भोपाल में सस्ते शॉपिंग के लिए बेस्ट स्ट्रीट हब

अपनी मनपसंद चीजे सस्ते में खरीदना हर किसी को पसंद आता है. अगर आपको यह पता हो की आपके घर से 50 किलोमीटर की दूरी पर घर सजाने के लिए सामान, खाने के लिए लजीज स्ट्रीट फ़ूड, कपड़ा आदि चीजें सस्ते दाम पर मिल रही हैं तो कोई भी शॉपिंग के लिए पैर अपने आप वहाँ पहुंच ही जाता है. ऐसे में भोपाल शहर में भी ऐसे कई स्ट्रीट मार्केट्स हैं जो सस्ती-सस्ती चीजों के लिए पूरे मध्य प्रदेश में फेमस हैं. इन मार्केट्स में सिर्फ स्थानीय लोग ही नहीं बल्कि दूर-दूर से लोग भी खरीददारी करने के लिए आते हैं.

न्यू मार्केट 

भोपाल शहर का न्यू मार्केट काफी लोकप्रिय मार्केट है, इसे मिनी बाम्बे भी कहते है. यहाँ पर कपड़ो की लेटेस्ट फैशन से लेकर पारम्परिक ट्रेडिशनल वेस्टर्न और इंडो वेस्टर्न सस्ते और महंगे मिल जाएंगे इसके साथ ही लेडीज़ बैग फुटवियर्स ज्यूलरी की भी वेराइटी उपलब्ध है.

बिट्टन मार्केट( बोर्ड कालोनी के पास)

बिट्टन मार्केट भोपाल शहर का सबसे प्राचीन और फेमस स्ट्रीट मार्केट माना जाता है. अगर आप अपने घर को सजाने के लिए सामान खरीदना चाहते हैं तो फिर आपको यहां ज़रूर आना चाहिए. यह मार्केट बेकरी के सामान के लिए भी सस्ती है और शहर की सस्ती सब्ज़ी मंडी भी यहां लगती हो यहां से आप सस्ते इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स भी खरीद सकते है. बिट्टन मार्केट लेटेस्ट ट्रेंडी बूट्स के लिए भी जाना जाता है. इस मार्केट में शॉपिंग के साथ-साथ स्ट्रीट फ़ूड का स्वाद चखना न भूलें.

चौक बाजार ओल्ड भोपाल

चौक बाजार एक भोपाल का लोकप्रिय मार्केट है। यह मार्केट उन लोगों के बीच काफी फेमस है जो सस्ते में चंदेरी साड़ी, मखमली पर्स, कुर्ती, टी-शर्ट, जींस आदि ड्रेस खरीदना चाहते हैं. घर की सजावट के लिए भी कई चीजों को आप बहुत कम दाम में शॉपिंग कर सकते हैं. हैंडीक्राफ्ट के लिए भी यह मार्केट लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है. कई लोगों का मानना है बहुत कम दाम पर सेकंड हैंड सामान भी यहां मिल जाते हैं. चौक बाजार में भोपाल से ही नहीं आस पास के लोग भी खरीददारी करने के लिए आते है.

हबीबगंज मार्केट

भोपाल शहर में आप किफायती दामों पर फैशनेबल कपड़े या फैशनेबल फुटवियर खरीदना चाहते हैं तो फिर आपको हबीबगंज मार्केट को ज़रूर एक्सप्लोर करना चाहिए. सड़क किनारे हजारों ऐसी दुकाने लगी होती हैं जहां से आप टी-शर्ट, जींस आदि ड्रेस खरीद सकते हैं.

इस मार्केट में सिर्फ फैशनेबल ड्रेस ही नहीं बल्कि सस्ते हैंड बैग और हैंडीक्राफ्ट के सामान भी कम दाम पर मिल जाते हैं। कहा जाता है कि यह मार्केट देशी मसालों के लिए फेमस है.

लूट सके तो लूटो

धर्म एक लूट का धंधा है, यह तो हम अरसे से कह ही रहे हैं पर हर अंधभक्त यह जानता है कि धर्म के नाम पर वह पगपग पर लुटता है और फिर भी उस का ब्रेनवाश इस कदर किया जाता है कि धर्म में लूट को भाग्य का फल मानता है और कहीं पूजापाठ के बाद उसे कोई लाभ हो जाए तो वह धर्म का कमाल मानता है.

चारधामों का प्रचार हाल में खूब जोरशोर से किया गया है और लाखों धर्मांधों को पर्यटन और पूजापाठ के दोहरे गुण गिना कर उन्हें इन स्थलों पर भेजा जा रहा है. अब पता चला है कि चारधाम के नाम पर लूट बाकायदा कंप्यूटर विज्ञान के साथ होने लगी है और अंतर्यामी चारधामों के देवता इसे रोकने में हमेशा की तरह असफल हैं.

साइबर ठगों ने चारधामों की यात्राओं की बुकिंग करने के लिए फर्जी वैबसाइटें बना रखी हैं जो गूगल को पैसे देने पर सब से ऊपर आ जाती हैं. लोग इन वैबसाइटों पर हर तरह की सुविधा, पक्की बुकिंग, टाइम, दाम, जगह जब पाते हैं तो उन्हें विश्वास हो जाता है और नैटवर्किंग या क्रैडिट कार्ड से भुगतान कर डालते हैं.

ये शातिर लोग हैलिकौप्टर बुकिंग, मंदिर टिकट बुकिंग, ट्रैवल बुकिंग, होटल बुकिंग, पंडित बुकिंग, स्वास्थ्य सेवा बुकिंग करते हैं और पैसे पहले रखा लेते हैं. शुरू में इन्हें सेवा लेने के जम कर फोन भी आते हैं और एक बार पैसे खाते से गए नहीं कि सन्नाटा छा जाता है. बेईमानीईमानदारी का चोलीदामन का साथ है. दोनों साथ चलते हैं पर जिस धर्म को जीवन को सुधारने, शराफत सिखाने, कल्याण करने और लक्ष्मी बरसाने वाला कह कर रातदिन प्रचारित किया जाता है वहीं पहले कदम पर लूट होनी शुरू हो जाए तो आश्चर्य तो नहीं लगता पर धर्म की पोल जरूर खोलता है.

धर्म का बाजार लूटता है. दुनियाभर में भव्य चर्च, मसजिदें, बौध बिहार, गुरुद्वारे, मंदिर उस चंदे और दान से बने हैं जो काल्पनिक वादों के बल पर वसूला गया है. हर धर्म में पोल ही पोल हैं और इसीलिए हर धर्म पोल खोलने को ईशनिंदा कहता है और राजाओं व सरकारों को पटा कर ईशनिंदा को धार्मिक भावनाएं भड़काने का नाम दे कर अपराध घोषित कर रखा गया है.

जो वैबसाइटें बेईमानी कर के पैसा लूट रही हैं वे असल में तो चंदा और दान ही जमा कर रही हैं. क्व10 हजार चढ़ाओ अवश्य संतान होगी. अदालत में केस डालेंगे, शेयरों के दाम बढ़ेेंगे, जल्दी शादी होगी और हैलिकौप्टर बुकिंग मिलेगी, टैक्सी स्टेशन पर खड़ी मिलेगी, गाइड हर जगह मिलेगा के  झूठों में आखिर अंतर क्या है. न पहले मामले में कुछ मिलता है न दूसरे में. धर्मांध तो खोएगा ही, चाहे मूर्ति के आगे खोए या मूर्ति के असलीनकली एजेंट के आगे.

वसीयत: भाग 3- क्या अनिता को अनिरूद्ध का प्यार मिला?

इस में चेतना को सजग रखने की बात कही गई है. दृष्टि का केवल एक ही जीवन पर केंद्रित रहना किसी छलावे से कम नहीं है और इंसान ताउम्र यही दुराग्रह करता रहता है कि उस की मृत्यु एक अंत है. अनीता चाहे मृत्यु को कितना भी बौद्धिक दृष्टिकोण से देख रही थीं, लेकिन वे अंदर से सिहर जातीं, जब भी उन्हें खयाल आता कि यह सुंदर देह वाला उन का प्रेमी 2-3 महीने से ज्यादा का मेहमान नहीं है.

लेकिन अनीता सशक्त महिला थीं, किसी दूसरे को स्नेह और करुणा देने के लिए व्यक्ति को पहले अपने भीतर से शक्तिशाली होना पड़ता है और वे तो भावनात्मक तौर पर हर दिन मजबूत और परिपक्व हो रही थीं. अनिरुद्ध की हालत खस्ता थी लेकिन अनीता के साथ के कारण वह जीवंत था. पलपल करीब आती मृत्यु को साक्षी भाव से देख रहा था जैसा अनीता उसे उन दिनों सिखा रही थीं.

