मौनसून का मिलेट्स से क्या है रिश्ता

आजकल स्वास्थ्य को ले कर लोगों में जागरूकता बढ़ी है. नियमित वर्कआउट करना उन की दिनचर्या में शामिल हो चुका है, लेकिन उन की डाइट में जागरूकता की बहुत कमी है क्योंकि आज के युवा जंक फूड पर अधिक रहने लगे हैं. उन्हें घर का बना खाना पसंद नहीं. ऐसे में बहुत कम उम्र में उन्हें मोटापा, कोलैस्ट्रौल, ब्लडप्रैशर आदि कई बीमारियां घेर लेती हैं, जिन से निकल पाना उन के लिए मुश्किल होता है.

ऐसे में आज डाइटीशियन हर व्यक्ति को मिलेट्स को दैनिक जीवन में शामिल करने की सलाह बारबार दे रहे हैं. मिलेट्स यानी मोटा अनाज. यह 2 तरह का होता है- मोटा दाना और छोटा दाना. मिलेट्स की कैटेगरी में बाजरा, रागी, बैरी, झंझगोरा, कुटकी, चना और जौ आदि आते हैं.

जागरूकता है जरूरी

इस बारे में क्लीनिकल डाइटीशियन हेतल व्यास कहती है कि मिलेट्स इम्यूनिटी बूस्टर का काम करता है. 2023 को सरकार ने ‘मिलेट्स ईयर’ घोषित किया है ताकि लोगों में मिलेट्स के प्रति जागरूकता बढे़. मिलेट्स में कैल्सियम, आयरन, जिंक, फास्फोरस, मैग्नीशियम, पोटैशियम, फाइबर, विटामिन बी-6 मौजूद होते हैं.

ऐसिडिटी की समस्या में मिलेट्स फायदेमंद साबित हो सकता है. इस में विटामिन बी-3 होता है, जो शरीर के मैटाबोलिज्म को बैलेंस रखता है. मिलेट्स में कौंप्लैक्स कार्बोहाइड्रेट रहता है, इसलिए फाइबर की मात्रा अधिक होती है. यह ग्लूटेन फ्री होता है. इस से वजन कम होता है. कुछ लोग ग्लूटेन सैंसिटिव होते हैं. इस से उन का वजन बढ़ जाता है. मिलेट्स में इन सब की मात्रा न होने की वजह से डाइजेशन शक्ति बढ़ती है.

मौनसून में अधिक उपयोगी

मौनसून में पूरा मौसम बदल जाता है. बच्चों से ले कर वयस्कों सभी को कोल्ड, कफ, डायरिया आदि हो जाता है. इस मौसम ने रोगप्रतिरोधक क्षमता में कमी आ जाती है, साथ ही पीने का पानी बदल जाता है. बारिश की वजह से उस समय लोगों की चटपटा खाने की इच्छा होती है. इस से पेट खराब हो जाता है. इस मौसम में मिलेट्स से बना भोजन अधिक लेना चाहिए क्योंकि यह हलका होने के साथसाथ पच भी जल्दी जाता है.

नाचनी की रोटी, पोरिज, ड्राईफू्रट के साथ उस के लड्डू आदि सभी चीजें इस मौसम में खाई जा सकती हैं. अगर मौनसून में बाहर का खाना खाते हैं तो कब्ज की शिकायत हो जाती है और पेट फूल जाता है. ऐसे में नाचनी, ज्वार, बाजरा आदि से बना भोजन अच्छा होता है. नाचनी को रेनी सीजन का बैस्ट भोजन माना जाता है.

वेट लौस का है मंत्र

हेतल कहती है कि वेट लौस का भी यही मंत्र है, अगर कोई व्यक्ति गेहूं की 4 रोटियां खाता है, तो वह ज्वार या बाजरा की 2 रोटी ही खा सकेगा. इस के अलावा रागी में कैल्सियम होता है. इस से ऐसिडिटी नहीं होती. हजम करना भी आसान होता है. डाइजेशन सिस्टम पर किसी प्रकार का प्रैशर नहीं होता. छोटे मिलेट्स जैसे कंगनी, कोदो, चीना, सांवा और कुटकी आते हैं. ये छोटे अवश्य हैं, लेकिन इन के फाइबर कंटैंट बहुत अधिक हैं. कुछ

फायदे मिलेट्स के निम्न हैं:

  •  मिलेट्स ब्लड सिर्कुलेशन को बढ़ाता है. इसे नियमित भोजन में शामिल करना अच्छा होता है, जिस से इम्यूनिटी बढ़ती है.
  • वजन कम करने में सहायक होता है क्योंकि मिलेट्स के सेवन से पेट भरा हुआ महसूस होता है, जिस से भूख कम लगती है.
  • मिलेट्स में ऐंटीऐजिंग के गुण होने की वजह से त्वचा पर काले धब्बे, डलनैस, पिंपल्स और ?ार्रियों में कमी आती है.
  • पाचनशक्ति को बढ़ाने में सहायक होने की वजह अधिक फाइबर का होना.
  • डायबिटीज को कम करने में सहायक होने की वजह ग्लूटेन फ्री होना.
  • कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि मिलेट्स में मौजूद मैग्नीशियम पीरियड्स क्रैंप्स से राहत देता है.
  • कैल्सियम अधिक होने की वजह से हड्डियां मजबूत होती हैं.
  • मिलेट्स में मैग्नीशियम बहुत अच्छी मात्रा में पाया जाता है, जो हार्ट अटैक से शरीर का बचाव करने में सहायक होता है क्योंकि यह मांसपेशियों को आराम दे कर ब्लड को निरंतर चलने में सहायता करता है.
  • मिलेट्स में ऐंटीऔक्सीडैंट्स शरीर में मौजूद सभी कैंसर कोशिकाओं पर नजर रखते हैं. इस से कैंसर का खतरा कम होता है.
  • बौडी डिटौक्स करने में सहायक होता है.

कैसे करें सेवन

हेतल कहती है कि दूध में नाचनी या ज्वार के आटे को डाल कर सुबह का नाश्ता यानी पोरिज बना सकते हैं. इस के लिए नाचनी के आटे को धीमी आंच पर थोड़ा घी डाल कर सेंक लें. उस में दूध या छाछ मिला कर ठंडा या गरम पोरिज ले सकते हैं. उस के ऊपर थोड़ा ड्राईफ्रूट डाल देने से वह और अधिक स्वादिष्ठ बन जाता है. दिन में 2 बार नाचनी, ज्वार, बाजरा की रोटी खाई जा सकती है.

मधुमेह के रोगी सांवा की रोटी चावल के स्थान पर खाते हैं. नाचनी के डोसे और इडली भी बनाई जा सकती है. खाने में हमेशा उस की मात्रा पर अधिक ध्यान देना पड़ता है. फाइबर अधिक होने से कम मात्रा में खाने से ही पेट भरा हुआ लगता है.

आज के यूथ को जंक फूड के अलावा कुछ और खिलाना मुश्किल होता है. ऐसे में नाचनी, ज्वार, बाजरा को गेहूं में मिला कर आटा बनाया जा सकता है. इस से बनी रोटी फायदेमंद होती है. इस के अलावा मखना, राजगिरा के मीठे लड्डू आदि सभी बच्चे आसानी से खा लेते हैं.

वसीयत: भाग 2- क्या अनिता को अनिरूद्ध का प्यार मिला?

कोटिधारा अभिषेक स्वरूप, जिस में अनीताजी भीग रही थीं. कुछ प्रेम प्रार्थना के अजस्र स्रोत हो वे उसे गले लगाना चाहती थीं, लेकिन… ‘‘आप को कोई तकलीफ तो नहीं. आप सारी रात कुरसी पर बैठी रहीं?’’ वह बोला. ‘‘तकलीफ,’’ अनीताजी सोच में पड़ गईं. मन के असंभावित और गुप्त कोष्ठ में जाना कब आसान है. नारी मन की भावयात्रा ही तकलीफ का पर्याय है.

लेकिन अनीता कुछ बोल नहीं पाईं. बस इतना कहा, ‘‘मैं ठीक हूं,’’ और सहसा उन्होंने आंखें बंद कर लीं, कहीं अनिरुद्ध उन की भावनाएं न पढ़ ले. ‘‘एक अकेलापन, कुछ निर्जन सा समाया हुआ है तुम्हारे अंदर, जो बिलकुल निकलता नहीं, तुम्हें खुद को संभालना होगा,’’

वह बोला. अनीताजी स्तब्ध थीं. बिलकुल चुप रहने वाला अनिरुद्ध आज ये सब क्या बोल रहा है?  ‘‘अनिरुद्ध, कभी दूर मत जाना मुझ से, वरना…’’ अनिरुद्ध मुसकराया, ‘‘आप खतरनाक भी हैं.’’ दोनों हंसने लगे. हालांकि अनीताजी को आज अनिरुद्ध के अंदर अपने प्रति सम्मान ही नहीं कुछ और भी नजर आ रहा था, एक तरह का आकर्षण. उसी दिन अनिरुद्ध की रिपोर्ट डाक्टर ने अनीताजी को दी और पता चला कि उसे चौथी स्टेज का ब्लड कैंसर है.

