परिणाम: विज्ञान की जीत हुई या पाखंड की

“हमारे बेटे का नाम क्या सोचा है तुम ने?” रात में परिधि ने पति रोहन की बांहों पर अपना सिर रखते हुए पूछा.

“हमारे प्यार की निशानी का नाम होगा अंश, जो मेरा भी अंश होगा और तुम्हारा भी,” मुसकराते हुए रोहन ने जवाब दिया.

“बेटी हुई तो?”

“बेटी हुई तो उसे सपना कह कर पुकारेंगे. वह हमारा सपना जो पूरा करेगी.”

“सच बहुत सुंदर नाम हैं दोनों. तुम बहुत अच्छे पापा बनोगे,” हंसते हुए परिधि ने कहा तो रोहन ने उस के माथे को चूम लिया.

लौकडाउन का दूसरा महीना शुरू हुआ था जबकि परिधि की प्रैगनैंसी का 8वां महीना पूरा हो चुका था और अब कभी भी उसे डिलीवरी के लिए अस्पताल जाना पड़ सकता था.

परिधि का पति रोहन इंजीनियर था जो परिधि को ले कर काफी सपोर्टिव और खुले दिमाग का इंसान था जबकि उस की सास उर्मिला देवी का स्वभाव कुछ अलग ही था. वे धर्मकर्म पर जरूरत से ज्यादा विश्वास रखती थीं.

प्रैगनैंसी के बाद से ही परिधि को कुछ तकलीफें बनी रहती थीं. ऐसे में उर्मिला देवी ने कई दफा परिधि के आने वाले बच्चे के नाम पर धार्मिक अनुष्ठान भी करवाए. मगर फिलहाल लौकडाउन की वजह से सब बंद था.

उस दिन सुबह से ही परिधि के पेट में दर्द हो रहा था. रात तक उस का दर्द काफी बढ़ गया. उसे अस्पताल ले जाया गया. महिला डाक्टर ने अच्छी तरह परीक्षण कर के बताया,” रोहनजी, परिधि के गर्भाशय में बच्चे की गलत स्थिति की वजह से उन्हें बीचबीच में दर्द हो रहा है. ऐसे में इन्हें ऐडमिट कर के कुछ दिनों तक निगरानी में रखना बेहतर होगा.”

“जी जैसा आप उचित समझें,” कह कर रोहन ने परिधि को ऐडमिट करा दिया.

इधर उर्मिला देवी ने डाक्टर की बात सुनी तो तुरंत पंडित को बुलावा भेजा.

“पंडितजी, बहू को दर्द हो रहा है. उसे स्वस्थ बच्चा हो जाए और सब ठीक रहे इस के लिए कुछ उपाय बताइए?”

अपनी भौंहों पर बल डालते हुए पंडितजी ने कुछ देर सोचा फिर बोले,” ठीक है एक अनुष्ठान कराना होगा. सब अच्छा हो जाएगा. इस अनुष्ठान में करीब ₹10 हजार का खर्च आएगा.”

“जी आप रुपयों की चिंता न करें. बस सब चंगा कर दें. आप बताएं कि किन चीजों का इंतजाम करना है?”

पंडितजी ने एक लंबी सूची तैयार की जिस में लाल और पीला कपड़ा, लाल धागे, चावल, घी, लौंग, कपूर, लाल फूल, रोली, चंदन, साबुत गेहूं, सिंदूर, केसर, नारियल, दूर्वा, कुमकुम, पीपल और तुलसी के पत्ते, पान, सुपारी आदि शामिल थे.

उर्मिला देवी ने मोहल्ले के परिचित परचून की दुकान से वे चीजें खरीद लीं. कुछ चीजें घर में भी मौजूद थीं.

सारे सामानों के साथ उर्मिला देवी पंडित को ले कर अस्पताल पहुंंचीं तो अस्पताल की नर्सें और कर्मचारी हैरान रह गए. उन्हें रिसैप्शन पर ही रोक दिया गया मगर उर्मिला देवी बड़ी चालाकी से पंडित को विजिटर बना कर अंदर ले आईं. उर्मिला देवी ने पहले ही परिधि को प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर लिया था. कमरा बंद कर के अनुष्ठान की प्रक्रिया आरंभ की गई.

बाहर घूम रहीं नर्सों को इस बाबत पूरी जानकारी थी कि अंदर क्या चल रहा है मगर उन के पास कहने के लिए शब्द नहीं थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस पाखंड को कैसे रोकें. दरअसल, अस्पताल में ऐसी घटना कभी भी नहीं हुई थी. सभी सीनियर डाक्टर के आने का इंतजार कर रहे थे. तब तक करीब 1 घंटे की के अंदर सारी प्रक्रियाएं पूरी कर उर्मिला देवी ने पंडित को विदा कर दिया.

नर्सें अंदर घुसीं तो देखा की परिधि के हाथ में लाल धागा बंधा हुआ है. माथे पर दूर तक सिंदूर लगा है. जमीन पर हलदी से बनाई गई एक आकृति के ऊपर चावल, लौंग, कुमकुम जैसी बहुत सी चीजें रखी हुई हैं. पास में नारियल के ऊपर एक पीला कपड़ा भी पड़ा हुआ है. और भी बहुत सी चीजें नजर आ रही थीं.

“स्टूपिड पीपुल्स…” कहते हुए एक नर्स ने बुरा सा मुंह बनाया और बाहर चली गई.

उर्मिला देवी चिढ़ गईं. नर्स को सुनाने की गरज से जोरजोर से चिल्ला कर कहने लगीं,” पूजा हम ने कराई है इस कलमुंही को क्या परेशानी है?”

इस बात को 4-5 दिन बीत गए. इस बीच परिधि को जुकाम और खांसी की समस्या हो गई. हलका बुखार भी हो गया था. अस्पताल वालों ने तुरंत उस का कोविड टेस्ट कराया.

उसी दिन रात में परिधि को दर्द उठा. आननफानन में सारे इंतजाम किए गए. सुबह की पहली किरण के साथ उस की गोद में एक नन्हा बच्चा खिलखिला उठा. घर वालों को खबर की गई. वे दौड़े आए.

तबतक कोविड-19 रिपोर्ट भी आ गई थी. परिधि कोरोना पोजिटिव थी. परिधि के पति और सास को जब यह खबर दी गई तो सास ने चिल्ला कर कहा,” ऐसा कैसे हो सकता है? हमारी बहू तो बिलकुल स्वस्थ हालत में अस्पताल आई थी. तुम लोगों ने जरूर सावधानी नहीं रखी होगी तभी ऐसा हुआ.”

“यह क्या कह रही हो अम्मांजी? हम ने ऐसा क्या कर दिया? हमारे अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा का पूरा खयाल रखा जाता है. यहां पूरी सफाई से सारे काम होते हैं.”

नर्स ने कहा तो सास उसी पर चिल्ला उठीं,” हांहां… गलत तो हम ही कह रहे हैं. वह देखो मरीज बिना मास्क के जा रहा है.”

“अम्मांजी उस की कल ही रिपोर्ट आई है. उसे कोरोना नहीं है और एक बात बता दूं, इस अस्पताल में कई इमारते हैं. इस इमारत में केवल गाइनिक केसेज आते हैं. बगल वाली इमारत कोविड मरीजों के लिए है. वहां के किसी स्टाफ को भी इधर आने की परमिशन नहीं. वैसे भी हम मास्क, ग्लव्स और सैनिटाइजेशन का पूरा खयाल रखते हैं. हमें उलटी बातें न सुनाओ.”