एक शाम सहसा अनिरुद्ध ने अनीता का हाथ पकड़ लिया और अपने पास बैठने को बोल दिया. यह कुछ अटपटा सा था क्योंकि उन दोनों के रिश्ते में कभी इतनी अंतरंगता नहीं थी.  ‘‘तुम अपना ध्यान रखना मेरे जाने के बाद,’’ कह वह बच्चे की तरह अनीता से लिपट गया. अनीता में वात्सल्य से ले कर रति तक के सब भाव उमड़ने लगे.

दोनों मौन में चले गए. उन के स्पर्श एकदूसरे में घुलते रहे. अंधेरा उतर आया था. अंधकार, मौन और प्रेम उन दोनों को अभिन्न कर रहा था. सभी विचार और तत्त्व विलीन हो रहे थे और केवल सजगता बची हुई थी. केंद्रित, शुद्ध, निर्दोष.

अगले दिन अनिरुद्ध की तबीयत काफी बिगड़ गई. उस के पिता और अनीता उस को फिर से अस्पताल ले गए. रास्तेभर अनीता अनिरुद्ध से अस्पष्ट और खंडित वार्त्तालाप करती रहीं, ‘‘जाना मत अनिरुद्ध. मेरे लिए रुक जाओ.’’ मगर हुआ वही जो होना तय था.

अनिरुद्ध चला गया. अगली सुबह अनिरुद्ध का अंतिम संस्कार कर दिया गया. अनीताजी का गला रुंधा हुआ था. अनिरुद्ध के पिता 4 साल पहले अपनी पत्नी को खो चुके थे और अब बेटा भी… 1 हफ्ता बीत चुका था. अनीता किसी से कुछ बोल नहीं पाईं और आंसू छिपाती हुईं उस कमरे में चली जातीं, जहां अनिरुद्ध रहता था.

उस की तसवीर के सामने खड़ी हो कर अनीता के सब्र का बांध टूट जाता और वे बेतहाशा रोने लगतीं.  एक सुबह अनीता शिमला वापस जाने की तैयारी कर रही थीं. इतने में अनिरुद्ध के पिता उन के कमरे में आ गए और बोले, ‘‘बेटी, सोच रहा हूं किसी युग में तुम ऋषिपुत्री या तिब्बती योगिनी रही होगी.

नारीमन की अंतरंग तरंगों में बहने के लिए संसार को विकास क्रम की एक लंबी यात्रा पूरी करनी है अभी, तुम स्त्रियां किस आयाम में रहतीं. संभव कर लेतीं तुम लोग असंभव को भी. इतनी बड़ी बीमारी के बावजूद मेरा बेटा बिना कष्ट के बहुत शांति से अपनी अगली यात्रा पर चला गया.

सम्यक ज्ञान का वह मानदंड जहां जाने वाले की अनुपस्थिति भी उपस्थिति बन जाती है और समस्त प्रयोजनों की स्वत: सिद्धि बन जाती… काश, मैं वक्त रहते समझ पाता तुम दोनों के अव्यक्त संवाद तो आज,’’ उन का गला भर आया. कुछ संभल कर वे फिर बोले, ‘‘तुम ने जो अनिरुद्ध के लिए किया वह कोई और नहीं कर सकता था.

कोई शब्द ऐसा नहीं जो धन्यवाद कर सकूं. मैं अपनी सारी संपत्ति तुम्हारे नाम कर रहा हूं. वकील साहब नई वसीयत ले कर नीचे आ गए हैं, उन से आ कर मिल लो.’’ अनीता सिसक उठीं. उन्हें किसी सांसारिक जीवन की वसीयत की जरूरत नहीं थी.

उन्हें अनिरुद्ध वसीयत में मिल चुका था, पूर्णरूप से अविभाज्य, पूरी तरह उपस्थित. उस का प्यार, उस की यादें अनीता की अंतर्जात पारदर्शी प्रभा को अवलोकित कर रही थीं. यह संपूर्ण प्राचुर्य का मामला था, जो द्वैत सीमाओं और अंतरिक्ष से भी विस्तृत था.

Film review: ‘‘जरा हट के जरा बच के- अहम मुद्दे को उठाने के बावजूद निराश करती…..’’

रेटिंगः पांच में से डेढ़ स्टार

निर्माताः जियो स्टूडियो और मैडॉक फिल्मस

लेखकः लक्ष्मण उतेकर, मैत्रेयी बाजपेयी और रामिज इल्हाम खान

निर्देशकः लक्ष्मण उतेकर

कलाकार: विक्की कौशल,सारा अली खान, राकेश बेदी, सुष्मिता मुखर्जी, इनामुल हक, नीरज सूद, शारिब हाशमी व अन्य

अवधि: दो घंटे 12 मिनट

2007 में ‘‘खन्ना एंड अय्यर’’ से बतौर कैमरामैन कैरियर की शुरूआत करने वाले लक्ष्मण उतेकर बाद में ‘इंग्लिश विंग्लिश’,‘डिअर जिंदगी’,‘हिंदी मीडियम’ और ‘ 102 नॉट आउट’ में बतौर कैमरामैन काम करते नजर आए. इस बीच उन्होने दो मराठी फिल्मों ‘टपाल’ व ‘लालबागची राणी’ का निर्देश किया.

2109 में उन्होने हिंदी फिल्म ‘लुका छिपी’ का निर्देशन किया. फिर ‘मिमी’ निर्देशित की. अब वह ‘जरा हटके जरा बच के ’’ लेकर आए हैं. इस फिल्म में विक्की कौशल और सारा अली खान की जोड़ी है.बतौर निर्देशक लक्ष्मण उतेकर ने फिल्म ‘‘लुका छिपी’’ में ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में रहने वाले कपल की कहानी पेश की थी,जो कि अपने माता पिता को झांसा देने के लिए नकली शादी करते हैं. अब उन्होने नई फिल्म ‘‘जरा हटके जरा बच के’’ में ऐसे शादीशुदा जोड़े की काहनी बयां की है,जो कि मकान के लिए तलाक ले लेता है. उनके माता पिता को सिर्फ यह पता है कि बेटे ने बहू को तलाक दे दिया. मजेदार बात यह है कि ‘जरा हटके जरा बचके’ में मकान के लिए तलाक का नाटक करने वाले विक्की कोशल ने नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही फिल्म  ‘‘लव पर स्क्वायर फुट’’ में मकान के लिए सुविधाजनक शादी करते हैं. मतलब इंसानी रिश्ते और विवाह संस्था इतनी कमजोर है कि ‘मकान’ की अहमियत बढ़ गयी है. तीन तीन लेखकों ने मिलकर फिल्म का सत्यानाश कर दिया है.वैसे फिल्मकार ने सरकार द्वारा मुफ्त में बांटे जा रहे पक्के मकान पर माफिया की पकड़ की पोल खेली है,पर बात जमी नहीं.

कहानीः

फिल्म की कहानी शुरू होती है इंदौर में अपनीं मां ममता( अनुभा  ) व पिता वेदप्रकाश दुबे(आकाश खुराना ) के साथ रहे रहे कपिल दुबे(विक्की कौशल ) की दूसरी शादी की दूसरी सालगिरह के दिन से.कपिल दुबे ने सौम्या आहुजा(सारा अली खान ) से प्रेम विवाह किया है. इंदौर में मकान छोटा है.अब उसी मकान में कपिल के मामा(नीरज सूद ) व मामी (कनुप्रिया पंडित ) भी रहने आ गए हैं, जिसके चलते कपिल व सौम्या को अपना कमरा मामा मामी को देना पड़ा है और अब उनकी अपनी प्रायवेसी खत्म हो गयी है. छह माह हो गए पर मामा मामी जाने का नाम नही ले रहे. उपर से कपिल व सौम्या के खिलाफ कपिल के माता पिता को भड़काते रहते हैं.कपिल योगा शिक्षक है. सौम्या  एक कोचिंग क्लास में पढ़ाती हैं.कपिल व सौम्या नया मकान खरीदना चाहते हैं,पर पैसे नही है. तभी ‘जन सुविधा आवास योजना’ का पता चलता है,पर कपिल के पिता के नाम पर पक्का मकान है. इसलिए एक एजेंट की सलाह पर कपिल व सौम्या अजीबीगरीब तरीके से तलाक लेते हैं.सौम्या किराए के मकान में रहने जाती है और ‘जन सुविधा आवास योजना’ में आवेदन करती हैं. लाटरी में नाम आ जाए इसके लिए एजेंट भगवानदास (इनामुल हक )को चार लाख रूपए दिए जाते हैं.

अब कपिल,सौम्या का भाई बनकर सौम्या से मिलने जाते रहते हैं.सौम्या जिस कालोनी में किराए के मकान में है,उसके चौकीदार (षाबिर हाषमी  ) को दाल में काला नजर आता है. खैर,कई घटनाक्रम बदलते हैं और फिर सौम्या को ‘‘जन सुविधा आवास योजना’ से मकान मिल जाता है.पर कपिल के मामा का सच जानने के बाद कपिल व सौम्या को शर्मिंदगी होती है और वह प्र्रायष्चित के तौर पर अपना ‘जन सुविधा आवास योजना’ का मकान चौकीदार को देकर पुनः शादी के बंधन में बंध जाते हैं.