दोनों चुपचाप डाक्टर को खामोशी से सुनते रहे. छुट्टी मिलने के बाद दोनों बुझे-बुझे से घर की ओर चल पड़े.  अगले 3 दिन अनिरुद्ध की बीमारी की पैरवी करते हुए अनीताजी ने ज्यादा  समय उसी के कमरे में बिताया. रात को जब वह सो जाता तो अनीताजी उसे देखती रहतीं. लौकडाउन खुल रहा था. कंपनियां अपने कर्मचारियों को वापस बुला रही थीं.

अनिरुद्ध को भी बुला लिया गया. अनिरुद्ध कुछ दुखी था. शिमला जैसी सुंदर जगह छोड़नी थी और अनीता को छोड़ कर जाना उस के लिए असंभव था. वह रुकना चाहता था लेकिन रुकने का कोई ठोस कारण भी तो नहीं था उस के पास.

अनीताजी जो चाहती थीं या वह जो सपने खुद देख रहा था, अब वह कुछ भी संभव नहीं था, बीमारी ही कुछ ऐसी थी कि वह उन का वर्तमान और भविष्य खराब नहीं करना चाहता था.  जब उस ने अनीताजी को वापस जाने की खबर दी तो वे कुछ नहीं बोलीं. एकदम चुप.

जैसे जब दर्द हद से ज्यादा बढ़ जाए तो एक नबंनैस आ जाती है, उन की वही स्थिति हो गई. जाते वक्तवह बाकी का किराया देने आया था जिस को लेने से अनीताजी ने मना कर दिया और जातेजाते उसे अपनी कविताओं की एक डायरी दे दी. उन्होंने उस को रुकने के लिए नहीं कहा. आखिर उस ने अपने दिल की बात उन से खुल कर कही भी तो नहीं थी.

अनीताजी उसे बेइंतहा प्यार देना चाहतीं थीं, लेकिन अनिरुद्ध के पास अब समय कम था.  जिस दिन अनिरुद्ध गया था उस सारा दिन अनीताजी बालकनी में बैठी रहीं. मैक्स  भी उन के पैरों के पास बैठा रहा. वे धीरेधीरे भग्न हृदय की मर्मांतक वेदना में गा रही थीं, ‘बैठ कर साया ए गुल में हम बहुत रोए वो जब याद आया, वो तेरी याद थी अब याद आया, दिल धड़कने का सबब याद आया…’

उन के गाने सिर्फ मैक्स सुनता था. नुकीले पश्चिमी भाग के पर्वत पर धुंधले से बादल, महान पर्वतीय शृंखलाएं सब नितांत अकेली. अनीताजी की तरह और पीछे का आकाश एकदम काला. शिमला की घाटी, स्याही जैसे रंग का तालाब लग रही थी. रात के सघन अंधेरे में केवल अनीताजी के अरमान जल रहे थे. सारी रात ऐसे ही बैठेबैठे बीत गई. क्या कोई इतना भी अकेला होता है.

प्रेममय होना बहुत श्रम चाहता है. मन पर काबू वैराग्य धारण करने के समान है और वह अनुशीलन का विषय है. न हो दैहिक संबंध. न की गई हों प्रेम भरी बातें. फिर भी जो स्थान किसी ने ले लिया वहां कोई और. नामुमकिन. शिमला जाग रहा था. गाडि़यों के हौर्न, लोगों की आवाजें. अनीताजी बेमन से उठीं और अंदर जा कर बिस्तर पर लेट गईं.

अनिरुद्ध नोएडा आ गया था, लेकिन शिमला से ज्यादा उसे अनीताजी याद आती रहीं. उस ने उन के बारे में बहुत सोचा. बहुत बार सोचा. लेकिन अब क्या हो सकता था, उस का शरीर भी अब उस का साथ छोड़ रहा था. उस ने बैग में से उन की लिखी डायरी निकाली और उन की कविताएं पढ़ने लगा. क्या कमाल का लिखती हैं अनीताजी.

सारी कविताओं में प्रेम और बिछोह के भाव सघन और संश्लिष्ट. नोएडा आ कर अनिरुद्ध ने थोड़े प्रयास किए और अंतत: एक ऐसी कंपनी मिली जो ‘वर्क फ्रौम होम’ के लिए राजी थी. शिमला छोड़े हुए 8 महीने हो चुके थे. अनीताजी से हफ्ते में 3-4 बार बात हो जाती थी लेकिन अनिरुद्ध ज्यादा बात नहीं करता था. ये मोह के बंधन बहुत कष्टकारी होते हैं, कल को जब वह न रहा तो ये बातें अनीताजी को और दुखी करेंगी, यही सोच कर वह बात करने से बचता.

एक दिन अनीता का फोन बजा. अनिरुद्ध के पिता बोल रहे थे. उन्होंने अनिरुद्ध को अनीता के स्केच बनाते देखा था और पूछने पर अनिरुद्ध ने सब बातें अपने पिता को बता दी थीं. उस के पिता अनीता को नोएडा बुला रहे थे ताकि आने वाले मुश्किल वक्त में वे अनिरुद्ध के साथ रह सकें.

अनीता ने कुछ नहीं सोचा और अगले ही दिन शिमला से नोएडा के लिए  निकल पड़ीं. लेकिन यह खबर वे अनिरुद्ध को नहीं देना चाहती थीं. यह सरप्राइज था. आज अनीताजी को भी नहीं पता था कि वे अनिरुद्ध के पास जाने के लिए इतनी बेचैन क्यों थीं… आज रास्ता कटते नहीं कट रहा था, सरप्राइज जो देना था उन्होंने. आखिर घुमावदार सड़कों से होते हुए शाम को अनीताजी नोएडा आ पहुंची.

ड्राइवर ने गाड़ी अनिरुद्ध के घर के बाहर पार्क की. गेट अनिरुद्ध के पिता ने खोला और अनीता ने उन के पैर छुए और अनिरुद्ध के कमरे की तरफ बढ़ गईं. अनिरुद्ध अचानक अनीता को देख कर चकित हो गया और उस के मुंह से एक शब्द नहीं निकला. वह पहले से काफी कमजोर और अपनी उम्र से बड़ा दिखाई दे रहा था.  ‘‘मिलीं भी तो किस मोड़ पर,’’ वह धीरे से बोला. ‘‘तुम्हें मेरी जरूरत है,’’ अनीता ने जवाब दिया. ‘‘अनीता मेरी बकाया जिंदगी अब सिवा दुख के तुम्हें कुछ नहीं दे सकती.’’ ‘‘मैं तुम से कुछ लेने नहीं देने आई हूं, अनिरुद्ध.’’ उस दिन के बाद से अनीता एक निष्ठावान और सच्चे साथी की तरह अनिरुद्ध की देखभाल में लग गईं.

वह ऊपर के फ्लोर पर अनिरुद्ध के साथ वाले कमरे में रहने लगीं. मैडिकल रिपोर्ट्स के हिसाब से अनिरुद्ध के पास 3 महीने से अधिक समय नहीं था. बारबार हौस्पिटल के चक्कर लगते रहते.  उन दिनों अनीता ‘जीवन और मरण की तिब्बती पुस्तक’ पढ़ रही थीं. वे न केवल  अनिरुद्ध के जीवन को संभाले हुए थीं बल्कि उस की आगे की यात्रा की भी तैयारी करवा रही थीं.

दोनों भावों के असीम सागर में डूबे रहते और उन के मृत्यु को ले कर संवाद चलते रहते.  अनीता उसे ‘बारदो’ के बारे में किताब से पढ़पढ़ कर बताती रहतीं. तिब्बती बुद्धिम में बारदो की अवस्था का वर्णन है जो मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच की अवस्था है.

मेरे सीने में लड़कियों की तरह उभार आ गए हैं, मुझे क्या करना चाहिए?

सवाल-

मैं 12वीं कक्षा का छात्र हूं और डाक्टर बनने का इच्छुक हूं. समस्या यह है कि 13 साल की उम्र से मेरी दोनों छातियां लड़कियों की छातियों की तरह कुछकुछ बाहर की तरफ उठ आई हैं.मुझे चिंता है कि कहीं इस कारण मैं मैडिकल प्रवेश परीक्षा से पहले शारीरिक जांच के समय अनुत्तीर्ण न हो जाऊं? कृपया मुझे इस समस्या से उबरने का उपाय बताएं?

