यह अन्याय है

ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर बनाना और पत्नी से छिपा कर रखना अब और मुश्किल होता जा रहा है. वैसे ही हर जगह सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैंहर जगह आईडी पूछी जाती है. हर जगह भीड़ उमड़ी रहती है और ऊपर से प्यार के दुश्मन दिल्ली हाई कोर्ट के जज कहते हैं कि अगर पति पर शक है तो पत्नी किसी होटल का रिकौर्ड मांग सकती है.

एक ऐडल्ट्री के मामले में पत्नी ने पति की जयपुर यात्रा के दौरान एक होटल से गैस्टों का रिकौर्ड और सीसीटीवी फुटेज मांगी पर होटल ने गैस्ट की राइट टू प्राइवेसी’ के नाम पर देने से इनकार कर दिया. दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि हिंदू मैरिज ऐक्ट के अंतर्गत ऐडल्ट्री मैट्रीमोनियल औफैंस है और उस के लिए सुबूत जुटाने का हक पत्नी को है. उस ने आदेश दिया है कि पति और उस की प्रेमिका की कौल रिकौर्डहोटल स्टे रिकौर्डसीसीटीवी फुटेज दिलवाई जाए ताकि वह साबित कर सके कि पति ऐडल्ट्री का गुनहगार है.

यह अन्याय है. प्रेमियों को मिलने देने का हक नहीं छीना जा सकता चाहे प्रेमियों में से एक या दोनों पहले से विवाहित ही क्यों न हों और वे विवाह तोड़ना नहीं चाहते हों. घर की रसोई का उबाऊ खाना बाहर के ठेले वाले के खाने से भी घटिया लगने लगे तो भला खाने वाले का क्या दोष. बेकार में हाई कोर्ट पति के प्रेम को अपराध बता रहा है. उन्हें प्रेम से जीने का हक पति को देना चाहिए. हम तो कहेंगे कि पत्नी को फटकार लगे कि तुम में क्या कमी हो गई कि पति बाहर जा रहा है और इतना बड़ा रिस्क ले रहा है और मोटे पैसे दे रहा है.

घर के सुगंधित बिस्तर की जगह इंपर्सनल होटलों के कमरों में प्रेमिका से रोमांस आखिर कितने दिन भाएगा. घर का कुत्ता 2-4 दिन बाहर लगा कर लौट ही आएगा का सिद्धांत भूलना नहीं चाहिए.

पत्नी भी मूर्ख है कि ऐडल्ट्री साबित करने के चक्कर में अपनी पोल खोल रही है कि पति को उस में कोई आकर्षण नहीं दिख रहा है और वह किसी और के चक्कर में शहरशहर मारा फिर रहा है. यह बेहद शर्मनाक है. हर प्रेमी को सम्मानजनक जगह मिलनी ही चाहिए और पत्नी या पुलिस डंडा घुमाते घूमे यह बिलकुल इजाजत नहीं होनी चाहिए.

पतिपत्नी के वादों का क्यावादे तो तोड़ने के लिए होते हैं. प्रधानमंत्री कहते रहे हैं कि हरेक की जेब में 15 लाख आएंगे. आए क्यापंडितमौलवी कहते रहते हैं कि ईश्वरअल्लाह छप्पर फाड़ कर देंगे. दिया क्याअब उन के खिलाफ क्या कर सकते हैंकुछ नहीं नतो वादे तोड़ने वाले पति के पीछे क्यों लट्ठ ले कर फिरे हो?

भईजो किक छिपछिपा कर प्रेम करने में मिलती है वह शादीशुदा पत्नी से प्रेम में कहां मिलेगी. बुरा हो कानूनबाजों का जो वे पतियों का जीना हराम कर रहे हैं.               

जिम जाना कितना जरूरी

बाबू सुंदर सिंह इंस्टिट्यूट औफ टैक्नोलौजी ऐंड मैनेजमैंट की वाइस चेयरपर्सन 42 साल की रीना सिंह अपना पूरा कालेज संभालती हैं. उन के कालेज में 11 हजार से अधिक लड़केलड़कियां पढ़ते हैं. इन से रूबरू होना, इन की समस्याओं को सुनना और कालेज के स्टाफ के बीच काम करना पूरे दिन की व्यस्तता रहती थी.

ऐसे में वे अपनी डाइट और ऐक्सरसाइज का ध्यान नहीं रख पा रही थीं. 40 प्लस के बाद महिलाओं की सेहत में तमाम तरह के बदलाव होते हैं. ये सब मिल कर हैल्थ को बुरी तरह प्रभावित कर रहे थे. काम के बाद की थकान रहती थी. स्ट्रैस बढ़ रहा था. ऐक्सरसाइज करने का मन नहीं होता था.

इन परेशानियों को ले कर जब रीना अपने डाक्टर से बात करती तो वे भी ऐक्सरसाइज करने को कहते. रीना ने इस के बाद ‘ऊर्जा फिटनैस ऐंड डाइट स्टूडियो’ जौइन किया. कुछ दिनों के बाद उसे अपने अंदर पौजिटिव बदलाव दिखने लगे. अब वह कालेज और घर के काम के बाद भी पहले जैसे थकती नहीं है.

रीना कहती है, ‘‘मैं अपने जिम में मिलने वाले डाइट प्लान और ऐक्सरसाइज को पूरी तरह से मानती हूं. पहले से कहीं अधिक बेहतर अनुभव करती हूं. मैं स्वस्थ्य और फिट रहने के लिए ही जिम जाती हूं. आज महिलाओं को अधिक जिम्मेदारियां निभानी पड़ रही हैं. ऐसे में ऐक्सरसाइज बहुत जरूरी होती है.’’

  1. हैल्थ इज वैल्थ

पुरानी कहावत है ‘हैल्थ इज वैल्थ.’ यह कहावत बताती है कि हैल्थ यानी सेहत ही हमारी वैल्थ यानी संपत्ति होती है. आज के दौर में इस का महत्त्व और भी बढ़ गया है. अगर आप की सेहत अच्छी नहीं है तो कोई भी सुखसुविधा किसी काम की नहीं है. अच्छी सेहत के लिए फिटनैस जरूरी है. इस का महत्त्व बढ़ गया है.

फिटनैस का मतलब जीरो फीगर या सिक्स पैक ऐब्स होना जरूरी नहीं होता है. फिटनैस मतलब अच्छी सेहत होती है. बीमारियों से दूर रहना भी अच्छी सेहत में आता है. शारीरिक रूप से फिट होने के साथसाथ जरूरी होता है कि मैंटल हैल्थ भी ठीक रहे. स्वस्थ, निरोगी और ऊर्जावान बने रहना ही फिटनैस की निशानी होती है. इस के लिए रहनसहन, खानपान संतुलित होना चाहिए ताकि लंबे समय तक स्वस्थ रह सकें और अपनी जिंदगी के मजे ले सकें.

2. बेहतर होता है पर्सनल ट्रेनर

सेहतमंद शरीर के लिए 7-8 घंटे की नींद, अच्छा नाश्ता, लंच और डिनर जरूरी होता है. आज न हमें अच्छी नींद मिल रही है और न ही अच्छा भोजन. इस के साथ ही हमें फिटनैस का समय भी नहीं मिल पा रहा.

ऐसे में जिम, फिटनैस ट्रेनर और डाइटिशियन बेहद जरूरी हो जाता है. कई लोग अपना पर्सनल ट्रेनर भी रखते हैं. पहले यह काम फिल्म स्टार और बड़े लोग करते थे. अब साधारण लोग भी इस काम को करते हैं. 10 हजार से 25 हजार रुपए के बीच पर्सनल फिटनैस ट्रेनर मिलने लगे हैं. य लेडीज और जैंटस दोनों ही होते हैं.

लखनऊ ‘मेंस ऐंड वूमन जिम’ की डाइरैक्टर रानी श्रीवास्तव सोशल इन्फ्लूएंसर और मौडल भी हैं. इंस्ट्राग्राम पर उन के 3 मीलियन से अधिक फौलोअर हैं. वे फिटनैस इंस्ट्रक्टर भी हैं. वे कहती हैं, ‘‘पर्सनल फिटनैस ट्रेनर जरूरी होते हैं क्योंकि वे आप की जरूरत के हिसाब से आप को ऐक्सरसाइज बताते हैं, उस में मदद करते हैं. सामान्य फिटनैस ट्रेनर एकसाथ कई लोगों को बताता है तो इस कारण उस का रिजल्ट उतना बेहतर नहीं होता है. ऐसे में अगर आप अफोर्ड कर सकते हैं तो पर्सनल फिटनैस ट्रेनर बेहतर रहता है. इस में गोपनीयता भी बनी रहती है.’’

3. कैसे सैट करें अपना फिटनैस गोल

जब आप फिटनैस सैंटर या जिम जाने की सोचें तो सब से पहले यह विचार करें कि आप का गोल यानी लक्ष्य क्या है? आप वेट लौस के लिये जिम आए हैं या फिट रहने के लिए अथवा डाक्टर न किसी खास बीमारी से बचाव के लिए जिम जाने की सलाह दी है. इन सवालों के जवाबों से आप को अपना फिटनैस गोल तय करने में मदद मिलेगी. इस गोल के बारे में फिटनैस कोच, काउंसलर या जिम ट्रेनर जो भी है उसे खुल कर बताएं ताकि वह आप की जरूरत के हिसाब से आप के लिए फिटनैस प्लान बना सके.

‘ऊर्जा फिटनैस ऐंड डाइट स्टूडियो’ के डाइरैक्टर कपिल कनोडिया कहते हैं, ‘‘जब भी आप किसी फिटनैस सैंटर जा रहे हों वहां जो काउसंलर हो उसे यह जरूर बताएं कि आप के आने का उददेश्य क्या है? आप हैल्दी रहने के लिए आए हैं या वजन घटाना है अथवा किसी बीमारी के कारण आए हैं. इस से वह आप की जरूरत के हिसाब से ऐक्सरसाइज प्लान बना कर दे पाएगा. इस से आप को कम समय में बेहतर परिणाम मिल पाएगा, आप को अपना फिटनैस गोल तय करने में मदद मिलेगी.’’