लेखन व निर्देशनः

बतौर निर्देशक लक्ष्मण उतेकर ने अपनी पहली फिल्म ‘‘लुका छिपी’’ में संकेत दे दिया था कि उन्हे विवाह संस्था में यकीन नही है. पर अब लग रहा है कि लक्ष्मण उतेकर व उनके लेखकों को भारतीय समाज व रिष्तों की भी समझ नही है. बहरहाल,लक्ष्मण उतेकर ने इस बार अपने आपस पास घट रहे घटनाक्रमों को पकड़ते हुए सरकार द्वारा मुफ्ट में बांटे जा रहे पक्के मकान पर किस तरह माफिया का कब्जा है,इसकी पोल डरते डरते खोलने का प्रयास किया है.

इसे वह सही ढंग से फिल्म में चित्रित नही कर पाए.पर इसके लिए उन्होने बहुत ही अजीबोगरीब कहानी बुनी है,जो कि दर्शकों को निराश करती है. वास्तव में समाज के किसी मुद्दे को उठाना आसान है,पर उस मुद्दे के इर्द गिर्द सही पटकथा लिखना आसान नही होता. फिल्म में अदालत के दृष्य में वकील मनोज(हिमांशु कोहली),वकील की बजाय अपराधी गिरोह का सरगाना/ड्ग माफिया ही नजर आता है. लोगों को हंसाने के मकसद से जिस तरह से अदालत की काररवाही रखी गयी है,वह लेखकों व निर्देशक के दिमागी दिवालियापन का प्रतीक है.

फिल्म का गलत ढंग से किया गया प्रचार भी इस फिल्म को ले डूबा. फिल्म में रोमांस या प्यार तो नही है. कुछ जगहों पर हवश का नजारा मिल सकता है.पर फिल्म को प्रेम कहानी के तौर पर प्रचारित किया गया.लेखक व निर्देशक देश की जनता को मूर्ख समझते हैं. तभी तो जो फिल्म मे नही है,उसी का प्रचार किया गया.ट्रेलर लांच के दौरान एंकर ने जमकर तलाक की तारीफें की थीं. आखिर किस तरह का समाज लेखक व निर्देशक चाहते हैं? सच यह है कि आज की तारीख में अच्छे लेखकों, निर्देषकों के साथ ही फिल्म प्रचारको का घोर अभाव है. फिल्म प्रचारक का काम होता है कि वह फिल्म को इस तरह से प्रचारित करे कि दर्षक के मन में उस फिल्म को देखने की उत्सुकता जागृत हो. हो सकता है कि फिल्म प्रचारक की बात निर्माता व निर्देशक सुनने की बजाय अपने इशारे पर उन्हे नचाते हो.

महज कालेज के मैदान या सिनेमाघरों के अंदर कुछ लोगों के बीच हीरो हीरोइन के नाचने गाने या कुछ संवाद बोलने से  फिल्म के प्रति दर्शकों के मन में उत्सकुता जागृत नही होती. लोग भूल जाते हैं कि सोशल मीडिया युग में इस तरह के प्रचार इवेंट में सेल्फी खींचने भीड़ आती हैं और उस सेल्फी को सोशल मीडिया पर डालकर अपने दोस्तों के बीच चर्चा का विषय बनने के बाद वह फिल्म को भूल जाता है. यह उसी तरह से होता है जैसे कि चुनाव की सभा में चंद पैसे लेकर इकट्ठा हुई भीड़ वोट नहीं देती.वोट देने के लिए तो जेब से पैसे नही खर्च होेते,पर फिल्म देखने के लिए दर्षक को अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं.फिल्मकार व प्रचारक को फिल्म की विषयवस्तु को इस तरह से प्रचारित करना चाहिए कि दर्शके अपनी जेब से पैसे निकालने के लिए उत्सुक हो जाए.इस तर्ज पर भी ‘जरा हट के जरा बच के’ मार खा गयी. फिल्म का गलत प्रचार भी इसे ले डूबा. इन दिनों हर प्रेस  में कलाकार के फैंस के नाम पर भाड़े के लोग बुलाए जाते हैं,जो कि सिनेमाघर में नकली हंसी हंसने से लेकर फिल्म के बेहतर होने का गुणगान तक करते हैं. सिनेमाघर में मेरे पीछे बैठ कर खूब हंस रहे चार लड़के प्रेस शो खत्म होने के बाद बस में हमारे साथ थे और वह अपने दोस्तांे को फोन पर बता रहे थे कि उनका वक्त बर्बाद हो गया.वह लोग अपना पैसा व वक्त बर्बाद न करे.टिकट खरीदकर इस फिल्म को न देखें…यह है कड़वा सच..

फिल्मकार ने बेवजह के बाथरूम में विक्की कौशल के अर्धनग्न नहाने के दृष्य रखकर लोगों को जबरन हंसाने का प्रयास किया है,पर वह असफल ही रहते हैं.

पूरी फिल्म देखकर अहसास होता है कि फिल्म के तीनो लेखक व निर्देषक देश व समाज से पूरी तरह कटे हुए हैं. उन्हे यही नही पता कि किसी भी सरकारी योजना के मकान को वह यॅूं ही किसी को नही दे सकते. इस तरह की योजना के अंतर्गत मिले मकान के मालिक का नाम नही बदलता. ईएमआई व किश्ते भरना आसान नही होता. मुंबई में म्हाड़ा के मकान जिन्हे पूरा पैसा देकर खरीदा जाता है,उन्हे भी मकान मालिक कई वर्षों तक बेच या दूसरो को नही दे सकता.

किसी भी सरकारी योजना के मकान की चाभी पोस्ट आफिस या कूरियर के माध्यम से नही भेजे जाते. लाभार्थी को स्वयं लेने जाना पड़ता है. फिल्मकार ने फिल्म के अंदर इंदौर की आंचलिक भाषा मालवी व निमाड़ी  में कलाकारों से संवाद बुलवाकर इंदौर शहर को स्थापित करने में सफल रहे हैं.  इसके अलावा फिल्म को एडीटिंग टेबल पर कसने की जरुरत थी. पता नही क्यो निर्देशक ने बेवजह कुछ दृष्यों को रबर की तरह खींचा है.फिल्म के संवाद भी प्रभावषाली नही है. शुरू से फिल्म जिस टोन मे चलती रहती है,क्लायमेक्स में जाकर वह टोन एकदम से हास्य से इमोशनल हो जाता है. उन दृष्यों को देखकर दर्षक सोचता है कि क्ष इतनी बड़ी बीमारी की षिकार मामी अपने भांजे के परिवार को बर्बाद करने के लिए हमेशा उल्टा सुल्टा बोलती रह सकती हैं? छह माह के दौरान घर में कोई भांप नही पाया कि वह इस कदर बीमार हैं. उन्हे दर्द तक नही हुआ. यहां आकर निर्देशक व लेखक एक बार फिर बुरी तरह से मात खा जाते हैं.

अभिनयः

विक्की कौशल को यह समझ लेना चाहिए कि अपने शारीरिक सौश ठव का प्रदर्शन कर वह अच्छे अभिनेता नही बन सकते. यदि वह अपने अभिनय कैरियर को डूबने से बचना चाहते है तो उन्हे अपनी अभिनय शैली पर विचार करने के साथ ही बेहतरीन कथानक वाली फिल्में चुननी पड़ेंगी.बड़े बड़े स्टूडियो के नाम के झांसे या निर्देशक की चिकनी चुपड़ी बातों से उन्हे बचना होगा.

चेहरे पर काला बिंदू चिपका लेने या दो बड़े दांत चिपका लेने से वह अच्छे कलाकार कभी नही बन सकते. विक्की कौषल को अभिनेता गुलषन ग्रोवर से कुछ सीखना चाहिए कि नकली बड़े दांतों का उपयोग किस तरह से कर अपने अभिनय का जलवा विखेरते थे. यूं तो यह फिल्म सारा अली खान के किरदार सौम्या के ही इर्द गिर्द घूमती है. विक्की का कपिल का किरदार तो महज उसका सहायक ही है.जब शुरूआत में साड़ी पहने हुए बिंदी लगाए सौम्या के किरदार  में सारा अली खान परदे पर नजर आती हैं,तो अहसास होता है कि इसमें सारा अली खान के अभिनय का जादू नजर आएगा.मगर चंद दृष्यों बाद यह भ्रम दूर हो जाता है.वह साड़ी में न सिर्फ सुंदर बल्कि ग्लैमरस भी नजर आती हैं. मगर अंतरंग दृष्यों मेें उनका अभिनय शून्य है. गुस्सा तो वह हो ही नही सकती. उनके चेहरे पर गुस्से के भाव आते ही नही है.

