस की गाजर, खीरा और अन्य मनपसंद सब्जियां डालें. इसमें नमक और हरा धनिया डालें. अब इसमें पका हुआ क्विनोआ मिलाएं. अब एक पैन में एक चम्मच तेल,जीरा और राई डालकर तड़का लगाएं. अब आप इसमें कटा हुआ अदरक और करी पत्ता डालें. इसको दही के मिश्रण के साथ अच्छी तरह मिला लें. ये व्यंजन बनकर तैयार है.

अनजाने पल: भाग 4- क्यों सावित्री से दूर होना चाहता था आनंद

मैं ने अभी तक अपनी घर की स्थिति के बारे में पिताजी को कुछ नहीं बताया था. सोचा, उन्हें क्यों परेशानी में डालूं. मां तो थी नहीं. पिताजी वैसे भी व्यापार के सिलसिले में हमेशा ही दौरे पर रहते थे. अभी मैं सोच ही रही थी कि पिताजी से मिल आऊं कि आनंद का पत्र आ गया. पत्र देख कर मेरा मन आनंदित हो गया.

बड़े ही उत्साह से मैं ने पत्र खोला. अब तो मैं नौकरी छोड़ कर भी अपनी बच्ची और पति के पास लौटने के लिए बेताब हो रही थी. कितनी अजीब होती है नारी, अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करते हुए परिवार से अलग हुई थी. अब उसी प्रकार परिवार से जुड़ने के लिए सबकुछ छोड़ने को उद्यत हो गई. लेकिन पत्र पढ़ते ही मेरा चेहरा फक पड़ गया. ऐसा लगा, मानो हजारों बरछियां शरीर को छलनी कर रही हों. बड़े ही अनुनयविनय से कड़वी दवा पर मीठी टिकिया का लेप चढ़ा कर पत्र भेजा था. सारांश यही था कि वह माया से विवाह करना चाहता है. माया के गर्भ में उस का बच्चा है. वह मुझ से तलाक चाहता है.

मेरी समझ में सारी बातें आ गईं. मुझ से अलगाव रखना, चिट्ठी न लिखना और खिंचेखिंचे रहने के पीछे क्या कारण था. यह मैं समझ गई. उस कायर की दुर्बलता पर मुझे हंसी आई. साफसाफ कह देता तो क्या मैं मुकर जाती.

मुझे नीलिमा के लिए डर लगने लगा था. परंतु उस ने लिखा था, नीलिमा माया से बहुत प्यार करती है. इसलिए वह  हमारे साथ ही रहेगी. मैं ने अपने दिल को कठोर बना कर तलाक के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए, कानूनी कार्यवाही के बाद 4 वर्षों में तलाक भी हो गया. मैं पिता के पास चेन्नई लौट आई.

मैं ने व्यापार में पिताजी का हाथ बंटाने का निश्चय कर लिया. दिल्ली की नौकरी से भी इस्तीफा दे दिया. चेन्नई में हमारी कंपनी खूब अच्छी चल रही थी. मैं ने पूरी निष्ठा से अपने को काम में समर्पित कर दिया. पर पिताजी वह सदमा झेल न पाए. तलाक होने के 2 महीने बाद ही हृदयगति रुक जाने से उन की मृत्यु हो गई.

मेरी जिंदगी की गाड़ी मंथर गति से आगे बढ़ने लगी. मैं कई मर्दों से व्यापार के दौरान मिलती. परंतु किसी से भी व्यापारिक चर्चा के अलावा कोई बात न करती. लोग मुझ से कहते भी कि तुम दोबारा विवाह क्यों नहीं कर लेतीं. परंतु मैं ने पुनर्विवाह न करने का दृढ़ संकल्प कर लिया था.

