Monsoon special: क्यों जरूरी है Menstrual हाइजीन

13  बरस की मासूम उम्र में मासिकधर्म का शुरू होना बच्चियों के जीवन की अनूठी घटना है. खेलनेकूदने और पढ़ने के बीच महीने के 5 दिन दर्द, तनाव, शर्म और कई बातों से अनभिज्ञता के बीच बिताने वाली बच्चियां अकसर मासिकधर्म के दौरान स्वच्छता का पूरा ध्यान नहीं रख पाती हैं, जिस के कारण वे अनेक बीमारियों का शिकार हो जाती हैं.

यद्यपि मासिकधर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन अभी भी भारतीय समाज में मासिकधर्म को अपवित्र या गंदा माना जाता है. इसे कई गलत धारणाओं और प्रथाओं से जोड़ दिया गया है, जो महिलाओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं.

दुनियाभर में लाखों महिलाओं और लड़कियों को पीरियड्स होने के कारण स्टिग्मा झेलना पड़ता है. मासिकधर्म के दौरान महिलाओं पर अनेक प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं. उन के साथ भेदभाव किया जाता है. उन्हें गंदे वातावरण और स्वच्छता का पालन नहीं करने के लिए मजबूर किया जाता है. कुछ घरों में उन के किचन में आने या खाना बनाने अथवा खाने को छूने पर रोक होती है. यह भ्रांति फैली हुई है कि पीरियड्स के दौरान अगर महिला अचारचटनी को हाथ लगा दे तो वह सड़ जाता है. पीरियड्स के दौरान लड़कियों को नहाने से रोका जाता है. महिला शादीशुदा है तो कई घरों में वह पति के साथ एक बिस्तर पर नहीं सो सकती. नीचे चटाई आदि बिछा कर सोती है.

सुरक्षा से खिलवाड़

गांवदेहातों में कई जगह आज भी पीरियड्स आने पर महिला को 5 दिन घर के बाहर छोटी सी कुटिया में रहने के लिए मजबूर किया जाता है, जहां वह मासिकस्राव को सोखने के लिए पुराने कपड़े और सूखी घास के पैड बना कर इस्तेमाल करती है. 5 दिन वह किसी से मिल नहीं सकती है. जमीन पर सोती है. स्वयं अपना खाना बनाती है. उसे स्नान करने की मनाही होती है.

सोचिए यदि वह बीमार हो, उसे बुखार आ रहा हो, तो अकेले उस कुटिया में 5 दिन बिताना क्या उस की जान से खेलना नहीं होगा? उसे कुटिया में अकेला पा कर कोई भी उस की अस्मत से खेल सकता है. जमीन पर सोने की स्थिति में कोई जहरीला कीड़ा, सांप आदि उसे काट सकता है. यह उस की सुरक्षा से खुला खिलवाड़ है.

पिछड़े इलाकों में और शहरी इलाकों में भी गरीब तबके में लड़कियां मासिकधर्म आने पर फटेपुराने, गंदे कपड़े आदि ही पैड के तौर पर इस्तेमाल करती हैं. उन्हीं को धोती, सुखाती और फिर इस्तेमाल करती हैं. यह गंभीर बीमारियों को न्योता देने के सिवा कुछ नहीं.

स्वास्थ्य के लिए हानिकारक

शहरों में और महानगरों तक में अपने घर में काम करने वाली बाई से पूछ लीजिए कि पीरियड्स आने पर किस कंपनी का सैनिटरी नैपकिन इस्तेमाल करती हो? जवाब मिलेगा इतना पैसा कहां जो हर महीने पैड खरीदें. हम तो कपड़ा आदि इस्तेमाल करते हैं.

अगर मां समझदार नहीं है, उसे स्वच्छता का ज्ञान नहीं है तो अमीर परिवारों की बेटियां भी पीरियड्स के दौरान गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाती हैं. ये सभी बातें मैंस्ट्रुअल हाइजीन के हिसाब से स्वास्थ्य केलिए बहुत हानिकारक है. गरमी और बरसात के मौसम में तो स्वच्छता का खयाल रखना और अधिक जरूरी हो जाता है.

ऐसे समय में अगर सफाईस्वच्छता नहीं रखी गई तो जीवाणु, संक्रमण, खुजली, जलन आदि का खतरा अधिक हो सकता है. योनि में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया निश्चित पीएच संतुलन बनाए रखते हैं. मगर गरमी, उमस के कारण होने वाले संक्रमण और हानिकारक बैक्टीरिया के विकास से यह बैलेंस बिगड़ जाता है और महिलाएं गंभीर यूरिनरी इन्फैक्शन का शिकार हो जाती हैं.

भावनात्मक सपोर्ट की जरूरत

जब मौसम गरम और उमस भरा होता है, तो अधिकांश महिलाओं को मासिकधर्म में बदलाव का अनुभव हो सकता है. पीरियड्स मौसमी बदलाव से संबंधित होते हैं. गरमी के कारण पीरियड्स लंबे समय तक या अधिक बार हो सकते हैं. टीनऐज गर्ल और पेरी मेनोपौज वूमन को अधिक परेशानी हो सकती है क्योंकि इस दौरान हारमोन अस्थिर होते हैं.

मेनोपौज के करीब आ रही महिलाओं को अकसर फाइब्रौयड्स की शिकायत हो जाती है जिस की वजह से बहुत ज्यादा रक्तस्राव होता है और दर्द भी बरदाश्त से बाहर होता है. ऐसे में उन्हें घर वालों की भावनात्मक सपोर्ट और इलाज की जरूरत होती है. लेकिन मासिकधर्म को अपवित्र दशा मानने वाले घरों में महिलाओं को सारा दर्द अकेले ही सहना पड़ता है.

मैंस्ट्रुअल हाइजीन के लिए जरूरी टिप्स

  1. हाइड्रेटेड रहें

शरीर से विशैले पदार्थों को बाहर निकालने और शरीर के पीएच संतुलन को बनाए रखने के लिए प्रतिदिन कम से कम 8-10 गिलास पानी पीना जरूरी है. ताजे जामुन खाएं और स्वादिष्ठ हर्बल पानी भी जरूर पीएं.

2. सूती अंडरगार्मैंट्स पहनें

गरमी के मौसम में कौटन अंडरगार्मैंट्स खासकर कौटन पैंटी पहनें. कौटन सूती कपड़े में हवा आसानी से आ और जा सकती है. यह स्किन को साफ और सूखा रखने में मदद करता है. इस दौरान आर्टिफिशियल धागों से तैयार कपड़े और अंडरगार्मैंट्स नहीं पहनने चाहिए जिन में अधिक पसीना आए. इस से गुप्तांगों में बैड बैक्टीरिया बढ़ता है. स्किन में खारिशखुजली और जलन हो सकती है.

3. साफ और कौटन तौलिए का इस्तेमाल

कौटन तौलिए का उपयोग करें. कभी भी दूसरे लोगों का इस्तेमाल किया हुआ तौलिया इस्तेमाल न करें. पतले तौलिए का उपयोग करें. इसे साफ करना और सुखाना आसान होता है. अपना यूज किया हुआ तौलिया किसी और के साथ सामन करें. बेहतर स्वच्छता के लिए अपने तौलिए को हर दिन साफ करें.

4. प्राइवेट पार्ट्स की सफाई

नहाते समय अपने प्राइवेट पार्ट्स को रोजाना साफ और ताजे पानी से धोएं. गरम पानी का प्रयोग न करें. किसी भी प्रकार के सुगंधित साबुन का प्रयोग न करें. योनि के पीएच बैलेंस को बनाए रखने के लिए रासायनिक मुक्त, साबुन मुक्त सफाई का चयन करें. जिम, तैराकी या कोई खेल खेलने के बाद हमेशा अपने इंटिमेट रीजन को धो लेना चाहिए. उसे थपथपा कर सुखा भी लेना चाहिए.

5. ऐंटीबैक्टीरियल सैनिटरी नैपकिन

पीरियड के दौरान कंफर्टेबल ऐंटीबैक्टीरियल सैनिटरी नैपकिन का उपयोग करना चाहिए. पीरियड्स हाइजीन के लिए हर 3-4 घंटे पर पैड बदल लेना चाहिए. अच्छी क्वालिटी की पीरियड्स पैंटी का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि बैक्टीरिया ग्रो न करे. इंटिमेट एरिया के बालों को भी शेव करें वरना यहां बैक्टीरिया पनप सकते हैं.  इस से यीस्ट इन्फैक्शन और यूटीआई से बचाव हो सकता है.

6. पीरियड्स में स्नान जरूर करें

यह सिर्फ एक भ्रांति है कि पीरियड्स के दौरान नहाना नहीं चाहिए. असल में पीरियड्स के दौरान स्नान करना पूरी तरह से सुरक्षित है. इस से थकान और दर्द के स्तर में बहुत कमी आती है. इस से मूड भी बेहतर होता है. कुनकुने पानी से स्नान पीरियड्स क्रैंप्स को कम करता है. पीरियड्स साइकिल के दौरान किसी भी दिन बालों को धोना भी पूरी तरह से सुरक्षित है.

