पहले अच्छे विद्यार्थियों में गिना जाने वाला मोहित अपनी शिक्षिकाओं के लिए अब समस्या बन गया था. वह चिड़चिड़ा और झगड़ालू हो गया था. पढ़ने और सीखने में उस की रुचि कम हो गई थी. अपने सहपाठियों की चीजें तोड़नेफोड़ने में उसे खूब मजा आता. उसे संभालना बहुत कठिन हो गया था.
‘‘मोहित की क्लासटीचर ने एक दिन उस से प्यार से बात करी तो मालूम पड़ा कि वह अपने पापा, दादादादी
नानानानी को बहुत याद करता है. उस का मन उन से मिलने को तड़पता है. अपनी टीचर से
बातें करते हुए वह भावुक हो कर कई बार रोया. मैं ने उस की बिगड़ी मानसिक स्थिति की चर्चा करने के लिए आप दोनों को बुलाया है. हम
सब की नासमझ और लापरवाही के कारण अगर उस मासूम का भविष्य खराब हो गया, तो हम सभी अफसोस करेंगे,’’ अनिता के इन शब्दों को सुन कर राकेश गंभीर व उदास सा और शिवानी उत्तेजित व भावुक नजर आने लगी.
प्रिंसिपल साहिबा के साथ उन की यह मुलाकात करीब 20 मिनट चली. इस दौरान शिवानी ने राकेश के ऊपर अपने साथ सहयोग न करने व अभद्र व्यवहार करने के आरोप को कई बार
ऊंची आवाज में दोहराया. तेज गुस्से के कारण उस की आवाज व शरीर दोनों कई बार कांपने लग जाते थे.
राकेश ने अनिता और शिवानी दोनों की बातें अधिकतर खामोश रह कर
सुनीं. उस ने न ज्यादा सफाई दी, और न ही शिवानी के खिलाफ बोला. जब भी मोहित के बिगड़े व्यवहार के बारे में प्रिंसिपल कोई जानकारी देती, उस की आंखों में दुख, चिंता और उदासी के मिलेजुले भाव और गहरा जाते.
उन दोनों को काफी समाझने के बाद अनिता ने अंत में कहा, ‘‘मुझे पूरा विश्वास है कि आप दोनों मोहित के सुखद भविष्य व समुचित विकास की खातिर साथसाथ रहना शुरू कर देंगे. अपने उत्तरदायित्वों को आपसी अहं के टकराव के कारण नजरअंदाज न करें. अपने बेटे को घर में हंसीखुशी का माहौल उपलब्ध कराना आप दोनों का ही फर्ज है.’’
प्रिंसिपल के कक्ष से बाहर आते ही राकेश ने अपना यह निर्णय शिवानी को सुनाया, ‘‘अतीत में जो भी हुआ है, उस का मुझे अफसोस है. मैं आज शाम ही तुम दोनों के पास रहने आ जाऊंगा.’’
राकेश ने अपना वचन निभाया. 2 सूटकेसों में अपना सामान भर कर उसी शाम फ्लैट में पहुंच गया. शिवानी ने उलझन भरी खुशी के साथ उस के निर्णय का स्वागत किया. मोहित तो इतना खुश हुआ कि पिता से लिपट गया.
राकेश के इस कदम से उन के आपसी संबंध सुधरने चाहिए थे, पर ऐसा नहीं हुआ. अतीत व भविष्य से जुड़ी अपनी सोचों को बदलना या रोकना इंसान के लिए आसान नहीं होता है.
पहले अपने अहं के टकराव के कारण दोनों लड़ते झगड़ते थे, पर अब अजीब सा खिंचाव दोनों के बीच बढ़ने लगा. एक ही छत के नीचे साथसाथ रहते हुए भी अजनबियों सा व्यवहार करते.
उन की आपस में बातचीत अधिकतर मोहित के बारे में होती. कभीकभी औपचारिक विषयों पर 2-4 वाक्य बोल लेते. दिल से दिल की बात कहनेसुनने का अवसर कभी आता भी, तो दोनों अजीब सी रुकावट महसूस करते हुए उस राह पर आगे बढ़ने की ताकत अपने अंदर नहीं पाते.
‘‘तुम इतना चुपचुप क्यों रहते हो?’’ कभीकभी शिवानी चिड़े से अंदाज में राकेश से पूछ भी लेती.
‘‘मैं ठीक हूं,’’ उदासीभरे अंदाज में कुछ ऐसा ही जवाब दे कर राकेश मोहित की तरफ ध्यान बंटा लेता था.
सच यह था कि दोनों रहने को सिर्फ साथ रहने लगे थे. उन की सोच व व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया था. मन की शिकायतों व नाराजगी के पूर्ववत बने रहने के कारण उन के आपसी संबंधों में सुधार नहीं हो रहा था.