“कैसे न सुनाऊं? मेरी बहू को इसी अस्पताल में कोरोना हुआ है. साफ है कि यहां का मैनेजमैंट सही नहीं. यहां आया हुआ स्वस्थ इंसान भी कोरोना मरीज बन जाता है.”

“आप तो हम पर इल्जाम लगाना भी मत. पता नहीं क्याक्या अंधविश्वास और पाखंड के चोंचले करती फिरती हो. अपनी बहू को देखिए. उस की तबीयत बिगड़ जाएगी. उस का फीवर अब ठीक है. आप अपने साथ ले जाइए. न्यू बोर्न बेबी को इस अस्पताल में छोड़ना उचित नहीं. इस वक्त छोटे बच्चे की कैसे केयर करनी है वह हम समझा देंगे.”

“नहीं इसे हम घर कैसे ले जा सकते हैं? इसे कोविड है. घर में किसी को हो जाएगा. इतनी तो समझ होनी चाहिए न आप को.”

“मां हम परिधि को घर में क्वैरंटाइन कर देंगे. बच्चे को कोविड से कैसे बचाना है वह नर्स बता ही देंगी.”

“नहीं हम बहू और बच्चे को घर नहीं ले जा सकते. खबरदार रोहन जो तू इन के चक्कर में आया. ये नर्स और डाक्टर ऐसे ही बोलते हैं. पर मैं कोई खतरा मोल नहीं ले सकती.”

“पर मां…”

तुझे कसम है चल यहां से..”

उर्मिला देवी रोहन का हाथ पकड़ कर उसे घसीटती हुई घर ले गईं. परिधि का चेहरा बन गया. डाक्टर और नर्स आपस में उर्मिला देवी के व्यवहार और हरकतों की बुराई करने लगे. उन लोगों ने मैनेजमैंट को भी उर्मिला देवी के गलत व्यवहार की खबर कर दी. 1-2 लोकल अखबारों में भी इस घटना का उल्लेख किया गया.

इस बात को करीब 4-5 दिन बीत चुके थे. एक दिन उर्मिला देवी ने पंडितजी को फोन लगाया. वह पूछना चाहती थीं कि आगे क्या करना उचित रहेगा और ग्रहनक्षत्रों के बुरे दोष कैसे दूर किए जाएं?

फोन पंडित के बेटे ने उठाया.

“बेटा जरा पंडितजी को फोन देना..” उर्मिला देवी ने कहा.

बेटे ने कहा,”पिताजी को कोरोना हो गया था. 1 सप्ताह पहले ही उन की मौत हो चुकी है.”

उर्मिला जी के हाथ से फोन छूट कर गिर पड़ा. खुद भी सोफे पर बैठ गईं. पंडितजी को कोरोना था, यह जान कर वह डर गई थीं. यानी जिस दिन पंडितजी धार्मिक अनुष्ठान कराने आए थे तब भी उन्हें कोरोना था. तभी तो परिधि को भी यह बीमारी हुई है.

परिधि के साथ उस दिन पंडितजी के साथ वह भी तो थीं यानी अब वह खुद भी कोरोना की चपेट में आ सकती हैं. उन्होंने गौर किया कि 2-3 दिनों से उन्हें भी खांसी हो रही थी.

उर्मिलाजी ने फटाफट अपना कोरोना टेस्ट करवाया. अब तक उन्हें बुखार भी आ चुका था. हजारीबाग में कोरोना का एक ही अस्पताल था इसलिए उन्हें उसी अस्पताल में जाना पड़ा. मगर वहां के मैनेजमैंट ने उर्मिला देवी को ऐडमिट करने से साफ इनकार कर दिया.

ऐंबुलैंस में पड़ीं उर्मिला देवी का दिमाग काम नहीं कर रहा था. वे जानती थीं कि इस के अलावा यहां कोई अस्पताल नहीं. अब या तो उन्हें 4 घंटे के सफर के बाद रांची ले जाया जाएगा और वहां बैड न मिला तो 12 घंटे का सफर कर के पटना जाने को तैयार रहना होगा. हताश रोहन अस्पताल से वापस निकल आया.

दोनों जानते थे कि उर्मिला देवी को अपनी करनी का फल ही मिल रहा था. उन की गलत सोच, अंधविश्वास और नकारात्मक रवैए का ही परिणाम था कि आज बहू और पोते के साथसाथ उन की अपनी जिंदगी भी दांव पर लग चुकी थी.

वाइट पैंट: जब 3 सहेलियों के बीच प्यार ने दी दस्तक

इस बार जब मायके आई तो घूमते हुए कालेज के आगे से गुजरना हुआ. तभी अनायास ही वह सफेद पैंट पहना हुआ शख्स आंखों के आगे लहरा गया जिस का नाम ही हम लोगों ने वाइट पैंट रखा हुआ था. और सोचते हुए कालेज के दिन चलचित्र जैसे आंखों के आगे नाचने लगे.

बात तब की है जब हम ने कालेज में नयानया ऐडमिशन लिया था. उस जमाने में कालेज जाना ही बहुत बड़ी बात होती थी. हर कोई स्कूल के बाद कालेज तक नहीं पहुंच पाता था. तो हम खुद को बहुत खुशनसीब समझते थे जो कालेज की चौखट तक पहुंचे थे. इंटर कालेज के कठोर अनुशासन के बाद कालेज का खुलापन और रंगबिरंगे परिधान एक अलग ही दुनिया की सैर कराते थे.

हमारे लिए हर दिन नया दिन होता था. कालेज हमें कभी बोर नहीं करता था. हम 3 सहेलियां थीं सरिता, सुमित्रा और सुदेश. हम हमेशा साथसाथ रहती थीं, इसीलिए सभी लोग हमें त्रिमूर्ति भी कहते थे.

हम तीनों अकसर क्लास खत्म होने के बाद खुले मैदान में बैठ कर घंटों गपें लड़ाती थीं. इसी क्रम में हम तीनों ने महसूस किया कि कोई हमारे आसपास खड़ा हो कर हम पर नजर रखता है और इस बात को हम तीनों ने ही नोट किया. हम ने देखा मध्यम कदकाठी का एक लड़का, जो बहुत खूबसूरत नहीं था, उस के गेहुएं रंग में सिल्की बाल अच्छे ही लग रहे थे. शर्ट जैसी भी पहने था. लेकिन पैंट वह हमेशा सफेद ही पहनता था. रोजरोज उसे सफेद पैंट में देखने के कारण हम ने उस का नाम ही वाइट पैंट रख दिया था जिस से हमें उस के बारे में बात करने में आसानी रहती थी.

हमारा काम था क्लास के बाद मैदान में बैठ कर टाइम पास करना और उस का काम एक निश्चित दूरी से हम को देखते रहना. जब यह क्रम काफी दिनों तक चलता रहा तो हमें भी कुतूहल हुआ कि आखिर यह हम तीनों में से किसे पसंद करता है. सो, हम तीनों ने सोचा क्यों न इस बात का पता लगाया जाए. तो इत्तफाक से एक दिन सुदेश नहीं आई लेकिन हम ने देखा कि वाइट पैंट फिर भी हमारे आसपास उपस्थित है. तो इतना तो पक्का हो गया कि सुदेश वह लड़की नहीं है जिस के लिए वह हमारा ग्रुप ताकता है. कुछ समय बाद सुमित्रा उपस्थित न रही. फिर भी उस का हमें ताकना बदस्तूर जारी रहा. अब सुमित्रा भी इस शक के घेरे से बाहर थी. अब रह गई थी एकमात्र मैं और फिर किसी कारणवश मैं ने भी छुट्टी ली तो अगले दिन कालेज जाने पर पता चला कि मेरे न होने पर भी उस का ताकना जारी था.