सौम्या के पिता आहुजा के किरदार में राकेश बेदी और मां के किरदार मे सुष्मिता मुखर्जी अपने अभिनय की छाप छोड़ जाती हैं.सरकारी मकान दिलाने वाले एजेंट भगवानदास के किरदार में इनामुल हक के अभिनय में वह चमक नजर नही आती,जिसे वह अपनी पिछली फिल्मों में दिखा चुके हैं.वाचमैन के किरदार में षारिब हाषमी का अभिनय ठीक ठाक है. कपिल की मामी के किरदार में कनुप्रिया पंडित जमी हैं.मगर मामा के किरदार मंे नीरज सूद निराष करते हैं.वकील मनोज के किरदार में हिमांषु कोहली ने महज ओवर एक्टिंग की है.उन्हे समझना चाहिए कि अदालत में अंडरवर्ल्ड सरगना की तरह दहाड़ना अभिनय नही है.

Father’s Day 2023: पापा की जीवनसंगिनी- भाग 2

पापा की बात सुन कर नानी और मौसी का मुंह जरा सा रह गया. पापा को इतनी गंभीर मुद्रा में उन्होंने पहली बार देखा था. चूंकि दोनों के घर दिल्ली में ही थे सो वे उसी समय भनभनाती हुई अपने घर चली गईं पर पापा की बात सुन कर मेरी आंखों में बिजली सी कौंध गई. आज मैं 21वर्ष की होने को आई थी पर मैं ने पापा का इतना रौद्ररूप कभी नहीं देखा था.

हमारे घर में बस मां और उस के परिवार वालों का ही बोलबाला था. मां कालेज में प्रोफैसर थीं और बहुत लोकप्रिय भी. नानी और मौसी के जाने के साथ ही पापा ने तेजी से भड़ाक की आवाज के साथ दरवाजा बंद कर दिया और मेरी ओर मुड़ कर बोले, ‘‘अरे पीहू तुम अभी यहीं बैठी हो, कुछ हलका बना लो भूख लगी है.’’

पापा की आवाज सुन कर मुझ कुछ होश आया और मैं वर्तमान में लौटी- फटाफट खिचड़ी बना कर अचार, पापड़ और दही के साथ डाइनिंगटेबल पर लगा कर आ कर बैठ गई.

पापा जैसे ही डाइनिंगरूम में आए तो सब से पहले मेरे सिर पर वात्सल्य से हाथ फेरा

और प्यार से बोले, ‘‘बेटा, तुम्हारी मां हमें अनायास छोड़ कर चली गई. 21 साल की उम्र विवाह की नहीं होती. मैं चाहता हूं कि तुम आत्मनिर्भर बनो ताकि जीवन में कभी भी खुद को आर्थिक रूप से कमजोर न समझ. एक स्त्री के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना बेहद आवश्यक है क्योंकि आर्थिक आत्मनिर्भरता से आत्मविश्वास आता है और आत्मविश्वास से विश्वास जो आप को किसी भी अनुचित कार्य का प्रतिरोध करने का साहस प्रदान करता है. कल से ही अपनी पढ़ाई शुरू कर दो क्योंकि 2 माह बाद ही तुम्हारी परीक्षा है और जीवन में कुछ बनो. क्यों ठीक कह रहा हूं न मैं?’’ मुझे चुप बैठा देख कर पापा ने कहा.

‘‘जी,’’ पापा की बातें मेरे कानों में पड़ जरूर रहीं थीं परंतु मैं तो पापा को ही देखे ही जा रही थी. उन का ऐसा व्यक्तित्व, ऐसे उत्तम विचारों से तो मेरा आज पहली बार ही परिचय हो रहा था. मैं ने जब से होश संभाला था घर में मम्मी के मायके वालों का ही आधिपत्य पाया था. पापा बहुत ही कम बोलते थे पर पापा जब आज इतना बोल रहे थे तो मम्मी के सामने क्यों नहीं बोलते थे, क्यों घर में नानीमौसी का इतना हस्तक्षेप था? क्यों मम्मी पापा की जगह नानी और मौसी को अधिक तरजीह देती थीं और उन के अनुसार ही चलती थीं? क्यों पापा की घर में कोई वैल्यू नहीं थी? इन यक्ष प्रश्नों के उत्तर जानना मेरे लिए अभी भी शेष था.

उस रात तो मैं सो गई थी पर फिर अगले दिन सुबह नाश्ते की टेबल पर मैं ने साहस जुटा कर पापा से दबे स्वर में पूछा, ‘‘पापा जहां तक मुझे पता है आप और मम्मी की लव मैरिज हुई थी फिर बाद में ऐसा क्या हुआ कि आप और मम्मी इतने दूर हो गए कि मम्मी ने सूसाइड करने की कोशिश की?’’

मेरी बात सुन कर पापा कुछ देर शांत रहे, फिर मानो मम्मी के खयालों में खो से गए. अपनी आंखों की कोरों में आए आंसुओं को पोंछ कर वे बोले, ‘‘हम तुम्हारी मां के घर में किराएदार थे. मेरे पापा यूनिवर्सिटी में क्लर्क थे तो उन के पापा उसी यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर. हम दोनों एक ही कालेज में पढ़ते थे. सो अकसर नोट्स का आदानप्रदान करते रहते थे. बस तभी नोट्स के साथ ही एकदूसरे को दिल दे बैठे हम दोनों. वह पढ़ने में होशियार थी और मैं बेहद औसत पर प्यार कहां बुद्धिमान, गरीब, अमीर, जातिपात और धर्म देखता है. प्यार तो बस प्यार है. एक सुखद एहसास है जिसे बयां नहीं किया जा सकता है बल्कि केवल महसूस किया जा सकता है और इस एहसास को हम दोनों ही बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहे थे. एमए करने के बाद तुम्हारी मम्मी पीएचडी कर के कालेज में प्रोफैसर बनी तो मैं बैंक में क्लर्क.

‘‘हम दोनों ही बड़े खुश थे. बस अब मातापिता की परमीशन से विवाह करना था पर जैसे ही हमारे परिवार वालों को पता चला तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया क्योंकि तुम्हारी मां सिंधी और मैं तमिल था. 3 साल तक हम दोनों ने अपनेअपने परिवार को मनाने की भरपूर कोशिश की पर जब दूरदूर तक बात बनते नहीं दिखाई दी तो एक दिन घर से भाग कर हम दोनों ने पहले कोर्ट और फिर मंदिर में शादी कर ली. तुम्हारी मम्मी के घर में एक अविवाहित बड़ी बहन और मां ही थी सो उन्होंने तो कुछ समय बाद ही हमें स्वीकार कर लिया पर मेरे घर वाले अत्यधिक जातिवादी और संकीर्ण मानसिकता के कट्टर धार्मिक थे इसलिए उन्होंने कभी माफ नहीं किया और शादी वाले दिन से ही हमेशा के लिए हम से सारे रिश्ते समाप्त कर लिए. उन्होंने अपना तबादला तमिलनाडु के ही रामेशवरम में करवा लिया और सदा के लिए यह शहर छोड़ कर चले गए.’’

‘‘इतने प्यार के बाद भी मम्मी…’’ पापा मानो मेरे अगले प्रश्न को सम?ा गए थे सो बोले, ‘‘विवाह के बाद जब तक हम भोपाल में थे तो सब कुछ ठीकठाक था. हम सुखपूर्वक अपना जीवनयापन कर रहे थे. उस समय तू 8 साल की थी जब तुम्हारी मम्मी का तबादला दिल्ली हुआ तो मैंने भी अपना ट्रांसफर करवा लिया. तुम्हारी मम्मी का मायका था दिल्ली सो वे बहुत खुश थीं. दिल्ली शिफ्ट होने के बाद तुम्हारी नानी और मौसी का आना जाना बहुत बढ गया था.

‘‘तुम्हारी मम्मी को उन पर बहुत भरोसा था. उन दोनों के जीने का तरीका एकदम भिन्न था. शापिंग करना, होटलिंग, किटी पार्टियां करना, बड़ेबड़े लोंगों से मेलजोल बढाना जैसे शाही शौक उन लोंगों ने पाल रखे थे. तुम्हारी मां बहुत भोली थी. वे कालेज में प्रोफैसर थी और मोटी तनख्वाह की मालकिन भी. इसीलिए ये दोनों उन्हें हमेशा अपने साथ रखतीं थी क्योंकि तुम्हारी मम्मी उनके सारे खर्चे उठाने में सक्षम थीं. एक बार जब मैं ने समझने का प्रयास किया.

‘‘अनु हमारे घर में इन लोंगों का इतना हस्तक्षेप अच्छा नहीं है. ये घर मेरा और तुम्हारा है तो इसे हम ही अपने विवेक से चलाएंगे न कि दूसरों की राय से. पर मेरी बात सुन कर वह उलटे मुझ पर ही बरस पड़ी कि देखो सुदेश तुम्हारे अपने परिवार वालों ने तो हम से किनारा ही कर लिया है. अब मेरे घर वाले तो आएंगेजाएंगे ही ये ही लोग तो हमारा संबल हैं यहां. मैं अपनी मांबहन के खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकती. दीदी की शादी नहीं हुई है और मां को पापा की नाममात्र की पैंशन मिलती है अब तुम ही बताओ मैं उन के लिए नहीं करूंगी तो कौन करेगा?

