अनजाने पल: भाग 3- क्यों सावित्री से दूर होना चाहता था आनंद

अपनी पीएचडी की समाप्ति पर प्रफुल्लचित, उत्साहित मैं जयपुर चल पड़ी. मन मुझे दोषी ठहराने लगा. मैं ने इन 6 महीनों में उन लोगों की कोई खोजखबर नहीं ली थी. उन लोगों ने भी मुझे कोई पत्र नहीं लिखा था. मैं सोचने लगी कि मेरी बेटी नीलिमा को भी क्या मेरी याद कभी नहीं आई होगी. पर मैं ने ही कौन सा उसे याद किया. पीएचडी की तैयारी इतनी अजीब होती है कि व्यक्ति सबकुछ भूल जाता है. परंतु इस में गलती ही क्या है? आनंद भी जब कंपनी की तरफ से ट्रेनिंग के लिए 6 महीने के लिए विदेश गया था तो उस ने भी तो कोई खोजखबर नहीं ली थी.

मैं भी तो व्यस्त थी. आनंद मेरी मजबूरी जरूर समझ गया होगा. मैं जब घर जाऊंगी तो वे लोग बहुत खुश होंगे. सहर्ष मेरा स्वागत करेंगे. मन में आशा की किरण जागी, लेकिन तुरंत ही निराशा के बादलों ने उसे ढक दिया, ‘क्या सचमुच वे मेरा स्वागत करेंगे? मुझे अगर घर में प्रवेश ही नहीं करने दिया तो?’ संशय के साथ ही मैं ने जयपुर पहुंच कर ननद के घर में प्रवेश किया.

ननद विधवा हो गई थी. अपना कोई नहीं था. नीलिमा से उसे बहुत प्यार था. बहुत रईस भी थी, इसलिए बड़ी शान से रहती थी. घर में नौकरचाकरों की कमी नहीं थी. मैं ने डरतेडरते भीतर प्रवेश किया. आनंद बाहर बरामदे में खड़ा था. उस ने मुझे देखते ही व्यंग्यभरी मुसकराहट के साथ कहा, ‘मेमसाहब को फुरसत मिल गई.’

मैं ने जबरदस्ती अपने क्रोध को रोका और मुसकराते हुए अंदर प्रवेश किया. अंदर से ननद की कठोर व कर्कश आवाज ने मुझे टोका, ‘जिस परिवार से तुम ने 6 महीने पहले रिश्ता तोड़ दिया था, अब वहां क्या लेने आई हो?’

‘मैं ने…मैं ने कब रिश्ता तोड़ा था?’

ननद बोली, ‘जब बच्ची को मेरे सुपुर्द कर दिया तो क्या संबंध तोड़ना नहीं हुआ?’

मैं ने हैरान हो, बरबस अपनी भावनाओं को काबू में रखते हुए, कहा, ‘दीदी, मैं आप से अपना अधिकार जताने या लड़ने नहीं आई हूं. नीलिमा कानूनन आज भी मेरी ही बेटी है. मैं केवल उसे लेने आई हूं.’

सफर की थकान और मई की लू के थपेड़ों ने मुझे पहले ही पस्त कर दिया था. ऊपर से आनंद के शब्दों ने मुझे और भी व्यथित कर दिया. उस ने बेरुखी से कहा, ‘नीलिमा को ले जाने का खयाल अपने दिल से निकाल दो. वह तुम से कोई संबंध रखना ही नहीं चाहती.’

मैं ने आपा खोते हुए कहा, ‘क्या रिश्ते कच्चे धागों के बने होते हैं, जो इतनी जल्दी टूट जाते हैं?’

इतने में नीलिमा बाहर आई. मैं ने सोचा था कि वह मुझ से गले मिलेगी, रोएगी. अगर वह मुझे कोसती, रूठती, रोती, कुछ भी करती तो मैं खुश हो जाती. परंतु उस की बेरुखी ने मुझे परेशान कर दिया.

उसी ने कहा, ‘मां, क्या लेने आई हो यहां?’

‘शुक्र है, तुम मुझे अब भी मां तो मानती हो. मैं तुम्हारे पास आई हूं. मेरी पीएचडी पूरी हो गई है. जून से मुझे प्रिंसिपल का पद मिल जाएगा. कालेज के कैंपस में ही हमारा घर होगा. तुम्हें वहां बहुत अच्छा लगेगा. अब हम साथसाथ रहेंगे.’

‘पिताजी हमारे साथ नहीं चलेंगे. और मैं उन के बगैर रह नहीं सकती. क्या आप हमारे साथ यहां नहीं रह सकतीं?’

मैं कुछ भी न कह पाई. मेरा वजूद मुझे नौकरी छोड़ने से रोक रहा था. मैं तबादले की कोशिश करने को तैयार थी. प्रिंसिपल का पद छोड़ने को भी तैयार थी, परंतु नौकरी छोड़ कर बैठे रहना मुझे मंजूर नहीं था. अगर मर्द का अहं इतना तन जाए तो नारी ही क्यों झुके? हम दोनों ने अपनेअपने अहं के चलते बच्ची के भविष्य की बात सोची ही नहीं.

मैं ने फिर विनम्रता और स्नेह से कहा, ‘बेटी, मैं तबादले की कोशिश करूंगी. तब तक तुम मेरे साथ रहो. एक साल के भीतर हम यहीं आ जाएंगे.’

नीलिमा ने पलट कर पिता की ओर देखा, ‘क्यों, मंजूर है?’

आनंद बोला, ‘सोच लो. मैं वहां नहीं रहूंगा. तुम्हें घर में अकेले दीवारों से बातें करते हुए रहना पड़ेगा. फिर तुम्हारी मां के कथन में न जाने कितनी सचाई. बाद में मुकर जाए तो…’

मुझे आनंद पर बहुत क्रोध आया कि न जाने भाईबहन ने नीलिमा से मेरे विरुद्ध  क्या कुछ कह दिया था. वह बेचारी अपने नन्हे से मस्तिष्क में विचारों का बवंडर लिए चुप रह गई.

मेरी ननद ने कहा, ‘अभी बच्ची को ले जाने की क्या जरूरत है. जब तबादला हो जाए तब देख लेंगे. अभी तो वह यहां बहुत खुश है.’

मुझे यह सलाह ठीक लगी. मैं अगली ट्रेन से ही दिल्ली लौट

आई. मेरे मन में भी आगे के कार्यक्रमों के बारे में योजनाएं बनने लगी थीं. मैं ने लौटते ही अपने तबादले के बारे में सैक्रेटरी से अनुरोध किया तो उन्होंने कहा, ‘तुम्हारी प्रिंसिपल की नौकरी के लिए सिफारिश आई है. क्या यह सबकुछ छोड़ कर जयपुर जाना चाहोगी?’

मैं ने कहा, ‘परिवार की खुशी के लिए नारी को थोड़ा सा त्याग करना ही पड़ता है. तभी तो वह नारी होने का दायित्व निभा पाती है.’

मुझे लोगों ने बहुत समझाया, पर मैं टस से मस न हुई. लेकिन तबादले की अर्जी देते ही तो तबादला नहीं हो जाता. सरकारी विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षकों का आदानप्रदान हो सकता है. यूनिवर्सिटी में उत्तरपुस्तिकाओं की जांच के दौरान मेरी रजनी से मुलाकात हुई. उस के पति का दिल्ली तबादला हो गया था और वह भी यहां आना चाहती थी. जयपुर कालेज से दिल्ली आने की उस की उत्सुकता देख मैं भी अत्यंत प्रसन्न हुई. हम दोनों ने ही आदानप्रदान के सारे कागजात जमा करवा दिए.

फिर मैं 4 दिनों की छुट्टी ले जयपुर गई. जयपुर से मेरे पति के पत्र नियमित रूप से नहीं आते थे. ननद तो कभी लिखती ही नहीं थी. मैं अपने खयालों में खोई हुई यह सोच भी नहीं पाई कि शायद वे लोग मुझ से कन्नी काट रहे हैं.

जयपुर पहुंचने पर पता चला कि ननद को कैंसर था. जब तक पता चला, काफी देर हो चुकी थी. उन की देखभाल के लिए माया नाम की 20-21 वर्षीय नर्स रख ली गई थी. मैं ने पति से पूछा, ‘मुझे सूचना क्यों नहीं दी, क्या मैं इतनी गैर हो गई थी?’

आनंद ने कहा, ‘पता नहीं, तुम छुट्टी ले कर आतीं या नहीं. और इस बीमारी में इलाज भी काफी दिनों तक चलता रहता है.’

मैं ने उस समय भी यही सोचा कि शायद उस ने मेरे बारे में ठीक ही निर्णय लिया होगा. मैं ने अपने तबादले के बारे में उस से जिक्र किया तो वह बोला, ‘इस समय तुम्हारा तबादला कराना ठीक नहीं होगा. दीदी बहुत बीमार हैं. माया उन की देखभाल अच्छी तरह कर ही लेती है. वह इलाज के बारे में सबकुछ जानती भी है. नीलू भी उस से काफी हिलमिल गई है.’

