फिर वसंत लौट आया: भाग 1- जब टूटा मेघा का भ्रम

‘‘बेटी मेघा, अजय साहब के लिए चाय ले आओ,’’ रंजीत बाबू ने बैरेक से ही आवाज लगाई.

मेघा किचन से ही आवाज देती हुई बोली, ‘‘हां पापा बस 2 मिनट में लाती हूं.’’

वह थोड़ी ही देर में चाय ले आई. मेघा देखने में बहुत खूबसूरत थी. बैरेक में घुसते ही सब से पहले उस ने अजय साहब को नमस्ते की और फिर चाय के कप मेज पर सजा कर वापस नमकीन लाने किचन में चली गई.

अब बातों का सिलसिला चल पड़ा. अजय साहब अफसोस जताते हुए बोले, ‘‘इतनी सीधीसादी लड़की के साथ ये लोग ऐसा व्यवहार कर रहे हैं. अरे, कम से कम सासससुर को तो बीच में कुछ कहना ही चाहिए था…’’

तभी बीच में रंजीत बाबू ने अजय साहब को टोका, ‘‘अरे, छोडि़ए भी अजय साहब अगर मेघा ने मना न किया होता तो मैं मनोज को छोड़ने वाला नहीं था. मैं अपनी बेटी का मुंह देख कर ही रह गया. मेघा कह रही थी कि जब मनोज ही मेरे साथ नहीं रहना चाहता, तो मैं क्यों जबरदस्ती उन के साथ रहूं. और सासससुर क्या करेंगे? जब मेरा दामाद मनोज ही नालायक निकल गया. हमारे समधि और समधन तो ऐसे सरल हैं कि पूछिए मत. आज भी हमारे संबंध उतने ही प्रगाढ़ हैं जितने पहले हुआ करते थे,’’ रंजीत बाबू मेघा के दिन ही खराब बता कर संतोष कर रहे थे.

‘‘सुबहसुबह मेघा को बहुत आपाधापी रहती है. सुबह सब से पहले नाश्ता तैयार करो. फिर खुद तैयार हो कर पापा का नाश्ता टेबल पर लगाओ. उस के बाद खुद नाश्ता कर के अपना टिफिन पैक करो. उस के बाद बच्चों का टिफिन पैक करो. यह मेघा की पिछले 4-5 सालों से एकजैसी दिनचर्या हो गई है.

चाय और नमकीन दे कर मेघा बाथरूम में गई और जल्दीजल्दी नहा कर औफिस के लिए तैयार हुई. फिर जल्दबाजी में जैसेतैसे नाश्ता किया और अपने पिता रंजीत बाबू से मुखातिब हुई, ‘‘पापा, टेबल पर नाश्ता लगा दिया है… आप नाश्ता कर लीजिएगा वरना ठंडा हो जाएगा.

अब मैं चलती हूं, औफिस के लिए लेट हो रही हूं,’’ मेघा अपने कमरे का दरवाजा बंद करते

हुए बोली.

‘‘ठीक है बेटा,’’ रंजीत बाबू बोले, ‘‘तुम ने अपना टिफिन और छाता ले लिया है न… बाहर बहुत धूप है. छाता ले कर ही निकलना,’’ रंजीत बाबू अखबार साइड में रखते हुए बोले.

‘‘अरे पापा मैं तो छाता भूल ही गई थी. आप ने अच्छा याद दिलाया,’’ कह कर  टेबल के नीचे से छाता निकालने लगी.

मेघा बस लेने के लिए बसस्टौप पर आ कर खड़ी हो गई.

‘‘तुम मु?ो बेवकूफ सम?ाते हो क्या मनोज?’’ मेघा को जब मनोज की दूसरी शादी के बारे में पता चला तो जैसे वह चीख पड़ी थी.

‘‘ऐसा मैं ने कब कहा,’’ मनोज संयत स्वर में बोला.

‘‘ऐसा नहीं है तो फिर कैसा है? एक म्यान में 2 तलवारें नहीं रह सकतीं. यह तो तुम्हें पता ही है ठीक वैसे ही मेरे रहते तुम रोजी के साथ नहीं रह सकते,’’ मेघा सम?ाता करने के लिए तैयार नहीं थी.

‘‘तुम और रोजी दोनों मेरे साथ रहेंगे. मैं तुम्हें अपने घर से भगा थोड़े ही रहा हूं,’’ मनोज सफाई देता हुआ बोला.

‘‘मैं आज की लड़की हूं और स्वाभिमानी भी हूं. मैं अपनी सौत के साथ जिंदगी नहीं बिता सकती. तुम्हें मेरे और रोजी में से किसी एक को चुनना होगा,’’ मेघा अपने आदर्शों से तिल मात्र भी सम?ाता नहीं करना चाहती थी.

मनोज भी सपाट स्वर में बोला, ‘‘तुम्हें

जो अच्छा लगता है करो, लेकिन रोजी मेरे साथ ही रहेगी.’’

‘‘तो मैं किस हैसियत से तुम्हारे घर में रहूं? एक बीवी की हैसियत से या एक रखैल की हैसियत से?’’ मेघा बोली.

‘‘तुम ऐसा क्यों कह रही हो? सारे समाज के सामने हमारी शादी हुई है, फिर तुम मेरी

रखैल कैसे हो गई? तुम्हें इस घर में पहले की तरह ही मानसम्मान मिलेगा,’’ मनोज सफाई देता हुआ बोला.

‘‘मानसम्मान की बात तुम न ही करो तो ज्यादा अच्छा है. तुम पूरीपूरी रात उस रोजी के कमरे में बिताते हो और उस का बिस्तर गरम करते हो. मेरे कमरे में ?ांकने तक नहीं आते और ऊपर से मानसम्मान की बात करते हो. मैं कल पूरी रात बिस्तर पर सिरदर्द और बुखार से तड़पती रही, लेकिन तुम मु?ो देखने तक नहीं आए. क्या यही मानसम्मान तुम मु?ो दे रहे हो? पतिपत्नी का रिश्ता केवल सुख का नहीं होता, बल्कि दुख का भी होता है और समाज. किस समाज की तुम बात करते हो? तुम अगर समाज की जरा भी परवाह करते तो ऐसी गंदी हरकत कभी न करते. छि: एक बीवी के रहते तुम ने दूसरी शादी कर ली.

‘‘तुम ने कभी यह भी न सोचा कि हमारे बच्चे क्या सोचेंगे? उन के संस्कारों पर क्या असर होगा? वे तुम्हारे बारे में क्या सोचेंगे?’’ मेघा आज फैसले के मूड में थी. वह मनोज से यही चाहती थी कि वह आज मेघा या रोजी में से किसी एक को चुनें ताकि मेघा को अपनी जिंदगी की राह चुनने में आसानी हो.

मेघा ने इस दुनिया में बहुत कष्ट सहा था. बचपन में मां गुजर गई. बचपन मां के बिना बिता. पिता ने किसी तरह पालपोस कर उसे बड़ा किया.

‘‘मैं ने कोई ऐसा काम नहीं किया है, जिस से मुझे समाज के सामने शर्मिंदा होना पडे़. बड़ेबड़े राजामहाराजाओं और मुगल बादशाहों की हजारों पटरानियां हुआ करती थीं. उन्होंने कभी इस का विरोध नहीं किया, लेकिन पता नहीं तुम्हें क्यों ऐतराज है मेरे और रोजी के साथ रहने पर?’’ मनोज ने अपने कुतर्क को ढकने के लिए अपना तर्क दिया.

‘‘अपनी नाकामियों और घृणित कारगुजारियों को छिपाने के लिए कम से कम ऐसे कुतर्क तो मत ही गढ़ो मनोज. अगर मैं तुम्हारे तर्क के हिसाब से चलूं तो पुराने मातृसत्तात्मक समाज में स्त्रियां बहू विवाह करती थीं,

‘‘तो क्या मैं भी 10 शादियां कर लूं? नहीं ऐसा आधुनिक समय में नहीं हो सकता. जब मैं ऐसा नहीं कर सकती तो तुम पुराने समय के राजामहाराजाओं और मुगल बादशाहों का उदाहरण क्यों दे रहे हो? आज के समय में हमारा संविधान हमें पहली पत्नी के मर जाने, पत्नी के दुराचारी होने पर ही तलाक के बाद दूसरी शादी की इजाजत देता है और जब तक तलाक न हो जाए तब तक दूसरी शादी अवैध मानी जाती है.’’

‘‘तो क्या तुम मु?ा से तलाक लोगी?’’ मनोज ने खिड़की को घूरते हुए पूछा.

‘‘हां, बिना तलाक के हम दोनों अपनी आने वाली जिंदगी का फैसला नहीं कर सकते. बेहतर होगा हमारा तलाक हो जाए ताकि तुम भी रोजी के साथ अपनी मरजी से अपनी जिंदगी गुजार सको,’’ मेघा निर्णयात्मक लहजे में बोली.

मेघा ने घड़ी पर नजर डाली. उस की 9 बजे वाली आज की बस छूट गई थी. वह

अकसर लेट हो जाती है. वह भी करे तो आखिर क्या करे? बच्चों का टिफिन तैयार करे, उन को स्कूल भेजे, दफ्तर संभाले, घर संभाले. एक अकेली जान आखिर क्याक्या करे? आज से पहले वह कभी इतनी लेट नहीं हुई. आज जरूर बौस से डांट पड़ेगी.

फांस: भाग 2- प्रिंस दोस्ती के आड़ में धोखा क्यों दे रहा है?

रविवार की रात तीनों सहेलियां खूब ढंग से तैयार हुई थीं. वंशिका की पिंक कलर की साड़ी उस की ही रंगत में मिलजुल गई थी. वहीं कृतिका महरून रंग के पैंट सूट में बेहद मोहक लग रही थी. उस ने अपने बालों को ऐसे ही खोल दिया था और आंखों को काजल से बांध कर एकदम कमनीय बना दिया था. वहीं आरोही ने गाउन पहना था. प्रिंस टाइम से आ गया था और तीनों के लिए छोटेछोटे गिफ्ट लाया था.

वह जब डिनर कर के वापस गया तो तीनों का दिल अपनी मुट्ठी में बंद कर के चला गया था. अब चारों एकसाथ लंच करते थे. तीनो सहेलियों में प्रिंस को इंप्रैस करने का कंपीटिशन चल रहा था और जिस कारण तीनों आजकल एकदूसरे से कटीकटी रहने लगी थीं.

तीनों सहेलियां जो पहले रसोई से दूर भागती थीं, अब प्रिंस के लिए नित नई डिश बना कर लाती थीं. प्रिंस को भला क्या आपत्ति हो सकती थी. उसे तो इतनी इंपौर्टैंस कभी नहीं मिली थी. प्रिंस की गर्लफ्रैंड ने इंजीनियर का रिश्ता मिलते ही उसे टाटा कर दिया था.

प्रिंस प्रशासनिक सेवा की तैयारी ही कर रहा था पर जब 2 प्रयासों के बाद भी सफल नहीं हो पाया केंद्रीय स्कूल में चयन होते ही वह यहां चला आया. आज प्रिंस लैसन प्लान बनाने का प्रयास कर रहा था कि तभी आरोही आई और बोली, ‘‘यह मैं कर दूंगी. तुम परेशान मत हो.’’ प्रिंस बोला, ‘‘तुम सच मे बहुत प्यारी हो, आज मेरी तरफ से तुम्हें ट्रीट मिलेगी, कहीं बाहर चलोगी?’’

आरोही बेहद खुश हो गई. उस ने जानबूझ कर यह बात कृतिका और  वंशिका से छिपा ली क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि आज की मुलाकात फिर से कोई फ्रैंड्स का गैटटूगैदर बन जाए. अगर प्रिंस को सब को ले चलना होता तो वह अवश्य बोलता.

शाम को आरोही जैसे ही तैयार हो कर निकल रही थी कि कृतिका और वंशिका सामने से आती हुई दिखाई दीं. दोनों को देख कर आरोही सकपका गई. जब दोनों ने प्रश्नात्मक मुद्रा में उसे देखा तो आरोही बोली, ‘‘अरे मम्मी की कोई दूर की रिश्तेदार यहां रहती हैं.

आज उन्होंने बुलाया था.’’ दोनों को आरोही का व्यवहार कुछ अजीब लगा पर वे चुप लगा गईं. आरोही और प्रिंस ने उस शाम खूब सारी बातें कीं. एक बार भी प्रिंस ने कृतिका या वंशिका का जिक्र भी नहीं किया. चलते हुए आरोही बोली, ‘‘मैं ने कृतिका और वंशिका को इस ट्रीट के बारे में कुछ नहीं बताया है.’’

प्रिंस बोला, ‘‘अच्छा किया तुम ने जरूरी नहीं हर बात सब को बताई जाए.’’ आरोही का मन आज सपनों के घोड़े पर बैठ कर अपने शादी के मंडप पर पहुंच गया था. उसे अच्छे से पता था कि घर पर किसी को कोई ऐतराज नहीं होगा.

उस ने मन ही मन प्रिंस के क्वार्टर या फिर अपने घर को कैसे सजाएगी, इस की भी तैयारी कर ली थी. अब आरोही न जाने क्यों कृतिका और वंशिका से खिंचीखिंची रहती थी. वह नहीं चाहती थी कि कृतिका और वंशिका उस के और प्रिंस के बारे में कुछ जानें.

अब वह उस की फ्रैंड्स नहीं कंपीटीटर बन गई थीं. प्रिंस तीनों लड़कियों के लिए एक मेडल था, जिस के गले में भी यह मैडल पड़ेगा उसी की जीत होगी.  अब जब चारों लंच करने बैठते तो माहौल में एक अलग सा तनाव बना रहता. प्रिंस  को अच्छेअच्छे पकवान बना कर खिलाने के लिए तीनों फ्रैंड्स में होड़ लगी रहती.