Father’s Day 2023: पापा की जीवनसंगिनी, भाग- 3

‘‘अनु मैं करने या उन का ध्यान रखने को मना कब कर रहा हूं मैं तो बस इतना चाहता हूं कि अपने घर को हम अपने विवेक से, अपने अनुसार चलाएं… तुम तो अपना घर ही उन के अनुसार चलाती हो… मैं ने अनु को समझने की कोशिश की पर मेरी किसी भी बात पर ध्यान दिए बिना ही अनु तुनक कर दूसरे कमरे में सोने चली गई. मैं तो विचारशून्य ही हो गया था.

कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं. खैर, इसी ऊहापोह के मध्य हमारी गृहस्थी रेंग रही थी. तुम अब 8 साल की नाजुक उम्र में पहुंच चुकी थी… तुम्हें वह दिन याद है न जब मैं ने जबरदस्ती तुम्हें अपने दोस्त नवीन के यहां रात्रि में उस की बेटी सायशा के साथ भेज दिया था क्योंकि मुझे पता था कि अनु देर रात्रि नशे की हालत में घर आएगी और मैं नहीं चाहता था कि तुम अपनी मां को उस हालत में देखो और हमारी बहस की साक्षी बनो.’’

‘‘आप को कैसे पता था कि मां उस हालत में आएगी?’’ पीहू अचानक बोल पड़ी.

‘‘क्योंकि अब तक मैं तुम्हारी मौसी और नानी की देर रात तक चलने वाली पार्टियों का मतलब बहुत अच्छी तरह समझ चुका था और उस दिन शाम को जब मैं बैंक से निकल रहा था तो अनु का फोन आया था कि मैं कालेज से सीधी दीदी के यहां आ गई हूं. देर से घर आऊंगी. दीदी के यहां एक पार्टी है. तुम पीहू को देख लेना. उस दिन देर रात तुम्हारी मम्मी एकदम आधुनिक बदनदिखाऊ ड्रैस पहने नशे में गिरतीपड़ती घर आई थी. किसी तरह उसे सुलाया था मैं ने. जब दूसरे दिन रात के बारे में बात की तो बोली कि देखो वे लोग बहुत मौडर्न हैं. तुम्हारी तरह दकियानूसी सोच वाले नहीं हैं. पार्टियांशार्टियां और ऐसी ड्रैसेज यह तो मौडर्न कल्चर है पर तुम नहीं समझगे. कल क्या पार्टी थी. मजा ही आ गया. मैं तो कहती हूं तुम भी चला करो, ‘‘अनु को अपने बीते कल पर कोई अफसोस नहीं था यह देख कर मैं हैरान था.

‘‘उस की नजर में पार्टियां करना, मौडर्न कपड़े पहनना, बड़े लोगों के साथ

बैठना, उठना और उन से हर प्रकार के संबंध बनाना उच्छृंखलता नहीं आधुनिकता के पर्याय हैं. व्यक्ति आधुनिक अपनी मानसिकता और विचारों से होता है न कि बदनउघाड़ू कपड़े पहनने और शराब पी कर फूहड़ता से भरे नृत्य करने से.

‘‘मेरे बारबार समझने पर भी कुछ असर नहीं हो रहा था बल्कि रोज घर में कलह होने लगी तो मेरे पास आंखें मूंदने के अलावा और कोई चारा भी नहीं बचा था. तुम्हें वह न्यू ईयर याद है जिसे तुम ने सायशा के घर मनाया था और मैं ने खुद तुम्हें वहां तुम्हारी जरा सी जिद करने पर भेज दिया क्योंकि उस 31 दिसंबर को हम तीनों यानी मैं, तुम और तुम्हारी मम्मी ही एकसाथ मनाने वाले थे पर अचानक तुम्हारी नानी, मौसी ने अपनी पार्टी में चलने को तुम्हारी मम्मी को तैयार कर लिया और हमारा प्लान कैंसिल कर के मम्मी उन के साथ चली गई. जब मैं ने उस से कहा तो बोली कि पीहू तो यों भी सायशा के घर जाना चाहती है तो उसे भेज दो और तुम भी अपने दोस्तों के साथ कुछ प्लान कर लो.’’

‘‘तो उस दिन आप अकेले ही रहे थे?’’

‘‘हां वह न्यू ईअर मैं ने अकेले ही मनाया था और उस दिन तुम्हारी मम्मी से मेरी आखिरी बहस हुई थी क्योंकि उस दिन भी तुम्हारी मम्मी न्यू ईयर की पार्टी मनाने तुम्हारे दूर के मामाजी के फार्महाउस पर गई थी अपनी मां, बहन के साथ. रात्रि के 3 बजे घर लौटी थी नशे में मदहोश लड़खड़ाती हुई. सुबह जब मैं ने इस बावत बात करनी चाही तो वह फट पड़ी कि मेरी जिंदगी, मेरा पैसा, मेरा परिवार तुम्हारा तो कुछ नहीं ले रही हूं मैं, मैं कैसे भी जीऊं. जब मैं तुम से कोई अपेक्षा ही नहीं रखती तो तुम अपनी जिंदगी जीयो और मैं अपनी. तब मैं ने कहा कि अनु तुम भूल रही हो कि हमारी बेटी अब किशोर हो रही है और उसे अच्छा माहौल देना हम दोनों की ही जिम्मेदारी है. इस पर बोली कि अरे तो बेटी की परवरिश के नाम पर क्या मैं अपनी जिंदगी जीना छोड़ दूं? अपने शौक त्याग दूं. आदर्श भारतीय नारी की भांति घर में बैठ जाऊं? पल तो रही है किस चीज की कमी है उसे? मैं अपनी जीवनशैली में कोई बदलाव नहीं कर सकती. 2-2 मेड लगा रखी हैं, अच्छे कौंवेंट स्कूल में पढ़ रही है? अच्छी ट्यूशन लगा रखी है और क्या चाहिए उसे?’’

‘‘उस दिन मैं समझ गया था कि अब तुम्हारी मम्मी को नहीं सम?ाया जा सकता क्योंकि वह तो अपनी सोचनेसमझने की शक्ति ही खो चुकी थी. इसलिए मैं ने आंखें बंद कर के मौन धारण करना ही उचित समझ और उस दिन का इंतजार करने लगा जब तुम्हारी मम्मी अपने विवेक से कुछ सोचसमझ पाएं. जब अपना ही सिक्का खोटा था तो मैं तुम्हारी नानी और मौसी को क्या दोष देता. दरअसल, अति आधुनिकता के नाम पर उच्छृंखलता ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा था.

‘‘तुम्हारी मौसी और नानी ने उसे अपने अनुसार ढाल लिया था. उस के पैसे पर स्वयं ऐश करने लगी थीं क्योंकि उन्हें पता था कि तुम्हारी मां वही करेंगी जो वे कहेंगी. धीरेधीरे वे इस से पैसा ऐठने लगी थीं. कुछ समय पहले उसे शायद सब समझ में आने लगा था पर अब सब हाथ से रेत जैसे फिसल गया था.

अपनी मां, बहन को वह अपनी जिम्मेदारी समझ न तो छोड़ पा रही थी और न ही कुछ कह पा रही थी जिस से वह तनाव में रहने लगी थी. कुछ दिनों से वह चुप सी रहने लगी थी. पिछले कुछ समय से अनिद्रा की शिकार थी. मैं कुछ कर पाता उस से पहले ही उस ने नींद की गोलियां खा कर मौत को अपने गले लगा लिया और मेरा इंतजार अधूरा ही रह गया.

‘‘वह दिल की बुरी नहीं थी. बहुत भोली थी इसीलिए तो दूसरे की बातों पर सहज भरोसा कर लेती थी. अब शायद तुम्हें मेरे मौन का कारण समझ आ गया होगा. मैं बस इतना चाहता हूं कि तुम इस साल अपनी ग्रैजुएशन पूरी कर लो फिर कंपीटिशन लड़ो और आत्मनिर्भर बनो. उस के बाद ही मैं तुम्हारा विवाह करूंगा.’’

उस के बाद पापा ने मुझे पढ़ा कर आत्मनिर्भर बनाने में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी. ग्रैजुएशन के बाद मैं ने बैंक का ऐग्जाम दिया और जब मेरा एकसाथ 2 बैंकों में चयन हुआ तो पापा की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. पहली बार जब मैं अपनी छुट्टियों में घर आई थी तो पापा अपनी आंखों में आंसू भर कर बोले थे, ‘‘मेरी तपस्या पूरी हो गई बेटा अब बस तुम्हारा विवाह करना शेष है.’’

‘‘पापा मेरे बैंक में…’’

‘‘क्या कोई पसंद है तुम्हें… फिर तो मेरी सारी चिंता ही दूर हो गई… बताओ कौन है वह…’’ पापा खुशी और आश्चर्य से उछल पड़े.

