सैक्स फैंटेसी: लाइफ में लाएं रोमांच

इंसान स्वभाव से ही बदलाव की कामना रखता है. जीवन में जब एकरसता या मोनोटनी आ जाती है तो इस की निरंतरता जीवन में ऊब पैदा कर देती है. हर इंसान इस ऊब से उबरने की कोशिश करता है. इस के लिए वह नएनए उपाय ढूंढ़ता रहता है. मोनोटनी चाहे खानेपीने के प्रति हो या रहनसहन के प्रति. इंसान हमेशा बदलाव की तमन्ना रखता है.

यही मोनोटनी जब सेक्स प्रक्रिया में भी आ जाती है तो इंसान वहां भी ऊब से बाहर आने का विकल्प ढूंढ़ता है. यही कारण है कि पतिपत्नी के बीच भी कुछ समय के बाद दूरियां आने लग जाती हैं. दूरियों का कारण चाहे कोई भी हो मगर इस का मूल आधार संभवतया मोनोटनी ही हुआ करता है. यही दूरियां बढ़तीबढ़ती अंतत: तलाक पर आ कर रुकती है. यह सच है कि आए दिन तलाक की संख्या अविश्वसनीय रूप से बढ़ रही हैं. इस का मुख्य कारण है मोनोटनी.

आइए इसी विषय पर विस्तार से बात करते हैं कि आखिर बैडरूम में यह ऊब क्यों आ जाती है और इस ऊब से बचने का विकल्प क्या है.

ताकि ऊब से बचे रहें

अमेरिका के मशहूर लेखक लुईस ए. वर्ड्सवर्थ की लोकप्रिय बुक ‘ए टेस्ट बुक औन सैक्सोलौजी में यह लिखा है, ‘‘बैडरूम की ऊब और मोनोटनी से बचने के लिए कपल को नित्य नए रूप में सैक्स प्रक्रिया निभानी चाहिए. नएनए पोजेस की तरफ आकर्षित होना चाहिए. कभीकभी स्थान बदल कर हिल स्टेशन में जा कर कुछ दिन बिताने भी इस का एक विकल्प है.’’

लुईस आगे लिखती है, ‘‘कुछ दिनों बाद इन में भी एकरूपता या एकरसता आगे लग जाती है. तब दंपती फिर से कोई नया विकल्प तलाशने निकल पड़ते हैं सैक्स प्रक्रिया और उस की मोनोटनी से उबने और उस से बचने के लिए जो विकल्प है. उन में एक नया नाम प्रचलित हो रहा है और वह है सैक्स फैंटेसी जो पश्चिमी देशों के युवाओं में काफी प्रचलित हो रही है. इसे सही मानने वाले लोग काफी हैं तो इसे गलत ठहराने वाल भी हैं.’’

इसी विषय को ले कर मुंबई के मशहूर सैक्स काउंसलर डा. रुस्तम बताते हैं, ‘‘आप ने बहुत ही सही विषय चुना है जो लोगों में जागृति पैदा करेगा. देखिए मेरे पास आजकल ऐसे पेशैंट्स की संख्या बढ़ती जा रही है. आजकल का जैनरेशन इंस्टैंट जैनरेशन है. उसे फास्ट फूड की ही तरह फास्ट प्लेजर भी चाहिए. इस में धीरज नहीं है. जबकि ‘सैक्स इज गेम औफ पेशंस.’ ’’

डा. ईरानी ने आगे बताया कि सैक्स प्रक्रिया में शरीर की ही हिस्सेदारी नहीं रहती है मन भी उतना ही इनवौल्व रहता है. इसलिए सैक्स प्रक्रिया के पहले फोरप्ले यानी छेड़छाड़, आलिंगन, किसिंग, हगिंग आदि अति आवश्यक है, जिसे आज की युवा पीढ़ी इगनोर करती देखी गई है. गलती उन की भी नहीं है. उन पर काम का बोझ इतना ज्यादा रहता है कि मानसिक थकान बहुत जल्दी हो जाती है.

इस वजह से फोरप्ले में जितना इनवौल्व होना चाहिए वह उतना नहीं हो पाती है. फलस्वरूप उसे सैक्स प्रक्रिया में परमआनंद या और्गेज्म की प्राप्ति नहीं हो पाती है. यहीं से सैक्स प्रक्रिया के प्रति उस की अरुचि शुरू हो जाती है. जो धीरेधीरे ऊब में बदल जाती है. यह ऊब दूरियां बनाने लगती है और दूरियां धीरेधीरे तलाक के पड़ाव तक जा पहुंची है.

शरीर और मन दोनों प्रभावी

डा. ईरानी के ही पेशैंट गौरव ग्रोवर और उन की पत्नी नेहा ग्रोवर बताते हैं, ‘‘जी हां हम लोग भी अपनी सैक्स लाइफ से ऊब चुके हैं. इसीलिए यहां आए हैं. अब कोई चार्म नहीं रह गया है सैक्स में.

‘‘हमारी शादी को अभी सिर्फ 2 ही साल हुए हैं, मगर सैक्स प्रक्रिया में हमारी रुचि न जाने क्यों नो चार्म के पौइंट पर आ गई है. अन्य सभी कामों की तरह सैक्स भी हमें रोजमर्रा की तरह ही बोरिंग लगने लगा है.’’

गौरव ने आगे बताया, ‘‘हम ने अपनी इस सैक्स लाइफ में थ्रिल लाने के लिए तरहतरह के उपाय किए. वीडियो देख कर वार्म होना शुरू किया. कई दवाओं का भी उपयोग किया. वीकैंड में किसी होटल में जा कर भी रहने लगे. इस से कुछ दिनों के लिए हमारी मोनोटनी तो अवश्य खत्म हो गई. हमें इस बदलाव से आनंद तो आने लगा, मगर चंद दिनों के बाद ही  इस में भी हमें बोरियल सी होने लगी. फाइनली हम लोग डाक्टर ईरानी केपास आए हैं.’’

डाक्टर साहब ने हमें कुछ बड़े अच्छे टिप्स दिए हैं. इन से हमें काफी फायदा हो रहा है,’’ नेहा ने ?ोंपते हुए कहा.

वे टिप्स क्या हैं? पूछने पर ‘सैक्स फैंटेसी,’ इतना कह कर नेहा चुप हो गईं. तब गौरव ने आगे बताया, ‘‘फैंटेसी का मतलब कल्पना की दुनिया. डाक्टर ईरानी ने हमें सलाह दी कि बैडरूम में जाते ही हम दोनों को कल्पना की दुनिया में चले जाना होगा. मतलब बैडरूम में जाते ही मैं पत्नी को कैटरीना कैफ सम?ाने लगता हूं और ये मुझे अपना पसंदीदा अक्षय कुमार और फिर दोनों हंसने लगे.

यह एक गंभीर विषय है और इस का एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है. इस के मनोवैज्ञानिक  विश्लेषण के लिए पुणे यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान के अवकाशप्राप्त प्रोफैसर कल्पेश देसाई से मुलाकात की. वे कहते हैं, ‘‘जी हां इस का एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी है जो काफी महत्त्वपूर्ण है. इंसान के मस्तिष्क में प्रत्यक्ष और परोक्ष 2 ग्रंथियां होती हैं. ये दोनों ग्रंथियां 24 घंटे ऐक्टिव रहती हैं. हम नींद में भी रहते हैं तो परोक्ष मस्तिष्क अपनी उड़ान भरता रहता है और मन की अधूरी या अपूर्ण इच्छाओं को दिवास्वपन के रूप में पूरी करता रहता है. इन्हीं लुकीछिपी इच्छाओं में एक है सैक्स फैंटेसी.’’