अब तो हम तीनों को गुस्सा आने लगा. लेकिन कर भी क्या सकते थे. हम कहीं भी जा कर बैठते, उसे अपने आसपास ही पाते. हम ने कई बार अपने बैठने की जगह भी बदली, मगर उसे अपने ग्रुप के आसपास ही पाया. तीनों में मैं थोड़ी साहसी और निडर थी. हम रोज उसे देख कर यही सोचते कि इसे कैसे मजा चखाया जाए. लेकिन हमारे पास कोई आइडिया नहीं था और वैसे भी, इतने महीनों तक न उस ने कुछ बात की और न ही कभी कोई गलत हरकत. इसलिए भी हम कुछ नहीं कर सके. लेकिन उस का हमेशा हमारे ही ग्रुप को ताकना हमें किसी बोझ से कम नहीं लगता था. एक दिन हमारे बैठते ही जब वह भी आ गया तो मैं ने कहा चलो, आज इसे मजा चखाते हैं. तो दोनों बोलीं, ‘कैसे?’

?मैं ने कहा, ‘यह रोज हमारा पीछा करता है न, तो चलो आज हम इस का पीछा करते हैं.’ वे दोनों बोलीं, ‘कैसे?’ मैं ने कहा, ‘तुम दोनों सिर्फ मेरा साथ दो. जैसा मैं कहती हूं, बस, मेरे साथसाथ वैसे ही चलना.’ उन दोनों ने हामी भर दी. फिर हम वहीं बैठे रहे. हम ने देखा लगभग एक घंटे बाद वह लाइब्रेरी की तरफ गया तो मैं ने दोनों से कहा कि चलो अब मेरे साथ इस के पीछे. आज हम इस का पीछा करेंगे और इसे सताएंगे. मेरी बात सुन कर वे दोनों खुश हो गईं. और हम तीनों उस के पीछेपीछे लाइब्रेरी पहुंच गए. जितनी दूरी पर वह खड़ा होता था, लगभग उतनी ही दूरी बना कर हम तीनों खड़े हो गए. जब उस की नजर हम पर पड़ी तो वह हमें देख कर चौंक गया और हलके से मुसकरा कर अपने काम में लग गया.

उस के बाद वह पानी पीने वाटरकूलर के पास गया तो हम भी उस के पीछेपीछे वहीं पहुंच गए. अब तक वह हम से परेशान हो चुका था. फिर वो नीचे आया और मैदान के दूसरे छोर पर बने विज्ञान विभाग की तरफ चल दिया. हम भी उस के पीछेपीछे चल दिए. वह विज्ञान विभाग के अंदर गया और काफी देर तक बाहर नहीं आया. हम बाहर ही मैदान में बैठ कर उस के बाहर आने का इंतजार करने लगे.

लगभग 35 मिनट के बाद वह चोरों की तरह झांकता हुआ बाहर निकला, तो उस ने हम तीनों को उस के इंतजार में बैठे पाया. 10 बजे से इस चूहेबिल्ली के खेल में 2 बज चुके थे. वह हम से भागतेभागते बुरी तरह थक चुका था. वह कालेज से बाहर निकला और ऋषिकेश की तरफ पैदल चलने लगा. हम भी उस के पीछे हो लिए. वह मुड़मुड़ कर हमें देखता और आगे चलता जाता. जब थकहार कर उसे हम किसी भी तरह टलते नहीं दिखे तो आखिर में वह हरिद्वार जाने वाली बस में चढ़ गया और हमारे सामने से हमें टाटा करते हुए मुसकराते हुए निकल गया. हम तीनों अपनी इस जीत पर पेट पकड़ कर हंसती रहीं और फिर उस दिन के बाद कभी दोबारा हम ने वाइट पैंट को अपने आसपास नहीं देखा.

2 हिस्से: जब खुशहाल शादी पहुंची तलाक तक

‘‘कहां थीं तुम? 2 घंटे से फोन कर रहा हूं… मायके पहुंच कर बौरा जाती हो,’’ बड़ी देर के बाद जब मोनी ने फोन रिसीव किया तो मीत बरस पड़ा.

‘‘अरे, वह… मोबाइल… इधरउधर रहता है तो रिंग सुनाईर् ही नहीं पड़ी… सुबह ही तो बात हुई थी तुम से… अच्छा क्या हुआ किसलिए फोन किया? कोई खास बात?’’ मोनी ने उस की झल्लाहट पर कोई विशेष ध्यान न देते हुए कहा.

‘‘मतलब अब तुम से बात करने के लिए कोई खास बात होनी चाहिए मेरे पास… क्यों ऐसे मैं बात नहीं कर सकता? तुम्हारा और बच्चों का हाल जानने का हक नहीं है क्या मुझे? हां, अब नानामामा का ज्यादा हक हो गया होगा,’’ मीत मोनी के सपाट उत्तर से और चिढ़ गया. उसे उम्मीद थी कि वह अपनी गलती मानते हुए विनम्रता से बात करेगी.

उधर मोनी का भी सब्र तुरंत टूट गया. बोली, ‘‘तुम ने लड़ने के लिए फोन किया है तो मुझे फालतू की कोई बात नहीं करनी है. एक तो वैसे ही यहां कितनी भीड़ है और ऊपर से मान्या की तबीयत…’’ कहतेकहते उस ने अपनी जीभ काट ली.

‘‘क्या हुआ मान्या को? तुम से बच्चे नहीं संभलते तो ले क्यों जाती हो… अपने भाईबहनों के साथ मगन हो गई होगी… ऐसा है कल का ही तत्काल का टिकट बुक करा रहा हूं तुम्हारा… वापस आ जाओ तुम… मायके जा कर बहुत पर निकल आते हैं तुम्हारे. मेरी बेटी की तबीयत खराब है और तुम वहां सैरसपाटा कर रही हो… नालायकी की हद है… लापरवाह हो तुम…’’ हालचाल लेने को किया गया फोन अब गृहयुद्ध में बदल रहा था. मीत अपना आपा खो बैठा था.

‘‘जरा सा बुखार हुआ है उसे… अब वह ठीक है… और सुनो, मुझे धमकी मत दो. मैं 10 दिन के लिए आई हूं. पूरे 10 दिन रह कर ही आऊंगी… मैं अच्छी तरह जानती हूं कि मेरे मायके आने से सांप लोटने लगा है तुम्हारे सीने पर… अभी तुम्हारे गांव जाती जहां 12-12 घंटे लाइट नहीं आती… बच्चे वहां बीमार होते तो तुम्हें कुछ नहीं होता… पूरा साल तुम्हारी चाकरी करने के बाद 10 दिन को मायके क्या आ जाऊं तुम्हारी यही नौटंकी हर बार शुरू हो जाती है,’’ मोनी भी बिफर गई. उस की आवाज भर्रा गई पर वह अपने मोरचे पर डटी रही.

‘‘अच्छा मैं नौटंकी कर रहा हूं… बहुत शह मिल रही है तुम्हें वहां…

अब तुम वहीं रहो. कोई जरूरत नहीं वापस आने की… 10 दिन नहीं अब पूरा साल रहो… खबरदार जो वापस आईं,’’ गुस्से से चीखते हुए मीत ने उस की बात आगे सुने बिना ही फोन काट दिया.

मोनी ने भी मोबाइल पटक दिया और सोफे पर बैठ कर रोने लगी. उस की मां पास बैठी सब सुन रही थीं. वे बोलीं, ‘‘बेटी, वह हालचाल पूछने के लिए फोन कर रहा था. देर से फोन उठाने पर अगर नाराज हो रहा था तो तुम्हें प्यार से उसे हैंडल करना था. खैर, चलो अब रोओ नहीं. कल सुबह तक उस का भी गुस्सा उतर जाएगा.’’