एक दिन जब मैं फैक्टरी से कार में लौट रही थी तो एक शराबी मेरी गाड़ी से टकरा कर गिर पड़ा. मैं ने गाड़ी रोकी और उसे अस्पताल ले गई. उस का इलाज करवाया. बाद में परिचय पूछने पर उस ने अपना नाम विकास बताया. उस ने बताया कि उस की पत्नी किरण कुछ दिनों पहले मर गई है. शादी हुए 2 साल ही हुए थे कि वह गुजर गई. उस के वियोग को सहन न कर पाने के कारण विकास ने शराब पीना शुरू कर दिया था.

विकास का भी कपड़े का व्यापार था. पर उस ने किरण के गुजर जाने के बाद उस की तरफ ध्यान नहीं दिया था. दुखी ही दुखियारे का दुख समझ सकता है. मैं ने विकास को सहारा दिया, उस के अंदर प्रेरणा जगाई. धीरेधीरे विकास मुझ से प्रेम करने लगा. उस ने शादी का प्रस्ताव रखा तो मैं झिझकी. तब उस ने कहा, ‘मुझे अपने पर विश्वास नहीं है. अगर तुम ने मुझे ठुकरा दिया तो मैं फिर से कहीं शराबी न बन जाऊं.’

मैं ने सोचा, दिशाहीन चलती अपनी जीवननैया को अगर खेवैया मिल रहा हो तो इनकार नहीं करना चाहिए. हम दोनों को एकदूसरे की जरूरत भी थी ही.

पर मन ने सचेत किया, ‘आज इसे मेरी जरूरत है, कल जरूरत न पड़े तो आनंद की तरह ही दूध की मक्खी के समान फेंक दे तो…’

मैं ने उस के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया. हम दोनों का व्यापार एकजैसा होने के कारण हम अकसर मिलते. परंतु विकास ने दोबारा मुझ से इस बारे में चर्चा नहीं की. हम दोनों होटल में व्यापार के सिलसिले में ही एक गोष्ठी में भाग लेने गए थे. विकास ने मुझे विचारों के घेरे से बाहर निकाला, ‘‘सावित्री, तुम ने कुछ भी नहीं खाया है. सारे लोग खा कर जा चुके हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘ओह, मुझे माफ कर दो, विकास. पुरानी यादों में मैं खो गई थी.’’

‘‘मैं समझ गया था. मैं ने उन लोगों से कह दिया है कि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है. चलो, हम यहां से सीधे आनंद के पास चलते हैं.’’

‘‘अभी वे लोग हमें आनंद से मिलने देंगे?’’

‘‘कम से कम नीलिमा से तो मिल लोगी.’’

‘‘मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती, स्वयं ही चली जाऊंगी. तुम गोष्ठी में जाओ.’’

उस ने मेरी बात न मानी. अपने सहायक को सारी बातें समझा कर वह मेरे साथ चल पड़ा. उस ने अपने ड्राइवर से गाड़ी घर भेज देने को कह दिया.

जब हम अस्पताल पहुंचे तो नीलिमा बाहर ही खड़ी मिली. वह रो पड़ी थी. अश्रुपूरित नेत्रों से उस ने हम से जुदा होने के बाद की कहानी सुनाई. जब माया ने आनंद से विवाह किया तो नीलू बहुत खुश थी. माया उस से बहुत प्यार करती थी. आनंद भी बहुत खुश था.

परंतु नीलू को माया का धीरेधीरे आंनद के करीब आना अच्छा न लगा. वह थी भी जिद्दी. आनंद का प्यार उस के लिए कम होने पर वह सह नहीं पाई. माया को वह कभी आनंद के साथ कहीं न जाने देती और उस के करीब भी न जाने देती. इस बात को ले कर हर रोज झगड़ा होता, तकरार होती, परंतु अंत में जीत नीलू की ही होती.

जब माया का बेटा हुआ तो नीलू को बहुत अच्छा लगा, लेकिन माया गुड्डू को सदा नीलू से दूरदूर ही रखती. एक दिन गुड्डू पालने में सो रहा था. माया रसोई में खाना बना रही थी. अचानक वह जाग गया और रोने लगा.