फिटनैस कोई ऐसी चीज नहीं है कि तय समय में यह मिल जाए. यह एक नियमित दिनचर्या है. इसे नियमित करने के साथ ही अपनी डाइट का भी पूरा खयाल रखें. अगर फिटनैस के साथ डाइट का ध्यान नहीं रखेंगे तो आप को अपना गोल हासिल नहीं होगा. जब आप फिटनैस प्लान बना रहे होंगे तो तभी अपना फिटनैस गोल भी सामने रखें ताकि उस के अनुसार ही प्लान हो सके. कई बार लोग अपनी बौडी के खास हिस्सों को ले कर जिम आते हैं जैसे किसी के पैर पतले हैं तो वह उन्हें स्ट्रौंग बनाना चाहता है. किसी की ब्रैस्ट छोटी है तो वह उसे उभारना चाहती है. कोई ब्रैस्ट को सुडौल बनाना चाहती है. इसी तरह से हिप्स और कमर को ले कर भी बात होती है. अत: इस तरह की बातें पहले से तय कर लें ताकि उस पर ही फोकस किया जा सके.

4. फिटनैस गोल के हिसाब से डाइट प्लान

सोनिया मेहरोत्रा और उन के पति सन्नी मेहरोत्रा लखनऊ में 6 सालों से ‘सन्नी फिटनैस फैक्टरी’ चला रहे हैं. उन का कहना है, ‘‘अपने फिटनैस गोल को तब तक हासिल नहीं कर सकते हैं जब तक कि वर्कआउट और डाइट के बीच अच्छा संतुलन नहीं होगा. आप जो भी डाइट लेते हैं उस का फिटनैस की तुलना में ज्यादा प्रभाव आप के शरीर पर पड़ता है.

फिटनैस के लिए ऐक्सरसाइज के साथ हैल्दी डाइट से भी बौडी को मैंटेन रख सकते हैं. डाइट में अधिक से अधिक प्रोटीन शामिल करें. कैलोरीज बढ़ाने वाले कार्ब और वसा के सेवन से सावधान रहें.

शरीर में जो भी कैलोरी आती है वह आप के द्वारा कंज्यूम किए जाने वाले सभी फूड्स और ड्रिंक्स आइटम के जरीए ही आती है. अगर आप नियमित रूप से व्यायाम करते हैं और कैलोरी को कंट्रोल करने में कामयाब नहीं होते हैं तो आप के द्वारा कंज्यूम की गई कैलोरी को केवल एक हिस्सा ही बर्न होता है.

हैल्थ के लिए कैलोरी का ज्यादा से ज्यादा बर्न करने की जरूरत होती है. ऐसे में वर्कआउट और डाइट के बीच तालमेल कर के ही कैलोरी बर्न कर सकते हैं. वजन घटाने के मसले में 80 फीसदी काम डाइट से होता है.

5. बाहरी प्रोटीन से जुड़ी सावधानियां

जिम जाने वाले प्रोटीन का सेवन अधिक करते हैं. डाइट में प्रोटीन पाउडर को शामिल करते हैं. ज्यादा प्रोटीन बौडी को नुकसान पहुंचाता है. ज्यादातर लोग इसे मसल्स गेन के लिए लेते हैं. प्रोटीन ऐसा पोषक तत्त्व है जो कार्बन, हाइड्रोजन, औक्सीजन एवं नाइट्रोजन के अणुओं से मिल कर बना होता है. प्रोटीन में 20 अमीनो ऐसिड होते हैं. हर इंसान के लिए प्रोटीन का सेवन करना जरूरी होता है क्योंकि यह शरीर में कई काम करता है. सामान्य रूप से प्रति किलोग्राम बौडी वेट पर 0.8 से 1 ग्राम प्रोटीन की जरूरत होती है. इस के अलावा, जो लोग फिजिकल रूप से अधिक ऐक्टिव रहते हैं वे 1 से 2 ग्राम प्रोटीन का भी सेवन कर सकते हैं.

प्रोटीन के अधिक सेवन से पुरुषों में टेस्टोस्टेरौन का लैवल कम हो जाता है और यह इनडाइरैक्ट रूप से कम स्पर्म काउंट का कारण बन सकता है. कम टेस्टोस्टेरौन लैवल हमेशा सीधे इन्फर्टिलिटी का कारण नहीं बनता.

लेकिन टेस्टोस्टेरौन का कम लैवल होने से स्पर्म प्रोडक्शन कम हो सकता है जो पुरुषों में बांझपन का कारण बन सकता है. टेस्टोस्टेरौन का कम लैवल कई बीमारियों और स्वास्थ्य जोखिमों का कारण बन सकता है. इस में मांसपेशियों की ताकत कम होना, डिमेंशिया, सैक्स ड्राइव कम होना, डायबिटीज, हार्ट संबंधित समस्या, अल्जाइमर आदि का कारण बन सकता है.

प्रोटीन महिला और पुरुष दोनों के लिए बहुत जरूरी होता है. सामान्य पुरुष को दिन में लगभग 56 ग्राम और महिलाओं को 46 ग्राम प्रोटीन का सेवन करना ही चाहिए. इस के अलावा अगर कोई अपने वजन के मुताबिक प्रोटीन लेना चाहता है तो वह प्रति किलोग्राम बौडी वेट के हिसाब से 0.8 से 1 ग्राम प्रोटीन का सेवन कर सकता है.

प्रोटीन की जरूरत उस की बौडी ऐक्टिविटीज के मुताबिक घटबढ़ सकती है. डाइरैक्ट प्रोटीन का सेवन खतरनाक हो जाता है. इस से किडनी, पाचन संबंधी समस्याएं, ब्लड में ऐसिड और मुंहासों की समस्या भी देखने को मिलती है.

तो बच्चे मोबाइल नहीं किताबों से रखेंगे दोस्ती

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा हाल ही में जारी की गई एक रिपोर्ट में 5 साल से कम उम्र के बच्चों का स्क्रीन टाइम निर्धारित किया गया है. अब तक हम सोचते थे कि स्क्रीन के सामने ज्यादा समय बिताने से बच्चों की आंखें खराब होती हैं. लेकिन डब्ल्यूएचओ की इस रिपोर्ट के मुताबिक इस के परिणाम और भी ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं.

5 साल से कम उम्र के बच्चों का निर्धारित समय से ज्यादा स्क्रीन टाइम उन के शारीरिक और मानसिक विकास पर सीधा असर डालता है. इस रिपोर्ट के जरीए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हिदायत दी है कि पेरैंट्स अपने छोटे बच्चों को मोबाइल फोन, टीवी स्क्रीन, लैपटौप और अन्य इलैक्ट्रौनिक उपकरणों से जितना हो सके दूर रखें.

  1. विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन
  • 1  साल से कम उम्र के बच्चों के लिए जीरो स्क्रीन टाइम निर्धारित किया गया है यानी उन्हें बिलकुल स्क्रीन के सामने नहीं रखना है.
  • 1 से 2 साल के बच्चों के लिए दिनभर में स्क्रीन टाइम 1 घंटे से ज्यादा नहीं होना चाहिए. इस के साथ ही 3 घंटे फिजिकल ऐक्टिविटीज करने की सलाह दी गई है. इस उम्र में बच्चों को कहानी सुनाना उन के मानसिक विकास के लिए फायदेमंद साबित होगा. 3 से 4 साल तक के बच्चों के लिए भी दिनभर में ज्यादा से ज्यादा समय 1 घंटा निर्धारित किया गया है.
  • यह दायित्व पेरैंट्स का है कि वे बेबीज को मोबाइल और टीवी से दूर रखें, जबकि सभी पेरैंट्स इस बात की गंभीरता नहीं सम?ाते. पीयू रिसर्च सैंटर की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार 45त्न पेरैंट्स सोचते हैं कि 12 साल की उम्र से पहले बच्चों को फोन नहीं देना चाहिए जबकि 28त्न मातापिता का मानना है कि 15 साल के होने के बाद ही बच्चों को फोन मिलना चाहिए. वहीं 22त्न पेरैंट्स 11 साल से भी छोटे बच्चों को फोन देने के लिए तैयार हैं.
  • छोटे बच्चे को फोन देने के बाद आप को उस पर नजर रखनी चाहिए. उस के फोन की ऐप्स को मौनिटर करें और इस्तेमाल के समय को सीमित करें. उस के फोन में गलत वैबसाइट या सर्च को हटा दें. उसे इंटरनैट और सोशल मीडिया से होने वाले नुकसान और खतरों के बारे में बताएं.
  • जिंदगी में मोबाइल और टीवी की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता. मगर इन के प्रयोग को सीमित जरूर किया जा सकता है. इन का प्रयोग सीमित तब होगा जब हम उन्हें किताबों से जोड़ेंगे. किताबें न सिर्फ हमारा मनोरंजन करती हैं बल्कि हमें वास्तविक और गहन ज्ञान भी देती हैं. किताबों की दुनिया बहुत खूबसूरत होती है. एक बार इन का नशा चढ़ जाए फिर इंसान बहुत ऊंचा उठ सकता है. किताबें बच्चों को काबिल बनाती हैं और उन का ज्ञान बढ़ाती हैं.

2. स्टडी से साबित हुआ किताबों का असर

वैस्ट वर्जीनिया की मार्शल यूनिवर्सिटी की एक स्टडी में यह बात सामने आई है कि बच्चों के दिमाग पर किताबों का बचपन से ही सकारात्मक असर पड़ता है. स्टडी के अनुसार डेली बुक के कुछ पेज पढ़ कर सुनाने से 12 माह और उस से कम उम्र के बच्चों में बोलने की समझ विकसित होने लगती है. ‘अमेरिकन बोर्ड औफ फैमिली मैडिसिन’ के जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी में शामिल कुछ पेरैंट्स को 20 बुक्स का सैट दिया गया.