मोनी अपना मुंह छिपाए रोते हुए बोली, ‘‘मम्मी, सिर्फ 10 दिन के लिए आई हूं. जरा सी मेरी खुशी देखी नहीं जाती इन से… पतियों का स्वभाव ऐसा क्यों होता है कि जब भी हमें मिस करेंगे, हमारे बिना काम भी नहीं चलेगा तब प्यार जताने के बदले, हमारी कदर करने के बदले हमीं पर झलाएंगे, गुस्सा दिखाएंगे… हम से जुड़ी हर चीज से बैर पाल लेंगे. यह क्या तरीका है जिंदगी जीने का?’’

‘‘बेटी, ये पुरुष होते ही ऐसे हैं… ये बीवी से प्यार तो करते हैं पर उस से भी ज्यादा अधिकार जमाते हैं. बीवी के मायके जाने पर इन को लगता है कि इन का अधिकार कुछ कम हो रहा है, तो अपनेआप अंदर ही अंदर परेशान होते हैं. ऐसी झल्लाहट में जब बीवी जरा सा कुछ उलटा बोल दे तो इन के अहं पर चोट लग जाती है और बेबात का झगड़ा होने लगता है… तेरे पापा का भी यही हाल रहता था,’’ मां ने मोनी के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे चुप कराया.

‘‘पर मम्मी औरत को 2 भागों में आखिर बांटते ही क्यों हैं ये पुरुष? मैं पूरी ससुराल की भी हूं और मायके की भी… मायके में आते ही ससुराल की उपेक्षा का आरोप क्यों लगता है हम पर? यह 2 जगह का होने का भार हमें ही क्यों ढोना पड़ता है?’’ मोनी ने मानो यह प्रश्न मां से ही नहीं, बल्कि सब से किया हो.

मां उसे अपने सीने से लगा कर चुप कराते हुए बोलीं, ‘‘इन के अहं और ससुराल में छत्तीस का आंकड़ा रहता ही है… मोनी मैं ने कहा न कि पुरुष होते ही ऐसे हैं. यह इन की स्वाभाविक प्रवृत्ति है… और पुरुष का काम ही है स्त्री को 2 भागों में बांट देना, जिन में एक हिस्सा मायके का और दूसरा ससुराल का बनता है… जैसे 2 अर्ध गोलाकार से एक गोलाकार पूरा होता है वैसे ही एक औरत भी इन 2 हिस्सों से पूर्ण होती है.’’

मोनी मूक बनी सब सुन रही थी. कुछ समझ रही थी और कुछ नहीं समझने की कोशिश कर रही थी. शायद यही औरत का सच है.

जमाना बदल गया: भाग 1- ऐश्वर्या ने सुशांत को कैसे सिखाया सबक?

‘‘हैलोपापा, मेरा कैंपस सलैक्शन हो गया है,’’ ऐश्वर्या ने लगभग चिल्लाते हुए कहा. उस से अपनी खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी.

‘‘बधाई हो बेटा,’’ पापा की प्रसन्नता भरी आवाज सुनाई दी, ‘‘किस कंपनी में हुआ है?’’

‘‘रिवोल्यूशन टैक्नोलौजी में. बहुत बड़ी सौफ्टवेयर कंपनी है. इस की कई देशों में शाखाएं हैं,’’ ऐश्वर्या ने खुशी से बताया, ‘‘कालेज में सब से ज्यादा पैकेज मुझे मिला है. ज्यादातर बच्चों को तीन से साढ़े तीन लाख रुपए तक के पैकेज मिले हैं, लेकिन मुझे साढ़े चार लाख रुपए का पैकेज मिला है. लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘यह कंपनी 2 साल का बौंड भरवा रही है. समझ में नहीं आ रहा क्या करूं?’’

‘‘दूसरी कंपनियां भी तो कम से कम 1 साल का बौंड भरवाती ही हैं. अगर अच्छी शुरुआत मिल रही है तो 2 साल का बौंड भरने में कोई बुराई नहीं है, क्योंकि 2 साल बाद अगर कंपनी बदलती हो तो तुम्हें इस से ऊपर का जंप मिलेगा जबकि तुम्हारे दूसरे साथियों को मुश्किल से उतना मिल पाएगा जितने से तुम शुरुआत कर रही हो,’’ पापा ने राय दी.

‘‘थैंक्यू पापा, आप ने मेरी उलझन दूर कर दी.’’

ऐश्वर्या लखनऊ के एक इंजीनियरिंग कालेज की छात्रा थी. हर सेमैस्टर में टौप करती थी. सभी उस की प्रतिभा का लोहा मानते थे. सभी को विश्वास था कि सब से अच्छा पैकेज उसी को मिलेगा.

2 दिन बाद जब ऐश्वर्या घर पहुंची तो पापा ने उसे गले से लगा लिया. मम्मी ने उस के ऊपर आशीर्वादों की बौछार करते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारी पोस्टिंग कहां होगी?’’

‘‘बैंगलुरु में?’’

घर में जश्न का माहौल था. खुशियों के बीच छुट्टियां कब बीत गईं पता ही नहीं चला. ऐश्वर्या जब नौकरी जौइन करने पहुंची तो कंपनी की भव्यता देख दंग रह गई. बैंगलुरु के आई टी हब में एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग की छठी मंजिल पर कंपनी का शानदार औफिस था.

सुबह 10 बजे कंपनी के सभी कर्मचारी मिनी औडिटोरियम में 15 मिनट तक मैडिटेशन करते उस के बाद अपनेअपने कार्यस्थल पर चले जाते. जूनियर कर्मचारियों के लिए हाल में छोटेछोटे क्यूबिकल्स बने थे, जबकि मैनेजर और ऊपर के अधिकारियों के लिए कैबिनों की व्यवस्था थी. किंतु सभी क्यूबिकल्स और कैबिनों की साजसज्जा एक ही तरह की थी, जिस से कंपनी का ऐश्वर्य झलकता था.

ऐश्वर्या की नियुक्ति प्रोजैक्ट मैनेजर सुशांत की टीम में हुई थी. उस की गिनती कंपनी के प्रमुख अधिकारियों में होती थी. अपनी काबिलीयत के बल पर उस ने बहुत तेजी से तरक्की की थी.

पहले ही दिन उस ने ऐश्वर्या का स्वागत करते हुए कहा, ‘‘ऐश्वर्याजी, मेरी टीम कंपनी की लीड टीम है. कंपनी के सब से महत्त्वपूर्ण प्रोजैक्ट हमारी टीम को ही मिलते हैं. मुझे विश्वास है कि आप के आने से हमारी टीम और मजबूत होगी.’’

‘‘सर, मैं आप की अपेक्षाओं पर खरी उतरने की पूरी कोशिश करूंगी,’’ ऐश्वर्या के चेहरे से भरपूर आत्मविश्वास झलक उठा.

सुशांत ने सच ही कहा था. कंपनी के सब से महत्त्वपूर्ण प्रोजैक्ट उस की टीम को ही

मिलते थे, इसलिए सभी को दूसरों की अपेक्षा मेहनत भी ज्यादा करनी पड़ती थी. देखते ही देखते पहला महीना बीत गया. ऐश्वर्या को ज्यादा काम नहीं दिया गया. इस बीच वह काम को समझतीसीखती रही.

पहली तनख्वाह मिलने पर उस ने पूरे 25 हजार की खरीदारी कर डाली और फिर हवाईजहाज से लखनऊ पहुंच गई.