अनजाने पल: भाग 2- क्यों सावित्री से दूर होना चाहता था आनंद

एक दिन मैं ने छुट्टी ले ली. घर में उस की पसंद की खीर बनाई और आलू की टिकियां. ये दोनों चीजें उसे बहुत अच्छी लगती थीं. वह स्कूल से घर आई. मैं बड़े प्यार से उसे मेज के पास ले गई. उस ने मेज पर रखी चीजें एकएक कर खोलीं, फिर बंद कर दीं. मैं खुशीखुशी उस की प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगी. जब वह कुछ न बोली तो मैं ने ही कहा, ‘चल नीलू, आज मैं तुझे स्वयं हाथ से खिलाती हूं.’

‘क्यों? आज मुझ से इतनी हमदर्दी क्यों?’ उस के शब्द शूल की तरह मेरे हृदय को भेद गए?

‘बेटी, कैसी बात करती है. मैं ने तेरी पसंद की चीजें बनाई हैं. देख…खीर, आलू की गरमगरम टिकिया.’

‘मुझे भूख नहीं है.’

‘क्या हुआ, मुझ से नाराज है?’

‘अगर तुम मुझे हर रोज इस प्रकार खाना खिलाओगी तो मैं आज खाने को तैयार हूं.’

मैं चुप हो गई, क्या जवाब देती. आखिर उसी ने चुप्पी तोड़ी, ‘बोलो, जवाब दो. क्या हर रोज घर पर रह सकती हो?’

‘तब तो मुझे नौकरी छोड़नी पड़ेगी. और नौकरी छोड़ दूं तो हम तुम्हें वह सुख और आराम नहीं दे पाएंगे, जो तुम्हें आज मिल रहा है. देखो, तुम्हारे पास टीवी है, एसी है, कितने खिलौने हैं, अच्छे स्कूल में पढ़ती हो, क्या ये सब तुम्हें खोना अच्छा लगेगा?’

‘लेकिन पिताजी तो कहते हैं कि तुम्हें नौकरी करने की जरूरत नहीं है.’

‘वे तो यों ही कहते हैं. तुम जब बड़ी हो जाओगी, तभी ये बातें समझ पाओगी.’

‘क्या पता. लेकिन मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता. तुम्हारा हर रोज देर से आना, फिर रात को तुम्हारा और पिताजी का झगड़ा…’ यह कहतेकहते उस की आंखों से आंसू झरने लगे.

मैं ने बच्ची को आलिंगन में भींच लिया. फिर कहा, ‘कहो तो तुम्हें होस्टल भेज दें. वहां तुम्हें खूब सारी सहेलियां मिलेंगी. खूब मजा आएगा.’

उस ने कुछ जवाब नहीं दिया. उस रात मैं ने आनंद से इस बात का जिक्र किया. मुझे तो आश्चर्य होता था कि उस व्यक्ति से मैं ने शादी कैसे की? वह कितना बदल गया गया था. कठोर हृदयहीन और अहंकारी. उस ने गुस्से से लगभग चीखते हुए कहा, ‘कैसी मां हो. बच्ची को अपने से अलग करना चाहती हो?’

मैं बोली, ‘मैं उसे अलग कहां कर रही हूं. आजकल तो सभी बच्चों को होस्टल भेजते हैं. एक साल में मेरा काम हो जाएगा. फिर पिं्रसिपल बन जाने पर कालेज के कैंपस में ही घर मिल जाएगा. नीलू को फिर घर ले आएंगे.’

आनंद ने तपाक से उत्तर दिया, ‘औरों की बात छोड़ो. सोसाइटी में झूठी शान बघारने के लिए लोग बच्चों को होस्टल भेजते हैं. हमें इस की जरूरत नहीं है. और यह खयाल दिल में फिर कभी मत लाना कि मैं कालेज कैंपस में तुम्हारे साथ रहूंगा.’

मैं दंग रह गई. थोड़ी देर बाद पूछा, ‘आप वहां क्यों नहीं रहेंगे? हमारी बच्ची की देखभाल भी वहां ढंग से हो जाएगी. मैं भी उसे ज्यादा समय दे पाऊंगी.’

‘क्या तुम सोचती हो कि मैं तुम्हारे टुकड़ों पर पलूंगा. मैं मर्द हूं. याद नहीं है, मैं ने तुम्हारे पिताजी से क्या कहा था?’

‘भला उसे मैं भूल सकती हूं. तुम ने पिताजी से कितने आक्रोश में कहा था कि मैं चाहे मिट जाऊं, परंतु दूसरों के टुकड़ों पर नहीं पल सकता. मेरे बाजुओं की ताकत पर भरोसा हो तो अपनी लड़की का हाथ मेरे हाथ में दें. अपनी खुद्दारी पर बहुत गर्व था न तुम्हें?’

‘था नहीं, आज भी है.’

‘लेकिन हम, तुम अलग तो नहीं हैं न.’

‘स्त्रीपुरुष का अस्तित्व अलग है और अलग ही रहेगा.’

‘तो तुम ने मुझे नौकरी करने के लिए मजबूर क्यों किया?’

‘अब भी मैं तुम्हें नौकरी करने से नहीं रोकता. बस, यही कहता हूं कि घर और बच्ची का ध्यान रखो. पीएचडी वगैरह की आवश्यकता नहीं है. तुम्हारी जितनी तनख्वाह है, उतनी ही काफी है. महत्त्वाकांक्षाओं का कभी अंत नहीं होता.’

‘लेकिन मेरे इतने दिनों की मेहनत पर पानी फिर जाएगा. मुझे नहीं लगता कि बच्ची को होस्टल भेजने और तुम्हारी इस लैक्चरबाजी में कोई संबंध है.’

‘है, तभी तो कह रहा हूं. मेरी बेटी होस्टल नहीं जाएगी. तुम पीएचडी छोड़ कर उस की परवरिश करो, नहीं तो मैं उसे अपनी बहन के पास जयपुर

भेज दूंगा. फिर अपना तबादला भी वहीं करा लूंगा.’

‘नीलिमा केवल तुम्हारी बेटी नहीं है, उस पर मेरा भी उतना ही अधिकार है, जितना कि तुम्हारा. उस के संबंध में मुझे भी निर्णय लेने का पूरा अधिकार है.’

‘इस निर्णय की हकदार तुम तभी बन सकती हो, जब उस का भला चाहो. मां हो कर अगर अपनी प्रतिष्ठा, यश और पदवी के लिए तुम उसे होस्टल भेजने पर उतारू हो जाओ तो ऐसे में तुम उस हक से वंचित हो जाती हो.’

मेरे क्रोध का पारावार न रहा. मैं भी बहुतकुछ बोल गई. आनंद ने भी बहुतकुछ कहा. बात बढ़ती ही चली गई. इतने में नीलिमा दौड़ती हुई आई और लगभग चीखती हुई बोली, ‘बंद करो यह झगड़ा. नहीं रहना मुझे अब इस घर में. मैं आंटी के पास जयपुर जाऊंगी.’

मेरा कलेजा मुंह को आ गया. ऐसा लगा, जैसे किसी ने छाती पर गोली दाग दी हो. मैं एकदम से पलट कर अपने कमरे में चली गई. मन में विचार उठा, ‘क्या अपनी पहचान बनाना गुनाह है? क्या मैं ने कोई गलती की है? मुझे पीएचडी नहीं करनी चाहिए क्या?’

मन ने झकझोरा, ‘नहीं, गलती मर्दों की है. पति का अहं मेरी पदोन्नति स्वीकार नहीं कर पाता. वह आखिर शाखा अधिकारी है और अगर मैं पिं्रसिपल बन गई तो उस को समाज में वह इज्जत नहीं मिलेगी, जो मुझे मिलेगी. वह मुझ से जलता है. मैं हार मानने से रही. नीलिमा अभी बच्ची है. एक दिन वह मां का प्यार जरूर महसूस करेगी,’ विचारों के सागर में गोते लगातेलगाते कब आंख लग गई, पता ही न चला.

सुबह उठी तो कुछ अजीब सी मायूसी ने घेर लिया. आनंद को नजदीक न पा कर जल्दी से उठ कर ड्राइंगरूम में पहुंची. घर की निस्तब्धता भयानक लगने लगी.

‘नीलिमा,’ मैं ने आवाज दी. लेकिन मेरी आवाज गूंजती हुई कानों में टकराने लगी. दिल धड़कने लगा. सहसा मेज पर रखी हुई चिट्ठी ने ध्यान आकर्षित किया. धड़कते दिल से उठा कर उसे पढ़ने लगी. उस में लिखा था, ‘मैं नीलिमा को ले कर जयपुर जा रहा हूं, उस की मरजी से ही यह सब हो रहा है. कभी हमारे लिए वक्त निकाल सको तो जयपुर पहुंच जाना. आनंद.’

इस के बाद बहुतकुछ हो गया. नीलिमा ने मुझे समझने या समझाने का मौका ही नहीं दिया. इतने समय बाद उसे देख कर पुराने जख्म हरे हो गए. मैं सोचने लगी, ‘आनंद अस्पताल में क्या कर रहा है? कैसी विचित्र परिस्थिति है, कैसा अजीब संगम. क्या कहूंगी आनंद से, क्या वह मुझे पहचानेगा? क्या मुझे उस से मिलना चाहिए? कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करूं.

