मेरे पति को कोलैस्ट्रौल है, इसको कंट्रोल करने के लिए मैं क्या करूं?

सवाल

मेरे पति के कोलैस्ट्रौल का स्तर काफी अधिक है. इस के लिए क्या उपचार हैक्या घरेलू उपायों से भी कोलैस्ट्रौल के स्तर को नियंत्रित रखा जा सकता है?

जवाब

कोलैस्ट्रौल को हृदयरोगों का सब से प्रमुख रिस्क फैक्टर माना जाता है. इस के स्तर को नियंत्रित रखने के लिए जीवनशैली में परिवर्तन लाएं. नियमित रूप से ऐक्सरसाइज करें. हलके और सुपाच्य भोजन का सेवन करें जिस में सैचुरेटेड फैट जैसे घी और मक्खन कम मात्रा मेंसब्जियांफल और साबुत अनाज अधिक मात्रा में हों. डीप फ्राई भोजन के सेवन से बचें. बाहर के फास्ट फूड से बचें क्योंकि इन में बारबार एक ही तेल का इस्तेमाल होता है.

कुल कोलैस्ट्रौल 200 से ज्यादा और एलडीएल कोलैस्ट्रौल 130 से ज्यादा है और उम्र 40 वर्ष से अधिक है तो दवा लेनी जरूरी है. दवा कोलैस्ट्रौल के स्तर को 1 महीने में 50त्न तक कम कर देती है.

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मेरे पिताजी का हृदय 60% काम कर रहा है. पूर्ण हार्ट फेल्योर से बचने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं?

जवाब

अगर हृदय की कार्यप्रणाली 50% से अधिक है तो इसे सामान्य माना जाता है. जब हृदय 40त्न से भी कम काम करता है तो इसे हार्ट फेल्योर कहते हैं. इस के कारण सांस फूलनाथकानदिल की धड़कनें तेज होनापैरों में सूजन आना जैसे लक्षण दिखाई देने लगते हैं. आप के पिताजी का हृदय 100त्न काम नहीं कर रहा हैतो ऐसे में उन्हें विशेष सावधानी रखने की जरूरत है. उन का रक्तदाबरक्त में शुगर और कोलैस्ट्रौल के स्तर को नियंत्रित रखें. समयसमय पर जरूरी जांचें कराते रहें.

-डा. आनंद कुमार पांडेय

डाइरैक्टर ऐंड सीनियर कंसल्टैंटइंटरनैशनल कार्डियोलौजीधर्मशिला नारायणा सुपर स्पैश्यलिटी हौस्पिटल 

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क्विनोआ से बनने वाली ये 5 रेसिपीज, जो आपके स्वास्थ्य के लिए है फायदेमंद

हम सभी के लिए अपनी सेहत का ध्यान रखना बेहद जरूरी है लेकिन बिजी लाइफ़स्टाइल के चलते हम ऐसा सही से नहीं कर पाते है. अगर आप भी अपनी सेहत को लेकर सीरियस है लेकिन आपके पास समय का अभाव है तो चिंता की बात नहीं है क्योंकि ऐसी कई रेसिपीज है जो आपके स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद और बनाने में आसान होती है. ऐसी रेसिपीज में है क्विनोआ, जो आजकल काफी ट्रेंड में है. क्विनोआ के पोषक तत्व और इसके कई स्वास्थ्य लाभों के कारण इसे लोग अपनी डाइट में शामिल करते हैं। यह वजन को घटाने के लिए एक अच्छा विकल्प है. 100 ग्राम क्विनोआ में 120 कैलोरी, 4.4 ग्राम प्रोटीन और 2.8 ग्राम फाइबर होता है. यहां हम आपको क्विनोआ रेसिपीज के बारे में बताएंगे जो कि आपके लिए स्वास्थ्यवर्धक हैं. जब भी इसकी रेसिपी ट्राई करें तो कुछ बातें ध्यान रखनी जरूरी है जैसे कि इसकी गंदगी निकलने तक इसे बार- बार धोएं. इसे नरम होने तक अच्छे से पकाए और पकाने के बाद कुछ मिनट के लिए ठंडा होने दें. तो आइए जानते हैं इसके बनने वाले व्यंजनों के बारे में-

  1. सलाद

इसके लिए सबसे पहले क्विनोआ को पकाएं. एक बाउल में हरा धनिया, जैतून का तेल, नींबू का रस और सिरके से ड्रेसिंग तैयार करें. अब इसमें पके हुए क्विनोआ और कटी हुई सब्जियां डालें.

2. उपमा

इसे बनाने के लिए सबसे पहले एक चम्मच तेल में राई डाले और फिर प्याज डालकर भूनें. अब इसमें अपनी पसंद की सब्जियां डालें और 5 से 10 मिनट तक भूनें. अच्छी तरह पक जाने के बाद इसमें पानी डालें और 10 मिनट तक पकने दें.

3. पुलाव

इसे बनाने के लिए सबसे पहले एक पैन में थोड़ा घी या तेल डालें और कटी हुई सब्जियां डालकर अच्छी तरह पकने तक भूनें.  अब अदरक और लहसुन का पेस्ट डालें। इसमें क्विनोआ और सब्जियां मिलाएं और इसमें मसाले जैसे नमक, हल्दी, धनिया, पुदीना की पत्तियां डालें और 10 मिनट के लिए पकाएं.

4. नींबू क्विनोआ 

इसे बनाने के लिए सबसे पहले पैन में तेल लें और राई लें. अब इसके बाद उसमें मूंगफली, हरी मिर्च डालें. मूंगफली को अच्छे से भून लीजिए. अब इसमें कटा हुआ प्याज डालें और पके हुए क्विनोआ डालकर कुछ देर तक भून लें. पक जाने के बाद इसमें नींबू का रस मिलाएं.

5. दही क्विनोआ

इसे बनाने के लिए सबसे पहले बाउल में कद्दूकस की गाजर, खीरा और अन्य मनपसंद सब्जियां डालें. इसमें नमक और हरा धनिया डालें. अब इसमें पका हुआ क्विनोआ मिलाएं. अब एक पैन में एक चम्मच तेल,जीरा और राई डालकर तड़का लगाएं. अब आप इसमें कटा हुआ अदरक और करी पत्ता डालें. इसको दही के मिश्रण के साथ अच्छी तरह मिला लें. ये व्यंजन बनकर तैयार है.

अनजाने पल: भाग 4- क्यों सावित्री से दूर होना चाहता था आनंद

मैं ने अभी तक अपनी घर की स्थिति के बारे में पिताजी को कुछ नहीं बताया था. सोचा, उन्हें क्यों परेशानी में डालूं. मां तो थी नहीं. पिताजी वैसे भी व्यापार के सिलसिले में हमेशा ही दौरे पर रहते थे. अभी मैं सोच ही रही थी कि पिताजी से मिल आऊं कि आनंद का पत्र आ गया. पत्र देख कर मेरा मन आनंदित हो गया.