‘‘मम्मी, यह देखिए बैंगलौरी सिल्क की साड़ी और पशमीना शाल दोनों आप पर बहुत खिलेंगी,’’ ऐश्वर्या ने मम्मी के कंधों पर साड़ी रखते हुए कहा.

साड़ी और शाल वास्तव में बहुत खूबसूरत थी. मम्मी का चेहरा खिल उठा.

‘‘पापा, आप के लिए गरम सूट और घड़ी,’’ कह ऐश्वर्या ने 2 पैकेट पापा की ओर बढाए.

सूट पापा के मनपसंद रंग का था और घड़ी भी बहुत खूबसूरत थी. पापा का चेहरा भी खिल उठा.

‘‘तुम ने कितने की खरीदारी कर डाली?’’ मम्मी ने पूछा.

‘‘ज्यादा नहीं, सिर्फ 25 हजार की,’’ ऐश्वर्या मुसकराई.

सुन मम्मी की आंखें फैल गईं, ‘‘अब पूरे महीने का खर्चा कैसे चलाओगी?’’

‘‘जैसे पहले चलाती थी. पापा जिंदाबाद,’’ ऐश्वर्र्या खिलखिला पड़ी.

‘‘हांहां क्यों नहीं. अभी मेरे रिटायरमैंट में6 महीने बाकी हैं. तब तक तो अपनी  लाडली का खर्चा उठा ही सकता हूं,’’ पापा ने भी ठहाका लगाया.

2 दिन बाद ऐश्वर्या बैंगलुरु  लौट गई. अगले दिन लंच के बाद उस के सीनियर ने उसे एक टास्क दिया, जिसे पूरा करतेकरते 7 बज गए, लेकिन टास्क पूरा नहीं हुआ. कंपनी के ज्यादातर कर्मचारी चले गए थे, पर ऐश्वर्या अपने काम में जुटी रही. जानती थी कि यह काम आज ही पूरा होना जरूरी है.

‘‘मैडम, आप अभी तक घर नहीं गईं?’’ अपने चैंबर से निकलते सुशांत की नजर उस पर पड़ी.

‘‘सर, एक छोटा सा टास्क था, जो पूरा नहीं हो पाया. लेकिन मैं कर लूंगी.’’

‘‘लाइए मैं देखता हूं क्या है?’’ सुशांत ने कहा.

ऐश्वर्या कंप्यूटर के सामने से हट गई. सुशांत ने चंद पलों तक स्क्रीन पर खुले प्रोग्राम

को देखा, फिर उस की उंगलियां तेजी से कीबोर्ड पर चलने लगीं.

करीब 5 मिनट बाद सुशांत मुसकराया, ‘‘लीजिए आप का टास्क पूरा हो गया.’’

जिस काम को ऐश्वर्या कई घंटों से नहीं कर पा रही थी उसे सुशांत ने 5 मिनट में ही पूरा कर दिया. ऐश्वर्या उस की प्रतिभा की कायल हो गई.

‘‘थैंक्यू सर,’’ ऐश्वर्र्या ने कृतज्ञता प्रकट की.

‘‘इस की जरूरत नहीं,’’ सुशांत हलका सा मुसकराया, ‘‘थैंक्स के बदले क्या आप मेरे साथ 1 कप कौफी पीना चाहेंगी?’’

ऐश्वर्या भी काफी थक गई थी. उसे भी कौफी या चाय की जरूरत महसूस हो रही थी, इसलिए उस ने हामी भर दी.

सुशांत उसे एक महंगे रैस्टोरैंट में ले गया. वहां हाल के साथसाथ टैरेस में भी बैठने की व्यवस्था थी. सुशांत सीधे टैरेस में आ गया. वहां अपेक्षाकृत भीड़ कम थी और शांति भी थी. टैरेस से बाहर के दृश्य बहुत खूबसूरत नजर आ रहे थे. शहर की जगमगाती लाइटें देख कर लग रहा था जैसे सितारे जमीं पर उतर आए हों.

‘‘ऐश्वर्याजी, कंपनी की तरफ से 2 इंजीनियर 1 साल के लिए अमेरिका भेजे जा रहे हैं. आप ने उस के लिए आवेदन क्यों नहीं दिया? कौफी की चुसकियां लेते हुए सुशांत ने पूछा.’’

‘‘सर, मैं बिलकुल नई हूं, इसलिए आवेदन नहीं किया.’’

‘‘बात नए या पुराने की नहीं है. बात प्रतिभा की है और इस मामले में आप किसी से कम नहीं हैं. आप को आवेदन करना चाहिए. 3 लाख प्रति माह के साथसाथ कंपनी की तरफ से बोनस भी मिलेगा. 1 साल बाद जब लौटेंगी तो आप की मार्केट वैल्यू काफी बढ़ चुकी होगी,’’ सुशांत ने समझाया.

‘‘लेकिन सर, मैं बहुत जूनियर हूं. क्या मेरा चयन हो पाएगा?’’

‘‘उस की चिंता छोडि़ए. यह प्रोजैक्ट मेरा है. कौन अमेरिका जाएगा और कौन नहीं, इस का फैसला मुझे ही करना है.’’

ऐश्वर्या सोच में पड़ गई. वह तत्काल कोई निर्णय नहीं ले पा रही थी.

तब सुशांत ने कहा, ‘‘कोई जल्दी नहीं है. आप अच्छी तरह सोच लीजिए. कल शाम हम फिर यहीं मिलेंगे. तब आप अपना फैसला सुना दीजिएगा.’’

Adipurush: मेकर्स ने बदले डायलॉग, ‘जलेगी तेरे बाप की’ की जगह अब होंगे ये शब्द

प्रभास, कृति सेनॉन और सैफ अली खान स्टारर ‘आदिपुरुष’ (Adipurush) फिल्म 16 जून को काफी लंबे अरसे के बाद बड़े स्क्रीन पर रिलीज हो गई है. जब से आदिपुरुष मूवी रिलीज हुई तभी से विवादो में आ गई है. दरअसल, ‘आदिपुरुष’ (Adipurush) के डायलॉग्स को लेकर जमकर बवाल हो रहा है.

मनोज शुक्ला मुंतशिर हुए ट्रोल

फिल्म निदर्शक ओम राउत की ‘आदिपुरुष’ फिल्म में हनुमान ने लंका दहन के दौरान एक डायलॉग बोला था, ‘कपड़ा तेरे बाप का, तेल तेरे बाप का, आग तेरे बाप की और जलेगी भी तेरे बाप की.’

फिल्म में इस डायलॉग को सुनकर दर्शक बुरी तरह से भड़क गए थे. यहां तक कि लोगों को ‘आदिपुरुष’ के राइटर मनोज शुक्ला मुंतशिर को काफी खरी- खोटी सुनाई. ‘आदिपुरुष’ को लेकर दर्शकों की इस प्रतिक्रिया को देख मेकर्स ने फिल्म के डायलॉग्स के कुछ विवादित डायलॉग्स को बदलने का फैसला लिया था. मनोज शुक्ला मुंतशिर ने दावा किया गया था कि एक हफ्ते के भीतर हनुमान  और रावण द्वारा बोले गए इन आपत्तिजनक डायलॉग्स को बदल दिया जाएगा. अब ‘आदिपुरुष’ के इन डायलॉग्स को बदल दिया गया है.

‘आदिपुरुष’ के बादल गए डायलॉग्स

सोशल मीडिया पर ‘आदिपुरुष’ की वीडियो क्लिप जमकर वायरल हो रहे है. जिसमें देखा जा सकता है कि हनुमान  की पूंछ में आग लगी है और वह मेघनाद से कह रहे हैं, “कपड़ा तेरी लंका का, तेल तेरी लंका का, आग भी तेरी लंका की, जलेगी भी तेरी लंका ही.”