जवाब-

जिस समय लड़केलड़कियां बचपन की दहलीज लांघ किशोर उम्र में पहुंचते है, उस समय उन के शरीर में पुरुष और स्त्री यौन हारमोन बनने लगते हैं. लड़कों में पुरुष हारमोन और लड़कियों में स्त्री हारमोन अधिक बनते हैं, पर कुछकुछ मात्रा में विपरीत सैक्स के हारमोन भी बनते हैं.इसी के फलस्वरूप कुछ लड़कों की छाती लड़कियों की छाती जैसी बढ़ जाती है औरकुछ लड़कियों में लड़कों कीतरह चेहरे पर बाल भी जाते हैं. ऐसा हो तो बहुत विचलित होने की जरूरत नहीं होती. कई लड़कों में समय के साथ छातियां अपनेआप घट जाती हैं. अगर 18-20 साल की उम्र तक भी छातियां कम न हों और अटपटा लगे तो किसी कौस्मैटिक सर्जन से मिल कर सलाह ली जा सकती है.अगर छातियां चरबी जमने से बढ़ी हुई हों, तो लाइपोसक्शन से चरबी घटाई जा सकती है.किंतु यदि छातियों में ग्रंथि ऊतक अधिक हों तो छोटे से आपरेशन से छातियों को छोटा किया जा सकता है.जहां तक मैडिकल कालेज में प्रवेश के समय होने वाली शारीरिक जांच का सवाल है, उस के बाबत आप चिंता त्याग दें. गाइनेकोमैस्टिया नामक यह समस्या मैडिकल जांच के समय अनुत्तीर्णता का कारण नहीं बन सकती.

Father’s Day 2023: पापा की जीवनसंगिनी- भाग 1

रात्रिके अंधेरे को चीरती हुई शताब्दी ऐक्सप्रैस अपनी तीव्र गति से बढ़ती जा रही थी. इसी के ए.सी. कोच ए वन में सफर कर रही पीहू के दिल की धड़कनें भी शताब्दी ऐक्सप्रैस की गति की तरह तेजी से चल रही थीं.

‘‘कैसे होंगे पापा? डाक्टरों ने क्या कहा होगा? मुझे पापा को अपने पास ही ले आना चाहिए था. पापा ने मुझे कभी क्यों नहीं बताया अपनी बीमारी के बारे में? पापा मेरी जिम्मेदारी हैं. मैं इतनी गैरजिम्मेदार कैसे हो गई? मैं क्यों स्वयं में ही इतना खो गई कि पापा के बारे में सोच ही नहीं पाईं,’’ सोचते वह बेचैन से खिड़की से बाहर झंकने लगी.

अहमद उसेबहुत अच्छी तरह जानता था सो उस के मानसिक अंतर्द्वंद्व को भांप कर उस के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘पीहू इस हालत में इतनी परेशान मत होओ हम सुबह तक पापा के पास होंगे. इस तरह तो तुम अपना बीपी ही बढ़ा लोगी और एक नई मुसीबत खड़ी हो जाएगी. फिर न तुम खुद को संभाल पाओगी और न ही पापा को, इसलिए स्वयं को थोड़ा सा शांत रखने की कोशिश करो.’’

‘‘हां तुम ठीक कह रहे हो,’’ कह कर पीहू ने सीट पर अपना सिर टिका कर आंखें बंद कर लीं. पर इंसान की फितरत होती है कि विषम परिस्थितियों में वह कितना भी शांत होने का प्रयास करे पर अशांति उस का पीछा नहीं छोड़ती. सो न चाहते हुए भी वह अपने प्यारे पापा के पास पहुंच गई. आखिर पापा उस के जीवन की सब से कीमती धरोहर हैं अगर उन्हें कुछ हो गया तो वह कैसे जी पाएगी. यों भी पापा का प्यार उसे बहुत समय के बाद मिला है. अभीअभी तो वह पापा के प्यार को महसूस करने लगी थी कि वे बीमार हो गए. कल ही तो उस के पड़ोस में रहने वाले अंकल ने फोन पर बताया, ‘‘बेटी पापा को बीमारी के चलते अस्पताल में भरती करवाया है.’’

सूचना मिलते ही वह पति अहमद के साथ दिल्ली के लिए निकल पड़ी थी. 10 साल पहले कैसे उस ने मम्मी की असामयिक मृत्यु के बाद अपने लिए पहली बार पापा की आवाज सुनी थी. उसे आज भी याद है मम्मी की 13वीं पर जब पहली बार घर में सभी एकत्रित हुए थे और शाम को जब सभी नातेरिश्तेदार चले गए थे तब मौसी ने नानी की ओर देखते हुए कहा था, ‘‘मां कुछ दिनों पहले पीहू के लिए एक बहुत अच्छा रिश्ता आया था. अनु को पसंद भी था पर जब तक वह कोई निर्णय ले पाती उस से पहले ही इस संसार से चली गई.’’

‘‘कहां से? कौन है? अगर जम गया तो मैं अगले शुभ मुहूर्त में ही इस के हाथ पीले कर दूंगी. मेरा क्या भरोसा कब ऊपर वाले के यहां का बुलावा आ जाए.

यह जिम्मेदारी पूरी कर दूं तो मैं शांति से मर तो पाऊंगी,’’ नानी ने मौसी की बात का उत्तर देते हुए कहा.

‘‘लड़का और उस का परिवार वर्षों से दुबई में रहता है. वहां उन का जमाजमाया बिजनैस है. अच्छेखासे पैसे वाले खानदानी परिवार का इकलौता लड़का है. बस उम्र अपनी पीहू से थोड़ी ज्यादा है. यहां उस की मौसी रहती हैं उन्हीं के जरीए यह रिश्ता मेरे पास आया है. उम्र देख लो यदि जम रही है तो इस से अच्छा रिश्ता नहीं हो सकता. अपनी पीहू 21 की है और लड़का 30 का है.’’

‘‘ठीक है 9-10 साल का अंतर तो चलता है. वैसे भी कम्मो सारी चीजें थोड़े ही मिलती हैं. हम ने कौन सी नौकरी करानी है जो उम्र के पीछे इतना अच्छा रिश्ता हाथ से जाने दें. इस के हाथ पीले हो जाएं तो मैं चैन से मर सकूंगी वरना मेरी लाड़ली तो कुंआरी ही रह जाएगी,’’ नानी ने पीहू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

‘‘पीहू तू बोल, तुझे तो कोई परेशानी नहीं है न? अगर तेरी इस रिश्ते में रुचि है तो मैं बात आगे बढ़ाऊं?’’ मौसी ने मुझ से पूछा परंतु मैं कुछ बोल पाती उस से पहले ही पापा बोल उठे, ‘‘मुझे परेशानी है, मेरी बेटी कोई अनाथ नहीं है जो आप लोग उस के भविष्य का निर्धारण करेंगी. उस का पिता अभी जिंदा है. अभी उस की विवाह की नहीं कैरियर बनाने की उम्र है. आप सब से विनम्र अनुरोध है कि हमें अकेला छोड़ दें. आप ने हमारी बहुत मदद की उस के लिए शुक्रिया परंतु अब हमें आप की मदद की लेशमात्र भी आवश्यकता नहीं है,’’ पापा का अब तक का भरा हुआ गुबार मानो फूट पड़ा.

‘‘अरे देखो तो अनु के जाते ही इस की जवान निकल आई. आज तक इस के परिवार को संभाले रहे हम. अनु तो पिछले 1 माह से बीमार थी. हम सब अपना घरबार छोड़ कर यहां पड़े रहे और अब यह…’’ मौसी और नानी दोनों ने अपनी वाणी के तीखे वाणों से पापा पर कठोर प्रहार सा कर दिया.

मगर पापा बिना किसी की परवाह किए अनवरत बोलते जा रहे थे, ‘‘मेरे साथ तो आप ने आज तक कोई रिश्ता निभाया ही नहीं तो आगे क्या निभाएंगी. आप ने हमेशा अपनी बेटी से ही वास्ता रखा. अब आप की बेटी इस संसार से चली गई तो इस घर से भी आप का रिश्ता समाप्त. अपनी बेटी के रहते मेरा घरसंसार आप का ही था. मैं तो सिर्फ एक मेहमान था. अब यह घर और बेटी मेरी है. इस से जुड़े सभी फैसले अब सिर्फ मैं ही लूंगा. आप लोग भी अपनाअपना घर देखें. अपनी पत्नी से मैं बहुत प्यार करता था इसलिए आप को भी अपने घर में सहन कर रहा था.

