नमस्ते जी: भाग 3- नितिन ने कैसे तोड़ा अपनी पत्नी का भरोसा?

सुबह के समय नितिन के फैक्टरी जाने से पहले वह आने लगी थी ताकि अंकिता को वह संभाल सके और मैं उन के लिए अच्छे से नाश्ता तैयार कर सकूं. जब कभी नितिन आयशा के सामने आ जाते तो वह हलका सा मुसकराती हुई कहती-‘नमस्ते जी.’

उस का मुसकराने का अंदाज बड़ा ही शर्मीला था. नितिन भी उसी के अंदाज में मुसकराते हुए जवाब देते थे. आयशा जब भी मेरे पास बैठती तो हमारे बारे में ही पूछती. कभी पूछती थी कि आंटीजी आप की ‘लवमैरिज’ है क्या? कभी कहती थी कि आंटीजी, अंकलजी बहुत ‘स्मार्ट’ हैं, आप ने कहां से ढूंढ़ा इन्हें? जाने कब भोलेपन में मैं ने वे सारी बातें नितिन को बता दी थीं. वक्त गुजरता जा रहा था.

एक दिन रविवार की शाम को मैं रसोई में खाना पका रही थी और नितिन पहली मंजिल पर अपने बैडरूम में टेलीविजन देख रहे थे. मांजी रसोई के साथ लगते अपने कमरे में बैठ कर कोई किताब पढ़ रही थीं. अंकिता को भी आयशा के साथ पहली मंजिल पर बच्चों के कमरे में खेलने के लिए छोड़ा हुआ था. मुझे अचानक याद आया कि नितिन रात के खाने में कभीकभार प्याज तो खा ही लेते हैं इसलिए सोचा कि चलो क्यों न काटने से पहले पूछ ही लिया जाए. पहले तो आवाज लगाई थी. नितिन ने टेलीविजन की आवाज इतनी तेज कर रखी थी कि कोई फायदा न जान मैं सीढि़यां चढ़ते हुए अपने बैडरूम की तरफ चल दी थी. मैं ने जैसे ही कमरे में प्रवेश किया तो जो देखा उसे देखने के साथ तो मेरी सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गई थी. मैं कभी स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी, जो मेरे सामने हो रहा था.

आयशा अंकिता को फर्श पर खिलौने के साथ छोड़ कर खुद सोफे पर नितिन के होंठों में होंठ लगाए अनंत आनंद की यात्रा में तल्लीन थी. नितिन ने एक हाथ से आयशा को पूरी तरह से कसकर भींच रखा था तो उन का दूसरा हाथ आयशा के शरीर का मंथन कर रहा था.

अपनी बेटी की देखभाल व रक्षा के लिए रखी गई दूसरे की बेटी के जिस्म का यह कैसा मंथन था? मैं देख कर सन्न रह गई थी. कुछ पलों के बाद जब मुझे वहां अपने खड़े रहने का आभास हुआ तो मैं जोर से चिल्लाई थी, ‘नितिन.’

नितिन की नजर जब मुझ पर पड़ी तो उन का पूरा शरीर कांप उठा था. ठंडे पड़ते बदन में अब इतनी भी हिम्मत नहीं रही थी कि वे आयशा को अपने से अलग कर सके. आयशा ने पलट कर मेरी तरफ देखा तो वह झटके से उठ कर बाथरूम की तरफ भाग गई. और फिर बाथरूम की टोटी से पानी गिरने की आवाजें आने लगी थीं. उस पल पता नहीं मेरे मन में क्या आया, मैं ने अपनी चप्पल पैर से निकाली थी और नितिन के मुंह में ठूंस दी थी. फिर जोर से चिल्लाई थी, ‘गंदगी में ही मुंह मारना है तो लो मैं ही खिला देती हूं तुम्हें.’

तभी नीचे से मांजी की आवाज आई थी, ‘बहू क्या हुआ?’

मांजी की आवाज सुनते ही नितिन मेरे पैरों में पड़ गए थे. वे कुछ ही क्षणों में वह सबकुछ कह गए थे जो एक पत्नी को अपने पति के अहम को तोड़ने के लिए काफी होता है. मांजी जब तक सीढि़यां चढ़ कर हमारे बैडरूम में पहुंचीं तब तक नितिन वापस सोफे पर बैठ चुके थे व मैं ने अंकिता को गोद में उठा लिया था.

‘बहू, क्या हुआ था जो इतनी जोर से चिल्लाई?’

‘कुछ नहीं मांजी, बैडरूम से कुछ गिरने की आवाज आई थी. मैं ने आ कर देखा तो अंकिता बैड से नीचे गिरी हुई थी. उसे देख कर मेरे मुंह से चीख निकल गई.’

‘आयशा कहां है?’ मांजी के पूछने पर मैं ने कह दिया कि वह बाथरूम में है. मेरा जवाब सुन कर मांजी यह कहते हुए वापस अपने कमरे की तरफ चली गई थीं कि पता नहीं आजकल के मांबाप क्या करते रहते हैं? 2 बच्चों की भी ढंग से देखभाल नहीं कर सकते. उस के लिए भी अलग से कामवालियां. अरे, हम ने भी तो बच्चे पाले हैं, एक नहीं…

मांजी के जाने के बाद मैं ने आयशा को बाथरूम से जल्दी बाहर निकलने को कहा था. वह जब तक बाथरूम से बाहर नहीं आई, मैं अंकिता को गोद में लिए फनफनाती हुई बाथरूम के आगे ही उस की प्रतीक्षा में चक्कर लगाती रही. बाथरूम की कुंडी खुली तो मेरी निगाहें दरवाजे पर जा कर अटक गई थीं. आयशा ने जिन कपड़ों को पहन रखा था वह उन्हीं कपड़ों में नहा कर बाथरूम से बाहर निकल आई थी. उस को देखने से ऐसा आभास हो रहा था कि जैसे उस के तनबदन में अब भी कामाग्नि हिलौरे ले रही थी. आयशा की आंखों में कहीं भी अपराधबोध, आत्मग्लानि व पश्चात्ताप के भाव नजर नहीं आ रहे थे. तब मुझ से रहा नहीं गया. मैं ने उस के गीले गाल पर अपने उलटे हाथ का एक जोरदार थप्पड़ जड़ते हुए कहा था, ‘आयशा, जल्दी से कपड़े बदल कर मेरे कमरे में आओ.’

वह थोड़ी देर के बाद हमारे बैडरूम में हम दोनों के बीच थी, मगर कोई शिकन उस के चेहरे पर नहीं थी. मैं उस के इस रूप को देख कर हैरान व परेशान थी. मैं ने ही मन में सोचा कि इस लड़की को नितिन ने ऐसा कौन सा पाठ पढ़ा दिया है जो यह इतनी बड़ी भूल करने के बाद भी बिलकुल सामान्य हो कर खड़ी है.

मैं ने एकाएक आयशा से पूछा, ‘आयशा, यह सब कब से चल रहा है?’

‘मुझ से क्या पूछती हो आंटी, अंकल से पूछो न.’

उस का यह उत्तर सुन कर मैं ने अपना रुख नितिन की ओर किया तो नितिन ने अपना मुंह नीचे फर्श पर गड़ा दिया. मुझे लगा था कि नितिन का मन पश्चात्ताप के कुएं में डुबकियां मार रहा था.

आयशा का दाहिना हाथ पकड़ कर उसे दूसरे कमरे में ले गई और वहां उसे एक सोने की लौंग व 3-4 पुराने सूट दे कर कहा, ‘अपना सारा सामान अभी समेट लो…और ध्यान से सुन, तू इस बात का किसी से भी जिक्र नहीं करेगी…और हां, अपनी मां को कह देना कि अब हमें तुम्हारी जरूरत नहीं रही.’

आयशा वाली घटना को अभी 7-8 महीने ही हुए होंगे कि नितिन ने रात को देर से आना शुरू कर दिया था. पूछने पर कहा था, ‘आजकल आर्डर अधिक हैं, सो रात वाली शिफ्ट में भी लेबर से काम होता है.’

तब नितिन ने मेरी आंखों पर मेहनत की बातों का ऐसा चश्मा चढ़ाया था कि जब तक मेरी आंखों ने परदे के पीछे की सचाई को देखना शुरू किया तब तक नितिन एक और सांवलीसलोनी के साथ जाने कब ऐसे घुलमिल गए जैसे पानी के साथ चीनी. और उस सावंलीसलोनी औरत के साथ नितिन न जाने अपनी कितनी रातें रंगीन कर चुके थे. बाद में पता लगा था कि उस औरत को उस के पति ने छोड़ रखा था और वह ऐसे ही शिकार की तलाश में रहती थी.

मेरा जब कभी भी फैक्टरी में जाना होता तो वह औरत हलकी सी हंसी होंठों पर ला कर बड़े ही अंदाज से ‘नमस्तेजी’ कहती थी.

मेरी यादों में जीवित होहो कर उन सब की ‘नमस्तेजी’ अब भी व्यंग्य कसती है मुझ पर. मैं आज तक उन हादसों से अपनेआप को नहीं निकाल पाई हूं. पति पर शक करना अपनी गृहस्थी में कांटे बोना जैसा होता है. पर जब शक विश्वास में बदल जाए तो जिंदगी नीरस हो कर रह जाती है.

मैं शादी के बंधन से ही विश्वास खो बैठी हूं और शायद, तभी से खुद को वैसा कभी नहीं पाया जैसा विश्वास टूटने से पहले…बस, गृहस्थी की डगर पर चलती जा रही हूं. शायद यह सोच कर कि वैवाहिक जीवन के आधे से अधिक का रास्ता तय करने के बाद भारतीय नारी के लिए पलट कर वापस पहले छोर पर जाने की गुंजाइश कहां रहती है, क्योंकि इसी रास्ते पर हमारे पीछेपीछे कुछ नन्हेनन्हे पांव भी चल रहे होते हैं. अगर कदम वापस लिए तो ये नन्हेनन्हे पांव असंतुलित हो, हम से भी पहले गिर सकते हैं और कुचल भी सकते हैं.

यह सब सोच कर ही मैं नहीं रुकने देती गृहस्थी के पहिए को…और चलती जा रही है नितिन के साथसाथ मेरी जिंदगी की गाड़ी सुनसान मोड़ों पर, ऊबड़खाबड़, पथरीले रास्तों से गुजरती हुई एक अनजान मंजिल की तरफ.

आज चेहरा दूसरा है. आयशा की जगह धोबी की लड़की है. मगर ‘नमस्ते जी’ के पीछे छिपे अभिप्राय को मैं जहां तक समझ पाई हूं, वह केवल एक ऐसा मर्द ढूंढ़ना है जो सभ्यता व संस्कार का मुखौटा लगाए तलाश में रहता है प्रतिपल एक नए संबोधन की कि कोई मुसकराए और धीरे से कहे,

‘‘नमस्ते जी.’’

Monsoon Special: मौनसून ब्यूटी केयर टिप्स

मुंबई के दादर स्थित ‘स्पा इमेज ब्यूटी क्लीनिक ऐंड इंस्टिट्यूट’ की ब्यूटी थेरैपिस्ट अर्चना प्रकाश बताती हैं कि गरमी खत्म होतेहोते और बरसात शुरू होने से पहले हवा में बहुत ज्यादा गरमी होती है, जिस से त्वचा टैन रहती है.