प्रोफैसर देसाई आगे बताते हैं, ‘‘इस प्रक्रिया में संलग्न कपल किसी की भी कल्पना मन ही मन में कर लेते हैं. चाहे उन का कश हो या कालेज, महल्ले या फिर पड़ोस का कोई लड़का अथवा लड़की. जो पसंद हो. उसे अपनी कल्पना में ढाल लेते हैं, मगर यह भले ही उन का सैक्स लाइफ में एक नया थ्रिल ला देता हो, मगर साइकोलौजिकली यह गलत है. जिस इंसान की आप किसी और रूप में कल्पना कर रहे हों उस के व्यक्तित्व को उस की पर्सनैलिटी को आप किल कर रहे हैं. उस के आत्मसम्मान को चोट पहुंचा रहे हैं. जानेअनजाने उस का अपमान कर रहे है. सैक्सोलौजिस्ट्स भले ही इसे दवा मानें मगर साइकोलौजिस्ट्स कभी इस की सलाह नहीं देते हैं.’’

प्रोफैसर कल्पेश देसाई की बातों ने दुविधा में डाल दिया तो इस के समाधान हेतु मुंबई के उपनगर मलाड की गाइनोकोलौजिस्ट डाक्टर अंजलि मालवानकर से मुलाकात की. वे कहती है, सैक्स प्रक्रिया एक ऐसी पूर्व प्रक्रिया है जिस से शरीर के साथसाथ मन का भी इनवौलमैंट होता है. इस संपूर्ण प्रक्रिया में लगभग 200 कैलोरी बर्न होती है. सरल शब्दों में कहें तो इस पूरी प्रक्रिया में मस्तिष्क और प्रजनन अंगों के बीच एक

रिश्ता कायम हो जाता है. मस्तिष्क के आदेश पर कई हारमोन होते हैं. मुख्यतया ऐस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरौन और टेस्टोस्टेरौन. ये लूब्रिकैंट्म तभी पैदा होते हैं जब हम स्वस्थ फोरप्ले की प्रक्रिया से गुजरते हैं. मतलब मैडिकल दृष्टिकोण से भी सैक्स प्रक्रिया के लिए फोरप्ले बहुत जरूरी है और अगर फोरप्ले के लिए सैक्स फैंटेसी का सहारा लेना पड़े तो इस में कुछ कोई गलत

नहीं है.’’

खुल कर बात करें

डा. अंजलि आगे कहती हैं, ‘‘हमारे यहां 90% महिलाएं सैक्स के बारे में जानने के लिए उत्सुक तो होती हैं, मगर उस पर बातें करने में शरमाती हैं पर यही महिलाएं गूगल में सैक्स के बारे में सब से ज्यादा सर्च करती हैं. तरहतरह के सवालों के जवाब ढूंढ़ती रहती हैं. एक सर्वे के अनुसार 80% लड़कियां सैक्स और और्गेज्म के विषय में सर्च करती हैं, जबकि 55% पुरुष ही इन विषयों पर सर्च करते हैं.

‘‘जहां तक सैक्स फैंटेसी की बात है इस के बारे में जानने की उत्सुक्ता पुरुषों में ज्यादा होती है. महिलाओं में न के बराबर होती है. जबकि उन्हें खुल कर इस विषय पर चर्चा करनी चाहिए और डाक्टरों की सलाह लेनी चाहिए क्योंकि गलत इलाज या गलत दवाएं नुकसान भी कर सकती हैं.’’

सैक्स फैंटेसी के भावनात्मक पहलू पर गौर करें तो यह सच है कि आशाओं और आकांक्षाओं का कोई अंत नहीं होता है. यह एक ऐसी चाह है जिस के पीछे इंसान हमेशा भागता ही रहता है और अंतत: इस की मृगतृष्णा में भटकता रह जाता है. इसलिए इस मृगतृष्णा के पीछे भागने के बदले हमें इस का कोई विकल्प ढूंढ़ना बेहतर होगा. हमें प्राकृतिक पारंपरिक और सही विकल्प यानी फोरप्ले की शरण में जाना होगा. जहां तक सैक्स फैंटेसी की बात है तो यदि यह सैक्स प्रक्रिया में आई ऊब को मिटाता है तो इस का सहारा लेने में कोई बुराई नहीं.

मगर याद रहे यह विकल्पों की आखिरी कड़ी होनी चाहिए. अंतिम पूर्णविराम होना चाहिए क्योंकि सुखद सैक्स लाइफ के लिए इच्छाओं की चाहें हम कतार लगाएं या आकांक्षाओं का अंबार पर इस सुख की तिजोरी तो संतुष्टि की चाबी से ही खुलती है.

मेरे परिवार में हार्ट अटैक के कई केस हुए है, मैं जानना चाहता हूं कैसे पता करें हार्ट अटैक आने वाला है?

सवाल

मेरे परिवार में हार्ट अटैक का इतिहास रहा है. हार्ट अटैक आने से पहले कैसे पता करें कि हार्ट अटैक आ सकता है?

जवाब

हार्ट अटैक तब आता है जब हृदय की ओर रक्त ले जाने वाली धमनियों में ब्लौकेज आ जाती है. अवरोध/ब्लौकेज 50त्न के स्तर से अधिक होने पर खतरा काफी बढ़ जाता है. लेकिन हार्ट अटैक आने के पहले ब्लौकेज के बारे में पता लगाना मुश्किल होता है क्योंकि अधिकतर मामलों में 70त्न ब्लौकेज होने तक कोई लक्षण दिखाई नहीं देता है. लेकिन इन अवरोधों की सीटी कोरोनरी ऐंजियोग्राफी के द्वारा केवल 2 मिनट में आसानी से पहचान की जा सकती है. अगर आप के परिवार में हार्ट अटैक का इतिहास है तो आप यह जांच कराने में बिलकुल देरी न करें और नियमित अंतराल पर कराती रहें. जब अवरोध/ब्लौकेज 80त्न के स्तर को पार करती है तो एनजाइना हो सकता है, लेकिन इस का पता भी टीएमटी (ऐक्सरसाइज स्ट्रैस टैस्ट) या सीटी ऐंजियोग्राफी के द्वारा लगाया जा सकता है.

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मुझे पिछले 4-5 साल से उच्च रक्तदाब की शिकायत है. मुझे बारबार चक्कर आने लगते हैं, दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं. उच्च रक्तदाब के क्या खतरे हैं और इसे नियंत्रित रखने के लिए क्या उपाय करने चाहिए?

जवाब

यदि रक्तदाब 140-90 से ज्यादा है तो उसे उच्च रक्तदाब माना जाता है. नमक का सेवन कम करें, नियमित रूप से ऐक्सरसाइज करें. अपना वजन न बढ़ने दें, अगर बढ़ गया हो तो उसे कम करने का प्रयास करें. धूम्रपान और शराब का सेवन बिलकुल बंद कर दें. अगर रक्तदाब को नियंत्रण में न रखा जाए तो हार्ट अटैक, किडनी रोग, स्ट्रोक, पैरों की धमनियों में ब्लौकेज आना, आंखों के परदे में ब्लीडिंग होने से आंखों की रोशनी चले जाना जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है.