नीलू अपने कमरे से भाग कर आई और गुड्डू को गोद में उठाना चाहा. वह नीचे गिरने को हुआ तो माया ने उसे उठा लिया. माया ने सोचा कि वह गुड्डू को पालने से नीचे गिराना चाह रही थी. नीलू ने कितना समझाने की कोशिश की, परंतु न तो वह समझी, न ही उस ने आनंद को समझाने का मौका दिया. आनंद के ऐसे कान भरे कि रात में उस ने नीलू को मारा भी.

इस घटना के बाद उस परिवार में एक दरार उत्पन्न हो गई, जो बढ़ती ही गई. ऐसे ही वातावरण में दुखी, तिरस्कृत, उपेक्षित, प्यार के लिए तरसतीबिलखती नीलू बड़ी होती गई. मुझे सोच कर हैरानी होती है कि आनंद ने अपने ही खून को इस तरह लाचार, विवश और दुखी क्यों बनाया?

इस घटना के बाद जब से आनंद का तबादला चेन्नई हुआ, तब से नीलू हर रोज यही सोचती कि उस की मां उसे दोबारा मिल जाए.

मैं ने अश्रुपूरित नेत्रों से बेटी को देखा. 9 साल की उम्र में उस ने क्याकुछ नहीं देखा और सहा था. आनंद और माया हर जगह गुड्डू को ले जाते और नीलिमा को घर पर छोड़ जाते. इस बार भी डिजनीलैंड से लौटते समय कार दुर्घटना में यह हादसा हो गया था. माया की मौत हो गई थी और आनंद भी बुरी तरह जख्मी हो जीवन व मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा था. गुड्डू को तनिक भी चोट नहीं आई थी.

नीलिमा जब यह सब बता रही थी, उसी दौरान आनंद भी गुजर गया. उस से कुछ कहनेसुनने का मौका भी न मिला. मैं दोनों बच्चों को घर ले आई. विकास ने आनंद के अंतिम संस्कार में मेरी काफी मदद की. पूछताछ के दौरान पता चला कि माया का कोई रिश्तेदार नहीं था. मैं किस रिश्ते से बच्चे को यहां रखती. स्कूल में उस का क्या नाम देती. सोच में डूबी हुई थी कि नीलू अंदर आई. उस ने पूछा, ‘‘मां, क्या तुम गुड्डू की भी मां बनोगी?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं गुड्डू की मां ही तो हूं.’’

‘‘मैं ने आप को कितना गलत समझा था मां,’’ नीलू आत्मग्लानि से भर कर बोली.

‘‘मेरी भी तो कुछ गलती थी.’’

‘‘मैं ने आप से मिलने की बहुत कोशिश की, पर पिताजी और माया आंटी ने मौका ही नहीं दिया.’’

‘‘बेटी, जो गुजर गए, उन के बारे में अपशब्द नहीं कहते.’’

गुड्डू रोता हुआ वहां आया. 3 बरस का गोलमटोल गुड्डू बहुत प्यारा लगता था. तोतली जबान में जब उस ने पुकारा ‘दीदी’, तो नीलू ने उसे अपनी बांहों में समेटते हुए कहा, ‘‘गुड्डू, ये हमारी मां हैं.’’

मैं ने उसे गोद में ले कर पुचकारा. वह बहुत देर तक ‘मम्मीमम्मी’ कह कर रोता रहा. मैं सोचने लगी, जिस पति ने मुझे मेरी बेटी से इसलिए अलग किया था, क्योंकि उस के अनुसार, मुझ में ममता नहीं थी, स्नेह नहीं था, और अब समय का खेल देखिए उस के बच्चे मेरी गोद में आ गए.

इतने में विकास भीतर आया और बोला, ‘‘आज इन बच्चों की परवरिश के लिए पिता का स्थान मुझे दे सकोगी?’’

मैं ने कहा, ‘‘हमारे बच्चे होंगे तो क्या होगा?’’