लेकिन वीडियो में देखा जा सकता है कि भले ही फिल्म का डायलॉग बदल गया हो लेकिन हनुमान  की लिपसिंग में अभी भी मैंच नहीं हो रही ऐसे लग रहा है हनुमान जी, ‘बाप’ ही बोल रहे हो. ऐसे में देखना होगा कि ‘आदिपुरुष’ के ये बदले हुए डायलॉग्स दर्शकों को खुश कर पाते हैं या फिर नहीं?

मनोज शुक्ला मुंतशिर ने दी सफाई

मनोज मुंतशिर ने ‘आदिपुरुष’ के डायलॉग्स को लेकर कहा कि, “यह कोई गलती नहीं थी. बजरंगबली और सभी पात्रों के लिए ये डायलॉग्स बहुत ही सोच- समझकर लिखे गए थे. हमने केवल इसे सरल बनाया था क्योंकि हमें एक बात समझनी होगी अगर किसी फिल्म में कई किरदार हैं तो सभी की भाषा एक जैसी नहीं हो सकती.” इसके अलावा मनोज मुंतशिर ने यह भी कहा था कि उन्होंने बेहद ही पवित्रता के साथ इस फिल्म के डायलॉग्स लिखे हैं.

Monsoon special: आज ही खरीदें ट्रेंडी और शानदार फैशनेबल कुर्ती

Monsoon season आने वाला है. Monsoon सीजन में कपड़ो की शॉपिंग करना बेहद जरूरी होता है. आमतौर पर महिलाओं को काफी टेंशन होती है किस तरह के कपड़े खरीदें. चिंतन करना छोड़िए, आज हम आपको बताएंगे Monsoon सीजन के फैशनेबल कुर्ता कैसे से खरीदें. ऑफिस से लेकर पार्टी तक, आप ये फैशनेबल कुर्ता पहन सकते हैं. आप शॉपिंग एप  के जरिए Monsoon सीजन के ट्रेंडी और फैशनेबल कुर्ती खरीद सकते है.

  1. कॉटन प्रिंटेड स्ट्रेट कुर्ती

महिलाओं के लिए कॉटन प्रिंटेड फ्लोरल स्ट्रेट कुर्ती Monsson के लिए के सबसे बेहतरीन ऑपशन है.  कुर्ती  इसमें खूबसूरत फ्लोरल प्रिंट है. यह कुर्ती आपको शॉपिंग एप पर मिल जाएगी.

2.शिफॉन की कुर्ती

अगर आप बारिश के मौसम में शिफॉन का कपड़ा पहनेंगे तो आपको काफी आसानी होगी. दरअसल, बारिश में कपड़ा जल्दी सूखता नहीं है, पर अगर आपका आउटफिट शिफॉन फैब्रिक का होगा तो ये थोड़ी सी हवा से भी सूख जाएगा. ऐसे में महिलाओं के लिए शिफॉन की कुर्ती बेस्ट रहेगी. आपको शॉपिंग एप पर कई सारी शिफॉन की कुर्ती मिल जाएगी.

3. नाइलॉन 

बारिश के मौसम में नाइलॉन कपड़ा बेस्ट होता है. ऐसे में आप Monsoon सीजन के फैशनेबल नाइलॉन कुर्ती पहन सकते है. यह बहुत जल्दी सूखता है. इसको पहनते वक्त बस इस बात का ध्यान रखें कि ये ज्यादा टाइट ना हों, वरना स्किन से जुड़ी परेशानियां सामने आ सकती हैं.

4. फ्लोरल प्रिंट कुर्ती

बरसात के मौसम के लिए अगर आप परफेक्ट प्रिंट की तलाश कर रहे हैं, तो फ्लोरल प्रिंट आपके लिए परफेक्ट ऑप्शन बन सकता है. ऐसे में आप Monsoon सीजन में फ्लोरल प्रिंट  कुर्ती पहन सकते है. ये आपको ट्रेंडी और फैशनेबल लुक देगा.

5.टाइट कपड़ों से रहें दूर

बरसात के मौसम में ध्यान रखें, कभी ज्यादा टाइट कपड़े नहीं पहनने चाहिए. भीगने के बाद ये शरीर से चिपक जाते हैं जो काफी अजीब लगते हैं. इसीलिए बरसात के मौसम  में टाइट कपड़े पहनने से बचे.

अनुपमा को लगी चोट तो अनुज ने उठाया गोद में, माया हुई गुस्से से बेहाल

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ लंबे समय से टीआरपी पर नंबर वन बना हुआ है. दर्शको के बीच ‘अनुपमा’ की खासी दिवानगी दिखी जा सकती है. शो के मेकर्स आए दिन ‘अनुपमा’ में तड़का डालते रहते है. टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ के मेकर्स शो के नंबर वन बने रहने के लिए नए-नए ट्विस्ट और टर्न्स लेकर आते ही रहते है. ‘अनुपमा’ में के अपकमिंग एपिसोड में देखने को मिलेगा कि अनुपमा को लगी चोट, वहीं माया का गुस्सा विक्रराल रूप ले लेता है. इसके साथ ही  ‘अनुपमा’ शो में पाखी कपाड़िया हाउस में अनुपमा के लिए फेयरवेल पार्टी का आयोजन के लिए किंजल को फोन पर बताती है.

अनुपमा को लगी चोट

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ में के अपकमिंग एपिसोड में दर्शको देखने को मिलेगा कि अनुपमा मार्किट जाती है वहां वह अनुज से टकरा जाती है. अनुज अनुपमा से पूछता है, ये चोट तुम्हें कैसे लगी. ‘अनुपमा’ के न्यु प्रोमो में देखने को मिला कि अनुपमा के चोट लगी होती है तो अनुज अनुपमा को गोद में उठा लिया.

माया का दिखा रूद्र रूप

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ के नए प्रोमो में देखने को मिला कि माया गुस्से में बेहाल हो जाती है. माया किचन में होती है और वह किचन में आटा गूंथने के समय अपना सारा गुस्सा निकाल रही है. माया गुस्से में पागल हो जाती है.

फेयरवेल पार्टी का प्लान करती पाखी

‘अनुपमा’ में मनोंरंजन का डोज यहीं खत्म नहीं होता. शो के मेकर्स शो मे नए-नए ट्विस्ट लेकर आते ही रहते है. टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ के अपकमिंग एपिसोड में देखने को मिलेगा कि पाखी किंजल को फोन करती है वह किंजल से कहती है कि अनुपमा के लिए फेयरवेल पार्टी का आयोजन के लिए कहती है, किंजल बा को बताती है. इस पर बा कहती है उसका दिमाग खराब है. उस कपाड़िया हाउस में पागल औरत रहती है. अनुपमा वहां क्यों जाएगी?

यह अन्याय है

ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर बनाना और पत्नी से छिपा कर रखना अब और मुश्किल होता जा रहा है. वैसे ही हर जगह सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैंहर जगह आईडी पूछी जाती है. हर जगह भीड़ उमड़ी रहती है और ऊपर से प्यार के दुश्मन दिल्ली हाई कोर्ट के जज कहते हैं कि अगर पति पर शक है तो पत्नी किसी होटल का रिकौर्ड मांग सकती है.