बदलते मौसम का असर पूरे शरीर की त्वचा के साथसाथ बालों पर भी पड़ता है. ऐसे में बौडी केयर के प्रति लापरवाही आप को महंगी पड़ सकती है.

आइए, जानते हैं बरसात के मौसम में कैसे करें शरीर की देखभाल:

त्वचा में सुधार के लिए स्ट्रौंग फेशियल की जरूरत होती है. इस मौसम में त्वचा के पोर्स खुले होते हैं. त्वचा पसीने से तरबतर, टैन और औयली होती है, जिस के लिए ऐंटीटैनिंग फेशियल या जेल बेस फेशियल करना ज्यादा फायदेमंद साबित होता है.

1. ऐंटीटैनिंग फेशियल:

ऐंटीटैनिंग फेशियल से त्वचा की टैनिंग तो दूर होती ही है, साथ ही बहुत ही कम समय में त्वचा नर्ममुलायम और तरोताजा बन जाती है.

2. बालों की देखभाल:

इस मौसम में हवा में आर्द्रता होती है इसलिए बालों का खूब खयाल रखना पड़ता है. हफ्ते में 1 बार बालों की अच्छी तरह से तेल से मालिश करें और फिर अच्छे शैंपू से उन्हें धो लें. बाल छोटे हों तो 2 दिन में 1 बार और बड़े हों तो हफ्ते में 2 या 3 बार बालों को धोएं. धोने के बाद बालों की डीप कंडीशनिंग करें. बरसात से पहले या बरसात में हवा में आर्द्रता होती है. अत: संभवतया इस मौसम में स्टे्रटनिंग, रिबौंडिंग या पर्मिंग न करें. हां, मौसम खुला हो और बरसात न हो तब आप ऐसा जरूर कर सकती हैं.

3. जैल बेस फेशियल:

ऐंटीटैनिंग फेशियल के साथसाथ जैल बेस फेशियल भी कर सकती हैं. जैल बेस फेशियल में क्रीम की जगह जैल का इस्तेमाल किया जाता है, जिस से औयली त्वचा को ज्यादा फायदा मिलता है. क्रीमी फेशियल से जहां त्वचा और ज्यादा औयली होने की संभावना रहती है, वहीं जैल फेशियल से यह समस्या दूर हो जाती है. जैल बेस फेशियल से बहुत जल्दी त्वचा पर इफैक्ट पड़ता है. त्वचा नर्ममुलायम, उजली और औयल फ्री दिखाई देने लगती है.

अर्चना बताती हैं कि इस मौसम में कुछ घरेलू उपाय कर के भी आप इन परेशानियों को दूर कर सकती हैं:

4. मैनीक्योर व पैडीक्योर:

कुनकुने पानी में 2-3 बूंदें हर्बल शैंपू और 1 चम्मच ऐंटीसैप्टिक लोशन डालें और उस में 15 मिनट तक पैर डुबोए रखें. फिर प्यूमिक स्टोन से हाथपावों को धीरेधीरे घिसें. डैड स्किन और त्वचा पर स्थित हैवी डस्ट निकल जाएगी. फिर औयल फ्री मौइश्चराइजर या बौडी लोशन लगाएं. त्वचा नर्ममुलायम और निखरीनिखरी नजर आएगी.

5. स्किन टैन:

टैन हुई त्वचा को निखारने के लिए घरेलू फेसपैक भी इस्तेमाल कर सकती हैं. इस के लिए चंदन, जायफल और हलदी को मिला कर लेप बनाएं और टैन हुई त्वचा पर लगाएं. सूखने पर धो लें.

ध्यान रहे

– इस मौसम में भरपूर पानी पीएं.

– नारियल पानी, जूस, छाछ, मिल्कशेक पीएं और रसीले फल खाएं.

– इस मौसम में ड्राईफू्रट्स कम खाएं, क्योंकि इन से शरीर में अधिक उष्णता बढ़ती है.

शारीरिक स्वच्छता

हवा में गरमी और आर्द्रता होने की वजह से इस मौसम में घर से बाहर निकलने पर त्वचा पसीने से तरबतर हो कर चिपचिपी हो जाती है. ऐसे में दिन में 2-3 बार मैडिकेटेड साबुन या बौडी वाश से स्नान करें. स्नान करने के बाद शरीर पर खुशबूदार टैलकम पाउडर और परफ्यूम लगाएं ताकि आप के शरीर से पसीने की बदबू न आए और आप अपनेआप को तरोताजा महसूस करें.

नया पड़ाव: भाग 2- जब पत्नी को हुआ अपनी गलती का अहसास

राकेश रात के 8 बजे लौटे. मुझे अनदेखा कर के बोले, ‘‘खाना तैयार हो तो

ले लाओ नहीं तो कल से खाना भी बाहर खा लिया करूंगा. फिर तुम्हें रंजू के लिए और ज्यादा वक्त मिल सकेगा.’’

मुझे गुस्सा तो बहुत आया परंतु चुप रहना ही उचित समझ खाना परोस कर ले आई. इतने व्यंग्य सुन कर मेरी भूख मिट गई थी. गले में ग्रास अटके जाते थे, पर जैसेतैसे खाना निबटा कर मैं उठ गई. राकेश ने मेरे कम खाने पर कुछ नहीं पूछा तो मन और उदास हो गया क्योंकि ऐसा पहली बार ही हुआ था.

सोचा, रात के एकांत में राकेश जरूर मुझे प्यार करेंगे. अपनी गलती के लिए कुछ कहेंगे परंतु बरतन समेट कर कमरे में आई तब तक राकेश सो चुके थे. उस पूरी रात मैं ठीक से सो भी नहीं सकी. आंखें बारबार भीगती रहीं.

मन में यह भी विचार आया कि राकेश कहीं किसी चक्कर में तो नहीं फंस गए. पर अंत में यह सोच कर कि आगे से राकेश के आने के वक्त से ठीक से तैयार हो जाया करूंगी, मैं हलकी हो कर सो गई.

सुबह देर से आंख खुली. रंजू बेतहाशा रो रहा था और राकेश अखबार पढ़ रहे थे. मैं ?ाटके से उठी. रंजू को उठाया और राकेश से बोली, ‘‘इतनी देर से रो रहा है, क्या यह सिर्फ मेरा

ही बेटा है जो आप इस की ओर जरा भी ध्यान नहीं देते.’’

राकेश चिढ़ कर बोले, ‘‘अलार्म का

काम कर रहा था तुम्हारा सुपूत, सो मैं बैठा

रहा ताकि तुम उठ कर चाय तो तैयार करो.

अब इस के होने पर न जाने क्याक्या बंद होने वाला है मेरा.’’

जैसे मुझे खिजाते हुए वे दोबारा अखबार पढ़ने लगे. मैं ने उठ कर रंजू को दूध दिया. फिर स्वयं बाथरूम से निबट कर चाय बना कर लाई तो राकेश बोले, ‘‘अब बैड टी तो गोल यह नाश्ते का वक्त है, कुछ साथ में ले आती तो नाश्ता गोल होने से बच जाता.’’

राकेश के इस तरह के व्यवहार की क्या वजह थी मुझे समझ में नहीं आ रहा था. फिर सुबहसुबह लड़ाई कर के बात बढ़ाना बेकार समझ मैं ने राकेश को घूर कर बिस्कुट का डब्बा पकड़ा दिया और चुपचाप चाय पीने लगी.

अभी बेइंतहा काम मेरा इंतजार कर रहा था. पहले ही काफी देर हो गई थी. मैं खाली चाय पी कर रसोई में आ गई. राकेश के लिए लंच बाक्स तैयार करना था.

रंजू को वाकर में बैठा कर मैं रसोई में ही ले आई. झटपट सब्जी बनाई और आटा गूंध कर परांठे तैयार किए. तब तक राकेश तैयार हो चुके थे.

मैं ने चुपचाप लंच बौक्स राकेश को पकड़ा दिया. बाहर तक छोड़ने आई तो राकेश मेरी ओर बगैर ध्यान दिए चल दिए.

सारा दिन मन बुझ रहा. अंदर का खालीपन और गहरा हो गया. रंजू की तबीयत

अब थोड़ी ठीक थी. मैं सारा काम चुपचाप करती रही. दिन में मां को पूरी बात बताई तो उन्होंने अपनी पुरानी कहानी शुरू कर दी कि पति की सेवा ही स्त्री का धर्म है. पति को कैसे भी मना और भूल कर भी लड़ना नहीं. शाम हुई तो मैं तैयार हो कर राकेश का इंतजार करने लगी.

मगर राकेश शाम के 7 बजे आए. मैं ने अच्छी साड़ी पहनी थी पर  उसे रंजू ने 3 बार गीला कर दिया था और वह जगहजगह से मुस गई थी. गोदी में उछलउछल कर उस ने मेरे बाल भी अस्तव्यस्त कर दिए थे.

राकेश देर से आने की कैफियत दिए बगैर बोले, ‘‘भारत की औरतों में एक बात है. बच्चों के पीछे सरी जिंदगी तबाह कर देती हैं. गीली साड़ी, उलझे बाल, खुरदुरे हाथ और मुरझया चेहरा. बस, बच्चों के बाद यही तसवीर मिलेगी औरतों की. अरे बाहर की औरतों को भी देखो, कैसे बच्चे पालती हैं. घर का काम भी करती हैं, बाहर का भी. फिर भी फूल की तरह मुसकराती रहती हैं.’’

मैं बिना कुछ कहे हिचकियां भरभर कर रोने लगी. रोतेरोते ही बोली, ‘‘सारा दिनभर खप कर काम किया है. फिर सज कर आप का इंतजार करती रही. इतनी देर से आए और अब भाषण देने लगे. बच्चों के लिए बड़ी आयानौकरानी रख दी है न, जो सारा दिन फूल सा मुककराता चेहरा ले कर आप के आगेपीछे घूमती रहूं. बरतन, सफाई, कपड़े, रंजू की देखभाल सब मेरे जिम्मे है. आप को तो सिर्फ बातें बनानी आ गई हैं… काम से लौट कर जख्मी तीर चला देते हो. अब रंजू को आप ही संभालो, मैं कुछ दिनों के लिए मायके

जा रही हूं,’’ कह कर मैं सचमुच अपने कपड़े समेटने लगी.

राकेश सिटपिटा कर बोले, ‘‘अरे भई, मैं तो मजाक कर रहा था. तुम्हारे बगैर कहीं मेरा गुजारा है. छोड़ो भी यार, हम तो कहते हैं हमारा भी कुछ खयाल रख लिया करो, बस.’’

मैं पिघल गई. राकेश ने उस रात मुझे खूब प्यार किया. खाना खा कर राकेश टहलने गए तो मेरे लिए एक कोल्ड क्रीम और हैंड लोशन खरीद लाए. बोले, ‘‘काम के बाद इन्हें इस्तेमाल किया करो, हाथ खराब नहीं होंगे.’’

सुन कर मुझे लगा कि राकेश अब भी मुझे बहुत प्यार करते हैं. मैं ही बुरी हूं जो उन का ध्यान नहीं रखती.