‘मेरे आने से इस में क्या रुकावट आ सकती है?’

‘डाक्टरों का कहना है कि दीदी महीने, 2 महीने से ज्यादा रहेंगी नहीं. फिर मैं भी जयपुर में रहना नहीं चाहता. मेरा अगला तबादला जहां होगा, तुम वहीं आ जाना. यही ठीक रहेगा.’

मैं समझ ही नहीं पाई कि वह मुझ से पीछा छुड़ाना चाह रहा है या मेरी भलाई चाहता है. मैं नीलू से जब भी कुछ बोलना चाहती, वह  ‘मां, मुझे परेशान मत करो’, कह कर भाग जाती.

माया दिल की अच्छी लगती थी, देखने में भी सुंदर थी. नीलू से वह बहुत प्यार करती थी. परंतु मैं ने पाया कि वह मेरे पति और बेटी के कुछ ज्यादा ही करीब है. वातावरण कुछ बोझिल सा लगने लगा. ननद मुझ से ठीक तरह से बोलती ही नहीं थी. वह बोलने की स्थिति में थी भी नहीं, क्योंकि काफी कमजोर और बीमार थी.

मैं वहां 2 दिनों से ज्यादा रुक न पाई. जाने से पहले मैं ने रजनी को अपनी मजबूरी बताते हुए फोन कर दिया था.

जब दिल्ली लौटी तो मन में दुविधा थी, ‘क्या मुझे जबरदस्ती वहां रुक जाना चाहिए था. पर किस के लिए रुकती? सब तो मुझे अजनबी समझते थे.’ कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था.

मुश्किल से 10 दिन बीते होंगे कि आनंद का पत्र आया. ‘दीदी की मृत्यु उसी दिन हो गई थी, जिस दिन तुम दिल्ली लौटी. मैं ने यहां से तबादले के लिए अर्जी भेजी है. आगे कुछ नहीं लिखा था. मैं ने संवेदना प्रकट करते हुए जवाब भेज दिया. इस के बाद एक महीना बीत गया. आनंद ने मेरे किसी भी पत्र का जवाब नहीं दिया.

मैं ने चिंतातुर जब बैंक मुख्यालय को फोन किया तो पता चला कि आनंद 15 दिन पहले ही तबादला ले कर मुंबई जा चुका है. उस ने जाने की मुझे कोई खबर नहीं दी थी.

मेरा मन आनंद की तरफ से उचट गया. मुझे मर्दों से नफरत सी होने लगी. इस प्रकार मुझ से दूरी बनाए रखने का क्या कारण हो सकता है, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था.

क्या है मानसिक रोग

बीमारी चाहे शारीरिक हो या मानसिक उस के कारणों के प्रति जनमानस की कुछ मान्यताएं होती हैं और अधिकांश मान्यताएं गलत ही होती हैं क्योंकि वे मनगढ़ंत या पारंपरिक मान्याओं पर आधारित होती हैं न कि चिकित्सीय दृष्टिकोण पर.

यहां कुछ उदाहरणों द्वारा मानसिक बीमारियों के प्रति मान्याओं पर प्रकाश डाल कर चिकित्सीय दृष्टिकोण से रूबरू होते हैं:

मानसिक बीमारी जेनेटिक होती है: ‘‘अरे, आप सुनीता से अपने बेटे की शादी करने जा रही हैं? आप को पता है कुछ सालों पूर्व उस की मां को मानसिक बीमारी हो गई थी. सुनीता भी वैसे ही बीमार हो सकती है. यह बीमारी जेनेटिक हो सकती है. उस लड़की से अपने बेटे का रिश्ता मत जोड़ो,’’ शांता अपनी सहेली से कह रही थी.

इस गलत सोच के कारण उच्चशिक्षित, सुंदर एवं स्वस्थ सुनीता का विवाह होना रुक गया. यह एक आम धारणा है कि अगर माता या पिता मानसिक रूप से बीमार हैं तो उन की संतान भी कुछ समय के बाद उसी बीमारी से पीडि़त हो जाती है.

यह सही नहीं है. रिसर्च के अनुसार सिर्फ 90% मरीजों के पारिवारिक इतिहास में किसी भी सदस्य का मां या पिता की बीमारी से ग्रस्त न होना यह साबित कर चुका है. रिसर्च में पाया गया कि वे सामान्य जीवन व्यतीत करते हैं.

मानसिक बीमारी जन्मपूर्र्व में किए गए कुकर्मों का परिणाम है: जब मानसिक रूप से बीमार किसी व्यक्ति को देखा जाता है, तो इस प्रकार टिप्पणी की जाती है, ‘‘देखो उस बेचारे की तरफ, उस ने पूर्व जन्म में कुछ पाप किए होंगे जिन की सजा वह भुगत रहा है. जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है. वह अपने कर्मों के फल से बच नहीं सकता.’’

जब लोग बीमारी के सही कारणों को नहीं जानते हैं तो इस प्रकार बुरे कर्मों के खिलाफ चेतावनी देते हैं. लेकिन हमें यह जानना चाहिए कि मानसिक बीमारियां मस्तिष्क में विशेष परिवर्तन के कारण होती हैं न कि बुरे कर्मों के परिणामस्वरूप.

गीता का गलतफहमी फैलाने वाला पाठ बड़े काम आता है. इस से पंडों की ग्रहशांति का मौका भी मिलता है, जिस में मोटी दक्षिणा मिलती है. जब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज रंजन गोगई देवी शक्तियों की बात कर सकते हैं तो आम लोगों का क्या कहना.

मानसिक बीमारियां उपद्रवी बुरी आत्माओं के कारण होती हैं: 25 वर्षीय नीला नाटी एवं पतली है. अचानक पिछले 3 महीनों से उस के स्वभाव में परिवर्तन आ गया है. यह कहा जाता है कि उस पर बुरी आत्मा का साया है. यह आत्मा अलगअलग समय पर विभिन्न लक्षणों को प्रकट करती है. वह प्राय: आक्रामक एवं हिंसक हो जाती है. उसे रोकने पर वह रोकने वालों को धक्का दे कर भाग जाती है. वह अपने पति एवं सास पर चीखतीचिल्लाती एवं गालियां देती है.

वह किसी के भी घर चली जाती है एवं भोजन मांगती है जो कुछ मिलता है, उसे निगल जाती है. वह इतना भोजन खा जाती है जितना 3 व्यक्ति खा सकते हैं. वह गांव में घूमती रहती है. लोगों को उसे देख कर आश्चर्य होता है कि क्या वह पागल हो गई है?

विक्रम 30 साल का है. एक कुशल कर्मचारी था, उफ अब वह आलसी हो गया है. प्राय वह अब स्वयं ही से बातें करता रहता है. कभीकभी चिल्लाने लगता है और कहता है, ‘‘दूर चले जाओ वरना मैं आप पर थूक दूंगा. वैसे ही जैसे वह किसी को आदेश दे रहा हो. उस की स्थिति दयाजनक हो गई है, वह रात में सो नहीं पाता है एवं अपने स्वास्थ्य पर भी ध्यान नहीं दे रहा है. उस का वजन घट गया है. उस के गांव वालों का कहना है कि वह एक या अधिक औरतों की आत्मा का शिकार बन गया है जो उस की जीवन शक्ति को चूस रही हैं और उसे सिर्फ चमड़ी और हड्डियों का ढांचा बना दिया है.

सच यह है कि नीला हिस्टीरिकल न्यूरोसिस नाम बीमारी से ग्रस्त है. वह घर में पति एवं अन्य परिवारजनों से खुश नहीं है. उन के बुरे व्यवहार के प्रति उस ने विरोध भी जताया, लेकिन किसी ने भी उसे सहारा नहीं दिया और न ही सहानुभूति दिखाई. उस के इस व्यवहार पर उस के अवचेतन मन ने एक तरीका खोजा और उस ने सामाजिक रूप से मानव धारणा ‘आत्मा लगना’ को अपना लिया और इस प्रकार वह समोहित व्यक्ति की तरह व्यवहार करने लगी एवं अपने पति एवं ससुराल वालों के बारे में बुरा बोलने लगी. उन्हें गालियों भी देने लगी. सभी यह सोचते हैं कि यह सब प्रेत आत्या कर रही है और वे नीला के साथ सहानुभूति रखते हैं.

विक्रम गंभीर मानसिक विकार सिजोफ्रेनिया से ग्रस्त है. इस बीमारी में व्यक्ति की ठीक तरह से सोचने की क्षमता कम या खत्म हो जाती है. वह अज्ञात आवाज सुनता है. बगैर किसी उद्दीपन के स्वप्न या दृश्य देखता है एवं उन के प्रति दृष्टि भ्रम, प्रतिक्रियाएं देता है. इस प्रक्रिया को हलूसिनेशन कहते हैं. उस की सासें एवं व्यवहार प्राकृतिक रूप से अजीब हो जाता और लोग इस गलतफहमी में रहते हैं कि आत्माएं उस से बातें कर रही हैं और इस स्थिति में वह ठीक से खाना नहीं खा पाने के कारण कमजोर हो जाता है. कहा जाता है कि आत्माएं उस की जीवनशक्ति को चूस रही हैं.