वह तीनों के साथ एक समान व्यवहार करता और उस के मन में क्या चल रहा है तीनों को ही नहीं पता था. आज कृतिका का जन्मदिन था. हरे रंग की साड़ी में वह सच में बेहद खूबसूरत लग रही थी. जैसे ही वह स्टाफरूम में घुसी प्रिंस बोला, ‘‘कृतिका तुम्हें देख कर मुझे सदैव बिपाशा बसु याद आ जाती हैं पर आज तो तुम ने उन्हें भी पीछे छोड़ दिया है.’’ कृतिका खिलखिला कर हंसते हुए अपने बाल झटकने लगी.

वंशिका और आरोही यह बात सुन कर जलभुन गई थीं. प्रिंस फ्लर्ट करते हुए बोला, ‘‘शाम को क्या चारों डिनर के लिए कहीं मिलें.’’ वंशिका बोली, ‘‘अरे मेरी तो ऐक्स्ट्रा क्लास है.’’ आरोही बोली, ‘‘मुझे तो आज एक वर्कशौप के लिए जाना है, आतेआते देर हो जाएगी.’’ प्रिंस बोला, ‘‘शाम को क्या कर रही हो कृतिका?’’ ‘‘कुछ नहीं.’’ ‘‘तो फिर आज शाम को मेरे घर डिनर पर आ जाना.’’

आरोही और वंशिका ने झूठ ही बोला था कि उन की ऐक्स्ट्रा क्लास या वर्कशौप है पर अब वे कुछ कह नहीं सकती थीं. उस रोज शाम को कृतिका ने वाकई विपाशा बसु की तरह शृंगार किया. प्रिंस कृतिका को देख कर पलकें झपकाना भूल गया.

उस दिन शाम को कृतिका और प्रिंस के बीच बहुत कुछ घटित हो गया. कृतिका को लगा जैसे आज 31 साल में वह लड़की से औरत बन गई.  अगले दिन स्टाफरूम में कृतिका प्रिंस को प्यारभरी नजरों से देख रही थी.

कृतिका को लग रहा था कि उस की जिंदगी में एक बहुत खूबसूरत मोड़ आ गया है मगर प्रिंस कृतिका के साथ बेहद नौर्मल ही था. कृतिका को लगा शायद प्रिंस यह सब के सामने जाहिर नहीं करना चाहता है, इसलिए उस ने भी यह बात अपने तक ही सीमित रखी.

लंच के बाद बस वंशिका और प्रिंस ही स्टाफरूम में रह गए थे. वंशिका कौपियां चैक करने में व्यस्त थी. प्रिंस बहुत देर से कोशिश कर रहा था पर उस से लैपटौप पर परीक्षा का पेपर टाइप नहीं हो रहा था. उसे इन सब कामों की आदत नहीं थी.

प्रिंस को पता था वंशिका इन सब कामों में अच्छी है. अचानक प्रिंस बोल उठा, ‘‘वंशिका, तुम इतनी खूबसूरत हो, तुम इस स्कूल में क्या कर रही हो?’’ वंशिका बोली, ‘‘जो तुम कर रहे हो.’’ प्रिंस बोला, ‘‘तुम्हारी मदद के बिना तो मैं वह भी नहीं कर पाऊंगा.’’ वंशिका न चाहते हुए भी प्रिंस की मदद करने के लिए उठ गई.

प्रिंस बात बढ़ाते हुए बोला, ‘‘वंशिका, तुम्हारे कितने बौयफ्रैंड्स हैं?’’ ‘‘क्यों?’’ प्रिंस बोला, ‘‘मुझे भी अर्जी लगानी है.’’ वंशिका थोड़ा खीजते हुए बोली, ‘‘तुम हो तो मेरे फ्रैंड.’’ प्रिंस बोला, ‘‘मुझे तुम्हारा बौयफ्रैंड बनना है.’’ वंशिका कुछ न बोली तो प्रिंस आगे बोला, ‘‘कृतिका और आरोही बहुत अच्छी हैं पर बस मेरी दोस्त है.

तुम से कभी खुल कर बात करने की हिम्मत ही नहीं हुई.’’ वंशिका न चाहते हुए भी अपनी तारीफ सुन कर बर्फ की तरह पिघल गई और प्रिंस के पूरे काम की जिम्मेदारी स्वयं पर ले ली. प्रिंस आगे बोला, ‘‘वंशिका, तुम सोच रही होगी, मैं कामचोर हूं पर दरअसल यह स्कूल की नौकरी मेरी मंजिल नहीं है.

मुझे एडमिनिस्ट्रेशन में जाना है इसलिए मेरा सारा ध्यान उस की परीक्षा की तैयारी में ही रहता है.’’ वंशिका ने भोलेपन से कहा, ‘‘तुम्हारा सारा टाइपिंग का काम अब मैं कर दिया करूंगी. तुम अपना सारा समय ऐग्जाम की तैयारी में लगाओ.’’ वंशिका ने अपनी और प्रिंस के मध्य हुई बात किसी को भी नहीं बताई थी. प्रिंस के जो भी स्कूल के अतिरिक्त कार्य होते थे वह अब त्रिमूर्ति कर देती थी.

मजे की बात यह थी कि तीनों ही यह बात एकदूसरे को भी नहीं बताती थीं. प्रिंस को लग रहा था, घर से अच्छी तैयारी तो वह यहां कर पा रहा है. घर पर पापा के ताने सुनो और मम्मी के काम भी करो.अच्छा किया उस ने यह स्कूल की नौकरी जौइन कर ली है. स्कूल में बस प्रिंस पढ़ाता था बाकी काम वंशिका और आरोही कर देती थीं. खाना भी अधिकतर कृतिका उस के लिए बना देती थी.

फांस: भाग 1-प्रिंस दोस्ती के आड़ में धोखा क्यों दे रहा है?

कृतिका, वंशिका और आरोही तीनों ही आज चाह कर भी अपनेअपने चेहरे की खुशी को छिपा नहीं पा रही थीं. कारण था उन के विद्यालय में आज प्रिंस नाम के एक नए अध्यापक ने जौइन किया था. तीनों ही इस स्कूल में 5 सालों से पढ़ा रही थीं. तीनों ही करीब 30 की की उम्र की थीं. वह अलग बात है पिछले 5 साल से ही उन की उम्र 25 वर्ष पर ही आ कर अटक गई थी. कृतिका इंग्लिश विषय पढ़ाती थी.

सैंट्रल स्कूल की यह नौकरी उस के लिए बेहद जरूरी थी. उस के पापा का कानपुर में छोटामोटा बिजनैस था. वह हर माह अपने वेतन का बड़ा हिस्सा कानपुर भेजती थी. उस के परिवार को उस के विवाह की कोई जल्दी नहीं थी पर उस का मन था कि उस का भी परिवार हो, एक जीवनसाथी हो.

लखनऊ में स्थित जब कृतिका ने यह सैंट्रल स्कूल जौइन किया तो उसे यह गलतफहमी थी कि अब वह पूरी तरह से आजाद है. मगर इस स्कूल में आ कर उस की गलतफहमी जल्द ही दूर हो गई थी. महीनों तक वह स्कूल के कैंपस से बाहर नहीं निकल पाती थी.

चाह कर भी अपने लिए कुछ नहीं कर पा रही थी. कृतिका का सांवला रंग पिछले 5 सालों में और अधिक गहरा हो गया था और लखनऊ की आबोहवा ने उस के बालों को और अधिक रूखा बना दिया था. आरोही दुबलीपतली सी थी.

चाय जैसी रंगत और लंबे सीधे बाल, चेहरे पर एक भोली सी मुसकान. अभी भी ऐसा लगता था कि वह पढ़ ही रही हो. आरोही के घर में पिता कैंसर से लड़ रहे थे. भाइयों को उस के लिए वर तलाशने की फुरसत नहीं थी. छुट्टियों में भी उस का अपने घर गोरखपुर जाने का मन नहीं करता था.

स्वभाव से बेहद सीधी थी इसलिए पहले भी दिल पर चोट खा चुकी थी. वंशिका का घर वाराणसी में था और अगर कहें तो वही तीनों में सब से अधिक सुंदर और स्टाइलिश थी. उस के घर मे कोई समस्या भी नहीं थी पर उस के लिए कोई वर नहीं तलाश रहा था क्योंकि उस के परिवार में लव मैरिज करने का चलन था. वंशिका के ऊपर लव मैरिज करने का इतना प्रैशर था कि वह बहुत बार सोशल मीडिया साइट्स के जरीए उलटेसीधे लड़कों से मिल चुकी थी.

वंशिका, कृतिका और आरोही स्कूल में त्रिमूर्ति के नाम से मशहूर थीं. तीनों ही एकदूसरे को बहुत अच्छे से समझती थीं. तीनों के क्वार्टर भी कैंपस में एकदूसरे से लगे हुए थे. तीनों के ही मन में अपने परिवार के प्रति एक आक्रोश छिपा हुआ था. अकसर तीनों छुट्टियों में भी यहीं बनी रहती थीं या फिर एकसाथ घूमने निकल जाती थीं.

जिंदगी यों ही नीरस सी चल रही थी कि तभी प्रिंस का पदार्पण हुआ और  तीनों की आंखों में सपने पलने लगे. जब इन तीनों की नौकरी लगी थी तो इन के अपने विवाह को ले कर सपने बहुत ऊंचे थे. परंतु घर वालों की लापरवाही, स्कूल की किचकिच, हाथ से सरकती उम्र और आसपास अपने से कम उम्र की लड़कियों की शादी होती देख कर बस यह त्रिमूर्ति अब विवाह करना चाहती थी.

आज जब तीनों कृतिका के घर पर चाय पी रही थीं तो वंशिका बोली, ‘‘क्यों न इस रविवार को प्रिंस को डिनर पर बुला लें.’’ कृतिका बोली, ‘‘अरे अच्छा आइडिया है पर उसे ऐसा न लगे कि हम उस से दोस्ती करने के लिए मरे जा रहे हैं.’’ आरोही बिस्कुट को चाय में डुबोती हुई बोली, ‘‘लगता भी है तो लगे, इतने वर्षों बाद कुछ आई टौनिक मिला है.’’ ‘‘यहां तो सब शादीशुदा पुरुष ही हैं या फिर महिलाएं.’’ ‘‘देखना वह भी हम से दोस्ती का इच्छुक होगा.’’ कृतिका कुछ सोचते हुए बोली, ‘‘काश वह इंग्लिश विभाग में होता पर वह तो आरोही के गणित विभाग में है.’’ वंशिका बोली, ‘‘आरोही तुम्हारी जिम्मेदारी है अब उसे इनवाइट करने की.’’

अगले दिन प्रिंस जैसे ही स्टाफरूम में आया, स्कूल की स्टाफ सैक्रेटरी ने उस का परिचय सब से कराया. नेवीब्लू पैंट और ग्रे रंग की शर्ट में उस का गोरा रंग बेहद खिल रहा था.

प्रिंस का लंबा कद, घने बाल और आजकल के फैशन के अनुसार उस के चेहरे पर दाढ़ी थी जो उसे बेहद सूट करती थी. तभी आशा मैडम ने पूछा, ‘‘प्रिंस आप शादीशुदा हो या बैचलर?’’ प्रिंस हंसते हुए बोला, ‘‘अभी तो बैचलर ही हूं.’’ आशा मैडम बोली, ‘‘फिर तो हमारी त्रिमूर्ति में से किसी एक मूर्ति के साथ इस विद्यालय के प्रांगण में सदैव के लिए स्थपित हो जाओ.’’ प्रिंस ने गहरी नजरों से उस तरफ देखा जहां त्रिमूर्ति झेंपी हुई सी समोसे खा रही थी.

कृतिका, आरोही से होते हुए प्रिंस की नजर वंशिका पर अटक गई. यह बात कृतिका और आरोही ने भी महसूस करी और उन का सर्वांग जल उठा. वंशिका मन ही मन इतरा रही थी. उसे लग रहा था अब तो उस की विजय निश्चित है. प्रिंस का वर्कस्टेशन आरोही से लगता हुआ था क्योंकि दोनों का सब्जैक्ट मैथ ही था. लास्ट पीरियड में आरोही ने प्रिंस को स्कूल के नियमकायदों से अवगत कराया.

प्रिंस आरोही की आंखों में झंकता हुआ बोला, ‘‘तुम तो मेरी मैंटर हो आरोही, वैरी क्यूट मैंटर जो अभी भी बच्ची ही लगती है.’’ आरोही प्रिंस की बात सुन कर पुलकित सी हो उठी और उस ने छुट्टी की घंटी बजतेबजते प्रिंस को डिनर पर इनवाइट कर दिया. शाम को चाय पीते हुए आरोही ने विजयभाव से यह बात अपनी सहेलियों को बताई तो सब बेहद खुश हो गईं.

उन के शुष्क और मरुस्थल जीवन में प्रिंस एक ठंडी हवा का झंका बन कर आया वरना तो इस स्कूल में कोई भी अविवाहित टीचर आता ही नहीं था.   घर जा कर कृतिका ने चेहरे पर बेसन का लेप लगाया और रूखे बालों में नारियल का तेल.

कालेज में वह मृगनयनी के नाम से मशहूर थी क्योंकि तब वह अपनी आंखों को काजल औऱ लाइनर की मदद से एक ड्रौमैटिक लुक देती थी परंतु अब तो उस का कुछ मन नहीं करता था. स्कूल ने और जीवन की परिस्थितियों ने उस के जीवन का रस सोख लिया था.

उधर आरोही ने सोचा कि कल से वह जूड़ा बना कर जाएगी और साड़ी पहनेगी ताकि वह प्रिंस को क्यूट के साथसाथ सैक्सी भी लगे. वंशिका को अपनी खूबसूरती पर पूरा भरोसा था. बस उसे थोड़ा सा कपड़ों पर और अधिक ध्यान देना होगा.