कुछ दिन मैं ने राकेश का खूब ध्यान रखा. थोड़ा जल्दी सुबह उठने से राकेश के लिए वक्त निकल आता था. पर थोड़े दिनों बाद मैं इस क्रम से ऊब गई क्योंकि दिनभर रंजू मुझे सोने नहीं देता था और रात को भी जगाता था. नींद पूरी न हो पाने से मैं चिड़चिड़ी हो गई और हार कर मैं ने सुबह देर से उठना शुरू कर दिया.

सारा दिन फिर उसी क्रम से सब काम देर से होते गए और शाम तक राकेश के लौटने तक मैं कामों में ही उलझ रहने लगी. स्वयं अपने पर ध्यान देने और सजने के लिए वक्त निकालने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था.

कभी राकेश किसी पत्रिका में त्वचा की देखभाल या हाथपैरों की सुरक्षा पर कोई लेख पढ़ कर मुझे पढ़ने को कहते तो पढ़ने पर मुझे लगता कि वे सब किताबी बातें हैं, क्योंकि ढेर से काम निबटाने के बाद जब रात होती तो सिर्फ जल्दी से बिस्तर में घुसना ही याद रहता. गरम पानी से हाथपैर साफ कर के उन पर क्रीम और लोशन मलने में आधा घंटा भी गुजारना मुझे व्यर्थ लगता. सुबह फिर उसी क्रम से व्यस्तता शुरू हो जाती. इस व्यस्तता ने मेरे हाथपैर और चेहरे को बेरौनक कर दिया था. पर मैं सोचती इस में मैं क्या कर सकती हूं. घर का सारा काम भी तो मुझे ही निबटाना है.

राकेश ने देर से घर आना शुरू कर दिया

था. पर रंजू की देखभाल और घर की व्यवस्था

में उलझ मैं राकेश के देर से आने को कभी महत्त्व नहीं दे पाई क्योंकि उन के जल्दी घर

आने का मतलब था कि मैं भी साथ तैयार हो कर कहीं घूमने निकलूं, जो मुझे खलने लगा था. बच्चों के साथ कहीं ये सब संभव है? अच्छी साड़ी की दुर्दशा से बचने के लिए मैं अकसर गाउन ही पहने रहती.

राकेश ने अब कहना छोड़ दिया था. मैं ने भी कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि राकेश घर क्यों देर से आते हैं.

रंजू 3 साल का हो गया था. काम कुछ कम होता, इस से पहले ही पिंकी पैदा हो गई और फिर मैं उसी क्रम से उल?ाती चली गई. घर, बच्चे और मैं. न जाने कब सुबह होती और कब रात. काम खत्म होने को ही नहीं आते थे. बच्चों के मोह में अटकी में सारा दिन उन के आगेपीछे घूम कर खानापीना या दूध दिया करती. नहीं  खाते तो हाथ से ग्रास बनाबना कर खिलाती.

रंजू अब स्कूल जाने लगा था. उसे पढ़ाने का काम और बढ़ गया था. राकेश सुबह दफ्तर जाते तो रात के 7-8 बजे ही घर लौटते और फिर खापी कर सो जाते.

नया पड़ाव: भाग 1- जब पत्नी को हुआ अपनी गलती का अहसास

उस दिन मेरा मन बहुत बुझाबुझा सा था. मेरी बेटी पिंकी 4 साल का मैडिकल कोर्स करने के लिए कजाकिस्तान चली गई थी. जातेजाते वह घर को बुरी तरह फैला गई थी. न जाने कहांकहां उस का सामान पड़ा रहता था. बड़ी मुश्किल से जुगाड़ लगा कर 8-10 लाख रुपए का लोन ले कर उसे भेजा था. महीनों वह इस तरह के कालेजों में एडमिशन की जानकारी लेती रही थी. मैरिट में उस को वह रैंक नहीं मिली थी कि इतने में भारतीय निजी कालेज में पढ़ाई कर सके.

8 दिन बाद मेरा बेटा रंजू भी जब अपनी नौकरी पर देहरादून चला गया तो मैं काफी अकेलापन महसूस करने लगी थी. पर फिर भी घर समेटने में मुझे 8 दिन और लग गए.

शादी के 2-3 दिन बाद राकेश ने भी दफ्तर जाना शुरू कर दिया था. उस दिन मुझे सुबह से लग रहा था कि अब कोई काम ही नहीं है.

अब तक अपने वैवाहिक जीवन में मैं हमेशा काम समेटने के चक्कर में, घर चलाने व सुव्यवस्थित रखने की हायतोबा में और बच्चे पालनेपोसने में ही जिंदगी जीती आई थी. शांति से बैठने, अपने बारे में सोचने का कभी वक्त ही नहीं मिला. हमारी शादी अरैंज्ड मैरिज थी पर बच्चे जल्दी हो गए और मैं बिहार के एक कसबे से दिल्ली आ गई. अपने शहर में कभी ब्यूटीपार्लर नहीं गई थी. शादी के टाइम पहली बार गई थी. पिंकी बहुत बार कहती कि ममा चलो. पर मुझे लगता था कि मैं ऐसे ही ठीक हूं.

जब भी किसी पत्रिका में हाथों की देखभाल, पांवों की सुरक्षा या त्वचा की देखभाल पर कोई लेख पढ़ती थी तो लगता था ये सब खाली वक्त के चोंचले हैं या फिर उन लोगों के लिए हैं जिन के घर में नौकरचाकर हैं अथवा उन के लिए हैं जो मौडलिंग करती हैं.

मगर अब जिंदगी के इस मोड़ पर पहुंच कर जब मैं दोनों बच्चों की शादियां निबटा चुकी थी फुरसत के क्षण जैसे मेरे आगेपीछे बिखर गए हैं. अब जब मैं ने अपने खुरदुरे हाथों और बिवाई पड़े पैरों पर निगाह डाली तो हैरानी हुई है कि इन पर कभी ध्यान क्यों नहीं गया?

मैं उठ कर शीशे के आगे जा खड़ी हो

गई. उफ क्या यह मैं ही हूं. बाल किस कदर कालेसफेद हो गए हैं. चेहरे की रौनक खत्म

हो गई है. झुर्रियां और आंखों के नीचे का कालापन मेरी लापरवाही का संकेत है या मैं सचमुच बूढ़ी हो गई हूं. दिमाग पर जोर दिया तो याद आया अगले दिन ही तो पूरे 39 वर्ष की हो जाऊंगी मैं. सोच कर उदासी की परत और गहरी हो गई.

अब न मैं बूढ़ी कही जा सकती थी और न ही जवान. बच्चे अपनेअपने ठिकानों पर जा चुके थे और राकेश अपने में ही मस्त थे. रह गई थी

तो सिर्फ मैं. अपनी जिंदगी के अकेलेपन का एहसास होते ही वीरानी और निराशा सी महसूस करने लगी.

अतीत को टटोला तो लगा अपनी नासमझ या फिर जिद्दीपन या दोनों ही की वजह से मैं अपने बच्चों की सिर्फ मां बन सकी हूं, एक अच्छी पत्नी नहीं. राकेश भी बिहार से दिल्ली आया था और उस के विवाह के पहले के बहुत से दोस्त थे. कई तो कई साल तक रूममेट भी थे. उन के साथ उसे अपनापन लगता था.

फिर सोचा, खैर जो हुआ सो हुआ अब अपना फुरसत का साथी अपने पति को ही बनाना होगा. बच्चों के पीछे तो सारी जिंदगी ही बिना दी मैं ने.

तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया. मैं ने विचारों की केंचुली से निकल कर दरवाजा खोला. देखा, मेरे पति राकेश दफ्तर से लौट आए हैं. मैं ने मुसकरा कर उन का स्वागत किया.

राकेश बोले, ‘‘ओह, आज यह सूरज कहां से उगा है? तुम और फुरसत से मुसकरा कर मेरा स्वागत करो? क्यों भई, तुम्हें तो इस वक्त रसोई में होना चाहिए था या मोबाइल पर भाभी या फिर मां से चुगली करने में व्यस्त.’’

राकेश का व्यंग्य मुझेअंदर तक कचोट गया. सारा उत्साह बटोर कर बोली, ‘‘अब दोनों बच्चे चले गए. आखिर कभी तो फुरसत होनी

ही चाहिए.’’

‘‘पर मुझे अब फुरसत नहीं है. मेरे फुरसत के क्षणों पर मेरे उन दोस्तों का अधिकार हो गया है, जो शादी से पहले साथ थे,’’ राकेश बोले. फिर कुछ उदास से हो कर आगे कहने लगे, ‘‘मैं ने कितना चाहा कि तुम मेरे साथ रहो. मेरी हमदम रहो शादी के पहले साल ही रंजू हो गया, पर तुम्हें तो बस बच्चों के आगे कभी कुछ सू?ा ही नहीं. मैं ने कहा भी था कि गर्भपात करा लो पर तुम्हारी दकियानूसी मां नहीं मानी. अब मैं मजबूर हूं. चाहो तो रोज की तरह रसोई से चाय बना कर पिंकी के हाथ भेज दो. मैं तब तक तैयार हो रहा हूं. आधे घंटे में हम सब अपने छड़े दोस्त के फ्लैट पर मिल रहे हैं.’’

राकेश मुझे आहत कर के दूसरे कमरे में चले गए. मैं हताश सी दूसरे कमरे से निकल कर रसोई में आ गई. राकेश यह भी भूल गए थे कि रोज उन्हें चाय पहुंचाने वाली पिंकी अब ससुराल जा चुकी है.

चाय बनातेबनाते मैं सोचती रही कि आज राकेश उस के जाने के बाद पहली बार दफ्तर

गए हैं, इसीलिए शायद रोज के क्रम को याद कर रहे हैं.

चाय बना कर मैं ने राकेश को दे दी. प्याला पकड़ते हुए वे बोले, ‘‘ओह, मैं तो भूल ही गया था पिंकी तो अब है ही नहीं.’’

मुझे ऐसा लगा जैसे मैं रो पड़ूंगी, पर रोई नहीं. जैसेतैसे चाय समाप्त हो गई. राकेश भी चुपचाप चाय पी कर मेरे हाथों में प्याला

पकड़ाते हुए बोले, ‘‘खैर, मैं चलता हूं, देर हो

रही है.’’

मैं ने निरीह सी हो कर उन के जाने के बाद दरवाजा बंद कर लिया.

मुझे राकेश पर बहुत गुस्सा आया. एक तो मैं इतना अकेलापन महसूस कर रही थी, उस पर व्यंग्यबाण चला कर मुझे और आहत कर गए. निढाल सी पड़ कर मैं अनायास रोने लगी कि

एक दिन दोस्तों के साथ महफिल न सजाते तो क्या हो जाता. यही सोचसोच कर मैं काफी देर तक रोती रही.

फिर मुझे लगा कि शायद ऐसी स्थिति पर पहुंचने के लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूं. आज कुछ नया तो नहीं घटा. फिर 17 वर्षों के बाद ही क्यों मुझे राकेश का इस तरह जाना खल रहा है.

ऐसा तो हर शाम होता था, पर मुझे कभी कुछ खास नहीं लगा या शायद बच्चों के झंझटों से निकल कर मैं ने कभी इस बात पर ज्यादा गौर ही नहीं किया. लगा कि अब शायद सचमुच मैं बहुत फुरसत में हूं. तभी तो 19 वर्ष पूर्व के अपने सुनहले रुपहले दिन याद आने लगे थे.