मानसिक बीमारी मनोवैज्ञानिक सदमों द्वारा होती है: मैं सम?ा सकता हूं कि क्यों कार्तिकेय पागल हो गया है बेचारा और हो भी क्या सकता है उस के साथ इस के अलावा? वह अपनी पत्नी से इतना प्यार करता था कि उस के लिए उस ने घर खरीदने हेतु बड़ा कर्ज लिया था. लेकिन उस की बेवफा बीवी एक दिन पड़ोसी के साथ भाग गई. यह सदमा वह कैसे सहन कर सकता था सो पागल हो गया. वह यही कहता है कि वह कुंआरा है.

क्या आपने सुना? शंकर जिस की लकड़ी की दुकान है, उस की लौटरी लग गई है और वह करोड़पति बन गया है. लेकिन वह अपनी इस समृद्धि का सुख नहीं उठा पाया. जैसे ही उस ने सुना कि उस ने लौटरी जीती है वह पागल हो गया और उस ने अपनी दुकान को आग लगाने की कोशिश की, कर्मचारियों को मारना शुरू किया. अब उसे एक कमरे में बंद कर दिया गया है तो. वह चिल्लाता रहता है कि वह एक राजा है और उसे वह सब कुछ करने देना चाहिए जो वह चाहता है. घर वाले उसे मानसिक अस्पताल में भरती कराने की सोच रहे हैं.

ये उदाहरण मनोवैज्ञानिक सदमों के हैं जिन में मानसिक बीमारियां कुछ विशेष घटनाओं के फलस्वरूप होनी समझ जाती हैं.

अकसर फिल्मों, कहानियों एवं उपन्यासों में इस प्रकार की घटनाएं होना बताया जाता है और इन का प्रभाव लोगों पर यों होता है कि वे किसी भी व्यक्ति को मानसिक बीमारी होने पर इस प्रकार का कारण ढूंढ़ते हैं.

सच यह है कि सुख एवं दुख दोनों से संबंधित अनापेक्षित घटनाएं किसी भी व्यक्ति में मानसिक बीमारी का कारण तो हो सकती हैं, लेकिन उन लोगों में जिन में जन्मजात इस रोग के होने की संभावना होती है बजाय एक आम स्वस्थ आदमी की तुलना में. कोविड के दिनों में जिन लोगों को कईकई सप्ताह अकेले रहना पड़ा था वे भी इस परेशानी से परेशान रहे हैं.

अनुपमा अब नहीं जाएगी अमेरिका! गुरु मां हुईं नाराज

अनुपमा धारावाहिक जबसे स्टार प्लास पर टेलीकस्ट हुआ है तभी से टीआरपी की लिस्ट में धूम मचा रहा है. इस सीरियल को धांसू बनाने के लिए मेकर्स आए दिन नया ट्विस्ट लेकर आते ही रहते हैं. रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर अनुपमा में देखन को मिलेगा कि माया की शोक सभा जरी है. ऐसे में वनराज अनुपमा से कहेगा कि तुम्हें अमेरिका जाना ही होगा इस पर अनुपमा कहती है जिंदगी बहुत परीक्षा लेती है. और ये बहुत ही कठिन है. अपने पति और बेटी को इस हलात में छोड़कर जाना. ये सारी बातें अनुज सुन लेगा.

माया की याद में तड़पेगी छोटी अनु

रुपाली गांगुली के ‘अनुपमा’ में देखने को मिलेगा कि छोटी अनु खुद को कमरे में बंद कर लेगी. वहीं जब वनराज और बाकी सब दरवाजा तोड़ेंगे तो देखेंगे कि छोटी अनु माया की तस्वीरों के साथ सो रही है. वहीं जब अनुपमा उसे गले लगाएगी तो वह नींद में माया को याद करेगी और कहेगी कि मुझे आप पर गुस्सा नहीं करना चाहिए था. यहां तक कि नींद खुलने पर वह अनुपमा से भी कहेगी कि मां तो छोड़कर चली गईं, लेकिन आप कहीं मत जाना.

अनुपमा नहीं जाएगी अमेरिका

छोटी अनु को देखने गुरु मां कपाड़िया हाउस जाएगी. वहां गुरु मां अनुपमा से कहेगी, तुम्हें अमेरिका जाना ही होगा. वहीं दूसरी और अनुज छोटी अनु पर चिल्लाने लगता है. इसके बाद अनुपमा अनु को गले लगा लेती है. वहीं यह सब गुरु मां और नकुल देख लेते है. इसके बाद गुरु मां कहेगी हमें परसो जाना है. इस पर वनराज कहेगा अनुपमा पहुंच जाएगी और अनुपमा भी यही कहती है.

गुरु मां और नकुल के बीच बातचीत

गुरु मां और नकुल गुरुकुल आकर आपस में बात करते हैं. गुरु मां को इस बात की चिंता होती है. अनुपमा अमेरिका जाने के लिए कहीं मना न कर दें. इस पर नकुल कहेगा ऐसा कुछ नहीं होगा. इस पर गुरु मां कहेगी अगर ऐसा नहीं हुआ तो जिस अनुपमा नें मेरा रौद्र रूप देखा है वह फिर देखेगी.

“ये जवानी है दीवानी” फेम एवलिन शर्मा दूसरी बार बनीं मां, देेखें वायरल पोस्ट

एक्ट्रेस एवलिन शर्मा ने गुरुवार को इंस्टाग्राम पर अपने दूसरे बच्चे के जन्म की घोषणा की. एवलिन, जो रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के साथ अयान मुखर्जी की “ये जवानी है दीवानी” में नजर आई थी. एवलिन ने इंस्टाग्राम पर अपने बेटे के नाम का भी खुलासा किया. इसी के साथ उन्होंने अपनी बच्चे की पहली तस्वीर साझा की है. एवलिन ने जनवरी में अपनी दूसरी प्रेग्नेंसी की घोषणा की थी. साल 2021 में उनका पहला बच्चा हुआ.

एवलिन शर्मा ने इंस्टाग्राम पर किया पोस्ट

एवलिन अपने नवजात बेटे को गोद में लिए हुए कैमरे के सामने मुस्कुराती नजर आ रही है. एवलिन शर्मा ने बच्चे के जन्म के तुरंत बाद तस्वीर ली, फोटो में बच्चे का चेहरा दिखाई नहीं दे रहा.

एवलिन ने अपने कैप्शन में लिखा, “कभी नहीं सोचा था कि मैं बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद इतना अद्भुत महसूस कर सकती हूं. मैं बहुत खुश हूं कि मैं इसके लिए छत पर खड़ी हो कर गा सकती हूं! हमारे छोटे बच्चे आर्डन को नमस्ते कहो.”

 

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एवलिन शर्मा के फैंस ने दी बधाई

एक फैन ने टिप्पणी की, “मां को बधाई और बेटे का स्वागत है.” एक टिप्पणी में यह भी लिखा था, “Yay!! आपके लिए बहुत खुश हूं! आप दोनों सुंदर लग रहे हैं.” एक अन्य यूजर ने लिखा, “बधाई हो प्रिय… आप दोनों को ढेर सारा प्यार.” मां और बेटे की एक साथ पहली तस्वीर पर कमेंट करते हुए एक फैन ने भी लिखा, “बहुत खूबसूरत… बिल्कुल सुंदर.”

एवलिन शर्मा का परिवार

एवलिन ने 2021 में ऑस्ट्रेलिया स्थित तुशान भिंडी से शादी की. दोनों ने नवंबर 2021 में अपने पहले बच्चे बेटी अवा रानिया भिंडी का स्वागत किया. उस समय के आसपास अपनी बेटी की एक तस्वीर साझा करते हुए, एवलिन ने इंस्टाग्राम पर लिखा था, “सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मेरी जिंदगी… माँ से @avabindi.

 

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एवलिन शर्मा की दूसरी प्रेग्नेंसी

अपने पहले बच्चे का स्वागत करने के दो साल बाद, जनवरी 2023 में, एवलिन शर्मा ने घोषणा की थी कि वह और तुषान दूसरी बार माता-पिता बनने के लिए तैयार हैं. एवलिन ने इंस्टाग्राम पर अपने बेबी बंप की तस्वीरें पोस्ट की थीं. अपने कैप्शन में उन्होंने लिखा, “तुम्हें अपनी बाहों में पकड़ने के लिए मैं इंतजार नहीं कर सकती!! बेबी नं. 2 रास्ते में है…”

कहीं आप बेटी की गृहस्थी तोड़ तो नहीं रहीं

मां बेटी का रिश्ता बहुत ही प्यारा होता है. हर मां की चाह होती है कि उस की बेटी ससुराल में खुश रहे. यदि बेटी इकलौती है तो वह उस के भविष्य के लिए कुछ ज्यादा ही फिक्रमंद होती है. इसी वजह से मां अपनी बेटी को बचपन से ही अच्छे संस्कार देती है परंतु परिवर्तनशील समाज में अब मान्यताएं बदल रही हैं.