एक ऐडल्ट्री के मामले में पत्नी ने पति की जयपुर यात्रा के दौरान एक होटल से गैस्टों का रिकौर्ड और सीसीटीवी फुटेज मांगी पर होटल ने गैस्ट की राइट टू प्राइवेसी’ के नाम पर देने से इनकार कर दिया. दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि हिंदू मैरिज ऐक्ट के अंतर्गत ऐडल्ट्री मैट्रीमोनियल औफैंस है और उस के लिए सुबूत जुटाने का हक पत्नी को है. उस ने आदेश दिया है कि पति और उस की प्रेमिका की कौल रिकौर्डहोटल स्टे रिकौर्डसीसीटीवी फुटेज दिलवाई जाए ताकि वह साबित कर सके कि पति ऐडल्ट्री का गुनहगार है.

यह अन्याय है. प्रेमियों को मिलने देने का हक नहीं छीना जा सकता चाहे प्रेमियों में से एक या दोनों पहले से विवाहित ही क्यों न हों और वे विवाह तोड़ना नहीं चाहते हों. घर की रसोई का उबाऊ खाना बाहर के ठेले वाले के खाने से भी घटिया लगने लगे तो भला खाने वाले का क्या दोष. बेकार में हाई कोर्ट पति के प्रेम को अपराध बता रहा है. उन्हें प्रेम से जीने का हक पति को देना चाहिए. हम तो कहेंगे कि पत्नी को फटकार लगे कि तुम में क्या कमी हो गई कि पति बाहर जा रहा है और इतना बड़ा रिस्क ले रहा है और मोटे पैसे दे रहा है.

घर के सुगंधित बिस्तर की जगह इंपर्सनल होटलों के कमरों में प्रेमिका से रोमांस आखिर कितने दिन भाएगा. घर का कुत्ता 2-4 दिन बाहर लगा कर लौट ही आएगा का सिद्धांत भूलना नहीं चाहिए.

पत्नी भी मूर्ख है कि ऐडल्ट्री साबित करने के चक्कर में अपनी पोल खोल रही है कि पति को उस में कोई आकर्षण नहीं दिख रहा है और वह किसी और के चक्कर में शहरशहर मारा फिर रहा है. यह बेहद शर्मनाक है. हर प्रेमी को सम्मानजनक जगह मिलनी ही चाहिए और पत्नी या पुलिस डंडा घुमाते घूमे यह बिलकुल इजाजत नहीं होनी चाहिए.

पतिपत्नी के वादों का क्यावादे तो तोड़ने के लिए होते हैं. प्रधानमंत्री कहते रहे हैं कि हरेक की जेब में 15 लाख आएंगे. आए क्यापंडितमौलवी कहते रहते हैं कि ईश्वरअल्लाह छप्पर फाड़ कर देंगे. दिया क्याअब उन के खिलाफ क्या कर सकते हैंकुछ नहीं नतो वादे तोड़ने वाले पति के पीछे क्यों लट्ठ ले कर फिरे हो?

भईजो किक छिपछिपा कर प्रेम करने में मिलती है वह शादीशुदा पत्नी से प्रेम में कहां मिलेगी. बुरा हो कानूनबाजों का जो वे पतियों का जीना हराम कर रहे हैं.               

जिम जाना कितना जरूरी

बाबू सुंदर सिंह इंस्टिट्यूट औफ टैक्नोलौजी ऐंड मैनेजमैंट की वाइस चेयरपर्सन 42 साल की रीना सिंह अपना पूरा कालेज संभालती हैं. उन के कालेज में 11 हजार से अधिक लड़केलड़कियां पढ़ते हैं. इन से रूबरू होना, इन की समस्याओं को सुनना और कालेज के स्टाफ के बीच काम करना पूरे दिन की व्यस्तता रहती थी.

ऐसे में वे अपनी डाइट और ऐक्सरसाइज का ध्यान नहीं रख पा रही थीं. 40 प्लस के बाद महिलाओं की सेहत में तमाम तरह के बदलाव होते हैं. ये सब मिल कर हैल्थ को बुरी तरह प्रभावित कर रहे थे. काम के बाद की थकान रहती थी. स्ट्रैस बढ़ रहा था. ऐक्सरसाइज करने का मन नहीं होता था.

इन परेशानियों को ले कर जब रीना अपने डाक्टर से बात करती तो वे भी ऐक्सरसाइज करने को कहते. रीना ने इस के बाद ‘ऊर्जा फिटनैस ऐंड डाइट स्टूडियो’ जौइन किया. कुछ दिनों के बाद उसे अपने अंदर पौजिटिव बदलाव दिखने लगे. अब वह कालेज और घर के काम के बाद भी पहले जैसे थकती नहीं है.

रीना कहती है, ‘‘मैं अपने जिम में मिलने वाले डाइट प्लान और ऐक्सरसाइज को पूरी तरह से मानती हूं. पहले से कहीं अधिक बेहतर अनुभव करती हूं. मैं स्वस्थ्य और फिट रहने के लिए ही जिम जाती हूं. आज महिलाओं को अधिक जिम्मेदारियां निभानी पड़ रही हैं. ऐसे में ऐक्सरसाइज बहुत जरूरी होती है.’’

  1. हैल्थ इज वैल्थ

पुरानी कहावत है ‘हैल्थ इज वैल्थ.’ यह कहावत बताती है कि हैल्थ यानी सेहत ही हमारी वैल्थ यानी संपत्ति होती है. आज के दौर में इस का महत्त्व और भी बढ़ गया है. अगर आप की सेहत अच्छी नहीं है तो कोई भी सुखसुविधा किसी काम की नहीं है. अच्छी सेहत के लिए फिटनैस जरूरी है. इस का महत्त्व बढ़ गया है.

फिटनैस का मतलब जीरो फीगर या सिक्स पैक ऐब्स होना जरूरी नहीं होता है. फिटनैस मतलब अच्छी सेहत होती है. बीमारियों से दूर रहना भी अच्छी सेहत में आता है. शारीरिक रूप से फिट होने के साथसाथ जरूरी होता है कि मैंटल हैल्थ भी ठीक रहे. स्वस्थ, निरोगी और ऊर्जावान बने रहना ही फिटनैस की निशानी होती है. इस के लिए रहनसहन, खानपान संतुलित होना चाहिए ताकि लंबे समय तक स्वस्थ रह सकें और अपनी जिंदगी के मजे ले सकें.

2. बेहतर होता है पर्सनल ट्रेनर

सेहतमंद शरीर के लिए 7-8 घंटे की नींद, अच्छा नाश्ता, लंच और डिनर जरूरी होता है. आज न हमें अच्छी नींद मिल रही है और न ही अच्छा भोजन. इस के साथ ही हमें फिटनैस का समय भी नहीं मिल पा रहा.

ऐसे में जिम, फिटनैस ट्रेनर और डाइटिशियन बेहद जरूरी हो जाता है. कई लोग अपना पर्सनल ट्रेनर भी रखते हैं. पहले यह काम फिल्म स्टार और बड़े लोग करते थे. अब साधारण लोग भी इस काम को करते हैं. 10 हजार से 25 हजार रुपए के बीच पर्सनल फिटनैस ट्रेनर मिलने लगे हैं. य लेडीज और जैंटस दोनों ही होते हैं.

लखनऊ ‘मेंस ऐंड वूमन जिम’ की डाइरैक्टर रानी श्रीवास्तव सोशल इन्फ्लूएंसर और मौडल भी हैं. इंस्ट्राग्राम पर उन के 3 मीलियन से अधिक फौलोअर हैं. वे फिटनैस इंस्ट्रक्टर भी हैं. वे कहती हैं, ‘‘पर्सनल फिटनैस ट्रेनर जरूरी होते हैं क्योंकि वे आप की जरूरत के हिसाब से आप को ऐक्सरसाइज बताते हैं, उस में मदद करते हैं. सामान्य फिटनैस ट्रेनर एकसाथ कई लोगों को बताता है तो इस कारण उस का रिजल्ट उतना बेहतर नहीं होता है. ऐसे में अगर आप अफोर्ड कर सकते हैं तो पर्सनल फिटनैस ट्रेनर बेहतर रहता है. इस में गोपनीयता भी बनी रहती है.’’