मैं जब विकास से मिली तो बड़ी परेशानी में थी. उस ने देखते ही कहा, ‘‘क्या हुआ. एक तो देर से आई हो… फिर इतनी घबराहट. सबकुछ ठीक तो है न. कोई बुरी खबर है क्या?’’

मैं ने मुसकराते हुए अपने विचारों को झटकने का प्रयास किया. हम होटल के अंदर गए. मन में विचारों का बवंडर उठ रहा था, ‘क्या विकास को सबकुछ बता दूं, क्या वह समझ पाएगा? आनंद से मिलने कैसे जाऊं? विकास से क्या कहूं?’ कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था.

अचानक मेरे कंधे पर हाथ रख कर विकास ने ही कहा, ‘सवि, मैं कुछकुछ समझ रहा हूं. समस्या क्या है, साफसाफ कहो?’

मेरी आंखों में आंसू आ गए. मैं ने विकास को सबकुछ बता दिया. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘इतनी सी बात के लिए परेशान हो. गोष्ठी खत्म होने के बाद उस से जा कर मिल लो. मैं भी साथ चलूंगा.’

उस ने इतनी आसानी से कह दिया, पर मैं अपने को संभाल नहीं पा रही थी. भोजन के दौरान स्मृतिपटल पर चलचित्र की तरह बीते दिन फिर से उभर आए.

Bigg Boss फेम सना खान बनीं मां, बेटे को दिया जन्म

बिग बॉस फेम एक्ट्रेस सना खान एक्टिंग दुनिया को अलविदा कह दिया है. धर्म के रास्ते पर एक्टिंग करियर से किनारा कर लिया है. एक्ट्रेस सना खान ने साल 2020 में धर्म के रास्ते पर चलने के लिए ग्लैमर दुनिया को अलविदा कहकर सबको चौंका दिया था.

इसके बाद सना खान ने बिजनेसमैन मुफ्ती अनस सैयद से शादी रचा ली. सना और मुफ्ती अनस के निकाह की तस्वीरों ने खूब वायरल हुई थी. दरअसल दोनों की लव स्टोरी की शुरुआत साल 2017 में हुई. वहीं सना खान मुफ्ती अनस से पहली बार मुलाकात मक्का में हुई थीं.  फिर दोनों में दोस्ती हुई और धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई. सना ने साल 2020 में अनस से गुजरात में गुपचुप तरीके से निकाह कर लिया था.

 

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दरअसल, सना खान और अनस सईद के घर में नन्हा मेंहमान आया है. सना और अनस के घर में किलकारियां गूंज उठी है. सना खाना मां बन गई है, उन्होंने बेटे को जन्म दिया है. सना ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर किया है.

 

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सना ने पोस्ट किया वीडियो

पूर्व अभिनेत्री और उनके पति अनस सैय्यद ने बुधवार को इंस्टाग्राम पर अपने बेटे के आगमन की घोषणा की. सना खान खुशखबरी देते हुए इंस्टाग्राम पर लिखा कि “अल्लाह हमें हमारे बच्चे के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ संस्करण बनाए. अल्लाह की अमानत है बेहतरीन बनाना है. जज़ाकअल्लाह खैर सभी को आपके प्यार और दुआ के लिए जिसने हमारे दिलों और आत्माओं को बनाया है.” हमारी इस खूबसूरत यात्रा पर खुश हूं,”

उन्होंने अपने पोस्ट के साथ एक छोटा वीडियो भी अटेच किया, जिसमें लिखा था, ”अल्लाह ताला ने मुकद्दर में लिखा, फिर उसको पूरा किया और आसां किया, और जब अल्लाह देता है तो खुश” और मुसर्रा के साथ देता है. तो अल्लाह ताला ने हमें बेटा दिया.”

सना की पोस्ट पर उनके फैंस के प्यार की बाढ़ आ गई

सना ने खुशखबरी इंस्टाग्राम पर शेयर किया है ऐसे में उनके फैंस काफी प्यार दे रहे है. सना खान के इस पोस्ट पर फैंस के कमेंट्स की बाढ़ आ गई है. फैंस सना खान को बधाइयां दे रहे हैं. सना के इस पोस्ट पर एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा, “माशाल्लाह बहुत मुबारक. अल्लाह लंबी उम्र दे, सेहत दे, नेक और इमान वाला बनाए आपकी औलाद को.” तो वहीं एक दूसरे यूजर ने लिखा, “बहुत- बहुत मुबारक हो, सना और अनस भाई.

अभिनेत्री हुमा कुरैशी से जानें मानसून में उनकी खास पसंद, पढ़ें इंटरव्यू

मॉडलिंग से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री हुमा कुरैशी दिल्ली की है. स्पष्टभाषी और खुबसूरत हुमा को अभिनय पसंद होने की वजह से उन्होंने दिल्ली में पढाई पूरी कर थिएटर ज्वाइन किया और कई डॉक्युमेंट्री में काम किया.

एक विज्ञापन की शूटिंग के लिए वह मुंबई आई. उस दौरान निर्देशक अनुराग कश्यप ने उसके अभिनय की बारीकियों को देखकर फिल्म ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ के लिए साइन किया. फिल्म हिट हुई और हुमा को पीछे मुड़कर देखना नहीं पड़ा. इसके बाद फिल्म ‘एक थी डायन, डी-डे, बदलापुर, डेढ़ इश्कियां, हाई वे, जॉली एल एल बी आदि के अलावा उन्होंने वेब सीरीज भी की है.

हुमा ने हॉलीवुड फिल्म ‘आर्मी ऑफ़ द डेड’ भी किया है. हुमा जितनी साहसी और स्पष्टभाषी दिखती है, रियल लाइफ में बहुत इमोशनल और सादगी भरी है. उनकी फिल्म ‘तरला’ रिलीज पर है, उनसे हुई बातचीत के अंश इस प्रकार है.

 

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सवाल – इस फिल्म को करने की खास वजह क्या रही?

जवाब – कहानी अच्छी तरह से लिखी गई है, एक प्रेरणादायक कहानी, जो एक मास्टर शेफ की है, उन्होंने रेसिपी बुक भी लिखी है और एक महिला होकर इतनी कामयाबी पाई है. उनकी कहानी सबको पता होनी चाहिए.

सवाल – किस तरह की तैयारिया की है?

जवाब – खाने की मैंने अधिक प्रैक्टिस नहीं की है, क्योंकि मैं खाना बना सकती हूँ, फ़ूड स्टाइलिस्ट ने ही सबकुछ किया है, लेकिन इसमें खाने को अधिक महत्व नहीं दिया गया है. इसमें घर का खाना जो माँ के हाथ का बना होता है, जिसमे फैंसी तरीके से सजावट नहीं होती, पर उसका स्वाद बहुत अलग होता है. उसे दिखाने की कोशिश की गई है.

सवाल – बायोपिक में किसी व्यक्ति को दर्शाते हुए उस व्यक्ति की बारीकियों को पर्दे पर उतारने की जरुरत होती है, नहीं तो कंट्रोवर्सी होती है, आपने इस बात का कितना ख्याल रखा?

जवाब – ये सही है कि बायोपिक में मेहनत अधिक करनी पड़ती है, इसमें मैंने तरला दलाल की बहुत सारी इंटरव्यू देखी, वह जिस तरीके से बात करती थी, उसे अडॉप्ट किया, मसलन वह गुजराती थी, पर मराठी लहजे में बात करती थी, बहुत सारे शब्द अंग्रेजी में बोलती थी. उनके बात करने का तरीका ‘लेडी नेक्स्ट डोर’ की तरह था, जो बहुत सुंदर था.

सवाल – तरला दलाल की कहानी आज की महिलाओं के लिए कितना सही है?

जवाब – आज भी तरला की कहानी प्रासंगिक है, क्योंकि आज भी किसी लड़की को पहले शादी करने की सलाह दी जाती है, बाद में उन्हें जो करना है, उसे करने को कह दिया जाता है, जिसे शादी के बाद करना आसान नहीं होता, पर तरला ने उसे कर दिखाया.

सवाल – परिवार का सहयोग किसी महिला की कामयाबी में कितना जरुरी होता है?

जवाब – तरला दलाल का जीने का तरीका संजीदगी से भरा हुआ करता था. वह एक सॉफ्ट स्पोकेन महिला थी. उस ज़माने घर से निकल कर काम करना, पति और परिवार का ध्यान रखना आदि सब करना आसान नहीं था. उस समय की वह मार्गदर्शन करने वाली पहली महिला है और उन्होंने बता दिया कि परिवार के साथ भी बहुत कुछ किया जा सकता है, जो आज की महिलाये भी कर सकती है. इसे बहुत ही प्यार भरी तरीके से उन्होंने किया है, जिसे सबको जानना आवश्यक है. मेरे यहाँ तक पहुँचने में भी मेरे परिवार का बहुत बड़ा सहयोग है, मेरे पेरेंट्स, मेरा भाई सबका सहयोग रहा है, अकेले इंसान कुछ भी नहीं कर पाता.

 

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सवाल – दिल्ली से मुंबई आना और एक्टिंग के कैरियर को स्टाब्लिश करना कितना मुश्किल रहा?