तीनों ने ही जब अगले दिन स्टाफरूम में प्रवेश किया तो आशा मैडम ने कहा, ‘‘क्या बात है प्रिंस के आते ही स्टाफरूम का मिजाज ही बदल गया.’’ तीनो झोंप गईं तभी प्रिंस ने स्टाफरूम में प्रवेश किया. आज उस की नजरों को तीनों ही बांध रही थीं. आज धीरेधीरे प्रिंस की बात वंशिका और कृतिका से भी हुई.

इंडस्ट्री के किस सेफ गेम की बात कर रहे है अभिनेता पलाश दत्ता. पढ़े इंटरव्यू

मुंबई के पलाश दत्ता हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अभिनेता, मॉडल, निर्माता, थिएटर कलाकार और कास्टिंग डायरेक्टर हैं. अभिनेता पलाश दत्ता ने फिल्म मोहब्बतें में गुरुकुल बॉय के रूप में शुरुआत की, जो वर्ष 2000 में रिलीज़ हुई थी. इसके अलावा उन्होंने तेरे नाम, धूम, गुड बॉय बैड बॉय, एक आदत, गुड लक, ग्रांडमस्ती, और ग्रेट ग्रैंड मस्ती जैसी अन्य कई फिल्मों में अभिनय किया है.

पलाशदत्त का अंग्रेजी नाटक ‘ब्लेम इट ऑन यशराज’ कई शो पूरे कर चुका है और अब भी दमदार चल रहा है. पलाश ने कुमार भूटानी के पास अभिनय की ट्रेनिंग ली है. इसके अलावा वे लगातार वर्कशॉप करते रहते है, क्योंकि एक्टिंग में खुद को पॉलिश करना बहुत जरुरी होता है. पलाश को अतरंगी कपडे पहनना पसंद है, जिसकी डिजाईनिंग वे खुद करते है. फिल्मों के अलावा उन्होंने कई विज्ञापनों में भी काम किये है. 13 साल बाद उन्होंने टीवी पर शो ‘इश्कबाज’ से वपसी की. इसमें उन्होंने इंटरनेट सेंसेशन लड़के की भूमिका निभाई है. उन्होंने नेटफ्लिक्स वेब सीरीज ‘टाइपराइटर’ में श्री बनर्जी, एक कडक पिता की भूमिका निभाई है, जिसे आलोचकों ने काफी प्रसंशा की. उनकी प्रोडक्शन कंपनी पलाश दत्ता क्लासिक प्रोडक्शन कंपनी खोली है.

जिसमे पलाश ने पुरस्कार विजेता लघु फिल्म ‘साइलेंट टाईज’ का निर्माण किया, जो भाई-बहन के बंधन के बारे में एक संवेदनशील कहानी है. इस फिल्म को कई फेस्टिवल्स में दिखाया जा चुका है और इस फिल्म ने कई अवॉर्ड जीते हैं. उन्होंने खास गृहशोभा से अपनी जर्नी के बारें में बात की, जो रोचक रही. कुछ खास अंश इस प्रकार है. इन दिनों की व्यस्तता के बारें में पूछने पर पलाश कहते है कि अभी मैं दो वेब सीरीज कर रहा हूँ, एक वेब सीरीज ‘अविनाश’ में मैं किन्नर अंगूरी की केमियों भूमिका निभा रहा हूँ. ‘शोस्टॉपर’ शो में ब्रा फिटर की भूमिका निभा रहा हूँ. ये एक अलग और इंटरेस्टिंग कहानी है, जो 8 एपिसोड में चलती है, जिसमे कई लोग मिलकर एक फैशन हाउस चलाते है.

प्रेरणा कहाँ से मिली?

अभिनय में आने की प्रेरणा कहाँ से मिली? मैं बचपन से ही डांस, सिंगिंग, इलोक्युशन में भाग लेता रहता था. स्कूल और कॉलेज से ही मेरा परफोर्मेंस जारी था. मेरे परिवार में कोई भी हिंदी फिल्मों में काम नहीं किया, लेकिन मेरे रिलेटिव का जुड़ाव क्रिएटिव वर्क से हमेशा रहा है. मेरे पेरेंट्स ने पहले पढ़ाई पूरी कर काम करने की सलाह दिया.

मैंने एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने एक एडवरटाइजिंग कंपनी में काम करना शुरू किया, काम करते-करते मुझे लगा कि मुझे इसमें ख़ुशी नहीं मिल रही है. फिर बिनाघर वालों से पूछे, मैंने मॉडलिंग में अप्लाई करना शुरू कर दिया. एक दिन एक अखबार में विज्ञापन देखकर अपना पोर्टफोलियों जमा कर दिया. मेरे पिता पृथ्वेश रंजन दत्ता बहुत स्ट्रिक्ट है, इसलिए मैंने उन्हें बताया नहीं.

इसलिए रोज पिता के ऑफिस जाने के साथ-साथ मैं भी टिफिन लेकर बाहर निकल जाता था, और पिता के ऑफिस जाने के बाद वापस घर आ जाता था, जबकि मैं जॉब छोड़ चुका था और ये बात सिर्फ माँ पापड़ी दत्ता को पता था, क्योंकि मैंने उन्हें अपनी इच्छा बता दिया था. घर आने के बाद मैं अपने सपनों को पूरा करने के लिए चेम्बूर से महालक्ष्मी स्टूडियों में ऑडिशन देने बस से चला जाता था. पहला विज्ञापन मिलने के बाद ही पिता को पता चल पाया था कि मैं मॉडलिंग कर रह हूँ.

इसे देख उन्होंने मुझ पर गुस्सा किया और डांटने लगे, पर मैंने नहीं माना और आगे बढ़ता गया. ये सही है कि मेरे परिवार में कोई इंडस्ट्री से नहीं है, इसलिए मेरे शुरूआती दिन काफी संघर्षपूर्ण रहे. पेरेंट्स को लगता था कि हिंदी सिनेमा में गन्दगी है, सुरक्षा नहीं है, अच्छे लोग यहाँ काम नहीं करते.

बना मॉडल कोर्डिनेटर

इसके आगे वे कहते है कि वर्ष 1995-96 में मैंने मॉडल कोर्डिनेटर का काम शुरू किया. मैंने विज्ञापनों के लिए बहुत अधिक मॉडल दिए है और ये अच्छा चल रहा था, लेकिन वर्ष 2000 में मैंने फिल्म ‘मोहब्बतें’ में एक होनहार छात्र की भूमिका के लिए ऑडिशन दिया और 3 राउंड की ऑडिशन के बाद मैं चुनलिया गया. इसमें बहुत सारे बड़े-बड़े चरित्र थे, जिससे मुझे उनसे मिलना और काम करने का सौभाग्य मिला. इसके अलावा मोहब्बतें के सेट पर करण जौहर से मुलाकात हुई और उन्होंने फिल्म ‘कभी ख़ुशी कभी गम’ में कास्टिंग का काम करने के लिए बुलाया.

तब कास्टिंग डायरेक्टर का जमाना नहीं था. कुछ आर्टिस्ट मसलन, रिमालागू, फरिदाजलाल, स्मिताजयकर आदि कुछ गिने चुने कलाकार ही माँ की भूमिका निभाते थे. मैंने उनका काम किया, जो उन्हें काफी पसंद आया, इसके बाद मैंने फिल्म ‘कल हो न हो’ के लिए भी कास्टिंग का काम किया.

इसके बाद कई फिल्मों में अभिनय भी किया. मैं 27-28 साल से कास्टिंग का काम करता हूँ. मैंने फिल्मों और वेब सीरीज के लिए हमेशा कास्टिंग डायरेक्टर का काम किया है. इसके साथ-साथ मैंने भरत दाभोलकर की नाट्य कम्पनी में अभिनय करना शुरू कर दिया. इस कंपनी की पहली अंग्रेजी शो ‘मंकी बिज़नेस’ थी और मैं दो महीने के लिए लंदन गया था. अभी दूसरी प्ले ‘ब्लेम इट ऑन यशराज’ में काम कर रहा हूँ. पिछले 4 से 5 साल से इस प्ले को पूरे विश्व में परफॉर्म किया जा रहा है. इसमें मैं वेडिंग प्लानर की भूमिका निभा रहा हूँ. ये मजेदार और कॉमेडी वाली शो है.

तीन साल पहले मैंने अपनी एक शोर्ट फिल्म ‘आई एम् फाइन’ प्रोड्यूस किया है, जो मेंटल हेल्थ कंडीशन को लेकर है. अभी मैंने शोर्ट फिल्म ‘साइलेंटाइज’ जो LGBT पर आधारित भाई-बहन की कहानी है. इसे कई अवार्ड भी मिले है. इसके लिए मुझे बेस्ट एक्ट्रेस का अवार्ड भी मिला है.

किये संघर्ष

पलाश संघर्ष के बारें में कहते है कि मैंने हर काम में सफलता के लिए बहुत संघर्ष किये है, फिर चाहे वह अभिनेता हो या कास्टिंग का काम. उस समय कास्टिंग का काम करने वाले को कोई दूसरा काम करने नहीं दिया जाता था. मुझे काफी लोगों ने ओपोज भी किया, पर मैंने रिबेल होकर अपना काम जारी रखा. मैंने कई बड़े- बड़े कलाकारों को कास्ट किया है. दिन में मैं 300 से 400 फ़ोन कॉल करता था, कलाकारों को ऑडिशन पर भेजने के लिए और मेरा गला तक सूख जाता था. कई बार स्क्रिप्ट भी उन्हें देना पड़ता था. आज काफी बदलाव हो चुका है, जो अच्छी बात है. असल में कास्टिंग के काम में बड़े-बड़े निर्देशकों के साथ उठना-बैठना होता है, इससे कई बार उन्हें एक्टिंग का मौका भी मिल जाता है.

परिवार का सहयोग

परिवार के सहयोग के बारें में पूछने पर पलाश हँसते हुए कहते है कि पिता की स्वीकृति मिलना आज भी कठिन है, क्योंकि आज भी वे मेरे काम को पसंद नहीं करते. मैंने जो भी फिल्में की है, उन्होंने देखा है और प्राउड भी फील करते है, क्योंकि मैंने बिना किसी गोड्फादर के इंडस्ट्री में अपनी साख जमाई. ये सही है कि मेरे समय में पेरेंट्स या बच्चे अधिक एक्सप्रेसिव नहीं होते थे. तब शोअप और सोशल मीडिया नहीं थी. कुछ भी हम सामने बोलकर या गिफ्ट देकर जताते थे, लेकिन मेरे काम को वे पसंद करते है, क्योंकि मुझे कई अवार्ड मिले, आलोचकों ने मेरे काम की तारीफे की.

ईमानदारी से किये काम

पलाश कहते है कि मैं बांग्ला कल्चर में पला-बड़ा हुआ हूँ और मेरे पिता के बहुत स्ट्रिक्ट होने की वजह से मैंने कभी कास्टिंग डायरेक्टर के रूप में कुछ गलत काम नहीं किया और न ही कोई महिला कलाकार मेरे पास आने से कतराई, क्योंकि मैंने अपने काम की ईमानदारी और सम्मान को बनाए रखा.

कास्टिंग काउच की घटनाएं पहले थी और आज भी है और ये बड़े लेवल पर है, ये एक प्रकार का दलदल है. मैं भी इन परिस्थितियों से गुजरा और इसमें फंस भी सकता था, लेकिन मैं इसमें से निकल गया, क्योंकि मुझे किसी प्रकार का नशा या ड्रग लेने की आदत नहीं है, पार्टी में मैं जाता नहीं.

मुझे लोग इंडस्ट्री का कलंक कहते है. मैं एक परफोर्म करने वाला आर्टिस्ट हूँ, मैंने 45 साल की उम्र में कथक सीखना शुरू किया है. इसके अलावा सुरेश वाडेकर के यहाँ क्लासिकल हिन्दुस्तानी सोंग भी सीख रहा हूँ. बचपन में मैं रविन्द्र संगीत सीख चुका हूँ.

सोच के विपरीत किये अभिनय

अभिनेता पलाश का कहना है कि ये सब सीखते हुए मैं खुद को सम्पूर्ण फील करता हूँ. मुझे शुरू से कॉमिक एड्स जैसे चम्पू, नोर्डी, पढ़ाकू आदि चरित्र मिलते थे. तब स्लैपस्टिक कॉमेडी ही चलती थी और मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे इससे निकलना है, थिएटर में सिर्फ अलग भूमिका करने को मिलता था. मैंने अधिकतर कॉमेडी शो ही किये है, लेकिन एक वेब शो मिस्टर बनर्जी में मैंने एक बहुत स्ट्रिक्ट बंगाली पिता की भूमिका की है.

उस भूमिका के बाद मेरा शिफ्ट कॉमेडी से सीरियस भूमिका की तरफ हुआ है, मेरा इंडस्ट्री से कहना है कि अगर किसी को मौका कुछ अलग करने को नहीं मिलेगा, तो वह खुद को कैसे प्रूव करेगा. कास्टिंग डायरेक्टर रौशनी बैनर्जी ने मेरे अंदर से 9 साल के पिता की स्ट्रिक्ट पिता की भूमिका निकलवाई. डायरेक्टर सुजोय घोष खुद भी विश्वास नहीं कर पा रहे थे, कि मैं एक 9 साल के बच्चे का पिता बन सकता हूँ, लेकिन सही लुक के लिए कॉस्टयूम डायरेक्टर ने केवल एक मूंछ के प्रयोग किया, जिससे डायरेक्टर को भी मैं परफेक्ट लगा.