वैसे भी आप ने तो मेरे गृहस्थ जीवन को बरबाद कर ही दिया. पैसे के लिए कोई कैसे अपनी बेटी और बहन की जिंदगी तबाह करता है यह मैं ने केवल पत्रपत्रिकाओं में पढ़ा और टीवी सीरियल्स में देखा ही था और हमेशा इसे अतिशयोक्ति मानता रहा परंतु आप लोगों को देख कर यकीन भी कर पाया कि सच में इस समाज में सबकुछ संभव है. अब आप लोग हमें हमारे हाल पर छोड़ दें,’’ कहतेकहते भावुक हो कर पापा ने मेरे सिर पर अपना हाथ फेरते हुए मुझे अपने सीने से लगा लिया.

Flim review: चिड़ियाखाना- कमजोर पटकथा व कमजोर निर्देशन

रेटिंग: पांच में से डेढ़ स्टार

 निर्माताः एन एफडी सी,कमल मिश्रा

लेखकः मनीष तिवारी और पद्मजा ठाकुर

निर्देषक: मनीष तिवारी

कलाकार: राजेश्वरी सचदेव,प्रशांत नारायण,रित्विक साहोर,गोविंद नाम देव,अंजन श्रीवास्तव,अवनीत कौर,रवि किशन,जयेश कार्डक,पुष्कर चिरपुतकर, नागेश भोसले,अजय जाधव मिलिंद जोशी व अन्य.

अवधिः दो घंटा एक मिनट

बिहार,अब झारखंड में जन्में, प्रारंभिक शिक्षा तिलैया सैनिक स्कूल से लेने के बाद दिल्ली,इंग्लैंड व अमरीका से शिक्षा ग्रहण करने के बाद भारत,रोम व नेपाल में संयुक्त राष्ट् संघ के खाद्य व कृषि विभाग में नौकरी की. आर्थिक व राजनीतिक विषयों पर कुछ लेख लिखे.उसके बाद उन्होने 2007 में प्रकाश झा निर्मित असफल फिल्म ‘‘दिल दोस्ती इस्टा’ का निर्देशन किया.

इसके बाद 2013 में प्रतीक बब्बर,अमायरा दस्तूर,रवि किशन व राजेश्वरी सचदेव को लेकर फिल्म ‘‘इसाक’’ का निर्देशन किया,जिसमें दो ‘भू माफिया’ के बच्चों की प्रेम कहानी पेश की थी. ‘इसाक’ का लेखन मनीष तिवारी और पद्मजा ठाकोर तिवारी ने किया था. फिल्म ‘इसाक’ अपनी आधी लागत भी वसूल नहीं कर पायी थी.अब पूरे दस वर्ष बाद मनीष तिवारी फिल्म ‘‘चिड़ियाखाना’’ लेकर आए हैं. इस फिल्म का निर्माण तो पांच वर्ष पहले ही पूरा हो गया था. 2019 में इसे सेंसर बोर्ड से प्रमाण पत्र भी मिल गया था.

मगर अफसोस यह फिल्म अब दो जून को सिनेमाघरों में पहुॅच रही है.पिछली फिल्म ‘इसाक’ की ही तरह इस फिल्म का लेखन भी मनीष तिवारी व पद्मजा ठाकोर ने किया है. इस बार मनीष तिवारी अपनी फिल्म ‘चिड़ियाखाना’ को लेकर मंबुई पहुॅच गए हैं. पर उनके दिमाग में ‘भू माफिया’,बिहार, ‘बाहरी’ यानी कि गैर मंबुईकर, झारखंड व बिहार का नक्सलवाद पूरी तरह से छाया हुआ है.

उन्होने एक अच्छी कहानी पर ‘‘चूं चूं का मुरब्बा’’ वाली फिल्म बनाकर पेश कर दी है. वास्तव में फिल्म ‘‘चिड़ियाखाना’’ का निर्माण ‘चिल्डन फिल्म सोसायटी’’ ने किया है, जिसका अब ‘एनएफडीसी’ में विलय हो चुका है. ‘चिल्डन फिल्म सोसायटी’ का दायित्व बच्चों के लिए उत्कृष्ट सिनेमा बनवाना रहा है, पर इसमें वह बुरी तरह से असफल रहा. यूं तो फिल्म ‘चिड़ियाखाना’’ एक ‘अंडरडाॅग’ की कहानी है,जो सफलता का मुकाम हासिल करता है.फिल्म के पोस्टरों में भी लिखा है-‘‘हर इंसान के अंदर एक टाइगर यानी कि षेर होता है.’मगर इस बात को सही परिप्रक्ष्य में चित्रित करने में मनीष तिवारी विफल रहे हैं.

कहानी

कहानी के केंद्र में 14 वर्ष का बिहारी लड़का सूरज (ऋत्विक साहोरे) और उसकी मां बिभा  (राजेश्वरी सचदेव) हैं. जो कि बिहार से भोपाल वगैरह होते हुए मंबुई पहुॅचा है. सूरज व उसकी मां एक झोपड़पट्टी मे रहती है.सूरज नगर पालिका यानी कि सरकारी स्कूल में पढ़ने जाने लगता है. जबकि मां बिभा एक घर में काम करने लगती है. सूरज के पिता नही है और बिभा,सूरज को उसके पिता का नाम बताना भी नही चाहती. सूरज का जुनून फुटबाल खेलना है,मगर स्कूल का मराठी भाषी गुंडा व स्कूल फुटबाल टीम का कैप्टन बाबू (जयेश कर्डक), सूरज को पसंद नही करता.

वह अपने दोस्तों के साथ सूरज का मजाक उड़ाता है. सूरज को हर लड़के में किसी न किसी जानवर का चेहरा नजर आता है. (शायद फिल्मकार ने अपनी फिल्म के नाम को जायज ठहराने के लिए ऐसा प्रतीकात्मक किया है). सूरज से उसकी सहपाठी मिली (अवनीत कौर ) प्यार करने लगती है.वह अपने तरीके से सूरज की मदद करने का प्रयास करती रहती है.

सूरज अपनी स्कूल टीम में जगह बनाने के लिए प्रयासरत रहता है,तो उसे झोपड़पट्टी के गुंडे /भाई प्रताप ( प्रशांत नारायणन ) की मदद मिलती है. जब से बिभा अपने बेटे सूरज के साथ इस बस्ती में रहने आयी है,तब से प्रताप मन ही मन बिभा को चाहने लगा है. प्रताप स्थानीय डाॅन भाउ (गोविंद नामदेव) के लिए काम करता है. यह स्थानीय डॉन बिल्डरों के एक समूह के साथ बीएमसी स्कूल के कब्जे वाली जमीन को हड़पने के लिए एक सौदा करता है,जहां यह बच्चे फुटबॉल खेलते हैं.

बीएमसी कमिश्नर भी स्कूल के प्रिंसिपल (अंजन श्रीवास्तव )की नही सुनते.पर प्रताप,भाउ की बजाय बच्चों के साथ मिलकर स्कूल के ग्राउंड को बचाना चाहता है.जिससे सूरज व अन्य बच्चे वहां पर फुटबाल खेल सके.कभी प्रताप भी इस स्कूल की फुटबाल टीम का कैप्टन रह चुका है. वह प्रिंसिपल को मेयर से मिलने की सलाह देता है. मेयर ग्राउंड बचाने के लिए षर्त रख देता है कि बीएमसी स्कूल के बच्चे एक प्रायवेट स्कूल के बच्चे की टीम को फुटबाल में हरा दे,तो वह ग्राउंड उनका रहेगा. इसी बीच बिभा का भाई  बिक्रम सिंह पांडे (रवि किशन ) ,बंदूक लेकर सूरज की हत्या करने आता है. पर प्रताप के आगे वह चला जाता है. तब पता चलता है कि बिभा ने अपने परिवार वालों के खिलाफ जाकर एक नक्सली महतो से षादी की थी. महतो की मोत हो चुकी है. पर बिभा का भाई बिभा व महतो के बेटे सूरज को खत्म करना चाहते हैं.खैर,दो स्कूलों की फुटबाल टीम के बीच मैच होता हैै.

लेखन व निर्देशनः

लेखकों के साथ ही फिल्मकार मनीष तिवारी का अधकचरा ज्ञान इस फिल्म को ले डूबा.एक अच्छी कहानी का सत्यानाश कैसे किया जाता है,यह मनीष तिवारी से सीखा जा सकता है.इसकी मूल वजह यह नजर आती है कि फिल्मकार खुद तय नही कर पाए है कि वह फुटबाल पर या घटतेे खेल के मैदान या भू माफिया द्वारा खेल के मैदान हड़पने या ‘मुंबई बाहरी’ या नक्सल में से किसे प्रधानता देना चाहते हैं.