इन में विशेषरूप से भाषा के विकास और पिक्चर वाली बुक्स शामिल थीं. सभी पेरैंट्स ने हर 3 वीक में वैलनैस चैकअप के दौरान बच्चों की सीखने की क्षमता का टैस्ट करने की भी सहमति दी.

पेरैंट्स ने रोज अपने बच्चे को बुक के 2 पेज पढ़ कर सुनाए. इस के 1 साल बाद चौंकाने वाले परिणाम आए. ऐसे बच्चों की सीखने की क्षमता उन बच्चों के मुकाबले ज्यादा थी जिन्हें कोई भी बुक पढ़ कर नहीं सुनाई जाती थी.

स्टडी में यह भी पता चला कि रोज एक ही बुक पढ़ कर सुनाने का उतना फायदा नहीं होता जितना बारबार किताबें बदल कर सुनने से होता है. इस से बच्चे ज्यादा शब्द सीखते हैं. उन की ब्रेन पावर बढ़ने के साथ ही लैंग्वेज स्किल भी अच्छी होती है. इतना ही नहीं यह स्पैशल टाइम बच्चे और पेरैंट्स के बीच के रिश्ते को भी और मजबूत बनाता है.

अगर आप चाहती हैं कि आप का बेबी जल्दी और साफ बोले तो उस के बड़े होने का इंतजार न करें. जन्म के 2 सप्ताह बाद से ही उस की ट्रेनिंग शुरू कर दें. 2 सप्ताह के बाद से 9 माह का होने तक उसे डेली बुक्स के कुछ पन्ने पढ़ कर सुनाएं. आप को यह सुनने में भले ही अजीब लगे लेकिन इस से आप के बच्चे का भाषाई विकास जल्दी और मजबूत होगा. वह शब्द सम?ाने भी जल्दी लगेगा और बोलने भी.

3. समय की बरबादी

स्मार्टफोन के आने के बाद नएनए फीचर्स के साथ नए ऐप्स की भी बहार आ गई है. इन ऐप्स के माध्यम से बच्चों का पूरा दिन कब गुजर जाता है उन्हें पता ही नहीं चलता. व्हाट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, गेम्स जैसे बहुत सारे ऐप्प्स हैं जिन्हें बच्चे पसंद करते हैं. इन से बढ़ती नजदीकियां बच्चों को किताबों से दूर कर रही हैं. उन्हें किताबों में सिर गड़ा कर पढ़ने के बजाय रील्स देखना ज्यादा अच्छा लगता है.

दिनभर व्हाट्सऐप पर दोस्तों से गपशप चलती रहती है. बच्चे और युवा खुद भी रील्स बना कर फेमस होने की कोशिश में अपना समय बरबाद करते रहते हैं.

यहां तक कि अब वे व्हाट्सऐप पर नोट्स भी शेयर कर के पढ़ाई करने लगे हैं. एक दोस्त के नोट्स व्हाट्सऐप के माध्यम से पूरे ग्रुप में शेयर कर दिए जाते हैं, जिस से उन के लिए अब चलतेचलते भी पढ़ाई करने की सुविधा हो गई है. यही नहीं गूगल की मदद से कहीं भी कोई भी जानकारी आसानी से प्राप्त की जा सकती है.

इस से उन्हें किताबों को खोलने व उन्हें लाने ले जाने के झंझट से भी छुटकारा लगता है. पर याद रखें कि ये नोट्स टाइप किए जाते हैं जबकि परीक्षा में लिखना होता है. लिखने की यह गति धीरेधीरे कम हो रही है.

आज के युवाओं को भी यह लगता है कि मोबाइल से जुड़े रहने के कारण एकसाथ कई काम होते रहते हैं या वे अधिक स्मार्टली काम कर पाते हैं. साथ ही मोबाइल उन के स्टेटस सिंबल को बनाए रखता है. यही सोच उन्हें अब किताबें नहीं बल्कि मोबाइल फोन खरीदने को मजबूर करती है. वे भूल जाते हैं कि गूगल ज्ञान एकत्र करता नहीं बल्कि एकत्रित ज्ञान को केवल पुस्तकालय के रूप में रखता है. गूगल का ज्ञान अधूरा या भ्रामक हो सकता है.

4. शान की बात क्यों

मोबाइल फोन में आज ढेरों गेम्स डाउनलोड करने की सुविधा है. अब बच्चों को परीक्षाओं में अच्छे अंक लाने से ज्यादा अपने पसंदीदा गेम में विजय हासिल करने की उत्सुकता रहती है. यही वजह है कि अब ट्रेन, बस या मैट्रो में सफर के दौरान भी उन के हाथों में किताबें नहीं बल्कि मोबाइल होते हैं.

उन की आंखें मोबाइल की स्क्रीन पर और हाथ टाइप या स्क्राल करने में व्यस्त होते हैं जबकि कानों में लेटैस्ट स्टाइल के इयरफोन लगे होते हैं. वे साथ में गाने भी सुनते हैं.

आज के युवाओं में लेटेस्ट मोबाइल खरीदने की होड़ मची हुई है. युवाओं की यह सोच बन गई है कि जितना ज्यादा महंगा व लेटैस्ट फोन होगा उस में उतने ज्यादा फीचर्स होंगे. इस से उन का अपने गु्रप में नाम भी होगा. अपने गु्रप में छाने के लिए युवा जो भी नया फोन मार्केट में आता है उसे खरीदने की कोशिश करते हैं.

लेटैस्ट फोन खरीदने के चक्कर में वे अपनी किताबों तक से समझता कर लेते हैं. उन्हें लगता है कि किताबें तो किसी दोस्त से शेयर कर के काम चला लेंगे लेकिन मोबाइल नए ब्रैंड का होना चाहिए ताकि शान में कमी न आए. यही सोच उन्हें किताबों से दूर कर रही है.

ऐसे जोड़ें अपने बेबीज को किताबों से पेरैंट्स के लिए अपने छोटे बच्चों को किताबों से जोड़ना आज बहुत बड़ी चुनौती बन गई है. लेकिन अगर थोड़ी समझदारी से काम लिया जाए तो ऐसा करना कठिन नहीं है.

5. घर में पढ़ाई का माहौल बनाएं

आप अपने बच्चे को कितने ही अच्छे स्कूल में क्यों न पढ़ा रहे हों या फिर हर विषय की महंगी ट्यूशन क्यों न लगवाई हो आप घर में उसे किताबें पढ़ने के लिए पूरा समय दें. अगर आप टीवी खोल कर बैठे रहेंगे तो बच्चा पढ़ने में मन कैसे लगा पाएगा? आप उस की पढ़ाई के लिए अलग टाइम टेबल बनाएं. उसे कुछ अच्छी किताबें पढ़ कर सुनाएं.

छोटे बेबीज को खासकर कहानियां सुनने में बहुत मजा आता है. आप उन्हें कहानियों की और तसवीर वाली पत्रिकाएं ला कर दे सकते हैं.

6. किताबों का महत्त्व समझाएं

छोटे बच्चों को इस बात को समझने की कोशिश करें कि पुस्तकों के बिना सफलता प्राप्त करना मुश्किल है. पुस्तकें हमारी रचनात्मक शक्ति का विकास करने में मददगार होती हैं. हम जितना ज्यादा पुस्तकों से प्यार करेंगे हमें उन से उतनी ही ज्यादा जानकारी प्राप्त होगी.

किताबों के माध्यम से चीजें हमारे सामने बहुत स्पष्ट होती हैं. जब हम कुछ पढ़ते हैं तो फिर खुद चीजों की कल्पना कर पाते हैं. हमारी शब्दावली भी मजबूत बनती है और हमें चीजों को बेहतर ढंग से लिखने की सम?ा आती है.

किताबों में हर विषय को 1-1 कर के उदाहरणों की मदद से सम?ाया जाता है, जिस से वह बात मन में बैठ जाती है. अगर एक बार कौंसैप्ट क्लीयर हो जाए तो फिर वह बात हम कभी नहीं भूलते. इंटरनैट की मदद से आप को जानकारी तो मिल जाएगी लेकिन उस में इतना बिखराव होता है कि आप खुद उस में उल?ा कर रह जाएंगे जिस से बेहतर परिणाम नहीं मिल पाएंगे.

एक बार किताब खरीदने के बाद वह जिंदगीभर के लिए आप के पास रहती है, जिस कारण आप उसे कहीं भी ले जा सकते हैं.

7. बच्चों को गिफ्ट करें किताबें

हम घर में छोटे बच्चों के बर्थडे वगैरह पर महंगे गिफ्ट्स ही देते आए हैं. इन गिफ्ट्स में अकसर महंगे कपड़े, वीडियो गेम्स आदि शामिल होते हैं. लेकिन अगर हम उन्हें उन की पसंद की किताबें गिफ्ट करें तो इस से उन्हें जानकारी भी मिल पाएगी और वे इसे बड़े चाव से पढ़ेंगे भी.

मेरी स्किन बहुत औयली है, कृपया मुझे होममेड स्किन टोनर की जानकारी दें?

सवाल-

मेरी स्किन बहुत औयली है. गरमियों में और ज्यादा औयली हो जाती है, साथ ही फेस के पोर्स भी बड़े हो रहे हैं. कृपया मुझे होममेड स्किन टोनर की जानकारी दें?

जवाब-

टमाटर और शहद का बहुत अच्छा होममेड स्किन टोनर बनाया जा सकता है. ताजा टमाटरों का रस निकाल उस में उतनी ही मात्रा में शहद मिला लें. दोनों को मिक्स कर के गाढ़ा पेस्ट बना कर उसे चेहरे पर 20 मिनट तक लगाए रखें. 20 मिनट के बाद चेहरे को ताजा ठंडे पानी से अच्छी तरह धो लें. यह होममेड स्किन टोनर आप की औयली स्किन के लिए वरदान साबित होगा. यह होममेड स्किन टोनर त्वचा के कीलमुंहासों, झांइयों और झुर्रियों को कम करने में भी मदद करता है. सप्ताह में 2-3 बार इस्तेमाल करने पर कुछ ही दिनों में त्वचा काफी ग्लोइंग नजर आने लगती है.