3. कैसे सैट करें अपना फिटनैस गोल

जब आप फिटनैस सैंटर या जिम जाने की सोचें तो सब से पहले यह विचार करें कि आप का गोल यानी लक्ष्य क्या है? आप वेट लौस के लिये जिम आए हैं या फिट रहने के लिए अथवा डाक्टर न किसी खास बीमारी से बचाव के लिए जिम जाने की सलाह दी है. इन सवालों के जवाबों से आप को अपना फिटनैस गोल तय करने में मदद मिलेगी. इस गोल के बारे में फिटनैस कोच, काउंसलर या जिम ट्रेनर जो भी है उसे खुल कर बताएं ताकि वह आप की जरूरत के हिसाब से आप के लिए फिटनैस प्लान बना सके.

‘ऊर्जा फिटनैस ऐंड डाइट स्टूडियो’ के डाइरैक्टर कपिल कनोडिया कहते हैं, ‘‘जब भी आप किसी फिटनैस सैंटर जा रहे हों वहां जो काउसंलर हो उसे यह जरूर बताएं कि आप के आने का उददेश्य क्या है? आप हैल्दी रहने के लिए आए हैं या वजन घटाना है अथवा किसी बीमारी के कारण आए हैं. इस से वह आप की जरूरत के हिसाब से ऐक्सरसाइज प्लान बना कर दे पाएगा. इस से आप को कम समय में बेहतर परिणाम मिल पाएगा, आप को अपना फिटनैस गोल तय करने में मदद मिलेगी.’’

फिटनैस कोई ऐसी चीज नहीं है कि तय समय में यह मिल जाए. यह एक नियमित दिनचर्या है. इसे नियमित करने के साथ ही अपनी डाइट का भी पूरा खयाल रखें. अगर फिटनैस के साथ डाइट का ध्यान नहीं रखेंगे तो आप को अपना गोल हासिल नहीं होगा. जब आप फिटनैस प्लान बना रहे होंगे तो तभी अपना फिटनैस गोल भी सामने रखें ताकि उस के अनुसार ही प्लान हो सके. कई बार लोग अपनी बौडी के खास हिस्सों को ले कर जिम आते हैं जैसे किसी के पैर पतले हैं तो वह उन्हें स्ट्रौंग बनाना चाहता है. किसी की ब्रैस्ट छोटी है तो वह उसे उभारना चाहती है. कोई ब्रैस्ट को सुडौल बनाना चाहती है. इसी तरह से हिप्स और कमर को ले कर भी बात होती है. अत: इस तरह की बातें पहले से तय कर लें ताकि उस पर ही फोकस किया जा सके.

4. फिटनैस गोल के हिसाब से डाइट प्लान

सोनिया मेहरोत्रा और उन के पति सन्नी मेहरोत्रा लखनऊ में 6 सालों से ‘सन्नी फिटनैस फैक्टरी’ चला रहे हैं. उन का कहना है, ‘‘अपने फिटनैस गोल को तब तक हासिल नहीं कर सकते हैं जब तक कि वर्कआउट और डाइट के बीच अच्छा संतुलन नहीं होगा. आप जो भी डाइट लेते हैं उस का फिटनैस की तुलना में ज्यादा प्रभाव आप के शरीर पर पड़ता है.

फिटनैस के लिए ऐक्सरसाइज के साथ हैल्दी डाइट से भी बौडी को मैंटेन रख सकते हैं. डाइट में अधिक से अधिक प्रोटीन शामिल करें. कैलोरीज बढ़ाने वाले कार्ब और वसा के सेवन से सावधान रहें.

शरीर में जो भी कैलोरी आती है वह आप के द्वारा कंज्यूम किए जाने वाले सभी फूड्स और ड्रिंक्स आइटम के जरीए ही आती है. अगर आप नियमित रूप से व्यायाम करते हैं और कैलोरी को कंट्रोल करने में कामयाब नहीं होते हैं तो आप के द्वारा कंज्यूम की गई कैलोरी को केवल एक हिस्सा ही बर्न होता है.

हैल्थ के लिए कैलोरी का ज्यादा से ज्यादा बर्न करने की जरूरत होती है. ऐसे में वर्कआउट और डाइट के बीच तालमेल कर के ही कैलोरी बर्न कर सकते हैं. वजन घटाने के मसले में 80 फीसदी काम डाइट से होता है.

5. बाहरी प्रोटीन से जुड़ी सावधानियां

जिम जाने वाले प्रोटीन का सेवन अधिक करते हैं. डाइट में प्रोटीन पाउडर को शामिल करते हैं. ज्यादा प्रोटीन बौडी को नुकसान पहुंचाता है. ज्यादातर लोग इसे मसल्स गेन के लिए लेते हैं. प्रोटीन ऐसा पोषक तत्त्व है जो कार्बन, हाइड्रोजन, औक्सीजन एवं नाइट्रोजन के अणुओं से मिल कर बना होता है. प्रोटीन में 20 अमीनो ऐसिड होते हैं. हर इंसान के लिए प्रोटीन का सेवन करना जरूरी होता है क्योंकि यह शरीर में कई काम करता है. सामान्य रूप से प्रति किलोग्राम बौडी वेट पर 0.8 से 1 ग्राम प्रोटीन की जरूरत होती है. इस के अलावा, जो लोग फिजिकल रूप से अधिक ऐक्टिव रहते हैं वे 1 से 2 ग्राम प्रोटीन का भी सेवन कर सकते हैं.

प्रोटीन के अधिक सेवन से पुरुषों में टेस्टोस्टेरौन का लैवल कम हो जाता है और यह इनडाइरैक्ट रूप से कम स्पर्म काउंट का कारण बन सकता है. कम टेस्टोस्टेरौन लैवल हमेशा सीधे इन्फर्टिलिटी का कारण नहीं बनता.

लेकिन टेस्टोस्टेरौन का कम लैवल होने से स्पर्म प्रोडक्शन कम हो सकता है जो पुरुषों में बांझपन का कारण बन सकता है. टेस्टोस्टेरौन का कम लैवल कई बीमारियों और स्वास्थ्य जोखिमों का कारण बन सकता है. इस में मांसपेशियों की ताकत कम होना, डिमेंशिया, सैक्स ड्राइव कम होना, डायबिटीज, हार्ट संबंधित समस्या, अल्जाइमर आदि का कारण बन सकता है.

प्रोटीन महिला और पुरुष दोनों के लिए बहुत जरूरी होता है. सामान्य पुरुष को दिन में लगभग 56 ग्राम और महिलाओं को 46 ग्राम प्रोटीन का सेवन करना ही चाहिए. इस के अलावा अगर कोई अपने वजन के मुताबिक प्रोटीन लेना चाहता है तो वह प्रति किलोग्राम बौडी वेट के हिसाब से 0.8 से 1 ग्राम प्रोटीन का सेवन कर सकता है.

प्रोटीन की जरूरत उस की बौडी ऐक्टिविटीज के मुताबिक घटबढ़ सकती है. डाइरैक्ट प्रोटीन का सेवन खतरनाक हो जाता है. इस से किडनी, पाचन संबंधी समस्याएं, ब्लड में ऐसिड और मुंहासों की समस्या भी देखने को मिलती है.

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