जवाब – दिल्ली से मुंबई आने के बाद मैंने विज्ञापनों में काम करना शुरू कर दिया था, एक एड में मेरे साथ अभिनेता आमिरखान थे, जिसे अनुराग कश्यप डायरेक्ट कर रहे थे, इसके बाद अनुराग कश्यप ने मुझे गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में काम करने का ऑफर दिया, जो 2012 में रिलीज हुई, ये एक छोटी सी मेरी शुरूआती जर्नी रही, जिसके बाद लोगों ने मुझे फिल्मों में काम करते हुए देखा और आगे काम मिलता गया.

सवाल – आपने इंडस्ट्री में करीब 10 साल बिता चुकी है और बॉलीवुड, हॉलीवुड और साउथ की फिल्मों में काम किया है, आप इस जर्नी को कैसे देखती है?

जवाब – ये सही है कि मैंने एक सपना देखा है और अब वह धीरे-धीरे पूरा हो रहा है. मैंने हमेशा से अभिनेत्री बनना चाहती थी, लेकिन कैसे होगा पता नहीं था. समय के साथ-साथ मैं आगे बढ़ती गयी. मैं चंचल दिल की लड़की हूँ और अपने काम से अधिक संतुष्ट नहीं रहती. मैं कलाकार के रूप में हर नयी किरदार को एक्स्प्लोर करना पसंद करती हूँ.

सवाल – किसी फिल्म को चुनते समय किस बात का ख़ास ध्यान रखती है?

जवाब – कहानी अच्छी हो, अच्छी तरह से लिखी हुई हो, अच्छे लोगों के साथ फिल्म बन रही हो और जो फिल्म बना रहे है, वे इमानदारी से फिल्म को पूरा करें. कहानी और स्क्रिप्ट अच्छी हो और मुझे एक्साइट करती हो, तो जोनर कोई भी हो, उसे करने में मजा आता है.

सवाल – इंडस्ट्री की कोई ऐसी फ्रेंड जिससे आप मिलना-जुलना पसंद करती है?

जवाब – मेरा इंडस्ट्री में कोई फ्रेंड नहीं है, मैं अकेले रहती हूँ. सुबह शूटिंग पर जाती हूँ, इसके ख़त्म होने के बाद सीधे घर आती हूँ. खाना खाती हूँ और सो जाती हूँ.

सवाल – मानसून में आप खुद को फिट कैसे रखती है?

जवाब – हर मौसम में समय पर खाना और समय से सोना ये दो चीज मैं नियमित करती हूँ, इसके अलावा वर्कआउट और योगा भी करती हूँ. मानसून में पकौड़े खाना पसंद है, जो किसी दूसरे मौसम में अच्छा नहीं लगता.

सवाल – ऐसी कोई फ़ूड जिसे आप खुद को खाने से रोक न सकें?

जवाब – चाट

सवाल – कोई ऐसी व्यंजन जिसे आप अच्छा बना लेती है?

जवाब – कीमा अच्छा बना लेती हूँ, जिसे सभी पसंद करते है.

सवाल – कोई सुपर पॉवर मिलने पर क्या बदलना चाहती है?

जवाब – मैं लोगों की थॉट्स पढ़ना चाहती हूँ.

मेरी अंडरआर्म्स से बदबू आती है, Odor से छुटकारा पाने के लिए मैं अब क्या करूं?

सवाल

मेरी अंडरआर्म्स से बदबू आती है और यह बदबू कई बार सब के बीच में शर्मिंदा कर देती है. क्या इस का कारण जरूरत से ज्यादा पसीना हैक्या आप इस बदबू से छुटकारा पाने के लिए नुसखे बता सकती हैं?

जबाव

दरअसलबदबूदार अंडरआर्म्स भले ही एक आम समस्या हो लेकिन यह आप के आत्मविश्वास को कम कर देती है. भले ही डियोड्रैंट या रोलऔन गरमियों में बदबूदार अंडरआर्म्स के लिए एक त्वरित समाधान है. लेकिन इस का असर खत्म होते ही यह समस्या फिर से होने लगती है. जब शरीर से पसीना निकलता है तो हमारी त्वचा की सतह पर रहने वाले बैक्टीरिया प्रोटीन को तोड़ देते हैं और कुछ खास ऐसिड यौगिक निकलते हैं जिन से शरीर के कुछ हिस्सों से तीखी गंध आने लगती है. यह एक ऐसी समस्या है जो आसानी से कुछ घरेलू नुसखों द्वारा दूर की जा सकती है.

आप भले ही इस समस्या से कई सालों से परेशान हों लेकिन इन नुसखों से आप कुछ ही दिनों में अंडरआर्म्स से बदबू की समस्या को दूर कर सकती हैं. अंडरआर्म्स की बदबू से छुटकारा पाने के लिए बेकिंग सोडा प्रभावी रूप से काम करता है. इस के लिए 2 बड़े चम्मच बेकिंग सोडा लें और उस में 1 चम्मच नीबू का रस मिलाएं. दोनों सामग्री को मिला कर पेस्ट तैयार करें. इस पेस्ट को अंडरआर्म्स पर 10 मिनट तक सर्कुलर मोशन में घुमाते हुए मसाज करें. इसे अंडरआर्म्स में थोड़ी देर के लिए लगाए रखें और हलका सूखने पर पानी से धो लें इस के अलावा

1 कप ऐप्पल साइडर विनेगर में 1/2 कप पानी मिलाएं. इसे एक स्प्रे बोतल में भर कर रोज रात को सोने से पहले अपनी अंडरआर्म्स पर लगाएं. सुबह इसे कुनकुने पानी से धो लें. इस प्रक्रिया को 15 दिनों तक नियमित रूप से दोहराएं. ऐसा करने से अंडरआर्म्स की बदबू पूरी तरह से दूर हो जाएगी.

समस्याओं के समाधान

ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडरडाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा 

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभाई-8रानी झांसी मार्गनई दिल्ली-110055.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.

नया पड़ाव: भाग 4- जब पत्नी को हुआ अपनी गलती का अहसास

राकेश की निष्ठुरता पर भी खूब क्रोध आता. उन के शाम को जल्दी आ जाने पर भी खीजी हुई मैं रसोई से ही चाय बना कर पिंकी के हाथ भिजवा देती और स्वयं काम में उलझ रहती. थोड़ी देर पिंकी के साथ गुप्पें लड़ा कर राकेश फिर बाहर चले जाते.

मुझे महसूस होता मेरे अंदर एक बांध है जो किसी दिन टूट जाएगा तो सबकुछ उस में बह जाएगा. पर यह बांध कभी टूट नहीं पाया. ठंडी रिक्तता हम दोनों के बीच बनी रही.

रंजू ने इस बीच बीटैक कर ली थी. देहरादून के रिसर्च इंस्टिट्यूट में जब उस की नौकरी लग गई तो मैं और पिंकी काफी अकेले पड़ गए. अकसर रंजू से मोबाइल पर बात होती रहती थी. उसे मेरी बहुत याद आती थी.

फिर एक दिन रंजू का मैसेज आया, ‘‘मैं ने अपनी पसंद की एक ईसाई लड़की से कचहरी में शादी करर ली है. ऐसा इसलिए किया क्योंकि शायद पता चलने पर आप और पिताजी इस के लिए कभी राजी न होते. कुछ दिन बाद छुट्टियां मिलने पर आप का आशीर्वाद लेने आऊंगा.’’

मैसेज पढ़ कर मैं तो एकदम से टूट ही गई. कैसे पलपल घुटघुट कर सारी इच्छाएं और उमंगें मैं ने रंजू पर कुरबान कर दी थीं और उस ने मुझे शादी कर के कैसे सूचना भेजी है. अपनी इस जीवनसंध्या में जब मैं पिंकी के ससुराल जाने के बाद रंजू की बहू से ही दिल बहलाने के ढेरों ख्वाब संजो रही थी, वे सारे उस के पत्र ने बिखेर कर रख दिए. उस की उम्र ही अभी क्या थी जो शादी कर ली. शहरों में तो लड़के 30-32 में शादी करते हैं.

राकेश तो मैसेज पढ़ कर खूब हंसे.

बोले, ‘‘देख लिया बच्चों पर बेहद कुरबान होने का नतीजा. न तुम इधर की रहीं, न उधर की. और भुगतोे.’’

राकेश तो कह कर रोज की तरह लापरवाही से बाहर चले गए, पर मैं बहुत रोई थी. काफी दिन उदास रही. मन ही मन रोती रही. गुस्से के मारे रंजू को बधाई भी नहीं दी. पिंकी उन दिनों मैडिकल की पढ़ाई कर रही थी. अब जिंदगी के इस पड़ाव पर आ कर मैं अकेली रह गई थी तो इस के लिए किस को दोष देती. शायद इस में राकेश का कम और मेरा ज्यादा दोष था या सिर्फ मेरा ही था.

तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया. मैं अपने में लौट आई. राकेश घूम कर लौट आए थे. मुझे उदास देख कर लापरवाही से बोले, ‘‘क्यों भई, यह उदासी कैसी है? अरे हां, मैं तो तुम्हें शाम को बताना ही भूल गया. मैं तो खाना खा कर आया हूं, तुम खा लो. फिर जरा मेरी तैयारी करनी है. 3-4 दिन के लिए दफ्तर की तरफ से मुझे कल लखनऊ जाना है,’’ कह कर वे स्वयं भी अपना सामान अटैची में रखने लगे.