बड़े ही उत्साह से मैं ने पत्र खोला. अब तो मैं नौकरी छोड़ कर भी अपनी बच्ची और पति के पास लौटने के लिए बेताब हो रही थी. कितनी अजीब होती है नारी, अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करते हुए परिवार से अलग हुई थी. अब उसी प्रकार परिवार से जुड़ने के लिए सबकुछ छोड़ने को उद्यत हो गई. लेकिन पत्र पढ़ते ही मेरा चेहरा फक पड़ गया. ऐसा लगा, मानो हजारों बरछियां शरीर को छलनी कर रही हों. बड़े ही अनुनयविनय से कड़वी दवा पर मीठी टिकिया का लेप चढ़ा कर पत्र भेजा था. सारांश यही था कि वह माया से विवाह करना चाहता है. माया के गर्भ में उस का बच्चा है. वह मुझ से तलाक चाहता है.

मेरी समझ में सारी बातें आ गईं. मुझ से अलगाव रखना, चिट्ठी न लिखना और खिंचेखिंचे रहने के पीछे क्या कारण था. यह मैं समझ गई. उस कायर की दुर्बलता पर मुझे हंसी आई. साफसाफ कह देता तो क्या मैं मुकर जाती.

मुझे नीलिमा के लिए डर लगने लगा था. परंतु उस ने लिखा था, नीलिमा माया से बहुत प्यार करती है. इसलिए वह  हमारे साथ ही रहेगी. मैं ने अपने दिल को कठोर बना कर तलाक के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए, कानूनी कार्यवाही के बाद 4 वर्षों में तलाक भी हो गया. मैं पिता के पास चेन्नई लौट आई.

मैं ने व्यापार में पिताजी का हाथ बंटाने का निश्चय कर लिया. दिल्ली की नौकरी से भी इस्तीफा दे दिया. चेन्नई में हमारी कंपनी खूब अच्छी चल रही थी. मैं ने पूरी निष्ठा से अपने को काम में समर्पित कर दिया. पर पिताजी वह सदमा झेल न पाए. तलाक होने के 2 महीने बाद ही हृदयगति रुक जाने से उन की मृत्यु हो गई.

मेरी जिंदगी की गाड़ी मंथर गति से आगे बढ़ने लगी. मैं कई मर्दों से व्यापार के दौरान मिलती. परंतु किसी से भी व्यापारिक चर्चा के अलावा कोई बात न करती. लोग मुझ से कहते भी कि तुम दोबारा विवाह क्यों नहीं कर लेतीं. परंतु मैं ने पुनर्विवाह न करने का दृढ़ संकल्प कर लिया था.

एक दिन जब मैं फैक्टरी से कार में लौट रही थी तो एक शराबी मेरी गाड़ी से टकरा कर गिर पड़ा. मैं ने गाड़ी रोकी और उसे अस्पताल ले गई. उस का इलाज करवाया. बाद में परिचय पूछने पर उस ने अपना नाम विकास बताया. उस ने बताया कि उस की पत्नी किरण कुछ दिनों पहले मर गई है. शादी हुए 2 साल ही हुए थे कि वह गुजर गई. उस के वियोग को सहन न कर पाने के कारण विकास ने शराब पीना शुरू कर दिया था.

विकास का भी कपड़े का व्यापार था. पर उस ने किरण के गुजर जाने के बाद उस की तरफ ध्यान नहीं दिया था. दुखी ही दुखियारे का दुख समझ सकता है. मैं ने विकास को सहारा दिया, उस के अंदर प्रेरणा जगाई. धीरेधीरे विकास मुझ से प्रेम करने लगा. उस ने शादी का प्रस्ताव रखा तो मैं झिझकी. तब उस ने कहा, ‘मुझे अपने पर विश्वास नहीं है. अगर तुम ने मुझे ठुकरा दिया तो मैं फिर से कहीं शराबी न बन जाऊं.’

मैं ने सोचा, दिशाहीन चलती अपनी जीवननैया को अगर खेवैया मिल रहा हो तो इनकार नहीं करना चाहिए. हम दोनों को एकदूसरे की जरूरत भी थी ही.

पर मन ने सचेत किया, ‘आज इसे मेरी जरूरत है, कल जरूरत न पड़े तो आनंद की तरह ही दूध की मक्खी के समान फेंक दे तो…’

मैं ने उस के विवाह प्रस्ताव को ठुकरा दिया. हम दोनों का व्यापार एकजैसा होने के कारण हम अकसर मिलते. परंतु विकास ने दोबारा मुझ से इस बारे में चर्चा नहीं की. हम दोनों होटल में व्यापार के सिलसिले में ही एक गोष्ठी में भाग लेने गए थे. विकास ने मुझे विचारों के घेरे से बाहर निकाला, ‘‘सावित्री, तुम ने कुछ भी नहीं खाया है. सारे लोग खा कर जा चुके हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘ओह, मुझे माफ कर दो, विकास. पुरानी यादों में मैं खो गई थी.’’

‘‘मैं समझ गया था. मैं ने उन लोगों से कह दिया है कि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है. चलो, हम यहां से सीधे आनंद के पास चलते हैं.’’

‘‘अभी वे लोग हमें आनंद से मिलने देंगे?’’

‘‘कम से कम नीलिमा से तो मिल लोगी.’’

‘‘मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती, स्वयं ही चली जाऊंगी. तुम गोष्ठी में जाओ.’’

उस ने मेरी बात न मानी. अपने सहायक को सारी बातें समझा कर वह मेरे साथ चल पड़ा. उस ने अपने ड्राइवर से गाड़ी घर भेज देने को कह दिया.

जब हम अस्पताल पहुंचे तो नीलिमा बाहर ही खड़ी मिली. वह रो पड़ी थी. अश्रुपूरित नेत्रों से उस ने हम से जुदा होने के बाद की कहानी सुनाई. जब माया ने आनंद से विवाह किया तो नीलू बहुत खुश थी. माया उस से बहुत प्यार करती थी. आनंद भी बहुत खुश था.

परंतु नीलू को माया का धीरेधीरे आंनद के करीब आना अच्छा न लगा. वह थी भी जिद्दी. आनंद का प्यार उस के लिए कम होने पर वह सह नहीं पाई. माया को वह कभी आनंद के साथ कहीं न जाने देती और उस के करीब भी न जाने देती. इस बात को ले कर हर रोज झगड़ा होता, तकरार होती, परंतु अंत में जीत नीलू की ही होती.

जब माया का बेटा हुआ तो नीलू को बहुत अच्छा लगा, लेकिन माया गुड्डू को सदा नीलू से दूरदूर ही रखती. एक दिन गुड्डू पालने में सो रहा था. माया रसोई में खाना बना रही थी. अचानक वह जाग गया और रोने लगा.

नीलू अपने कमरे से भाग कर आई और गुड्डू को गोद में उठाना चाहा. वह नीचे गिरने को हुआ तो माया ने उसे उठा लिया. माया ने सोचा कि वह गुड्डू को पालने से नीचे गिराना चाह रही थी. नीलू ने कितना समझाने की कोशिश की, परंतु न तो वह समझी, न ही उस ने आनंद को समझाने का मौका दिया. आनंद के ऐसे कान भरे कि रात में उस ने नीलू को मारा भी.