आजकल अधिकतर घरों के टूटने की वजह अभिभावकों का बेटी की गृहस्थी में अनावश्यक हस्तक्षेप और उन के द्वारा दी जाने वाली शिक्षा है. नीना की शादी को 2 वर्ष बीत चुके हैं. उस के पति सोमेश बैंक में अधिकारी हैं, अच्छी तनख्वाह है. ससुर को भी पैंशन मिलती है. सोमेश की अविवाहित बहन है. बेटी के लिए चिंता करना हर मां का फर्ज है. नीना अपनी ननद के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करती. उस की मां नीना को गलत व्यवहार के लिए उकसाती रहती है. यही वजह है कि घर में अशांति बनी रहती है. आपसी रिश्तों में तनाव रहने का मूल कारण नीना की अपनी मां ही है.

यदि बेटी अपनी ससुराल में खुश है, उसे अपने पति और ससुराल वालों से शिकायत नहीं है, तो मां का फर्ज यही होता है कि वह बेटी और  उस के ससुराल वालों के साथ मजबूत रिश्ते बनाए.

भावनात्मक जुड़ाव

इकलौती बेटी जन्म से ही अपने घर की दुलारी और अपने पेरैंट्स की राजकुमारी होती है. इस कारण उस के पेरैंट्स अपनी बेटी के लिए ओवर प्रोटैक्टिव होते हैं. वे उस की हर इच्छा को यथासंभव पूरा करने का प्रयास करते हैं.

इकलौती बेटियां अपने पेरैंट्स से इतनी ज्यादा जुड़ी होती हैं कि वे ससुराल जा कर भी हर समय उन के लिए टेंशन महसूस करती रहती हैं. उन के लिए दूसरों के साथ तालमेल बैठाना, शेयरिंग करना मुश्किल पड़ता है. अपने पेरैंट्स से उन्हें विशेष ध्यान मिलता था तो वे ससुराल में भी वही अपेक्षा करती हैं और नहीं मिलने पर अकसर अपने मन का दर्द अपनी मां को सुनाने लग जाती हैं.

वीडियोकौल या औडियोकौल के जरीए बेटी हर पल की खबर अपनी मां तक पहुंचाती है और मां की आक्रोशित प्रतिक्रिया उस के व्यवहार और जबान में घुल कर प्रकट हो कर आपसी कलह का कारण या आगे चल कर रिश्तों में कड़वाहट पैदा कर देती है.

इकलौती मीता की शादी उस की मां ने अपने ही शहर में करवाई थी. इस वजह से ज्यादातर रात में पति मेहुल औफिस से लौटते हुए लेता हुआ चला जाता था.

एक दिन माइके वालों के साथ पिकनिक का प्रोग्राम था. वह पिकनिक के लिए बहुत खुश और एक्साइटेड थी, लेकिन उसी दिन उस की सासूमां को बहुत तेज बुखार चढ़ गया तो उदास मन से उस ने अपनी मां को मना करने के लिए फोन किया पर उस की मां आशा उस पर बरस पड़ी और सासूमां को भलाबुरा बोलने लगी.

मीता को अच्छा नहीं लगा और उस ने अपनी मां को सम?ाने की कोशिश भी की. मगर पिकनिक पर न जा पाने की वजह से उस का मूड भी खराब था, ऊपर से मां की उलटीसीधी बातों ने उस के मन में अपनी सासूमां के साथ रिश्तों के धागों में एक महीन सी गांठ डालने का काम अवश्य कर दिया.

पैरों तले जमीन खिसक गई

सीमा अपनी तलाकशुदा मां आरती की इकलौती बेटी थी. चूंकि वह अपने ननिहाल में रहती थी, उस की मां को उस के नानानानी या मामा दुखियारी सम?ाते हुए हमेशा स्पैशल ट्रीटमैंट देते थे. प्यारदुलार के कारण उसे पूरी तरह मोम की गुडि़या बना दिया था. चूंकि सीमा काफी सुंदर और संपन्न परिवार से थी, इसलिए शहर के कईर् परिवार उसे बहू बनाने के लिए रिश्ता ले कर आए, लेकिन आईएएस के ख्वाब के कारण आरती ने किसी को भी पसंद नहीं किया.

जब उस की उम्र 30 के पार पहुंचने लगी, तो लोगों के दबाव में, अपनी इज्जत बचाने के लिए कहीं भी शादी तय करने को तैयार हो गई और जल्दबाजी में एक साधारण परिवार के लड़के के साथ रिश्ता तय कर दिया.

खूब सारा दहेज, गाड़ी और कैश दे कर धूमधाम से शादी की. अब जब सीमा ने ससुराल की पथरीली धरती पर अपने कदम रखे तो वहां के तौरतरीके देख कर उस के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई थी. चूंकि उस ने कभी घर का काम ही नहीं किया था सो उसे कोई अभ्यास नहीं था. वहां पर तो एक भी नौकर नहीं था. उस ने कभी किसी के साथ अपनी चीजें शेयर नहीं की थीं. यहां पर उस की मां की दी हुई गाड़ी की चाबी देवर के पास ही रहती.

आरती समयबेसमय पर बेटी को फोन खटकाती और वीडियोकौल में, जब बेटी सीमा को बरतन धोते देखती तो उस का खून खौल उठता. उसे लगता कि उस की तो सारी दुनिया ही लुट गई. बेटी के बिना उन्हें अपना जीवन अधूरा सा लगता.

बेटी सीमा भी अपने ससुराल वालों की शिकायतों का पिटारा खोल कर बैठ जाती. सीमा का देवर सुकेश अपनी भाभी के साथ हंसीमजाक और मीठीमीठी छेड़खानी करता. सीमा को यह सब अच्छा नहीं लगा, तो उस ने छोटी सी बात का बतंगड़ बना दिया. तमाम शिकायतों का दौर चला. मांबेटी दोनों को ही रिश्ता बचाने के लिए हाथ जोड़ कर माफी मांगनी पड़ी. सास से अलग रहने पर मामला सुलझा.

बेटी की परेशानियां

बेटी की परेशानियां सुनसुन आरती बिलख उठती. उस के घर वाले सम?ाते लेकिन अब उसे अपना दामाद ही विलेन लगता क्योंकि शादी कर के उस के सपने भी मिट्टी में मिल गए थे. उसे नाश्ते में आमलेट चाहिए उधर सीमा को प्याज से भी परहेज था. न समय पर सुकेश चाय मिलती और न ही खाना, क्योंकि मोम की गुडि़या घर का काम कर ही नहीं पाती थी. नाराज हो कर एक दिन सुकेश ने गुस्से में उस पर हाथ उठा दिया.

बस आरती को बहाने की तलाश थी. प्रैगनैंट बेटी को घर ले आई. रिश्तों में कड़वाहट तो शादी के दिन से ही शुरू हो गई थी, लेकिन अब ऐसी गांठ पड़ी जो कभी सुल?ा नहीं पाई. अब सीमा उस घड़ी को कोसती है जब वह मां का हाथ पकड़ कर मायके आई थी.

नोएडा की स्मिता की शादी को 2 साल हो चुके हैं, एक बेटा भी है. किसी छोटी सी बात पर पति के साथ ?झगड़ा हुआ तो उस ने तुरंत अपनी मां से बढ़ाचढ़ा कर शिकायत कर दी. छोटीछोटी बातों में कहासुनी भला किस पतिपत्नी में नहीं हुआ करती. लेकिन स्मिता की रोजरोज की कहासुनी और अनबन की बात सुन कर उस की मां ने उसे अपने पास बुला लिया. उस के बाद उत्पीड़न का केस कर दिया. दरअसल, स्मिता संयुक्त परिवार में नहीं रहना चाहती थी. इसी वजह से घर में आए दिन क्लेश होता रहता था. वह बच्चे को ले कर मायके आ गई और दहेज उत्पीड़न का आरोप लगा कर अदालत में मुकदमा दायर कर दिया.

इस तरह से शादी के बाद बेटी का परिवार बिखरने के करीब 40 फीसदी मामलों में लड़की की मां का हस्तक्षेप प्रमुख कारण बनता है. पिछले 4 वर्षों में महिला परिवार परामर्श केंद्र में पहुंचे हुए मामलों में यह हकीकत सामने आई है. 4 सालों में यहां 1647 मामले पहुंचे, इन में से करीब 600-700 मामलों में लड़की की मां के हस्तक्षेप के कारण बात बिगड़ी. काउंसलिंग के बाद कई परिवार बिखरने से बच गए तो कुछ परिवार मां के अनुचित हस्तक्षेप के कारण बिखर गए.

मातापिता का हस्तक्षेप

परिवारों में देखा जाता है कि इकलौती बेटी की हर इच्छा या जरूरत को पेरैंट्स पूरी करने की बहुत ज्यादा कोशिश करते हैं क्योंकि वह उन के जीवन की सब से कीमती चीज होती है. भाईबहनों के न होने से इकलौती बेटियां अपने कंधे पर बहुत बड़ा बोझ लिए होती हैं. पेरैंट्स और बेटियां दोनों एकदूसरे के लिए चिंतित और परेशान रहते हैं. इकलौती बेटियों को केवल अपनी खुद की जरूरतों पर ध्यान देने की आदत होती है. ऐसे में दूसरों के लिए सहानुभूति महसूस करने में उन्हें मुश्किल होती है.