सेफ गेम खेलती है इंडस्ट्री मेरा एटरटेनमेंट इंडस्ट्री से कहना है कि व्यक्ति कैसा भी हो उसे हर तरह की भूमिका मिलनी चाहिए. इमेज के आधार पर नहीं. कॉमेडियन जोनी लीवर भी निगेटिव या सीरियस रोल कर सकते है, पर उन्हें वह मौका नहीं मिला. इंडस्ट्री में लोग केवल बड़ी बाते करते है. नयापन के नाम पर कुछ नहीं होता. ऐसे कई एक्टर भरे पड़े है, जो दीखते कुछ है, पर वे कुछ और एक्टिंग कर सकते है. मैंने अधिकतर कॉमेडी फिल्में की है. फिल्म आई एम् फाइन में मैंने जो भूमिका निभाई है, वैसा मैंने कभी नहीं किया है. ओटीटी की वजह से थोड़े बदलाव इंडस्ट्री में आई है, पर अभी बहुत बदलाव होना बाकी है. यहाँ वर्क कल्चर बहुत ख़राब है, आर्टिस्ट की वैल्यू नहीं है.

Father’s Day 2023: पापा की जीवनसंगिनी- भाग 4

‘‘आंटी आप…’’ उन्हें इस प्रकार अचानक अपने सामने देख कर पीहू चौंक गई.

‘‘ओहो मिशेल आप आ गईं पेशैंट का कुछ सामान मंगवाया था इन से शी इज केयरिंग योअर फादर सिंस यसटरडे,’’ नर्स ने उन से सामान लेते हुए कहा.

पड़ोस की मिशेल आंटी से पिछली बार पापा ने मिलवाया था पर पापा की इतनी केयर उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. 2 दिन बाद पापा कुछ ठीक हुए तो सामने पीहू को देख कर खुश हो गए. अब पापा को रूम में शिफ्ट करना था सो वह कुछ जरूरी सामान लेने घर चली गई. लौटी तो पापा रूम में शिफ्ट हो गए थे. जैसे ही वह रूम में जाने के लिए मुड़ी तो बाहर कैंसर वार्ड लिखा देख कर चौंक गई कि क्या. पापा को कैंसर हुआ है… पापा को ऐसी बीमारी… वह चक्कर खा कर गिरने ही वाली थी कि अहमद की मजबूत बांहों ने उसे संभाल लिया… अहमद ने उसे पास ही पड़ी बैंच पर बैठाया. अहमद पीहू को बहुत अच्छे से जानता था. वह पीहू के दिमाग में चल रहे ?ां?ावात को भलीभांति सम?ा गया था सो बोला, ‘‘पीहू हम यहां पापा को संभालने आए हैं खुद उन के लिए मुसीबत बनने नहीं… खुद को संभालो… यदि तुम ही कमजोर पड़ जाओगी तो पापा को कौन संभालेगा?’’

‘‘हां तुम ठीक कह रहे हो…’’ कहते हुए पीहू ने अपनी आंखों में आए आंसुओं को रूमाल से पोंछ लिया. मिशेल आंटी दूसरी बैंच पर बैठी ये सब बातें सुन रही थीं. वे अचानक पीहू के पास आईं और बोलीं, ‘‘तुम उन से कुछ मत पूछना मैं तुम्हें सब बताऊंगी पर अभी तुम उन के पास जा कर बैठो उन्हें अच्छा लगेगा.’’

उस दिन शाम को मिशेल आंटी ने जो बताया उसे सुन कर पीहू के पैरों तले जमीन

खिसक गई. उस की आंखों से ?ार?ार आंसू बह निकले. वे बोली, ‘‘तुम्हारे पापा को काफी दिनों से पेट में बहुत प्रौब्लम हो रही थी… खाना बिलकुल हजम नहीं हो रहा था… कुछ दिनों से ब्लीडिंग भी होने लगी थी. जब डाक्टर को दिखाया तो कुछ टैस्ट्स के बाद उन्होंने आंतों का कैंसर बताया है… पर तुम जरा भी चिंता मत करो. अभी प्रथम स्टेज ही है. डाक्टर ने कहा है कि एक छोटी सी सर्जरी के बाद पूरी तरह से ठीक हो जाएंगे.’’

‘‘आंटी मैं पापा से रोज बात करती हूं,पापा इतना सब सह रहे थे और मुझे बताया तक नहीं,’’ पीहू रोते हुए बोली.

‘‘वे तुम्हें परेशान नहीं करना चाहते थे तुम प्रैगनैंट जो थीं. जब से उन्हें तुम्हारी प्रैगनैंसी के बारे में पता चला था खुशी से पागल हुए जा रहे थे. बेबी के होने के बाद के न जाने कितने प्लान बना रखे थे. इस बीमारी ने तो उन्हें बीच में ही पकड़ लिया न,’’ मिशेल ने कहा.

सब सुन कर पीहू के तो होश ही उड़ चुके थे साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया था कि मिशेल और उस के पापा काफी करीब थे. रात्रि में अहमद पापा के पास रुके तो वह मिशेल के साथ घर आ गई. सोने से पहले पीहू जब पापा की अलमारी ठीक करने लगी तो उस के हाथ पापा की डायरी लगी. वह जानती थी कि पापा नियम से रोज डायरी लिखते हैं. पीहू उत्सुकतावश पन्ने पलटने लगी. पिछले कुछ पृष्ठों पर पापा ने लिखा था,

‘‘पीहू और अनु मेरी जिंदगी थीं और दोनों ही अब मेरे पास नहीं हैं. कभीकभी जीवन बहुत बो?िल सा लगने लगता है. लगता है जीने का उद्देश्य ही समाप्त हो गया हो. पता नहीं क्यों आजकल बहुत बीमार रहने लगा हूं. पीहू को बताऊंगा तो वह परेशान हो जाएगी. ऐसा लगता है मानो जिंदगी से थक गया हूं. आज पार्क में पड़ोस की मिशेल मिलीं बड़ा अच्छा लगा मिल कर जिंदगी में पति और बेटाबहू खोने के बाद भी जिंदादिली से भरपूर. उन से बात कर के बड़ा सुकून मिलता है.’’

इस के कुछ महीनों बाद ही लिखा था,

‘‘मिशेल और मैं बहुत अच्छे दोस्त बन गए हैं. अब हम एकदूसरे से अपना सुखदुख साझा करने लगे हैं. उन्होंने तो विवाह का प्रस्ताव भी रखा है. विवाह तो मैं भी करना चाहता हूं कम से कम कोई बात करने वाला तो मिलेगा. अकेला घर तो खाने को दौड़ता है. शायद उन के साथ से मेरा बुढ़ापा कुछ आसानी से कट जाएगा. उन की तो कोई संतान ही नहीं है पर पीहू… पीहू से मैं डरता हूं… बिना मां की बच्ची है… सुन कर कहीं गलत अर्थ न निकाल ले. अनु को तो खो ही चुका हूं पीहू को नहीं खोना चाहता.’’

पापा की डायरी पढ़तेपढ़ते पीहू वहीं जमीन पर सिर पकड़ कर बैठ गई.

अगले दिन अस्पताल पहुंच कर पीहू ने अहमद को पापा की डायरी वाली बात बताई तो अहमद बोले, ‘‘सही तो है दोनों यदि एकदूसरे के साथी बन जाते हैं तो दोनों के लिए ही जिंदगी जीनी बहुत आसान हो जाएगी पर अब जबकि पापा को यह बीमारी डायग्नोस हो चुकी तो अब भी क्या मिशेल वही सोचती हैं जो पहले सोचती थीं. फिर क्या तुम मिशेल आंटी को अपनी मां का दर्जा देने या अपने प्यारे पापा को उन के साथ सा?ा करने को तैयार हो?’’

‘‘हां तुम सही कह रहे हो पर मिशेल आंटी से तो मैं स्पष्ट पूछ लूंगी और जहां तक मेरी बात है तो मैं यही चाहती हूं कि मेरी अनुपस्थिति में पापा के पास कोई तो होगा जिस से वे अपनी बातें शेयर कर सकें.’’

कुछ देर बाद मिशेल भी आ गईं. पीहू ने उन्हें पापा के पास जाने को कहा और अंदर मिशेल के साथ पापा को हंसहंस कर बात करते देख कर अहमद से बोली, ‘‘अहमद अब मैं आंटी का मन ले कर ही रहूंगी चाहे कुछ भी हो जाए अपने पापा की खातिर. देखो पापा कितने खुश हैं उन के साथ..’’

‘‘पर क्या तुम्हारे परिवार और समाज वाले इसे मान्यता देंगे? एक तो इस उम्र में विवाह और उपर से दूसरे धर्म में?’’ अहमद ने कुछ अचकचाते हुए कहा.

‘‘अरे अहमद जब पापा ने मेरे विवाह में इस समाज की चिंता नहीं की तो मैं क्यों करूं. वैसे भी जिस समाज की तुम बात कर रहे हो वह सिर्फ मुंह चलाना जानता है, कमजोर को 2 ठोकर मार कर और अधिक कमजोर बनाता है और ताकतवर और पैसे वाले को सलाम ठोका करता है. जब आप भूखे होते हैं तो आप को 2 रोटी को नहीं पूछता यह समाज. अहमद मैं ऐसे किसी समाज की चिंता नहीं करती. मैं सिर्फ पापा की परवाह करती हूं,’’ पीहू बोलतेबोलते हांफने लगी थी.

1 सप्ताह बाद पापा को ले कर पीहू घर आ गई. एकदम व्यवस्थित और साफसुथरा घर देख कर पापा चौंक गए और बोले, ‘‘अरे मिशेल आज फिर तुम ने घर की सफाई कर दी. तुम्हें पता है पीहू यह तुम्हारी मिशेल आंटी अकसर मेरे द्वारा फैलाई गंदगी साफ करती रहती हैं.’’

‘‘मैं ने नहीं ये सब पीहू ने किया है बाबा…’’ मिशेल आंटी कुछ शरमाते हुई सी बोलीं.

‘‘आंटी अभी तो मैं ने कर दिया है पर मैं चाहती हूं कि अब आप ही पापा और उन के घर को संभालें. बोलिए आंटी क्या आप मेरे पापा की जीवनसंगिनी बनने को तैयार हैं?’’

अचानक ऐसे सीधे प्रश्न से मिशेल ही नहीं पापा और अहमद दोनों

ही चौंक गए. पर वे बहुत समझदार थीं सो बहुत सधे स्वर में बोलीं, ‘‘पीहू मैं तैयार तो थी पर तुम्हारे पापा…’’

‘‘मेरे पापा अब कैंसर के पेशैंट हैं तो इसलिए आप विवाह नहीं कर सकतीं, जबकि आप पहले तैयार थीं. मुझे भी यही शक था इसीलिए मैं ने घुमाफिरा कर पूछने के बजाय आप से सीधे ही पूछ लिया. आंटी आप भी इसी समाज का ही हिस्सा हो न तो आप की सोच अलग कैसे हो सकती है,’’ पीहू एकदम तैश में आ कर बोली.

‘‘नहीं बेटा ऐसी बात नहीं है. प्यार कभी बीमारी, इंसान, जाति, रंग रूप या धर्म को देख कर नहीं किया जाता है प्यार तो बस प्यार है जो दिल का दिल से होता है. मैं आज भी तुम्हारे पापा को पहले जितना ही प्यार करती हूं. मैं बस तुम्हारे पापा की मंशा जानना चाह रही थी. बेटा बीमारी का क्या है बाद में भी हो सकती है. मुझे तो सुदेश की कंपनी पसंद है पर क्या सुदेश को मेरा साथ पसंद है?’’ कह कर मिशेल चुप हो गईं.

मिशेल आंटी की बातें सुन कर पीहू मानो सोते से जाग गई. आंटी की पौजिटिव सोच ने उस के सारे नकारात्मक विचारों को दूर कर दिया. वह दौड़ कर अपने पापा और मिशेल के गले लग गई. यद्यपि वह अपने पापा के मन की बात डायरी में पढ़ चुकी थी पर फिर भी उन की ओर मुखातिब हो कर बोली, ‘‘बोलो पापा क्या आप तैयार हो?’’

पापा ने मुसकरा कर मिशेल की ओर देखते हुए उसे गले लगा लिया. पापा की स्वीकृति समझ पीहू किचन की तरफ मिठाई लेने दौड़ पड़ी.

कर्ज: क्या फिर से अपने सपनों को पूरा करेगी सीमा?

मेरी देवरानी साक्षी 14 साल सर्विस करने के बाद अपने विभाग की हैड बन गई है. उस ने अपनी पदोन्नति की खुशी में आज जो पार्टी दी है, उस में उस के औफिस की सारी सहेलियां बहुत सजधज कर आई थीं.

मैं ने काफी कोशिश करी पर मुझ से बातें करने में किसी की दिलचस्पी ही नहीं थी. उन के बीच चह रहे वार्त्तालाप के लगभग सारे विषय उन की औफिस की जिंदगी से जुड़े थे.

उन के रुखे व्यवहार के कारण मेरा मन आहत हुआ, अचानक मैं खुद को बहुत अलगथलग, उदास व उपेक्षित सा महसूस करने लगी थी. मु लगा कि ये सब मुझे अपनी कंपनी में शामिल करने के लायक नहीं समझ रही थीं.

मैं एक तरफ कोने में बैठ कर उस समय को याद करने लगी जब मैं भी औफिस जाती थी. इन सब की तरह ढंग से तैयार हो कर घर से निकलना कितना अच्छा लगता था. औफिस में मैं भी नईनई चुनौतियों का सामना करने के लिए इन की तरह आत्मविश्वास से भरी नजर आती थी.

शादी के सालभर बाद मेरी बेटी मानसी पैदा हुई थी. उस के होने से 3 महीने पहले मैं ने नौकरी से त्यागपत्र तो दे दिया पर मेरा इरादा था कि जब वह कुछ बड़ी हो जाएगी तो मैं फिर से नौकरी करना शुरू कर दूंगी.