मैं 22 की थी, राकेश 28 के. राकेश से जिस वक्त मेरी शादी हुईर् थी उस वक्त मैं और

राकेश एकदूसरे में ही खोए रहते थे. राकेश के दफ्तर जाने तक मैं उन के आगेपीछे ही घूमती रहती थी. उन की हर जरूरत का ध्यान रखती. राकेश तब मुझे पा कर फूले न समाते थे. इतना खयाल तो कभी उन की मां ने भी नहीं किया था. ऐसा उन का कहना था. हम लोग एक बड़े कसबे से आए थे. अच्छी पढ़ाईलिखाई के बावजूद मुझे घर में रहना ही पसंद था. राकेश ने बहुत कहा कि कोई नौकरी कर लो पर मैं नहीं मानी कि बच्चों को कौन देखेगा.

शुरूशुरू में दिनभर मैं राकेश के इंतजार में उन की मनपसंद चीजें बनाती रहती. आने का वक्त होता तो सजधज कर उन का स्वागत करती और फिर हम चाय पी कर घूमने निकल जाते. छुट्टी वाले रोज कभी कहीं घूमते, कभी कहीं. कभी पिक्चर तो कभी पिकनिक.

पड़ोसी तब हमें ‘युगल कपोत’ कहा करते थे क्योंकि मैं शादी के 1 साल में ही गर्भवती हो गई. इच्छा पूरी होती तो मैं ने उस की एहतियात के लिए घूमनाफिरना काफी कम कर दिया. राकेश को घूमने और पिक्चर देखने का बेहद शौक था, पर मैं उन्हें, ‘‘थोड़े ही दिन की तो बात है,’’ कह कर उन प्रोग्रामों को टालने लगी.

फिर 9 महीने बाद रंजू जब मेरी गोद में आया तो मानो मुझे सबकुछ मिल गया. राकेश भी खुश थे. हम ने प्यार से उस का नाम रंजू रखा.

40 दिन के आराम के बाद राकेश ने

पिक्चर का प्रोग्राम बनाया तो मैं ने यह कह कर मना कर दिया, ‘‘वहां रंजू रोएगा. बीच में उस

के दूध का वक्त होगा. वहां कैसे पिलाऊंगी.

आप का बहुत मन हो तो किसी दोस्त के साथ चले जाओ.’’

राकेश उस दिन मन मार कर अकेले

पिक्चर देख आए थे. पर फिर यह एक दिन का क्रम नहीं रहा. मैं रंजू के मोह में धीरेधीरे फंसती चली गई और मेरे घूमनेफिरने पर एकदम पाबंदी सी लग गई.

जब कभी राकेश उत्साहित हो कर कहीं चलने का प्रोग्राम बनाते तो मु?ो लगता बच्चे के साथ बाहर निकलना बहुत मुश्किल है. सर्दी

होती तो कहती, ‘‘रंजू को सर्दी लग जाएगी, बाहर बहुत हवा है. गरमी होती तो उसे लू लग जाने का भय बताती और बरसात होने पर उस के भीग जाने का.’’

सुन कर राकेश कभीकभी चिढ़ जाते थे. कभीकभी राकेश अपनी कमीज के बटन टूटने

की ओर ध्यान दिलाते तो मैं मुसकरा कर

कहती, ‘‘वक्त ही नहीं मिला आप के लाडले से. सारा दिन नचाए रखता है. अच्छा आज जरूर लगा दूंगी.’’

अकसर मैं उन के बताए काम भूल जाती. उन के आगेपीछे घूमना तो

मैं ने छोड़ ही दिया था. इस तरह रंजू की देखभाल में मैं न जाने कब राकेश को खोती चली गई, इस का मुझे पता ही नहीं चला.

राकेश के साथ घूमने में जो मजा आता था, उस से ज्यादा मजा मुझे रंजू को गोद में ले कर निहारते रहने में आता.

दिनभर रंजू के साथ कब गुजर जाता, मुझे पता ही न चलता. यह भी याद न रहता कि राकेश के आने का वक्त हो गया है.

एक दिन की बात है. राकेश ने दफ्तर जाते वक्त मुझे से पैंटकमीज निकाल देने को कहा. उस वक्त रंजू अपने नैपकिन को गोली कर के रो रहा था. मैं बोली कि रंजू हो रहा है, तुम जरा अपनेआप निकाल लो, तब तक मैं इस का नैपकिन बदल देती हूं.

मैं गुनगुनाती हुई रंजू का काम करने लगी. राकेश ने अपनेआप कपड़े तो निकाल कर पहन लिए, परंतु नाश्ते के वक्त मुझ से बिलकुल नहीं बोले, ‘‘आप को तो खुश होना चाहिए कि मैं आप के ही खून की अपने हाथों से देखभाल करती हूं, किसी आया या नौकरानी पर नहीं छोड़ती. अब बच्चे के साथ काम तो बढ़ ही जाता है. ऐसे में उलटे आप को चाहिए कि मेरा हाथ बंटाओ, कभीकभार सब्जी कटवा दो, चाय बना दो या रंजू का कोई काम कर दो. अपने कपड़े तो अपनेआप निकालने ही चाहिए आप को. अब पहले की तरह मैं खाली तो हूं नहीं जो हर वक्त आप के आगेपीछे घूमती रहूं.’’

सुन कर राकेश मुझे घूरते रहे. फिर दफ्तर चले गए. मैं ने बाहर जा कर उन्हें विदा भी नहीं किया… रंजू ने उलटी कर दी थी. उसे ही साफ करने में लगी रही.

उस दिन रंजू ने कई बार उलटियां कीं. घबरा कर मैं उसे डाक्टर के पास ले गई. दवा पीने के बाद वह आराम से सो पाया.

मैं ने रंजू की उलटियों से खराब हुए कपड़े धोने शुरू ही किए थे कि राजेश दफ्तर से लौट आए. शाम के 5 बज गए थे. मुझे पता ही नहीं चला था.

उलझे बालों और भीगे गाउन से मैं ने दरवाजा खोला तो राकेश् को फिर गुस्सा आ गया. बगैर मुझ से बोले ही वे अंदर दाखिल हो गए.

रंजू तब तक जाग गया था. मैं राकेश से बोली, ‘‘राकेश रंजू को उठा लो. मैं तब तक कपड़े सूखने डाल कर आप के लिए चाय बना देती हूं.’’

सुन कर राकेश बोले, ‘‘सारा दिन दफ्तर

में काम करतेकरते थक कर घर आया हूं, अब क्या यहां की नौकरी बजाऊं? तुम चाय रहने दो. तुम्हें तो अब इतनी भी फुरसत नहीं कि अपने बाल संवारो, वक्त पर कपड़े धोओ और मेरे

लिए कुछ वक्त निकालो. मैं कहीं बाहर ही चाय पी लूंगा.’’

राकेश मेरी दिनभर की व्यस्तता का लेखाजोखा लिए बगैर बाहर चले गए. मेरा दिल रोने को हो आया. दरवाजा बंद कर के रोतेरोते रंजू को उठा कर मैं ने चुप कराया. उसे दूध गरम कर पिलाया, दवा दी. वह खेलने लगा तो मैं ने फटाफट कपड़े धो कर सूखने डाल दिए. शाम की चाय अकेले ही पी.

अब तक मैं सुबह से काम करतेकरते थक गईर् थी, परंतु रात का खाना अभी तैयार करना था. जल्दीजल्दी वह भी काम निबटाया और स्वयं तैयार हो कर राकेश का इंतजार करने लगी.

मेरा बौयफ्रैंड छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाता है, क्या मुझे उससे अपनी दोस्ती तोड़ लेनी चाहिए?

सवाल
मैं 18 वर्षीय अविवाहित युवती हूं. मेरा एक बौयफ्रैंड है. हम दोनों एकदूसरे को पसंद करते हैं. लेकिन उस के  साथ एक समस्या है कि वह छोटीछोटी बातों पर नाराज हो जाता है, जैसे अगर उस का फोन रिसीव नहीं किया, उस ने बाहर चलने को कहा लेकिन मैं नहीं जा पाई, उस की पसंद की ड्रैस नहीं पहनी आदि. मुझे उस का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगता. ऐसा लगता है वह मुझे अपने हिसाब से चलाना चाहता है. मैं उस के साथ खुश कम, परेशान ज्यादा रहती हूं. क्या मुझे उस से अपनी दोस्ती तोड़ लेनी चाहिए?

जवाब
आप का बौयफ्रैंड आप को इमोनशनल फूल बना रहा है और आप के साथ सिर्फटाइमपास कर रहा है. साथ ही, आप की बातों से लगता है कि वह आप पर हावी रहना चाहता है. जब आप खुद समझ रही हैं कि आप उस के साथ खुश कम और परेशान ज्यादा रहती हैं तो आप को यह भी समझ जाना चाहिए कि वह आप की दोस्ती के काबिल नहीं है. आप उस की बातों को महत्त्व न दें और अपना ध्यान उस से हटा लें और अपनी पढ़ाई पर ध्यान दें. ऐसे टाइमपास लड़के के साथ आप की दोस्ती ज्यादा समय तक नहीं निभेगी इसलिए अभी से ही दूरी बनाने में भलाई है.

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बेवफाई रास न आई

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के अहिरौली थानाक्षेत्र का एक गांव है शंभूपुर दमदियावन. इसी गांव में हरिदास यादव अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के 2 बेटे थे संतोष यादव और विनोद यादव. संतोष बड़ा था. अपनी मेहनत और लगन की बदौलत वह सन 2015 में उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही के पद पर भरती हो गया था. उस की पहली पोस्टिंग चंदौली जिले के चकिया थाने में हुई थी. नौकरी लग जाने पर घर वाले भी बहुत खुश थे. जब लड़का कमाने लगा तो घर वालों ने उस का रिश्ता भी तय कर दिया.

30 दिसंबर, 2017 को उस का बरच्छा था, इसलिए वह एक सप्ताह की छुट्टी ले कर अपने गांव आया था. बरच्छा का कार्यक्रम सकुशल संपन्न हो गया था. अगली सुबह 8 बजे के करीब संतोष अपने 2 दोस्तों राहुल यादव और सुरेंद्र के साथ टहलते हुए गांव से बाहर की ओर निकला. शादी को ले कर राहुल और सुरेंद्र दोनों ही संतोष से हंसीमजाक कर रहे थे, तभी संतोष के मोबाइल पर किसी का फोन आ गया.

संतोष ने अपने मोबाइल स्क्रीन पर नजर डाली तो वह नंबर उस के किसी परिचित का निकला. काल रिसीव कर के उस ने उस से बात करनी शुरू की. अपने दोनों दोस्तों से वहीं रुकने और थोड़ी देर में लौट कर आने की बात कह कर वह वहां से चला गया. संतोष के इंतजार में राहुल और सुरेंद्र वहां काफी देर तक खड़े रहे. जब 2 घंटे बाद भी वह नहीं लौटा तो दोनों दोस्त यह सोच कर घर लौट गए कि हो सकता है संतोष अपने घर चला गया हो.

संतोष के यहां मांगलिक कार्यक्रम था. घर में मेहमान आए हुए थे. दोस्तों ने सोचा कि हो सकता है वह उन के सेवासत्कार में लग गया हो और उसे लौटने का समय न मिला हो. संतोष को घर से निकले 3 घंटे बीत चुके थे. घर वाले उसे ले कर काफी परेशान थे कि सुबह का निकला संतोष आखिर कहां घूम रहा है. सब से ज्यादा परेशान उस के पिता हरिदास थे.