चूंकि मातापिता लगातार उन की समस्याओं का हल करते रहे हैं, इसलिए किसी भी परेशानी के समय वे उन्हीं की सलाह मांगती हैं. चूंकि चीजें आसानी से मिलती रहीं, इसलिए किसी भी मुश्किल के आते ही घबरा जाती हैं. इकलौती बेटी का चूंकि घर में सब चीजों पर हक होता है, इसलिए उस के मन में यह प्रवृत्ति जन्म ले लेती है कि वह जो चाहती है, उसे पाना उस का अधिकार है. इकलौती बेटी अपने पेरैंट्स की उम्मीदों और महत्त्वाकांक्षाओं के लिए ही जीने की कोशिश में लगी रहती है.

तोहफे

तोहफे हर किसी को अच्छे लगते हैं. बहुत अधिक तोहफे दे कर आप अपनी बेटी की आदतों को बिगाड़ रही हैं. अगर ससुराल वाले आप की बेटी के शौकों को पूरा नहीं कर सकते तो आप आर्थिक सहायता देने का बिलकुल भी कष्ट न करें. इस तरह से आप उस के ससुराल वालों को नीचा दिखा रहे हैं और आपसी रिश्तों को खराब करने की शुरुआत कर रहे हैं.

आप बेटी के गृहस्थ जीवन में हस्तक्षेप न करें. अगर आप उस की ससुराल वालों और अपने दामाद से कुछ कहना भी चाहते हैं, तो इस तरह कहें कि उन्हें बुरा न लगे वरना इस वजह से आप और उन के संबंधों में खटास पड़ सकती है.

आज सुनने में भले ही अटपटा लगे लेकिन बात शतप्रतिशत सही है कि मांबाप के छोटीछोटी बातों में दखल देने से ही परिवार बहुत तेजी से टूट रहे हैं. मामला मनमुटाव और कहासुनी शुरू हो कर नौबत तलाक तक पहुंच रही है. अधिकांश मामलों में संबंध टूटने का मुख्य कारण बेटी की शादीशुदा जिंदगी में मां का अनुचित हस्तक्षेप करना होता है. इस वजह से इकलौती बेटियां अपनी ससुराल की उपेक्षा और मायके के प्रति अधिक झुकाव रखती हैं. मायके के प्रति समर्पित इकलौती लाडली पति और रिश्तेदारों को सम्मान नहीं देना चाहती.

दानदहेज ले कर आई इकलौती बेटी के मन में यह बात घर कर जाती है कि पति से रिश्तेदारी न हो कर उस की खरीदारी हुई हो और पति पर सिर्फ और सिर्फ उस का मालिकाना हक है. उस के बाद तो ससुराल में मनमानी और दुर्व्यवहार भी करने से नहीं चूकती और बढ़तेबढ़ते 7 फेरों का पवित्र बंधन कोर्टकचहरी के चक्करों में उलझ जाता है.

पारिवारिक रिश्तों में हो रहे क्षय के प्रमुख कारणों में से एक पतिपत्नी के दांपत्य जीवन में मां का अनुचित हस्तक्षेप देखा जा रहा है.

मैं हेयर फॉल से बहुत परेशान हूं, मुझे कोई उपाय बताएं?

सवाल

मेरी उम्र 35 साल है और मेरे बाल बहुत ज्यादा गिर रहे हैं. कोई उपाय बताएं?

जवाब

हेयर लौस के कई फैक्टर हैं जिन में मेन फैक्टर आप की डाइट से जुड़ा है. आप डाइट में किन चीजों को शामिल करती हैं इस पर सब से ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. बालों के लिए सब से ज्यादा जरूरी होता है प्रोटीन. अगर आप के  शरीर में प्रोटीन की कमी है तो अपनी डाइट में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने के लिए डेयरी प्रोडक्ट्स और दालों को शामिल करें. हैल्दी हेयर्स के लिए बादाम, फूलगोभी, मशरूम, अंडे में मिलने वाला बायोटिन एक जरूरी विटामिन है. बालों का ?ाड़ने से रोकने के लिए इस विटामिन को डाइट में शामिल करना आप के लिए फायदेमंद हो सकता है. भुने चने, मटर, राजमा, छोले और काजू को डेली डाइट में शामिल कर के आप बालों के लिए भी काफी फायदेमंद आयरन पा सकती हैं. इसी आयरन की कमी से बालों के ?ाड़ने और बेजान होने की समस्या बढ़ सकती है. विटामिन ए और सी ऐसे विटामिन हैं जो बालों की ग्रोथ और शाइनिंग के लिए बेहद असरदार हैं. इसलिए आप को विटामिन ए के लिए गाजर, शकरकंद, कद्दू, पालक, दूध या दही को डाइट में शामिल करने की जरूरत है. वहीं विटामिन सी के लिए आंवला, नीबू, अमरूद या स्ट्राबेरी को शामिल करें.

आप चैक करें कि आप के बालों में डैंड्रफ तो नहीं है. अगर है तो उस को दूर करने के लिए बालों में ऐंटीडैंड्रफ शैंपू का इस्तेमाल करें और जब भी शैंपू करें अपनी कंघी, तकिए के गिलाफ और तौलिए को धोएं और किसी ऐंटीसैप्टिक लोशन में डाल कर रखें. धूप में सुखाएं और फिर इस्तेमाल करें.

बालों की ग्रोथ बढ़ाने के लिए 1 टेबल स्पून ऐलोवेरा जैल में 1 छोटा चम्मच विनेगर, 1/2 चम्मच रैड ओनियन सीड औयल मिला लें. इन तीनों को मिक्स कर के बालों की रूट्स में लगाएं. 1/2 घंटा इंतजार करें और उस के बाद सिर धो लें. बालों के ?ाड़ने के दूसरे फैक्टर्स में टैंशन भी एक फैक्टर है जिस से आप के बाल टूटने लगते हैं. इसलिए टैंशन कम करने के लिए नियमित मैडिटेशन करें.

-समस्याओं के समाधान

ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर, डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा द्य

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Monsoon special: स्किन के लिए नेचुरल सन स्क्रीन

सन स्क्रीन का प्रयोग करना हमारी स्किन के लिए कितना जरूरी होता है यह तो बताने की जरुरत नहीं है. सूर्य की यूवी किरणें हमारी स्किन को समय से पहले बूढ़ा कर सकती हैं और सन बर्न के कारण हमारी स्किन पर बहुत सारे दाग धब्बे और पिग्मेंटेशन भी हो सकती है. इस स्थिति से बचने के लिए आपको एसपीएफ 50 से ऊपर के ही किसी सन स्क्रीन का प्रयोग करना चाहिए. अगर आपके पास घर में सन स्क्रीन नहीं है तो आप कुछ प्राकृतिक विकल्पों को भी सन स्क्रीन की तरह प्रयोग कर सकते हैं और उनसे भी आपको सूर्य से सुरक्षा मिलेगी. आइए जानते हैं इन ऑप्शन के बारे में.

1. जिंक ऑक्साइड 

जिंक ऑक्साइड एक ऐसा प्राकृतिक मिनरल होता है जो सूर्य की दोनों प्रकार की यूवी किरणों यूवी ए और यूवी बी से आपकी स्किन की सुरक्षा करता है. ऐसे प्रोडक्ट्स को खरीदें जिनमें नॉन नैनो जिंक ऑक्साइड होता है. इसका मतलब है की इसके तत्व इतने बड़े होंगे की आपकी स्किन द्वारा आसानी से एब्जॉर्ब किए जा सकेंगे.

 2. रेड रास्पबेरी सीड ऑयल

इस ऑयल में प्राकृतिक 25 से 50 एसपीएफ होता है.  इसमें एंटी ऑक्सीडेंट्स होते है जो सूर्य से आपकी स्किन की सुरक्षा करने में मदद करते हैं. हालांकि ट्रेडिशनल सन स्क्रीन के मुकाबले इसमें कम मात्रा में एसपीएफ मौजूद होता है. आप इसे अन्य सन प्रोटेक्शन के तरीकों के साथ मिला कर प्रयोग कर सकते हैं.

3. कैरट सीड ऑयल

इसमें नेचुरल एंटी ऑक्सीडेंट्स मौजूद होते हैं और एसपीएफ 30 भी मौजूद होता है. यह सूर्य से आपकी स्किन को बचा सकता है और इसे अकेले प्रयोग करने की बजाए आप इसे अन्य सन प्रोटेक्शन के तरीकों के साथ अलग से प्रयोग कर सकते हैं.

4. नारियल का तेल 

नारियल के तेल में लगभग 4 से 6 का नेचुरल एसपीएफ होता है जो आपकी सूर्य से कुछ हद तक रक्षा कर सकता है. इस को आप पूरी तरह से एक सन स्क्रीन के जैसे प्रयोग नहीं कर सकते हैं क्योंकि इससे आपको पूरा लाभ नहीं मिलेगा बल्कि आप इसे एक मॉश्चराइजर के रूप में सन स्क्रीन लगाने से पहले प्रयोग कर सकते हैं.