मगर वह समय मेरी जिंदगी में फिर लौट कर कभी नहीं आया. मानसी के होेने के 2 साल बाद मेरे बेटे सुमित का जन्म हो गया. मैं कुछ सालों के बाद नौकरी करना शुरू कर देती पर अपनी देवरानी साक्षी के कारण ऐसा नहीं कर सकी थी.

सुमित के होने के सालभर बाद मेरे देवर वसुराज की शादी साक्षी से हुई थी. वह एमबीए थी और अच्छे पद पर नौकरी करती थी.

हमारी तेजतर्रार स्वभाव वाली सास को साक्षी का देर से औफिस से लौटना व रसोई के कामों में बहुत कम हाथ बंटाना अच्छा नहीं लगता था. इस कारण सासूमां को उसे डांटने व अपमानित करने के मौके बड़ी आसानी से रोज ही मिल जाते थे.

ऐसा कर के सासू साक्षी को दबाना चाहती थीं पर साक्षी दबने को तैयार नहीं थी. इस कारण घर का माहौल कुछ दिनों में ही इतना खराब हो गया कि साक्षी घर से अलग होने की सोचने लगी.

साक्षी ने मु?ा से एक शाम साफसाफ कह दिया, ‘‘भाभी, मैं अगर नौकरी छोड़ कर घर में बैठी तो पागल हो जाऊंगी. मेरे लिए अच्छा कैरियर बनाना बहुत महत्त्वपूर्ण है.’’

एक दिन साक्षी को घर लौटने में रात के

11 बज गए क्योंकि वह औफिस से ही अपने एक सहयोगी की शादी में शामिल होने चली गई थी.

उस दिन घर में सासूमां की बहन का पूरा परिवार भी डिनर के लिए आया हुआ था. साक्षी देवरजी की इजाजत ले कर शादी के समारोह में शामिल होने गई थी, पर सासूमां ने उस के देर से लौटने पर सब मेहमानों के सामने बहुत क्लेश किया था.

साक्षी अपने कमरे में जा कर ऐसी बंद हुई कि किसी के बुलाने पर भी बाहर नहीं आई. मैं जब देर रात को उस के कमरे में खाना ले कर गई, तो वह छोटी बच्ची की तरह मुझ से लिपट कर बहुत जोर से रो पड़ी थी.

तब भावुक हो कर मैं ने उस से वादा कर लिया था, ‘‘साक्षी, तुम घर की चिंता छोड़ो और

बेफिक्र हो कर नौकरी करो. मेरे होते तुम्हारे नौकरी करने पर कभी आंच नहीं आएगी. घर तो मैं संभाल ही रही हूं और आगे भी संभालती रहूंगी. इस मामले में मांजी की डांटफटकार को एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल दिया करो.’’

मगर आज अपने उस फैसले के कारण मेरे मन में गुस्सा, चिड़ व गहरा असंतोष पैदा हो रहा था. साक्षी की औफिस की सहेलियों को देख कर मन बारबार सोच रहा था कि कितनी चुस्तदुरुस्त और आत्मविश्वास से भरी नजर आ रही हैं ये सब की सब. मेरा व्यक्तित्व इन की तुलना में कितना फीका लग रहा है.

अपने व साक्षी के बच्चों को संभालतेसंभालते मेरी विवाहित जिंदगी के 30 साल निकल गए हैं. उन चारों को ढंग से पालपोस कर बड़ा करने के लिए सुबह से रात तक चकरघिन्नी सी घूमती

रही हूं.

इस कारण मुझे इज्जत और वाहवाही तो खूब मिली पर मेरा व्यक्तित्व मुरझा गया और यह बात आज मेरे मन को बहुत कचोट रही थी.

वैसे मुझे साक्षी से कोई शिकायत नहीं है. उस ने अलग तरह से हमारे संयुक्त परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियां पूरी करी हैं. बिजलीपानी के बिल देवरजी ही भरते रहे हैं. मकान की मरम्मत व रंगरोगन सदा उन्होंने ही कराया है. मेरी बेटी मानसी की पढ़ाई का आधे से ज्यादा खर्चा मेरे देवर ने ही उठाया था.

आज यह बात मन में बहुत जोर से चुभ रही है कि  घरगृहस्थी के कामों में उलझे रहने से मेरे व्यक्तित्व का विकास रुक गया. तभी तो साक्षी की सहेलियों के साथ खुल कर बातें करने में मुझे अजीब सा डर लग रहा है. मुझे साफ महसूस हो रहा है कि मेरे अंदर नए लोगों से मिलनेजुलने का आत्मविश्वास खो गया है.

‘‘भाभी, किस सोच में डूबी हो,’’ साक्षी ने अचानक पास आ कर सवाल पूछा तो मैं चौंक गई.

‘‘कुछ नहीं,’’ न चाहते हुए भी मेरा स्वर उदास हो गया.

‘‘फिर भी जो मन में चल रहा है मुझे बताओ न,’’ वह मेरा हाथ थाम कर बड़े अपनेपन से मुसकराई.

‘‘मैं सोच रही थी कि तुम्हारी इन स्मार्ट, सुंदर सहेलियों के सामने मेरा व्यक्तित्व कितना बौना और बेजान आ रहा है. आज महसूस कर रही हूं कि मुझे हमेशा के लिए नौकरी नहीं छोड़नी चाहिए थी,’’ अपने मन की पीड़ा को मैं ने उसे बता ही दिया.

‘‘भाभी, अगर आप नौकरी नहीं छोड़तीं

तो आज यह प्रमोशन पार्टी न हो रही होती. आप ने घर की जिम्मेदारियां संभालीं, तो ही मैं पूरी लगन व मेहनत से औफिस में काम कर तरक्की के इतने ऊंचे मुकाम तक पहुंच पाई हूं,’’ यह जवाब दे कर साक्षी ने मेरा मूड ठीक करने का प्रयास किया.

मैं ने साक्षी की बात का कोई जवाब नहीं दिया पर मेरी आंखों से एकाएक आंसू बहने लगे. साक्षी ने पहले अपने रूमाल से मेरे आंसू पोंछे और फिर अचानक तालियां बजा कर सब मेहमानों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने लगी.

‘‘साक्षी, यह क्या कर रही हो. मेरा तमाशा न बनाना, प्लीज,’’ मैं ने उसे रोकने की कोशिश करी पर उस ने तालियां बजाना जारी रखते हुए खुद और मुझे सारे मेहमानों की नजरों का केंद्र बिंदु बना ही दिया.

जब सब का ध्यान हमारी तरफ हो गया तो उस ने ऊंची आवाज में बोलना शुरू किया, ‘‘मैं आप सब का एक खास इंसान से परिचय कराना चाहती हूं. मुझे प्रमोशन दिलाने में, मेरी लगन और मेहनत के साथसाथ इस इंसान का सहयोग भी बहुत महत्त्वपूर्ण रहा है.

‘‘आप सब को लग रहा होगा कि अब मैं अपने जीवनसाथी का गुणगान करूंगी तो मैं वैसा कुछ नहीं करने जा रही हूं. वे तो उलटा हमेशा मुझे डांटते थे कि मैं अपनी कमाई का घमंड न करूं और आए दिन नौकरी छुड़वा देने की धमकी देते रहते थे.’’

साक्षी के इस मजाक पर जब मेहमानों का हंसना रुक गया तो वो आगे बोली, ‘‘आज मेरा बेटा मोहित 10वीं कक्षा में है और बेटी तान्या 12वीं कक्षा में. दोनों हमेशा फर्स्ट आते हैं. आज मैं हर तरह से सुखी और संतुष्ट हूं. क्या आप सब जानना चाहेंगे कि मेरी व मेरे बच्चों की सफलता व खुशियों के लिए सब से महत्त्वपूर्ण योगदान किस का है?

‘‘कहा जाता है कि हर पुरुष की सफलता के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है. मेरे जीवन को अपार खुशियों से भरने में भी एक स्त्री का हाथ है और वह हैं बहुत सीधीसादी व सब के सुखदुख बांटने वाली मेरी ये सीमा भाभी. मैं चाहती हूं कि आप सब इन का एक बार जोर से तालियां बजा कर स्वागत करें.’’

सभी मेहमानों ने बड़े जोरशोर से तालियां बजा कर मेरा अभिनंदन किया. सच कहूं तो इस वक्त मैं खुश होने के साथ बहुत शरमा भी उठी थी.

साक्षी भावुक अंदाज में मेहमानों से आगे बोली, ‘‘मेरी इन सीमा भाभी के पास

सोेने का दिल है. इन के कारण मैं शादी के बाद से ही अपने दोनों बच्चों की देखभाल की चिंता से पूरी तरह मुक्त रही हूं. जब मेरे बच्चे स्कूल से लौटते थे तो उन्हें किसी आया की डांटफटकार नहीं बल्कि अपनी ताईजी का प्यार मिलता था. ये सीमा भाभी ही थीं जिन के कारण उन्हें हमेशा खाना गरम और अपनी मनपसंद का मिला. इन्होंने दोपहर का अपना आराम त्याग कर उन्हें होमवर्क कराया. मेरे बच्चों को बहुत अच्छे संस्कार इन्होंने ही दिए हैं.

‘‘मैं आज सीमा भाभी को बताना चाहती हूं कि हम नौकरी करने वाली औरतें तो घर व औफिस की दोहरी जिम्मेदारियों को निभाते हुए मशीन बन कर रह जाती हैं. हमारे चमकदार व्यक्तित्व में बहुत कुछ नकली और बनावटी होता है. मैं अपने बच्चों को कभी इतने अच्छे ढंग से नहीं पाल सकती थी जैसे इन्होंने ने पाला है.

‘‘मेरी सीमा भाभी ने हमारे इस घर को जोड़ कर रखा है. ये स्नेह व त्याग की जीतीजागती मिसाल हैं. मैं ने कभी नहीं कहा है पर आज आप सब के सामने कहती हूं कि इस जिंदगी में तो मैं इन के प्यार, स्नेह और त्याग का कर्ज कभी नहीं उतार पाऊंगी. पर मैं जो कर रही हूं उस की प्लानिंग मैं ने और बसु ने कई महीनों से कर रखी थी. हम ने गोमतीनगर के एक कमर्शियल कौंप्लैक्स में एक दुकान खरीदी है जिस में भाभी के बनाए और डिजाइन किए कपड़े बिकेंगे. यह हमारी ओर से एहसानों का बदला नहीं है, प्यार का मान है. भाभी यह लो सारे कागज, दुकान आप के नाम पर है,’’ कहते हुए साक्षी ने सीमा के हाथ में एक फाइल पकड़ा दी.

आंखों से आंसू बहा रही साक्षी ने वहीं सब के सामने मेरे पैर छू कर आशीर्वाद लिया तो तालियों की तेज आवाज से पूरा पंडाल एक बार फिर गूंज उठा. उसे प्यार से गले लगाते हुए मेरे मन की सारी शिकायतें, हीनभावना व कड़वाहट जड़ से दूर हो गई थी.

मुझे परिवार के सारे सदस्यों ने घेर लिया. सब की आंखों में मुझे अपने लिए प्रशंसा व आदर के भाव साफ नजर आ रहे थे. मेरी आंखों से अब जो आंसू बह रहे थे तो वे खुशी और गहरे संतोष के थे.

झगड़ा: प्रिया आखिर क्यों अपने पति से तलाक लेना चाहती थी?

सुबह सुबह शालू को प्ले स्कूल पहुंचा कर प्रिया घर के काम समाप्त कर औफिस पहुंच गई. शालू के स्कूल जाने से पहले ही वह 2 घंटों में फुरती से घर के काम निबटाती है. प्रिया ने औफिस में घड़ी देखी. 2 बज चुके थे. वह शालू को लेने स्कूल पहुंची क्योंकि टीचर ने नोट भेजा था कि प्रिंसिपल से मिल लें. वरना रिकशे वाला रोज उसे घर के पास बने क्रैच में छोड़ आता था जहां प्रिया उस का लंच सुबह ही दे आती थी. उस के कपड़ों का बैग भी रहता था.

‘‘प्रियाजी आप की बेटी आजकल ज्यादा ही गुस्से में रहती है. जब देखो साथी बच्चों के साथ लड़ाई झगड़ा करती है. कल तो इस ने बगल में बैठे पीयूष को बोतल फेंक कर मार दी. 2 दिन पहले वह पायल के साथ ?झगड़ा करने लगी. पायल लंच में सैंडविच लाई थी. उस ने शालू को सैंडविच नहीं दिए तो शालू ने उस का टिफिन ही उठा कर नीचे फेंक दिया. बताइए इस तरह की हरकतें कब तक सही जाएंगी. पता नहीं इतनी छोटी सी बच्ची इतनी अग्रैसिव क्यों है,’’ टीचर ने यह शिकायत क्लास प्रिंसिपल से की थी.

‘‘हां मैं ने भी देखा है. घर में भी शालू गुस्से में चीजें उठा कर फेंक देती है.’’

‘‘देखिए मैं बस यही कह सकती हूं कि बच्चे घर में जैसा बड़ों को करते देखते हैं उस का काफी असर उन पर पड़ता है. इस बात का खयाल रखें कि ऐसा कुछ बच्ची के आगे न हो.’’

‘‘मैं बिलकुल इस बात का खयाल रखूंगी,’’ कह कर प्रिया शालू को ले कर घर चली आई मगर दिल में तूफान मचा था. कहीं न कहीं शालू के इस रवैए की वजह घर में होने वाले  झगड़े ही थे. शालू अकसर अपने मांबाप के  झगड़े देखती थी.