डा. आनंद कुमार पांडेय

डाइरैक्टर ऐंड सीनियर कंसल्टैंट, इंटरनैशनल कार्डियोलौजी, धर्मशिला नारायणा सुपर स्पैश्यलिटी हौस्पिटल 

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Monsoon Special: हेयर मास्क, जो डैंड्रफ के इलाज में है कारगर

हर कोई अपने बालों का खास ख्याल रखता है. इसके लिए कई सारे उपाय भी अपनाते हैं लेकिन कई बार जानकारी के अभाव में हम अपने बालों को और नुकसान पहुंचा लेते हैं जिससे डैंड्रफ जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं. इससे आपके बाल सूखे और बेजान दिखने लगते हैं. बाजार में कई ऐसे प्रोडक्ट है जो डैंड्रफ को कम करने का वादा करते हैं लेकिन अक्सर कैमिकल आपके बालों के लिए हानिकारक होते हैं इसीलिए हम यहां आप को प्राकृतिक और हर्बल सामग्री वाले हेयर मास्क अपनाने की सलाह देते हैं जो बालों की समस्या से निपटने के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकते हैं. हेयर मास्क आपके बालों को पोषण और कंडीशनिंग देते हुए डैंड्रफ को खत्म करने में मदद कर सकते हैं. इनसे आपकी स्कैल्प में खुजली, डैंड्रफ जैसी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है तो आइए जानते हैं इन हेयर मास्क के बारे में-

दही, शहद और नींबू का मास्क- नींबू के रस में साइट्रिक एसिड आपके बालों के पीएच को बैलेंस करने में मदद कर सकता है.  दही बालों के डैमेज में सुधार और कंडीशनिंग में मदद कर सकती है। शहद से डैंड्रफ जैसी समस्याओं में सुधार हो सकता है.

सामग्री-

  1. 1/2 कप दही
  2. 1 बड़ा चम्मच नींबू का रस
  3. 1 बड़ा चम्मच शहद

सभी सामग्रियों को एक कटोरे में मिलाकर पतला मिश्रण तैयार करें। इस मिश्रण को अपने बालों की जड़ों से शुरू कर सिरे तक लगाएं. इसे 30 मिनट तक लगा रहने दें और बाद में हल्के सल्फेट फ्री शैंपू से बालों को धो लें. इसे आप अपने बालों में हफ्ते में एक से दो बार लगा सकते हैं.

केला, शहद, नींबू और जैतून का तेल- केला आपके बालों को मुलायम बनाने और डैंड्रफ को बैलेंस करने में मदद कर सकता है. जैतून का तेल आपके बालों को मुलायम और मजबूत बनाने में और नींबू के रस से आपके बालों का पीएच बैलेंस करने में मदद मिल सकती है. शहद डैंड्रफ को कम करने में मदद कर सकता है.

सामग्री

  1.  2 पके केले
  2.  1 बड़ा चम्मच शहद
  3.  1 बड़ा चम्मच जैतून का तेल
  4.  1 बड़ा चम्मच नींबू का रस

सबसे पहले बाउल में केले को अच्छी तरह मैश कर लें. अब इन केलों में जैतून का तेल, शहद और नींबू का रस मिलाएं और पेस्ट तैयार कर लें. इस हेयर मास्क को अपने स्कैल्प और बालों पर 30 मिनट के लिए लगाएं। इसके बाद बालों को सल्फेट फ्री शैंपू से धो लें.

अंडे और दही का हेयर मास्क- अंडा और दही आपकी स्कैल्प को पोषण और नमी देते हैं. इससे डैंड्रफ जैसी समस्या में राहत मिलती है.

सामग्री-

  1.  1 अंडा
  2.  2 बड़े चम्मच जैतून का तेल
  3.  1 कप दही
  4.  1 बड़ा चम्मच नींबू का रस

सबसे पहले एक बाउल में इन सामग्री को अच्छे से फेंटें. अब इस हेयर मास्क को अपने बालों पर अच्छी तरह लगाएं और 20 मिनट तक रहने दे। अब बालों को हल्के शैंपू से धो ले.

यह ध्यान रखें कि अपने बालों को धोने के लिए ठंडे पानी का उपयोग करें क्योंकि गर्म पानी अंडे को पका सकता है.

नारियल का तेल-  नारियल का तेल एटोपिक डर्मेटाइटिस से राहत दिलाने में मदद करता है.  इसलिए यह डैंड्रफ से छुटकारा दिलाने में भी मदद कर सकता है.

सामग्री

3 बड़े चम्मच नारियल तेल सबसे पहले नारियल के तेल को हल्का गर्म करें. इसके बाद गरम नारियल तेल की मालिश करना शुरू करें. लगभग 10-15 मिनट तक अपने स्कैल्प और बालों की अच्छे से मालिश करें. इसे 30 मिनट तक बालों पर रखा रहने दें और इसके बाद हल्के सल्फेट फ्री शैंपू से बालों को धो लें.

अपने अपने सच: पहचान बनाने के लिए क्या फैसला लिया स्वर्णा की मां ने?

अनजाने पल: भाग 3- क्यों सावित्री से दूर होना चाहता था आनंद

अपनी पीएचडी की समाप्ति पर प्रफुल्लचित, उत्साहित मैं जयपुर चल पड़ी. मन मुझे दोषी ठहराने लगा. मैं ने इन 6 महीनों में उन लोगों की कोई खोजखबर नहीं ली थी. उन लोगों ने भी मुझे कोई पत्र नहीं लिखा था. मैं सोचने लगी कि मेरी बेटी नीलिमा को भी क्या मेरी याद कभी नहीं आई होगी. पर मैं ने ही कौन सा उसे याद किया. पीएचडी की तैयारी इतनी अजीब होती है कि व्यक्ति सबकुछ भूल जाता है. परंतु इस में गलती ही क्या है? आनंद भी जब कंपनी की तरफ से ट्रेनिंग के लिए 6 महीने के लिए विदेश गया था तो उस ने भी तो कोई खोजखबर नहीं ली थी.

मैं भी तो व्यस्त थी. आनंद मेरी मजबूरी जरूर समझ गया होगा. मैं जब घर जाऊंगी तो वे लोग बहुत खुश होंगे. सहर्ष मेरा स्वागत करेंगे. मन में आशा की किरण जागी, लेकिन तुरंत ही निराशा के बादलों ने उसे ढक दिया, ‘क्या सचमुच वे मेरा स्वागत करेंगे? मुझे अगर घर में प्रवेश ही नहीं करने दिया तो?’ संशय के साथ ही मैं ने जयपुर पहुंच कर ननद के घर में प्रवेश किया.

ननद विधवा हो गई थी. अपना कोई नहीं था. नीलिमा से उसे बहुत प्यार था. बहुत रईस भी थी, इसलिए बड़ी शान से रहती थी. घर में नौकरचाकरों की कमी नहीं थी. मैं ने डरतेडरते भीतर प्रवेश किया. आनंद बाहर बरामदे में खड़ा था. उस ने मुझे देखते ही व्यंग्यभरी मुसकराहट के साथ कहा, ‘मेमसाहब को फुरसत मिल गई.’

मैं ने जबरदस्ती अपने क्रोध को रोका और मुसकराते हुए अंदर प्रवेश किया. अंदर से ननद की कठोर व कर्कश आवाज ने मुझे टोका, ‘जिस परिवार से तुम ने 6 महीने पहले रिश्ता तोड़ दिया था, अब वहां क्या लेने आई हो?’