‘‘हां पापा…पसंद तो है पर वह जाति… धर्म… आप को… परेशानी…’’ मेरे शब्द जैसे मुंह में ही बर्फ की भांति जमे से जा रहे थे.

‘‘नहीं बेटा मैं जातिधर्म को नहीं मानता. मेरी नजर में सिर्फ एक ही धर्म है और वह है इंसानियत का. ये जाति की दीवारें तो हम इंसानों ने खड़ी की है. तुम खुल कर अपनी पसंद बताओ मैं तुम्हारे द्वारा लिए गए हर फैसले में तुम्हारे साथ हूं,’’ पापा के इतना कहते ही मैं लिपट गई थी उन से और खुश होते हुए बोली, ‘‘मैं कल आप को उस से मिलवाऊंगी.’’

अगले दिन मैं अहमद के साथ पापा के सामने थी. अहमद से मिल कर पापा बहुत खुश हुए और कुछ ही दिनों में बिना कोई देर किए पापा ने हम दोनों को विवाह के पवित्र बंधन में बांध दिया. मु?ो आज भी विदाई के समय पापा के शब्द याद हैं.

‘‘बेटा बस यही आशीष दूंगा कि अपने घर को तुम दोनों अपने विवेक से मिलजुल कर चलाना… अपने घर में किसी का भी दखल बरदाश्त मत करना फिर चाहे वह मैं ही क्यों न होऊं.’’

‘‘उस के बाद घटनाक्रम कुछ ऐसा बदला कि हम दोनों का ट्रांसफर दिल्ली से आगरा हो गया और पापा रह गए दिल्ली में अकेले. अचानक अहमद की आवाज से पीहू चौंक गई.’’

‘‘पीहू दिल्ली आने वाला है गेट पर चलते हैं.’’

‘‘पीहू अहमद के पीछेपीछे चलने लगी. एम्स अस्पताल में आईसीयू में

तमाम नलियों में आबद्ध पापा को लेटे देख कर तो पीहू की रुलाई ही छूट गई. अहमद ने बड़ी मुश्किल से उसे संभाला. तभी उस के पड़ोस में रहने वाली मिशेल आंटी ने एक बैग के साथ प्रवेश किया.

‘गुम है किसी के प्यार में’ की ‘करिश्मा’ स्नेहा भावसार ने छोड़ा शो

स्टार प्लास का टॉप सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ दर्शको में काफी फेमस है. शो में करिश्मा च्वहाण का रोल प्ले कर रही स्नेहा भावसार. हाल ही में को एक्टर विहान वर्मा के साथ रिलेशनशिप की अफवाह को लेकर काफी सुर्खियों में रही हैं. लेकिन, स्नेहा भावसार ने एक इंटरव्यू में विहान को डेट करने की खबरों को खारिज किया और कहा कि वे सिर्फ अच्छे दोस्त हैं इससे ज्यादा कुछ नहीं. खबरों के मुताबिक, स्नेहा ने बताया है कि वे ‘गुम है किसी के प्यार में’ शो को छोड़ रही हैं.

क्या है वजह शो छोड़ने की

ई-टाइम्स को दिए इंटरव्यू में स्नेहा भावसार ने बताया “ शो छोड़ने का फैसला मैंने अभी हाल ही में नहीं लिया था. मैं शो से बाहर निकालने का इंतजार कर रही थी क्योंकि मैं कुछ नया करना चाहती थी. मैं शो इसलिए छोड़ रही हूं मुझे एक नया प्रोजेक्ट मिल गया है.

 

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सही समय का कर रही थी इंतजार

“मैं केवल नए मौके चाह रही थी क्योंकि यह मेरे लिए नीरस हो गया था क्योंकि मैंने इतने लंबे समय तक इस किरदार को निभाया. मैंने अपनी चिंताओं और व्यू पॉइंट को क्रिएटिव के साथ शेयर  किया. लेकिन शो को अचानक छोड़ना पॉसिबल नहीं था. जब शो में लीप लाने की बात आई तो मेरे क्रिएटिव डायरेक्टर ने मुझसे ये फैसला लेने के लिए कहा कि मैं जारी रखना चाहता हूं या नहीं. तो फिर मैंने फैसला किया कि अगर मेरे बाहर निकलने से ट्रैक पर असर नहीं पड़ेगा, तो मुझे बाहर निकलना अच्छा लगेगा. मैं सही टाइम का इंतजार कर रही था और अब ये आ गया है.”

शो के जेनरेशन लीप पर एक्ट्रेस ने कहा

गुम है किसी के प्यार में’ में जेनरेशन लीप के बारे में बात करते हुए, स्नेहा ने कहा, “ठीक है, मैं बस उन्हें शो के लिए शुभकामनाएं दे रही हूं. इसके अलावा, मैं लीप का हिस्सा नहीं हूं इसलिए मैं आपको कुछ नहीं बता सकती. मेरे पास है इसके बारे में कोई बात नहीं है.”

गलत है जैंडर के हिसाब से न्याय

दिसंबर, 2017 में एक आदमी की शादी हुई पर उस की पत्नी से नहीं बनी. 1 साल के भीतर ही ऐसे हालात हो गए कि उसे लगा इस रिश्ते में रहा तो मर जाएगा. इसलिए उस ने पत्नी से अलग होने का फैसला ले लिया और कोर्ट जा कर तलाक की अपील की. वह इंसान 10 साल तक केस लड़ता रहा, लेकिन इस दौरान उस पर क्या कुछ गुजरा वह बता नहीं सकता.

पत्नी ने 498-ए का केस कर दिया. वह जेल चला गया. लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि सच क्या है. कहीं यह मुकदमा झठा तो नहीं है. खैर, किसी तरह उसे कोर्ट से जमानत मिली तो उस ने अपना केस खुद लड़ने का फैसला किया. फिजियोथेरैपिस्ट की नौकरी छोड़ कर उस ने वकालत की पढ़ाई की ताकि खुद को बेगुनाह साबित कर सके.

उस की मेहनत रंग लाई और वह बाइज्जत बरी हो गया. पत्नी से उसे तलाक भी मिल गया. लेकिन उसे पत्नी से आजाद होने की भारी कीमत चुकानी पड़ी. समय और पैसे की बाबादी हुई वह अलग.

टूट गया सब्र का बांध

ऐसा ही एक और मामला है जहां तलाक के बाद भी पत्नी ने अपने पति का पीछा नहीं छोड़ा. वह पति के औफिस जा कर हंगामा शुरू कर देती, उसे गालियां देती, शोर मचाती. आजिज आ कर वह इंसान नौकरी छोड़ कर भाग गया, तो वह उसे व्हाट्सऐप पर मैसेज कर परेशान करने लगी. उसे लोगों से पिटवाया, उसे अगवा करवा कर अपने घर में ला कर बंद कर दिया. फिर 100 नंबर पर कौल कर के पुलिस को बुला कर कहा कि वह उस का रेप करने की कोशिश कर रहा था. रेप केस में उस इंसान को जेल हो गई.

जेल से निकल कर जब वह फिर से जिंदगी जीने की कोशिश करने लगा तो वह फिर आ धमकी और उसे गालियां बकने लगी, मारा भी. अब उस इंसान के सब्र का बांध टूट गया था इसलिए उस ने 24 पन्ने का लंबा सुसाइड नोट लिख कर आत्महत्या कर ली.

आखिर उस इंसान की गलती क्या थी? पुरुष होने की? क्या कोर्ट को उस की बात नहीं सुननी चाहिए थी और क्या समाज का यह फर्ज नहीं बनता था कि वह दोनों का पक्ष सुने?

मेरठ की एक महिला ने सरकारी अस्पताल से फर्जी मैडिकल सर्टिफिकेट बनवा कर अपने पति के खिलाफ थाने में मुकदमा दर्ज करवाया. महिला की बातों में आ कर पुलिस ने उस के पति को गिरफ्तार भी कर लिया. लेकिन बाद में इस मामले की जांच में पता चला कि महिला का किसी गैरमर्द से नाजायज संबंध था और पति इस पर एतराज करता था. अपने पति को रास्ते से हटाने के लिए महिला ने यह योजना बनाई और पति को झूठे केस में फंसा कर उसे जेल करवा दी.

पुरुष भी होते हैं घरेलू हिंसा के शिकार

घरेलू हिंसा और शोषण की बात वैसे तो घर की चारदीवारी से बहुत मुश्किल से बाहर आ पाती है और अगर आती भी है तो अमूमन समझ जाता है कि पीडि़त महिला ही होगी. लेकिन कई बार पुरुष भी चुप रह कर यह सबकुछ झेलते हैं. शर्मिंदगी, समाज के डर के कारण वे अपना दर्द बयां नहीं कर पाते हैं और अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं.

हौलीवुड सुपर स्टार जौनी डेप के साथ भी यही हुआ कि पत्नी के हाथों घरेलू हिंसा के शिकार होते हुए भी वे चुप रहे कि लोग और समाज उन के बारे में क्या कहेंगे.