दरअसल, प्रिया और विवेक ने भले ही लव मैरिज की थी मगर

अब दोनों के बीच बिलकुल नहीं बनती थी. विवेक अकसर झगड़े के दौरान प्रिया पर चीखता था और चीजें भी उठा कर फेंकता था. वह खुद भी गुस्से में आपा खो बैठती थी. जब दोनों थकहार कर औफिस से आते तो दोनों के पास शिकायतें होतीं. प्यार करनेकी फुरसत नहीं होती.

प्रिया ने खाना खिला कर शालू को सुला दिया. वह खुद भी लेट गई. उस का सिर भारी हो रहा था. पिछली रात विवेक के साथ हुए  झगड़े ने उसे अंदर तक तोड़ दिया था. वह पिछली रात की बात सोचने लगी. कल रात विवेक देर रात लौटा तो प्रिया ने टोक दिया. प्रिया ने उसे सुबह कहा भी था कि वह जल्दी आ जाए ताकि दोनों शालू कुछ किताबें और ड्रैसेज ले आएं.

तब तक प्रिया को उस की एक कुलीग ने बता दिया था कि विवेक का चक्कर चल रहा है. इसलिए प्रिया ने उस से सीधा सवाल किया, ‘‘मुझे पता चला है कि तुम सोनल के साथ डिनर के लिए गए थे. क्या यह सच है?’’

‘‘हां सच है. क्या प्रौब्लम है तुम्हें? अच्छा अब समझ दरअसल तुम्हारे जैसी औरतों की सोच हमेशा से छोटी ही रहती है. अगर मैं ने सोनल के साथ हंसीमजाक कर लिया, कहीं

घूमने चला गया तो कौन सी बड़ी बात हो गई. सोनल मेरी कुलीग है. दोस्ती हो गई तो क्या हो गया. तुम मेरी जासूसी करवाओगी?’’ विवेक चिढ़ कर बोला.

‘‘मैं ने आज तक कभी सोनल से तुम्हारी दोस्ती को ले कर कोई सवाल नहीं किया. मगर अब पानी सिर के ऊपर जा रह है. आज तुम उस के साथ डिनर के चक्कर में इतनी रात को लौटे हो, जबकि मैं यहां तुम्हारा मनपसंद खाना बना कर इंतजार करती रही. हमें शालू की किताबें लाने के लिए भी जाना था. मगर तुम यह भी भूल गए. क्या यह सही था,’’ प्रिया ने पूछा.

‘‘सहीगलत मैं नहीं जानता. तुम मुझ पर बेकार का शक करती हो. इस बात से मुझ कोफ्त होती है.’’

‘‘अच्छा और जब मेरा पुराना क्लासमेट अजीत मुझ से मिलने घर आ गया तो क्या तुम ने तमाशा नहीं किया था.’’

‘‘किया था मगर इस की वजह तुम जानती हो? वह मुझे जरा भी पसंद नहीं,’’ विवेक चिल्लाया.

‘‘तो फिर सोनल भी मुझे पसंद नहीं.

सोनल को छोड़ो मुझे तुम्हारा ऐटीट्यूड ही पसंद नहीं. शादी के बाद तुम ने कभी मुझे समझने

की कोशिश नहीं की. कभी मेरे साथ समय

बिताने की कोशिश नहीं की,’’ प्रिया ने अपनी भड़ास निकाली.

‘‘समय क्या बिताऊं पूरा दिन तुम्हारी बकवास सुनूं. वैसे भी तुम्हारे पास समय कहां रहता है. औफिस से छुट्टी मिले तो गुरु की सेवा में लग जाती हो. पूरा संडे तो भजन, कीर्तन और सत्संग में बिताती हो. वहां से आती हो तो तुम्हारे गुरु की चेली का फोन आ जाता है.’’

प्रिया जानती थी कि विवेक पूजापाठ और गुरु के नाम से बहुत चिढ़ता. यह भी सच था कि आजकल उस का बहुत सारा समय पूजापाठ में जाने लगा था. वह पूजा पहले भी करती थी लेकिन अब समय के साथ पूजापाठ में उस का ज्यादा समय लगने लगा था. अपनी सहेली की बात मान कर उस ने अपना एक गुरु बना लिया था. दोनों सहेलियां अकसर सत्संग में गुरु की सेवा के लिए जातीं और पूरा दिन गुजार कर वापस आतीं. पूजापाठ, सत्संग, भजनकीर्तन में लगने वाले समय की वजह से उस के पास घर संभालने या बच्चे के लिए कुछ बेहतर कर पाने का समय कम होता था. खुद को आकर्षक बनाए रखने का भी कोई प्रयास नहीं करती थी क्योंकि उस के दिमाग में  झगड़े की बातें घूमती रहती थीं. हमेशा की तरह छोटी सी बात पर शुरू हुआ यह  झगड़ा खिंचता चला गया.

पिछले संडे दोनों ने प्लान बनाया था कि लंच के बाद शालू को ले कर मौल जाएंगे. कुछ जरूरी शौपिंग के साथ कोई मूवी भी देख लेंगे. निकलने से पहले प्रिया ने जल्दीजल्दी खाना बना कर थाली लगाई और विवेक को खाने को बुलाया. फिर वह किचन समेटने अंदर चली गई.

तभी विवेक के जोर से चिल्लाने की आवाज आई, ‘‘सब्जी है या केवल नमक भर दिया है. काम में मन नहीं लगता तुम्हारा. न जाने क्या करती हो पूरा दिन.’’

‘‘तुम्हारी गृहस्थी ही संभालती हूं. औफिस भी जाती हूं. तुम्हारी तरह देर रात तक किसी के साथ घूमती नहीं.’’

प्रिया ने तंज कसा तो विवेक को गुस्सा आ गया. उस ने थाली उठा कर जमीन पर फेंक दी. फिर दोनों के बीच देर तक लड़ाई चलती रही और सारा प्लान कैंसिल हो गया.

प्रिया समझने लगी थी कि अब विवेक के साथ निभाना उस के वश का नहीं रहा. विवेक छोटीछोटी बात पर उस से  झगड़ता था. ऐसा लंबे समय से चलता आ रहा था.

आज शालू की जो मारपीट की शिकायत स्कूल से सुनने को मिली थी वह कहीं न कहीं शालू ने रोज मांबाप के हो रहे  झगड़ों को देख कर ही सीखा. घर पहुंच कर प्रिया ने प्यार से शालू को अपने सामने बैठाया और पूछा, ‘‘बेटा एक बात बताओ आप ने पीयूष को क्यों मारा था?’’

‘‘मम्मा वह मुझे चिढ़ा रहा

था कि तू गंदी है,’’ शालू ने

जवाब दिया.

‘‘तब तुम ने क्या किया?’’

‘‘मुझे गुस्सा आ गया. वह  झठ बोल रहा था. इसीलिए मैं ने उसे बोतल

से मारा,’’ वह मासूमियत से बोली.

प्रिया ने अगला सवाल किया, ‘‘फिर तुम्हारी टीचर ने क्या किया?’’

‘‘टीचर ने मुझे दूसरे कमरे में भेज दिया.’’

‘‘इस के बाद तो तुम दोनों के बीच  झगड़ा नहीं हुआ न,’’ प्रिया ने पूछा.

‘‘नहीं मम्मा, फिर पूरा दिन हम ने एकदूसरे को देखा ही नहीं इसलिए  झगड़ा भी नहीं हुआ,’’ शालू ने सहजता से कहा.

‘‘अच्छा आज मैं तुम्हें एक बात सम?ाती हूं. बेटा, ध्यान से सुनना. तुम देखती हो न कि मैं और तुम्हारे पापा आपस में  झगड़ते हैं.’’

‘‘हां मम्मा.’’

‘‘तुम्हें अच्छा नहीं लगता न?’’

‘‘हां मम्मा मुझ बिलकुल अच्छा नहीं लगता,’’ शालू उदास हो कर शालू बोली.

‘‘अब बताओ अगर तुम टीचर होती तो हम दोनों को अलगअलग कमरे में भेज देती न जैसे तुम्हारी टीचर ने किया.’’

‘‘हां,’’ वह भोलेपन से मुसकराई.

प्रिया ने फिर समझया, ‘‘देखो तुम और पीयूष छोटे बच्चे हो इसलिए टीचर

ने  तुम्हें अलगअलग कमरे में बैठा दिया और तुम्हारा  झगड़ा खत्म हो गया. लेकिन मैं और पापा तो बड़े हैं न. हमें अलगअलग कमरे में नहीं बल्कि अलगअलग घर में रहना होगा तभी हमारा  झगड़ा खत्म हो पाएगा. तब हम सब हैप्पी रहेंगे, है न?’’

‘‘तब मैं पापा के घर में रहूंगी,’’ शालू बोली.

‘‘तुम्हें पापा ज्यादा अच्छे लगते हैं?’’

‘‘नहीं लेकिन पापा से दूर नहीं होना मुझे. मेरी फ्रैंड सोनल के पापा दूर रहते हैं. वह रोती रहती है. मुझे ऐसे दूर नहीं रहना.’’

‘‘पर बेटा पापा के साथ रहोगी तो मम्मा अकेली रह जाएंगी न?’’ प्रिया ने पूछा.

‘‘मुझे आप के साथ भी रहना है. मैं तो आप दोनों के साथ रहूंगी,’’ शालू मचल कर बोली.

‘‘नहीं तुम मम्मा के साथ रहना और पापा कभीकभी तुम से मिलने आते रहेंगे. फिर तो ठीक है न,’’ प्रिया ने समझना चाहा.

मगर शालू रोने लगी, ‘‘नहीं मम्मी आप दोनों दूर मत होना मु?ो आप दोनों चाहिए.’’

प्रिया ने शालू को बांहों में ले कर चूम लिया. वह सम?ा रही थी कि इतनी छोटी सी बच्ची को मांबाप दोनों की जरूरत है. तभी तो वह किसी भी तरह विवेक के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश कर रही थी. वह अपनी तरफ से हर संभव कोशिश करती है पर कमी हमेशा विवेक की तरफ से रही. वह शालू के कारण पति से अलग नहीं हो सकती थी मगर साथ रहना भी दूभर हो रहा था. यही वजह थी कि वह कशमकश भरी जिंदगी जी रही थी.

वक्त गुजरता रहा. विवेक और प्रिया के झगड़े पहले की तरह चलते रहे. अब  झगड़े छोटीछोटी बातों पर होेने लगे थे. झगड़ों के बाद कई बार प्रिया ने फिर शालू को समझया कि वह मम्मा और पापा को अलग होने दे मगर शालू उदास हो जाती.

एक दिन सोनल को ले कर प्रिया और विवेक के बीच फिर से  झगड़ा हुआ. दरअसल प्रिया को अपनी कुलीग के जरीए पता चला कि विवेक सोनल के साथ फिल्म देखने गया था. यह सुनते ही प्रिया के अंदर गुस्से का लावा फूट पड़ा. वह गुस्से में थी. देर रात जब विवेक लौटा और आते ही बैडरूम का रुख किया तो वह चीख उठी, ‘‘सोनल के घर ही सोने चले जाते न, यहां क्यों आए हो?’’

‘‘यहां क्यों आए हो से क्या मतलब है तुम्हारा?’’ विवेक भी ताव में आ गया, ‘‘यह

मेरा घर है. यहां नहीं आऊंगा तो कहां जाऊंगा? बेमतलब का इलजाम लगाते शर्म नहीं आती तुम्हें?’’

‘‘शर्म तुम्हें आनी चाहिए मुझे नहीं. तुम शर्मनाक हरकतें करते हो तब कुछ नहीं होता. मैं ने हकीकत बता दी तो इतना बुरा लग रहा है,’’ प्रिया गुस्से में थी.

‘‘ठीक है मैं ने बहुत बड़ी शर्मनाक हरकत कर दी. मैं ने किसी और को अपने दिल में बसा लिया. जब तुम इस लायक हो नहीं तो किसी और को ही ढूंढ़ूंगा. बस खुश हो या कुछ और बोलूं?’’ विवेक चीखा.

‘‘बोलना क्या है. सचाई तो बता ही दी तुम ने. मैं अब पसंद नहीं तो

किसी और को ही ढूंढ़ोगे. मैं ने तुम्हें खुली छूट दे दी है. जाओ जो करना है कर लो. बस मु?ा से कोई उम्मीद मत रखना. न ही कभी मेरे करीब आने की कोशिश करना.’’

‘‘तुम्हारे करीब आना चाहता ही कौन है. तुम्हारी तरफ देखना भी नहीं चाहता,’’ कहते हुए उस ने साइड टेबल पर रखी अपनी और प्रिया की तसवीर नीचे गिरा दी और खुद कमरे का दरवाजा जोर से बंद करता हुआ और प्रिया को धक्का देता गैस्टरूम में चला गया.

कोने में खड़ी शालू यह सब देख रही थी. उस के चेहरे पर अजीब से भाव थे और नन्हे दिल में बहुत से सवाल घूम रहे थे.

उस दिन प्रिया देर तक आईने के सामने खड़ी हो कर खुद को देखती रही. आईना देख कर उसे पहले तरह खुद पर गुमान नहीं हुआ. एक समय था जब प्रिया बहुत खूबसूरत थी. लंबी, छरहरी, गोरा रंग और उस पर घने स्टाइल में कटे हुए काले, लहराते बाल ऐसे कि कोई भी उसे पहली नजर में देख कर दीवाना हो जाता था. ऐसा ही हुआ था जब विवेक ने उसे देखा तो देखता रह गया था. पहली नजर का प्यार था उन का मगर अब उम्र बढ़ने के साथ प्रिया के अंदर काफी बदलाव आए थे. उस में वह कशिश नहीं रह गई थी जो एक समय में उस में थी. उस के पेट पर काफी चरबी जम चुकी थी और अब वह थोड़ी मोटी महिलाओं की श्रेणी में आने लगी थी. उस के बाल भी अब  झड़ने लगे थे और वह अब बालों को बांध कर रखती थी. आंखों पर चश्मा लग चुका था. घर, औफिस और बच्चे को संभालने में पूरी तरह थक जाती थी इसलिए कुछ चिड़चिड़ी भी हो गई थी.