राकेश अपने दिल की बात किसी से नहीं कहता था, पर शिवानी अपनी सहेली अंजलि से अपना सुखदुख बांट लेती थी.
‘‘शिवानी, तुम राकेश के बदलने का क्यों इंतजार कर रही हो. तुम खुद ही सहज हो कर उस से हंसनाबोलना क्यों नहीं शुरू देती हो?’’ अंजलि अकसर उस से कहती.
‘‘राकेश मुंह से कुछ न कहे, पर उस की आंखों में मैं अपने लिए लानतों, शिकायतों व नाराजगी के भावों को अब भी साफ पढ़ लेती हूं. तब मेरे अंदर कुछ भर सा जाता है, मन विद्रोह सा कर उठता है और मैं मीठा या अच्छा बोलने का अभिनय करने में खुद को पूरी तरह से असमर्थ पाती हूं,’’ ऐसा जवाब देते हुए शिवानी चिढ़ व गुस्से का शिकार बन जाती.
‘‘तुम दोनों शादी होने से पहले घंटों हंसबोल कर भी प्यासे से रह जाते थे. पता नहीं क्या हो गया तुम दोनों को,’’ दुख प्रकट करते हुए अंजलि की पलकें नम हो उठतीं.
अंजलि ने लाख कोशिश करी, पर वह शिवानी और राकेश को उन की
शादी की 7वी वर्षगांठ के मौके पर किसी पहाड़ी स्थल पर घूम आने को राजी नहीं कर पाई.
अंजलि के प्रयासों से ही उन के फ्लैट पर सालगिरह के दिन पार्टी का आयोजन हो पाया. शिवानी और राकेश दोनों ने इस पार्टी के प्रति जरा भी उत्साह नहीं दर्शाया.
वैसे पार्टी वाली शाम उन दोनों ने ही मेहमानों के सामने नकली मुसकान और खुशी जाहिर करने वाले मुखौटे ओढ़ लिए. उन्हें सब की खातिरदारी जोश के साथ करते देख कर कोई अनुमान नहीं लगा सकता था कि उन के बीच भारी मनमुटाव चल रहा है.
बनावटी व्यवहार इंसान के दिलोदिमाग को कहीं ज्यादा थका देता है. आखिरी मेहमान के विदा होने तक शिवानी का सिर दर्द से इतना फटने लगा कि उसे दर्दनिवारक गोली लेनी पड़ी. राकेश थकाहारा सा सोफे पर आंखें मूंद कर
लेट गया.
दोनों के मन में यह चाह मौजूद थी कि आज की विशेष रात वे एकदूसरे की बांहों में गुजारें, पर इस इच्छापूर्ति के लिए पहल करने से दोनों हिचकते रहे.
शिवानी घर संवारने लगी. राकेश मोहित से बातें करता रहा. दोनों के मन पर बेचैनी व तनाव का बोझ बढ़ता गया.
काम समाप्त कर शिवानी ने कपड़े बदले और डबल बैड पर लेट गई. राकेश आ
कर उसे प्यार से बातें करे इस की कामना करतेकरते उस की आंख ही लग गई.
बाहर ड्राइंगरूम में राकेश शिवानी के
अपने पास आ कर बैठने का इंतजार करते हुए नकारात्मक ऊर्जा से भरने लगा. आज की रात
भी अपनी पत्नी का घमंडी मन उसे बुरी तरह चुभने लगा.
मोहित कुछ देर बाद सो गया. उसे उठा कर राकेश बैडरूम में ले आया. वहां शिवानी को सोता देख कर उस को तेज धक्का लगा. उस के तनमन में दुख, पीड़ा व अकेलेपन का एहसास कराने वाली ऐसी तेज लहर उठी कि उस की आंखों में आंसू छलक आए.
मोहित को शिवानी के पास लिटा कर वह खुली खिड़की के पास आ खड़ा हुआ. आंखों में आंसू भरे होने के कारण उसे बाहर का दृश्य धुंधलाधुंधला सा नजर आ रहा था.
मोहित के हिलनेडुलने के कारण शिवानी की नींद उथली हो गई थी. फिर एक अजीब सी आवाज ने उस के कानों तक पहुंच कर उसे पूरी तरह जगा दिया.
वह आवाज राकेश के गले से निकली थी. शिवानी उठ कर उस के पास पहुंची तो अपने पति के गले से निकल रही सुबकियों की आवाज साफसाफ सुन ली.
‘‘राकेश. तुम हो रहे हो? क्यों?’’ घबराई शिवानी ने राकेश के कंधों को पकड़ कर उसे अपनी तरफ घुमा लिया.