‘मैं ने…मैं ने कब रिश्ता तोड़ा था?’

ननद बोली, ‘जब बच्ची को मेरे सुपुर्द कर दिया तो क्या संबंध तोड़ना नहीं हुआ?’

मैं ने हैरान हो, बरबस अपनी भावनाओं को काबू में रखते हुए, कहा, ‘दीदी, मैं आप से अपना अधिकार जताने या लड़ने नहीं आई हूं. नीलिमा कानूनन आज भी मेरी ही बेटी है. मैं केवल उसे लेने आई हूं.’

सफर की थकान और मई की लू के थपेड़ों ने मुझे पहले ही पस्त कर दिया था. ऊपर से आनंद के शब्दों ने मुझे और भी व्यथित कर दिया. उस ने बेरुखी से कहा, ‘नीलिमा को ले जाने का खयाल अपने दिल से निकाल दो. वह तुम से कोई संबंध रखना ही नहीं चाहती.’

मैं ने आपा खोते हुए कहा, ‘क्या रिश्ते कच्चे धागों के बने होते हैं, जो इतनी जल्दी टूट जाते हैं?’

इतने में नीलिमा बाहर आई. मैं ने सोचा था कि वह मुझ से गले मिलेगी, रोएगी. अगर वह मुझे कोसती, रूठती, रोती, कुछ भी करती तो मैं खुश हो जाती. परंतु उस की बेरुखी ने मुझे परेशान कर दिया.

उसी ने कहा, ‘मां, क्या लेने आई हो यहां?’

‘शुक्र है, तुम मुझे अब भी मां तो मानती हो. मैं तुम्हारे पास आई हूं. मेरी पीएचडी पूरी हो गई है. जून से मुझे प्रिंसिपल का पद मिल जाएगा. कालेज के कैंपस में ही हमारा घर होगा. तुम्हें वहां बहुत अच्छा लगेगा. अब हम साथसाथ रहेंगे.’

‘पिताजी हमारे साथ नहीं चलेंगे. और मैं उन के बगैर रह नहीं सकती. क्या आप हमारे साथ यहां नहीं रह सकतीं?’

मैं कुछ भी न कह पाई. मेरा वजूद मुझे नौकरी छोड़ने से रोक रहा था. मैं तबादले की कोशिश करने को तैयार थी. प्रिंसिपल का पद छोड़ने को भी तैयार थी, परंतु नौकरी छोड़ कर बैठे रहना मुझे मंजूर नहीं था. अगर मर्द का अहं इतना तन जाए तो नारी ही क्यों झुके? हम दोनों ने अपनेअपने अहं के चलते बच्ची के भविष्य की बात सोची ही नहीं.

मैं ने फिर विनम्रता और स्नेह से कहा, ‘बेटी, मैं तबादले की कोशिश करूंगी. तब तक तुम मेरे साथ रहो. एक साल के भीतर हम यहीं आ जाएंगे.’

नीलिमा ने पलट कर पिता की ओर देखा, ‘क्यों, मंजूर है?’

आनंद बोला, ‘सोच लो. मैं वहां नहीं रहूंगा. तुम्हें घर में अकेले दीवारों से बातें करते हुए रहना पड़ेगा. फिर तुम्हारी मां के कथन में न जाने कितनी सचाई. बाद में मुकर जाए तो…’

मुझे आनंद पर बहुत क्रोध आया कि न जाने भाईबहन ने नीलिमा से मेरे विरुद्ध  क्या कुछ कह दिया था. वह बेचारी अपने नन्हे से मस्तिष्क में विचारों का बवंडर लिए चुप रह गई.

मेरी ननद ने कहा, ‘अभी बच्ची को ले जाने की क्या जरूरत है. जब तबादला हो जाए तब देख लेंगे. अभी तो वह यहां बहुत खुश है.’

मुझे यह सलाह ठीक लगी. मैं अगली ट्रेन से ही दिल्ली लौट

आई. मेरे मन में भी आगे के कार्यक्रमों के बारे में योजनाएं बनने लगी थीं. मैं ने लौटते ही अपने तबादले के बारे में सैक्रेटरी से अनुरोध किया तो उन्होंने कहा, ‘तुम्हारी प्रिंसिपल की नौकरी के लिए सिफारिश आई है. क्या यह सबकुछ छोड़ कर जयपुर जाना चाहोगी?’

मैं ने कहा, ‘परिवार की खुशी के लिए नारी को थोड़ा सा त्याग करना ही पड़ता है. तभी तो वह नारी होने का दायित्व निभा पाती है.’

मुझे लोगों ने बहुत समझाया, पर मैं टस से मस न हुई. लेकिन तबादले की अर्जी देते ही तो तबादला नहीं हो जाता. सरकारी विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षकों का आदानप्रदान हो सकता है. यूनिवर्सिटी में उत्तरपुस्तिकाओं की जांच के दौरान मेरी रजनी से मुलाकात हुई. उस के पति का दिल्ली तबादला हो गया था और वह भी यहां आना चाहती थी. जयपुर कालेज से दिल्ली आने की उस की उत्सुकता देख मैं भी अत्यंत प्रसन्न हुई. हम दोनों ने ही आदानप्रदान के सारे कागजात जमा करवा दिए.

फिर मैं 4 दिनों की छुट्टी ले जयपुर गई. जयपुर से मेरे पति के पत्र नियमित रूप से नहीं आते थे. ननद तो कभी लिखती ही नहीं थी. मैं अपने खयालों में खोई हुई यह सोच भी नहीं पाई कि शायद वे लोग मुझ से कन्नी काट रहे हैं.

जयपुर पहुंचने पर पता चला कि ननद को कैंसर था. जब तक पता चला, काफी देर हो चुकी थी. उन की देखभाल के लिए माया नाम की 20-21 वर्षीय नर्स रख ली गई थी. मैं ने पति से पूछा, ‘मुझे सूचना क्यों नहीं दी, क्या मैं इतनी गैर हो गई थी?’

आनंद ने कहा, ‘पता नहीं, तुम छुट्टी ले कर आतीं या नहीं. और इस बीमारी में इलाज भी काफी दिनों तक चलता रहता है.’

मैं ने उस समय भी यही सोचा कि शायद उस ने मेरे बारे में ठीक ही निर्णय लिया होगा. मैं ने अपने तबादले के बारे में उस से जिक्र किया तो वह बोला, ‘इस समय तुम्हारा तबादला कराना ठीक नहीं होगा. दीदी बहुत बीमार हैं. माया उन की देखभाल अच्छी तरह कर ही लेती है. वह इलाज के बारे में सबकुछ जानती भी है. नीलू भी उस से काफी हिलमिल गई है.’

‘मेरे आने से इस में क्या रुकावट आ सकती है?’

‘डाक्टरों का कहना है कि दीदी महीने, 2 महीने से ज्यादा रहेंगी नहीं. फिर मैं भी जयपुर में रहना नहीं चाहता. मेरा अगला तबादला जहां होगा, तुम वहीं आ जाना. यही ठीक रहेगा.’

मैं समझ ही नहीं पाई कि वह मुझ से पीछा छुड़ाना चाह रहा है या मेरी भलाई चाहता है. मैं नीलू से जब भी कुछ बोलना चाहती, वह  ‘मां, मुझे परेशान मत करो’, कह कर भाग जाती.