इस घटना के बाद उस परिवार में एक दरार उत्पन्न हो गई, जो बढ़ती ही गई. ऐसे ही वातावरण में दुखी, तिरस्कृत, उपेक्षित, प्यार के लिए तरसतीबिलखती नीलू बड़ी होती गई. मुझे सोच कर हैरानी होती है कि आनंद ने अपने ही खून को इस तरह लाचार, विवश और दुखी क्यों बनाया?

इस घटना के बाद जब से आनंद का तबादला चेन्नई हुआ, तब से नीलू हर रोज यही सोचती कि उस की मां उसे दोबारा मिल जाए.

मैं ने अश्रुपूरित नेत्रों से बेटी को देखा. 9 साल की उम्र में उस ने क्याकुछ नहीं देखा और सहा था. आनंद और माया हर जगह गुड्डू को ले जाते और नीलिमा को घर पर छोड़ जाते. इस बार भी डिजनीलैंड से लौटते समय कार दुर्घटना में यह हादसा हो गया था. माया की मौत हो गई थी और आनंद भी बुरी तरह जख्मी हो जीवन व मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा था. गुड्डू को तनिक भी चोट नहीं आई थी.

नीलिमा जब यह सब बता रही थी, उसी दौरान आनंद भी गुजर गया. उस से कुछ कहनेसुनने का मौका भी न मिला. मैं दोनों बच्चों को घर ले आई. विकास ने आनंद के अंतिम संस्कार में मेरी काफी मदद की. पूछताछ के दौरान पता चला कि माया का कोई रिश्तेदार नहीं था. मैं किस रिश्ते से बच्चे को यहां रखती. स्कूल में उस का क्या नाम देती. सोच में डूबी हुई थी कि नीलू अंदर आई. उस ने पूछा, ‘‘मां, क्या तुम गुड्डू की भी मां बनोगी?’’

मैं ने कहा, ‘‘मैं गुड्डू की मां ही तो हूं.’’

‘‘मैं ने आप को कितना गलत समझा था मां,’’ नीलू आत्मग्लानि से भर कर बोली.

‘‘मेरी भी तो कुछ गलती थी.’’

‘‘मैं ने आप से मिलने की बहुत कोशिश की, पर पिताजी और माया आंटी ने मौका ही नहीं दिया.’’

‘‘बेटी, जो गुजर गए, उन के बारे में अपशब्द नहीं कहते.’’

गुड्डू रोता हुआ वहां आया. 3 बरस का गोलमटोल गुड्डू बहुत प्यारा लगता था. तोतली जबान में जब उस ने पुकारा ‘दीदी’, तो नीलू ने उसे अपनी बांहों में समेटते हुए कहा, ‘‘गुड्डू, ये हमारी मां हैं.’’

मैं ने उसे गोद में ले कर पुचकारा. वह बहुत देर तक ‘मम्मीमम्मी’ कह कर रोता रहा. मैं सोचने लगी, जिस पति ने मुझे मेरी बेटी से इसलिए अलग किया था, क्योंकि उस के अनुसार, मुझ में ममता नहीं थी, स्नेह नहीं था, और अब समय का खेल देखिए उस के बच्चे मेरी गोद में आ गए.

इतने में विकास भीतर आया और बोला, ‘‘आज इन बच्चों की परवरिश के लिए पिता का स्थान मुझे दे सकोगी?’’

मैं ने कहा, ‘‘हमारे बच्चे होंगे तो क्या होगा?’’

‘‘सरकार के परिवार नियोजन का बोर्ड नहीं देखा. 2 बच्चे बस, 2 से अधिक नहीं. मैं ने औपरेशन करवा लिया है,’’ वह बोला.

‘‘अगर मैं विवाह से इनकार कर देती तो…तुम ने ऐसा क्यों किया?’’

‘‘तुम इनकार कर दो, तब भी ये बच्चे हमारे ही रहेंगे. इन बच्चों को हम ने साथसाथ ही पाया है. इसलिए मैं ने इन का संरक्षक बन कर जीवन गुजारने का निश्चिय कर लिया है.’’

इस से आगे मुझ में इनकार करने की शक्ति नहीं थी. परंतु मैं ने नीलिमा को बुला कर पूछा, ‘‘विकास अंकल को पापा कह सकोगी?’’

‘‘अगर गुड्डू के लिए तुम मां हो तो अंकल हम दोनों के पापा हुए न…’’

हम उस अनजाने पल में एकदूसरे से पूरी तरह बंध चुके थे. मैं ने कृतज्ञताभरी दृष्टि से विकास की ओर देखा. मेरी नजरों में छिपी सहमति विकास की नजरों से छिप न सकी.

BB Ott 2: अब्दू रोजिक ने मनीषा रानी के Kiss करने पर जताई नराजगी

सलमान खान का मशहूर रियलिटी शो बिग बॉस ओटीटी 2 को दर्शक काफी प्यार दे रहे है. बिग बॉस ओटीटी 2 को शुरू हुए 2 हफ्तों से ज्यादा हो गया है. अभी पिछले हफ्ते शो में अब्दू रोजिक की बतौर गेस्ट बीबी हाउस में एंट्री हुई. घर में आने के बाद अब्दू को सभी कंटेस्टेंट्स के खूब प्यार मिल रहा है. शो में मनीषा रानी ने अब्दू को किस किया था जिसका रिएक्शन अब्दू ने अब दिया है.

अब्दू ने मनीषा पर निकाला गुस्सा

बिग बॉस के विशेष कार्य के हिस्से के रूप में, अब्दू को अपने लोकप्रिय सॉन्ग चालाक ब्रो और छोटा भाईजान पर चार बिग बॉस ओटीटी 2 कंटेस्टेंट्स  के साथ एक विशेष डांस रील शूट करना था. बिग बॉस 16 के पूर्व कंटेस्टेंट अब्दू रोजिक ने इसके लिए जद हदीद, मनीषा रानी, ​​अविनाश सचदेव और जिया शंकर को चुना. हालांकि, कार्य में तब असहज मोड़ आ गया जब जकूजी में डांस करते समय मनीषा ने अब्दू के गालों पर किस कर दिया.

टास्क के बाद,  अब्दु  ने कहा- अजीब सा,“बिग बॉस, मेरा काम हो गया. उसने मुझे मार डाला, मैंने उसकी जगह किसी और को क्यों नहीं चुना? ये मेरी जिंदगी की एक बड़ी गलती थी. वह पागल है.”

 

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अब्दू ने जताई नराजगी

अब, अपने नए गाने के लॉन्च इवेंट के दौरान, अब्दु ने बिग बॉस ओटीटी 2 हाउस के अंदर की घटना के बारे में खुलासा किया. अब्दु ने मनीषा के हावभाव पर नाराजगी जताते हुए कहा कि यह ‘जबरदस्ती की किस’ थी.

अब्दू का नया गाना हुआ लॉन्च

अब्दू के गाने के लॉन्च में उनकी बिग बॉस 16 मंडली – शिव ठाकरे, साजिद खान, सुम्बुल तौकीर और मान्या सिंह ने भाग लिया.