मैं असमंजस में पड़ कर सामान रखवाने लगी कि पीछे से अकेली कैसे रहूंगी. खैर, मैं ने

खाना यों ही समेट कर रख दिया. भूख न जाने कहां उड़ गई थी. पूरी रात न जाने कैसेकैसे संकल्प करती रही.

सुबह मैं ने उन्हें विदा किया. पर अब मैं उदास नहीं थी. सोचा, जैसे भी हो जो गुजर गया है उस लौटाना होगा मुझे. आगत के सामने नए सिरे से खड़े हो सकने की सामर्थ्य तो पैदा करनी ही होगी अपने अंदर. राकेश के साथ हर पल गुजारने के लिए उन के मनमुताबिक बनना ही होगा मुझे.

दोपहर को बाजार जा कर अच्छी सी

दुकान से पैर और हाथ साफ करने का सारा सामान, कोल्ड क्रीम, हैंड लोशन, ग्लिसरीन, गुलाबजल, नेलपौलिश, इत्र यहां तक कि बाल काले करने का तेल भी खरीद लाई. एक पास के ब्यूटी सैलून में गई और बालों से ले कर पैरों तक को ट्रीट कराया. 3-4 घंटे लगे और कुछ हजार का बिल भी आया पर मुझे संतोष था कि मैं सही कर रही हूं.

फिर पता ही नहीं चला कि 4 दिन कैसे गुजर गए. मैं शीशे के आगे स्वयं जाजा कर कायाकल्प पर हैरान होती रहती. आखिर राकेश दौरे से लौटे. दरवाजा खुलते ही मुझे देख कर हैरान हो गए.

मैं उन से लिपट कर बोली, ‘‘भूल गई थी मैं कि जीवनसाथी जीवनसाथी ही होता है. हम दोनों की ही जीवनसंध्या अब करीब है. जिंदगी के इस पड़ाव पर हमें एकदूसरे की सख्त जरूरत है. अब से हर पल मैं तुम्हारी हूं.’’

सुन कर और हाथ की अटैची नीचे रख कर राकेश ने मुझे गरमजोशी से गले लगा लिया.

मानसून में गर्भवती महिलाएं और नवजात बच्चे की सेहत का ध्यान रखें कुछ ऐसे

बारिश के मौसम में वायरल इंफेक्शन या फ्लू जैसी बीमारियों का कहर बढ़ जाता है. इस मौसम में हेल्दी रहने के लिए सभी लोगों को सावधानियां बरतनी पड़ती है. खासकर गर्भवती महिलाओं को मानसून में स्पेशल केयर की जरूरत होती है. अगर आप प्रेग्नेंट हैं, तो प्रेग्नेंसी से जुड़ी कुछ अहम बातों का खास ख्याल रखकर मानसून का आनंद उठा सकती हैं.

इस बारें में पुणे की मदरहुड अस्पताल की वरिष्ठ सलाहकार प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शालिनी विजय कहती है कि अन्य मौसम की तुलना में मानसून के दौरान संक्रमण का खतरा अधिक रहता है. इस मौसम में डेंगू और मलेरिया भी तेजी से फैलने लगता है, ऐसे में प्रेग्नेंसी के दौरान बीमार पड़ने से गर्भ में पल रहे बच्चे की सेहत पर भी सीधा असर पड़ सकता है. इसलिए मानसून के दौरान गर्भवती महिलाएं या जिसने बच्चे को जन्म दिया हो, उन्हें खुद की और नवजात की सेहत का ध्यान रखना काफी जरूरी हैं. कुछ विशेष सुझाव निम्न है,

  1. डाइट पर रखे ध्यान
  • इस मौसम में बाकी मौसम की तरह सब्जियां नहीं मिलती, हरी साग-सब्जियां भले ही मिल जाय, लेकिन उसमे कई तरह के कीड़े या उनके अंडे हो सकते है,
  • अगर हरी पत्तेदार सब्जियां खाने का मन है, उन्हें ठीक तरीके से थोड़े गर्म पानी से धो लें,
  • गर्भवती महिलाओं को जंक फूड मानसून में अवॉयड करना चाहिए,
  • प्रेग्नेंसी में फल खाएं, लेकिन इसे अच्छी से धो लें,
  • बारिश में पानी फिल्टर या उबालकर ही पिएं, इसके अलावा घर में निकालकर फ्रेश फ्रूट्स के जूस पिएं, नींबू और नारियल पानी भी पी सकती है.

2. खतरा इन्फेक्शन का

  • मानसून में इंफेक्शन से बचने के लिए साफ-सफाई का ध्यान जरूरी होता है, क्योंकि इस समय वातावरण में नमी बढ़ जाती है, ऐसे में जरा भी गंदगी स्किन इंफेक्शन बढ़ा सकती है.
  • थोड़ी सी भी नमी वाले कपडे न पहने,
  • इसके अलावा जिन महिलाओं को ऑपरेशन से बच्चे हुए हैं टांका ताजा है, वे उस स्थान को एकदम सूखा रखें, अन्यथा टांके टूट सकते हैं.
  • पानी में नीम की पत्तियां डालकर भी नहाना भी एक अच्छा विकल्प हैं, इससे जर्म्स पनपने का खतरा कम होता हैं.

3. नवजात का खास ख्याल रखना जरुरी

इसके आगे डॉक्टर शालिनी कहती है कि मानसून में डिलीवरी के बाद नवजात की सेहत का ध्यान रखना भी सबसे अधिक आवश्यक है, क्योंकि जन्म के बाद बच्चा एक अलग माहौल में रहता है और उससे बाहर के मौसम से सामंजस्य बिठाने में समय लगता है. इस मौसम में महिलाएं जब बच्चों को स्तनपान कराती हैं, तो उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि दूध के साथ पसीना बच्चे के मुंह में न चली जाए, क्योंकि मानसून चिपचिपी गर्मी का समय है, पसीना आना स्वाभाविक है. ऐसे में स्टरलाइज किये हुए कॉटन बॉल से निप्पल के चारों ओर साफ़ कर लें. नवजात के लिए भी हर तरह सावधानियां उसे सेहतमंद बनाती है, इसलिए पेरेंट्स को इसका खास ध्यान रखनी चाहिए,

  • मानसून के दौरान इन्फेक्शन वाली बिमारी बढने का खतरा अधिक होने की वजह से नवजात शिशु के बीमार होने की संभावना अधिक होती हैं. इस वजह से माता-पिता के रूप में, बच्चे को मानसून की इन्फेक्शन से बचाने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है. कुछ सावधानियां निम्न है,
  • बरसात में बच्चे को बिमारी के संक्रमण से बचाने के लिए बीमार व्यक्ति के संपर्क से बच्चे को दूर रखें.
  • बारिश में छाता, रेनकोट और रेनबूट का इस्तेमाल करें.
  • इस मौसम में तापमान बदलता रखता हैं. इसलिए नमी को दूर रखने के लिए बच्चे को आरामदायक सूती कपड़े पहनाएं, लेकिन जब मौसम सर्द हो जाए, तो हमेशा बनियान या जैकेट साथ रखें, ताकि जरुरत के अनुसार उन्हें पहना सकें.
  • हमेशा सुनिश्चित करें कि शिशु के कपड़े पूरी तरह सूखे हों. बारिश में कपड़े नमी जल्दी सोख लेते हैं, जिससे फंगल इन्फेशन होने का खतरा रहता है.
  • इसके अलावा बच्चे को इस मौसम में एक मिनट के लिए भी गीला डायपर न पहनाए.
  • बरसात में, बच्चे अन्य मौसमों की तुलना में अधिक पेशाब करते हैं, जिससे त्वचा पर चकत्ते हो सकते हैं. यहां तक कि हल्का नम डायपर भी त्वचा पर चकत्ते पैदा कर सकता है साथ ही नवजात शिशुओं को ठंड का एहसास करा सकता है. इसलिए याद रखें कि जैसे ही आपको लगे कि शिशु की नैपी गीली या गंदी है, उसे तुरंत बदल दें.
  • बुखार, शारीरिक दर्द, छींक और अन्य लक्षण मानसून से संबंधित बीमारियों की विशेषता हैं और ये वायरल संक्रमण होने का लक्षण हैं. ऐसा होने पर बच्चे के डॉक्टर से संपर्क करें और बीमारी से लड़ने के लिए उचित सावधानी बरतें,
  • मच्छर के काटने से नवजात शिशु को गंभीर परेशानी हो सकती है. बच्चे के लिए मच्छरदानी का इस्तेमाल करें, ताकि वह अच्छी नींद ले सके. शाम होने पर मच्छर से बचाने के लिए बच्चों को पूरे कपडे पहनाएं.
  • नवजात बच्चे को रोजाना नहाने की आवश्यकता नहीं होती हैं, क्योंकि वह ज्यादातर घर के अंदर ही रहते है. मानसून में शिशु को सप्ताह में दो से तीन बार नहलाना जरूरी होता है, अगर बच्चे को बाहर लेकर गए, तो घर पर वापस आने पर उसे गर्म पानी से नहलाना अच्छा होता है.