इसी तरह समय गुजरता रहा. सोनल की वजह से प्रिया और विवेक के बीच आएदिन  झगड़े होते रहे. इन ?झगड़ों का सीधा असर नादान शालू पर पड़ रहा था. प्रिया यह बात सम?ाती थी मगर उसे कोई उपाय नजर नहीं आ रहा था. वह सही समय का इंतजार कर रही थी जब शालू खुद उस की बात समझ जाए और पापा से अलग होना स्वीकार कर ले.

एक दिन प्रिया औफिस में थी तभी उस के फोन की घंटी बजी. फोन स्कूल से था.

शालू को सिर में चोट लग गई थी. प्रिया भागती हुई अस्पताल पहुंची. शालू को माथे पर चोट लगी थी और थोड़ा खून भी बह गया था.

शालू मां से लिपट कर रोने लगी, ‘‘मम्मा आज मेरा अमित से  झगड़ा हुआ और उस ने मुझे इतनी जोर से धक्का मारा कि मेरा सिर फट गया. आज के बाद मैं अमित का चेहरा भी नहीं देखूंगी. वह मुझ से हमेशा लड़ता रहता है.’’

प्रिया उसे शांत करा कर घर ले आई और सुला दिया. उस रात विवेक फिर से काफी देर से घर लौटा और प्रिया के एतराज जताने पर भड़क उठा. जोर से चीखता हुआ बोला, ‘‘तुम्हारे साथ रह कर मेरी जिंदगी खराब हो रही है.

पता नहीं कैसी घड़ी में तुझ से प्यार किया और शादी की.’’

‘‘शादी करना ही काफी नहीं होता. उसे निभाना भी पड़ता है,’’ प्रिया ने कहा.

‘‘अच्छा क्या नहीं निभाया मैं ने?’’

‘‘ज्यादा मुंह मत खुलवाओ. 1-1 कच्चा चिट्ठा जानती हूं,’’ प्रिया बोली.

‘‘क्या जानती हो. आज बता ही दो.’’

‘‘तुम्हारी रंगीनमिजाजी, तुम्हारी बेवफाई और तुम्हारा इस रिश्ते से भागना…’’

अचानक गुस्से में विवेक ने प्रिया को जोर से थप्पड़ मार दिया. दूर

खड़ी शालू सबकुछ देख रही थी. थप्पड़ मारते देखते ही शालू भड़क उठी और प्रिया का हाथ पकड़ कर उसे खींचती हुई दूसरे कमरे में ले

आई. फिर उस ने प्रिया से कहा, ‘‘मम्मा आज के बाद आप पापा के साथ नहीं रहोगी. आप ने

कहा था न कि पापा और आप अलगअलग घर में रहोगे तो  झगड़े नहीं होंगे. आप अलग घर लो. पापा से दूर हो जाओ वरना आप को भी मेरी

तरह चोट लग जाएगी.  झगड़ा हो उस से दूर हो जाना चाहिए.

मैं भी उस स्कूल में नहीं पढ़ूंगी और आप के साथ किसी दूसरे घर में रहूंगी और दूसरे स्कूल में जाऊंगी. अब मैं कभी झगड़ा नहीं करूंगी और ममा आप भी मत करना. आप को पापा गुस्सा दिलाते हैं, झगड़े करते हैं तो बस आप उन से दूर हो जाओ. मैं भी अमित से दूर हो जाऊंगी. ठीक है न मम्मा?’’

एक सांस में सारी बात कह कर शालू ने पूछा तो प्रिया ने उसे गले से लगा लिया. बेटी की इतनी समझदारी भरी बातों से वह चकित थी. फिर बोली, ‘‘हां बेटा मगर तू पापा के बिना रह लेगी न.’’

‘‘हां मम्मा. आप ने कहा था न पापा कभीकभी आएंगे ही मिलने. मैं आप के साथ रहूंगी. बस आप कभी झगड़ा मत करना.’’

प्रिया ने बेटी को सीने से लगा लिया. आज शालू ने प्रिया की कशमकश दूर कर दी थी. अब वह बिना किसी गिल्ट विवेक को तलाक दे कर सुकून से रह सकती थी. वह अपनी बच्ची को एक सुंदर भविष्य देना चाहती थी और इस के लिए उस का विवेक से दूर जाना ही उचित था.

मौनसून हेयर केयर मिस्टेक्स

बारिश का मौसम बालों और स्कैल्प के लिए काफी खराब माना जाता है. मौनसून में हेयर फौल और डैंड्रफ की समस्या होना सब से आम है. इसलिए इस मौसम में बालों की अधिक देखभाल की जरूरत पड़ती है.

आइए जानते हैं ये कौन सी समस्याएं हैं और यह भी कि हम खुद इस मौसम में ऐसी कौन सी गलतियां करते हैं जिन की वजह से ये समस्याएं ज्यादा परेशान करने लगती हैं:

मौनसून में होने वाली बालों की समस्याएं

1.बालों का झड़ना

मौनसून में अकसर महिलाओं को हेयर फौल की समस्या का सामना करना पड़ता है. दरअसल, बारिश के मौसम का मिजाज ही ऐसा होता है कि उमस भरी गरमी स्कैल्प का पीएच संतुलन बिगाड़ देती है. इस से हेयर लौस की आशंका काफी बढ़ जाती है. वैसे तो हेयर फौल किसी भी मौसम में हो सकता है लेकिन मौनसून में अधिक देखने को मिलता है.

2. स्कैल्प इन्फैक्शन

मौनसून में स्कैल्प इन्फैक्शन होना आम बात है. स्कैल्प पर बैक्टीरियल और फंगल इन्फैक्शन की समस्या हो सकती है. दरअसल, मौनसून में बाल कई बार बारिश के पानी से गीले हो जाते हैं और इस से स्कैल्प पर बैक्टीरिया और फंगस पैदा हो जाता है. साथ ही फोड़ेफुंसियां भी हो सकती हैं.

3. डैंड्रफ

बारिश के मौसम में बढ़ते प्रदूषण, धूलमिट्टी और गंदगी के कारण बालों में जूंएं या रूसी पैदा हो सकती है. इस से बाल कमजोर हो जाते हैं और अधिक ?ाड़ने लगते हैं. मौनसून में डैंड्रफ की समस्या अधिक इसलिए होती है क्योंकि इस के लिए जिम्मेदार कवक नमी वाले इस मौसम में ही पनपता है.

4.खुजली

बारिश के मौसम में बालों और स्कैल्प में नमी रहती है. इस से बाल जल्दी चिपचिपे हो जाते हैं और खुजली होने लगती है. डैंड्रफ और इन्फैक्शन की वजह से भी सिर में खुजली हो सकती है.

कौमन हेयर केयर मिस्टेक्स

इस संदर्भ में एनी मुंजाल (एमडी, आश्मीन मुंजाल स्टार मेकअप अकादमी) कुछ सामान्य हेयर केयर गलतियां बता रही हैं जिन से मौनसून के मौसम में बचना चाहिए:

1.अपने बालों को बारिश और नमी से न बचाना

बारिश का पानी बालों को बहुत नुकसान पहुंचाता है. हम बारिश में भीगने का मजा लेते समय यह बात भूल जाते हैं और बालों से जुड़ी समस्याओं को न्योता देते हैं. इसलिए जरूरी है कि जब बाहर बारिश होने लगे तो अपने बालों को टोपी, दुपट्टे या छाते से ढक लें. यह आप के बालों को गीला होने और उल?ाने से बचाने में मदद करेगा.

2. बहुत अधिक स्टाइलिंग प्रोडक्ट्स का उपयोग करना

ज्यादातर स्टाइलिंग प्रोडक्ट्स हार्श होते हैं और बालों को नुकसान पहुंचाते हैं. इसलिए मौनसून में अपने बालों पर बहुत अधिक स्टाइलिंग प्रोडक्ट्स का प्रयोग करने से बचें. इन के बजाय ऐसे प्राकृतिक प्रोडक्ट्स का चयन करें जो आप के बालों के लिए कोमल हों.

3.अपने बालों को साफ न रखना

मौनसून एक ऐसा समय होता है जब आप के बाल आसानी से गंदे और चिकने हो जाते हैं. अत: सुनिश्चित करें कि आप अपने बालों को साफ और स्वस्थ रखने के लिए नियमित रूप से हलके शैंपू से धोती हैं. किसी भी तरह की गंदगी को हटाने के लिए अपने बालों को अच्छी तरह से धोना जरूरी है.

4.कंडीशनर स्किप करना

मौनसून में अपने बालों को रूखापन और उल?ाने से बचाने के लिए अतिरिक्त नमी की आवश्यकता होती है. कंडीशनर न लगाने से आप के बाल बेजान नजर आएंगे. इसलिए अपने बालों में नमी वापस लाने के लिए हफ्ते में 1 बार डीप कंडीशनिंग हेयर मास्क का इस्तेमाल करें. बालों को मुलायम और हाइड्रेटेड रखने के लिए शैंपू करने के बाद अच्छी क्वालिटी वाले कंडीशनर का उपयोग करें. यह आप के बालों को सुल?ाने में भी मदद करेगा.

5. हौट स्टाइलिंग टूल्स का इस्तेमाल

फ्लैट आयरन और कर्लर जैसे हौट स्टाइलिंग टूल्स मौनसून में आप के बालों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. अत: हौट स्टाइलिंग टूल्स का इस्तेमाल करने के बजाय अपने बालों को हवा में सुखाने का विकल्प चुनें.

6. अपने बालों को नियमित रूप से ट्रिम न करना

मौनसून के दौरान हवा में नमी बढ़ने के कारण बाल टूटने का खतरा रहता है. नियमित ट्रिमिंग दोमुंहे बालों को रोक सकती है और बालों को स्वस्थ रख सकती है.

7. कैमिकल ट्रीटमैंट्स से दूरी

कैमिकल ट्रीटमैंट्स बालों को नुकसान पहुंचाते हैं. इसलिए मौनसून के दौरान किसी भी तरह के बालों के रंग या कैमिकल ट्रीटमैंट्स से बचना सब से अच्छा है क्योंकि हाई ह्यूमिडिटी रंग को जल्दी फीका कर सकती है और कैमिकल आप के बालों को कमजोर बना सकते हैं.

मौनसून में ऐसे करें बालों की देखभाल

1.बालों को अच्छी तरह से कवर कर के रखें

भले लगातार बारिश न हो रही हो मगर इस मौसम में नमी के कारण बाल  झड़ते हैं. ऐसे में बालों को अगर झड़ने से बचाना है तो एक अच्छा स्कार्फ ले कर अपने सिर के चारों ओर लपेटें. यह न सिर्फ बालों की बल्कि स्कैल्प की भी रक्षा करेगा.

2. ऐसैंशियल औयल का इस्तेमाल

अपनी स्कैल्प की मालिश करने के लिए टी ट्री, लैवेंडर और मेहंदी जैसे आवश्यक तेलों का उपयोग करें जो रक्त परिसंचरण में सुधार करने और बालों के विकास को बढ़ावा देने में मदद करेगा.

3. हेयर सीरम का इस्तेमाल करना

हेयर सीरम का इस्तेमाल करने से बालों का  झड़ना कम हो सकता है और मौनसून के मौसम में आप के बालों में चमक आ सकती है. अपने बालों को अच्छी तरह से पोषण देने के लिए उन पर लाइट औयल बेस्ड सीरम लगाएं और सुनिश्चित करें कि आप हर 15 दिनों में 1 बार बालों की डीप कंडीशनिंग भी करें.

4.खानपान सही रखें

इस मौसम में बाल झड़ने से रोकने हैं तो आप को जंक फूड से बचना चाहिए. औयली फूड मूल रूप से रक्त परिसंचरण को धीमा कर देता है और आप के बालों और स्किन की हैल्थ के साथ खिलवाड़ करता है. स्वस्थ बाल और पौष्टिक आहार के बीच सीधा संबंध है. आप की डाइट बैलेंस होनी चाहिए. बैलेंस का मतलब उस में सारे न्यूट्रीएंट्स शामिल होने चाहिए. मसलन, आप का भोजन कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फैट, विटामिन, मिनरल्स और वाटर का एक संतुलित कौंबिनेशन हो. प्रोटीन, ओमेगा 3 फैटी ऐसिड और बायोटिन प्रचुरता वाली चीजों को अपनी डाइट में शामिल करना होगा. ये बालों के स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी न्यूट्रिएंट्स हैं. खूब पानी पीएं और बहुत ज्यादा कैफीन पीने से भी बचें.

5. बालों को छोटा रखें

अगर आप के बाल लंबे हैं तो बारिश के मौसम में उन्हें छोटा कटवा लें. ऐसा करने से बालों की देखभाल अच्छे से हो जाएगी. इस के साथ ही बालों को और आप को नया लुक भी मिल जाएगा.

6. बालों की साफसफाई का खयाल रखें

सफाई का मतलब यह कतई नहीं है कि हमें प्रतिदिन शैंपू से ही बालों की सफाई करनी है. आप एक दिन छोड़ कर दूसरे दिन शैंपू से बालों की सफाई कर सकती हैं यानी एक दिन शैंपू से तो उस के अगले दिन सिर्फ नौर्मल वाटर से.

7. गीले बाल न बांधें

अगर आप के बाल लंबे हैं तो जाहिर है आप बरसात के दिनों में अकसर बाल बांध कर रखना पसंद करती हैं. अगर आप ऐसा करना चाहती हैं तो कोई दिक्कत नहीं है. बस एक एहतियात जरूर बरतें. गीले बालों को कतई न बांधें. बालों की नमी दूर होने दें. जब वे सूख जाएं तभी बांधें.