‘‘सरकार के परिवार नियोजन का बोर्ड नहीं देखा. 2 बच्चे बस, 2 से अधिक नहीं. मैं ने औपरेशन करवा लिया है,’’ वह बोला.

‘‘अगर मैं विवाह से इनकार कर देती तो…तुम ने ऐसा क्यों किया?’’

‘‘तुम इनकार कर दो, तब भी ये बच्चे हमारे ही रहेंगे. इन बच्चों को हम ने साथसाथ ही पाया है. इसलिए मैं ने इन का संरक्षक बन कर जीवन गुजारने का निश्चिय कर लिया है.’’

इस से आगे मुझ में इनकार करने की शक्ति नहीं थी. परंतु मैं ने नीलिमा को बुला कर पूछा, ‘‘विकास अंकल को पापा कह सकोगी?’’

‘‘अगर गुड्डू के लिए तुम मां हो तो अंकल हम दोनों के पापा हुए न…’’

हम उस अनजाने पल में एकदूसरे से पूरी तरह बंध चुके थे. मैं ने कृतज्ञताभरी दृष्टि से विकास की ओर देखा. मेरी नजरों में छिपी सहमति विकास की नजरों से छिप न सकी.

BB Ott 2: अब्दू रोजिक ने मनीषा रानी के Kiss करने पर जताई नराजगी

सलमान खान का मशहूर रियलिटी शो बिग बॉस ओटीटी 2 को दर्शक काफी प्यार दे रहे है. बिग बॉस ओटीटी 2 को शुरू हुए 2 हफ्तों से ज्यादा हो गया है. अभी पिछले हफ्ते शो में अब्दू रोजिक की बतौर गेस्ट बीबी हाउस में एंट्री हुई. घर में आने के बाद अब्दू को सभी कंटेस्टेंट्स के खूब प्यार मिल रहा है. शो में मनीषा रानी ने अब्दू को किस किया था जिसका रिएक्शन अब्दू ने अब दिया है.

अब्दू ने मनीषा पर निकाला गुस्सा

बिग बॉस के विशेष कार्य के हिस्से के रूप में, अब्दू को अपने लोकप्रिय सॉन्ग चालाक ब्रो और छोटा भाईजान पर चार बिग बॉस ओटीटी 2 कंटेस्टेंट्स  के साथ एक विशेष डांस रील शूट करना था. बिग बॉस 16 के पूर्व कंटेस्टेंट अब्दू रोजिक ने इसके लिए जद हदीद, मनीषा रानी, ​​अविनाश सचदेव और जिया शंकर को चुना. हालांकि, कार्य में तब असहज मोड़ आ गया जब जकूजी में डांस करते समय मनीषा ने अब्दू के गालों पर किस कर दिया.

टास्क के बाद,  अब्दु  ने कहा- अजीब सा,“बिग बॉस, मेरा काम हो गया. उसने मुझे मार डाला, मैंने उसकी जगह किसी और को क्यों नहीं चुना? ये मेरी जिंदगी की एक बड़ी गलती थी. वह पागल है.”

 

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अब्दू ने जताई नराजगी

अब, अपने नए गाने के लॉन्च इवेंट के दौरान, अब्दु ने बिग बॉस ओटीटी 2 हाउस के अंदर की घटना के बारे में खुलासा किया. अब्दु ने मनीषा के हावभाव पर नाराजगी जताते हुए कहा कि यह ‘जबरदस्ती की किस’ थी.

अब्दू का नया गाना हुआ लॉन्च

अब्दू के गाने के लॉन्च में उनकी बिग बॉस 16 मंडली – शिव ठाकरे, साजिद खान, सुम्बुल तौकीर और मान्या सिंह ने भाग लिया.

इस बीच, बिग बॉस ओटीटी 2 हाल ही में तब विवादों में आ गया जब एक टास्क के दौरान घर के अंदर आकांक्षा पुरी और जैड हदीद के बीच किसिंग सीन को लेकर जंग हो गई. वीकेंड का वार के दौरान सलमान खान ने उन्हें फटकार लगाई थी.