सिंगल मदर अभिनेत्री बरखा बिस्ट सभी से क्या कहना चाहती हैं, पढ़े इंटरव्यू

बरखा बिस्ट का जन्म और पालन-पोषण हिसार, हरियाणा के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उन्होंने अपनी शुरुआती पढाई कोलकाता और पुणे से किया है. ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान ही बरखा ने मॉडलिंग करना शुरू कर दिया था. वर्ष 2000 में बरखा ने एनडीए क्वीन ब्यूटी पेजेंट में भाग लिया और उस ब्यूटी पेजेंट की विनर बनी, जिससे बरखा को अभिनय क्षेत्र में आने की प्रेरणा मिली .

मॉडलिंग में आने के बाद बरखा ने अभिनय के क्षेत्र में जाने का फैसला किया, लेकिन उनके पिता को यह मंजूर नहीं था. हालाँकि, वह उनकी इच्छा के विरुद्ध गई और अभिनय में अपना करियर बनाने के लिए मुंबई चली आई. उनके पिता ने उनसे तब बात करना बंद कर दिया था और उन्होंने भी लगभग दो महीने तक अपने पिता से बात नहीं की. हालाँकि, उनकी माँ और बहन के समझाने के बाद उनके पिता मान गए.

 

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मुंबई में रहने के दौरान उन्हें अपना पहला टीवी शो कितनी मस्त है जिंदगी में उदिता का किरदार निभाया. इसके बाद उन्होंने कई शो कसौटी ज़िंदगी की, क्या होगा निम्मो का और काव्यांजलि जैसे कई शो में कैमियो की भूमिका की है.

काम के दौरान बरखा का परिचय अभिनेता और को स्टार इंद्रनील सेनगुप्ता से हुआ, प्यार हुआ और शादी की. इन्द्रनील से शादी से पहले उन्होंने अपने पूर्व प्रेमी करण सिंह ग्रोवर से सगाई की थी, लेकिन यह रिश्ता 2006 में समाप्त हो गया था. इन्द्रनील से शादी के बाद बरखा एक बेटी मीरा की माँ बनी, लेकिन आपसी मन मुटाव के चलते वर्ष 2021 में दोनों अलग हो गए, लेकिन इन्द्रनील के साथ बरखा की जान – पहचान अभी भी जारी है, वे अपने बेटी से मिलने, बीच – बीच में आते रहते है.

अभिनय के अलावा बरखा ने कॉमेडी सर्कस के अजूबे और पॉपकॉर्न जैसे शो को भी होस्ट किया हैं. वर्ष 2008 में डांस शो सास बनाम बहू में उन्होंने एक प्रतियोगी के रूप में भाग लिया. बरखा बिष्ट वर्ष 2010 की बॉलीवुड फिल्म “राजनीति” के “इश्क बरसे” गाने में भी दिखाई दी. इन दिनों बरखा की हॉरर फिल्म 1920: हॉरर्स ऑफ़ द हार्ट रिलीज हो चुकी है, जिसमे उन्होंने माँ की भूमिका निभाई है. उन्होंने खास गृहशोभा के लिए बात की आइये जानते है, बरखा की जर्नी और सिंगल मदर बनने की कहानी, उनकी जुबानी.

इस फिल्म को करने की खास वजह के बारें में पूछने पर बरखा कहती है कि मैंने हॉरर जोनर में कोई फिल्म पहले नहीं की थी, इसे ट्राई करने की इच्छा से इसे किया. इसके अलावा ये निर्देशक विक्रम भट्ट की फ्रेंचाइजी फिल्म है, इसलिए करना जरुरी लगा. मुझे हॉरर फिल्म देखना बहुत पसंद है और मुझे डर भी नहीं लगता. इस बार मैंने हॉरर फिल्म में अभिनय कर दर्शकों को डराने का जिम्मा लिया है.

बरखा खुद माँ है, ऐसे में माँ की भूमिका निभाना उनके लिए मुश्किल नहीं था, लेकिन फ़िल्मी माँ और रियल माँ में अंतर अवश्य होता है. वह कहती है कि माँ के इमोशन को पर्दे पर दिखाना आसान होता है, सारे इमोशन नैचुरल तरीके से आते है. रिलेटेबल चरित्र भी होता है, जो अपने बेटी को प्यार करती है, उसे प्रोटेक्ट करती है, उसका ख्याल रखती है, जो भी हो जाय, पर उसका ध्यान रखना नहीं छोडती. ऐसा मैं अपनी 11 साल की बेटी मीरा के लिए भी करती हूँ, लेकिन ड्रामा पर्दे पर अधिक होता है, रियल में इतना नहीं होता.

 

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आगे बरखा कहती है कि फिल्म और रियल लाइफ में बदला व्यक्ति कई बार लेता है. रियल लाइफ में अगर किसी बेटी के साथ भी कुछ गलत होता है और उसमे बदला लेने की सामर्थ्य है, तो वह अवश्य बदला लेती है, क्योंकि रिवेंज यानि बदला एक इमोशन है, ये किसी के साथ कभी भी हो सकता है.

हॉरर फिल्मों की शेल्फ लाइफ बहुत कम होती है, क्योंकि एक बार देखने के बाद लोग उसे देखना पसंद नहीं करते, इस बारें में बरखा कहती है कि आज केवल हॉरर फिल्में ही नहीं, हर फिल्म की शेल्फ लाइफ कम हो चुकी है. कोविड के बाद से सारे थिएटर की फिल्में सफर कर रही है. आज किसी भी फिल्म को दुबारा देखने की इच्छा नहीं होती. हर जोनर के पिक्चर की सेल्फलाइफ छोटी हो गई है, लेकिन हॉरर की एक कमिटेड ऑडियंस है और उन्हें ऐसी फिल्में देखना पसंद है, साथ ही ऐसी फिल्में कम बनती है, लेकिन ये फिल्म सबको अच्छी लग रही है. फिल्म का अच्छा होना, ऑडियंस को एंगेज कर पाना ही किसी फिल्म की सफलता का राज है.

ओटीटी पर फिल्मों का अधिक सक्रिय होने की वजह से फिल्मों का स्तर कम होता जा रहा है, इस बात से आप कितनी सहमत रखती है? बरखा कहती है कि ये सारी चीजे डिमांड और सप्लाई पर आधारित होती है, जब डिमांड बढ़ता है तो सप्लाई को भी बढ़ाना पड़ता है, और यहाँ ये एक क्रिएटिव फील्ड है, कोई प्रोडक्ट नहीं. डिमांड बढ़ने से कुछ फिल्मों के कंटेंट अच्छी न होने पर भी बन जाती है. ये हर चीज के लिए दुनिया में लागू होती है. ओटीटी का भी यही हाल हो रहा है, क्योंकि क्रिएटिव फील्ड में मशीन की तरह क्रिएटिविटी को दिखाया नहीं जा सकता.

इसलिए इसमे गिरावट आ रही है, जबकि लोगों की आशाएं बहुत अधिक हो चुकी है, क्योंकि उन्होंने वैसी अच्छी फिल्में पहले देखी है. यहाँ ये भी समझना जरुरी है कि जो लोग वैसी फिल्में या वेब सीरीज बना रहे है, उन्हें भी पता नहीं है कि उनका काम सही नहीं हो रहा है, उनके हिसाब से वे सही फिल्म बना रहे है. दर्शक ही ऐसी फिल्मों को नकार सकते है. देखा जाय तो क्रिएटिव फील्ड सबसे अधिक अनस्टेबल है. कंटेंट की अभी बहुत अधिक जरुरत है, आज निर्माता, निर्देशक किसी भी आईडिया के पीछे भाग रहे है, वे फटाफट कुछ बनाकर डाल देते है, जबकि कंटेंट अच्छी नहीं होती है.

 

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एक्टिंग के अलावा बरखा अभी एक सिंगल माँ है, क्योंकि वह एक्टर इन्द्रनील दासगुप्ता से अलग हो चुकी है. वह कहती है कि मेरी बेटी 11 साल की है, जिसका बहुत ख्याल रखना पड़ता है. आज के बच्चों के पास सबकुछ जानने का बहुत बड़ा माध्यम है, उन्हें मुझे वक्त देने की जरुरत होती है, उन्हें मोनिटर करना पड़ता है. सिंगल मदर का स्ट्रगल बहुत अधिक होता है, पर ये मेरे और मेरी बेटी के जीवन का नया फेज है, इसमें गलत या सही करते हुए मैं आगे बढ़ रही हूँ और अच्छा करने की कोशिश कर रही हूँ.

इसके आगे वह कहती है कि सिंगल मदर बनना आसान नहीं होता, कई बार मैं रियेक्ट कर देती हूँ, फिर सोची कि जिसे जो कहना है कहें. मेरी जिंदगी को मुझे जीना है जिसमे मेरी एक बेटी है. हम दोनों को एक दूसरे से अच्छी बोन्डिंग हो इसकी कोशिश रहती है.