 क्या यह सारे सन स्क्रीन स्किन को सूर्य से सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं?

यह सारे सन स्क्रीन केमिकल से भरपूर सन स्क्रीन का एक प्राकृतिक विकल्प हैं. इनमें सन स्क्रीन के जितनी सूर्य से सुरक्षा प्रदान करने की क्षमता नहीं होती है इसलिए इनका प्रयोग सन स्क्रीन के रूप में केवल इमरजेंसी में ही किया जाना चाहिए जब कभी आपका सन स्क्रीन खत्म हो गया हो और आपको बाहर निकलना हो तो आप इनका प्रयोग कुछ समय के लिए कर सकते हैं.

इनका प्रयोग अकेले करना आपकी स्किन को पूरी तरह से सूर्य से सुरक्षा प्रदान नहीं कर पाएगा क्योंकि इनमें इतना ज्यादा मात्रा में एसपीएफ मौजूद नहीं होता है इसलिए आपको इनका प्रयोग असली सन स्क्रीन के साथ मिला कर ही करना चाहिए या उसे प्रयोग करने से पहले आप एक मॉश्चराइजर की तरह इन इग्रेडिएंट्स का प्रयोग कर सकते हैं.

अगर आप स्विमिंग या अन्य किसी ऐसी गतिवधि करते समय इस तरह के सन स्क्रीन का प्रयोग करते हैं तो इन्हें बार बार प्रयोग करना अनिवार्य है क्योंकि इनका असर बहुत जल्दी ही खत्म हो जाता है.

अगर आप ऐसे प्राकृतिक सन स्क्रीन का प्रयोग करते हैं तो आपको इन्हें जल्दी जल्दी और बार बार प्रयोग करना होगा. इसके साथ ही आपको इसकी अच्छी खासी मात्रा का प्रयोग करना होगा तभी आपको लाभ मिल सकेगा.

धर्म के नाम पर पाखंड का बोलबाला

आज जब पूरे विश्व में विज्ञान के क्षेत्र में नित नए आयाम स्थापित किए जा रहे हैं, वैज्ञानिक चांद और मंगल पर बस्तियां बसाने की कोशिश में प्रयासरत हैं, वहीं हमारा देश सांप्रदायिक विद्वेश और पाखंड में उलझता चला जा रहा है.

धर्म के नाम पर तर्क शास्त्र और शास्त्रार्थ की परंपरा को समाप्त कर दिया है और दिनोंदिन पाखंड में दिखावा बढ़ता जा रहा है जिस की वजह से पाखंड महंगा होता जा रहा है. हमारा मीडिया और सोशल साइट्स पाखंड और अंधविश्वास को बढ़ाने में अपना भरपूर सहयोग कर रही हैं.

गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सारे पाप धुल जाते हैं, हज करने से व्यक्ति पवित्र हो जाता है तो ईसाइयों के लिए पवित्र जल बहुत महत्त्वपूर्ण है. वैसे ही सिखों के लिए पवित्र सरोवर और गुरु ग्रंथ साहिब और मुसलमानों के लिए कुरान. इन ग्रंथों के अपमान के नाम पर हत्या और दंगे आएदिन की बात है. यह पाखंड नहीं तो क्या है? साथ में हज या अन्य किसी भी दूरदराज स्थान की तीर्थयात्राएं सामान्य वर्ग के लिए बहुत महंगी होती हैं. वर्तमान सरकार भी तीर्थयात्राओं को आसान व सुविधापूर्ण बनाने के लिए काफी प्रयासरत दिखाई पड़ रही है. आजकल चारों तरफ विशाल मंदिरों, मसजिदों का जाल फैलता चला जा रहा है.

ठगने का धंधा

आज के युग में लोग इतने भयभीत रहने लगे हैं कि हनुमान, शिव एवं शनि मंदिरों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. स्कूल और अस्पतालों के स्थान पर मंदिर और मसजिदों की संख्या तथा उन का पुनर्निर्माण धूमधाम एवं भव्य होता जा रहा है. प्रत्येक समाज का अपना अलग त्योहार एवं तीर्थ हो चला है. ज्योतिषी लोगों को उन का भविष्य बताने और दुखों को दूर करने वाले टोटके बता कर समाज में पाखंड और अंधविश्वास फैला कर अपनी रोजीरोटी चलाने का धंधा कर रहे हैं. विभिन्न टीवी चैनल दिनरात जनता को पाखंड के जाल में फंसाने के लिए तरहतरह के उपाय बता कर ठगने का धंधा कर रहे हैं और हमारा सरकारी तंत्र आंखकान बंद कर बैठा है.

हिंदू धर्म में दान करने की महिमा का बारबार वर्णन किया गया है इसलिए लोगों के मन  में पाखंड करने की इच्छा तो परिवार में बचपन से ही कूटकूट कर भर दी जाती हैं. दान का महिमामंडन करते हुए कहा है-

‘हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कंठस्य भूषणं,

श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणै: किं प्रयोजनम्.’

हाथ का आभूषण दान है, कंठ का सत्य है और कान का आभूषण शास्त्र है, फिर अन्य किसी आभूषण की क्या आवश्यकता है?

हिंदू धर्म में 16 संस्कारों का बहुत महत्त्व है. संस्कार का तात्पर्य उन धार्मिक कृत्यों से है जो किसी समुदाय का योग्य सदस्य बना कर उस के मनमस्तिष्क को पवित्र करें परंतु वर्तमान में लोग एकदूसरे का अनुकरण करते हुए भेड़चाल चलते ज्यादा दिखाई दे रहे हैं.

पाखंड पर विश्वास क्यों

हिमाचल प्रदेश के फौजी परिवार की रिया  बैंगलुरु में आईटी कंपनी में काम करती थी और वहीं पर सहकर्मी अक्षर को पसंद करने लगी थी. दोनों ने 2-3 साल लिव इन में रहने के बाद जब शादी कर लेने का निर्णय कर लिया तो अक्षर के घर वालों ने जन्मकुंडली में काल सर्प योग बता कर उस की पूजा करवाने को कहा तो पढ़ीलिखी रिया और उस के मातापिता ने साफ मना कर दिया कि वे इस तरह के पाखंड की बातों पर विश्वास नहीं करते. अक्षर के दबाव में बु?ो मन से मांबाप शादी के लिए राजी हो गए. पंडितजी के बताए हुए शुभ मुहूर्त में दोनों की शादी धूमधाम से हो गई.

रिया ने अक्षर के लिए सरप्राइज प्लान कर के हनीमून पैकेज ले कर कश्मीर की वादियों की बुकिंग करवा रखी थी. अक्षर के पेरैंट्स उत्तर प्रदेश के उन्नाव के रहने वाले थे. काल सर्प योग के डर से उन लोगों ने अक्षर को अपना निर्णय सुना दिया कि नासिक के त्रयंबकेश्वर मंदिर में काल सर्प योग की पूजा के बाद ही हनीमून संभव है. उस की आंखों में आंसू बह निकले थे, लेकिन  अक्षर एक तरफ मांबाप को खुश करने के लिए नासिक की ट्रेन के टिकट और पूजा के लिए पंडित औनलाइन खोजता रहा तो दूसरी तरफ रिया के सामने कान पकड़ कर गिड़गिड़ाता रहा. वह अपने हनीमून पीरियड में परिवार के साथ सर्पों की पूजा कर रही थी. डरे हुए पेरैंट्स चांदी, तांबे और सोने का सर्प बनवा कर अपने साथ लाए थे.

बाद में पछताना पड़ता है

काल सर्प योग की शांति पूजा 3 घंटे में समाप्त हो गई, पूजा का खर्च तो क्व7 हजार था  परंतु पंडित को खुश करने के लिए पेरैंट्स उन के लिए कपड़ा, दक्षिणा आदि देने के बाद पंडित ने सम?ा लिया कि शिकार पूरी तरह उन के कब्जे में है, तो उंगलियों पर गिनती करते हुए रिया के साथ शादी को अक्षर के जीवन के लिए खतरा बताते हुए महामृत्युंजय की पूजा के लिए संकल्प करवा कर क्व25 हजार और ले लिए. रिया भोले पेरैंट्स को लुटते देखती रही और मन ही मन उस घड़ी को कोसती रही जब अक्षर से उस की मुलाकात हुई थी. अक्षर मिट्टी का माधो सा खड़ा सब देखता रहा.

हनीमून का सपना सपना ही बना रह गया. दोनों के संबंध में ऐसी गांठ पड़ गई, जिसे सुल?ाना आसान नहीं था और वह आज तक रिया पूजा की याद कर के गुस्से से भर उठती है.

उन की कीमती छुट्टियां और बुकिंग के रुपए बरबाद हो गए इस मूर्खता के पाखंड के कारण. अक्षर की बेचारगी देख वह अपने निर्णय पर बारबार पछता रही थी.