Film Review Tarla: कैसी है हुमा कुरैशी और शारिब हाशमी की ‘तरला’

लेखक व निर्देषक को इस बात की जानकारी नही है कि सत्तर से नब्बे के दर्शक में किस तरह पितृसत्तात्मक सोच ने महिलाओं के पैरो में बेड़ियां डाल रखी थीं. इसी वजह से वह फिल्म में तरला की पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ लड़ाई व उनके पति नलिन दलाल के सपोर्ट को रेखांकित करने में पूरी तरह से विफल रहे हैं.

रेटिंग: पांच में से ढाई स्टार

निर्माताः अर्थस्काय पिक्चर्स, आरएसवीपी मूवीज

लेखकः गौतम वेद और पियूष गुप्ता

निर्देशकः पियूष गुप्ता

कलाकारः हुमा कुरेशी, शारिब हाशमी,पूर्णेंदु भट्टाचार्य, वीना नायर, भारती आचरेकर और अन्य

अवधिः दो घंटे सात मिनट

ओटीटी प्लेटफार्म: जी 5

इन दिनों हर होटल में जो मुख्य रसोइया होता है,उसे ‘षेफ’ कहा जाता है.इन दिनों ‘षेफ’ एक अति प्रचलित षब्द हो गया है. पर आज से पचास साल पहले इस षब्द का इजाद नहीं हुआ था. उस दौर में एक साधारण महिला तरला दलाल ने कुछ करने के मकसद से कूकिंग क्लास लेनी शुरू की. उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. फिर उनकी रेसिपी की किताबें बिकने लगीं. सत्तर से नब्बे के दशक में तरला दलाल ने रसोई के व्यंजनों /रेसिपी को लेकर जिस तरह से अपने कैरियर को अंजाम दिया कि हर कोई अचंभित रह गया. उन्होने अपने काम से पितृसत्तात्मक सोच को भी धराषाही कर दिया. यहां तक कि उनके पति नलिन दलाल भी उनकी मदद किया करते थे. तरला दलाल इंडियन फूड राइटर, शेफ, कुकबुक राइटर और कुकिंग शो की होस्ट रह चुकी हैं. वह पहली भारतीय थीं, जिन्हें 2007 में खाना पकाने की कला में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था.

उनके ‘देसी नुस्खे‘ आज भी हर भारतीय के घर में चर्चा का विषय होते हैं. तरला दलाल ऐसी शेफ थीं, जिन्हें आज भी शाकाहारी खाने को नया रूप व स्वाद देने के लिए क्रेडिट दिया जाता है. 2013 में 77 वर्ष की उम्र में निधन हो गया था. वह 17 हजार से अधिक रेसिपी देकर गयी हैं. ऐसी ही तरला दलाल की बायोपिक  फिल्म ‘‘तरला’’ लेकर फिल्मकार पियूष गुप्ता आए हैं,जो कि सात जुलाई से ओटीटी प्लेटफार्म ‘‘जी 5’’पर स्ट्रीम हो रही है.

कहानी

फिल्म की कहानी शाकाहारी भोजन बनाने की कला को आसान बनाने वाली तरला दलाल की है. स्कूल में जब षिक्षक उन्हे पढ़ा रही होती थी,तब वह कुछ करने के सपने देखती रहती थीं. वह कुछ करने के लिए शादी नही करना चाहती थीं. लेकिन उनके माता पिता ने कम उम्र में यह कह कर शादी कर दी कि ‘ जो मन में आए शादी के बाद कर लेना‘. पर तरला शादी नही करना चाहती थी. इसलिए जब पेशे से इंजीनियर नलिन दलाल (शारिब हाशमी) उनके घर आते हैं,तो  तो तरला (हुमा कुरेशी) इतनी नाराज हो जाती है कि वह नलिन को लाल मिर्च मिला हुआ हलवा परोस देती हैं. जिसे नलिन एक खेल की तरह लेते हुए शादी के लिए हां कह देते हैं.