उन्होंने छोटे बेटे विनोद को संतोष का पता लगाने के लिए भेज दिया. विनोद को पता चला कि 3 घंटे पहले संतोष को राहुल और सुरेंद्र के साथ गांव से बाहर जाते देखा गया था. यह जानकारी मिलते ही विनोद राहुल और सुरेंद्र के घर पहुंच गया. दोनों ही अपनेअपने घरों पर मिल गए. विनोद ने उन से संतोष के बारे में पूछा तो वह यह सुन कर चौंक गए कि संतोष अब तक घर पहुंचा ही नहीं था. आखिर वह कहां चला गया.

राहुल ने विनोद को बताया कि वे तीनों साथ में गांव से बाहर निकले थे तभी संतोष के मोबाइल पर किसी का फोन आया था. वह कुछ देर में वापस आने की बात कह कर चला गया था. जब 2 घंटे बीत जाने के बाद भी वह नहीं लौटा तो वे दोनों यह सोच कर लौट आए कि शायद वह घर चला गया होगा.

संतोष को ले कर जितना ताज्जुब दोस्तों को हो रहा था, विनोद भी उतनी ही हैरत में डूबा हुआ था कि बिना किसी को कुछ बताए भाई आखिर गया कहां. इस से भी बड़ी बात यह थी कि उस का मोबाइल फोन भी स्विच्ड औफ था. संतोष का नंबर मिलातेमिलाते विनोद भी परेशान हो चुका था.

संतोष का जब कहीं पता नहीं चला तो विनोद घर लौट आया और पिता हरिदास को सब कुछ बता दिया. अचानक संतोष के लापता हो जाने की बात सुन कर हरिदास ही नहीं, बल्कि पूरा परिवार स्तब्ध रह गया.

संतोष की गांव भर में तलाश की गई, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. संतोष को तलाशते हुए पूरा घर और नातेरिश्तेदार परेशान हो गए. विनोद भी मोटरसाइकिल ले कर संतोष को खोजने गांव के बाहर निकल गया था. लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला.

दोपहर 2 बजे के करीब गांव के कुछ चरवाहे बच्चे गांव से करीब आधा किलोमीटर दूर अरहर के खेत के पास अपने पशु चरा रहे थे. भैंसें चरती हुई अरहर के खेत में घुस गईं तो चरवाहे खेत में गए. चरवाहे जैसे ही बीच खेत पहुंचे तो वहां दिल दहला देने वाला दृश्य देख कर उन के हाथपांव फूल गए.

अरहर के खेत के बीचोबीच संतोष यादव की खून से सनी लाश पड़ी थी. लाश देखते ही चरवाहे जानवरों को खेतों में छोड़ कर चीखते हुए उल्टे पांव गांव की ओर भागे. वे दौड़ते हुए सीधे हरिदास यादव के घर जा कर रुके और एक ही सांस में पूरी बात कह डाली.

बेटे की हत्या की बात पर एक बार तो हरिदास को भी विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने उन बच्चों से कहा, ‘‘बेटा, किसी और की लाश होगी. तुम ने ठीक से पहचाना नहीं होगा.’’

बच्चे पासपड़ोस के थे, इसलिए वे संतोष को अच्छी तरह जानतेपहचानते थे. बच्चों ने जब उन्हें फिर से बताया कि लाश किसी और की नहीं बल्कि संतोष चाचा की ही है तो हरिदास के घर में रोनापीटना शुरू हो गया.

हरिदास छोटे बेटे विनोद को ले कर अरहर के खेत में उस जगह पहुंच गए, जहां संतोष की लाश पड़ी होने की सूचना मिली थी. बेटे की रक्तरंजित लाश देख कर हरिदास गश खा कर वहीं गिर पड़े. कुछ ही देर में यह बात पूरे गांव में फैल गई तो वहां पूरा गांव उमड़ आया.

यह सूचना थाना अहरौला के थानाप्रभारी चंद्रभान यादव को दे दी गई थी. चूंकि हत्या एक पुलिसकर्मी की हुई थी, इसलिए आननफानन में थानाप्रभारी एसआई रमाशंकर यादव, कांस्टेबल महेंद्र कुमार, अखिलेश कुमार पांडेय, ओमप्रकाश यादव और महिला कांस्टेबल अनीता मिश्रा के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने इस की सूचना एसपी अजय कुमार साहनी और एसएसपी नरेंद्र प्रताप सिंह को भी दे दी.

सूचना मिलने के कुछ ही देर बाद दोनों पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. जिस जगह लाश पड़ी थी, वहां आसपास अरहर की फसल टूटी हुई थी. इस से लग रहा था कि मृतक ने हत्यारों से संघर्ष किया होगा.

संतोष की हत्या कुल्हाड़ी जैसे तेज धारदार हथियार से की गई थी. हथियार के वार से उस का जबड़ा भी कट कर अलग हो गया था. गले पर कई वार किए गए थे. इस के अलावा उसे 2 गोली भी मारी गई थीं. इस से साफ पता चलता था कि हत्यारे नहीं चाहते थे कि संतोष जिंदा बचे. इसलिए मरते दम तक उस पर वार पर वार किए गए थे.

मौकेमुआयने के दौरान पुलिस को वहां कारतूस का एक खाली खोखा भी मिला. संतोष के पास मोबाइल फोन था, जो उस के पास नहीं मिला. इस का मतलब था कि हत्यारे उस का मोबाइल अपने साथ ले गए थे. बहरहाल, पुलिस ने कागजी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दी.

पुलिस ने मृतक के पिता हरिदास यादव की तहरीर पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. थानाप्रभारी चंद्रभान यादव ने सब से पहले संतोष के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स खंगाली तो पता चला कि संतोष के सेलफोन पर 30 दिसंबर, 2017 की सुबह आखिरी काल आजमगढ़ के छितौना गांव की रहने वाली ज्योति यादव की आई थी. पुलिस ने ज्योति को पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. ज्योति से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि वह मृतक संतोष यादव की प्रेमिका थी.

पुलिस ने जब ज्योति से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने संतोष की हत्या की पूरी कहानी बता दी. उस ने कहा कि संतोष को उस ने ही फोन कर के गांव से बाहर अरहर के खेत में मिलने के लिए बुलाया था. वहां पहले से छिपे बैठे उस के घर वालों ने उसे मौत के घाट उतार दिया. पुलिस ने वारदात में शामिल अन्य आरोपियों की तलाश में दबिश दी तो वे सभी अपने घरों से गायब मिले.

पुलिस ने सिपाही संतोष यादव हत्याकांड का खुलासा 60 घंटों में कर दिया था. ज्योति से विस्तार से पूछताछ की गई तो उस ने अपने प्रेमी की हत्या की जो कहानी बताई, वह रोमांचित कर देने वाली थी—

22 वर्षीया ज्योति उर्फ रजनी मूलरूप से आजमगढ़ के अहरौला थाने के छितौना गांव के रहने वाले रामकिशोर यादव की बेटी थी. 3-4 भाईबहनों में वह दूसरे नंबर की थी. रामकिशोर यादव की खेती की जमीन थी, उसी से वह अपने 6 सदस्यों के परिवार की आजीविका चलाते थे. सांवले रंग और सामान्य कदकाठी वाली ज्योति बिंदास स्वभाव की थी. वह एक बार किसी काम को करने की ठान लेती तो उसे पूरा कर के ही मानती थी.

ज्योति ने 12वीं तक पढ़ाई के बाद आगे की पढ़ाई नहीं की. आगे की पढ़ाई में उस का मन नहीं लग रहा था. हालांकि मांबाप ने उसे आगे पढ़ाने की कोशिश की, लेकिन उन की कोशिश बेकार गई थी.

ज्योति जिस स्कूल में पढ़ने जाया करती थी, उस स्कूल का रास्ता शंभूपुर दमदियावन गांव हो कर जाया करता था. ज्योति सहेलियों के साथ इसी रास्ते से हो कर आतीजाती थी. इसी गांव का रहने वाला संतोष कुमार यादव ज्योति के स्कूल आनेजाने वाले रास्ते में खड़ा हो जाता और उसे बड़े गौर से देखता था. ज्योति भले ही सांवली थी, लेकिन उस में गजब का आकर्षण था. यही आकर्षण संतोष को उस की ओर खींच रहा था.

संतोष ने ज्योति के बारे में जानकारी हासिल की तो पता चला कि वह पड़ोस के गांव छितौना के रहने वाले रामकिशोर यादव की बेटी है और उस का नाम ज्योति है. ज्योति के बारे में सब कुछ पता लगाने के बाद संतोष उस के पीछे पागल दीवानों की तरह घूमने लगा.

ज्योति के घर से स्कूल जाते समय और स्कूल से लौटते समय वह गांव के बाहर खड़ा हो कर उस का इंतजार करता था. ज्योति ने संतोष की प्रेमिल नजरों को पढ़ लिया था. वह जान चुकी थी कि संतोष उस से बेपनाह मोहब्बत करता है. इस के बाद ज्योति के दिल में भी संतोष के प्रति चाहत पैदा हो गई.

ज्योति और संतोष दोनों एकदूसरे को चाहने जरूर लगे थे, लेकिन अपनी मोहब्बत का इजहार नहीं कर पा रहे थे. एक दिन ज्योति घर से स्कूल के लिए अकेली निकली. संतोष पहले से ही गांव के बाहर एक सुनसान जगह पर खड़ा उस का इंतजार कर रहा था.

जब उस ने देखा कि ज्योति अकेली है तो उस ने पक्का मन बना लिया कि कुछ भी हो जाए, आज उस से अपने दिल की बात कह कर ही रहेगा. ज्योति उस के नजदीक पहुंची तो संतोष उस के सामने आ कर खड़ा हो गया.

ज्योति के दिल की धड़कनें भी तेज हो गईं. जब वह रिलैक्स हुई तो संतोष बोला, ‘‘ज्योति, मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं.’’

ज्योति कुछ बोले बिना साइड से निकल कर आगे बढ़ गई.

‘‘रुक जाओ ज्योति, एक बार मेरी बात सुन लो, फिर चली जाना.’’ वह बोला.

‘‘जल्दी बताओ, क्या कहना चाहते हो. किसी ने देख लिया तो जान पर बन आएगी.’’ ज्योति घबराई हुई थी.

‘‘नहीं, मैं तुम्हारी जान पर आफत नहीं आने दूंगा.’’ संतोष ने कहा.

‘‘क्या मतलब?’’ ज्योति चौंक कर बोली.

‘‘यही कि आज से इस जान पर मेरा अधिकार है.’’

‘‘होश में तो हो तुम, क्या बक रहे हो, कुछ पता भी है.’’ ज्योति ने हलके गुस्से में कहा.

‘‘मुझे पता है कि तुम पड़ोस के गांव छितौना के रामकिशोर यादव की बेटी हो,’’ संतोष कहता गया, ‘‘जानती हो, जिस दिन से मैं ने तुम्हें देखा है, अपनी सुधबुध खो बैठा हूं. न दिन में चैन मिलता है और रात को नींद आती है. बस तुम्हारा खूबसूरत चेहरा मेरी आंखों के सामने घूमता रहता है. मैं तुम से इतना प्यार करता हूं कि अब मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगा.’’