पूजा के नाम पर नाटक

मध्य प्रदेश के भिंड की रहने वाली संजना और आरव की शादी धूमधाम से हुई. दोनों संपन्न और दकियानूसी परिवार थे. अरेंज्ड मैरिज थी. संजना फिजियोथेरैपिस्ट थी और आरव सीए दोनों की मुलाकात एक पार्टी में हुई थी. दोनों वर्किंग थे और खुश थे. संजना प्रैगनैंट हो गई तो आरव की मां की हिदायतों ने उसे परेशान कर के रख दिया. बेटा हुआ तो तुरंत पंडित से औनलाइन संपर्क शुरू हुआ और पंडित ने बता दिया कि बच्चा मूल नक्षत्र में पैदा हुआ है और पिता के स्वास्थ्य के लिए भारी है. संयोगवश आरव की गाड़ी किसी बाइक से टकरा गई.

अब तो भिंड से मूल शांति के लिए पंडितजी ने जो लंबी लिस्ट लिखवाई कि आरव ने उसे देखते ही हाथ जोड़ दिए. लेकिन संजना की मां तुरंत आ गईं और जबरदस्ती उसे पूजा करवाने के लिए मजबूर कर दिया. फिर तो उसे नन्हे को ले कर भिंड आना पड़ा और पूजा के नाम पर ऐसा नाटक हुआ कि पूछो मत. वह और आरव दोनों ही चुपचाप 27 कुंओं का जल, 7 जगह की मिट्टी, 7 तरह का अनाज, सोने की मूल नक्षत्र की मूर्ति और जाने क्याक्या. नाई के लिए कपड़े, पंडितजी के लिए सिल्क का धोतीकुरता व सोने की

अंगूठी नन्हे बच्चे के बराबर तोल कर अन्न दान, 27 ब्राह्मणों का भोजन, उन की दक्षिणा, नातेरिश्तेदारों के लिए गिफ्ट और दावत.

मूल शांति के नाम पर कुल मिला कर लाखों का खर्च किया गया ऊपर से आरव का क्लोजिंग ईयर का टाइम चल रहा था, इसलिए उन दिनों छुट्टी लेने की वजह से उस की प्रमौशन अलग से रुक गई.

आजकल यहांवहां भागवत् कथा का धूमधाम से आयोजन देखा जा सकता है- इन दिनों संगीतमय भागवत् का बहुत प्रचलन दिखाई दे रहा है, जिस का न्यूनतम खर्च क्व2-3 लाख तक आ जाता है. यदि कोई नामी कथा वाचक है तो केवल उस की फीस ही लाखों में होती है.

कमाई पर ध्यान

मेरे पड़ोस में सार्वजनिक भागवत् कथा का आयोजन हुआ, जिस में कहने के लिए कथावाचक ने कोई फीस नहीं ली परंतु उन के संगीत बजाने वाले 7-8 लोगों की टीम को क्व1 हजार प्रतिदिन देना तय हुआ. टैंट वाले ने क्व40 हजार लिए संगीत के उपकरणों के लिए भी क्व20 हजार लगे. अन्य संसाधन जुटाने में क्व15-20 हजार लगे.

रोज के फूलफल, मिष्ठान्न आदि पर

क्व1 हजार प्रतिदिन लगते रहे. लोग भक्तिभाव से भरपूर चढ़ावा चढ़ाते रहे. आरती में हजारों रुपए आ जाते.

भीड़ बढ़ती गई और साथ में चढ़ावे की रकम भी. वह सब चढ़ावा कथावाचक समेटते रहे. उन के कर्मचारी पूरे समय दान का डब्बा ले कर भीड़ में चक्कर लगाते रहते. डब्बे पर ताला लगा कर रखा था जिसे वह चुपचाप खोलते और समेट कर अंदर कर लेते. कोई क्व500 देता तो तुरंत माइक पर नाम अनाउंस करते. इस तरह कथा कम होती बस कमाई पर ज्यादा ध्यान रहता .

अंत में भंडारे के आयोजन पर लगभग

50 हजार रुपये का खर्च आया. इस के अतिरिक्त कार्यक्रम के दौरान प्रतिदिन की पूजा, विभिन्न कथा प्रसंगों के लिए कभी साड़ी, कभी चावल, कभी सोनाचांदी का दान, कभी कलश स्थापना और पूजा आदि का खर्च भी प्रति परिवार 15 से 20 रुपये हजार अलग से हुआ. जो मुख्य जजमान बना उस का व्यक्तिगत खर्च 20 से 25 हजार रुपये हुआ. अभी कथावाचक के लिए वस्त्र और दक्षिणा के साथ कुछ सोने की अंगूठियों का खर्च नहीं जोड़ा गया है.

यहांवहां पूछताछ करने पर एक प्रमुख कथावाचक ने भागवत् सुनाने की केवल अपनी  फीस 25 लाख रुपये बताई थी. सोचिए कि पाखंड दिनोंदिन कितना महंगा होता जा रहा है .

कथा के नाम पर फूहड़ डांस

मेरे एक परिचित ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि उन के परिवार ने भागवत् कथा के आयोजन के लिए गांव की जमीन बेच दी और वहां से मिले रुपयों में से लगभग 15 से 20 लाख रुपये का खर्च इस भागवत् कथा के आयोजन पर किया क्योंकि समाज में उन्हें अपना नाम करना था. कथा का तो नाम था वहां पर फिल्मी धुन पर भजन के नाम पर उलटेसीधे गाने गाए जाते थे और फूहड़ डांस होता रहता था.

कभी कृष्णराधा की झंकी तो कभी गरीब सुदामा तो कभी नंद बाबा और बाल कृष्ण के जन्म की झंकी लोगों के आकर्षण का केंद्रबिंदु बन गई थी. भीड़ और चढ़ावा दोनों भलीभांति बढ़ते जा रहे थे और साथ में कथावाचक की कथा के बजाय झंकियों पर ज्यादा जोर होता चला गया था. कुल मिला कर कथावाचक का ध्यान पैसे की उगाही में लगा रहता था. आज कृष्ण जन्म उत्सव, तो कल गिरिराजजी की पूजा तो परसों रुक्मिणी विवाह के लिए साड़ी और सुहाग का सामान. इस तरह से रोज एक नया नाटक होता रहता.

बाद में मालूम हुआ कि धंधे से अनापशनाप पैसे इन धार्मिक कार्यों, आयोजनों में लगाने और साथ में अपना शोरूम अपने विश्वस्त लोगों पर छोड़ देने से उन्हें भारी नुकसान हो गया. कोठी भी बिक गई और बेटे ने बुढ़ापे में वृद्धाश्रम में रहने के लिए भेज दिया. सारे धर्मकर्म धरे रह गए.

पूजा भी ठेके की तरह हो गई

उत्तर प्रदेश के रहने वाले आयुष एवं पूर्वी ने मुंबई में 3 करोड़ रुपये में अपना फ्लैट खरीदा तो उन की मां ने गृहप्रवेश की पूजा को जरूरी बताया. इस के अतिरिक्त सभी लोगों ने वास्तु पूजा और गृहप्रवेश की पूजा करने को आवश्यक बताया तो दोनों ने औनलाइन पंडित और पूजा के विषय में जानने के लिए सर्च करना शुरू किया. दोनों ही पूजन सामग्री की लिस्ट देख कर ही आश्चर्यचकित हो गए थे.

उन लोगों ने गूगल पर नंबर देख कर यहांवहां फोन मिलाए तो मालूम हुआ. गृह प्रवेश और वास्तु पूजा और ग्रह शांति पूजा के नाम पर 25 हजार रुपये से शुरू हो कर लाखों वाले पंडित उपलब्ध हो रहे थे. उन लोगों ने अंतत: गायत्री परिवार के पंडित जो 11 हजार रुपये में पूजा कर रहे थे उन्हें बुलाया, लेकिन पूजा कर के उन के मन को शांति कम अशांति एवं पैसे और समय की बरबादी ज्यादा लगी. पंडितजी ने 11 हजार रुपये के बजाय लगभग 20 हजार रुपये खर्च करवा दिए. वे सोचने लगे कि इस से तो कोई नया सामान ले लेते, जो उन के काम आता.

महानगर में पूजा भी ठेके की तरह हो गई है. जिस स्तर की पूजा करवानी है, उसी स्तर के पुजारी उपलब्ध हैं, सस्ते वाले गायत्री परिवार के 11 हजार रुपये से शुरू हो कर 51 हजार रुपये या लाखों में किया जा सकता है. अब पंडितजी पूजन सामग्री अपने साथ भी ले कर आते हैं जिस का मूल्य वे अपने कौंट्रैक्ट में ले लेते हैं. पूजा के नाम पर लोग अपने खर्च में कटौती कर के जी खोल कर पूजा और धार्मिक कार्यों पर खर्च करते हैं. इस के लिए चाहे उधार ले कर करना पड़े, लेकिन ऐसे आयोजन अवश्य करते हैं क्योंकि उन की सोच होती है कि उन्हें पूजा कर के सीधा स्वर्ग का टिकट मिलने वाला होता है.