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औयली (तैलीय) त्वचा वाली महिलाओं को कई तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता है. त्वचा पर मौजूद अधिक तेल चेहरे को चिपचिपा बना देता हे, जिस से चेहरे पर कीलमुंहासे होने का डर बना रहता है, लेकिन अब इस डर को घर में बनाए जाने वाले फेस पैक, जिन्हें घरेलू फेस पैक के नाम से भी जानते हैं, का इस्तेमाल कर दूर किया जा सकता है.

डा. दीपाली भारद्वाज, त्वचा रोग विशेषज्ञा बताती हैं कि तैलीय त्वचा से परेशान बहुत सी महिलाएं उन के पास आती हैं, जो विभिन्न क्रीमों व अन्य चिकित्सीय उपचार ले चुकी होती हैं, लेकिन डा. दीपाली के मुताबिक घरेलू उपचार से बेहतर कोई इलाज नहीं.

इन 5 घरेलू उपचारों का प्रयोग कर आप औयली त्वचा की परेशानियों से छुटकारा पा सकती हैं:

1 केला, शहद और लैमन फेस पैक: केला सेहत के लिए तो फायदेमंद होता ही है, साथ ही यह त्वचा से अतिरिक्त तेल निकालने में भी मदद करता है. केले के साथ शहद और नीबू भी कमाल के गुणों से भरपूर होते हैं. आप को अपने लिए फेस पैक बनाने के लिए बस इतना करना है कि एक केले को मैश कर उस में 1 चम्मच शहद और नीबू का रस मिला कर इस मिश्रण को चेहरे पर तब तक लगाए रखना है जब तक कि यह सूख न जाए. फिर चेहरे को कुनकुने पानी से धो लें.

सच्चाई: आखिर क्यों मां नहीं बनना चाहती थी सिमरन?

पड़ोस में आते ही अशोक दंपती ने 9 वर्षीय सपना को अपने 5 वर्षीय बेटे सचिन की दीदी बना दिया था. ‘‘तुम सचिन की बड़ी दीदी हो. इसलिए तुम्हीं इस की आसपास के बच्चों से दोस्ती कराना और स्कूल में भी इस का ध्यान रखा करना.’’ सपना को भी गोलमटोल सचिन अच्छा लगा था. उस की मम्मी तो यह कह कर कि गिरा देगी, छोटे भाई को गोद में भी नहीं उठाने देती थीं.

समय बीतता रहा. दोनों परिवारों में और बच्चे भी आ गए. मगर सपना और सचिन का स्नेह एकदूसरे के प्रति वैसा ही रहा. सचिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मणिपाल चला गया. सपना को अपने ही शहर में मैडिकल कालेज में दाखिला मिल गया था. फिर एक सहपाठी से शादी के बाद वह स्थानीय अस्पताल में काम करने लगी थी. हालांकि सचिन के पापा का वहां से तबादला हो चुका था.

फिर भी वह मौका मिलते ही सपना से मिलने आ जाता था. सऊदी अरब में नौकरी पर जाने के बाद भी उस ने फोन और ईमेल द्वारा संपर्क बनाए रखा. इसी बीच सपना और उस के पति सलिल को भी विदेश जाने का मौका मिल गया. जब वे लौट कर आए तो सचिन भी सऊदी अरब से लौट कर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहा था.

‘‘बहुत दिन लगा दिए लौटने में दीदी? मैं तो यहां इस आस से आया था कि यहां आप अपनी मिल जाएंगी. मम्मीपापा तो जबलपुर में ही बस गए हैं और आप भी यहां से चली गईं. इतने साल सऊदी अरब में अकेला रहा और फिर यहां भी कोई अपना नहीं. बेजार हो गया हूं अकेलेपन से,’’ सचिन ने शिकायत की. ‘‘कुंआरों की तो साथिन ही बेजारी है साले साहब,’’ सलिल हंसा, ‘‘ढलती जवानी में अकेलेपन का स्थायी इलाज शादी है.’’

‘‘सलिल का कहना ठीक है सचिन. तूने अब तक शादी क्यों नहीं की?’’ सपना ने पूछा.

‘‘सऊदी अरब में और फिर यहां अकेले रहते हुए शादी कैसे करता दीदी? खैर, अब आप आ गई हैं तो लगता है शादी हो ही जाएगी.’’

‘‘लगने वाली क्या बात है, शादी तो अब होनी ही चाहिए… और यहां अकेले का क्या मतलब हुआ? शादी जबलपुर में करवा कर यहां आ कर रिसैप्शन दे देता किसी होटल में.’’

‘‘जबलपुर वाले मेरी उम्र की वजह से न अपनी पसंद का रिश्ता ढूंढ़ पा रहे हैं और न ही मेरी पसंद को पसंद कर रहे हैं,’’ सचिन ने हताश स्वर में कहा, ‘‘अब आप समझा सको तो मम्मीपापा को समझाओ या फिर स्वयं ही बड़ी बहन की तरह यह जिम्मेदारी निभा दो.’’ ‘‘मगर चाचीचाचाजी को ऐतराज क्यों है? तेरी पसंद विजातीय या पहले से शादीशुदा बालबच्चों वाली है?’’ सपना ने पूछा.

‘‘नहीं दीदी, स्वजातीय और अविवाहित है और उसे भविष्य में भी संतान नहीं चाहिए. यही बात मम्मीपापा को मंजूर नहीं है.’’

‘‘मगर उसे संतान क्यों नहीं चाहिए और अभी तक वह अविवाहित क्यों है?’’ सपना ने शंकित स्वर में पूछा. ‘‘क्योंकि सिमरन इकलौती संतान है. उस ने पढ़ाई पूरी की ही थी कि पिता को कैंसर हो गया और फिर मां को लकवा. बहुत इलाज के बाद भी दोनों को ही बचा नहीं सकी. मेरे साथ ही पढ़ती थी मणिपाल में और अब काम भी करती है. मुझ से शादी तो करना चाहती है, लेकिन अपनी संतान न होने वाली शर्त के साथ.’’

‘‘मगर उस की यह शर्त या जिद क्यों है?’’

‘‘यह मैं ने नहीं पूछा न पूछूंगा. वह बताना तो चाहती थी, मगर मुझे उस के अतीत में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं तो उसे सुखद भविष्य देना चाहता हूं. उस ने मुझे बताया था कि मातापिता के इलाज के लिए पैसा कमाने के लिए उस ने बहुत मेहनत की, लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया, जिस के लिए कभी किसी से या स्वयं से लज्जित होना पड़े. शर्त की कोई अनैतिक वजह नहीं है और वैसे भी दीदी प्यार का यह मतलब यह तो नहीं है कि उस में आप की प्राइवेसी ही न रहे? मेरे बच्चे होने न होने से मम्मीपापा को क्या फर्क पड़ता है? जतिन और श्रेया ने बना तो दिया है उन्हें दादादादी और नानानानी. फूलफल तो रही है उन की वंशबेल,’’ फिर कुछ हिचकते हुए बोला, ‘‘और फिर गोद लेने या सैरोगेसी का विकल्प तो है ही.’’

‘‘इस विषय में बात की सिमरन से?’’ सलिल ने पूछा. ‘‘उसी ने यह सुझाव दिया था कि अगर घर वालों को तुम्हारा ही बच्चा चाहिए तो सैरोगेसी द्वारा दिलवा दो, मुझे ऐतराज नहीं होगा. इस के बावजूद मम्मीपापा नहीं मान रहे. आप कुछ करिए न,’’ सचिन ने कहा, ‘‘आप जानती हैं दीदी, प्यार अंधा होता है और खासकर बड़ी उम्र का प्यार पहला ही नहीं अंतिम भी होता है.’’

‘‘सिमरन का भी पहला प्यार ही है?’’ सपना ने पूछा. सचिन ने सहमति में सिर हिलाया, ‘‘हां दीदी, पसंद तो हम एकदूसरे को पहली नजर से ही करने लगे थे पर संयम और शालीनता से. सोचा था पढ़ाई खत्म करने के बाद सब को बताएंगे, लेकिन उस से पहले ही उस के पापा बीमार हो गए और सिमरन ने मुझ से संपर्क तक रखने से इनकार कर दिया. मगर यहां रहते हुए तो यह मुमकिन नहीं था. अत: मैं सऊदी अरब चला गया. एक दोस्त से सिमरन के मातापिता के न रहने की खबर सुन कर उसी की कंपनी में नौकरी लगने के बाद ही वापस आया हूं.’’ ‘‘ऐसी बात है तो फिर तो तुम्हारी मदद करनी ही होगी साले साहब. जब तक अपना नर्सिंगहोम नहीं खुलता तब तक तुम्हारे पास समय है सपना. उस समय का सदुपयोग तुम सचिन की शादी करवाने में करो,’’ सलिल ने कहा.

‘‘ठीक है, आज फोन पर बात करूंगी चाचीजी से और जरूरत पड़ी तो जबलपुर भी चली जाऊंगी, लेकिन उस से पहले सचिन मुझे सिमरन से तो मिलवा,’’ सपना ने कहा. ‘‘आज तो देर हो गई है, कल ले चलूंगा आप को उस के घर. मगर उस से पहले आप मम्मी से बात कर लेना,’’ कह कर सचिन चला गया. सपना ने अशोक दंपती को फोन किया. ‘‘कमाल है सपना, तुझे डाक्टर हो कर भी इस रिश्ते से ऐतराज नहीं है?  तुझे नहीं लगता ऐसी शर्त रखने वाली लड़की जरूर किसी मानसिक या शारीरिक रोग से ग्रस्त होगी?’’ चाची के इस प्रश्न से सपना सकते में आ गई.

‘‘हो सकता है चाची…कल मैं उस से मिल कर पता लगाने की कोशिश करती हूं,’’ उस ने खिसियाए स्वर में कह कर फोन रख दिया.