तरला शादी कर घरेलू कामकाज में व्यस्त हो जाती हैं.उनके तीन बच्चे हो जाते हैं. पति नलिन के टिफिन लेकर फैक्ट्री जाने के बाद तरला के पास खाना बनाने,सफाई करने, अपने तीन बच्चों की देखभाल करने का ही काम रहता है. ऐसा तब तक चलता रहता है जब तक उसे अहसास नही होता कि उसे स्टोव पर भोजन पकाने के अपने कौशल को अन्य युवा महिलाओं तक पहुंचाकर उनकी जल्द शादी होने में योगदान देना है. फिर वह कूकिंग क्लास लेने लगती हैं. पर सोसायटी एतराज करती है. उधर नलिन की नौकरी चली जाती है. तब नलिन प्रकाशक बनकर तरला की कूकिंग रेसिपी की किताब छापता है.पहले किताबे नही बिकती. मगर फिर कमाल हेा जाता है. फिर तरला का टीवी कायकम आने लगात है. और एक दिन नलिन को अहसास होता है कि लोग तरला के साथ ही उसके भी प्रषंसक है क्योकि उसने पितृसत्तात्मक सोच के विपरीत जाकर अपनी पत्नी को कुछ करने में अपना योगदान दिया.

लेखन व निर्देशन

कई वर्ष तक फिल्मकार नितेश तिवारी के साथ जुड़े रहे पियूष गुप्ता की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म है,पर उन्होने दृष्यों को सुंदरता से फिल्माया है. मगर पटकथा लेखक गौतम वेद इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी हैं. इसके चलते फिल्म प्रभाव छोड़ने में असफल रहती है. लेखक व निर्देशक को इस बात की जानकारी नही है कि सत्तर से नब्बे के दषक में किस तरह पितृसत्तात्मक सोच ने महिलाओं के पैरो में बेड़ियां डाल रखी थीं.

इसी वजह से वह फिल्म में तरला की पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ लड़ाई व उनके पति नलिन दलाल के सपोर्ट को रेखांकित करने में पूरी तरह से विफल रहे हैं. भोजन के इर्द-गिर्द घूमने वाली इस  फिल्म में एक भी तत्व ऐसा नहीं है,जो इंसान के अंदर सुरूचिकर भोजन के प्रति जिज्ञासा पैदा करे. इतना ही नही फिल्म में एक भी यादगार दृश्य नहीं है.सब कुछ बड़ा बनावटी सा लगता है. यहां तक कि नलिन दलाल का किरदार भी ठीक से नहीं उभर पाया,जो कि खुद को प्रगतिषील मानता है,मगर हर मोड़ पर वह अपनी प्रषंसा का भूखा भी है,पर न मिलने पर उसके अंदर एक अजीब सी बेचैनी व जलन भी होती है.फिल्म के अंत में महज दो चार मिनट के दृष्य में इस बात को चित्रित कर लेखक व निर्देशक ने इतिश्री कर ली.इसकी मूल वजह यह हे कि नई पीढ़ी के लेखक गौतम वेद और निर्देषक से पियूष गुप्ता को सत्तर से नब्बे के दषक के समाज  की समझ नही है. इन दोनो ने उसे समझने का भी प्रयास नही किया. पीयूष ने तरला की कहानी को स्लाइस-ऑफ-लाइफ शैली में बेहतर तरीके से पेष किया है,मगर कमजोर पटकथा व कई तरह की नासमझी वाली गलतियों के चलते फिल्म मजेदार नही बन पाती. इतना ही नही फिल्म की गति काफी धीमी है.

मध्यम वर्गीय परिवार में लैंगिक असमानता,सफल कामकाजी महिला के प्रति समाज के दृष्टिकोण को भी फिल्मकार सही ढंग से  चित्रित नही कर पाए.माना कि निर्देशक एक महिला की सहानुभूति को गरिमापूर्ण तरीके से उजागर करने के लिए काफी संवेदनशील नजर आते हैं.

तरला अपने टीवी कार्यक्रम को लेकर इस कदर व्यस्त हो जाती हैं कि घर पर रसोइया रख देती हैं.नलिन नौकरी की तलाष में व्यस्त हैं. डाइनिंग टेबल पर पिता व तीन छोटे बच्चे खाना खा रहे हैं.छोटा बेटा बीच में उठकर खाना कचरे के डिब्बे में फेंक कर आता है और पिता की समझ में कुछ न आए,यह कैसे हो सकता है? यहां तक कि जब डाक्टर बताता है कि बेटे की बीमारी की वजह यह है कि उसने तीन दिन से भोजन नही किया है. तब जिस तरह से तरला व नलिन के बीच बातचीत होनी चाहिए थी,उसे भी लेखक व निर्देषक नहीं गढ़ पाए. लेखक व निर्देषक भूल गए कि किसी की बायोपिक बनाते हुए सिर्फ उसका महिमामंडन नही किया जाता.फिल्म में इस तरह की तमाम गलतियां हैं. फिल्मकार भूल गए कि कोई भी इंसान बिना असाधारण उतार चढ़ाव के बड़ा नही बन पाता.

अभिनय

कमजोर पटकथा के बावजूद तरला के किरदार को हुमा कुरेशी ने अपनी तरफ से मेहनत तो की, पर बात नही बनी. मशहूर रेस्टारेंट ‘सलीम’ के मालिक की बेटी होने के चलते हुमा कुरेशी इस किरदार में अपनी तरफ से कई आयाम जोड़ सकती थीं,पर ऐसा कुछ नही हुआ. तरला मूलतः गुजराती हैं, पर हुमा कुरेशी के मंुह से संवाद सुनकर लगता है कि यह कोई पुणे में रहने वाली महाराष्ट्यिन हैं. कई जगह उनके चेहरे पर वह भाव नही आते,जो आने चाहिए.जब डाक्टर से तरला को पता चलता है कि  उसके तीन दिन से खाना न खाने के चलते उनका बेटा बीमार हुआ है,तो मां के रूप में उनके चेहरे पर जो भाव आने चाहिए थे,वह नजर नही आते.इतना ही नही उस वक्त मां और सफल कामकाजी मां के बीच की जो कश्मकश होती है,वह भी हुमा कुरेशी के चेहरे पर नजर नही आती.‘महारानी’ या ‘मोनिका ओह माय डार्लिंग ’ से उनकी जिस अभिनय प्रतिभा के लोग दीवाने हुए थे,उसका अभाव यहां नजर आता है.

‘फिल्मिस्तान’ व ‘फुल्लूू’ के बाद ‘तरला’ में पुरूष नायक  के तौर पर नलिन दलाल के किरदार को निभाकर शारिब हाशमी ने साबित कर दिया कि वह फिल्म में हीरो बनने लायक अभिनय क्षमता रखते हैं,जिसकी अनदेखी फिल्मकार करते रहते हैं.शारिब ने अपने अभिनय से तरला को यादगार बनाने में अहम भूमिका निभायी है,जबकि लेखक ने उनके किरदार को सही ढंग से  लिखा नही है.अपनी पत्नी के ‘कुछ’करने की इच्छाषक्ति को बेहिचक बढ़ावा देने वाले पति,पत्नी की रेसिपी को टाइपकर उसकी किताब छापने तक नलिन के उत्साह को शारिब हाशमी ने अपने अभिनय से परदे पर उभारा है.माफी मांगने वाले लंबे मोनो लॉग में षारिब का अभिनय यादागर बनकर रह जाता है.छोटे किरदार में भारती आचरेकर अपनी छाप छोड़ जाती हैं.

 

अपना घर लेना आसान नहीं

एक अच्छे घर के सपने के लिए लाखों लोग अपना घर सोसायटियों में ले रहे हैं जहां सुरक्षामनचाहे लोगकुछ सार्वजनिक सुविधाएं और एक स्टेटस मिलता है. शहरों के बाहर खेती की जमीनों पर तेजी से मकान उग रहे हैं. लोन की सुविधा पर युवा जोड़े अपना आशियाना खोज रहे है. आरवीआई (रिजर्व बैंक औफ इंडिया) की रिपोर्ट के अनुसार जनवरीमार्च 2023 में घरों की बिक्री 21.6 ‘ बढ़ी और साथ ही घरों पर बकाया लोन बढ़ कर 19,36.428 करोड़ रुपए हो गया.

अपनेआप में यह सुखद बात है कि लोग अपना मकान ले रहे हैं पर अफसोस यह है कि वे बचत पर नहीं ले रहे लोन पर ले रहे हैं. लोन पर लिए मकान का मतलब बौंकर के अपने घर में 24 घंटे मेहमान की तरह रखना जो करता कुछ नहीं है सिर्फ खाता है और गुर्राता है. उस ने मकान दिलवायां तो वह मकान मालिक से ज्यादा गुर्राता है और ज्यादा खाता है क्योंकि एक भी ईएमआई में देर हुई नहीं कि पीनल इंट्रस्ट चालू हो जाता है जो घरों में बैठे इस मेहमान को खूखांर और जानलेवा तक बना देता है.

यदि सामान्य बैंक के कम इंट्रस्ट वाले लोन की इंस्टालमैंट नहीं चुका पाओ तो बाजार से ज्यादा इंट्रस्ट पर लोन लेना पड़ता है. जैसेजैसे अच्छे मकानों की तमन्ना बढ़ती जा रही है वैसेवैसे ज्यादा इंट्रस्ट वाले लोन भी बढ़ रहे हैं और अब कुल होम लोन का 56.1 का 56.1 प्रतिशत हो गया है.

अपना फ्लैट एक अच्छी ग्रेट्ड सोसायटी में होना एक अच्छा सपना है पर जिस तरह से सरकारबिल्डरप्रौपर्टी एजेंट और बैंक आम ग्राहक को लूटते है. उस से यह सपना टूटने में देर नहीं लगती. सभी शहरों में हजारों बिङ्क्षल्डगों में ताले लगे फ्लैट दिख जाएंगे जो अलाट तो हो गए हैं पर पूरा पैसा न देने पर उन का पौजेशन नहीं दिया गया.

सरकार ने रेस नाम की एक संस्था बनाई है जो बिल्डरों पर लगाम लगा कर यह भी पुलिस थाने और अदालत जैसे हो गई है जहां शिकायत हल नहीं की जाती टाली जाती हैसाल दर साल और इस दौरान बुक किए फ्लैट पर इंट्रस्ट बढ़ता रहता है और भटकते रहते हैं.

सोसायटी में रहने की तमन्ना के लायक अभी देश की इकोनौमिक हालत नहीं हुई है. देश अभी भी गरीबों का देश है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहे अमेरिका जा कर ढींग कर आए कि पिछले 10 सालों में अर्थव्यवस्था 10वें से 5वें स्थान पर पहुंच गई है. प्रति व्यक्ति आय के पैमाने पर 2015 से 2022 में आय 1600 डौलर प्रति व्यक्ति से 400 डौलर बढ़ कर 2000 डौलर हुई जबकि इसी दौरान वियटनाम जैसे पिछड़े देश में 2055 से बढ़ कर 3025 डौलर और ङ्क्षसगापुर जैसे समृद्ध देश में 59112 डौलर से बढ़ कर 69.896 डौलर हो गई है.

हम सभी अपने घर अफौर्ड नहीं कर सकते. यह साफ है. कुछ ही ऐसे चतुर हैं जो या तो मांबाप के मकाए पैसे पर या किसी तरह के भागीदार हो कर होमलोन चुकता कर पाने की स्थिति में है.

 

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