इस बीच, बिग बॉस ओटीटी 2 हाल ही में तब विवादों में आ गया जब एक टास्क के दौरान घर के अंदर आकांक्षा पुरी और जैड हदीद के बीच किसिंग सीन को लेकर जंग हो गई. वीकेंड का वार के दौरान सलमान खान ने उन्हें फटकार लगाई थी.

Film Review Tarla: कैसी है हुमा कुरैशी और शारिब हाशमी की ‘तरला’

लेखक व निर्देषक को इस बात की जानकारी नही है कि सत्तर से नब्बे के दर्शक में किस तरह पितृसत्तात्मक सोच ने महिलाओं के पैरो में बेड़ियां डाल रखी थीं. इसी वजह से वह फिल्म में तरला की पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ लड़ाई व उनके पति नलिन दलाल के सपोर्ट को रेखांकित करने में पूरी तरह से विफल रहे हैं.

रेटिंग: पांच में से ढाई स्टार

निर्माताः अर्थस्काय पिक्चर्स, आरएसवीपी मूवीज

लेखकः गौतम वेद और पियूष गुप्ता

निर्देशकः पियूष गुप्ता

कलाकारः हुमा कुरेशी, शारिब हाशमी,पूर्णेंदु भट्टाचार्य, वीना नायर, भारती आचरेकर और अन्य

अवधिः दो घंटे सात मिनट

ओटीटी प्लेटफार्म: जी 5

इन दिनों हर होटल में जो मुख्य रसोइया होता है,उसे ‘षेफ’ कहा जाता है.इन दिनों ‘षेफ’ एक अति प्रचलित षब्द हो गया है. पर आज से पचास साल पहले इस षब्द का इजाद नहीं हुआ था. उस दौर में एक साधारण महिला तरला दलाल ने कुछ करने के मकसद से कूकिंग क्लास लेनी शुरू की. उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. फिर उनकी रेसिपी की किताबें बिकने लगीं. सत्तर से नब्बे के दशक में तरला दलाल ने रसोई के व्यंजनों /रेसिपी को लेकर जिस तरह से अपने कैरियर को अंजाम दिया कि हर कोई अचंभित रह गया. उन्होने अपने काम से पितृसत्तात्मक सोच को भी धराषाही कर दिया. यहां तक कि उनके पति नलिन दलाल भी उनकी मदद किया करते थे. तरला दलाल इंडियन फूड राइटर, शेफ, कुकबुक राइटर और कुकिंग शो की होस्ट रह चुकी हैं. वह पहली भारतीय थीं, जिन्हें 2007 में खाना पकाने की कला में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था.

उनके ‘देसी नुस्खे‘ आज भी हर भारतीय के घर में चर्चा का विषय होते हैं. तरला दलाल ऐसी शेफ थीं, जिन्हें आज भी शाकाहारी खाने को नया रूप व स्वाद देने के लिए क्रेडिट दिया जाता है. 2013 में 77 वर्ष की उम्र में निधन हो गया था. वह 17 हजार से अधिक रेसिपी देकर गयी हैं. ऐसी ही तरला दलाल की बायोपिक  फिल्म ‘‘तरला’’ लेकर फिल्मकार पियूष गुप्ता आए हैं,जो कि सात जुलाई से ओटीटी प्लेटफार्म ‘‘जी 5’’पर स्ट्रीम हो रही है.

कहानी

फिल्म की कहानी शाकाहारी भोजन बनाने की कला को आसान बनाने वाली तरला दलाल की है. स्कूल में जब षिक्षक उन्हे पढ़ा रही होती थी,तब वह कुछ करने के सपने देखती रहती थीं. वह कुछ करने के लिए शादी नही करना चाहती थीं. लेकिन उनके माता पिता ने कम उम्र में यह कह कर शादी कर दी कि ‘ जो मन में आए शादी के बाद कर लेना‘. पर तरला शादी नही करना चाहती थी. इसलिए जब पेशे से इंजीनियर नलिन दलाल (शारिब हाशमी) उनके घर आते हैं,तो  तो तरला (हुमा कुरेशी) इतनी नाराज हो जाती है कि वह नलिन को लाल मिर्च मिला हुआ हलवा परोस देती हैं. जिसे नलिन एक खेल की तरह लेते हुए शादी के लिए हां कह देते हैं.

तरला शादी कर घरेलू कामकाज में व्यस्त हो जाती हैं.उनके तीन बच्चे हो जाते हैं. पति नलिन के टिफिन लेकर फैक्ट्री जाने के बाद तरला के पास खाना बनाने,सफाई करने, अपने तीन बच्चों की देखभाल करने का ही काम रहता है. ऐसा तब तक चलता रहता है जब तक उसे अहसास नही होता कि उसे स्टोव पर भोजन पकाने के अपने कौशल को अन्य युवा महिलाओं तक पहुंचाकर उनकी जल्द शादी होने में योगदान देना है. फिर वह कूकिंग क्लास लेने लगती हैं. पर सोसायटी एतराज करती है. उधर नलिन की नौकरी चली जाती है. तब नलिन प्रकाशक बनकर तरला की कूकिंग रेसिपी की किताब छापता है.पहले किताबे नही बिकती. मगर फिर कमाल हेा जाता है. फिर तरला का टीवी कायकम आने लगात है. और एक दिन नलिन को अहसास होता है कि लोग तरला के साथ ही उसके भी प्रषंसक है क्योकि उसने पितृसत्तात्मक सोच के विपरीत जाकर अपनी पत्नी को कुछ करने में अपना योगदान दिया.

लेखन व निर्देशन

कई वर्ष तक फिल्मकार नितेश तिवारी के साथ जुड़े रहे पियूष गुप्ता की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म है,पर उन्होने दृष्यों को सुंदरता से फिल्माया है. मगर पटकथा लेखक गौतम वेद इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी हैं. इसके चलते फिल्म प्रभाव छोड़ने में असफल रहती है. लेखक व निर्देशक को इस बात की जानकारी नही है कि सत्तर से नब्बे के दषक में किस तरह पितृसत्तात्मक सोच ने महिलाओं के पैरो में बेड़ियां डाल रखी थीं.

इसी वजह से वह फिल्म में तरला की पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ लड़ाई व उनके पति नलिन दलाल के सपोर्ट को रेखांकित करने में पूरी तरह से विफल रहे हैं. भोजन के इर्द-गिर्द घूमने वाली इस  फिल्म में एक भी तत्व ऐसा नहीं है,जो इंसान के अंदर सुरूचिकर भोजन के प्रति जिज्ञासा पैदा करे. इतना ही नही फिल्म में एक भी यादगार दृश्य नहीं है.सब कुछ बड़ा बनावटी सा लगता है. यहां तक कि नलिन दलाल का किरदार भी ठीक से नहीं उभर पाया,जो कि खुद को प्रगतिषील मानता है,मगर हर मोड़ पर वह अपनी प्रषंसा का भूखा भी है,पर न मिलने पर उसके अंदर एक अजीब सी बेचैनी व जलन भी होती है.फिल्म के अंत में महज दो चार मिनट के दृष्य में इस बात को चित्रित कर लेखक व निर्देशक ने इतिश्री कर ली.इसकी मूल वजह यह हे कि नई पीढ़ी के लेखक गौतम वेद और निर्देषक से पियूष गुप्ता को सत्तर से नब्बे के दषक के समाज  की समझ नही है. इन दोनो ने उसे समझने का भी प्रयास नही किया. पीयूष ने तरला की कहानी को स्लाइस-ऑफ-लाइफ शैली में बेहतर तरीके से पेष किया है,मगर कमजोर पटकथा व कई तरह की नासमझी वाली गलतियों के चलते फिल्म मजेदार नही बन पाती. इतना ही नही फिल्म की गति काफी धीमी है.