‘‘लेकिन मैं तो तुम से प्यार नहीं करती.’’ ज्योति ने तुरंत कहा.

‘‘ऐसा मत कहो ज्योति, वरना मैं सचमुच मर जाऊंगा.’’ संतोष गिड़गिड़ाया.

‘‘ठीक है तो मर जाओ, किस ने रोका है.’’ कहती हुई ज्योति होंठ दबा कर मुसकराती हुई स्कूल की ओर बढ़ गई. संतोष तब तक उसे निहारता रहा, जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई. ज्योति की तरफ से कोई सकारात्मक उत्तर न पा कर वह मायूस हो कर घर लौट आया.

ज्योति ने संतोष के मन की टोह लेने के लिए अपने मन की बात जाहिर नहीं की थी, जबकि वह संतोष से दिल की गहराई से प्रेम करने लगी थी. ज्योति का नहीं में उत्तर सुन कर संतोष को रात भर नींद नहीं आई, इसलिए अगले दिन वह फिर उसी जगह जा कर खड़ा हो गया था, जहां उस की ज्योति से मुलाकात हुई थी.

ज्योति नियत समय पर घर से निकली. उस दिन उस के साथ उस की कई सहेलियां भी थीं. जैसे ही ज्योति संतोष के करीब आई, उस ने चुपके से एक कागज गिरा दिया और आगे बढ़ गई. संतोष ने जल्दी से कागज उठा कर अपनी कमीज की जेब में रख लिया. फिर ज्योति को वह तब तक निहारता रहा, जब तक उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई.

इस के बाद वह जल्दी में जेब से कागज निकाल कर पढ़ने लगा. वह प्रेमपत्र था. ज्योति का प्रेमपत्र पढ़ने के बाद संतोष ऐसे उछला, जैसे उसे दुनिया का सब से बड़ा खजाना मिल गया हो. उस दिन के बाद से संतोष की हिम्मत और बढ़ गई. स्कूल की छुट्टी के बाद अकसर दोनों रास्ते में ही मिल जाया करते थे.

उन दिनों संतोष कोई काम नहीं करता था, लेकिन उस की ख्वाहिश थी कि उसे पुलिस विभाग में नौकरी मिल जाए. इसलिए वह तैयारी में जुट गया. साथ ही ज्योति के साथ उस की प्यार की उड़ान भी जारी रही. प्यार की बातें चाहे कोई कितनी भी छिपाने की कोशिश करें, छिपती नहीं हैं. लिहाजा इन दोनों के प्रेम के चर्चे दोनों के गांवों में होने लगे. उड़ती हुई यह खबर जब ज्योति के पिता रामकिशोर यादव तक पहुंची तो वह गुस्से से उबल पड़े. उन्होंने ज्योति का घर से बाहर निकलना बंद कर दिया.

इतना ही नहीं रामकिशोर ने शंभूपुर दमदियावन पहुंच कर संतोष के पिता हरिप्रसाद से शिकायत की. उन्होंने कहा, ‘‘आप अपने बेटे संतोष को संभाल लें. वह मेरी बेटी का स्कूल आतेजाते पीछा करता है. याद रखो, भविष्य में अगर उस ने मेरी बेटी से मिलने की कोशिश की तो इस का अंजाम बहुत बुरा होगा. ठीक से समझ लो, मैं अपनी मानमर्यादा और इज्जत से किसी को भी खिलवाड़ नहीं करने दूंगा.’’

हरिप्रसाद को बेटे की करतूतों के बारे में पता चला तो उन्हें बड़ा दुख हुआ. उन्होंने जब संतोष से यह बात पूछी तो उस ने सब सचसच बता दिया. हरिप्रसाद ने उसे समझाया कि पहले वह अपने भविष्य को देखे, नौकरी की तैयारी करे. समय आने पर वह किसी अच्छी लड़की से उस की शादी करा देंगे.

पिता ने संतोष को ठीक से समझाया तो उस पर उन की बातों का गहरा असर हुआ. लिहाजा वह अपने भविष्य की तैयारी में जुट गया. उस की मेहनत रंग लाई और उस की नौकरी उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाही के पद पर लग गई.

सन 2015 में उस की चंदौली जिले के चकिया थाने में पहली पोस्टिंग हुई. ये बात उस ने सब से पहले ज्योति को बताई. यहां यह बताना जरूरी है कि रामकिशोर ने भले ही संतोष के पिता को धमकी दी थी. लेकिन संतोष और ज्योति पर इस का कोई खास असर नहीं हुआ.

वे दोनों फोन के जरिए एकदूसरे के करीब बने रहे. संतोष ने ज्योति को विश्वास दिलाया कि कुछ भी हो जाए, लेकिन वह शादी उसी से करेगा. यह सुन कर ज्योति काफी खुश थी. उस ने मां के जरिए यह बात अपने पिता और परिवार वालों तक पहुंचा दी. उस की यह कोशिश रंग लाई और उस का परिवार संतोष से उस की शादी कराने के लिए राजी हो गया.

एक तो संतोष को सरकारी नौकरी मिल चुकी थी, दूसरे दोनों एक ही जातिबिरादरी के थे. जब पूरा परिवार एकमत हो गया तो रामकिशोर बेटी का रिश्ता ले कर हरिप्रसाद के पास गए और कहा कि पुरानी बातें भूल कर नए रिश्ते जोड़ते हैं.

हरिप्रसाद रामकिशोर की धमकी को भूले नहीं थे. दूसरे संतोष भी पिता के पक्ष में आ गया था, इसलिए हरिप्रसाद ने रिश्ते से इनकार कर दिया. उस ने पिता से कह दिया कि वह उसी लड़की से शादी करेगा, जिस से वह चाहेंगे. रामकिशोर शादी का प्रस्ताव ठुकराए जाने के बाद घर लौट गए.

संतोष 2 साल तक ज्योति का दैहिक शोषण करता रहा था, उसे धोखे में रखे रहा था. अंत में उस ने ज्योति से शादी करने से साफ मना कर दिया था. उस ने ज्योति से साफ कह दिया था कि घर वालों के दबाव में उसे कहीं और शादी करनी पड़ रही है. वह भी किसी अच्छे से लड़के से शादी कर ले.

यह बात ज्योति से बरदाश्त नहीं हुई. उस ने रोरो कर मां के सामने सारी सच्चाई खोल दी. यह बात जब रामकिशोर और उस के बेटे सर्वेश को पता चली तो गुस्से के मारे उन के तनबदन में आग सी लग गई. दोनों ने फैसला किया कि जिस ने ज्योति की जिंदगी बरबाद की है, उसे किसी और लड़की से शादी नहीं करने देंगे. उस ने जो गुनाह किया है, उसे उस की सजा जरूर मिलनी चाहिए.

इस बीच सर्वेश को सूचना मिल गई थी कि 29 दिसंबर, 2017 को संतोष का बरच्छा होने वाला है. इस कार्यक्रम में वह गांव आएगा. संतोष 28 दिसंबर को एक सप्ताह की छुट्टी ले कर घर आया.

तय कार्यक्रम के मुताबिक 29 दिसंबर की शाम को संतोष का बरच्छा का कार्यक्रम संपन्न हुआ. वह बहुत खुश था. 30 दिसंबर की सुबह संतोष दोस्तों के साथ गांव के बाहर निकला, तभी उस के फोन पर ज्योति का फोन आ गया. उस ने संतोष को फोन कर के छितौना गांव के अरहर के एक खेत में मिलने को बुलाया. वहां पहले से ही ज्योति के अलावा उस के पिता रामकिशोर, भाई सर्वेश के साथ गांव के मनोज यादव, संजय यादव और आनंद मौजूद थे.

संतोष के पहुंचते ही रामकिशोर यादव, संजय यादव और आनंद ने संतोष को दबोच लिया. ज्योति को उन लोगों ने वहां से हटा दिया. गुस्से में सर्वेश ने कुल्हाड़ी से संतोष के चेहरे और गरदन पर वार कर के उसे मौत के घाट उतार दिया. संतोष की हत्या करने के बाद वहां से भागते समय सर्वेश ने कुल्हाड़ी एक झाड़ी में छिपा दी. सर्वेश संतोष का फोन भी अपने साथ ले गया. रास्ते में उस ने फोन से सिम निकाल कर कहीं फेंक दी.

ज्योति के गिरफ्तार होने के 15 दिनों के भीतर गांव से एकएक कर के सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया. सभी आरोपियों ने अपनेअपने जुर्म कबूल कर लिए थे. सर्वेश की निशानदेही पर पुलिस ने झाड़ी से कुल्हाड़ी भी बरामद कर ली. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हुई थी. पुलिस ने अदालत में सभी आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर दिया था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Monsoon Special: इन 8 टिप्स से बारिश के सीजन में भी खूबसरत रहेंगे बाल

बरसात के मौसम में बालों का ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है वरना वे झड़ने भी शुरू हो जाते हैं. आइए जानें कि बरसात में बालों की देखभाल कैसे की जाए:

1 पौष्टिक आहार लें

बालों का बढ़ना अमूमन आप की डाइट पर  निर्भर करता है. बालों की सही ग्रोथ के लिए हमेशा प्रोटीन, कैल्सियम और मिनरल्स युक्त आहार लें. इन के अलावा अपने आहार में फल और सलाद खासकर चुकंदर और जड़ वाली सब्जियों का ज्यादा सेवन करें.

2 बालों को कवर करें

बरसात में बालों को भीगने न दें, क्योंकि बरसात के प्रदूषित पानी की वजह से उन की जड़ें कमजोर हो जाती हैं और वे झड़ने लगते हैं. अत: बरसात के गंदे पानी और नम हवा से बालों की रक्षा करने के लिए उन्हें किसी कपड़े अथवा स्कार्फ से ढक कर रखें. गोल हैट का इस्तेमाल भी कर सकती हैं ताकि बाल सुरक्षित रहें.

3 शौर्ट और ट्रैंडी हेयर कट

बरसात के मौसम में शौर्ट हेयर कट ही रखें. फंकी हेयर कट का बरसात में काफी चलन होता है, क्योंकि इसे संभालना आसान होता है. फिर इस पर होने वाला खर्च भी बजट में होता है. इसलिए शौर्ट और ट्रैंडी हेयर कट को ही ज्यादा पसंद करें. घुंघराले और सीधे बालों में भी ये दोनों ही स्टाइल खूब फबते हैं.

4 बालों को धोना

बरसात में बालों को ज्यादा बार धोएं. बरसात में 1 दिन के अंतराल में बाल धोने से पसीने और चिकनाहट से उन का बचाव होता है. बालों को धोने से पहले उन में कुनकुना नारियल तेल लगाएं. फिर शैंपू से धोने के बाद अच्छी तरह कंडीशनर लगाएं. ऐसा करने से बालों की जड़ें मजबूत होती हैं और बाल नर्ममुलायम बनते हैं.

5 हेयर प्रोडक्ट्स का उचित इस्तेमाल

बालों को धोने के लिए वही शैंपू चुनें जो बालों को सूट करता हो. झूठे विज्ञापनों के झांसे में आ कर कोई भी शैंपू न अपनाएं. फिर बालों को कंघी से अच्छी तरह सैट करें. गीले बालों में कंघी न करें वरना उन के टूटने की संभावना रहती है. गीले बालों को बांधें नहीं. सूखने पर ही बांधें.