‘‘हम ने तो इस संभावना के बारे में सोचा ही नहीं था,’’ सब सुनने के बाद सलिल ने कहा. ‘‘अगर ऐसा कुछ है तो हम उस का इलाज करवा सकते हैं. आजकल कोई रोग असाध्य नहीं है, लेकिन अभी यह सब सचिन को मत बताना वरना अपने मम्मीपापा से और भी ज्यादा चिढ़ जाएगा.’’

‘‘उन का ऐतराज भी सही है सलिल, किसी व्याधि या पूर्वाग्रस्त लड़की से कौन अभिभावक अपने बेटे का विवाह करना चाहेगा? बगैर सचिन या सिमरन को कुछ बताए हमें बड़ी होशियारी से असलियत का पता लगाना होगा,’’ सपना ने कहा. ‘‘सिमरन के घर जाने के बजाय उस से पहले कहीं मिलना बेहतर रहेगा. ऐसा करो तुम कल लंचब्रेक में सचिन के औफिस चली जाओ. कह देना किसी काम से इधर आई थी, सोचा लंच तुम्हारे साथ कर लूं. वैसे तो वह स्वयं ही सिमरन को बुलाएगा और अगर न बुलाए तो तुम आग्रह कर के बुलवा लेना,’’ सलिल ने सुझाव दिया. अगले दिन सपना सचिन के औफिस में पहुंची ही थी कि सचिन लिफ्ट से एक लंबी, सांवली मगर आकर्षक युवती के साथ निकलता दिखाई दिया.

‘‘अरे दीदी, आप यहां? खैरियत तो है?’’ सचिन ने चौंक कर पूछा.

‘‘सब ठीक है, इस तरफ किसी काम से आई थी. अत: मिलने चली आई. कहीं जा रहे हो क्या?’’

‘‘सिमरन को लंच पर ले जा रहा था. शाम का प्रोग्राम बनाने के लिए…आप भी हमारे साथ लंच के लिए चलिए न दीदी,’’ सचिन बोला.

‘‘चलो, लेकिन किसी अच्छी जगह यानी जहां बैठ कर इतमीनान से बात कर सकें.’’

‘‘तब तो बराबर वाली बिल्डिंग की ‘अंगीठी’ का फैमिलीरूम ठीक रहेगा,’’ सिमरन बोली. चंद ही मिनट में वे बढि़या रेस्तरां पहुंच गए. ‘बहुत बढि़या आइडिया है यहां आने का सिमरन. पार्किंग और आनेजाने में व्यर्थ होने वाला समय बच गया,’’ सपना ने कहा. ‘‘सिमरन के सुझाव हमेशा बढि़या और सटीक होते हैं दीदी.’’

‘‘फिर तो इसे जल्दी से परिवार में लाना पड़ेगा सब का थिंक टैंक बनाने के लिए.’’ सचिन ने मुसकरा कर सिमरन की ओर देखा. सपना को लगा कि मुसकराहट के साथ ही सिमरन के चेहरे पर एक उदासी की लहर भी उभरी जिसे छिपाने के लिए उस ने बात बदल कर सपना से उस के विदेश प्रवास के बारे में पूछना शुरू कर दिया. ‘‘मेरा विदेश वृतांत तो खत्म हुआ, अब तुम अपने बारे में बताओ सिमरन.’’ ‘‘मेरे बारे में तो जो भी बताने लायक है वह सचिन ने बता ही दिया होगा दीदी. वैसे भी कुछ खास नहीं है बताने को. सचिन की सहपाठिन थी, अब सहकर्मी हूं और नेहरू नगर में रहती हूं.’’

‘‘अपने पापा के शौक से बनाए घर में जो लाख परेशानियां आने के बावजूद इस ने बेचा नहीं,’’ सचिन ने जोड़ा, ‘‘अकेली रहती है वहां.’’

‘‘डर नहीं लगता?’’

‘‘नहीं दीदी, डर तो अपना साथी है,’’ सिमरन हंसी. ‘‘आई सी…इस ने तेरे बचपन के नाम डरपोक को छोटा कर दिया है सचिन.’’ सिमरन खिलखिला कर हंस पड़ी, ‘‘नहीं दीदी, इस ने बताया ही नहीं कि इस का नाम डरपोक था. किस से डरता था यह दीदी?’’ ‘‘बताने की क्या जरूरत है जब रातदिन इस के साथ रहोगी तो अपनेआप ही पता चल जाएगा,’’ सपना हंसी. ‘‘रातदिन साथ रहने की संभावना तो बहुत कम है, मैं मम्मीजी की भावनाओं को आहत कर के सचिन से शादी नहीं कर सकती,’’ सिमरन की आंखों में उदासी, मगर स्वर में दृढ़ता थी. सपना ने घड़ी देखी फिर बोली, ‘‘अभी न तो समय है और न ही सही जगह जहां इस विषय पर बहस कर सकें. जब तक मेरा नर्सिंगहोम तैयार नहीं हो जाता, मैं तो फुरसत में ही हूं, तुम्हारे पास जब समय हो तो बताना. तब इतमीनान से इस विषय पर चर्चा करेंगे और कोई हल ढूंढ़ेंगे.’’

‘‘आज शाम को आप और जीजाजी चल रहे हैं न इस के घर?’’ सचिन ने पूछा.

‘‘अभी यहां से मैं नर्सिंगहोम जाऊंगी यह देखने कि काम कैसा चल रहा है, फिर घर जा कर दोबारा बाहर जाने की हिम्मत नहीं होगी और फिर आज मिल तो लिए ही हैं.’’

‘‘आप मिली हैं न, जीजाजी से भी तो मिलवाना है इसे,’’ सचिन बोला, ‘‘आप घर पर ही आराम करिए, मैं सिमरन को ले कर वहीं आ जाऊंगा.’’

‘‘इस से अच्छा और क्या होगा, जरूर आओ,’’ सपना मुसकराई, ‘‘खाना हमारे साथ ही खाना.’’ शाम को सचिन और सिमरन आ गए. सलिल की चुटकियों से शीघ्र ही वातावरण अनौपचारिक हो गया. जब किसी काम से सपना किचन में गई तो सचिन उस के पीछेपीछे आया.

‘‘आप ने मम्मी से बात की दीदी?’’

‘‘हां, हालचाल पूछ लिया सब का.’’

‘‘बस हालचाल ही पूछा? जो बात करनी थी वह नहीं की? आप को हो क्या गया है दीदी?’’ सचिन ने झल्ला कर पूछा. ‘‘तजरबा, सही समय पर सही बात करने का. सिमरन कहीं भागी नहीं जा रही है, शादी करेगी तो तेरे से ही. जहां इतने साल सब्र किया है थोड़ा और कर ले.’’ ‘‘इस के सिवा और कर भी क्या सकता हूं,’’ सचिन ने उसांस ले कर कहा. इस के बाद सपना ने सिमरन से और भी आत्मीयता से बातचीत शुरू कर दी. यह सुन कर कि सचिन औफिस के काम से मुंबई जा रहा है, सपना उस शाम सिमरन के घर चली गई. उस का घर बहुत ही सुंदर था. लगता था बनवाने वाले ने बहुत ही शौक से बनवाया था. ‘‘बहुत अच्छा किया तुम ने यह घर न बेच कर सिमरन. जाहिर है, शादी के बाद भी यहीं रहना चाहोगी. सचिन तैयार है इस के लिए?’’ ‘‘सचिन तो बगैर किसी शर्त के मेरी हर बात मानने को तैयार है, लेकिन मैं बगैर उस के मम्मीपापा की रजामंदी के शादी नहीं कर सकती. मांबाप से उन के बेटे को विमुख कभी नहीं करूंगी. प्रेम तो विवेकहीन और अव्यावहारिक होता है दीदी. उस के लिए सचिन को अपनों को नहीं छोड़ने दूंगी.’’

‘‘यह तो बहुत ही अच्छी बात है सिमरन. चाचाचाचीजी यानी सचिन के मम्मीपापा भी बहुत अच्छे हैं. अगर उन्हें ठीक से समझाया जाए यानी तुम्हारी शर्त का कारण बताया जाए तो वे भी सहर्ष मान जाएंगे. लेकिन सचिन ने उन्हें कारण बताया ही नहीं है.’’ ‘‘बताता तो तब न जब उसे खुद मालूम होता. मैं ने उसे कई बार बताने की कोशिश की, लेकिन वह सुनना ही नहीं चाहता. कहता है कि जब मेरे साथ हो तो भविष्य के सुनहरे सपने देखो, अतीत की बात मत करो. मुझे भी अतीत याद रखने का कोई शौक नहीं है दीदी, मगर अतीत से या जीवन से जुड़े कुछ तथ्य ऐसे भी होते हैं जिन्हें चाह कर भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, उन के साथ जीना मजबूरी होती है.’’ ‘‘अगर चाहो तो उस मजबूरी को मुझ से बांट सकती हो सिमरन,’’ सपना ने धीरे से कहा. ‘‘मैं भी यही सोच रही थी दीदी,’’ सिमरन ने जैसे राहत की सांस ली, ‘‘अकसर देर से जाने और बारबार छुट्टी लेने के कारण न नौकरी पर ध्यान दे पा रही थी न पापा के इलाज पर, अत: मैं नौकरी छोड़ कर पापा को इलाज के लिए मुंबई ले गई थी. वहां पैसा कमाने के लिए वैक्यूम क्लीनर बेचने से ले कर अस्पताल की कैंटीन, साफसफाई और बेबी सिटिंग तक के सभी काम लिए. फिर मम्मीपापा के ऐतराज के बावजूद पैसा कमाने के लिए 2 बार सैरोगेट मदर बनी. तब तो मैं ने एक मशीन की भांति बच्चों को जन्म दे कर पैसे देने वालों को पकड़ा दिया था, लेकिन अब सोचती हूं कि जब मेरे अपने बच्चे होंगे तो उन्हें पालते हुए मुझे जरूर उन बच्चों की याद आ सकती है, जिन्हें मैं ने अजनबियों पर छोड़ दिया था. हो सकता है कि विचलित या व्यथित भी हो जाऊं और ऐसा होना सचिन और उस के बच्चे के प्रति अन्याय होगा. अत: इस से बेहतर है कि यह स्थिति ही न आने दूं यानी बच्चा ही पैदा न करूं. वैसे भी मेरी उम्र अब इस के उपयुक्त नहीं है. आप चाहें तो यह सब सचिन और उस के परिवार को बता सकती हैं. उन की कोई भी प्रतिक्रिया मुझे स्वीकार होगी.’’