इतने सालों की जर्नी कैसी रही, कोई रिग्रेट है क्या? वह कहती है कि मुझे किसी प्रकार की कोई रिग्रेट नहीं है. मैंने टीवी, वेव फिल्म्स, फिल्में आदि सब कर चुकी हूँ. यंग लड़की से शुरू कर अब माँ का भी अभिनय कर रही हूँ. मुझे कोई कंप्लेन नहीं रहा, आज भी अच्छा काम कर रही हूँ. कोई रिग्रेट नहीं है.

डेली दिनचर्या के बारें में बरखा का कहना है कि मेरी जिंदगी अभी आम महिला की जिंदगी हो चुकी है, जिसमे सुबह उठकर बच्चे को स्कूल भेजना, उसकी पढाई देखना, आदि करना पड़ता है. इसके बाद जो समय बचता है, अभिनय और सोशल लाइफ, फ्रेंड्स, ट्रेवलिंग आदि करती हूँ. आगे 3 से 4 साल तक मेरा फोकस पूरी तरह से बेटी पर रहेगा. सभी माओं से मेरा कहना है कि बच्चे को कभी रोके नहीं, जितना हो सकें प्रोटेक्ट करें. प्रोटेक्ट का अर्थ यहाँ यह है कि उसे इतना आत्मनिर्भर और समझदार बना दें, ताकि बड़े होकर किसी भी परिस्थिति में बच्चे खुद को प्रोटेक्ट कर सकें, क्योंकि एक उम्र के बाद बच्चे खुद सारी चीजे करते है और ये जरुरी भी है. पेरेंट्स का साथ बच्चों के साथ केवल थोड़े समय के लिए ही होता है, इसलिए उनका साथ इस समय अवश्य देते

बरखा बिस्ट का जन्म और पालन-पोषण हिसार, हरियाणा के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उन्होंने अपनी शुरुआती पढाई कोलकाता और पुणे से किया है. ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान ही बरखा ने मॉडलिंग करना शुरू कर दिया था. वर्ष 2000 में बरखा ने एनडीए क्वीन ब्यूटी पेजेंट में भाग लिया और उस ब्यूटी पेजेंट की विनर बनी, जिससे बरखा को अभिनय क्षेत्र में आने की प्रेरणा मिली .

 

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मॉडलिंग में आने के बाद बरखा ने अभिनय के क्षेत्र में जाने का फैसला किया, लेकिन उनके पिता को यह मंजूर नहीं था. हालाँकि, वह उनकी इच्छा के विरुद्ध गई और अभिनय में अपना करियर बनाने के लिए मुंबई चली आई. उनके पिता ने उनसे तब बात करना बंद कर दिया था और उन्होंने भी लगभग दो महीने तक अपने पिता से बात नहीं की. हालाँकि, उनकी माँ और बहन के समझाने के बाद उनके पिता मान गए.

मुंबई में रहने के दौरान उन्हें अपना पहला टीवी शो कितनी मस्त है जिंदगी में उदिता का किरदार निभाया. इसके बाद उन्होंने कई शो कसौटी ज़िंदगी की, क्या होगा निम्मो का और काव्यांजलि जैसे कई शो में कैमियो की भूमिका की है.

काम के दौरान बरखा का परिचय अभिनेता और को स्टार इंद्रनील सेनगुप्ता से हुआ, प्यार हुआ और शादी की. इन्द्रनील से शादी से पहले उन्होंने अपने पूर्व प्रेमी करण सिंह ग्रोवर से सगाई की थी, लेकिन यह रिश्ता 2006 में समाप्त हो गया था. इन्द्रनील से शादी के बाद बरखा एक बेटी मीरा की माँ बनी, लेकिन आपसी मन मुटाव के चलते वर्ष 2021 में दोनों अलग हो गए, लेकिन इन्द्रनील के साथ बरखा की जान – पहचान अभी भी जारी है, वे अपने बेटी से मिलने, बीच – बीच में आते रहते है.

अभिनय के अलावा बरखा ने कॉमेडी सर्कस के अजूबे और पॉपकॉर्न जैसे शो को भी होस्ट किया हैं. वर्ष 2008 में डांस शो सास बनाम बहू में उन्होंने एक प्रतियोगी के रूप में भाग लिया. बरखा बिष्ट वर्ष 2010 की बॉलीवुड फिल्म “राजनीति” के “इश्क बरसे” गाने में भी दिखाई दी. इन दिनों बरखा की हॉरर फिल्म 1920: हॉरर्स ऑफ़ द हार्ट रिलीज हो चुकी है, जिसमे उन्होंने माँ की भूमिका निभाई है. उन्होंने खास गृहशोभा के लिए बात की आइये जानते है, बरखा की जर्नी और सिंगल मदर बनने की कहानी, उनकी जुबानी.

इस फिल्म को करने की खास वजह के बारें में पूछने पर बरखा कहती है कि मैंने हॉरर जोनर में कोई फिल्म पहले नहीं की थी, इसे ट्राई करने की इच्छा से इसे किया. इसके अलावा ये निर्देशक विक्रम भट्ट की फ्रेंचाइजी फिल्म है, इसलिए करना जरुरी लगा. मुझे हॉरर फिल्म देखना बहुत पसंद है और मुझे डर भी नहीं लगता. इस बार मैंने हॉरर फिल्म में अभिनय कर दर्शकों को डराने का जिम्मा लिया है.

 

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बरखा खुद माँ है, ऐसे में माँ की भूमिका निभाना उनके लिए मुश्किल नहीं था, लेकिन फ़िल्मी माँ और रियल माँ में अंतर अवश्य होता है. वह कहती है कि माँ के इमोशन को पर्दे पर दिखाना आसान होता है, सारे इमोशन नैचुरल तरीके से आते है. रिलेटेबल चरित्र भी होता है, जो अपने बेटी को प्यार करती है, उसे प्रोटेक्ट करती है, उसका ख्याल रखती है, जो भी हो जाय, पर उसका ध्यान रखना नहीं छोडती. ऐसा मैं अपनी 11 साल की बेटी मीरा के लिए भी करती हूँ, लेकिन ड्रामा पर्दे पर अधिक होता है, रियल में इतना नहीं होता.

आगे बरखा कहती है कि फिल्म और रियल लाइफ में बदला व्यक्ति कई बार लेता है. रियल लाइफ में अगर किसी बेटी के साथ भी कुछ गलत होता है और उसमे बदला लेने की सामर्थ्य है, तो वह अवश्य बदला लेती है, क्योंकि रिवेंज यानि बदला एक इमोशन है, ये किसी के साथ कभी भी हो सकता है.

हॉरर फिल्मों की शेल्फ लाइफ बहुत कम होती है, क्योंकि एक बार देखने के बाद लोग उसे देखना पसंद नहीं करते, इस बारें में बरखा कहती है कि आज केवल हॉरर फिल्में ही नहीं, हर फिल्म की शेल्फ लाइफ कम हो चुकी है. कोविड के बाद से सारे थिएटर की फिल्में सफर कर रही है. आज किसी भी फिल्म को दुबारा देखने की इच्छा नहीं होती. हर जोनर के पिक्चर की सेल्फलाइफ छोटी हो गई है, लेकिन हॉरर की एक कमिटेड ऑडियंस है और उन्हें ऐसी फिल्में देखना पसंद है, साथ ही ऐसी फिल्में कम बनती है, लेकिन ये फिल्म सबको अच्छी लग रही है. फिल्म का अच्छा होना, ऑडियंस को एंगेज कर पाना ही किसी फिल्म की सफलता का राज है.

ओटीटी पर फिल्मों का अधिक सक्रिय होने की वजह से फिल्मों का स्तर कम होता जा रहा है, इस बात से आप कितनी सहमत रखती है? बरखा कहती है कि ये सारी चीजे डिमांड और सप्लाई पर आधारित होती है, जब डिमांड बढ़ता है तो सप्लाई को भी बढ़ाना पड़ता है, और यहाँ ये एक क्रिएटिव फील्ड है, कोई प्रोडक्ट नहीं. डिमांड बढ़ने से कुछ फिल्मों के कंटेंट अच्छी न होने पर भी बन जाती है. ये हर चीज के लिए दुनिया में लागू होती है. ओटीटी का भी यही हाल हो रहा है, क्योंकि क्रिएटिव फील्ड में मशीन की तरह क्रिएटिविटी को दिखाया नहीं जा सकता. इसलिए इसमे गिरावट आ रही है, जबकि लोगों की आशाएं बहुत अधिक हो चुकी है, क्योंकि उन्होंने वैसी अच्छी फिल्में पहले देखी है. यहाँ ये भी समझना जरुरी है कि जो लोग वैसी फिल्में या वेब सीरीज बना रहे है, उन्हें भी पता नहीं है कि उनका काम सही नहीं हो रहा है, उनके हिसाब से वे सही फिल्म बना रहे है. दर्शक ही ऐसी फिल्मों को नकार सकते है. देखा जाय तो क्रिएटिव फील्ड सबसे अधिक अनस्टेबल है. कंटेंट की अभी बहुत अधिक जरुरत है, आज निर्माता, निर्देशक किसी भी आईडिया के पीछे भाग रहे है, वे फटाफट कुछ बनाकर डाल देते है, जबकि कंटेंट अच्छी नहीं होती है.