20 से 25 हजार रुपये तो साधारण पूजा में लगने ही हैं. पंडित के कपड़े और दक्षिणा उस के स्तर के अनुसार होनी चाहिए. आप का समय चाहे कितना कीमती है 7-8 घंटे तो लगने ही हैं. ज्यादा ताम?ाम वाला करना है तो 1 से 3 दिन तक लग सकते हैं.

पूरी निगाह चढ़ावे पर

आजकल समाज में सुंदरकांड और माता की चौकी का जगहजगह आयोजन देखा जाता है. ये लोग भी एक कौंट्रैक्ट जैसा तय कर लेते हैं जिस की शुरुआत 21 हजार रुपये से होती है. यदि बहुत साधारण स्तर का है तो 11 हजार रुपये में भी राजी हो जाते हैं, लेकिन इन की पूरी निगाह चढ़ावे पर होती है. बातबात पर रुपए की मांग करते हैं और फलमिठाई और चढ़ावे, आरती के सारे रुपए समेट कर रख लेते हैं. इस में भी 7-8 लोगों की टीम होती है जो अपने संगीत उपकरण अपने साथ ले कर आते हैं जैसे ढोलक मजीरा, हारमोनियम, कैसियो, तबला आदि आप से डैक या लाउडस्पीकर लगवाने की फरमाइश करते हैं.

कानफोड़ू आवाज में फिल्मी धुन पर सुंदरकांड हो या माता के भजन गाते हैं. मैं ने स्वयं देखा कि  एक आयोजन में एक बच्चे को शेर का मुखौटा पहना दिया और दूसरे बच्चे का दुर्गा माता का स्वरूप बना कर उस पर बैठा दिया और चारों तरफ शोर मच गया माता प्रकट हो गईं कह कर लोग अपना सिर नवा कर दुर्गा माता की जयजयकार करने लगे. उन पर रुपयों की बौछार शुरू हो गई. बहुत हास्यास्पद दृश्य उपस्थित कर दिया गया था. संयोजक ने बताया कि माता की चौकी करवाने के लिए प्रसाद, चढ़ावा, टैंट आदि के बाद खाना करने में लगभग 50 हजार रुपये खर्च हो गए.

इस तरह के दृश्य बना कर लोगों के मन में भक्तिभाव जगा कर अघिक से अधिक धन उगाही करना उन का मुख्य उद्देश्य होता है. सभी उपस्थित भक्तिभाव से प्रसन्न मन से उन पर रुपयों की बौछार करने लग जाते हैं .

नीरजा की बेटी बुखार से तप रही थी. डाक्टर से उन की अपौइंटमैंट थी. रास्ते में ट्रैफिक जाम की वजह से रुकना पड़ा. डीजे की कानफोड़ू आवाज उन्हें विचलित कर रही थी. बीमार बच्ची के कानों को उन्होंने जोर से बंद किया. शोर के कारण उन का दिल जोरजोर से धड़कने लगा. संगीत संगीत न हो कर विध्वंसक सुर में बदल गया. उन्हें बहुत गुस्सा आ रहा था. 15-20 लड़के समूह में डीजे के साथ नाच रहे थे. एक ठेले पर माता की ज्योत को ले जाया जा रहा था. पता लगा कि नशे में झूमतेनाचते ये लड़के वैष्णव माता के दरबार में जा रहे हैं. यह कैसा पाखंड जो बढ़ता

जा रहा है? वहां पर भक्ति और आस्था का

तो नामोनिशान नहीं था. था तो केवल पाखंड

का दिखावा.

शिकारी आएगा जाल में फंसाएगा

भारत ही एक ऐसा विचित्र देश है, जहां धर्म के नाम पर पाखंड का इतना बोलबाला है. यहां हर गली कूचे में स्कूल और अस्पताल के स्थान पर मंदिर या मसजिद मिल जाएगी. हमारे देश मे सब को आजादी है कि वह अपने तरीके से अपने धर्म का प्रचारप्रसार कर सकता है. धर्म के नाम पर बढ़ते पाखंड के दिखावे पर रोक लगना आवश्यक है. आज यहांवहां बड़ेबड़े धार्मिक आयोजन बहुत बड़े स्तर पर आयोजित किए जाते हैं, जिन में दिखावे के लिए पैसे को पानी की तरह बहाया जाता है और इन साधूसंतों और अन्य धर्मगुरुओं ने अपना एक नैटवर्क बना लिया है जहां देश की भोली जनता यहां तक कि युवा पीढ़ी भी तात्कालिक लाभ पाने के लिए उन के जाल में फंस जाती हैं.

यह भी देखने में आ रहा है कि युवा पीढ़ी धार्मिक कार्यक्रमों को भी मौजमस्ती में ढालती जा रही है. पाखंड दिखावे के कारण दिनोंदिन महंगा होता जा रहा है. जब तक डीजे को तेज आवाज में नहीं बजाएंगे, धार्मिक यात्राएं, बड़ेबड़े यज्ञ, हवन  के आयोजन नहीं किए जाएंगे, हजारों लोगों के भंडारे का आयोजन कर के भीड़ नहीं इकट्ठी करेंगे, डीजे की आवाज पर बरातियों की तरह नाचेंगे नहीं, तब तक भगवान को कैसे पता लगेगा कि उन के मन में कितनी श्रद्धा है और वहे भगवान के कितने बड़े भक्त हैं.

जितना बड़ा मंदिर, जितना ज्यादा दिखावा, जितना ज्यादा खर्च, समाज में उतना बड़ा नाम. यह आज के पाखंड  का स्वरूप है. वर्तमान सरकार भी अपने वोट बैंक को बढ़ाने के लिए जनता की धार्मिक भावनाओं का सहारा ले कर मंदिरों के पुनर्निर्माण और अन्य सुविधाओं पर पैसा खर्च कर रही है.

आज पूजापाखंड पर मंदिरों की यात्राओं के आयोजन, फूलफल प्रसाद पर पैसे खर्च करने के स्थान पर शिक्षा के लिए स्कूलों की व्यवस्था और अस्पतालों पर यदि पैसे खर्च किए जाए तो आम जनता ज्यादा लाभांवित होगी और देश की स्थिति अधिक सुधर सकती है.

आज धर्म के सही अर्थ को समझने की आवश्यकता है. एक स्वर और एक आवाज में धर्म की सच्ची राह सब को विशेष कर युवा पीढ़ी को दिखाना बहुत जरूरी हो गया है. शोरशराबे, पाखंड और दिखावे को छोड़ कर सच्ची भावना के साथ, लोकहित की कामना को ले कर धर्म के मार्ग पर चलना ही सच्चा मानव धर्म है.

Sunrise Masala: बनाओ ऐसी मटन करी जो हर दावत को बना दे स्पेशल

चाहे वो कोलकाता का मटन रेज़ाला हो या फिर बिहारी मटन करी, नाम सुनने भर से मुंह में पानी आ जाता है. घर में कोई खास मेहमान आया हो, फैमिली के साथ घर पर छोटी सी शाही दावत करनी हो या दोस्तों के साथ डिनर, मटन तो लगभग हर नॉनवेज पसंद करने वालों की दावत की शान है. यह बात भी सच कि मटन का स्वाद उसकी क्वालिटी के साथ-साथ उसे बनाने के तरीके और मसालों के सही संतुलन पर निर्भर करता है. कई लोग सोचते हैं कि ज्यादा मसाले डालने से इसका स्वाद बढ़ता है तो कई सोचते हैं कि जितने कम मसाले उतना बेहतर मटन का जायका.

जबकि मटन बनाने के लिए मसालों के सही मिश्रण और संतुलन का होना बेहद जरूरी है. लेकिन अब टेंशन की कोई बात नहीं क्योंकि सनराइज़ मीट मसाला आपकी मटन गे्रवी को न सिर्फ जायकेदार बनाएगा बल्कि आप इसकी मदद से झटपट मटन

डिश भी तैयार कर लेंगी. सनराइज़ मीट मसाले में है मसालों का सही मिश्रण जो आपको घर की बनी मटन करी की याद दिला देगा.

स्पेशल मटन करी

सामग्री

  1. 1 किलोग्राम मटन
  2. 1 कप प्याज की प्यूरी
  3. 1 कप टमाटर की प्यूरी
  4. 1/2 चम्मच अदरक लहसुन का पेस्ट
  5. 1 सनराइज़ मीट मसाला
  6. नमक स्वादानुसार.

स्पेशल मटन करी कैसे घर पर बनाए, देखें पूरी रेसिपी की विधि

सबसे पहले मटन को 1/2 चम्मच अदरक लहसुन पेस्ट, 1/2 चम्मच सनराइज़ मीट मसाला से मैरीनेट कर कुछ देर के लिए रख दें. उसके बाद कड़ाही में तेल गर्म कर ओनियन प्यूरी को सुनहरा होने तक भूनें. अब टमाटर की प्यूरी भी मिला दें और कुछ देर भून कर मैरीनेट किया हुआ मटन इसमें मिला कर अच्छी तरह मिक्स करेें. इसा के साथ आप अब नमक और पानी मिला कर मटन अच्छी तरह पका लें. आखिरी में प्याज और धनियापत्ती से गार्निश कर परोसें. जायकेदार मटन करी खा कर लोग उंगलियां चट जाएंगे

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