मध्यम वर्गीय परिवार में लैंगिक असमानता,सफल कामकाजी महिला के प्रति समाज के दृष्टिकोण को भी फिल्मकार सही ढंग से  चित्रित नही कर पाए.माना कि निर्देशक एक महिला की सहानुभूति को गरिमापूर्ण तरीके से उजागर करने के लिए काफी संवेदनशील नजर आते हैं.

तरला अपने टीवी कार्यक्रम को लेकर इस कदर व्यस्त हो जाती हैं कि घर पर रसोइया रख देती हैं.नलिन नौकरी की तलाष में व्यस्त हैं. डाइनिंग टेबल पर पिता व तीन छोटे बच्चे खाना खा रहे हैं.छोटा बेटा बीच में उठकर खाना कचरे के डिब्बे में फेंक कर आता है और पिता की समझ में कुछ न आए,यह कैसे हो सकता है? यहां तक कि जब डाक्टर बताता है कि बेटे की बीमारी की वजह यह है कि उसने तीन दिन से भोजन नही किया है. तब जिस तरह से तरला व नलिन के बीच बातचीत होनी चाहिए थी,उसे भी लेखक व निर्देषक नहीं गढ़ पाए. लेखक व निर्देषक भूल गए कि किसी की बायोपिक बनाते हुए सिर्फ उसका महिमामंडन नही किया जाता.फिल्म में इस तरह की तमाम गलतियां हैं. फिल्मकार भूल गए कि कोई भी इंसान बिना असाधारण उतार चढ़ाव के बड़ा नही बन पाता.

अभिनय

कमजोर पटकथा के बावजूद तरला के किरदार को हुमा कुरेशी ने अपनी तरफ से मेहनत तो की, पर बात नही बनी. मशहूर रेस्टारेंट ‘सलीम’ के मालिक की बेटी होने के चलते हुमा कुरेशी इस किरदार में अपनी तरफ से कई आयाम जोड़ सकती थीं,पर ऐसा कुछ नही हुआ. तरला मूलतः गुजराती हैं, पर हुमा कुरेशी के मंुह से संवाद सुनकर लगता है कि यह कोई पुणे में रहने वाली महाराष्ट्यिन हैं. कई जगह उनके चेहरे पर वह भाव नही आते,जो आने चाहिए.जब डाक्टर से तरला को पता चलता है कि  उसके तीन दिन से खाना न खाने के चलते उनका बेटा बीमार हुआ है,तो मां के रूप में उनके चेहरे पर जो भाव आने चाहिए थे,वह नजर नही आते.इतना ही नही उस वक्त मां और सफल कामकाजी मां के बीच की जो कश्मकश होती है,वह भी हुमा कुरेशी के चेहरे पर नजर नही आती.‘महारानी’ या ‘मोनिका ओह माय डार्लिंग ’ से उनकी जिस अभिनय प्रतिभा के लोग दीवाने हुए थे,उसका अभाव यहां नजर आता है.

‘फिल्मिस्तान’ व ‘फुल्लूू’ के बाद ‘तरला’ में पुरूष नायक  के तौर पर नलिन दलाल के किरदार को निभाकर शारिब हाशमी ने साबित कर दिया कि वह फिल्म में हीरो बनने लायक अभिनय क्षमता रखते हैं,जिसकी अनदेखी फिल्मकार करते रहते हैं.शारिब ने अपने अभिनय से तरला को यादगार बनाने में अहम भूमिका निभायी है,जबकि लेखक ने उनके किरदार को सही ढंग से  लिखा नही है.अपनी पत्नी के ‘कुछ’करने की इच्छाषक्ति को बेहिचक बढ़ावा देने वाले पति,पत्नी की रेसिपी को टाइपकर उसकी किताब छापने तक नलिन के उत्साह को शारिब हाशमी ने अपने अभिनय से परदे पर उभारा है.माफी मांगने वाले लंबे मोनो लॉग में षारिब का अभिनय यादागर बनकर रह जाता है.छोटे किरदार में भारती आचरेकर अपनी छाप छोड़ जाती हैं.

 

अपना घर लेना आसान नहीं

एक अच्छे घर के सपने के लिए लाखों लोग अपना घर सोसायटियों में ले रहे हैं जहां सुरक्षामनचाहे लोगकुछ सार्वजनिक सुविधाएं और एक स्टेटस मिलता है. शहरों के बाहर खेती की जमीनों पर तेजी से मकान उग रहे हैं. लोन की सुविधा पर युवा जोड़े अपना आशियाना खोज रहे है. आरवीआई (रिजर्व बैंक औफ इंडिया) की रिपोर्ट के अनुसार जनवरीमार्च 2023 में घरों की बिक्री 21.6 ‘ बढ़ी और साथ ही घरों पर बकाया लोन बढ़ कर 19,36.428 करोड़ रुपए हो गया.

अपनेआप में यह सुखद बात है कि लोग अपना मकान ले रहे हैं पर अफसोस यह है कि वे बचत पर नहीं ले रहे लोन पर ले रहे हैं. लोन पर लिए मकान का मतलब बौंकर के अपने घर में 24 घंटे मेहमान की तरह रखना जो करता कुछ नहीं है सिर्फ खाता है और गुर्राता है. उस ने मकान दिलवायां तो वह मकान मालिक से ज्यादा गुर्राता है और ज्यादा खाता है क्योंकि एक भी ईएमआई में देर हुई नहीं कि पीनल इंट्रस्ट चालू हो जाता है जो घरों में बैठे इस मेहमान को खूखांर और जानलेवा तक बना देता है.

यदि सामान्य बैंक के कम इंट्रस्ट वाले लोन की इंस्टालमैंट नहीं चुका पाओ तो बाजार से ज्यादा इंट्रस्ट पर लोन लेना पड़ता है. जैसेजैसे अच्छे मकानों की तमन्ना बढ़ती जा रही है वैसेवैसे ज्यादा इंट्रस्ट वाले लोन भी बढ़ रहे हैं और अब कुल होम लोन का 56.1 का 56.1 प्रतिशत हो गया है.

अपना फ्लैट एक अच्छी ग्रेट्ड सोसायटी में होना एक अच्छा सपना है पर जिस तरह से सरकारबिल्डरप्रौपर्टी एजेंट और बैंक आम ग्राहक को लूटते है. उस से यह सपना टूटने में देर नहीं लगती. सभी शहरों में हजारों बिङ्क्षल्डगों में ताले लगे फ्लैट दिख जाएंगे जो अलाट तो हो गए हैं पर पूरा पैसा न देने पर उन का पौजेशन नहीं दिया गया.