फिल्म की पटकथा इतनी लचर है कि दर्शक को पहले से ही पता होता है कि अब यही होगा.इंटरवल से पहले फिल्म ठीक ठाक चलती है. लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म पर से मनीष तिवारी की पकड़ खत्म हो जाती है. वह तो जितने मसाले डाल सकते थे,वह सब डाल देते हैं.यहां तक बिहारी अस्मिता के लिए वह सूरज के मुंह से बिहारी भाषा में कुछ संवाद भी बुलवा देते हैं. फिल्म में 2001 में आयी फिल्म ‘लगान’ की नकल भी है. फिल्मकार ‘बाहरी’ का मुद्दा भी ठीक से नही उठा पाए. इसकी मूल वजह यह है कि मुंबई जैसे शहर में यह मुद्दा कई दशक से गौण हो चुका है.

मुंबई शहर में खेल के मैदानों पर बिल्डर लाॅबी का कब्जा अहम मुद्दा है. सिर्फ मुंबई से सटे भायंदर जैसे छोटे इलाके में भाजपा के विधायक रहते हुए नरेंद्र मेहता ने जिस तरह से खेल के मैदान पर कब्जा कर अपना निजी रिसोर्ट खड़ा कर किया है, वह जगजाहिर है. पर अब तक उनके खिलाफ कोई काररवाही नही हुई. पर अफसोस की बात यह है कि जब खेल के मैदान कई सौ करोड़ो में बिक रहे हों,चिल्डन पार्क खत्म हो रहे हैं,तब भी इस मुद्दे को फिल्मकार सही परिप्रेक्ष्य में चित्रित करने में बुरी तरह से विफल रहे हैं. जबकि महज इसी मुद्दे को फुटबाल खेल की पृष्ठभूमि में वह अच्छे से उठाते तो फिल्म अच्छी बन जाती.

अचानक नक्सलवाद का एंगल लाकर फिल्मकार कहानी के बहाव को रोकने का प्रयास करते हैं.बिभा के भाई बिक्रम के आगमन वाला दृष्य फिल्मकार के दिमागी दिवालियापन को ही दिखाता है.क्या बिक्रम ने वास्तव में सोचा था कि वह  एक विदेशी भूमि (मुंबई उसके लिए विदेशी है) की बस्ती में किसी की हत्या करके बच जाएगा?फिल्मकार खुद झारखंड से हैं,मगर उन्हे यही नहीं पता कि उत्तर भारत में लोगों के ‘सरनेम’ क्या होते हैं? ‘चिल्डन फिल्म ‘सोसायटी’ का दायित्व बच्चों के लिए षिक्षाप्रद फिल्मों का निर्माण करना हुआ करता था,पर वह ‘चिड़ियाखाना’ जैसी फिल्म का निर्माण कर अपने मकसद से  भटक गया था,शायद इसी वजह से इसे बंद कर दिया गया.

इस फिल्म में एक दृष्य में प्रताप ,बाबू को बंदूक देकर कहता है कि वह सूरज को गोली मार दे. भले ही बंदूक में गोली नही थी, मगर इस तरह के दृष्य बच्चों के मानस पटल पर किस तरह का असर डालते हैं. नक्सलवाद को जिस तरह से फिल्म में पेष किया गया है,उस तरह से एक नौसीखिया फिल्मकार भी नहीं करता. बिभा के अतीत को बेहतर ढंग से पेष किया जा सकता था. सूरज को फुटबाल खेलने का जुनून है,पर कब कहां से विकसित हुआ? वह बिहार व भोपाल होते हुए मुबई पहुॅचा है. पर इन जगहों पर फुटबाल के खेल को कम लो गही जानते हैं. मनीष तिवारी की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी विषय की नासमझी ही रही. इसी कारण वह बेहतरीन प्रतिभाषाली कलाकारों को फिल्म से जोड़ने के बाद भी अच्छी फिल्म ही बना सके.

अभिनयः

अपने बेटे की जिंदगी बचाने के लिए दर दर भटक रही मां के दर्द,अपने अतीत को अपने बेटे से छिपाने की कश्मकश,बेटे की सुरक्षा की चिंता, गरीबी, इन सारे भावों को बिभा के किरदार में जीते हुए राजेश्वरी सचदेव ने अपने अभिनय के कई नए आयामों को परदे पर उकेरा है.जबकि उन्हे अपने किरदार को निभाने के लिए पटकथा से कहीं कोई मदद नही मिलती.

उनकी अतीत की कहानी भी सही ढंग से चित्रित नहीं की गयी.सूरज के किरदार में रित्विक साहोर को देखकर कल्पना करना मुश्किल हो सकता है कि उसके अंदर कितनी प्रतिभा है. बाबू के जटिल किरदार को जिस तरह से जयेश कार्डक ने जिया है, उसे अनुभवी कलाकार भी नही निभा सकते थे,पर नवोदित कलाकार जयेश कार्डक ने तो कमाल कर दिया. प्रशांत नारायणन हमेशा नकारात्मक किरदारों में ही पसंद किए जाते रहे हैं. मगर इस फिल्म में उन्होने थोड़ा सा उससे हटकर प्रताप के किरदार को बेहतर ढंग से जिया है. प्रताप के किरदार में भाउ और स्कूल प्रिंसिपल  के किरदार में अंजन श्रीवास्तव से बेहतर कोई दूसरा कलाकार हो ही नही सकता था. वैसे यह दोनो किरदार अधपके ही रहे. मिली के किरदार मे बेबी अवनीत कौर अपनी छाप छोड़ जाती हैं. कैमरा कॉन्शस तो दूर वह हर पोज को एंजॉय करती नजर आती है. पुष्करराज चिरपुतकर, अजय जाधव, नागेश भोंसले, मिलिंद जोशी, माधवी जुवेकर, संजय भाटिया, शशि भूषण, प्रशांत तपस्वी, रीतिका मूर्ति, श्रीराज शर्मा, योगिराज, लरिल गंजू, स्वाति सेठ, योगेश, अखिलेश (दो रैपर्स) भी ठीक ठाक हैं.

6 tips for summer: गर्मियों में ऐसे रखे स्किन का ख्याल, ग्लो करेंगी स्किन

भीषण गर्मीं में स्किन की देखभाल करना बेहद जरूरी है. अब हर कोई चाहता है कि उसकी त्वचा गर्मी में खिली-खिली और जवां रहे. किंतु गर्मी के मौसम में त्वचा डल, ड्राई और बेजान हो जाती है. गर्मी में चिलचिलाती धूप में घूमने से स्किन पर टैनिंग हो जाती है. समर में स्किन की केयर ना की जाए तो स्किन प्रॉब्लम्स होने लगती है. आइए जानते हैं समर में स्किन को स्वस्थ रखने के लिए ये 6 टिप्स.

  1. वॉटर इंटेक ज्यादा करें

गर्मियों मे पसीना ज्यादा होने से वॉटर लॉस ज्यादा होता है. इसी वजह से हमारे शरीर को पर्याप्त हाइड्रेटेड रखने की जरूरत होती है. गर्मियों के दौरान आपको वॉटर इंटेक ज्यादा रखना चाहिए. इसके लिए आप फ्रेश फ्रूट जूस और नारियल पानी को भी डाइट में शामिल कर सकते हैं.

2. एंटीऑक्सीडेंट ज्यादा लें

समर के मौसम में एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर डाइट जरूर लें. एंटीऑक्सीडेंट आपकी त्वचा संबंधित समास्याओं को दूर करेगा. इसके साथ ही अपनी डाइट में कलरफुल और एंटीओक्सीडेंट भरपूर खाद्य पदार्थ जैसे पपीता, टमाटर, आम भी डाइट में शामिल करें, जो फ्री रेडिकल्स डैमेज को कम करने में मदद कर सकते हैं.

3. दिन में दो बार नहाएं

एक्सपर्ट के मुताबिक समर में बॉडी को हाइजीन मेंटेन रखने और इंफेक्शन को कम करने के लिए दिन में दो बार नहाना चाहिए. यह स्वेटिंग से पैदा हुए बैक्टीरिया को खत्म करके बॉडी को रिलैक्स करने में मदद करेगा.

4. सनस्क्रीन का करें यूज
गर्मियों में सनस्क्रीन अवॉइड करना टैनिंग के साथ कई स्किन इंफेक्शन हो सकते है. अगर आप धूप में ज्यादा नहीं जाते तो एसपीएफ 30 की सनस्क्रीन इस्तेमाल करें, लेकिन अगर आपको काफी देर बाहर रहना पड़ता है, तो एसपीएफ 50 वाली सनस्क्रीन इस्तेमाल करें है.