माया दिल की अच्छी लगती थी, देखने में भी सुंदर थी. नीलू से वह बहुत प्यार करती थी. परंतु मैं ने पाया कि वह मेरे पति और बेटी के कुछ ज्यादा ही करीब है. वातावरण कुछ बोझिल सा लगने लगा. ननद मुझ से ठीक तरह से बोलती ही नहीं थी. वह बोलने की स्थिति में थी भी नहीं, क्योंकि काफी कमजोर और बीमार थी.

मैं वहां 2 दिनों से ज्यादा रुक न पाई. जाने से पहले मैं ने रजनी को अपनी मजबूरी बताते हुए फोन कर दिया था.

जब दिल्ली लौटी तो मन में दुविधा थी, ‘क्या मुझे जबरदस्ती वहां रुक जाना चाहिए था. पर किस के लिए रुकती? सब तो मुझे अजनबी समझते थे.’ कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था.

मुश्किल से 10 दिन बीते होंगे कि आनंद का पत्र आया. ‘दीदी की मृत्यु उसी दिन हो गई थी, जिस दिन तुम दिल्ली लौटी. मैं ने यहां से तबादले के लिए अर्जी भेजी है. आगे कुछ नहीं लिखा था. मैं ने संवेदना प्रकट करते हुए जवाब भेज दिया. इस के बाद एक महीना बीत गया. आनंद ने मेरे किसी भी पत्र का जवाब नहीं दिया.

मैं ने चिंतातुर जब बैंक मुख्यालय को फोन किया तो पता चला कि आनंद 15 दिन पहले ही तबादला ले कर मुंबई जा चुका है. उस ने जाने की मुझे कोई खबर नहीं दी थी.

मेरा मन आनंद की तरफ से उचट गया. मुझे मर्दों से नफरत सी होने लगी. इस प्रकार मुझ से दूरी बनाए रखने का क्या कारण हो सकता है, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था.

क्या है मानसिक रोग

बीमारी चाहे शारीरिक हो या मानसिक उस के कारणों के प्रति जनमानस की कुछ मान्यताएं होती हैं और अधिकांश मान्यताएं गलत ही होती हैं क्योंकि वे मनगढ़ंत या पारंपरिक मान्याओं पर आधारित होती हैं न कि चिकित्सीय दृष्टिकोण पर.

यहां कुछ उदाहरणों द्वारा मानसिक बीमारियों के प्रति मान्याओं पर प्रकाश डाल कर चिकित्सीय दृष्टिकोण से रूबरू होते हैं:

मानसिक बीमारी जेनेटिक होती है: ‘‘अरे, आप सुनीता से अपने बेटे की शादी करने जा रही हैं? आप को पता है कुछ सालों पूर्व उस की मां को मानसिक बीमारी हो गई थी. सुनीता भी वैसे ही बीमार हो सकती है. यह बीमारी जेनेटिक हो सकती है. उस लड़की से अपने बेटे का रिश्ता मत जोड़ो,’’ शांता अपनी सहेली से कह रही थी.

इस गलत सोच के कारण उच्चशिक्षित, सुंदर एवं स्वस्थ सुनीता का विवाह होना रुक गया. यह एक आम धारणा है कि अगर माता या पिता मानसिक रूप से बीमार हैं तो उन की संतान भी कुछ समय के बाद उसी बीमारी से पीडि़त हो जाती है.

यह सही नहीं है. रिसर्च के अनुसार सिर्फ 90% मरीजों के पारिवारिक इतिहास में किसी भी सदस्य का मां या पिता की बीमारी से ग्रस्त न होना यह साबित कर चुका है. रिसर्च में पाया गया कि वे सामान्य जीवन व्यतीत करते हैं.

मानसिक बीमारी जन्मपूर्र्व में किए गए कुकर्मों का परिणाम है: जब मानसिक रूप से बीमार किसी व्यक्ति को देखा जाता है, तो इस प्रकार टिप्पणी की जाती है, ‘‘देखो उस बेचारे की तरफ, उस ने पूर्व जन्म में कुछ पाप किए होंगे जिन की सजा वह भुगत रहा है. जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है. वह अपने कर्मों के फल से बच नहीं सकता.’’

जब लोग बीमारी के सही कारणों को नहीं जानते हैं तो इस प्रकार बुरे कर्मों के खिलाफ चेतावनी देते हैं. लेकिन हमें यह जानना चाहिए कि मानसिक बीमारियां मस्तिष्क में विशेष परिवर्तन के कारण होती हैं न कि बुरे कर्मों के परिणामस्वरूप.

गीता का गलतफहमी फैलाने वाला पाठ बड़े काम आता है. इस से पंडों की ग्रहशांति का मौका भी मिलता है, जिस में मोटी दक्षिणा मिलती है. जब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज रंजन गोगई देवी शक्तियों की बात कर सकते हैं तो आम लोगों का क्या कहना.

मानसिक बीमारियां उपद्रवी बुरी आत्माओं के कारण होती हैं: 25 वर्षीय नीला नाटी एवं पतली है. अचानक पिछले 3 महीनों से उस के स्वभाव में परिवर्तन आ गया है. यह कहा जाता है कि उस पर बुरी आत्मा का साया है. यह आत्मा अलगअलग समय पर विभिन्न लक्षणों को प्रकट करती है. वह प्राय: आक्रामक एवं हिंसक हो जाती है. उसे रोकने पर वह रोकने वालों को धक्का दे कर भाग जाती है. वह अपने पति एवं सास पर चीखतीचिल्लाती एवं गालियां देती है.

वह किसी के भी घर चली जाती है एवं भोजन मांगती है जो कुछ मिलता है, उसे निगल जाती है. वह इतना भोजन खा जाती है जितना 3 व्यक्ति खा सकते हैं. वह गांव में घूमती रहती है. लोगों को उसे देख कर आश्चर्य होता है कि क्या वह पागल हो गई है?

विक्रम 30 साल का है. एक कुशल कर्मचारी था, उफ अब वह आलसी हो गया है. प्राय वह अब स्वयं ही से बातें करता रहता है. कभीकभी चिल्लाने लगता है और कहता है, ‘‘दूर चले जाओ वरना मैं आप पर थूक दूंगा. वैसे ही जैसे वह किसी को आदेश दे रहा हो. उस की स्थिति दयाजनक हो गई है, वह रात में सो नहीं पाता है एवं अपने स्वास्थ्य पर भी ध्यान नहीं दे रहा है. उस का वजन घट गया है. उस के गांव वालों का कहना है कि वह एक या अधिक औरतों की आत्मा का शिकार बन गया है जो उस की जीवन शक्ति को चूस रही हैं और उसे सिर्फ चमड़ी और हड्डियों का ढांचा बना दिया है.

सच यह है कि नीला हिस्टीरिकल न्यूरोसिस नाम बीमारी से ग्रस्त है. वह घर में पति एवं अन्य परिवारजनों से खुश नहीं है. उन के बुरे व्यवहार के प्रति उस ने विरोध भी जताया, लेकिन किसी ने भी उसे सहारा नहीं दिया और न ही सहानुभूति दिखाई. उस के इस व्यवहार पर उस के अवचेतन मन ने एक तरीका खोजा और उस ने सामाजिक रूप से मानव धारणा ‘आत्मा लगना’ को अपना लिया और इस प्रकार वह समोहित व्यक्ति की तरह व्यवहार करने लगी एवं अपने पति एवं ससुराल वालों के बारे में बुरा बोलने लगी. उन्हें गालियों भी देने लगी. सभी यह सोचते हैं कि यह सब प्रेत आत्या कर रही है और वे नीला के साथ सहानुभूति रखते हैं.