सरकार ने रेस नाम की एक संस्था बनाई है जो बिल्डरों पर लगाम लगा कर यह भी पुलिस थाने और अदालत जैसे हो गई है जहां शिकायत हल नहीं की जाती टाली जाती हैसाल दर साल और इस दौरान बुक किए फ्लैट पर इंट्रस्ट बढ़ता रहता है और भटकते रहते हैं.

सोसायटी में रहने की तमन्ना के लायक अभी देश की इकोनौमिक हालत नहीं हुई है. देश अभी भी गरीबों का देश है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहे अमेरिका जा कर ढींग कर आए कि पिछले 10 सालों में अर्थव्यवस्था 10वें से 5वें स्थान पर पहुंच गई है. प्रति व्यक्ति आय के पैमाने पर 2015 से 2022 में आय 1600 डौलर प्रति व्यक्ति से 400 डौलर बढ़ कर 2000 डौलर हुई जबकि इसी दौरान वियटनाम जैसे पिछड़े देश में 2055 से बढ़ कर 3025 डौलर और ङ्क्षसगापुर जैसे समृद्ध देश में 59112 डौलर से बढ़ कर 69.896 डौलर हो गई है.

हम सभी अपने घर अफौर्ड नहीं कर सकते. यह साफ है. कुछ ही ऐसे चतुर हैं जो या तो मांबाप के मकाए पैसे पर या किसी तरह के भागीदार हो कर होमलोन चुकता कर पाने की स्थिति में है.

 

सैक्स फैंटेसी: लाइफ में लाएं रोमांच

इंसान स्वभाव से ही बदलाव की कामना रखता है. जीवन में जब एकरसता या मोनोटनी आ जाती है तो इस की निरंतरता जीवन में ऊब पैदा कर देती है. हर इंसान इस ऊब से उबरने की कोशिश करता है. इस के लिए वह नएनए उपाय ढूंढ़ता रहता है. मोनोटनी चाहे खानेपीने के प्रति हो या रहनसहन के प्रति. इंसान हमेशा बदलाव की तमन्ना रखता है.

यही मोनोटनी जब सेक्स प्रक्रिया में भी आ जाती है तो इंसान वहां भी ऊब से बाहर आने का विकल्प ढूंढ़ता है. यही कारण है कि पतिपत्नी के बीच भी कुछ समय के बाद दूरियां आने लग जाती हैं. दूरियों का कारण चाहे कोई भी हो मगर इस का मूल आधार संभवतया मोनोटनी ही हुआ करता है. यही दूरियां बढ़तीबढ़ती अंतत: तलाक पर आ कर रुकती है. यह सच है कि आए दिन तलाक की संख्या अविश्वसनीय रूप से बढ़ रही हैं. इस का मुख्य कारण है मोनोटनी.

आइए इसी विषय पर विस्तार से बात करते हैं कि आखिर बैडरूम में यह ऊब क्यों आ जाती है और इस ऊब से बचने का विकल्प क्या है.

ताकि ऊब से बचे रहें

अमेरिका के मशहूर लेखक लुईस ए. वर्ड्सवर्थ की लोकप्रिय बुक ‘ए टेस्ट बुक औन सैक्सोलौजी में यह लिखा है, ‘‘बैडरूम की ऊब और मोनोटनी से बचने के लिए कपल को नित्य नए रूप में सैक्स प्रक्रिया निभानी चाहिए. नएनए पोजेस की तरफ आकर्षित होना चाहिए. कभीकभी स्थान बदल कर हिल स्टेशन में जा कर कुछ दिन बिताने भी इस का एक विकल्प है.’’

लुईस आगे लिखती है, ‘‘कुछ दिनों बाद इन में भी एकरूपता या एकरसता आगे लग जाती है. तब दंपती फिर से कोई नया विकल्प तलाशने निकल पड़ते हैं सैक्स प्रक्रिया और उस की मोनोटनी से उबने और उस से बचने के लिए जो विकल्प है. उन में एक नया नाम प्रचलित हो रहा है और वह है सैक्स फैंटेसी जो पश्चिमी देशों के युवाओं में काफी प्रचलित हो रही है. इसे सही मानने वाले लोग काफी हैं तो इसे गलत ठहराने वाल भी हैं.’’

इसी विषय को ले कर मुंबई के मशहूर सैक्स काउंसलर डा. रुस्तम बताते हैं, ‘‘आप ने बहुत ही सही विषय चुना है जो लोगों में जागृति पैदा करेगा. देखिए मेरे पास आजकल ऐसे पेशैंट्स की संख्या बढ़ती जा रही है. आजकल का जैनरेशन इंस्टैंट जैनरेशन है. उसे फास्ट फूड की ही तरह फास्ट प्लेजर भी चाहिए. इस में धीरज नहीं है. जबकि ‘सैक्स इज गेम औफ पेशंस.’ ’’

डा. ईरानी ने आगे बताया कि सैक्स प्रक्रिया में शरीर की ही हिस्सेदारी नहीं रहती है मन भी उतना ही इनवौल्व रहता है. इसलिए सैक्स प्रक्रिया के पहले फोरप्ले यानी छेड़छाड़, आलिंगन, किसिंग, हगिंग आदि अति आवश्यक है, जिसे आज की युवा पीढ़ी इगनोर करती देखी गई है. गलती उन की भी नहीं है. उन पर काम का बोझ इतना ज्यादा रहता है कि मानसिक थकान बहुत जल्दी हो जाती है.

इस वजह से फोरप्ले में जितना इनवौल्व होना चाहिए वह उतना नहीं हो पाती है. फलस्वरूप उसे सैक्स प्रक्रिया में परमआनंद या और्गेज्म की प्राप्ति नहीं हो पाती है. यहीं से सैक्स प्रक्रिया के प्रति उस की अरुचि शुरू हो जाती है. जो धीरेधीरे ऊब में बदल जाती है. यह ऊब दूरियां बनाने लगती है और दूरियां धीरेधीरे तलाक के पड़ाव तक जा पहुंची है.

शरीर और मन दोनों प्रभावी

डा. ईरानी के ही पेशैंट गौरव ग्रोवर और उन की पत्नी नेहा ग्रोवर बताते हैं, ‘‘जी हां हम लोग भी अपनी सैक्स लाइफ से ऊब चुके हैं. इसीलिए यहां आए हैं. अब कोई चार्म नहीं रह गया है सैक्स में.

‘‘हमारी शादी को अभी सिर्फ 2 ही साल हुए हैं, मगर सैक्स प्रक्रिया में हमारी रुचि न जाने क्यों नो चार्म के पौइंट पर आ गई है. अन्य सभी कामों की तरह सैक्स भी हमें रोजमर्रा की तरह ही बोरिंग लगने लगा है.’’

गौरव ने आगे बताया, ‘‘हम ने अपनी इस सैक्स लाइफ में थ्रिल लाने के लिए तरहतरह के उपाय किए. वीडियो देख कर वार्म होना शुरू किया. कई दवाओं का भी उपयोग किया. वीकैंड में किसी होटल में जा कर भी रहने लगे. इस से कुछ दिनों के लिए हमारी मोनोटनी तो अवश्य खत्म हो गई. हमें इस बदलाव से आनंद तो आने लगा, मगर चंद दिनों के बाद ही  इस में भी हमें बोरियल सी होने लगी. फाइनली हम लोग डाक्टर ईरानी केपास आए हैं.’’