‘‘ठीक है सिमरन, मैं मौका देख कर सब से बात करूंगी,’’ सपना ने सिमरन को आश्वासन दिया. सिमरन ने जो कहा था उसे नकारा नहीं जा सकता था. उस की भावनाओं का खयाल रखना जरूरी था. सचिन के साथ तो खैर कोई समस्या नहीं थी, उसे तो सिमरन हर हाल में ही स्वीकार थी, लेकिन उस के घर वालों से आज की सचाई यानी सैरोगेट मदर बन चुकी बहू को स्वीकार करवाना आसान नहीं था. उन लोगों को तो सिमरन की बड़ी उम्र बच्चे पैदा करने के उपयुक्त नहीं है कि दलील दे कर समझाना होगा. सचिन के प्यार के लिए इतने से कपट का सहारा लेना तो बनता ही है.

एक डाली के फूल: भाग 3-किसके आने से बदली हमशक्ल ज्योति और नलिनी की जिंदगी?

जब प्रथम प्रसव में कन्या हुई तो विपुला पति की आंखों में उतरे क्रोध व शोक को देख कांप उठी थी. वकील साहब उपस्थित प्रियजनों के सम्मुख तो कुछ न बोले, किंतु एकांत पाते ही दांत पीस विपुला को यह जताना न भूले, ‘लड़की ही पैदा करनी थी…?’

विपुला के नेत्रों में आंसू डबडबा आए. वह चुपचाप मुंह दूसरी तरफ कर सिसकने लगी.
दूसरी बार प्रसव कक्ष में सरबती भी विपुला के साथ थी. नवजात शिशुओं के रुदन के बीच ही सरबती का चेहरा लटक गया था. उस का मुख देख ही विपुला का चेहरा स्याह पड़ गया था. परिणाम तो सरबती के चेहरे पर परिलक्षित था किंतु फिर भी उस ने प्रश्नभरी निगाह सरबती पर डाली थी.
सरबती अटकअटक कर बोली थी, ‘मालकिन, अब के तो दोनों जुड़वां बेटियां हैं.’

विपुला पर तो मानो वज्र गिर पड़ा. वह उस की ओर जीवनदान मांगती सी इतना भर कह पाई, ‘सरबती, कुछ सोच, वे बरदाश्त न कर पाएंगे,’ और वह बेहोश हो गई.
सरबती विपुला के दर्द और घाव को समझती थी, पर अनपढ़, गरीब किस बल पर उस का साहस बंधाती. उस को जो सूझा, उस ने किया.

विपुला को घंटेभर बाद होश आया तो वकील साहब को तनिक संतुष्ट व प्रसन्न देख फटी आंखों से चारों तरफ निहारने लगी. कहीं स्वप्न तो नहीं देख रही या इतने वर्षों तक वह अपने पति को ही भलीभांति न जान सकी? इतने में वकील साहब तन कर बोले, ‘देखना, बेटे को बैरिस्टर बनाऊंगा, बैरिस्टर.’

वह चौंकी, मानो स्वप्न की दुनिया से वास्तविकता में आ गई हो. वकील साहब ने बेटे को उस की बगल में लिटा दिया था. विपुला के कांपते हाथ अनायास ही बच्चे के शिश्न पर चले गए. वह मूक ठगी सी कृतज्ञ सरबती की ओर ताकने लगी.

थोड़ी देर बाद वकील साहब घर चले गए थे. विपुला ने दोनों हाथों से कंगन उतारते सरबती को इशारे से पास बुला पहना दिए और फफक कर रो पड़ी थी.

सरबती ने धीरे से बताया था, ‘चिंता न करो बहूजी, एक डाक्टर के बेटा हुआ है, उस से बदल लिया है.’
इस के बाद बड़ी देर तक सरबती खुसुरफुसुर कर बताती रही अपनी वीरगाथा कि कैसे नर्स को लोभ दिखा कर उसे यह सफलता मिली. विपुला सुन तो रही थी पर पीड़ा भी उसे हुई इस कृत्य पर. फिर भी सरबती की कृतज्ञ थी, जिस ने अपने गले में पड़ी सोने की चेन तुरंत नर्स के हाथ में रख दी थी.

अचानक विपुला को वकील साहब ने जोरों से झकझोरा तो उस की तंद्रा टूटी. वह हड़बड़ा कर खड़ी हो गई. वे बोले, ‘‘तुम अभी तक यहीं मुंह लटकाए बैठी हो?’’

विपुला अपना सिर पकड़ बिना कुछ कहे वहां से चल दी. नलिनी ने पूछा, ‘‘मां, सिर में दर्द है?’’

दीपक ने भी कहा, ‘‘मैं सिर दबा दूं?’’

विपुला इनकार में सिर हिलाती एक लंबी सांस खींच बोली, ‘‘मुझे अकेला छोड़ दो. कोई बात मत करो.’’
‘‘पर मां, खाना तो खा लो,’’ दीपक ने कहा तो विपुला शून्य में देखती हुई बोली, ‘‘भूख नहीं है.’’
इतना कह विपुला कमरे में सोने चली गई. नींद उसे कहां आनी थी. वह आंखों में आंसू भरे करवटें लेती रही. कभी अपनी कायरता पर रोती, कभी अपराधबोध त्रस्त कर देता, ‘हाय, क्यों इतना भय समा गया था? किसी की कोख से बेटा छीन लेने का जो अपराध किया, उस से तिलतिल जलती ही रही हूं, कोई सुख नहीं पाया. इतने वर्षों तक घुटघुट कर जीती रही. पर अपने को कभी माफ नहीं कर पाई. अपनी ही नजर में जब व्यक्ति गिर जाए तो उस का जीनामरना एक समान होता है.’

अगले दिन विपुला नलिनी से ज्योति के घर का पता पूछ चली गई. उसे देखते ही डा. प्रशांत व्यंग्य से मुसकराए और बोले, ‘‘मैं जानता था, आज आप में से कोई या दोनों पतिपत्नी आओगे जरूर. इस कारण ही मैं क्लीनिक बंद कर घर में बैठा हूं,’’ फिर लंबी सांस छोड़ कर गंभीरता ओढ़ ली, ‘‘कहिए, मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं?’’

विपुला सिर झुकाए अपराधी की भांति कुछ क्षण सूखे होंठ चाटती रही. सहसा फूटफूट कर रो पड़ी. रुदन थमा तो बोली, ‘‘डाक्टर साहब, मैं आप की अपराधिन हूं, मुझे दंड मिलना ही चाहिए. मैं ने अपने स्वार्थ के कारण आप का बेटा छीना. पर विश्वास कीजिए, यह कदम मैं ने बेटीबेटे के भेद के कारण नहीं बल्कि अपने पति के भय से उठाया था. फिर भी कुछ भी हो, मैं ने यह अपराध किया तो अपने स्वार्थ के लिए ही न. इसलिए सजा मिलनी ही चाहिए.

‘‘यह सच है कि ज्योति मेरी ही बेटी है और दीपक आप का बेटा, मैं स्वीकार करती हूं. सजा भोगने को भी तैयार हूं,’’ उस ने अंतिम वाक्य सजल नेत्र ऊपर उठा सीधे उन की आंखों में झांकते हुए कहा.
डा. प्रशांत फिर भी चुप रहे.
वह आगे बोली, ‘‘आप अपना दीपक दावा कर के ले लीजिए.’’
‘‘क्यों, आज पति का भय नहीं रहा?’’
‘‘भय आज भी है, परंतु उस को सहने की ताकत मुझ में पैदा हो गई है,’’ जोर दे कर निर्भीकता से बोली विपुला.

ज्योति, जिस ने सबकुछ सुनसमझ लिया था, कमरे की ओट से उन के सामने आते हुए बोली, ‘‘पिताजी, मैं ने आप को बहुत दुख दिया है,’’ इतना कह उन के पैरों में गिर पड़ी. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे.
डा. प्रशांत अचकचा गए. इस स्थिति की तो उन्होंने कल्पना भी न की थी. उन्होंने उसे उठाते हुए ताज्जुब से पूछा, ‘‘तू कब कालेज से आई? छि… बेटियां पांव नहीं पड़तीं. तू रो क्यों रही है? पगली, तेरे बिना तो मेरा जीवन ही व्यर्थ है,’’ उसे दुलारते, समझाते बोले, ‘‘तू तो मेरे शरीर का हिस्सा है, ज्योति, मैं दीपक ले कर क्या करूंगा, जब ज्योति ही न होगी. तू तो सचमुच मेरी ज्योति है.’’

यह कह कर उन्होंने उस के सिर पर स्नेह से चपत लगाई और कहा, ‘‘तू दुखी मत हो, हम यह शहर ही छोड़ देंगे. मैं जल्लाद नहीं हूं, जो तुझे ऐसी जगह झोंक दूं जहां बेटियों के जन्म का भय समाया हो. तू तो मेरा बेटा और बेटी दोनों ही है.’’

‘‘नहीं, पिताजी, मुझे पता है, आप मुझे मानसिक रूप से असुरक्षित नहीं देखना चाहते हैं. पर मैं इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती हूं. मैं ने आज तक बहुत लाड़प्यार और दुलार आप से पाया है. यद्यपि मैं आप को खोना नहीं चाहती, पर आप को बेटे से वंचित रखना…’’
‘‘चुप,’’ जोर से बीच में ही उन्होंने टोका, ‘‘बहुत बोलने लगी है.’’