5. घरेलू नुस्खे भी आजमाएं
होम मेड फेसपैक जैसे कि मुल्तानी मिट्टी, चंदन पाउडर और गुलाब जल का इस्तेमाल बेहद लाभकारी हो सकता है, क्योंकि यह चीजें त्वचा को कूलिंग इफेक्ट देने के साथ हाइड्रेड करने और फ्रेशनेस बनाए रखने में मदद करती हैं.

6. मॉइश्चराइजर करना न भूलें
समर मे हम सभी फेस पर मॉइश्चराइजर अवॉइड करना शुरू कर देते हैं, बल्कि यह स्किन केयर का जरूरी स्टेप होता है. स्किन एक्सपर्ट के मुताबिक, गर्मियों में आपको लाइट या वॉटर बेस मॉइश्चराइजर का इस्तेमाल करना चाहिए, जिससे आपकी स्किन ऑयली और डल न लगे.

Anupama: वनराज और बरखा की खुलेगी पोल, माया करेंगी अनुज से तलाक की डिमांड

स्टार प्लस का नंबर वन टीवी सीरियल अनुपमा लगातर सुर्खियों में बना रहता है. रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ दर्शको के बीच काफी फेमस है. शो में आए दिन नए-नए ट्विस्ट और टर्न्स देखने को मिलते रहते है. फैंस के लाख चाहत के बाद भी शो के मेकर्स अनुपमा और अनुज को साथ नहीं कर रहे है. शो में वैसे ही अनुज के नाक में दम कर रखा है माया ने.

बीते दिन ‘अनुपमा’ में देखने को मिला कि अनुज और अनुपमा को साथ देखकर वनराज बौखला जाता है. यह सब देखकर माया अनुज की रट लगाने लगती है. लेकिन अनुपमा भी उसको मुंहतोड़ जवाब देती है. शो के ट्विस्ट और टर्न्स यहीं खत्म नहीं होते है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sanu (@anupamaa__love__)

वनराज और बरखा की खुलेगी पोल

इस बार अनुपमा में देखने को मिलेगा कि बरखा गलती से बोल पड़ती है कि अनुपमा को अब पता चल गया है कि माया की उस दिन तबीयत खराब थी. बरखा की इस बात से अनुज और अनुपमा हैरान रह जाते हैं कि इन्हें ये बात कैसे पता थी. अनुज बरखा से सवाल करता है कि आपको कैसे पता और पता था तो आपने किसी को बताया क्यों नहीं. घबराहट में आकर बरखा वनराज का नाम भी ले लेती है कि उसे भी सबकुछ पता था. इसपर अनुपमा भड़क जाती है और उससे पूछती है कि आपने क्यों नहीं बताया कि अनुज की मजबूरी थी. ऐसे में आप मौके का फायदा उठाने में लगे थे.

अनुज से माया करेंगी तलाक की डिमांड

शो में आगे देखने को मिलेगा कि अनुज माया से साफ कर देगा कि वह कभी भी उसे पत्नी का दर्जा नहीं देगा. वहीं अनुपमा भी वनराज से साफ कर देती है कि उसकी जिंदगी में अनुज की जगह कोई नहीं ले सकता. इतना ही नहीं माया अनुज से कहती है कि आप मुझे बीवी का अधिकार नहीं दे सकते, लेकिन अनुपमा से तलाक तो ले सकते हो. माया पर अनुज भड़क जाता है और कहता है, “अनुज जान दे सकता है, लेकिन अनु को तलाक नहीं. इसलिए तलाक की बात बोलना तो दूर सोचना भी मत.”

काव्या वनराज को प्रेग्नेंसी का सच बताएगी

इस बार शो में भरपूर डोज मिलेगा. काव्या अपनी प्रेग्नेंसी का सच वनराज को बताएगी. शो में आगे देखने को मिलेग कि अनुपमा अपने समर की बारात के लिए तैयारी करती है. वहीं डिंपल शादी के बाद समर की जिंदगी नर्क बनाने का फैसला कर लेती है. दूसरी ओर काव्या वनराज को बताती है कि वह पिता बनने वाला है और अपनी प्रेग्नेंसी से पर्दा उठा देती है.

ई कौमर्स का फीका पड़ रहा नशा

ईकौमर्स आजकल तेजी से बढ़ रही है पर यह असल में हमारे निकम्मेपन और सस्ते डिलिवरी बौयज की देन है. हाल ही में जैप्टो और ब्लिंकिट ने अपने दरवाजे बंद कर दिए क्योंकि वे एक डिलिवरी के 15 रुपए डिलिवरी बौयज को दे रही थीं जिन्हें 10 मिनट में ग्राहकों तक सामान पहुंचाना होता था. मगर ग्राहकों को सेवा देर से मिलने की वजह से इन कंपनियों ने बहुत सी जगह डिलिवरी बंद कर दी.

ई कौमर्स का नशा अब धीरेधीरे फीका पड़ रहा है. अखबारों में भारी छूट के विज्ञापन बंद हो गए हैं. जो सामान दिखाया जाता है वह मिलता नहीं है. छूट भी दिखावटी होती है क्योंकि बाजार में इसी दाम पर सामान मिलने लगा है.

फिर भी सुविधा के कारण लोग अभी भी इस पर निर्भर हैं. कंपनियां भी खुल रही हैं जो अपने ब्रैंडों का सामान थोपने लगी हैं. ई कौमर्स डाउन लोड करना अब कोई मुश्किल नहीं है.

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर किसी के पास समय की कमी है. ऐसे में औनलाइन शौपिंग आज बहुत पौपुलर हो चुकी है. खरीदारी से ले कर बिक्री तक के सारे माध्यम इस के जरीए उपलब्ध हैं. मगर यदि आप ने सही ऐप डाउनलोड नहीं किया तो जितनी इस से सुविधा मिलती है, उस से कहीं अधिक हानि की भी संभावना बढ़ जाती है.

असल में इंटरनैट के जरीए बिक्री और खरीदारी को ही ई कौमर्स कहते हैं. इस में इलैक्ट्रौनिक रूप से धन 2 या 2 से अधिक पार्टियों के बीच स्थानांतरित होता है. डैविड कार्ड या क्रैडिट कार्ड की सहायता से किसी भी प्रकार का सामान घर बैठे खरीदा व बेचा जा सकता है.

ई कौमर्स कई

  •  बिजनैस टु कंज्यूमर्स में लेनदेन व्यापार और ग्राहक के बीच में होता है और यही सब से अधिक पौपुलर है. फ्लिप कार्ट, अमेजन इंडिया, इबे, स्नैपडील, जबोंग, मंत्रा आदि ऐसे ही कुछ ई कौमर्स के प्रमुख ऐप हैं.
  • बिजनैस टु बिजनैस के अंतर्गत 2 व्यवसायी आपस में व्यवसाय करते हैं. कई बार कोई कंपनी खुद प्रोडक्ट नहीं बनाती, बल्कि दूसरी कंपनी से खरीद कर सामान बेचती है.
  • कंज्यूमर्स टु बिजनैस में ग्राहक एक वैबसाइट बनाने के लिए कंपनी को औफर देता है और कंपनी उसे सही कीमत दे कर वैबसाइट बनाने की मंजूरी देती है.
  • कंज्मूमर्स टु कंज्युमर्स भी एक ऐप होता है, जिस में दोनों उपभोक्ताओं के बीच सामान खरीदा और बेचा जाता है.
  • बिजनैस टु गवर्नमैंट में कंपनियों और सार्वजनिक प्रशासन के बीच किया गया लेनदेन शामिल होता है. इस में बड़ीबड़ी सेवाएं शामिल होती हैं. मसलन, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार, कानूनी दस्तावेज आदि में यह अधिक प्रयोग में लाई जाती है.
  • कंज्यूमर टु गवर्नमैंट के तहत सरकार और उपभोक्ता के बीच लेनदेन किया जाता है

जैसे स्वस्थ्य सेवाओं का भुगतान, कर का भुगतान आदि.

ई कौमर्स के बारे में जानने के बाद सब से पहले अपनी सोच निर्धारित करें कि आप को खरीदना या बेचना क्या है. इंटरनैट के सहारे ई कौमर्स की साइट पर जा कर या गूगल प्ले स्टोर पर जा कर डाउनलोड बटन पर क्लिक करें. डाउनलोड होने के बाद उसे इनस्टौल कर लें. इस के बाद उस ऐप के सहारे किसी भी वैबसाइट पर जा कर अपना मनपसंद सामान चुनें और भुगतान करें. नाम और दिए गए पते पर सामान की डिलिवरी करवाएं. इस पद्यति से सामान खरीदना और कुछ गलत होने पर वापस करना भी आसान होता है.