डाक्टर साहब ने हमें कुछ बड़े अच्छे टिप्स दिए हैं. इन से हमें काफी फायदा हो रहा है,’’ नेहा ने ?ोंपते हुए कहा.

वे टिप्स क्या हैं? पूछने पर ‘सैक्स फैंटेसी,’ इतना कह कर नेहा चुप हो गईं. तब गौरव ने आगे बताया, ‘‘फैंटेसी का मतलब कल्पना की दुनिया. डाक्टर ईरानी ने हमें सलाह दी कि बैडरूम में जाते ही हम दोनों को कल्पना की दुनिया में चले जाना होगा. मतलब बैडरूम में जाते ही मैं पत्नी को कैटरीना कैफ सम?ाने लगता हूं और ये मुझे अपना पसंदीदा अक्षय कुमार और फिर दोनों हंसने लगे.

यह एक गंभीर विषय है और इस का एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है. इस के मनोवैज्ञानिक  विश्लेषण के लिए पुणे यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान के अवकाशप्राप्त प्रोफैसर कल्पेश देसाई से मुलाकात की. वे कहते हैं, ‘‘जी हां इस का एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी है जो काफी महत्त्वपूर्ण है. इंसान के मस्तिष्क में प्रत्यक्ष और परोक्ष 2 ग्रंथियां होती हैं. ये दोनों ग्रंथियां 24 घंटे ऐक्टिव रहती हैं. हम नींद में भी रहते हैं तो परोक्ष मस्तिष्क अपनी उड़ान भरता रहता है और मन की अधूरी या अपूर्ण इच्छाओं को दिवास्वपन के रूप में पूरी करता रहता है. इन्हीं लुकीछिपी इच्छाओं में एक है सैक्स फैंटेसी.’’

प्रोफैसर देसाई आगे बताते हैं, ‘‘इस प्रक्रिया में संलग्न कपल किसी की भी कल्पना मन ही मन में कर लेते हैं. चाहे उन का कश हो या कालेज, महल्ले या फिर पड़ोस का कोई लड़का अथवा लड़की. जो पसंद हो. उसे अपनी कल्पना में ढाल लेते हैं, मगर यह भले ही उन का सैक्स लाइफ में एक नया थ्रिल ला देता हो, मगर साइकोलौजिकली यह गलत है. जिस इंसान की आप किसी और रूप में कल्पना कर रहे हों उस के व्यक्तित्व को उस की पर्सनैलिटी को आप किल कर रहे हैं. उस के आत्मसम्मान को चोट पहुंचा रहे हैं. जानेअनजाने उस का अपमान कर रहे है. सैक्सोलौजिस्ट्स भले ही इसे दवा मानें मगर साइकोलौजिस्ट्स कभी इस की सलाह नहीं देते हैं.’’

प्रोफैसर कल्पेश देसाई की बातों ने दुविधा में डाल दिया तो इस के समाधान हेतु मुंबई के उपनगर मलाड की गाइनोकोलौजिस्ट डाक्टर अंजलि मालवानकर से मुलाकात की. वे कहती है, सैक्स प्रक्रिया एक ऐसी पूर्व प्रक्रिया है जिस से शरीर के साथसाथ मन का भी इनवौलमैंट होता है. इस संपूर्ण प्रक्रिया में लगभग 200 कैलोरी बर्न होती है. सरल शब्दों में कहें तो इस पूरी प्रक्रिया में मस्तिष्क और प्रजनन अंगों के बीच एक

रिश्ता कायम हो जाता है. मस्तिष्क के आदेश पर कई हारमोन होते हैं. मुख्यतया ऐस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरौन और टेस्टोस्टेरौन. ये लूब्रिकैंट्म तभी पैदा होते हैं जब हम स्वस्थ फोरप्ले की प्रक्रिया से गुजरते हैं. मतलब मैडिकल दृष्टिकोण से भी सैक्स प्रक्रिया के लिए फोरप्ले बहुत जरूरी है और अगर फोरप्ले के लिए सैक्स फैंटेसी का सहारा लेना पड़े तो इस में कुछ कोई गलत

नहीं है.’’

खुल कर बात करें

डा. अंजलि आगे कहती हैं, ‘‘हमारे यहां 90% महिलाएं सैक्स के बारे में जानने के लिए उत्सुक तो होती हैं, मगर उस पर बातें करने में शरमाती हैं पर यही महिलाएं गूगल में सैक्स के बारे में सब से ज्यादा सर्च करती हैं. तरहतरह के सवालों के जवाब ढूंढ़ती रहती हैं. एक सर्वे के अनुसार 80% लड़कियां सैक्स और और्गेज्म के विषय में सर्च करती हैं, जबकि 55% पुरुष ही इन विषयों पर सर्च करते हैं.

‘‘जहां तक सैक्स फैंटेसी की बात है इस के बारे में जानने की उत्सुक्ता पुरुषों में ज्यादा होती है. महिलाओं में न के बराबर होती है. जबकि उन्हें खुल कर इस विषय पर चर्चा करनी चाहिए और डाक्टरों की सलाह लेनी चाहिए क्योंकि गलत इलाज या गलत दवाएं नुकसान भी कर सकती हैं.’’

सैक्स फैंटेसी के भावनात्मक पहलू पर गौर करें तो यह सच है कि आशाओं और आकांक्षाओं का कोई अंत नहीं होता है. यह एक ऐसी चाह है जिस के पीछे इंसान हमेशा भागता ही रहता है और अंतत: इस की मृगतृष्णा में भटकता रह जाता है. इसलिए इस मृगतृष्णा के पीछे भागने के बदले हमें इस का कोई विकल्प ढूंढ़ना बेहतर होगा. हमें प्राकृतिक पारंपरिक और सही विकल्प यानी फोरप्ले की शरण में जाना होगा. जहां तक सैक्स फैंटेसी की बात है तो यदि यह सैक्स प्रक्रिया में आई ऊब को मिटाता है तो इस का सहारा लेने में कोई बुराई नहीं.

मगर याद रहे यह विकल्पों की आखिरी कड़ी होनी चाहिए. अंतिम पूर्णविराम होना चाहिए क्योंकि सुखद सैक्स लाइफ के लिए इच्छाओं की चाहें हम कतार लगाएं या आकांक्षाओं का अंबार पर इस सुख की तिजोरी तो संतुष्टि की चाबी से ही खुलती है.

मेरे परिवार में हार्ट अटैक के कई केस हुए है, मैं जानना चाहता हूं कैसे पता करें हार्ट अटैक आने वाला है?

सवाल

मेरे परिवार में हार्ट अटैक का इतिहास रहा है. हार्ट अटैक आने से पहले कैसे पता करें कि हार्ट अटैक आ सकता है?