विपुला आगे बढ़ कर ज्योति से आंखें मिलाने का साहस न कर सकी, गले लगाना तो दूर रहा. वह बोली, ‘‘डाक्टर साहब, मैं ने आप जैसे महान व्यक्ति के साथ धोखा किया, मुझे सजा मिलनी ही चाहिए. मैं दंड की ही अधिकारिणी हूं,’’ इतना कह वह फिर रोने लगी.

डा. प्रशांत को विपुला पर क्रोध तो आ रहा था पर वे उसे सजा भी नहीं देना चाह रहे थे. कुछ चिढ़ कर बोले, ‘‘जानती हैं, आप को भय तब क्यों लग रहा था क्योंकि आप मोह में फंसी थीं और आज अपराधबोध से शायद आप की अपनी देह से ही ममता छूट गई है, इसलिए भयभीत नहीं हैं…’’
‘‘डा. साहब, सही कहा आप ने. आज मैं ने जान लिया है, जो मनुष्य भयवश झूठा आचरण करता है वह पशु से भी बदतर है.’’

डा. प्रशांत के चेहरे की कठोरता कुछ कम हुई. उन्होंने सोचा, सजा के बजाय क्षमा अधिक वीरतापूर्ण कार्य है. क्षमा जो वीर पुरुष का भूषण है. अपने कुटुंब और प्रियजन के लिए तो सभी त्याग करते हैं पर जो दूसरों के लिए करे वही प्रशंसनीय है. फिर अपकार का बदला अपकार नहीं बल्कि उपकार ही हो सकता है. जिस पौधे को उन्होंने सींच कर बड़ा किया ही नहीं, उस से मोह उत्पन्न होगा भी कैसे और न ही वह उन्हें अपना पाएगा.

विपुला दोनों हाथ जोड़ बड़ी निर्भयता से परिणाम जानने के लिए उन के आगे खड़ी थी. डा. प्रशांत बड़ी दृढ़ता से बोले, ‘‘आप ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया, मैं इसी से प्रसन्न हूं. अब आप जा सकती हैं. और हां, जो पहेली आप ने आज तक अपने तक सीमित रखी है, आगे भी रख सकती हैं. मेरी ज्योति मुझे प्राणों से प्यारी है. शायद आप मेरा अभिप्राय समझ गई होंगी.’’

विपुला आश्चर्य से कुछ पल उन की ओर ताकती रही, फिर उन के चरणों में झुक गई, ‘‘डा. साहब, आप सचमुच महान हैं.’’

खूबसूरत एक्ट्रेस रकुल प्रीत सिंह को सुपर पॉवर मिलने पर क्या बदलना चाहती है, पढ़े इंटरव्यू

फिल्म ‘यारियां’ से चर्चा में आने वाली मॉडल और अभिनेत्री रकुल प्रीत सिंह दिल्ली की है. उसने अपने कैरियर की शुरुआत मॉडलिंग से की है. हिंदी के अलावा उसने तमिल, तेलगू, कन्नड़ फिल्मों में भी काम किया है. माध्यम चाहे कोई भी हो, रकुल को किसी प्रकार की समस्या नहीं होती. उसे अच्छी और चुनौतीपूर्ण कहानियां प्रेरित करती है.

छरहरी काया और इंडस्ट्री की खूबसूरत रकुल को हर तरह की फिल्मों में काम करना पसंद है. उसे एडवेंचर और समुद्री तट अच्छा लगता है. कॉलेज के दिनों में वह गोल्फ प्लेयर भी रह चुकी है और फिटनेस को जीवन में अधिक महत्व देती है. गृहशोभा के लिए उन्होंने खास बात की पेश है कुछ खास अंश.

 

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सोशल फिल्में करना जरुरी

रकुल ने अब तक कई सुपरहिट फिल्में की है, जिसमे फिल्म ‘छतरीवाली’ काफी लोकप्रिय रही, क्योंकि ये सोशल मेसेज देती है. रकुल का कहना है कि इस फिल्म को करने का मकसद यही था कि लोग सेक्स एजुकेशन के बारें में खुलकर बात करें. हालाँकि सरकार ने इसे शिक्षा में अनिवार्य बताया है और पाठ में भी है, लेकिन बच्चे और अध्यापक इस पर आज भी बात करने से कतराते है.

लोग अपने दिल की बात कर सकते है, पेट से जुडी बिमारियों के बारें में बात कर सकते है, लेकिन रिप्रोडक्शन के बारें में बात क्यों नहीं कर सकते? इन सब बातों को नार्मल तरीके से लेना जरुरी है, क्योंकि ये एक बॉडी पार्ट है, इसी बात पर ये फिल्म फोकस करती है. इस फिल्म में मैंने सतीश कौशिक के साथ काम किया है, जो एक अच्छा अनुभव रहा, वे एक अनुभवी, मेहनती और खुश रहने वाले इंसान थे. उनको खो देना इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी लॉस है.

 

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इसके अलावा रकुल बेटी बचाओं बेटी पढाओं की ब्रांड एम्बेसेडर भी रही. इसका उद्देश्य छोटे शहरों और गावं में जाकर काम करना है. तेलंगाना के नालगोडा में जाकर रकुल इस पर काम किया. अभी उनकी रोमांटिक थ्रिलर फिल्म ‘आई लव यू’ जियो सिनेमा पर रिलीज हो चुकी है, जिसमे उन्होंने शोर्ट हेयर के साथ एक अलग लुक दिया है.

मिली प्रेरणा

रकुल कहती है कि बचपन मेरा खेलकूद में गुजरा, क्योंकि मैं एक फौजी की बेटी हूँ. 10वीं कक्षा के बाद मैंने फिल्में देखनी शुरू की थी, लेकिन मेरी माँ रिनी सिंह चाहती थी कि मैं अभिनय के क्षेत्र में कुछ करूँ, क्योंकि मेरी कद काठी अच्छी थी. उन्होंने मुझे मिस इंडिया में भी भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया था, लेकिन तब मुझे जाना नहीं था. 12वीं के बाद मुझे लगने लगा कि मैं मॉडलिंग करूँ और मैंने पढ़ाई ख़त्म करने के बाद मॉडलिंग शुरू की, साथ में फिल्मों के लिए भी ऑडिशन देती रही. इस तरह इस प्रोफेशन में आ गयी.

मिला ब्रेक

रकुल आगे कहती है कि जब मॉडलिंग शुरू की थी तो मुझे साउथ की इंडस्ट्री के बारें में कोई जानकारी नहीं थी. मैंने पहली बार तो उन्हें मना भी कर दिया था, लेकिन बाद में फिल्म समझ कर अभिनय किया. इससे मुझे कुछ पैसे भी मिले. मैंने अपने पैसे से कार भी खरीद ली और अभिनय के बारें में बहुत कुछ सीखने को भी मिला. अभिनय में मुझे मज़ा भी आने लगा. मेरे लिए माध्यम कोई बड़ी बात नहीं है. काम करते रहना जरुरी है. ‘यारियां’ मेरी पहली हिंदी फिल्म सफल थी, जिससे काम मिलना थोडा आसान हुआ था.

नहीं हुई हताश

इंडस्ट्री में कभी रकुल को किसी गलत परिस्थिति का सामना नहीं करना पड़ा, क्योंकि उन्होंने कभी भी काम के लिए हताश नहीं थी. वह कहती है कि अगर आप हताश है और जब ये बात किसी को पता चलता है तो लोग उसका फायदा उठाने की कोशिश करते है. मुझे जो काम मिला उसे करती गयी. इसके अलावा मेरे पास एक अच्छी फॅमिली सपोर्ट है, जिससे ‘डू ऑर डाई’ वाली परिस्थिति कभी भी नहीं आई. मैं जानती हूँ कि ऐसे कई कलाकार है, जो काम की तलाश में यहाँ आ जाते है और संघर्ष करते है, पर अच्छा काम नहीं मिल पाता.

केवल ग्लैमर इंडस्ट्री ही नहीं, दुनिया में हर कोई लाभ उठाने के लिए बैठा है, ऐसे में आप उन्हें कितना उसे लेने देते है, ये आप पर निर्भर करता है. मेरी जर्नी अच्छी चल रही है, जितना मिला उससे संतुष्ट हूँ, लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है. अच्छे काम के लिए हंगरी हूँ. मैं इंडस्ट्री में जब आई थी, तो किसी को नहीं जानती थी, ऐसे में अपनी बलबूते पर आना, दक्षिण की फिल्मों और यहां की फिल्मों में बड़े- बड़े कलाकारों के साथ काम करना, इसे जब मैं देखती हूँ तो लगता है कि मैंने वाकई एक अच्छी जर्नी अबतक तय की है.

 

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इंटरेस्टिंग है कहानी

रकुलप्रीत सिंह आगे कहती है कि ‘आई लव यू’ की स्क्रिप्ट बहुत अच्छी थी. मुझे सत्या का ये चरित्र इंटरेस्टिंग और स्ट्रोंग लगा. ये एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो प्यारी है, फॅमिली वुमन है, काम भी अच्छा करती है, लेकिन जब मुसीबत आती है, तो कैसे कंट्रोल करती है, ये सारी बातें मेरे लिए नई और चुनौतीपूर्ण थी. ये फिल्म डर और गुप्त जैसी है, लेकिन अंतर यह है कि इस फिल्म में मेरी भूमिका सत्या लाचार नहीं, स्ट्रोंग है.

फिल्म शुरू करने के दो हफ्ते पहले मैंने कई वर्कशॉप किये है, जिसमे कलाकार के साथ निर्देशक भी थे. ये बहुत ही इनोवेटिव सेशन था, जहां चरित्र को पूरी तरह से समझने में कामयाबी मिली. फिल्म में एक्टिंग से अधिक रियल इमोशन को प्रयोग करना था. इसके अलावा मैंने अंडरवाटर ट्रेनिंग भी ली है. एक दृश्य में ढाई मिनट पानी के अंदर रहना पड़ा था.