6 हेयर स्पा

कुनकुने नारियल तेल से बालों की मसाज करें. इस से रक्तसंचार बढ़ता है और बालों में चमक आती है.

7 स्टाइलिंग प्रोडक्ट्स से बचें

बालों पर जैल या सीरम जैसे स्टाइलिंग प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल से बचें.

8 बालों को रखें नैचुरल

बरसात में बालों की पर्मिंग, स्ट्रेटनिंग और कलर करना टालें, क्योंकि इस मौसम में बालों के भीगने की वजह से उन में स्टाइल्स का कोई खास असर दिखाई नहीं पड़ता उलटा नुकसान होता है. बाल कमजोर होने लगते हैं.

किसी से नहीं कहना: भाग 5- उर्वशी के साथ उसके टीचर ने क्या किया?

बैल बजते ही उर्वशी ने दरवाजा खोला और सामने महेश को देख कर ठंडी सांस ली. महेश उस के कंधे पर सिर रख कर रोने लगा.

उर्वशी ने उसे सांत्वना देते हुए पूछा, ‘‘महेश फोन क्यों नहीं उठाया तुम ने? मैं ने तुम्हें कितने फोन किए?’’

‘‘उर्मी मैं बाइक पर था, जब मुझे इस ऐक्सीडैंट का समाचार मिला, यह सुनते ही मेरे हाथ से मोबाइल गिर गया और पीछे से आ रही कार का पहिया उस के ऊपर से निकल गया. मैं होश में नहीं था, घर जा कर मैं ने कार ली और सीधे जबलपुर चला गया. मैं ने अपने मातापिता को खो दिया उर्मी, मैं बहुत अकेला महसूस कर रहा हूं. तुम जल्दीसेजल्दी मेरे जीवन में पूरी तरह से आ जाओ.’’

‘‘हां महेश, यह हमारे लिए बहुत ही दुखभरा समय है. कुछ दिनों बाद पापा के पास जा कर हम फिर से बात करेंगे.’’

‘‘उर्मी मैं चाहता हूं कि पापा के पास पहुंचने से पहले ही पूरी जायदाद तुम्हारे नाम कर दूं.’’

उर्वशी ने मन ही मन खुश होते हुए ऊपरी मन से कहा, ‘‘नहीं महेश उस की जरूरत नहीं है.’’

‘‘उर्मी मैं ने पापा से वादा किया है और उसे पूरा तो करना ही है.’’

1 सप्ताह के अंदर महेश ने अपनी पूरी जायदाद उर्वशी के नाम कर दी.

यह देख कर उर्वशी ने पूछा, ‘‘महेश, तुम इतना प्यार करते हो मुझ से?’’

‘‘हां उर्मी मैं ने तुम्हारा प्यार पाने के लिए, अपनी पत्नी को भी हमेशाहमेशा के लिए छोड़ दिया है. अब हमारे बीच कोई नहीं आ सकता.’’

महेश से यह सब सुन कर उर्वशी को सुकून का ऐसा एहसास हुआ, जिस की चाहत वर्षों से उस के दिल में हलचल मचाए हुए थी.

जायदाद के कागज साथ में ले कर उर्वशी और महेश भोपाल पहुंच गए. उर्वशी के मातापिता ने महेश का बहुत स्वागत किया और उसे सांत्वना दी.

महेश ने कहा, ‘‘पापा, मैं ने अपनी पूरी जायदाद उर्मी के नाम कर दी है.’’

अपनी बेटी की योजना को सफल करने के लिए विवेक ने उन दोनों की शादी की तारीख 20 दिन बाद की तय कर दी.

उर्वशी ने मनहीमन कुदरत से कहा कि यह केवल मेरा बदला मात्र है जो एक नारी को अपने स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए मजबूर कर रहा था. मेरी लुटी हुई इज्जत तो मुझे वापस नहीं मिल सकती, किंतु इस पापी को उस पाप की सजा जरूर मिलनी चाहिए, जो इस ने 10 वर्ष की छोटी सी नासमझ बच्ची पर किया था.’’

शादी की तारीख तय होते ही महेश और उर्वशी वापस देवास पहुंच गए.

विवाह के 1 सप्ताहपूर्व उर्वशी ने महेन्श के घर जा कर कहा, ‘‘महेश, मैं तुम से शादी नहीं करना चाहती.’’

‘‘यह क्या कह रही हो उर्मी? अब तो हमारी शादी के लिए सभी तैयार हैं?’’

‘‘शादी? कैसी शादी, तुम ने कभी अपने जीवन के भूतकाल को याद किया है महेश? एक 10 वर्ष की नन्ही बच्ची के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए, कभी सोचा था?’’

‘‘यह क्या कह रही हो तुम? कौन 10 साल की बच्ची?’’

‘‘महेश क्या तुम उस का नाम भूल गए? वही उर्वशी जिसे इंटर स्कूल कंपीटिशन के बहाने उस के मातापिता के विश्वास को तोड़ कर, उस के साथ तुम ने बलात्कार किया था. उस नन्ही बच्ची के जीवन को ऐसी जगह घसीट कर ले आए थे, जहां से वह आज तक बाहर नहीं निकल पाई.

‘‘मैं वही उर्वशी हूं महेश और मैं तुम से प्यार नहीं, बेइंतहा नफरत करती हूं. तुम्हें उस तड़पती हुई, कमजोर बच्ची पर जरा सी भी दया नहीं आई थी. उस का भविष्य कैसा होगा, तुम ने नहीं सोचा, वह रो रही थी और तुम अपनी मनमानी कर रहे थे. किसी से नहीं कहना यही सिखा रहे थे न मुझे. तुम्हें अब कोई नहीं मिलेगा महेश, न मैं और न ही तुम्हारी पत्नी.

‘‘तुम तो अपनी पत्नी के साथ भी वफा नहीं कर पाए. तुम्हारी गलतियों का प्रायश्चित्त तो हो ही नहीं सकता. यह सजा भी तुम्हारे लिए बहुत कम है बाकी सजा तो शायद तुम्हें कुदरत ही दे पाएगी.

‘‘अपनी पत्नी को वापस बुलाने की कोशिश भी मत करना, क्योंकि 10 वर्ष की बच्ची का बलात्कार करने वाले के साथ वह कभी नहीं रहेगी.’’

उर्वशी के मुंह से यह बात सुन कर महेश सकपका गया. काटो तो खून नहीं  उस की ऐसी हालत हो रही थी.

उस के घराए हुए चेहरे को देख कर उर्वशी ने कहा, ‘‘हां महेश मेरे इस षड्यंत्र में मेरे पापामम्मी के अलावा तुम्हारी पत्नी पूजा भी शामिल थी. मैं ने बहुत पहले ही उसे सबकुछ बता दिया था. तुम्हें यह बात पता नहीं चले, इसलिए उस ने वही किया जो मैं ने उसे करने को कहा. अब यह घर मेरा है महेश, तुम यहां से चले जाओ और अपनी शकल मुझे कभी मत दिखाना.’’

उस मकान, उस दौलत से उर्वशी को कोई मतलब नहीं था. वह तो केवल उस के बदले की जीत थी. उस मकान को उर्वशी ने अनाथाश्रम को दे दिया. महेश की पत्नी से मिल कर उसे धन्यवाद कहा और वापस अपने मम्मीपापा के पास चली गई. फिर उर्वशी ने अपनी जिंदगी की एक नई शुरुआत करी. न कोर्ट, न कचहरी, यह थी स्वाभिमान की लड़ाई जो उर्वशी ने जीत कर दिखाई.

Monsoon Special: मौनसून में इन 9 टिप्स से दिखें स्टाइलिश

मानसून के दौरान ऑफिस में पेशेवर और सहज दिखना थोड़ा कठिन हो जाता है. पर विशेषज्ञ की इन सलाह को मानकर आप मानसून में भी स्टाइलिश नजर आ सकती हैं. मानसून को देखते हुए कुछ ऐसे ही उपयोगी टिप्स :

1. चटक रंगों का प्रयोग:

मानसून के दौरान रहने वाले अनमने से मौसम को नीले, लाल और संतरी रंग के परिधानों के जरिए मात दी जा सकती है. इस मौसम में सफेद कपड़े न पहनें. बारिश में भीगने पर उनमें से आरपार नजर आता है और उन पर दाग भी आसानी से लगते हैं.

2. पतलून और स्कर्ट:

लंबी पतलून न पहनें क्योंकि वे जल्दी गंदी होती हैं. आप चाहें तो अपनी सुविधा और माहौल अनुसार, उन्हें नीचे से मोड़ सकती हैं. इस मौसम के हिसाब से स्मार्ट फॉर्मल स्कर्ट बढ़िया हैं.

3. कोट और जैकेट:

आप पश्चिमी परिधानों को बरसाती कोट या जैकेट के साथ पहन सकती हैं.

4. भारतीय परिधान:

अगर आप मानसून के दौरान पारंपरिक भारतीय परिधान को प्राथमिकता देती हैं तो सलवार और पटियाला की बजाय शॉर्ट कुर्ती के साथ लैगिंग या चूड़ीदार आजमाएं. इस मौसम में बड़े-बड़े दुपट्टों की जगह स्कार्फ या स्टॉल डालें. बारिश में ऐसे प्रिंट और रंगों वाले कपड़े कतई न पहनें, जो भीगने पर रंग छोड़ें.

5. जूते-चप्पल:

इस मौसम में चमड़े के जूते या सैंडिल न पहनें क्योंकि ये जल्दी गीले होते हैं और सूखने में बहुत वक्त लेते हैं. जेली शूज, बिना हील वाली चप्पल-जूते और अन्य मजबूत, बिना फिसलने वाले फुटवियर पहनें.

6. मेकअप:

वाटरप्रूफ काजल और आई-लाइनर लगाएं. बारिश के मौसम में फाउंडेशन का प्रयोग न करें और अगर लगाना ज्यादा ही जरूरी है, तो हल्का लगाएं.

7. बाल:

मानसून में वातावरण में मौजूद नमी आपके बालों को उलझा सकती है. बालों का जूड़ा या चोटी बनाना बेहतर होगा.

8. डेनिम:

मानसून में डेनिम को भूल जाएं. इन्हें सूखने में बहुत वक्त लगता है.

9. छाता:

कपड़ों से मेल खाता छाता चुनें.

Monsoon Special: इन 4 चीजों का खाना मतलब बरसात में बीमारियों को दावत

बरसात केवल गर्मी से राहत लेकर नहीं आता बल्कि ढेर सारी बीमारियां भी लेकर आता है. ऐसे में आपको इस मौसम में सतर्क रहने की जरूरत होती है. साफ-सफाई के अलावा अपने खान-पान पर भी ध्यान देने की जरूरत है.बरसात के मौसम में हवा में काफी नमी रहती है. ऐसे में रोगजनक कीटाणुओं से बीमार होने का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे मौसम में कुछ ऐसे फूड्स हैं जिनसे परहेज करना चाहिए. आइए, जानते हैं कि वे फूड्स कौन-कौन से हैं.