जौनी डेप की ऐक्स वाइफ ऐंबर डेप ने उन पर घरेलू हिंसा का आरोप लगाते हुए कहा था कि नशे की हालत में डेप उस का यौन उत्पीड़न करते हैं और उसे मारने की धमकी देते हैं. ऐंबर की तरफ से उस की डाक्टर ने भी गवाही दी थी कि शराब के नशे में जान उस के साथ जबरन संबंध बनाने की कोशिश करते हैं और उस के साथ मारपीट भी करते हैं.

डाक्टर ने गवाही में यह भी कहा कि एक बार जौनी इतने हिंसक हो गए थे कि वे ऐंबर के प्राइवेट पार्ट में कोकीन ढूंढ़ने की कोशिश करने लगे. मगर तमाम गवाहों, सुबूतों, वीडियो, औडियो और सैकड़ों मैसेज खंगालने के बाद यही पता चला कि जान डेप पर लगाए गए सारे इलजाम झूठे थे.

कोरोनाकाल में पूरे देश में लौकडाउन के चलते लोग अपनेअपने घर में कैद हो कर रह गए थे. उस दौरान घरेलू हिंसा के मामलों में भी काफी बढ़ोतरी हुई थी. लेकिन उस दौरान सिर्फ महिलाएं ही घरेलू हिंसा की शिकार नहीं हुईं, बल्कि कई पुरुष भी घरेलू हिंसा के शिकार हुए थे. यह बात अलग है कि भारत में अभी तक ऐसा कोई सरकारी अध्ययन या सर्वेक्षण नहीं हुआ जिस से इस बात का पता चल सके कि घरेलू हिंसा में शिकार पुरुषों की तादाद कितनी है. लेकिन कुछ गैरसंस्थान इस दिशा में जरूर काम कर रहे हैं.

दुनियाभर में केवल महिलाओं और बच्चों के साथ ही नहीं, बल्कि पुरुषों के साथ भी अत्याचार के मामले सामने आ रहे हैं. सिर्फ भारत में हर साल लगभग 65 हजार से अधिक शादीशुदा पुरुष खुदकुशी कर लेते हैं, जिस का कारण उन पर दहेज, घरेलू हिंसा, रेप जैसे झूठे मुकदमों का दर्ज होना है.

महिलाओं की सुरक्षा के लिए बलात्कार, दहेज आदि कानून जरूरी हैं, लेकिन कहीं न कहीं इन कानूनों को हथियार बना कर कुछ महिलाएं इन का दुरुपयोग भी कर रही हैं. ऐसे केसों में जो पुरुष फंसे या फंसाए जा रहे हैं, उन की इज्जत, समय और जो पैसों की बरबादी होती है उस की भरपाई कौन करेगा? कानून का आज जो दुरुपयोग किया जा रहा है उसे रोकना बहुत जरूरी है नहीं तो निर्दोष पुरुषों की जिंदगी झूठे केसों में फंसती चली जाएगी.

हंसी के पात्र बन जाते हैं

‘सेव इंडिया फैमिली फाउंडेशन’ और ‘माई नेशन’ नाम की गैरसरकारी संस्थाओं के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि भारत में 90 फीसदी से कहीं ज्यादा पति 3 साल की रिलेशनशिप में कम से कम एक बार घरेलू हिंसा का सामना कर चुके होते हैं. इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पुरुष जब अपनी शिकायतें पुलिस या फिर किसी और प्लेटफौर्म में करनी चाहीं तो लोगों ने उन की बातों पर विश्वास नहीं किया, बल्कि वे और हंसी के पात्र बन गए.

एक स्टडी कहती है कि जीवन में कभी न कभी अपने पार्टनर के हाथों हिंसा ?ोलने में महिलाओं और पुरुषों की तादाद लगभग बराबर है. हालांकि गंभीर हिंसा के मामले पुरुषों में महिलाओं के मुकाबले थोड़े कम होते हैं.

झूठे रेप केस में फंसते पुरुष

दिल्ली के आत्मा राम सनातन धर्म कालेज की आर्ट्स की स्टूडैंट आयुषी भाटिया ने पिछले 1 साल में 7 रेप केस अलगअलग पुलिस स्टेशनों में दर्ज कराए. लेकिन ये सारे फाल्स रेप केस थे. सख्ती करने पर पुलिस के सामने आयुषी ने स्वीकार किया कि वह लड़कों पर रेप के झूठे आरोप लगा कर उन से जबरन पैसे वसूलती थी.

उस ने बताया कि कैसे वह जिम, इंस्टा, औनलाइन डेटिंग ऐप पर 20 से 22 साल के लड़कों से दोस्ती करती और फिर उन से मिलती थी. लड़के के साथ फिजिकल रिलेशनशिप और किसी के साथ प्यार के वादे के बाद वह उस पर रेप का आरोप लगा दिया करती थी. सब से अजीब बात तो यह कि उस ने 1 साल में 7 झूठे रेप केस पुलिस स्टेशन में दर्ज करवाए.

बलात्कार एक घिनौना अपराध तो है ही, लेकिन उस से भी ज्यादा घिनौना अपराध यह है कि एक निर्दोष व्यक्ति पर बलात्कारी होने का ठप्पा लग जाना क्योंकि यहां पर एक निर्दोष व्यक्ति के मानप्रतिष्ठा दांव पर लग जाती है, साथ में उस की जिंदगी भी नर्क बन जाती है.

कुछ सालों पहले नई दिल्ली के करावल नगर के इब्राहिम खान पर बलात्कार का आरोप लगा था और आरोप भी किसी गैर ने नहीं, बल्कि उस की खुद की सगी बेटी ने लगाया था. संगीन आरोप था कि उस ने अपनी बेटी का रेप किया जिस से वह गर्भवती हो गई. इस आरोप के बाद इब्राहिम का सामाजिक बहिष्कार तो हुआ ही उसे जेल भी हुई. जेल में भी उसे कैदियों ने पीटा.

7 साल जेल में रहने के बाद साबित हुआ कि उस की बेटी ने उस पर झूठा इलजाम लगाया था क्योंकि वह बेटी के देह व्यापार में बाधक बन रहा था. बेटी के पेट में जो बच्चा था वह भी उस का नहीं था. अदालत ने इब्राहिम को बेगुनाह साबित होने पर उसे छोड़ तो दिया मगर तब तक उस की पूरी दुनिया तबाह हो चुकी थी.

एमपी में दर्ज हो रहे झूठे रेप केस

मध्य प्रदेश में सरकारी मुआवजा प्राप्त करने के लिए रेप केस के कई मामले दर्ज कराए गए. हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि अधिकतर केस झूठे और सरकारी मुआवजा लेने के लिए किए गए. दरअसल, एमपी में राज्य सरकार एससीएसटी एट्रोसिटी एक्ट के तहत पीडि़त महिला को 4 लाख रुपए का मुआवजा देती है. मामले में एफआईआर होने पर 1 लाख और कोर्ट में चार्ज शीट पेश होने पर 2 लाख रुपए दिए जाते हैं यानी 3 लाख रुपए तो सजा होने के पहले ही दे दिए जाते हैं. अगर आरोपी को सजा होती है तो 1 लाख रुपए और दिए जाते हैं. सजा न भी हो तो पहले दिया गया मुआवजा वापस नहीं मांगा जाता. यह प्रावधान केवल एससीएसटी वर्ग के लिए ही है, अन्य को नहीं.

झूठे रेप केस की अफवाह क्यों उठी

सागर की रहने वाली एक महिला ने एक व्यक्ति पर अपनी बेटी के बलात्कार का मामला दर्ज कराया. जब आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया और कोर्ट में मामले की सुनवाई शुरू हुई तब दलित महिला ने ट्रायल कोर्ट में कबूला कि साधारण ?ागड़े में उस ने आरोपी पर अपनी नाबालिग बेटी से रेप का झूठा केस दर्ज करवाया था. यहां मुआवजे का लालच इस हद तक बढ़ चुका है कि झूठे आरोप लगा कर सरकारी मुआवजा हासिल किया जा रहा है.

यूपी के बरेली शहर की नेहा गुप्ता और साफिया नाम की 2 लड़कियां पैसे के लिए पुरुषों को फंसाने का रैकेट चला रही थीं. वे कई लड़कों पर बलात्कार के झूठे केस कर के पैसे हड़पने के बाद पकड़ी गईं.

बलात्कार की परिभाषा, जहां एक महिला के साथ उस की इच्छा के विरुद्ध, उस की सहमति के बिना, जबरदस्ती, गलत बयानी या धोखाधड़ी द्वारा या फिर ऐसे समय में जब वह नशे में या ठगी गई हो अथवा अस्वस्थ मानसिक स्वास्थ्य की हो और किसी भी मामले में यदि वह 18 साल से कम उम्र की हो, बलात्कार माना जाता है. लेकिन कुछ महिलाएं अपने लिए बनाए गए कानून का फायदा उठा कर पुरुषों को बदनाम करने का काम कर रही हैं.