उस पल तक शिवानी ने राकेश को यों किसी बच्चे की तरह आंसू बहाते कभी नहीं देखा था. उस के उदास चेहरे पर बहते आंसुओं का देख कर वह स्तब्ध रह गई.
‘‘क्या बात है?’’ यह पूछते हुए शिवानी की खुद की आंखें भी भर आईं.
राकेश के होंठ कुछ कहने को फड़फड़ाए, पर गले से बोल नहीं निकले. बस आंसुओं के बहने की रफ्तार व सिसकियों की आवाज ज्यादा तेज हो गई.
‘‘नो… प्लीज डौंट क्राई,’’ शिवानी ने हाथ बढ़ा कर अपने पति के गालों पर बह रहे आंसुओं को पोंछ डाला.
दोनों की नजरें आपस में मिलीं. शिवानी का दिल ऐसा भावुक हुआ कि वह भी रो पड़ी. राकेश के हाथ अपनेआप फैले और शिवानी बिना सोचेसमझे उस की छाती से लिपट गई.
‘‘जिंदगी ने हमें यह किस मोड़ पर ला खड़ा किया है, शिवानी? हमारे बीच प्रेम की जगह यह शिकायतें, यह नफरत, ये अजनबीपन कहां से आ गया?’’ रो रहे राकेश की आवाज में गहरी उदासी और अफसोस के भाव शिवानी को अंदर तक हिला गए.
एक ऐसा तूफान शिवानी के मन में उठा जिस ने उस के मन में दबी सारी नकारात्मक भावनाओं को आंसुओं की राह से बहाना शुरू कर दिया.
‘‘मैं तुम से दूर हो कर नहीं जीना चाहती हूं. मेरी अकड़… मेरे घमंड ने हमारी खुशियां तबाह कर दीं. मुझे माफ कर दो, राकेश. मुझे पहले की तरह अपने दिल की रानी बना लो,’’ सुबकती शिवानी ने राकेश के आंसू पोंछते हुए अपने दिल की इच्छा बयां करी.
‘‘तुम से बड़ा कुसूरवार मैं हूं, शिवानी,’’ राकेश रुंधे गले से बोला, ‘‘मेरे अहं ने हमारे प्रेम की जड़ों को कमजोर कर दिया. मैं… मुझे तुम्हारी तरक्की और सफलता ही बुरी लगने लगी. हर कदम पर साथ देने के बजाय मैं तुम्हारा विरोधी क्यों हो गया.’’
एक बार दोनों ने अपनेअपने दिल की गहराइयों में दबीछिपी बातों को जबान
पर लाना शुरू किया, तो जैसे कोई बांध सा टूट गया. दोनों देर तक एकदूसरे से सटे अतीत की बहुत सी घटनाओं व यादों को शब्द दे कर बांटने लगे.
जब वे सोने के लिए पलंग पर लिपट कर लेटे, तब तक उन के दिलोदिमाग पर
लंबे समय से बना रहने वाला चिंता, तनाव शिकायतों व नाराजगी का बोझ पूरी तरह से
उतर चुका था.
राकेश ने शिवानी का माथा प्यार से चूम कर कहा, ‘‘तुम आज मुझे पहले मिलन की रात से ज्यादा सुंदर लग रही हो क्योंकि मैं बहुतबहुत खुश हूं.’’
‘‘आज मैं तुम से एक पक्का वादा कर रही हूं,’’ शिवानी उस की आंखों में प्यार से झंकते हुए मुसकराई.
‘‘करो,’’ राकेश उस की जुल्फों से खेलने लगा.
‘‘भविष्य में हमारा दिनभर चाहे कितना भी झगड़ा हो, पर सोने से पहले मैं सिर्फ तुम्हारे प्यार की गरमाहट अपने रोमरोम में महसूस करना चाहूंगी. एकदूसरे के दिल की बात कहनेसुनने का सिलसिला अब हम कभी टूटने नहीं देंगे.’’
‘‘हमारी खुशियों व मोहित के इज्ज्वल भविष्य की खातिर मैं तुम्हारे साथ पूरा सहयोग करूंगा.’’
‘‘जिंदगी के सफर में आने वाली चुनौतियां तभी समस्याएं बनती हैं जब हम उन का बोझ अतीत व भविष्य की चिंताएं बना कर मन में ढोने लगते हैं. ऐसी मूर्खता करने से हम बचेंगे.’’
‘‘बिल्कुल. आओ इस समझैते पर मैं प्यार की मुहर लगा दूं,’’ राकेश ने गरदन झका कर शिवानी के होंठों पर प्यार भरा चुंबन अंकित किया, तो वह नई दुलहन की तरह से शर्मा उठी.