इसे एक स्क्यूबा इंस्ट्रक्टर ने सिखाई थी. ये अलग चीजे करना ही मेरे लिए चुनौती होती है. आगे रकुल एक कम्पलीट लव स्टोरी करने की ड्रीम रखती है. वह कहती है कि मैंने अभी तक रोमांटिक लव स्टोरी नहीं की है. इसके अलावा मुझे हिस्टोरिकल फिल्म करने की इच्छा है, जिसमे हिस्टोरिकल ऑउटफिट पहननी पड़े. मैं एक डायरेक्टर की एक्टर हूँ और उनके विज़न के हिसाब से फिल्में करती हूँ, क्योंकि एक निर्देशक के सामने उसकी पूरी फिल्म होती है. कुछ भी अलग करने की इच्छा होने पर निर्देशक के साथ बैठकर चर्चा कर फिर उसे अमल करती हूँ.

खूबसूरत अभिनेत्री होने का फायदा

इंडस्ट्री की खुबसूरत अभिनेत्री होने का कोई फायदा या नुकसान के बारें में पूछने पर रकुल हंसती हुई कहती है कि कोई सुंदर होने पर न तो नुकसान होता है और न ही कुछ फायदा. असल में काम के प्रति डेडीकेशन, हार्ड वर्क, एक्टिंग स्किल्स, आदि ही मुख्य होता है, क्योंकि मैं जानती हूँ कि मुझसे भी अधिक सुंदर और प्रतिभावान कलाकार अवश्य इंडस्ट्री में होंगे, लेकिन मुझसे अधिक हार्ड वर्क करने वाला कोई नहीं होगा. ये सब किसी को भी आगे बढ़ने में हेल्प करता है. आगे हिंदी और तमिल में कई फिल्में आने वाली है और कुछ की शूटिंग शुरू होने वाली है.

मिला पिता का सहयोग

रकुल का कहना है कि मेरे परिवार का मेरे काम के प्रति बहुत सहयोग रहा है. पिता कर्नल के जे सिंह के साथ बिताया मेरे कई पल है, खासकर जब मैं घर से दूर रहती हूँ तो वे पल काफी याद आते है. आज जो मैं हूँ, मेरी कॉन्फिडेंस, मेरी वैल्यू सिस्टम, अनुसाशन सब मेरे पिता की वजह से मेरे अंदर आये है. मैंने 18 साल की उम्र में अभिनय शुरू किया था, उस समय पिता ने मुझे किसी से बात करना तक सिखाया है .

मेरे अकाउंट मेरे पिता ही हैंडल करते है. किसी भी स्ट्रेस को मैं उनसे डिस्कस करती हूं, वे मेरे लिए एक स्ट्रोंग पिलर है. बचपन मैं बहुत अच्छी बच्ची थी, किसी प्रकार की शैतानी करने पर भाई पर डाल देती थी. उसे ही डांट पड़ती थी. मेरा सभी यूथ के लिए सन्देश है कि जब हम छोटे होते है, तो लगता है कि हमारे पेरेंट्स हमें नहीं समझते, लेकिन जब बड़े होते है, तो समझ में आती है कि उनसे बेहतर हमें कोई भी समझ नहीं सकता.

आज के यूथ को इसकी समझ होना जरुरी है. खासकर इंडियन पेरेंट्स की पूरी जिंदगी बच्चों की परवरिश में लग जाती है, इसलिए उनकी दी हुई सीख को जीवन में उतारना है और अपने पेरेंट्स की देखभाल जितना हो सकें, दिल से करें, उन्हें कभी दुःख न दें. करती हूँ खुद की देखभाल वह आगे कहती है कि मानसून स्किन के लिए सबसे सुरक्षित समय होता है, विंटर और समर में स्किन की समस्या सबसे अधिक होती है.

मैं अधिक पानी पीती हूँ, वर्कआउट करती हूँ, ताकि पसीने से शारीर की टोक्सिन्स बाहर निकलती रहे और ये मेरे रोज का रूटीन रहता है, जिसमे समय से खाना, सोना, स्किन को हमेशा मोयास्चराइज करना, मेकअप उतार कर सोना और सबसे जरुरी होता है, अंदर से खुश रहना. इससे किस भी सीजन में स्किन हमेशा ग्लो करती है. अंत में वह मुस्कुराती हुई कहती है कि सुपर पॉवर मिलने पर मैं पूरे देश से क्राइम और नकारात्मकता को हटाना चाहती हूँ.

Anupama: डिंपल की अक्ल ठिकाने लगाएगी बरखा तो अनुज से माफी मांगेगी माया

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ लगातर नंबर वन पर छाया हुआ है. शो के मेकर्स ‘अनुपमा’ को दिलचस्प बनाने के लिए रोज नए-नए ट्विस्ट और टर्न्स लेकर आते रहते है. बीते दिन ‘अनुपमा’ में देखने को मिला कि अनुपमा बा को लेकर शाह हाउस लौटती है. वह डिंपल और समर को फटकार लगाती है, साथ ही अलग घर लेकर वहां रहने के लिए भी कहती है. वहीं दूसरी ओर माया अनुज को इंप्रेस करने की कोशिश करती है. शो के ट्विस्ट और टर्न्स यहीं खत्म नहीं होती.

बरखा को ठुकराते ही डिंपल ने बा के आगे भीख मंगी

‘अनुपमा’ सीरियल के अपकमिंग एपिसोड में देखने को मिलेगा कि अनुपमा की बात सुनने के बाद डिंपल बरखा को मैसेज करती है और कपाड़िया हाउस में रहने की बात कहती है. हांलाकि बरखा उसको सीधा मना कर देती है और कहती है शाह हाउस में रहने की सलाह देती है. बरखा का मैसेज पढ़कर डिंपल अपना रुप दिखाती है और बा के सामने गिड़गिड़ाना शुरू कर देती है. वह बा से कहती है कि मैं और समर अलग रह लेंगे, लेकिन आप हमें घर से बाहर मत निकालो.

डिंपल बरखा के साथ प्लानिंग करेगी

इसके आगे अनुपमा में देखने को मिलेगा कि डिंपल अपने कमरे में आकर प्लानिंग-फ्लॉटिंग के बारे में सोचेगी. वह यह सोचती है जब वह शाह हाउस में पगफेरे के लिए जाएंगी तो वह बरखा के साथ प्लान बनाएगी. ऐसे में डिंपल फैसला करेगी कि बा और शाह परिवार के बाकी सदस्यों से निपटने के लिए वह दिमाग से खेलेगी.

 

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माया अनुज से माफी मांगेगी

‘अनुपमा’ सीरियल में मनोरंजन का डोज यहीं खत्म नहीं होता. शो में देखने को मिलेगा कि माया अनुज को खुश करने के लिए माया सारा काम करती है. अनुज के मना करने पर माया नहीं रुकती है. वह अपने अनुज को मनाने के लिए उसके पैरों में गिर जाती है. और कहती है कि आप कहेंगे तो मैं अनुपमा से भी माफी मांग लूंगी. मैं आगे से ऐसा कुछ नहीं करूंगी. लेकिन अनुज का गुस्सा शांत नहीं होता. ऐसे में वह माया को छोड़कर वहां से निकल पड़ता है.

Monsoon special: मॉनसून सीजन में खुद को यूं बनाए फैशनेबल और स्टाइलिश

देश में जल्द ही मॉनसून दस्तक देने वाला है.  बारिश के मौसम में अक्सर शहर की सड़कें जलभराव और कीचड़ से भर जाती हैं. ऐसे में खुद को फैशनेबल बनाए रखना काफी कठिन हो जाता है.  बारिश के मौसम में स्टाइलिश दिखने के चक्कर में अपने कपड़ों और जूतों को गीला और खराब करनें में कोई समझदारी नहीं है. इन टिप्स के जरिए मॉनसून को खुलकर इंजॉय करें.

  1. हल्के फैब्रिक वाले कपड़े

बरसात के मौसम में हल्के और ब्रीदेबल फैब्रिक वाले कपड़े पहनने चाहिए जैसे कि कॉटन. सिथेंटिक कपड़ो को नहीं पहनना चाहिए. इसके साथ ही बारिश के मौसम में शॉर्ट्स, शॉर्ट स्कर्ट्स या शॉर्ट ड्रेसेज पहन सकती हैं क्योंकि इन्हें मॉनसून में कैरी करना बेहद आसान होता है.

2. डार्क कलर्स

बरसात के मौसम में अपने फैशन सेंस को अच्छा बनाने के लिए  आप बरसात में नेवी ब्लू, ब्लैक और ग्रे के साथ डार्क शेड्स से फैशन का जलवा बिखेरें सकते है. कहा जाता है ये शेड्स डिफॉल्ट रूप से बारिश के दौरान हमारे आसपास की उदासी को दूर करते हैं.

3. फुटवेअर सही पहनें

बारिश में या बारिश के बाद भी चलना काफी कष्टदायक हो सकता है. ऐसे में आप लोगों के सामने फिसलकर गिरना नहीं चाहेंगे, तो फॉर्मल हो या कोई समारोह, सही फुटवेअर आपके लुक को पूरा करेगा. गीले इलाकों में जरूरी ग्रिप के लिए उपयुक्त सोल वाले जूते पहने. अगर आपके जूते वेदर-रेजिस्टेंट मटीरियल से बने हैं तो इससे बेहतर और क्या हो सकता.

4. स्टाइलिश रेनकोट

बरसात के मौसम में बेहद जरुरी है आपके पास छाता और रेनकोट हो. आप चाहें तो स्टाइलिश रेनकोच या ट्रेंचकोट पहन सकती हैं जिससे लोगों की नजर आप पर ही टिकी रह जाएगी. इसके साथ आप वाइब्रेंट कलर्स के गम बूट्स भी आपको स्टाइलिश लुक देंगे.

5.नाइलॉन ट्रैंसपैरंट बैग

बारिश में अपने सामान को सुरक्षित रखने के साथ ही स्टाइल भी फ्लॉन्ट करना है तो मॉनसून में नाइलॉन के ट्रैंसपैरंट यानी पारदर्शी बैग का इस्तेमाल करें. इससे न सिर्फ आपका सामान सुरक्षित रहेगा बल्कि यह आपका स्टाइल भी किसी से कम नहीं होगा.

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