विक्रम गंभीर मानसिक विकार सिजोफ्रेनिया से ग्रस्त है. इस बीमारी में व्यक्ति की ठीक तरह से सोचने की क्षमता कम या खत्म हो जाती है. वह अज्ञात आवाज सुनता है. बगैर किसी उद्दीपन के स्वप्न या दृश्य देखता है एवं उन के प्रति दृष्टि भ्रम, प्रतिक्रियाएं देता है. इस प्रक्रिया को हलूसिनेशन कहते हैं. उस की सासें एवं व्यवहार प्राकृतिक रूप से अजीब हो जाता और लोग इस गलतफहमी में रहते हैं कि आत्माएं उस से बातें कर रही हैं और इस स्थिति में वह ठीक से खाना नहीं खा पाने के कारण कमजोर हो जाता है. कहा जाता है कि आत्माएं उस की जीवनशक्ति को चूस रही हैं.

मानसिक बीमारी मनोवैज्ञानिक सदमों द्वारा होती है: मैं सम?ा सकता हूं कि क्यों कार्तिकेय पागल हो गया है बेचारा और हो भी क्या सकता है उस के साथ इस के अलावा? वह अपनी पत्नी से इतना प्यार करता था कि उस के लिए उस ने घर खरीदने हेतु बड़ा कर्ज लिया था. लेकिन उस की बेवफा बीवी एक दिन पड़ोसी के साथ भाग गई. यह सदमा वह कैसे सहन कर सकता था सो पागल हो गया. वह यही कहता है कि वह कुंआरा है.

क्या आपने सुना? शंकर जिस की लकड़ी की दुकान है, उस की लौटरी लग गई है और वह करोड़पति बन गया है. लेकिन वह अपनी इस समृद्धि का सुख नहीं उठा पाया. जैसे ही उस ने सुना कि उस ने लौटरी जीती है वह पागल हो गया और उस ने अपनी दुकान को आग लगाने की कोशिश की, कर्मचारियों को मारना शुरू किया. अब उसे एक कमरे में बंद कर दिया गया है तो. वह चिल्लाता रहता है कि वह एक राजा है और उसे वह सब कुछ करने देना चाहिए जो वह चाहता है. घर वाले उसे मानसिक अस्पताल में भरती कराने की सोच रहे हैं.

ये उदाहरण मनोवैज्ञानिक सदमों के हैं जिन में मानसिक बीमारियां कुछ विशेष घटनाओं के फलस्वरूप होनी समझ जाती हैं.

अकसर फिल्मों, कहानियों एवं उपन्यासों में इस प्रकार की घटनाएं होना बताया जाता है और इन का प्रभाव लोगों पर यों होता है कि वे किसी भी व्यक्ति को मानसिक बीमारी होने पर इस प्रकार का कारण ढूंढ़ते हैं.

सच यह है कि सुख एवं दुख दोनों से संबंधित अनापेक्षित घटनाएं किसी भी व्यक्ति में मानसिक बीमारी का कारण तो हो सकती हैं, लेकिन उन लोगों में जिन में जन्मजात इस रोग के होने की संभावना होती है बजाय एक आम स्वस्थ आदमी की तुलना में. कोविड के दिनों में जिन लोगों को कईकई सप्ताह अकेले रहना पड़ा था वे भी इस परेशानी से परेशान रहे हैं.

अनुपमा अब नहीं जाएगी अमेरिका! गुरु मां हुईं नाराज

अनुपमा धारावाहिक जबसे स्टार प्लास पर टेलीकस्ट हुआ है तभी से टीआरपी की लिस्ट में धूम मचा रहा है. इस सीरियल को धांसू बनाने के लिए मेकर्स आए दिन नया ट्विस्ट लेकर आते ही रहते हैं. रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर अनुपमा में देखन को मिलेगा कि माया की शोक सभा जरी है. ऐसे में वनराज अनुपमा से कहेगा कि तुम्हें अमेरिका जाना ही होगा इस पर अनुपमा कहती है जिंदगी बहुत परीक्षा लेती है. और ये बहुत ही कठिन है. अपने पति और बेटी को इस हलात में छोड़कर जाना. ये सारी बातें अनुज सुन लेगा.

माया की याद में तड़पेगी छोटी अनु

रुपाली गांगुली के ‘अनुपमा’ में देखने को मिलेगा कि छोटी अनु खुद को कमरे में बंद कर लेगी. वहीं जब वनराज और बाकी सब दरवाजा तोड़ेंगे तो देखेंगे कि छोटी अनु माया की तस्वीरों के साथ सो रही है. वहीं जब अनुपमा उसे गले लगाएगी तो वह नींद में माया को याद करेगी और कहेगी कि मुझे आप पर गुस्सा नहीं करना चाहिए था. यहां तक कि नींद खुलने पर वह अनुपमा से भी कहेगी कि मां तो छोड़कर चली गईं, लेकिन आप कहीं मत जाना.

अनुपमा नहीं जाएगी अमेरिका

छोटी अनु को देखने गुरु मां कपाड़िया हाउस जाएगी. वहां गुरु मां अनुपमा से कहेगी, तुम्हें अमेरिका जाना ही होगा. वहीं दूसरी और अनुज छोटी अनु पर चिल्लाने लगता है. इसके बाद अनुपमा अनु को गले लगा लेती है. वहीं यह सब गुरु मां और नकुल देख लेते है. इसके बाद गुरु मां कहेगी हमें परसो जाना है. इस पर वनराज कहेगा अनुपमा पहुंच जाएगी और अनुपमा भी यही कहती है.

गुरु मां और नकुल के बीच बातचीत

गुरु मां और नकुल गुरुकुल आकर आपस में बात करते हैं. गुरु मां को इस बात की चिंता होती है. अनुपमा अमेरिका जाने के लिए कहीं मना न कर दें. इस पर नकुल कहेगा ऐसा कुछ नहीं होगा. इस पर गुरु मां कहेगी अगर ऐसा नहीं हुआ तो जिस अनुपमा नें मेरा रौद्र रूप देखा है वह फिर देखेगी.

“ये जवानी है दीवानी” फेम एवलिन शर्मा दूसरी बार बनीं मां, देेखें वायरल पोस्ट

एक्ट्रेस एवलिन शर्मा ने गुरुवार को इंस्टाग्राम पर अपने दूसरे बच्चे के जन्म की घोषणा की. एवलिन, जो रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के साथ अयान मुखर्जी की “ये जवानी है दीवानी” में नजर आई थी. एवलिन ने इंस्टाग्राम पर अपने बेटे के नाम का भी खुलासा किया. इसी के साथ उन्होंने अपनी बच्चे की पहली तस्वीर साझा की है. एवलिन ने जनवरी में अपनी दूसरी प्रेग्नेंसी की घोषणा की थी. साल 2021 में उनका पहला बच्चा हुआ.

एवलिन शर्मा ने इंस्टाग्राम पर किया पोस्ट

एवलिन अपने नवजात बेटे को गोद में लिए हुए कैमरे के सामने मुस्कुराती नजर आ रही है. एवलिन शर्मा ने बच्चे के जन्म के तुरंत बाद तस्वीर ली, फोटो में बच्चे का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा.

एवलिन ने अपने कैप्शन में लिखा, “कभी नहीं सोचा था कि मैं बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद इतना अद्भुत महसूस कर सकती हूं. मैं बहुत खुश हूं कि मैं इसके लिए छत पर खड़ी हो कर गा सकती हूं! हमारे छोटे बच्चे आर्डन को नमस्ते कहो.”