1. हरी पत्तेदार सब्जियां

सेहतमंद रहने के लिए अक्सर हरी पत्तेदार सब्जियों के सेवन की सलाह दी जाती है. लेकिन मानसून में आपको इनसे परहेज करना चाहिए. दरअसल, ऐसी सब्जियों की पत्तियों पर कीट चिपके होते हैं. जो सेहत के लिए सही नहीं होते. ऐसे में बरसात के मौसम में पत्तागोभी, पालक, फूलगोभी से परहेज करना ही बेहतर होता है.

2. फलों के जूस

बरसात के नम वातावरण में रखी हर चीज को खाने से परहेज करना चाहिए. इसमें सड़कों के किनारे मिलने वाले फल और फलों के जूस भी शामिल हैं. फलों के जूस पीना यूं तो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है. लेकिन बरसात के मौसम में खुले नम वातावरण में रखे जूस जर्म्स से भरपूर होते हैं. ऐसे में बेहतर यही है कि आप घर पर फलों का जूस निकालकर पिएं.

3. सी-फूड्स

मानसून मछली और झींगा आदि का प्रजननकाल होता है. ऐसे में इस दौरान इनसे परहेज करना बेहतर होता है. इसके बदले बरसात में आप चिकन, मटन या अन्य नॉन-वेजिटेरियन विकल्पों पर विचार कर सकते हैं. अगर आपको फिर भी सी-फूड्स खाने का मन है तो इस बात का ख्याल रखें कि वह एकदम ताजा हो और अच्छी तरह से पका हो.

4. तली-भुनी चीजें

मानसून के मौसम में हमारी पाचन शक्ति काफी कमजोर हो जाती है. ऐसे में तली-भुनी चीजें खाने से गैस संबंधी विकार या पेट की समस्या होने की संभावना होती है. इसके अलावा ज्यादा नमक वाली चीजें खाने से शरीर में पानी की कमी का भी खतरा होता है.

किसी से नहीं कहना: भाग 4- उर्वशी के साथ उसके टीचर ने क्या किया?

डिनर के बाद महेश ने उर्मी को उस के घर छोड़ दिया. बिस्तर पर लेट कर उर्वशी अपनी योजना को सफल होता देख खुश हो रही थी, किंतु आगे अब क्या और कैसे करना है, यह उस के समक्ष चुनौतीभरा कठिन प्रश्न था.

दूसरे दिन उर्वशी ने महेश को फोन कर के कहा, ‘‘हैलो महेश मैं 1 सप्ताह के लिए अपने घर जा रही हूं…’’

महेश ने बीच में ही उसे टोकते हुए कहा, ‘‘उर्मी, 1 सप्ताह, मैं कैसे रहूंगा तुम्हारे बिना?’’

‘‘महेश हमेशा साथ रहना है तो यह जुदाई तो सहन करनी ही होगी. मैं हमारी शादी की बात करने जा रही हूं, आखिर मुझे भी तो जल्दी है न.’’

उर्वशी के मुंह से यह बात सुन कर महेश खुश हो गया. उर्वशी अपने घर चली गई, महेश से यह कह कर कि उसे फोन नहीं करना.

1 सप्ताह का कह कर गई उर्वशी 15 दिनों तक भी वापस नहीं आई.

इधर महेश की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उर्वशी यही तो चाहती थी, अभी तक

सबकुछ उस की योजना के मुताबिक ही हो रहा था. 15 दिनों बाद उर्वशी वापस आई और उस ने महेश को फोन लगा कर बोला, ‘‘महेश एक बहुत ही दुखद समाचार ले कर आई हूं, शाम को डिनर पर मिलो तो तुम्हें सब विस्तार से बताऊंगी.’’

शाम को डिनर पर उर्वशी को उदास देख कर महेश ने पूछा, ‘‘क्या हुआ उर्मी? घर पर मना तो नहीं कर दिया न?’’

बहुत ही उदास मन से उर्वशी ने उसे बताया, ‘‘महेश मेरे पापा ने मेरी शादी तय कर दी है.’’

‘‘यह क्या कह रही हो उर्मी? तुम से बिना पूछे वे ऐसा कैसे कर सकते हैं?’’

‘‘मुझे नहीं पता था महेश कि मेरे महल्ले में रहने वाला राकेश बचपन से मुझे प्यार करता है. मैं ने तो कभी उस के साथ बात भी नहीं करी. एक दिन उस ने मेरे पापा से मिल कर कहा मैं आप की बेटी से बहुत प्यार करता हूं और उस से शादी करना चाहता हूं. मैं उस के लिए कुछ भी कर सकता हूं.

‘‘मेरे पापा ने यों ही उस से पूछ लिया कि क्या कर सकते हो तुम उस के लिए?

‘‘राकेश ने कुछ देर सोच कर कहा कि मैं शादी से पहले ही अपना बंगला, सारी दौलत आप की बेटी के नाम कर सकता हूं.

‘‘मेरे पापा चौंक गए और उन्होंने कहा कि यह क्या कह रहे हो? कथनी और करनी में बहुत फर्क है.

‘‘तब महेश उस ने सच में अपना बंगला मेरे नाम पर लिख दिया हालांकि मेरे पापा ने उसे मना भी किया. पापा के मुंह से यह सब सुनने के बाद मैं कुछ कह ही नहीं पाई, क्योंकि मेरे मम्मीपापा दोनों बहुत ही खुश थे.

‘‘मुझे समझते हुए उन्होंने कहा कि उर्मी जो लड़का तुम्हें इतना प्यार करता है, सोचो तुम्हें कितना खुश रखेगा. मैं कुछ नहीं कह पाई महेश.

महेश ने बौखला कर कहा, ‘‘इस में कौन सी बड़ी बात है उर्मी, मैं भी अपनी पूरी दौलत तुम्हारे नाम कर सकता हूं.

प्यार के आगे दौलत की औकात ही क्या और फिर तुम भी तो मेरी ही रहोगी न.’’

अपनी योजना को सफल होता देख उर्वशी ने खुश हो कर कहा, ‘‘मैं जानती हूं महेश, लेकिन राकेश ने तो अपनी सारी दौलत मेरे नाम कर दी है, उसे कैसे मना करें?’’

‘‘उर्वशी तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हारे पापा से मिल कर उन्हें समझऊंगा और जो कुछ भी राकेश ने दिया है उसे वापस कर देंगे.’’

इस तरह बातें करते हुए दोनों ने डिनर पूरा किया और फिर महेश ने उर्वशी को घर छोड़ दिया. महेश की पत्नी पूजा को उस के अफेयर के बारे में पता था. इसीलिए उन के घर में रोज झगड़ा होता रहता था.

महेश जैसे ही अपने घर पहुंचा पूजा ने गुस्से में पूछा, ‘‘इतनी देर कहां थे महेश? कोई फोन नहीं, कोई खबर नहीं, आखिर ऐसा क्यों कर रहे हो? तुम्हें क्या लगता है, मुझे कुछ पता नहीं, धोखा देना और गलतियां करना तो तुम्हारी आदत ही है.’’

पूजा बहुत ही स्वाभिमानी लड़की थी. उस ने महेश की इस हरकत के लिए उसे धिक्कारते हुए कहा, ‘‘महेश तुम एकसाथ 2 लड़कियों को धोखा दे रहे हो. कौन है उस से मुझे कोई मतलब नहीं, मुझे मतलब है तुम से और यह धोखा तुम मुझे दे रहे हो. मैं तुम्हारे जैसे घटिया धोखेबाज इंसान के साथ नहीं रह सकती. मैं उन लड़कियों में से नहीं हूं, जो पति को परमेश्वर मान कर इस तरह के अत्याचार घूंघट में रह कर ही सहन कर लेती हैं. यदि तुम्हें मुझ से नहीं किसी और से प्यार है तो मैं तुम्हें आजाद करती हूं. इतने सालों में शायद मेरा प्यार तुम्हें कम पड़ गया. अच्छा ही हुआ हमें अभी तक कोई संतान नहीं हुई वरना शायद मेरे पैरों में बेडि़यां पड़ जातीं.’’

महेश पूजा की बातों का कोई जवाब नहीं दे पाया. उस पर तो अभी केवल उर्मी के प्यार का नशा चढ़ा हुआ था. उर्वशी के मन में चल रहे षड्यंत्र से अनजान महेश उसी के साथ उस के मातापिता के पास गया. वहां पहुंच कर महेश ने उर्मी के पिता के समक्ष अपने प्यार का इजहार किया और शादी का प्रस्ताव रखा.

किंतु उर्वशी के पिता विवेक ने उसे टोकते हुए कहा, ‘‘यह संभव नहीं है, मैं ने उर्मी का रिश्ता तय कर दिया है, वह लड़का राकेश उसे बहुत प्यार करता है. मेरे मना करने के बाद भी उस ने अपनी सारी दौलत इस के नाम कर दी है, मैं उसे कैसे मना कर सकता हूं महेश? ’’

‘‘लेकिन उर्मी तो मुझ से प्यार करती है न अंकल, राकेश से नहीं. यह तो उर्मी के साथ भी अन्याय ही होगा. यदि आप अपनी बेटी को खुश देखना चाहते हैं तो आप वह रिश्ता तोड़ दीजिए, मैं उर्मी से बहुत प्यार करता हूं और उस के बिना जी नहीं पाऊंगा. मैं भी अपनी पूरी दौलत उर्मी के नाम लिखने को तैयार हूं.’’

विवेक अब कुछ नहीं कह पाए और उन्होंने हां कह दी, क्योंकि इस षड्यंत्र में वे शुरू से ही उर्वशी के साथ थे.

महेश बहुत ही जोश में था, वह तुरंत ही वहां से जाने लगा और जातेजाते उस ने उर्मी से कहा, ‘‘उर्मी आई लव यू, तुम्हारे लिए मैं कुछ

भी कर सकता हूं कुछ भी. मैं कल ही अपने वकील को साथ ले कर वापस आऊंगा और अपनी पूरी जायदाद तुम्हारे नाम कर दूंगा. फिर हमें विवाह के बंधन में बंधनेसे कोई भी रोक नहीं पाएगा.’’

1 दिन की कह कर गया महेश 3 दिन तक वापस नहीं आया और न ही उस का कोई फोन आया. इधर उर्वशी और उस के मातापिता बेचैन होने लगे, उन्हें लगने लगा कि महेश कहीं कुछ समझ तो नहीं गया.

उर्वशी बारबार उसे फोन कर रही थी, किंतु उस का फोन स्विच औफ ही आ रहा था. देखतेदेखते पूरा सप्ताह बीत गया, किंतु महेश नहीं आया तब उर्वशी घबरा कर वापस देवास आ गई और महेश से मिलने उस के शोरूम पहुंच गई.

सेल्समैन ने उसे देखते ही कहा, ‘‘उर्मी मैडम महेश सर के मातापिता  की कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई है. यह समाचार मिलते ही वह जबलपुर चले गए और उन का मोबाइल भी बंद आ रहा है.’’

इतना सुन कर उर्वशी ने खेद व्यक्त किया और अपने घर चली गई. उस के मन में यह संतोष था कि जैसा वह सोच रही थी वैसा कुछ नहीं है. महेश को कुछ भी पता नहीं चला, उस की योजना असफल नहीं हुई.

1 सप्ताह और बीतने के बाद महेश देवास वापस आया और सब से पहले उर्मी से मिलने उस के घर पहुंच गया.

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