पीडि़तों पर बुरा असर

उत्तरी इंगलैंड की रिसर्चर एलिजाबेथ बेट्स बताती हैं कि समाज पुरुषों को अपराधी मनाने में बिलकुल देर नहीं लगाता, लेकिन उन्हें पीडि़त मानने में उसे बड़ी दिक्कत होती है. वे कहती हैं टीवी पर कौमेडी शो में कई बार लोगों को हंसाने के लिए पुरुष पर अत्याचार होते दिखाया जाता है. इसलिए किसी महिला के हाथों पुरुष की पिटाई होते देख हमारा समाज हंसता है, जिस का अकसर पीडि़तों पर बुरा असर पड़ता है.

कई बार इस से जुड़ी शर्मिंदगी और मजाक उड़ाए जाने के डर से पुरुष सामने नहीं आते, हिंसा झूठलते हैं और मदद मांगने से शरमाते हैं. बेट्स की रिसर्च दिखाती है कि समाज में इसे जिस तरह से देखा जाता है उस का असर घरेलू हिंसा के शिकार पुरुषों पर पड़ता है. ऐसे पीडि़तों में हिंसा ?ोलने के कारण कई लौंग टर्म मानसिक और शारीरिक समस्याएं सामने आती हैं.

हमारे देश में जहां हर 15 मिनट पर एक रेप की घटना दर्ज होती है, हर 5वें मिनट में घरेलू हिंसा का मामला सामने आता है, हर 69वें मिनट में दहेज के लिए दुलहन की हत्या की जाती है और हर साल हजारों की संख्या में बेटियां पैदा होने से पहले ही मां के गर्भ में मार दी जाती हैं, ऐसे सामाजिक परिवेश में दीपिका नारायण भारद्वाज, जो कभी इन्फोसिस में सौफ्टवेयर इंजीनियर थी और फिर अपनी नौकरी छोड़ कर पत्रकारिता में आ गईं वह डौक्यूमैंटरी फिल्म भी बनाती हैं उन का कहना है कि क्या मर्द असुरक्षित नहीं हैं? क्या उन्हें भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता है? क्या वे पीडि़त नहीं हो सकते?

दीपिका ने 2012 में पुरुष पक्षधर के इस मुद्दे पर रिसर्च शुरू की थी और पाया कि ज्यादातर दहेज प्रताड़ना केस झूठे होते हैं. झूठे आरोप में फंसाए जाने के कारण कई बेटों के मातापिता ने बदनामी के डर से आत्महत्या कर ली. वह पहली महिला हैं जिन का कहना है कि भारत में असली प्रताड़ना पुरुष झेल रहे हैं. हालांकि ऐसी बात नहीं है. महिलाएं भी कम प्रताडि़त नहीं हो रही हैं.

दीपिका नारायण का कहना है कि बदलाव लाना है तो पुरुषों के सहयोग की जरूरत है, न कि कुछ प्रतिशत पुरुषों के दुर्व्यवहार का उदाहरण दे कर पूरी पुरुष जाति को आपराधिक मानसिकता का ठहरा देना. उन का कहना है कि ऐसे ज्यादातर संगठनों का नेतृत्व कर रही महिलाएं खुद को महान कहलवाने, दूसरों के किए कामों में मुफ्त की स्पोर्टलाइट लेने, कानून, संविधान और सरकार को अपनी तरफ झकाने ताकि बैठेबैठाए बिना कुछ किए मुफ्त की रोटी और तारीफ मिलती रहे, हमारी सामाजिक बनावट में गलत हस्तक्षेप कर रही हैं. उन के हठ से तमाम घर बरबाद हो रहे हैं.

पुरुष ही शोषक नहीं

यह बात सच है कि दुनिया की आधी आबादी आज भी हर स्तर पर संघर्ष कर रही है और पितृसत्तात्मक व्यवस्था में उसे वह स्थान नहीं मिल पा रहा है जिस की वह अधिकरिणी है. लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि समानता के इस संघर्ष के बीच एक ऐसी धारा बह निकली जहां पुरुषों को सदैव शोषक और महिलाओं को शोषित के रूप में दिखाया जाता रहा है. लेकिन सत्य तो यह है कि ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, प्रेम, जैसे मानवीय अमनीभव पुरुष और स्त्री में समान रूप से प्रभावित होते हैं तो सिर्फ पुरुष ही शोषक कैसे हो सकता है.

यह कहना भी गलत नहीं होगा कि आमजन से ले कर हमारी न्यायिक व्यवस्था पुरुषों की पीड़ा की उपेक्षा करती है. घरेलू हिंसा, दहेज, यौन उत्पीड़न अधिनियम महिलाओं की सुरक्षा और सम्मानपूर्वक जीवन देने के लिए बनाए गए हैं. ये लैंगिक समानता को स्थापित करने के लिए आवश्यक भी हैं. लेकिन जब एक के साथ न्याय और दूसरे के साथ अन्याय हो तो समाज ही बिखर कर रह जाएगा.

कुछ महिलाएं इन कानूनों का इस्तेमाल अपने निजी हितों के लिए करने लगी हैं. वे इन्हें पुरुषों से बदला लेने का रास्ता समझने लगी हैं. 2005 में उच्चतम न्यायालय ने इसे कानूनी आतंकवाद की संज्ञा दी थी, वहीं विधि आयोग ने अपनी 154वीं रिपोर्ट में इस बात को स्पष्ट शब्दों में स्वीकारा था कि आईपीसी की धारा 498ए का दुरुपयोग हो रहा है.

शिवांगी जोशी-कुशाल टंडन के नए शो ‘बरसाते’ का प्रोमो रिलीज, देखें वीडियो

टीवी की मशहूर एक्ट्रेस शिवांगी जोशी और एक्टर कुशाल टंडन का नया टीवी शो सोनी पर जल्द ही दस्तक देने वाला है. शिवांगी जोशी और एक्टर कुशाल टंडन अपने नए शो ‘बरसाते’ में जल्द नजर आएंगे. शो से जुड़ा प्रोमो भी रिलीज हो गया है, जिसमें दोनों की केमिस्ट्री देखने लायक लग रही है. बता दें, कुशाल टंडन लंबे समय बाद छोटे पर्दे पर वापसी करेंगे तो वहीं शिवांगी जोशी को आखिरी बार ‘बेकाबू’ में देखा गया था.

प्रोमो वीडियो देखकर लगा शिवांगी और कुशाल के प्यार की शुरूआत तकरार से होती है. सोशल मीडिया पर ‘बरसाते’ का प्रोमो तोजी से वायरल हो रहा है. प्रोमो वीडियो में दिखाया गया है कि पहली मुलाकात ही फुल टशन के साथ होती है. सूट-बूट पहनकर कुशाल टंडन एंट्री करते हैं. वहीं शिवांगी जोशी बारिश में खड़ होकर कैब का इंतजार करती हैं. वहीं जैसे ही उन्हें कैब मिलती है और वह उसका दरवाजा खोलती हैं, उसमें कुशाल टंडन आकर बैठ जाते हैं. प्रोमो में देख सकते है पहली मुलाकात में ही शिवांगी जोशी और कुशाल टंडन की तकरार हो जाती है. इसे लेकर माना जा रहा है कि दोनों के प्यार की शुरुआत तकरार से होगी.

फैंस दे रहे है रिएक्शन

सोनी पर जल्द ही एक्टर कुशाल टंडन और शिवांगी जोशी का नया सीरियल ‘बरसातें’ आ रहा है. शो का प्रोमो भी रिलीज हो गया है. प्रोमो देखकर उनके फैंस जमकर तरीफ कर रहे है. एक यूजर ने लिखा है कि “प्रोमो शानदार है. शिवांगी को उनके खूबसूरत लुक के साथ पर्दे पर देखने के लिए तैयार हैं. आपको और आपकी पूरी टीम को ‘बरसातें’ के लिए शुभकामनाएं.”

वहीं दूसरे यूजर ने लिखा, “कुशाल टंडन और शिवांगी जोशी एक साथ, अच्छी जोड़ी है.” लेकिन इस प्रोमो को देखकर कुछ लोगों को मोहसिन खान की भी याद आई. एक यूजर ने लिखा, “काश इसमें कुशाल टंडन की जगह मोहसिन खान होते.” बता दें कि मोहसिन खान और शिवांगी जोशी की जोड़ी टीवी पर सबसे हिट जोड़ी है.

इस दिन से शुरु होगा ‘बरसातें’

कई मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक शिवांगी जोशी-कुशाल टंडन अपकमिंग शो ‘बरसातें’ इस महीने की 19 तारीख से शुरू हो सकता है. अब ये देखना होगा कि टीवी पर इन दोनों की जोड़ी हिट साबित होती है या नहीं, लेकिन शो के प्रोमो से खूब प्यार मिल रहा है.

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