एक्टिंग के अलावा बरखा अभी एक सिंगल माँ है, क्योंकि वह एक्टर इन्द्रनील दासगुप्ता से अलग हो चुकी है. वह कहती है कि मेरी बेटी 11 साल की है, जिसका बहुत ख्याल रखना पड़ता है. आज के बच्चों के पास सबकुछ जानने का बहुत बड़ा माध्यम है, उन्हें मुझे वक्त देने की जरुरत होती है, उन्हें मोनिटर करना पड़ता है. सिंगल मदर का स्ट्रगल बहुत अधिक होता है, पर ये मेरे और मेरी बेटी के जीवन का नया फेज है, इसमें गलत या सही करते हुए मैं आगे बढ़ रही हूँ और अच्छा करने की कोशिश कर रही हूँ.

इसके आगे वह कहती है कि सिंगल मदर बनना आसान नहीं होता, कई बार मैं रियेक्ट कर देती हूँ, फिर सोची कि जिसे जो कहना है कहें. मेरी जिंदगी को मुझे जीना है जिसमे मेरी एक बेटी है. हम दोनों को एक दूसरे से अच्छी बोन्डिंग हो इसकी कोशिश रहती है.

इतने सालों की जर्नी कैसी रही, कोई रिग्रेट है क्या? वह कहती है कि मुझे किसी प्रकार की कोई रिग्रेट नहीं है. मैंने टीवी, वेव फिल्म्स, फिल्में आदि सब कर चुकी हूँ. यंग लड़की से शुरू कर अब माँ का भी अभिनय कर रही हूँ. मुझे कोई कंप्लेन नहीं रहा, आज भी अच्छा काम कर रही हूँ. कोई रिग्रेट नहीं है.

डेली दिनचर्या के बारें में बरखा का कहना है कि मेरी जिंदगी अभी आम महिला की जिंदगी हो चुकी है, जिसमे सुबह उठकर बच्चे को स्कूल भेजना, उसकी पढाई देखना, आदि करना पड़ता है. इसके बाद जो समय बचता है, अभिनय और सोशल लाइफ, फ्रेंड्स, ट्रेवलिंग आदि करती हूँ. आगे 3 से 4 साल तक मेरा फोकस पूरी तरह से बेटी पर रहेगा. सभी माओं से मेरा कहना है कि बच्चे को कभी रोके नहीं, जितना हो सकें प्रोटेक्ट करें. प्रोटेक्ट का अर्थ यहाँ यह है कि उसे इतना आत्मनिर्भर और समझदार बना दें, ताकि बड़े होकर किसी भी परिस्थिति में बच्चे खुद को प्रोटेक्ट कर सकें, क्योंकि एक उम्र के बाद बच्चे खुद सारी चीजे करते है और ये जरुरी भी है. पेरेंट्स का साथ बच्चों के साथ केवल थोड़े समय के लिए ही होता है, इसलिए उनका साथ इस समय अवश्य देते रहे.

झूठ पुरुष ही क्यों बोलते हैं

सुरेश ने फोन पर नीलम से कहा कि उसे घर आने में देर होगी और आज रात की पार्टी में नहीं जा सकेगा. नीलम को पहले तो गुस्सा आया, लेकिन फिर सुरेश के काम की व्यस्तता को समझ कर चुप रह गई. वह अपनी सहेली से फोन पर बात कर ही रही थी कि अचानक दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा खोला, तो सामने सुरेश हंसता हुआ खड़ा था क्योंकि उसे पता था कि नीलम गुस्सा होगी.

अब नीलम ने सहेली के साथ बात करना बंद किया और सुरेश को डांटने लगी कि यह कैसा झूठ है, जो मुझे तकलीफ दे? सुरेश ने हंसते हुए जवाब दिया कि मैं तुम्हें सरप्राइज देना चाहता था, इसलिए ऐसा किया. अब नीलम मान गई और दोनों पार्टी में चले गए.

यह मजेदार, छोटा सा झूठ था और सरप्राइज होने की वजह से सब ठीक हो गया, लेकिन ऐसी कई घटनाएं देखी गई हैं, जहां झूठ बोलने की आदत ने सारे रिश्ते खत्म कर दिए.

‘सफेद झूठ,’ ‘झूठ बोले कौआ काटे,’ ‘आमदनी अठन्नी’ आदि कई ऐसी फिल्में हैं, जो झूठ बोलने को ले कर ही कौमेडी के रूप में बनाई गईं और दर्शकों ने इन फिल्मों को पसंद किया क्योंकि ये परदे पर थीं, रियल लाइफ में नहीं. मगर झूठ बोलने की आदत कई बार जीवन के लिए खतरनाक भी हो जाती है और इस झूठ को सच साबित करने में सालों लग जाते हैं.

बारबार झूठ बोलना

यह सही है कि हर धर्म में झूठी बातों का शिकार महिलाएं ही हुई हैं. इन्हें कहने वाले पुरुष ही हैं क्योंकि महिलाएं संवेदनशील होती हैं और इन धर्मगुरुओं की बातों को सहजता से मान लेती हैं. मसलन, बीमार होने पर भी व्रत या उपवास करना, अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए नंगे पांव मीलों चलना आदि सभी निर्देशों को महिलाएं सच्चे मन से पूरा करती हैं.

रिसर्च में भी यह बात सामने आई है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में झूठ कम बोल पाती हैं. असल में अधिकतर महिलाएं पुरुषों से अधिक सैंसिटिव और ईमानदार होती हैं. उन पर लोग आसानी से ट्रस्ट कर सकते हैं. इसलिए उन्हें अधिक झूठ बोलने की जरूरत नहीं पड़ती. जैंडर को ले कर शोध करने पर यह भी पाया गया कि झूठ बोलने से अगर झूठ बोलने वाले को फायदा होता है, तो वह बारबार झूठ बोलता है. पुरुषों के लगातार झूठ बोलने की वजहें 3 हैं. शेम, प्रोटैक्शन ऐंड रैपुटेशन.

क्या कहते हैं मनोवैज्ञानिक

असल में अपना रियल चेहरा छिपाने के लिए लोग झूठ बोलते हैं ताकि दूसरे की भावनाओं को ठेस न पहुंचे. इस के अलावा दूसरों को इंप्रैस करने, उत्तरदायित्व से पल्ला झड़ने, कुकर्मों को छिपाने के लिए सामाजिक पहलुओं से दूर भागने, कनफ्लिक्ट को दूर करने आदि कई कारणों से झूठ बोलते हैं. मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि झूठ बोलना लाइफ की एक कंडीशन है.

मस्तिष्क की ऐक्टिविटी के बारे में बात की जाए तो पता चलता है कि झूठ बोलने से हमारे मस्तिष्क के कुछ पार्ट स्टिम्युलेट भी हो जाते हैं. इन में पहले फ्रंटल लोब यानी मस्तिष्क के सब से आगे के हिस्से में क्षमता सचाई को आसानी से दबाने की होती है और यह झूठ को एक इंटैलेक्चुअल तरीके से रखने की क्षमता रखता है. दूसरा लिंबिक सिस्टम, जो अधिकतर ऐंग्जौइटी की वजह से होता है. इस में झूठ बोलना एक धोखा भी माना जाता है और व्यक्ति कई बार अपराधबोध या स्ट्रैस्ड से ग्रस्त हो कर भी झूठ बोलता है. तीसरा टैंपोरल लोब में व्यक्ति झूठ बोलने के बाद आनंद महसूस करता है. झूठ बोलने पर हमारा ब्रेन सब से अधिक व्यस्त रहता है.

झूठ बोलने का सहारा

इस बारे में काउंसलर राशिदा कपाडि़या कहती हैं कि सर्वे में भी यह स्पष्ट है कि झूठ बोलने की आदत लड़कों को बचपन से ही शुरू हो जाती है और यह झूठ वे अपनी मां से अधिकतर बोलते हैं. इस की वजह यह है कि पुरुष संबंधों में कड़वाहट नहीं चाहते क्योंकि सही बात शायद उन के पार्टनर को पसंद न हो, तर्कवितर्क चल सकता है, इसलिए उसे अवौइड करने के लिए पुरुष झूठ का सहारा लेते हैं. इस के अलावा किसी काम को अवौइड करना या सोशल इवेंट में नहीं जाना, हो तो झूठ बोलते रहते हैं, साथ ही पुरुषों का इगो बड़ा होता है. वे अपनी कमजोरियां दिखाना नहीं चाहते. इस वजह से भी झूठ बोलते हैं.

कई बार किसी दूसरे शौक को पूरा करने के लिए झूठ बोलने का सहारा लिया जाता है, साथ ही यह भी देखा गया है कि पुरुषों को गिल्ट फीलिंग महिलाओं की अपेक्षा कम होती है. महिलाओं में अपराधबोध अधिक होता है. वे झूठ बोल कर अधिक समय तक नहीं रह पातीं और सच बोल देती हैं. पुरुष इमोशनल कम होते हैं और प्रैक्टिकल अधिक सोचते हैं. झूठ बोलना उन के लिए बड़ी बात नहीं होती क्योंकि व्यवसाय या जौब में वे छोटाछोटा झूठ बोलते रहते हैं. पुरुषों का झूठ पकड़ना आसान नहीं होता क्योंकि वे बहुत सफाई से झूठ बोल लेते हैं और महिलाएं भी उस पर आसानी से विश्वास कर लेती हैं.

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