8. हेयर ट्रिमिंग

आप को प्रत्येक 5-6 सप्ताह तक अपने बाल ट्रिम करवा लेने चाहिए. ट्रिम करवाने से आप को डैड हेयर से छुटकारा मिलेगा. इस की जगह जो नए बाल उगेंगे वे पुराने बालों जैसे बेजान नहीं होंगे बल्कि बेहद जानदार और खूबसूरत होंगे.

9. सही शैंपू का चुनाव

अपनी पसंद का शैंपू चूज करते समय ब्रैंड, कीमत, फ्रैगरैंस और कंपोनैंट पर ध्यान होना चाहिए. कोई भी शैंपू चुनने से पहले यह जरूर देख लें कि वह सल्फेट और क्लोराइड फ्री शैंपू हो. बेहतर होगा अगर आप इस मौसम में प्रोटीन शैंपू का इस्तेमाल करें.

10. पानी का सही टैंपरेचर

सिर पर डालने वाला पानी किसी भी हाल में गरम नहीं होना चाहिए. इस से स्कैल्प के ड्राई होने और बालों के डैमेज होने की आशंका बढ़ जाती है. इसी तरह हार्ड वाटर मतलब जिस पानी में लवण और मिनरल्स की मात्रा तय मानक से ज्यादा हो उससे न नहाएं यानी जो पानी पीने योग्य और खाना बनाने योग्य नहीं है वह नहाने के योग्य भी नहीं है.

11. हेयर कौस्मैटिक्स

बालों के सौंदर्य के लिए बाजार में तरहतरह के कौस्मैटिक्स मौजूद हैं जैसे विभिन्न किस्म के हेयर जैल और स्टाइलिंग क्रीम्स. कभीकभार पार्टीफंक्शन में इस्तेमाल कर लिया तो कर लिया, लेकिन इस के इस्तेमाल को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल न करें. लंबे समय तक इस्तेमाल करने से यह बालों को काफी डैमेज कर देता है.

12. गीले बालों को तुरंत करें क्लीन

अगर बारिश में आप के बाल गीले हो गए हैं तो आप तुरंत बालों में शैंपू करें. ऐसा करने से बालों से बरसाती पानी और पसीना निकल जाएगा और वे गिरेंगे नहीं. बारिश के पानी की वजह से भी बालों में हेयर फौल की समस्या शुरू हो जाती है.

प्रजनन क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध और कोविड-19 का प्रभाव

हालांकि मानसिक स्वास्थ्य और निःसंतानता को अलग-अलग माना जा सकता है, परन्तु यह दोनों एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और समानताएं साझा करती हैं. हमारे समाज में इन दोनों स्थितियों को हीन माना जाता है और इन विषयों के बारे में सामाजिक चर्चा को भी अस्वीकृत किया जाता है. इसके अलावा इन दोनों मुद्दों पर जागरूकता की भी कमी है. सामान्यतया, मानसिक स्थिति के लक्षणों को नजरअंदाज कर दिया जाता है और ऐसे व्यक्तियों को समुदाय में “पागल” या “सनकी” कहा जाता है. वहीं निःसंतानता को एक महिला-केंद्रित स्थिति माना जाता है क्योंकि महिलाएं गर्भाधारण से प्रसव और पोषण करने तक, पूरी प्रक्रिया के केंद्र में रहती हैं. इसके अलावा, सोसाइटल नोमर्स के अनुसार एक महिला की प्राथमिक जिम्मेदारी शादी करना और संतान पैदा करना है.

डॉ क्षितिज मुर्डिया, सीईओ और सह-संस्थापक, इंदिरा आईवीएफ का कहना है कि – आज भी, हमारे देश मे मानसिक बीमारी और निःसंतानता से ग्रसित कई लोग ठीक होने के लिए झाड़-फुंक और तांत्रिक उपायों का सहारा लेते हैं.

हमारे देश मे शारीरिक स्वास्थ्य को मानसिक स्वास्थ्य के मुकाबले ज्यादा महत्व दिया जाता है क्यों की ये प्रत्यक्ष दिखाई देता है. किसी व्यक्ति का मानसिक स्वास्थ्य उनकी समग्र भावनात्मक, सामाजिक, व्यवहारिक और मनोवैज्ञानिक सेहत होता है. ऐतिहासिक और कुछ सामाजिक परम्पराओं के कारण लोग मानसिक और भावनात्मक कमजोरी का प्रदर्शन करने से बचते हैं इसलिए मानसिक स्वास्थ्य को हमेशा इतना महत्व नहीं दिया जाता है जिसके वह योग्य है.  नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (एनआईएमएचएएनएस) का अनुमान है कि लगभग 150 मिलियन भारतीयों को अपने मानसिक स्वास्थ्य के लिए सक्रिय मदद की आवश्यकता है.

जब 12 महीने या नियमित असुरक्षित संभोग के बाद गर्भधारण करने में विफलता होती है तो इस स्थिति को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रजनन प्रणाली के रोग- निःसंतानता के रूप में परिभाषित किया गया है. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एआईआईएमएस) के अनुसार भारत की अनुमानित 1.3 बिलियन आबादी में से 10-15 प्रतिशत आबादी निःसंतानता से प्रभावित है – इसका मतलब है कि देश में लगभग 195 मिलियन लोग गर्भधारण करने में समस्याओं का सामना करते हैं.

मानसिक स्वास्थ्य और निःसंतानता पर व्यापक चर्चा हाल ही में शुरू हुई है। इन जानकारियों के प्रभाव स्वरुप हमारी सोच मे बदलाव आ रहा है और अब इस बात को समझ लिया गया है कि मानसिक स्थितियों का उसी तरह से इलाज करना होगा जिस तरह से किसी शारीरिक बीमारी का इलाज किया जाता है. लोग अब यह भी समझते हैं कि जिस तरह डायबिटीज जैसी बीमारी की अगर जांच नहीं की जाएं तो जटिलताएं हो सकती हैं, उसी तरह  मानसिक रोगों की जांच और इलाज न होने से भविष्य में हालात अधिक गंभीर हो सकते हैं.

निःसंतानता के मामलों मे , अत्यधिक शोध और तकनिकी साधनो द्वारा आज,दंपती में गर्भधारण न कर पाने में पुरुष की जिम्मेदारी को प्रकाश में लाया गया है. वास्तविकता मे निःसंतानता के सभी मामलों में यह देखा गया है कि एक तिहाई मामलों में महिला में अंतर्निहित स्थितिया,  एक तिहाई में पुरुष में अंतर्निहित स्थितिया और शेष में दोनों पुरुष और महिला की समस्याएं जिम्मेदार होती हैं.

इनफर्टिलिटी और इस से सम्बंधित परिस्थितियाँ बहुत लंबे समय से दुनिया में मौजूद हैं. जागरूकता में कमी और जीवन शैली में नुकसानदेह परिवर्तन के कारण इसकी संख्या में वृद्धि हुई  है. निःसंतानता के कुछ कारण निम्नलिखित हैं –

  • आयु
  • शराब की लत, ड्रग्स, सिगरेट पीना
  • पर्यावरणीय विषाक्त (जैसे सीसा, कीटनाशक), प्रदूषण
  • विकिरण/ रेडिएशन और कीमोथेरेपी
  • कुछ दवाएं
  • तनाव, खराब आहार, वजन
  • स्वास्थ्य की स्थितियां जैसे पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पीसीओएस), प्राथमिक ओवेरियन अपर्याप्तता, अवरुद्ध फैलोपियन ट्यूब, एंडोमेट्रियोसिस, गर्भाशय फाइब्रॉएड, मम्स (गला संबंधी बीमारी), गुर्दे की बीमारी, हार्मोनल समस्याएं, कैंसर, अन्य.

भारतीय संदर्भ में निःसंतानता शारीरिक स्वास्थ से जुड़ी स्थिति है. देश मैं  वैज्ञानिक तरीके से प्रजनन तकनीक (एआरटी) द्वारा पहला गर्भधारण डॉ.सुभाष मुखर्जी द्वारा चार दशक पहले 1978 में शुरू हुआ जब देश की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ था. हालांकि, तकनीकी सहयोग द्वारा गर्भधारण का, सामाजिक परिस्तिथियों के कारणवश अस्वीकृत होने की वजह से उनका काम कई साल तक सामने नहीं आ पाया. यह वाक्या उस काल में लोगों के पारिवारिक जीवन पर सामाजिक प्रभाव को प्रकाशित करता है.

निःसंतान दंपती में मानसिक स्वास्थ्य समस्या का दिखना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। चिंता, अवसाद, अनियंत्रित जीवन, आत्मविश्वास तथा आत्मसम्मान में कमी आदि कई लक्षण इनमें नजर आते है. वे अपनी स्थिति की वजह से समाज से अलग-थलग भी महसूस कर सकते हैं. यह भावनाएं पुरुषों और महिलाओं, दोनों में देखी गयी है जो इंगित करतीं हैं कि निःसंतानता से संबंधित धारणा और ज्ञान में कुछ बदलाव आया है.

2016 में फर्टिलिटी एंड स्टेरिलिटी नामक पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि अध्ययन किए गए सेम्पल में, महिलाओं में, अवसाद और चिंता के लक्षण क्रमशः 56 प्रतिशत और 76 प्रतिशत व्याप्त हैं और पुरुषों में यह अनुपात क्रमशः 32 प्रतिशत और 61 प्रतिशत है. प्रजनन क्षमता में जटिलताओं वाली महिलाओं द्वारा अनुभव किए गए मानसिक संकट को उन लोगों के समान पाया गया जो कैंसर और उच्च रक्तचाप के रोगी है.

इससे निःसंतानता वश, महिलाओं में अपने परिवार और दोस्तों द्वारा दिए गए दबाव,  स्वयं के माँ बनने की इक्षा साथ ही दीर्घकालिक बीमारी से उत्पन तनाव , इन सभी बातो का पता चलता है जिसका वे हर समय सामना करतीं हैं. इसके अलावा वह लोग जो दवा, एआरटी, इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ), अत्यादि द्वारा निःसंतानता के उपचार का विकल्प चुनते हैं, वे वित्तीय बोझ और प्रक्रिया की सफलता में अनिश्चितता के कारण तनाव महसूस करते हैं.

SARS-CoV-2 नोवेल कोरोना वायरस वैश्विक महामारी के कारण ऐसे व्यक्तियों की स्थिति को और जटिल बना दिया है. कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका में 20 से 45 वर्ष की आयु की महिलाओं पर एक अध्ययन किया गया जिनका प्रजनन उपचार हो रहा था , जिसमें कोरोना वायरस की वजह से 86 प्रतिशत में उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव देखा. इस महामारी ने महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को खराब किया है और  इन दोनों का प्रजनन स्वास्थ्य के साथ सीधा संबंध भी है. यह महत्वपूर्ण है कि महिलाओं को अब उनके हिस्से का आराम और मानसिक शांति मिले, ताकि आने वाली पीढ़ियां मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहें.

आज, विशेष रूप से यह जरूरी है कि मरीजों को न केवल उनके प्रजनन स्वास्थ्य के संदर्भ में बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी परामर्श दिया जाए. जाहिर है फर्टिलिटी चिकित्सा को निःसंतान दम्पति  के उपचार में श्रेष्ठता के साथ साथ उनके मानसिक तनाव के उपचार मे भी निपूर्ण बनना होगा.

मेरी स्किन बहुत औयली है और स्किन पर ऐक्ने है, ऐसे में क्या करूं?

सवाल

मेरी स्किन बहुत औयली है. गरमी आ चुकी है और मेरे चेहरे पर ब्लैकहैड्स और ऐक्ने शुरू हो गए हैं. मुझे डर लग रहा है कि कहीं ऐक्नों के दाग मेरे फेस पर न पड़ जाएंमुझे बताइए कि मैं क्या करूं

 जवाब

गरमियों में स्किन ज्यादा औयल प्रोड्यूस करती है और उस के ऊपर धूलमिट्टी व गंदगी मिल कर ब्लैकहैड्स बन जाते हैं. अगर इन्हें निकाला न जाए तो इन में इन्फैक्शन हो कर ऐक्नों में तबदील हो जाते हैं. सब से ज्यादा जरूरी है कि चेहरे को साफ रखा जाए. अगर ऐक्ने नहीं हैं सिर्फ ब्लैकहैड्स हैं तो फेस पर रोज स्क्रब करने से ऐक्ने होने के चांसेज कम हो जाते हैं और अगर ऐक्टिव ऐक्ने हो चुके हैं तो स्किन टोनर से फेस को साफ करती रहें. औयली स्किन के लिए घर में ही स्किन टोन बनाया जा सकता है.

नीम के पत्तों को धो कर पानी में डाल कर उबालने के बाद जब पानी वनथर्ड रह जाए तो उसे छान लें और फ्रिज में रख दें. इसे 1 बोतल में डाल कर फेस पर स्प्रे करती रहें. यह एक बहुत ही अच्छा टोनर है जिस से आप की स्किन साफ भी होती है और टोन भी होती है, साथ में ऐक्ने भी कम होते हैं. चकले पर 2 बूंदें दूध की डाल कर लौंग घिस लें और उसे ऐक्टिव ऐक्नों पर दिन में 2 या 3 बार लगाएं. इस से ऐक्ने निकलने भी कम हो जाते हैं.

ज्यादा मीठा खाने से बचें. जब भी आम खाएं तो साथ में ठंडी लस्सी जरूर पीएं. गरमियों में आम खाने की वजह से भी ऐक्ने बढ़ जाते हैं. गरमियों में खूब पानी पीएं. नीबू पानी भी पीती रहें.

-समस्याओं के समाधान

ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा  
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