ई कौमर्स के फायदे

  •  दुनिया के किसी भी कोने से खरीदारी और बिक्री की जा सकती है, उत्पाद की पहुंच अधिक से अधिक ग्राहकों तक होती है, विदेशों से आए सामान पर कस्टम ड्यूटी देनी होती है.
  • इस की कोई निर्धारित समय सीमा नहीं होती. इस पर आप कभी भी शौपिंग कर सकते हैं.
  • इस में ब्रिकी लागत कम होने की वजह से सामान सस्ते दाम में मिलता है.
  • लागत में कमी और विस्तार बाजार होने की वजह से अधिक उत्पाद कम समय में बेचे जा सकते हैं, इसलिए इस का लाभ मार्जिन बहुत अधिक होता है.
  • अधिक व्यस्तता की वजह से जो लोग दुकानों में नहीं जा सकते उन के लिए यह सब से बढि़या औप्शन है.
  • किसी भी सामान को खरीदने से पहले ग्राहक खोजबीन कर सामान की कीमत और उस की गुणवत्ता की जांचपरख कर और्डर दे सकता है ताकि उसे सही सामान सही दाम में मिले.

कौमर्स ऐप की सुविधा के साथसाथ कुछ हानियां भी हैं, जिन का ध्यान रखना आवश्यक है:

  •  यहां दुकान की तरह सामान को देख कर नहीं खरीदा जा सकता, इसलिए प्रोडक्ट की विश्वसनीयता पर संदेह रहता है, सामान सही होगा या नहीं इस की चिंता रहती है.
  • इंटरनैट की अच्छी सुविधा का होना ई कौमर्स के लिए बहुत जरूरी है, हालांकि आजकल इस की सुविधा है, लेकिन कई छोटे शहरों और अन्य क्षेत्रों में इस का अभी भी अभाव है.
  • तकनीक की सही जानकारी होना आवश्यक है ताकि सामान की सही खरीदारी या बिक्री की जा सके.
  • इस तरह के लेनदेन में सामान को निर्धारित स्थान पर पहुंचने में देर लगती है क्योंकि और्डर देने के बाद सामान कई प्रक्रियाओं से गुजर कर ग्राहक तक पहुंचता है.

बहुत सी ई कौमर्स कंपनियां कई बार मैसेज भेज कर या फोन कर के परेशान भी करती हैं. अगर आप को उन से तकलीफ न हो तो धड़ल्ले से ई कौमर्स से शौपिंग करें पर यह न भूलें कि असल मजा तो स्टोर में जाने पर होने पर आता है जब आप पूरी तरह से जांचपरख कर सामान खरीद सकते हैं.

प्री वैडिंग शूट: ऐसे करें तैयारी

हमारे समाज में कई तरह की रूढि़यां अब धीरेधीरे दरकिनार हो रही हैं. इन में से एक यह भी थी कि शादी से पहले लड़कालड़की मिलें नहीं. प्री वैडिंग के चलन से यह सोच अब टूट रही है. फिर भी अभी भी समाज का एक बड़ा हिस्सा है जो अपने बच्चों को इस से दूर रखता है. इस के बाद भी लड़के अपने जीवन के हर पल को यादगार बनाना चाहते हैं. अपनी खुशी को बनाए रखने के लिए वे प्री वैडिंग शूट कराते हैं.

इस से शादी के पहले के पलों को जीवनभर संजो कर रखना चाहते हैं. इस के लिए स्टाइलिश, कंफर्टेबल ड्रैस और अलगअलग लोकेशन का चुनाव करते हैं. इस के खास होने की वजह पार्टनर होने से पहले पार्टनर होने का एहसास करना है. एकदूसरे को जानने का मौका भी मिल जाता है. अपने पार्टनर को शादी से पहले और अच्छे से समझ पाते हैं.

मशहूर फोटोग्राफर और क्लीकर स्टूडियो के ओनर सूर्या गुप्ता कहते हैं, ‘‘प्री वैडिंग शूट आप की चाहत के हिसाब से हो इस के लिए समझदार और जानकार फोटोग्राफर पहली जरूरत होती है, जो प्लान करे. उस का एक विकल्प भी ले कर चलें. कई बार लोकेशन में दिक्कत आ जाती है. फोटोग्राफर से क्या चाहते हैं यह बात उस को बता दें. इस से वह आप की चाहत के हिसाब से रिजल्ट दे पाएगा.’’

कम बजट में कैसे करें शूट प्लान

बड़ी संख्या में परिवार प्री वैडिंग को अभी भी शादी का मुख्य हिस्सा नहीं मानते हैं. ऐसे में जरूरी यह होता है कि प्री वैडिंग शूट का प्लान इस तरह से करें कि वह कम बजट में हो सके. फोटोग्राफी के अलावा जो खर्चें होते हैं वह ड्रैस, मेकअप और लोकेशन को ले कर होता है. इस में खर्च बढ़ जाता है. हर शहर में कुछ खास स्थान होते हैं. वहां की लोकेशन को ले सकते हैं. किसी दूसरे शहर के मुकाबले इस का खर्च कम होगा. इसी तरह से ड्रैस और मेकअप के खर्च भी कम कर सकते हैं.

अपना बजट और आप क्या चाहते हैं यह फोटोग्राफर के साथ बैठ कर पहले प्लान कर लें. किसी के फोटो देख कर अपनी सोच न बनाएं. कुछ नई सोच बनाएं जिस से फोटो देखने वाला आप की समझदारी की तारीफ कर सके. शादी पर वैसे भी खर्चा ज्यादा होता है. ऐसे में फोटोशूट पर आप कितना खर्च कर सकते हैं यह पहले सोच लें. कम बजट के लिए डिजाइनर या खास तरह के कपड़े खरीदने से बेहतर होगा कि रैंट पर ले लें.

लोकेशन नजदीक चुनें

प्री वैडिंग शूट के लिए नजदीक की लोकेशन चुनें. प्रौप का चुनाव लोकेशन और ड्रैस के अलावा थीम को ध्यान में रखते हुए करें. कैसेकैसे पोज देने हैं यह भी सोच लें ताकि आखिरी समय पर दिक्कत न हो. फोटोग्राफर से मीटिंग करें तो यह सब डिस्कस कर लें. इसे डायरी में लिख लें. इस से फोटोग्राफर के साथ बेहतर तालमेल बनेगा जो वैडिंग फोटोशूट पर भी काम आएगा. प्री वैडिंग शूट में ले जाने वाले कपड़े, जेवर, मेकअप किट, नौर्मल और वेट टिशू, चादर जिस पर बैठ कर फोटोशूट के बीच में फ्री टाइम पर रिलैक्स कर सकें. शूट के पहले लोकेशन देख लें.

प्री वेडिंग शूट के लिए लोकेशन का चुनाव समझदारी के साथ करें. लोकेशन के बाद थीम  चुनना आसान होता है. हर थीम हर लोकेशन पर काम नहीं करता है. आप दोनों के मिलने की कहानी क्या है? लव मैरिज या अरेंज्ड मैरिज? आप कैसे मिले थे? कब कैसे रिश्ता शुरू हुआ था? इस से थीम और लोकेशन बनाना आसान होगा. लोकेशन वही रखें जहां आप दोनों कंफर्ट हों. थीम ऐसा हो जो लोकेशन से मैच करे. लोकेशन और थीम का चुनाव करते समय मौसम का भी ध्यान रखें. इस के हिसाब से फोटोग्राफर लैंस और बाकी चीजों का चुनाव करता है.

फोटोग्राफर कम से कम हों

बजट को कम करने के लिए कम फोटोग्राफर रखें. इस का दूसरा लाभ यह होगा कि आप आराम से फोटो शूट करवा सकते हैं. कई बार ज्यादा फोटोग्राफर होते हैं तो एकदूसरे की सोच के हिसाब से तालमेल नहीं बनता. समय भी ज्यादा लगता है. कई बार झिक झिक भी करनी पड़ती है. ऐसे में कम फोटोग्राफर ठीक रहते हैं. फोटोग्राफर का चुनाव ठीक देखभाल कर करें. समझदार और व्यवहारकुशल फोटोग्राफर अच्छा रहता है.

गैरजरूरी और महंगा है वीडियो बनवाना

प्री वैडिंग शूट के लिए वीडियो बनवाना बहुत जरूरी नहीं होता है. इस की उपयोगिता भी नहीं होती. ऐसे में इसे छोड़ा जा सकता है. शादी में वैसे भी वीडियो बनता ही है. ऐसे में वीडियो बनवाना महंगा होने के साथसाथ झंझट ही पैदा करता है.