 

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एवलिन शर्मा के फैंस ने दी बधाई

एक फैन ने टिप्पणी की, “मां को बधाई और बेटे का स्वागत है.” एक टिप्पणी में यह भी लिखा था, “Yay!! आपके लिए बहुत खुश हूं! आप दोनों सुंदर लग रहे हैं.” एक अन्य यूजर ने लिखा, “बधाई हो प्रिय… आप दोनों को ढेर सारा प्यार.” मां और बेटे की एक साथ पहली तस्वीर पर कमेंट करते हुए एक फैन ने भी लिखा, “बहुत खूबसूरत… बिल्कुल सुंदर.”

एवलिन शर्मा का परिवार

एवलिन ने 2021 में ऑस्ट्रेलिया स्थित तुशान भिंडी से शादी की. दोनों ने नवंबर 2021 में अपने पहले बच्चे बेटी अवा रानिया भिंडी का स्वागत किया. उस समय के आसपास अपनी बेटी की एक तस्वीर साझा करते हुए, एवलिन ने इंस्टाग्राम पर लिखा था, “सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मेरी जिंदगी… माँ से @avabindi.

 

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एवलिन शर्मा की दूसरी प्रेग्नेंसी

अपने पहले बच्चे का स्वागत करने के दो साल बाद, जनवरी 2023 में, एवलिन शर्मा ने घोषणा की थी कि वह और तुषान दूसरी बार माता-पिता बनने के लिए तैयार हैं. एवलिन ने इंस्टाग्राम पर अपने बेबी बंप की तस्वीरें पोस्ट की थीं. अपने कैप्शन में उन्होंने लिखा, “तुम्हें अपनी बाहों में पकड़ने के लिए मैं इंतजार नहीं कर सकती!! बेबी नं. 2 रास्ते में है…”

कहीं आप बेटी की गृहस्थी तोड़ तो नहीं रहीं

मां बेटी का रिश्ता बहुत ही प्यारा होता है. हर मां की चाह होती है कि उस की बेटी ससुराल में खुश रहे. यदि बेटी इकलौती है तो वह उस के भविष्य के लिए कुछ ज्यादा ही फिक्रमंद होती है. इसी वजह से मां अपनी बेटी को बचपन से ही अच्छे संस्कार देती है परंतु परिवर्तनशील समाज में अब मान्यताएं बदल रही हैं.

आजकल अधिकतर घरों के टूटने की वजह अभिभावकों का बेटी की गृहस्थी में अनावश्यक हस्तक्षेप और उन के द्वारा दी जाने वाली शिक्षा है. नीना की शादी को 2 वर्ष बीत चुके हैं. उस के पति सोमेश बैंक में अधिकारी हैं, अच्छी तनख्वाह है. ससुर को भी पैंशन मिलती है. सोमेश की अविवाहित बहन है. बेटी के लिए चिंता करना हर मां का फर्ज है. नीना अपनी ननद के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करती. उस की मां नीना को गलत व्यवहार के लिए उकसाती रहती है. यही वजह है कि घर में अशांति बनी रहती है. आपसी रिश्तों में तनाव रहने का मूल कारण नीना की अपनी मां ही है.

यदि बेटी अपनी ससुराल में खुश है, उसे अपने पति और ससुराल वालों से शिकायत नहीं है, तो मां का फर्ज यही होता है कि वह बेटी और  उस के ससुराल वालों के साथ मजबूत रिश्ते बनाए.

भावनात्मक जुड़ाव

इकलौती बेटी जन्म से ही अपने घर की दुलारी और अपने पेरैंट्स की राजकुमारी होती है. इस कारण उस के पेरैंट्स अपनी बेटी के लिए ओवर प्रोटैक्टिव होते हैं. वे उस की हर इच्छा को यथासंभव पूरा करने का प्रयास करते हैं.

इकलौती बेटियां अपने पेरैंट्स से इतनी ज्यादा जुड़ी होती हैं कि वे ससुराल जा कर भी हर समय उन के लिए टेंशन महसूस करती रहती हैं. उन के लिए दूसरों के साथ तालमेल बैठाना, शेयरिंग करना मुश्किल पड़ता है. अपने पेरैंट्स से उन्हें विशेष ध्यान मिलता था तो वे ससुराल में भी वही अपेक्षा करती हैं और नहीं मिलने पर अकसर अपने मन का दर्द अपनी मां को सुनाने लग जाती हैं.

वीडियोकौल या औडियोकौल के जरीए बेटी हर पल की खबर अपनी मां तक पहुंचाती है और मां की आक्रोशित प्रतिक्रिया उस के व्यवहार और जबान में घुल कर प्रकट हो कर आपसी कलह का कारण या आगे चल कर रिश्तों में कड़वाहट पैदा कर देती है.

इकलौती मीता की शादी उस की मां ने अपने ही शहर में करवाई थी. इस वजह से ज्यादातर रात में पति मेहुल औफिस से लौटते हुए लेता हुआ चला जाता था.

एक दिन माइके वालों के साथ पिकनिक का प्रोग्राम था. वह पिकनिक के लिए बहुत खुश और एक्साइटेड थी, लेकिन उसी दिन उस की सासूमां को बहुत तेज बुखार चढ़ गया तो उदास मन से उस ने अपनी मां को मना करने के लिए फोन किया पर उस की मां आशा उस पर बरस पड़ी और सासूमां को भलाबुरा बोलने लगी.

मीता को अच्छा नहीं लगा और उस ने अपनी मां को सम?ाने की कोशिश भी की. मगर पिकनिक पर न जा पाने की वजह से उस का मूड भी खराब था, ऊपर से मां की उलटीसीधी बातों ने उस के मन में अपनी सासूमां के साथ रिश्तों के धागों में एक महीन सी गांठ डालने का काम अवश्य कर दिया.

पैरों तले जमीन खिसक गई

सीमा अपनी तलाकशुदा मां आरती की इकलौती बेटी थी. चूंकि वह अपने ननिहाल में रहती थी, उस की मां को उस के नानानानी या मामा दुखियारी सम?ाते हुए हमेशा स्पैशल ट्रीटमैंट देते थे. प्यारदुलार के कारण उसे पूरी तरह मोम की गुडि़या बना दिया था. चूंकि सीमा काफी सुंदर और संपन्न परिवार से थी, इसलिए शहर के कईर् परिवार उसे बहू बनाने के लिए रिश्ता ले कर आए, लेकिन आईएएस के ख्वाब के कारण आरती ने किसी को भी पसंद नहीं किया.

जब उस की उम्र 30 के पार पहुंचने लगी, तो लोगों के दबाव में, अपनी इज्जत बचाने के लिए कहीं भी शादी तय करने को तैयार हो गई और जल्दबाजी में एक साधारण परिवार के लड़के के साथ रिश्ता तय कर दिया.

खूब सारा दहेज, गाड़ी और कैश दे कर धूमधाम से शादी की. अब जब सीमा ने ससुराल की पथरीली धरती पर अपने कदम रखे तो वहां के तौरतरीके देख कर उस के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई थी. चूंकि उस ने कभी घर का काम ही नहीं किया था सो उसे कोई अभ्यास नहीं था. वहां पर तो एक भी नौकर नहीं था. उस ने कभी किसी के साथ अपनी चीजें शेयर नहीं की थीं. यहां पर उस की मां की दी हुई गाड़ी की चाबी देवर के पास ही रहती.

आरती समयबेसमय पर बेटी को फोन खटकाती और वीडियोकौल में, जब बेटी सीमा को बरतन धोते देखती तो उस का खून खौल उठता. उसे लगता कि उस की तो सारी दुनिया ही लुट गई. बेटी के बिना उन्हें अपना जीवन अधूरा सा लगता.

बेटी सीमा भी अपने ससुराल वालों की शिकायतों का पिटारा खोल कर बैठ जाती. सीमा का देवर सुकेश अपनी भाभी के साथ हंसीमजाक और मीठीमीठी छेड़खानी करता. सीमा को यह सब अच्छा नहीं लगा, तो उस ने छोटी सी बात का बतंगड़ बना दिया. तमाम शिकायतों का दौर चला. मांबेटी दोनों को ही रिश्ता बचाने के लिए हाथ जोड़ कर माफी मांगनी पड़ी. सास से अलग रहने पर मामला सुलझा.

बेटी की परेशानियां

बेटी की परेशानियां सुनसुन आरती बिलख उठती. उस के घर वाले सम?ाते लेकिन अब उसे अपना दामाद ही विलेन लगता क्योंकि शादी कर के उस के सपने भी मिट्टी में मिल गए थे. उसे नाश्ते में आमलेट चाहिए उधर सीमा को प्याज से भी परहेज था. न समय पर सुकेश चाय मिलती और न ही खाना, क्योंकि मोम की गुडि़या घर का काम कर ही नहीं पाती थी. नाराज हो कर एक दिन सुकेश ने गुस्से में उस पर हाथ उठा दिया.

बस आरती को बहाने की तलाश थी. प्रैगनैंट बेटी को घर ले आई. रिश्तों में कड़वाहट तो शादी के दिन से ही शुरू हो गई थी, लेकिन अब ऐसी गांठ पड़ी जो कभी सुल?ा नहीं पाई. अब सीमा उस घड़ी को कोसती है जब वह मां का हाथ पकड़ कर मायके आई थी.

नोएडा की स्मिता की शादी को 2 साल हो चुके हैं, एक बेटा भी है. किसी छोटी सी बात पर पति के साथ ?झगड़ा हुआ तो उस ने तुरंत अपनी मां से बढ़ाचढ़ा कर शिकायत कर दी. छोटीछोटी बातों में कहासुनी भला किस पतिपत्नी में नहीं हुआ करती. लेकिन स्मिता की रोजरोज की कहासुनी और अनबन की बात सुन कर उस की मां ने उसे अपने पास बुला लिया. उस के बाद उत्पीड़न का केस कर दिया. दरअसल, स्मिता संयुक्त परिवार में नहीं रहना चाहती थी. इसी वजह से घर में आए दिन क्लेश होता रहता था. वह बच्चे को ले कर मायके आ गई और दहेज उत्पीड़न का आरोप लगा कर अदालत में मुकदमा दायर कर दिया.

इस तरह से शादी के बाद बेटी का परिवार बिखरने के करीब 40 फीसदी मामलों में लड़की की मां का हस्तक्षेप प्रमुख कारण बनता है. पिछले 4 वर्षों में महिला परिवार परामर्श केंद्र में पहुंचे हुए मामलों में यह हकीकत सामने आई है. 4 सालों में यहां 1647 मामले पहुंचे, इन में से करीब 600-700 मामलों में लड़की की मां के हस्तक्षेप के कारण बात बिगड़ी. काउंसलिंग के बाद कई परिवार बिखरने से बच गए तो कुछ परिवार मां के अनुचित हस्तक्षेप के कारण बिखर गए.

मातापिता का हस्तक्षेप

परिवारों में देखा जाता है कि इकलौती बेटी की हर इच्छा या जरूरत को पेरैंट्स पूरी करने की बहुत ज्यादा कोशिश करते हैं क्योंकि वह उन के जीवन की सब से कीमती चीज होती है. भाईबहनों के न होने से इकलौती बेटियां अपने कंधे पर बहुत बड़ा बोझ लिए होती हैं. पेरैंट्स और बेटियां दोनों एकदूसरे के लिए चिंतित और परेशान रहते हैं. इकलौती बेटियों को केवल अपनी खुद की जरूरतों पर ध्यान देने की आदत होती है. ऐसे में दूसरों के लिए सहानुभूति महसूस करने में उन्हें मुश्किल होती है.

चूंकि मातापिता लगातार उन की समस्याओं का हल करते रहे हैं, इसलिए किसी भी परेशानी के समय वे उन्हीं की सलाह मांगती हैं. चूंकि चीजें आसानी से मिलती रहीं, इसलिए किसी भी मुश्किल के आते ही घबरा जाती हैं. इकलौती बेटी का चूंकि घर में सब चीजों पर हक होता है, इसलिए उस के मन में यह प्रवृत्ति जन्म ले लेती है कि वह जो चाहती है, उसे पाना उस का अधिकार है. इकलौती बेटी अपने पेरैंट्स की उम्मीदों और महत्त्वाकांक्षाओं के लिए ही जीने की कोशिश में लगी रहती है.

तोहफे

तोहफे हर किसी को अच्छे लगते हैं. बहुत अधिक तोहफे दे कर आप अपनी बेटी की आदतों को बिगाड़ रही हैं. अगर ससुराल वाले आप की बेटी के शौकों को पूरा नहीं कर सकते तो आप आर्थिक सहायता देने का बिलकुल भी कष्ट न करें. इस तरह से आप उस के ससुराल वालों को नीचा दिखा रहे हैं और आपसी रिश्तों को खराब करने की शुरुआत कर रहे हैं.

आप बेटी के गृहस्थ जीवन में हस्तक्षेप न करें. अगर आप उस की ससुराल वालों और अपने दामाद से कुछ कहना भी चाहते हैं, तो इस तरह कहें कि उन्हें बुरा न लगे वरना इस वजह से आप और उन के संबंधों में खटास पड़ सकती है.

आज सुनने में भले ही अटपटा लगे लेकिन बात शतप्रतिशत सही है कि मांबाप के छोटीछोटी बातों में दखल देने से ही परिवार बहुत तेजी से टूट रहे हैं. मामला मनमुटाव और कहासुनी शुरू हो कर नौबत तलाक तक पहुंच रही है. अधिकांश मामलों में संबंध टूटने का मुख्य कारण बेटी की शादीशुदा जिंदगी में मां का अनुचित हस्तक्षेप करना होता है. इस वजह से इकलौती बेटियां अपनी ससुराल की उपेक्षा और मायके के प्रति अधिक झुकाव रखती हैं. मायके के प्रति समर्पित इकलौती लाडली पति और रिश्तेदारों को सम्मान नहीं देना चाहती.

दानदहेज ले कर आई इकलौती बेटी के मन में यह बात घर कर जाती है कि पति से रिश्तेदारी न हो कर उस की खरीदारी हुई हो और पति पर सिर्फ और सिर्फ उस का मालिकाना हक है. उस के बाद तो ससुराल में मनमानी और दुर्व्यवहार भी करने से नहीं चूकती और बढ़तेबढ़ते 7 फेरों का पवित्र बंधन कोर्टकचहरी के चक्करों में उलझ जाता है.

पारिवारिक रिश्तों में हो रहे क्षय के प्रमुख कारणों में से एक पतिपत्नी के दांपत्य जीवन में मां का अनुचित हस्तक्षेप देखा जा रहा है.

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