जवाब

हार्ट अटैक तब आता है जब हृदय की ओर रक्त ले जाने वाली धमनियों में ब्लौकेज आ जाती है. अवरोध/ब्लौकेज 50त्न के स्तर से अधिक होने पर खतरा काफी बढ़ जाता है. लेकिन हार्ट अटैक आने के पहले ब्लौकेज के बारे में पता लगाना मुश्किल होता है क्योंकि अधिकतर मामलों में 70त्न ब्लौकेज होने तक कोई लक्षण दिखाई नहीं देता है. लेकिन इन अवरोधों की सीटी कोरोनरी ऐंजियोग्राफी के द्वारा केवल 2 मिनट में आसानी से पहचान की जा सकती है. अगर आप के परिवार में हार्ट अटैक का इतिहास है तो आप यह जांच कराने में बिलकुल देरी न करें और नियमित अंतराल पर कराती रहें. जब अवरोध/ब्लौकेज 80त्न के स्तर को पार करती है तो एनजाइना हो सकता है, लेकिन इस का पता भी टीएमटी (ऐक्सरसाइज स्ट्रैस टैस्ट) या सीटी ऐंजियोग्राफी के द्वारा लगाया जा सकता है.

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मुझे पिछले 4-5 साल से उच्च रक्तदाब की शिकायत है. मुझे बारबार चक्कर आने लगते हैं, दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं. उच्च रक्तदाब के क्या खतरे हैं और इसे नियंत्रित रखने के लिए क्या उपाय करने चाहिए?

जवाब

यदि रक्तदाब 140-90 से ज्यादा है तो उसे उच्च रक्तदाब माना जाता है. नमक का सेवन कम करें, नियमित रूप से ऐक्सरसाइज करें. अपना वजन न बढ़ने दें, अगर बढ़ गया हो तो उसे कम करने का प्रयास करें. धूम्रपान और शराब का सेवन बिलकुल बंद कर दें. अगर रक्तदाब को नियंत्रण में न रखा जाए तो हार्ट अटैक, किडनी रोग, स्ट्रोक, पैरों की धमनियों में ब्लौकेज आना, आंखों के परदे में ब्लीडिंग होने से आंखों की रोशनी चले जाना जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है.

डा. आनंद कुमार पांडेय

डाइरैक्टर ऐंड सीनियर कंसल्टैंट, इंटरनैशनल कार्डियोलौजी, धर्मशिला नारायणा सुपर स्पैश्यलिटी हौस्पिटल 

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.

Monsoon Special: हेयर मास्क, जो डैंड्रफ के इलाज में है कारगर

हर कोई अपने बालों का खास ख्याल रखता है. इसके लिए कई सारे उपाय भी अपनाते हैं लेकिन कई बार जानकारी के अभाव में हम अपने बालों को और नुकसान पहुंचा लेते हैं जिससे डैंड्रफ जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं. इससे आपके बाल सूखे और बेजान दिखने लगते हैं. बाजार में कई ऐसे प्रोडक्ट है जो डैंड्रफ को कम करने का वादा करते हैं लेकिन अक्सर कैमिकल आपके बालों के लिए हानिकारक होते हैं इसीलिए हम यहां आप को प्राकृतिक और हर्बल सामग्री वाले हेयर मास्क अपनाने की सलाह देते हैं जो बालों की समस्या से निपटने के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकते हैं. हेयर मास्क आपके बालों को पोषण और कंडीशनिंग देते हुए डैंड्रफ को खत्म करने में मदद कर सकते हैं. इनसे आपकी स्कैल्प में खुजली, डैंड्रफ जैसी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है तो आइए जानते हैं इन हेयर मास्क के बारे में-

दही, शहद और नींबू का मास्क- नींबू के रस में साइट्रिक एसिड आपके बालों के पीएच को बैलेंस करने में मदद कर सकता है.  दही बालों के डैमेज में सुधार और कंडीशनिंग में मदद कर सकती है। शहद से डैंड्रफ जैसी समस्याओं में सुधार हो सकता है.

सामग्री-

  1. 1/2 कप दही
  2. 1 बड़ा चम्मच नींबू का रस
  3. 1 बड़ा चम्मच शहद

सभी सामग्रियों को एक कटोरे में मिलाकर पतला मिश्रण तैयार करें। इस मिश्रण को अपने बालों की जड़ों से शुरू कर सिरे तक लगाएं. इसे 30 मिनट तक लगा रहने दें और बाद में हल्के सल्फेट फ्री शैंपू से बालों को धो लें. इसे आप अपने बालों में हफ्ते में एक से दो बार लगा सकते हैं.

केला, शहद, नींबू और जैतून का तेल- केला आपके बालों को मुलायम बनाने और डैंड्रफ को बैलेंस करने में मदद कर सकता है. जैतून का तेल आपके बालों को मुलायम और मजबूत बनाने में और नींबू के रस से आपके बालों का पीएच बैलेंस करने में मदद मिल सकती है. शहद डैंड्रफ को कम करने में मदद कर सकता है.

सामग्री

  1.  2 पके केले
  2.  1 बड़ा चम्मच शहद
  3.  1 बड़ा चम्मच जैतून का तेल
  4.  1 बड़ा चम्मच नींबू का रस

सबसे पहले बाउल में केले को अच्छी तरह मैश कर लें. अब इन केलों में जैतून का तेल, शहद और नींबू का रस मिलाएं और पेस्ट तैयार कर लें. इस हेयर मास्क को अपने स्कैल्प और बालों पर 30 मिनट के लिए लगाएं। इसके बाद बालों को सल्फेट फ्री शैंपू से धो लें.

अंडे और दही का हेयर मास्क- अंडा और दही आपकी स्कैल्प को पोषण और नमी देते हैं. इससे डैंड्रफ जैसी समस्या में राहत मिलती है.

सामग्री-

  1.  1 अंडा
  2.  2 बड़े चम्मच जैतून का तेल
  3.  1 कप दही
  4.  1 बड़ा चम्मच नींबू का रस

सबसे पहले एक बाउल में इन सामग्री को अच्छे से फेंटें. अब इस हेयर मास्क को अपने बालों पर अच्छी तरह लगाएं और 20 मिनट तक रहने दे। अब बालों को हल्के शैंपू से धो ले.

यह ध्यान रखें कि अपने बालों को धोने के लिए ठंडे पानी का उपयोग करें क्योंकि गर्म पानी अंडे को पका सकता है.

नारियल का तेल-  नारियल का तेल एटोपिक डर्मेटाइटिस से राहत दिलाने में मदद करता है.  इसलिए यह डैंड्रफ से छुटकारा दिलाने में भी मदद कर सकता है.

सामग्री

3 बड़े चम्मच नारियल तेल सबसे पहले नारियल के तेल को हल्का गर्म करें. इसके बाद गरम नारियल तेल की मालिश करना शुरू करें. लगभग 10-15 मिनट तक अपने स्कैल्प और बालों की अच्छे से मालिश करें. इसे 30 मिनट तक बालों पर रखा रहने दें और इसके बाद हल्के सल्फेट फ्री शैंपू से बालों को धो लें.

अपने अपने सच: पहचान बनाने के लिए क्या फैसला लिया स्वर्णा की मां ने?

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