वसीयत: भाग 1- क्या अनिता को अनिरूद्ध का प्यार मिला?

कभीकभी   प्यार जीवन में अप्रत्याशित रूप से दस्तक देता है, यह चंद्रमा समान है, जिस की शीतल चांदनी संसार की दग्ध अग्नि को शांत करती है. इस की बौछार के नीचे भीगने के लिए बस निरुपाय अंतर्भाव में रिक्त पात्र सहित खड़े रहना होता है. जिंदगी अनूठे, अप्रत्याशित स्वाद देती है और हम उन को कोई संज्ञा नहीं दे पाते. बाहरी तल पर हमें बारबार खो देना होता है एकदूसरे को लेकिन अंदर के तलों पर असंख्य कथाएं लिखी होती हैं.

अनंत यात्राओं की महागाथा के रूप में. अनीता के आसपास यही दुनिया थी, तिलिस्मी दुनिया, प्रेम की दुनिया. 48 वर्षीय संभ्रांत वर्ग की महिला, थिएटर से जुड़ी हुई. इस उम्र में भी बहुत दिलकश और हसीन, सूरज और चंद्रमा के बराबरबराबर हिस्सों से बनीं अनीताजी.

शिमला की एक शांत सी सड़क पर बड़ा सा उन का दोमंजिला घर, हरी छत वाला और सामने छोटीछोटी पहाडि़यां और पूर्व से पश्चिम की ओर विस्तारित होती हुई महान पर्वत शृंखला हिमालय.

यह वही क्षेत्र है जहां रहस्य कभी भी सर्वोच्च चोटियों को नहीं छोड़ता. अनीता अपने खयालों में गुम थीं कि मैक्स अलसाते हुए आगे आया और खुशी से गुर्राया. यह सफेद हस्की कुत्ता ही एकमात्र साथी था उन का. अनीताजी के जीवन में हस्की के अलावा कोई नहीं था.

नीचे का फ्लोर पिछले 1 साल से किराए पर दिया था, नोएडा से लड़का है अनिरुद्ध, लगभग 30 वर्ष का, वर्क फ्रौम होम करता है, यहीं शिमला में रह कर. लेकिन बिलकुल एकांत प्रेमी है, सिर्फ अपने काम से मतलब और जब खाली होता है तो बाहर बैठ कर सामने फैली हुई वृहत् शृंखलाओं को देखता रहता है डूब कर और कभीकभी पहाड़ों के स्कैच भी बनाता है.

आंखें एकदम शांत जैसे कोई ध्यान में बैठा हो, जैसे अपने दिमाग में सारे दृश्य, पहाड़, धुंध और रात का अंधकार समाहित कर रहा हो. अनीता उसे गौर से देखती रहतीं, उस से बात करने की कोशिश करतीं, लेकिन वह मतलब भर की बात कर के चला जाता.

आखिर ऐसा क्या था उस नवयुवक में जो उन्होंने कभी किसी की आंखों में  नहीं देखा था. कभीकभी वे उसे ऊपर वाले कमरे में बुला लेतीं, अपने हाथों से बनाया केक खिलाने और चाय के बहाने. अगर वह आ भी जाता तो एक अजीब से चुप्पी वहां छाई रहती और हवाएं बोझिल हो जातीं.

क्यों यह लड़का अनीताजी में बेचैनी और उत्सुकता पैदा कर रहा था? अनीता के मन की किताब के हर कोरे हिस्से पर नईनई कविताएं नाचती रहतीं. शून्य और सृष्टि जैसे एक हो रहे थे. उस के उठ के जाने के बाद अनीता कुहनियों को डाइनिंगटेबल पर टिकाए घंटों वह खाली कुरसी ताकती रहती थीं, जिस पर वह बैठ कर गया होता. फिर उस कप में चाय पीतीं, जिस में वह पी कर गया होता, शायद उस के होंठों का स्पर्श महसूसने की कोशिश करतीं.

इंसानी इश्क और जनूनी हसरतें क्या न करवा लें. उन्होंने उस पर कविताएं लिखीं. कभी भी सपनों के सच न हो पाने की लाचारी के बावजूद सहसा वे गुनगुनाने लगतीं, ‘अपनी आंखों के समंदर में उतर जाने दे, तेरा मुजरिम हूं मु?ो डूब कर मर जाने दे…’ अनीताजी अपने पिता की इकलौती संतान थीं और यह घर उन का पुश्तैनी था. मांबाप को गुजरे लगभग 10 साल हो चुके थे.

पूरा जीवन दिल्ली और मुंबई में थिएटर को दिया. ऐक्टिंग की, डाइरैक्शन की और इन सब के बीच जवानी के दिनों में प्यार में धोखा भी खाया और उस के बाद किसी और की नहीं हो पाईं, नतीजा आज वे बिलकुल अकेली थीं और अब इस उम्र में एक नवयुवक की तरफ आकर्षित हो रही थीं.

शायद वे इस लड़के के प्यार में थी. बेइंतहा प्यार में. अनीताजी खुद अपनी सोच से कभीकभी सहम जातीं कि नहीं अनीता, इस सफर की कोई मंजिल नहीं है, अपनी ही धज्जियां उड़ती हैं, कुछ भी शेष नहीं बचेगा क्यों उस की और अपनी जिंदगी के साथ खिलवाड़ करना.

अकसर अटपटी और अजनबी लय जिंदगी के किसी भी मोड़ पर संगीतमय हो कर हम में चली आती है. मन के अंतिम प्रकोष्ठ के वाद्ययंत्र तरंगित हो जाते हैं और एक देवमूर्ति जो बरसों से खंडहर में रखी होती है वह भक्त का स्पर्श पाने के लिए तरसने लगती है.

एक अस्पष्ट मंत्र सुनने को कान आकुल हो जाते हैं. कहीं दूर पखावज बजने लगते हैं. एक दिन अचानक अनिरुद्ध की तबीयत खराब हो गई, भयंकर खराब. उलटियां रुक नहीं रही थीं और वह निढाल हो कर बिस्तर पर लेटा रहा. आधी रात को फिर उलटी आई. लेकिन इतनी कमजोरी कि बिस्तर पर उलटी हो गई. उस ने अपना मोबाइल उठाया और अनीताजी को फोन लगाया लेकिन कुछ बोल नहीं पाया.

अनीताजी कुछ ही क्षणों में उस के कमरे में थीं और अनिरुद्ध को बस इतना ही याद रहा कि वह उस के सिर को गोद में रख कर सहला रही थीं और बेचैनी में किसी को फोन पर बुला रही थीं. बाद में क्या हुआ उसे कुछ याद नहीं. अगले दिन आंखें खुलीं तो वह शिमला सिटी हौस्पिटल के बिस्तर पर था. अनीताजी पास कुरसी पर बैठी सो रही थीं.

कमरे में खालीपन था और खालीपन में ही खूबसूरती समाती है. अनीताजी देखने में कितना खूबसूरत हैं… अनीताजी को एकटक देखते हुए अनिरुद्ध मायावी सपने देखता रहा. उन के स्पर्श को तरसता रहा. बाद में धीरे से सपनों की दुनिया से यथार्थ में आया. आकाशीय अभिलेखन का ब्रह्मांडीय ज्ञानरूपी सूर्य प्रकाश, पेड़ों की पत्तियों में से हो कर सामने की दीवार पर विभेदनयुक्त धब्बे बना रहा था. कमरे में धूप की चहलकदमी चालू थी. हिरण्यगर्भ से एक नई सृष्टि की उत्पत्ति हो रही थी, जिस में केवल 2 लोग थे- अनीता और अनिरुद्ध. अनिरुद्ध धीरे से बोला, ‘‘अनीता…’’

अनीताजी हड़बड़ा कर उठीं और उस की तरफ आ कर उस का हाथ पकड़ कर बैठ गईं. आज पहली बार उस ने इतनी आत्मीयता से उन्हें उन के नाम से पुकारा था. ‘‘तुम ठीक तो हो?’’ अनीताजी ने पूछा. अनिरुद्ध चुप रहा. वो उनके हाथ की नर्मी और गरमाहट महसूस करता रहा. घाटी की तलहटी पर बहती नदी की गूंज यहां तक आ रही थी. ऐसे पलों को पढ़ना ही नहीं होता, सहेजना भी होता है, इसलिए अनीताजी और अनिरुद्ध ने पढ़ना स्थगित रखा. अनीताजी को उस का स्पर्श सावन की अनुभूति करा गया. यह भावों से किया गया पावन अभिसिंचन था.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें