हैप्पी फैमिली: भाग 3- श्वेता अपनी मां की दूसरी शादी के लिए क्यों तैयार नहीं थी?

‘‘इस बीच श्रीकांत मेरे ही औफिस में मेरा सीनियर बन कर आ गया. मैं खुद को रोक नहीं सकी. हमारा रिश्ता गहरा होता गया. एक ऐक्सीडैंट में श्रीकांत की पत्नी गुजर चुकी थी. हम दोनों ने फिर से एक होने का फैसला लिया और मु झे तेरे पापा से तलाक लेना पड़ा. तब तेरे पापा ने अपनी  झोली फैला कर मु झ से तु झे मांग लिया था. सच बता रही हूं बहुत प्यार करते हैं वे तु झ से.

‘‘उन के शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं कि सपना तुम मु झे छोड़ कर जा रही हो तो तुम्हें रोकूंगा नहीं क्योंकि तुम्हारी खुशी श्रीकांत के साथ ही है. पर मु झे मेरी खुशी, मेरी जिंदगी, मेरी यह बच्ची दे कर चली जाओ. उम्र भर तुम्हारा एहसान मानूंगा. इस के बिना मैं बिलकुल नहीं जी नहीं पाऊंगा.

‘‘उस वक्त तेरे पापा की आंखों में तेरे लिए जो प्यार और ममता थी उसे आज भी नहीं भूल सकी हूं. मैं ने प्रवीण की जिंदगी अधूरी छोड़ दी थी पर तु झे उन की बांहों में सौंप कर मु झे लगा था जैसे मैं ने उन्हें और तु झे नई जिंदगी दी है. इस के बदले मैं ने अपनी ममता का गला घोट दिया और अपने हिस्से का पश्चात्ताप कर लिया. मैं चली आई पर पूरे इस विश्वास के साथ कि प्रवीण के साथ तू बहुत खुश रहेगी. वे तेरे लिए कुछ भी करेंगे. तु झ में उन की जान बसती है. प्रवीण बहुत सम झदार हैं. दिल के साथ दिमाग से भी सोचते हैं और मु झे पूरी उम्मीद है कि उन्होंने जिसे भी तेरी नई मां के रूप में चुना है वह बहुत अच्छी होगी और प्रवीण जैसी ही सम झदार होगी. सच प्रज्ञा अपने पापा और उन की पसंद पर पूरा यकीन रख. यह भी तो सोच कि तेरे ससुराल जाने के बाद वे कितने अकेले हो जाएंगे. तब कौन रखेगा उन का खयाल इसलिए उन्हें यह शादी कर लेने दे बेटा, ‘‘सपना ने बेटी को सम झाते हुए कहा था.

आज मां के मुंह से तलाक की असली वजह जान कर प्रज्ञा का दिल भर आया था. आज तक उसे यही लगता था कि कहीं न कहीं गलती उस के पापा की होगी जो मम्मी को यह घर छोड़ कर जाना पड़ा पर अब वह बड़ी हो गई थी और काफी कुछ सम झने लगी थी. मां की बातों को सुन कर उस का दिल अपने पापा के लिए प्यार से भर उठा.

जिस पापा से वह कल से इतनी नाराज थी आज उसी पापा पर उसे प्यार आ रहा था. कल से उस ने प्रवीण से बात भी नहीं की थी और प्रवीण भी कमरे में अकेले गुमसुम बैठा था मानो जानना चाहता हो कि उसे जिंदगी में कभी पूरा प्यार मिल क्यों नहीं पाया. अपनी मां की बातें सुन कर मन ही मन में प्रज्ञा ने एक फैसला ले लिया. उस ने तय कर लिया कि वह अपने पापा की खुशियों के बीच में नहीं आएगी.

घर लौट कर अमृता और श्वेता के बीच भी एक अनकही सी खामोशी पसरी हुई थी. श्वेता यह बात स्वीकार करने को तैयार नहीं थी कि उस की मां किसी अनजान पुरुष को सामने ला कर कहे कि अब से यह तुम्हारे पापा हैं. वह न अपनी मां से बात कर रही थी और न ही दोस्तों से. स्कूल में लंच के समय वह सहेलियों को छोड़ कर गुमसुम सी एक कोने में बैठी हुई थी.

उसे ऐसे बैठा देख कर उस का दोस्त पीयूष उस के पास आ कर बैठ गया. वह श्वेता की उदासी की वजह पूछ रहा था कि तभी पीयूष के पापा मिलने आए. आते ही उन्होंने बेटे को गले लगाया और चौकलेट हैंपर्स व केक देते हुए सारे दोस्तों को बांटने को कहा.

पीयूष की खुशी देखते ही बनती थी. आज उस का बर्थडे था पर उस के पापा अपनी बीमार मां को देखने गए हुए थे इसी वजह से पीयूष आज बर्थडे नहीं मना रहा था. मगर अब उस के चेहरे पर रौनक लौट आई थी. पापा के जाने के बाद उस ने मुसकराते हुए श्वेता को चौकलेट दी. श्वेता ने चौकलेट ले ली पर उस के चेहरे की उदासी नहीं गई.

‘‘बताओ न श्वेता क्या हुआ. तुम इतनी उदास क्यों हो?’’ पीयूष ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं यार.’’

‘‘बताओ न मैं दोस्त हूं न तुम्हारा.’’

‘‘यार तुम्हारे पापा तुम्हें कितना प्यार करते हैं.’’

‘‘सभी पापा अपने बच्चों से प्यार करते हैं. तुम्हारे पापा भी तो करते हैं. यह बात अलग है कि वे दूर हैं.’’

‘‘यार अपने पापा तो अपने ही होते हैं न. मगर सुना है सौतेले पापा जीना हराम कर देते हैं. अपनी वेदिका को देखा है न,’’ श्वेता ने कहा.

‘‘ऐसा कुछ नहीं है श्वेता सौतेले पेरैंट्स भी प्यार करते हैं. मेरे पापा को ही देख. मैं ने कभी किसी को नहीं बताया पर आज तु झे बता रहा हूं. कोई सोच सकता है कि वे मेरे अपने पापा नहीं हैं. उन की जान बसती है मु झ में.’’

‘‘तो क्या सचमुच वे तुम्हारे सौतेले पापा हैं?’’ चौंकते हुए श्वेता ने पूछा.

‘‘हां श्वेता पर अपने से बढ़ कर प्यार करते हैं. इसलिए कहता हूं किसी पर भी सौतेले का ठप्पा नहीं लगाना चाहिए. अब मैं चलता हूं,’’ कह कर पीयूष चला गया.

श्वेता देर तक इस बारे में सोचती रही. तभी उस ने देखा कि प्रज्ञा स्कूल की दूसरी

वाली बिल्डिंग में जा रही है. वह जल्दी से उठी, ‘‘अरे प्रज्ञा तू इसी स्कूल में पढ़ती है?’’

‘‘हां और तू भी? गुड यार.’’

‘‘आ बैठ न तु झ से बातें करनी हैं,’’ श्वेता

ने उसे अपने पास बैठा लिया और पूछा, ‘‘प्रज्ञा

तू ने क्या सोचा हमारे पेरैंट्स की शादी के बारे में?’’

‘‘यार मु झे तो लगता है यह शादी हो जानी चाहिए. हमारा परिवार भी पूरा हो जाएगा और हमारे पेरैंट्स को भी जीवनसाथी मिल जाएंगे. आखिर हम हमेशा उन के साथ तो रह नहीं सकते,’’ प्रज्ञा ने सम झाते हुए कहा.

‘‘तू कह तो सही रही है, मगर क्या तु झे नहीं लगता कि सौतेले मम्मीपापा का होना कितना अजीब है?’’

‘‘यार मैं ने भी पहले ऐसा ही सोचा था. मगर मेरी मम्मी ने ही सम झाया कि ऐसा कुछ नहीं होता कई बार दिल के रिश्ते जन्म के रिश्तों से बड़े निकलते हैं. हमें उन को एक मौका तो देना ही चाहिए न,’’ प्रज्ञा ने कहा.

पीयूष की बातों ने पहले ही श्वेता की सोच को एक दिशा दी थी. अब प्रज्ञा की बातों ने उस का रहासहा संशय भी मिटा दिया.

श्वेता कुछ देर प्रज्ञा की तरफ देखते हुए कुछ सोचती रही, फिर उस से हाथ मिलाते हुए बोली, ‘‘ठीक है हम एक हैप्पी फैमिली बनाएंगे. कोशिश करने में हरज ही क्या है. शायद इस से हमारे पेरैंट्स की अधूरी जिंदगी भी पूरी हो जाए.’’

खुशी से प्रज्ञा ने श्वेता को गले लगा लिया. आज दोनों ही अपनेअपने पेरैंट्स को सरप्राइज देने वाली थीं.

मुझे फैटी लिवर की समस्या है, मैं जानना चाहती हूं कि इसका क्या इलाज है?

सवाल

मैं 44 वर्षीय कामकाजी महिला हूं. मुझे फैटी लिवर की समस्या हो गई है. मैं जानना चाहती हूं कि यह समस्या कितनी गंभीर है और इस के उपचार के कौनकौन से विकल्प उपलब्ध हैं?

जवाब

लिवर में वसा के जमने को फैटी लिवर कहते हैं. लिवर में वसा होना सामान्य है लेकिन यह 5-10त्न से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. फैटी लिवर की समस्या अपनेआप ही ठीक हो जाती है. अकसर इस का कोई लक्षण भी दिखाई नहीं देता है न ही लिवर को कोई स्थाई नुकसान पहुंचता है. लिवर में वसा का जमाव अधिक होने से कई बार यह सूज जाता है और इस की कार्य करने की गति धीमी हो जाती है. इस की वैसे तो कोई दवा नहीं है. डाक्टर उन कारकों को नियंत्रित करने को कह सकता है जो इस का कारण बन रहे हैं.

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सवाल

मेरे पति को लिवर सिरोसिस है. यह समस्या क्यों होती है और इस के उपचार के कौनकौन से विकल्प उपलब्ध हैं?

जवाब

लिवर सिरोसिस यानी लिवर का स्थाई रूप से क्षतिग्रस्त हो जाना. सिरोसिस में लिवर की स्वस्थ कोशिकाएं इतनी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं कि लिवर अपने निर्धारित कार्य नहीं कर पाता है. सामान्य तौर पर जब पुरानी कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं तब लिवर नई कोशिकाओं का पुनर्निर्माण कर के स्वयं इस क्षति की भरपाई कर लेता है, लेकिन सिरोसिस में लिवर की कोशिकाएं इतनी तेजी से और इतनी अधिक मात्रा में क्षतिग्रस्त होती हैं कि इन का पुनर्निर्माण करना लिवर के लिए संभव नहीं होता. इसे ही सिरोसिस कहते हैं. शराब का अत्यधिक मात्रा में सेवन लिवर सिरोसिस का सब से प्रमुख कारण है. इस के अलावा फैटी लिवर की समस्या और हैपेटाइटिस भी इस का कारण बन सकता है. लिवर सिरोसिस का उपचार इस पर निर्भर करता है कि इस का कारण क्या है और लिवर को कितनी क्षति पहुंच चुकी है.

  -डा. संजय गोजा

प्रोग्राम डाइरैक्टर ऐंड क्लीनिकल लीड-लिवर ट्रांसप्लांटएचपीबी सर्जरी ऐंड रोबोटिक लिवर सर्जरीनारायणा हौस्पिटलगुरुग्राम.

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तलाक देना ही समाधान नहीं

अगर पति और पत्नी संबंध जोड़ते हैं तो एकदूसरे की  सुरक्षा लेने, एकदूसरे का साथ लेने, एकदूसरे को सैक्स और बच्चों का सुख देने के लिए. विवाह हमेशा 2 युवाओं के बीच ही होता है. यह व्यावहारिक बात ही है कि उस उम्र में युवक के पास अपना घर नहीं होता तो वह मातापिता के साथ रहता है और युवक ही नहीं उस की पत्नी भी उस के मातापिता को सम्मान, आदर व सहयोग देती है. मगर क्या विवाह की शर्तों में मातापिता की सेवा भी शामिल होनी चाहिए?

आजकल तो यह सेवा लड़की के मातापिता भी मांगने लगे हैं अगर वह मातापिता की अकेली बेटी है. क्या युवक का कर्तव्य है कि वह पत्नी के मातापिता की सेवा उसी तरह करे जैसे बेटी विवाह से पहले करती आई है? कोलकाता हाई कोर्ट ने एक फैसले में कहा है कि पुत्र का नैतिक कर्तव्य है कि वह अपने मातापिता का ध्यान रखे और उन्हें छत प्रदान करे.

अगर युवक की पत्नी मातापिता को पुत्र से अलग करना चाहे तो पति तलाक मांग सकता है. भारतीय संस्कृति का नाम लेते हुए हाई कोर्ट के जज ने पत्नी को ही नहीं समाज को भी उपदेश दिया है कि पति के साथ पति के मातापिता की सेवा न करना वैवाहिक अपराध है और उसे पत्नी की क्रूरता कहा जाएगा जो तलाक का स्पष्ट आधार है. तलाक तो हर उस स्थिति में पति या पत्नी का हक होना ही चाहिए जब दोनों में किसी भी कारण से नहीं बन रही.

कानून, समाज, अदालतें पतिपत्नी को एक बिस्तर पर सोने के लिए तब बाध्य नहीं कर सकतीं जब दोनों में कोई प्रेम न हो. यह धारणा ही गलत है कि पतिपत्नी का संबंध जीवनपर्यंत है और 7 जन्मों तक  चलने वाला है और समाज, कानून इसे युवा पतिपत्नी पर थोप सकता है. यदि पत्नी पति के मातापिता के साथ किसी भी कारण से न रहना चाहे और पति यदि उन से अलग रहने से इनकार इस हद तक कर दे कि पतिपत्नी के संबंध ही टूट जाएं तो तलाक केवल अकेला तरीका है. इसे पहले ही अदालत द्वारा पहली ही पेशी में दे दिया जाना चाहिए.

पति या पत्नी के मातापिता को यह हक नहीं कि वे अपने बच्चों को पालने की कीमत उन के युवा होने पर वसूलने का कोई सामाजिक, नैतिक या कानूनी अधिकार आविष्कार कर के थोपें. हां, मरजी से मातापिता के घर में युवा पतिपत्नी रहना चाहें या मातापिता अपने बनाए, अपने खर्च पर चलते घर में अपनी शर्तें लागू करें तो यह उन का पूरा हक है.

इस में न पति न पत्नी कोई अड़चन डाल सकती है. भारतीय संस्कृति में हजारों ऐसी कहानियां सुनाई जाती हैं जिन में पति अपनी पत्नी को पारिवारिक या धार्मिक कारणों से दंड देता है. विधवाओं को जलाना या उन्हें सफेद कपड़े पहनने को मजबूर करना उन्हीं में से एक है. पति की आयु के लिए व्रत, उपवास और पूजापाठ करना भी इसी संस्कृति का जनक है जिस में पत्नी को सामाजिक गुलाम बना दिया जाता है. इस की सैकड़ों कहानियां हमारे ग्रंथों में मौजूद हैं और इन ग्रंथों की महिमा गाने वाले ही किस तरह अपनी पत्नी को छोड़ देते हैं, इस के उदाहरण भी जगजाहिर हैं. अपने मातापिता की सेवा या पति या पत्नी के मातापिता की सेवा करना एक सामान्य बात है और समझदार युवा व युवती कभी भी इस से पीछे नहीं हटेंगे.

मुसीबत तब होती है जब छद्म संस्कृति के नाम पर जबरन सेवा करने की जिद की जाती है. कोलकाता उच्च न्यायालय ने तलाक दिलवाया यह सही है पर संस्कृति और परंपरा को बीच में ला कर पत्नी को नाहक कठघरे में खड़ा करने की जरूरत नहीं थी.

बीवी चाहिए सुंदर मगर…

दिनेश वर्मा ने कभी नहीं चाहा था कि उस की पत्नी कृति नौकरी करे. वह तो हर वक्त कृति को अपनी नजरों के सामने रखना चाहता था. कृति उस के लिए वह अनमोल हीरा थी जिसे खो देने के डर से वह अपने काम पर भी ध्यान नहीं दे पा रहा था. उस की निगरानी के चक्कर में अंतत: घर के आर्थिक हालात इतने बिगड़ गए कि कृति को ही नौकरी करने के लिए घर से बाहर निकलना पड़ा.

कृति 24 साल की पढ़ीलिखी, सुलझी हुई, सुंदर और सलीकेदार लड़की है. ग्रैजुएशन पूरा करने के बाद उस ने नर्सिंग की ट्रेनिंग भी की थी. उस की शादी दिनेश से हुई तो उस ने नौकरी करने के बजाय गृहस्थी को प्राथमिकता दी. दिनेश भी यही चाहता था कि कृति घर पर ही रहे. वह सोचता था कि कहीं उस की सुंदर पत्नी को कोई दूसरा पटा न ले. वह तो कृति को घर के दरवाजे पर भी खड़ा होने पर टोक देता था. कभी वह कहती कि वह थोड़ी देर छत पर टहल आए तो दिनेश भी उस के साथ जाता. कुल मिला कर यह कि दिनेश एक सुंदर स्त्री को ब्याह कर तो ले आया मगर उस की सुंदरता ने उस के अंदर असुरक्षा का भाव पैदा कर दिया. शक और सुरक्षा की भावना.

2015 में जब दिनेश की शादी कृति से हुई थी, तब रिश्तेदारों, दोस्तों और महल्ले वालों के मुंह से अपनी पत्नी की खूबसूरती की तारीफ सुन कर उस की छाती फूल जाती थी कि हाय कितनी सुंदर दुलहन लाया है. दिनेश तेरे तो आंगन में चांद उतर आया है. बहुत कम को इतनी सुंदर पत्नी मिलती. ऐसी बातें सुनसुन कर वह खूब खुश होता था.

दिनेश एक प्राइवेट जौब में था. सैलरी अच्छी थी. काम के सिलसिले में उसे कभीकभी टूर पर भी जाना पड़ता था. घर में उस के और कृति के अलावा मां और छोटा भाई राघव था. राघव दिनेश से 2 ही वर्ष छोटा है और ग्रैजुएशन कर रहा है. अपनी भाभी के साथ राघव खूब हंसीठिठोली कर लेता है. कृति उम्र में राघव से छोटी है तो कभीकभी उस की बातों से शरमा भी जाती है. इन बातों को दिनेश ने कई बार नोट किया है. कृति के आने के बाद राघव के दोस्तों का भी घर में आनाजाना बढ़ गया था. कृति सब से हंस कर बात करती और एक अच्छी बहू की तरह सब की सेवा और सत्कार में लगी रहती. लेकिन बाहरी लड़कों का यों घर में जमघट लगना दिनेश को अच्छा नहीं लगता था.

कृति की सुंदरता ने दिनेश के अंदर शक और असुरक्षा की भावना भर दी थी. वह जितनी देर औफिस में होता था उस की नजर फाइलों पर कम दीवार घड़ी पर ज्यादा रहती थी कि कब 6 बजें और वह घर भागे. दिनेश छुट्टियां भी बहुत लेने लगा था. आए दिन कोई न कोई बहाना ले कर मैनेजर के पास पहुंच जाता. औफिस के काम के संबंध में पहले वह हर महीने टूर पर जाता था, मगर शादी के बाद टूर पर भी नहीं जाना चाहता था. बहाने बना देता था. मैनेजर जोरजबरदस्ती कर के भेज दे तो उलटापुल्टा काम निबटा कर अगले दिन वापस आ जाता था.

6 महीने तो मैनेजर ने दिनेश को समझाने की बहुत कोशिश की और फिर काम से निकाल दिया. बीवी की रखवाली के चक्कर में दिनेश ने न सिर्फ अपना कैरियर बरबाद कर लिया बल्कि दोस्तों और घर वालों की नजर में भी बीवी का पिछलग्गू समझ जाने लगा. जब बढ़ने लगा कर्ज घर में कमाने वाला सिर्फ दिनेश ही था. उस की तनख्वाह से घर का खर्च और छोटे भाई की पढ़ाई ठीकठाक चल रही थी. जौब छूटने के बाद दिनेश ने कई जगह इंटरव्यू दिए, मगर नौकरी पाने में कामयाब नहीं हुआ. इधर बचत के पैसे खत्म होने लगे और उधर कृति की डिलिवरी की तारीख भी नजदीक आ गई. दिनेश की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर हो गई कि घर में बच्चा होने की खुशी की मिठाई महल्ले वालों को उस ने एक दोस्त से उधार पैसे ले कर खिलाई.

दिनेश के सिर पर कर्ज बढ़ रहा था. कृति को इस का एहसास था. खर्चा चलाने के लिए वह अपनी सोने की चेन दिनेश को दे चुकी थी. अम्मां ने भी अपनी चेन गिरवी रखवाई थी क्योंकि छोटे बेटे की फीस जमा होनी थी. कुछ दिन बाद कृति ने सोने की चूडि़यां भी दे दीं. दिनेश ने उन्हें भारी मन से बेचा.

धीरेधीरे डेढ़ साल गुजर गया. दिनेश को कोई अच्छी नौकरी नहीं मिली. कभी ट्यूशन पढ़ा कर तो कभी किसी और तरीके से वह थोड़ाबहुत पैसा कमा रहा था, मगर इस थोड़ी सी पूंजी से घर का खर्च चलाना संभव नहीं हो रहा था.

एक दिन कृति ने दिनेश से कहा कि अगर उसे जौब नहीं मिल रही है तो क्यों न वह कहीं जौब कर ले. आखिर नर्सिंग ट्रेनिंग किस दिन काम आएगी. दिनेश को जब जौब मिल जाएगी तो कृति छोड़ देगी. दिनेश राजी हो गया तो कृति ने 2-3 प्राइवेट अस्पतालों में अपना आवेदन भेज दिया. जल्द ही एक अस्पताल से इंटरव्यू की कौल आ गई. कृति दिनेश के साथ इंटरव्यू देने गई और पहले ही इंटरव्यू में उस का चयन हो गया. इंटरव्यू लेने वालों पर उस की डिगरियों से ज्यादा उस की सुंदरता और सलीके ने प्रभाव डाला. मां बनने के बाद कृति पहले से ज्यादा निखार गई थी. गहराता गया शक

कृति नौकरी पर जाने लगी तो दिनेश के मन में असुरक्षा की भावना और ज्यादा बढ़ गई. अस्पताल में तमाम जवान डाक्टर हैं. कहीं किसी के साथ कृति के संबंध न बन जाएं. सुबह जब कृति अस्पताल जाने के लिए तैयार हो कर निकलती तो दिनेश उस के दमकते शरीर को आंखें फाड़ कर देखता रह जाता. इस हीरे को कोई गपक न ले वह इस चिंता में घुला जाता था. कृति को अस्पताल छोड़ने और लेने वह खुद जाता था.

अब हाल यह हो गया कि अपने लिए नौकरी तलाशने के बजाय दिनेश दिन में कई चक्कर कृति के अस्पताल के लगाने लगा.

1-2 बार फोन भी कर लेता. इस पर कृति को ?ां?ालाहट भी होती थी. अगर किसी गंभीर केस की वजह से कृति को अंदर देर होती तो दिनेश की बेचैनी 7वें आसमान पर पहुंच जाती थी. कहना गलत न होगा कि कृति की सुंदरता ने दिनेश की जिंदगी का सुकून खत्म कर दिया था. उस की 24 घंटे की चौकीदारी से कृति भी बहुत परेशान रहती. पहले तो उसे लगता था कि उस का पति उस से बहुत प्यार करता है इसलिए हर वक्त उस के साथ रहना चाहता है, लेकिन बाद में उसे एहसास होने लगा कि वह उस की चौकीदारी करता है, उस के कैरेक्टर पर संदेह करता है.

दरअसल, पत्नी की अत्यधिक सुंदरता उन पतियों को बहुत असुरक्षित कर देती है, जो शक्की और संकीर्ण सोच वाले होते हैं. भले पत्नी का चरित्र साफ हो, वह सिर्फ अपने पति से ही प्रेम करती हो, मगर पति को हर समय यह शक लगा रहता है कि कहीं उस की पत्नी के किसी दूसरे आदमी से संबंध तो नहीं हैं, कोई और तो उस पर डोरे नहीं डाल रहा है.

अतीत में ताकझांक

उस के मन में यह कीड़ा भी कुलबुलाता रहता है कि इतनी सुंदर है तो कालेज लाइफ में जरूर इस का कोई न कोई प्रेमी रहा होगा. पत्नी की बीती जिंदगी में भी वह घुसने की कोशिश करता रहता है और घुमाफिरा के उस की कालेज फ्रैंड्स के बारे में पूछता है. इस शंका का परिणाम यह होता है कि वह अपना कामधंधा छोड़ कर पत्नी पर निगरानी रखने लगता है. अगर पत्नी फोन पर किसी से ज्यादा देर तक बात करे तो संकेत से पूछ ही लेगा कि किस का फोन है.

एक पुरानी कहावत है कि सुंदर कन्या से विवाह करने का मतलब है सड़क के किनारे धनिया बोना अर्थात दोनों ही मामलों में असुरक्षा बनी रहती है. हरेक पड़ोस में कुछ देवर टाइप लोग भी होते है. सुंदर पत्नी दरवाजे या गेट पर खड़ी हो कर उन से हंस कर बात कर ले तो गजब हो जाता है. शक्की पति सुंदर बीवी को न तो किसी से हंसने बोलने देता है और न ही कहीं अकेले आनेजाने देता है.

सुंदरता को ज्यादा महत्त्व

समाज चाहे जितना आधुनिक हो गया हो, किंतु कुछ मामलों में सोच अभी भी पुरानी ही है. शादीविवाह के मामलों में आज भी स्त्री की पढ़ाई और योग्यता से ज्यादा उस की सुंदरता को तरजीह दी जाती है. सुंदर लड़कियों की शादी भी तुरंत तय हो जाती है. लेकिन यह सुंदरता कभीकभी पति पर बहुत भारी पड़ती है. पति साधारण शक्लसूरत का हो और पत्नी हीरोइन जैसी दिखती हो तो पति चौकीदार बन कर रह जाता है.

आशंकित पति

पत्नी सुंदर हो तो पति उसे कहीं अकेले नहीं जाने देता बल्कि खुद साथ जाता है और कभीकभी तो ऐसा होता है कि जहां पत्नी को जाने की आवश्यकता भी नहीं होती वहां यह सोच कर उसे साथ ले जाता है कि उस के घर में अकेली होने पर कोई अनहोनी न हो जाए, कहीं किसी पड़ोसी, छोटे या बड़े भाई से उस के संबंध न बन जाएं. खूबसूरत और चिर जवां पत्नी पति के हाथ में एटम बम की तरह होती है जिस के प्रति वह हमेशा आशंकित रहता है कि पता नहीं कब दुर्घटना घट जाए.

खुद को फिट रखने की मजबूरी

सुंदर बीवी हो तो पति को अपने जीवन में भी कई बदलाव करने पड़ते हैं. अपनी फिटनैस की तरफ ध्यान देना पड़ता है. मनचाहे भोजन का त्याग कर के ऐसी डाइट लेनी पड़ती है जिस से उस की तोंद न निकले. कुछ पति तो खुद को स्लिमट्रिम रखने के चक्कर में केवल सलाद या बेस्वाद खाने से काम चलाने लगते हैं. देखा गया है कि सुंदर पत्नी वाले पति के परिवार में शादीब्याह या कोई अन्य फंक्शन हो तो वह 1-2 महीने पहले से ही कसरत या ग्रूमिंग सैशन में जा कर अपने को फिट करने लगता है ताकि कोई उन की जोड़ी को बेमेल न कह दे.

सार्वजनिक स्थल पर असुविधा

खूबसूरत बीवी साथ में होने पर सार्वजनिक स्थल पर आप को असुविधाजनक स्थिति का सामना करना पड़ता है. कई नौजवान और तरसे हुए लोगों को अपनी बीवी की ओर ताकते पाएंगे जो आप को असुरक्षा और हीनता का बोध कराएगा. खूबसूरत बीवी साथ में होने से आप

उन लोगों को अपने आसपास ‘भाभीजी’ ‘भाभीजी’ कहते हुए मंडराते पाएंगे, जिन्हें आप फूटी आंख भी पसंद नहीं करते हैं. पत्नी खूबसूरत मिल जाए तो रिश्तेदार और दोस्त भी आप में हीनभावना भरने का काम करने लगते हैं फिर चाहे आप अपने कार्यक्षेत्र में कितने ही सफल क्यों न हों.?

सुंदरता नहीं गुण जरूरी

बावजूद इन सब बातों के लगभग हर आदमी की यही इच्छा होती है कि जब भी उस की शादी हो तो किसी सुंदर कन्या से ही हो. सिर्फ शादी करने वाला लड़का ही नहीं, बल्कि उस की मां और पिता भी यही चाहते हैं कि उन के घर में बेहद खूबसूरत बहू कदम रखे.

आजकल के जमाने में घर में खूबसूरत बीवी या बहू रखना एक तरह का शोऔफ सा हो गया है. लोग लड़की की योग्यता, शिक्षा या कैरियर के बजाय उस की सुंदरता के पीछे भागते हैं, जबकि बाहरी खूबसूरती ही सबकुछ नहीं होती हैं, आंतरिक सुंदरता और अच्छा व्यवहार भी माने रखता है.

मेनोपौज नहीं है कोई बीमारी

जयश्री बातबात पर क्रोधित होने लगी थी. औफिस में किसी न किसी के साथ झगड़ती रहती थी. इस सब से वह बहुत परेशान रहती थी. सोचती क्या उसे कोई बीमारी तो नहीं हो गई? उस की सम?ा में नहीं आता था कि उस में ऐसा फर्क कैसे आ रहा है. उसे ऐसा ही लगता कि घर के सथी लोग उस का दिमाग खराब कर रहे हैं और बच्चे तो उस की सुनते ही नहीं हैं.

एक दिन जब जयश्री की हालत बहुत खुराब हो गई तब उन के पति उस को एक गायनेकोलौजिस्ट के पास ले गए. डाक्टर ने पूछताछ की और जांच कर के कहा कि इस में चिंता की कोई बात नहीं है. जयश्री को मेनोपौज की तकलीफ है.

मेनोपौज स्त्रीजीवन की एक अवस्था है, जिस में स्त्री को शारीरिक और मानसिक तकलीफें रहती हैं. कई बार इतनी तकलीफों से गुजरती है कि उस के लिए मेनोपौज एक समस्या बन जाती है.

दरअसल, महिला के शरीर में गर्भाशय की साथ 2 अंडाशय होते हैं. इन अंडाशयों में से ऐस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रेरौन नामक 2 आंतस्त्राव निकलते हैं. इन हारमोंस के जरीए महिला का शारीरिक और मानसिक संतुलन बना रहता है. लेकिन महिला में करीब 40 की वय में यह आंतस्त्राव धीरेधीरे कम होने लगता है, जिस कारण मानसिक तकलीफें शुरू हो जाती हैं. इसे मेनोपौज कहा जाता है. 45 से 50 की वर्ष में जब यह आंतस्त्राव कम होने लगता है तब महिला मेनोपौज में आई होती है.

महिला में मेनोपौज पूरी जिंदगी देखने को मिलता है, जिसे पोस्ट मेनोपौज कहा जाता है. इस में यह देखने को मिलता है.

  • मासिक अनियमित आना.
  • शरीर में अचानक गरमी लगना, पसीना छूट जाना.
  • हृदय की धड़कन बढ़ जाना.
  • मूत्राशय के रोग.
  • यूरीन में बारबार चेप लगना.
  • बारबार पेशाब जाना.
  • पेशाब के वक्त दर्द और जलन होना.
  • पेशाब पर कंट्रोल न रहना, पेट में दर्द होना.
  • योनिमार्ग की भी कई तकलीफें देखने को मिलती हैं.
  • खुजली होना.
  • कई बार छाले भी पड़ जाते हैं.
  • स्नायुओं और जोड़ों में दर्द रहना.
  • स्किन की ड्राई और पतला हो जाना.
  • मानसिक तकलीफों में टैंशन होना.
  • जीवन नीरस बन जाना.
  • याददाश्त कम होना
  • हत्या करने की इच्छा होना आदि.

किसी भी कारण से जब महिला गर्भाशय निकालने का औपरेशन कराती है तो वह मेनोपौज में नहीं होता है. लेकिन गर्भाशय के साथ दोनों अंडाशय निकाल लिए हों तो इन में से आंतरत्राव बंद हो जाता है और महिला में मेनोपौज की तकलीफें देखने को मिलती हैं. महिला मेनोपौज में आए तब गर्भाशय और अंडाशय की सोनोग्राफी होनी चाहिए. महिला के सफेद पानी की भी जांच करानी पड़ती है.

मेनोपौज में होने वाली तकलीफें

  • हड्डियों में दर्द रहता है.
  • सब से खतरनाक बात हड्डियों का
  • फैक्चर होना.
  • लंबे समय तक बिस्तर पर रहना पड़ता है.
  • मेनोपौज में होने वाली जांच
  • महिला को 35 की उम्र से हर जांच
  • करानी चाहिए.
  • हड्डियों की जांच सोनाग्राफी, मैमोग्राफी या बेक्सा से करानी चाहिए.
  • रूटीन ब्लड जांच.
  • थायरायड, ग्लूकोस, कोलैस्ट्रौल, लाइथील प्रोफाइल की जांच नियमित करानी चाहिए.
  • ऐक्सरे कराना चाहिए.

मेनोपौज में क्या करें

  • टैंशन नहीं लेनी चाहिए.
  • नियमित काम करना चाहिए.
  • कसरत करनी चाहिए.
  • डाक्टर की सलाह अनुसार हर्बल और कैल्सियम की गोलियां लेनी चाहिए.

5 Tips: आपके ब्यूटी प्रोडक्ट्स, पड़ ना जाएं सेहत पर भारी

जब से कोरोना काल का भयानक मंजर लोगो ने देखा है तब से इन्फेक्शन को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हो गए  हैं. हालांकि लोगो ने अब मास्क का प्रयोग करना काफ़ी हद तक कम कर दिया है लेकिन खुद को जर्म  फ्री रखने के लिए सेनिटिज़ेर का प्रयोग करते है या हाथों को साबुन से धो लेते हैं. खास कर महिलाऐं इस बात का खास ध्यान रखने लगी हैं किचन में सब्जियों को अच्छे से धोना अब उनकी आदत में शुमार हो गया है. खैर कोरोना काल से हमने स्वस्थ रहने के कई गुण सीखे हैं। लेकिन क्या आपने सोचा है कि  जो आप अच्छे और महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स  अपनी त्वचा पर इस्तेमाल करती हैं वो कीटाणूों  से सुरक्षित है या नहीं.

शायद आपका जवाब होगा नहीं क्योंकि  हम उन पर मौज़ूद जर्म्स के बारे मे सोचते तक नहीं हैं. लेकिन यदि वो प्रोडक्ट धुल या जर्म्स से भरा हो  तो वो आपके चेहरे पर हफ्ते भर जितनी गंदगी और जर्म्स छोड़ सकता है. तो जरूरी है की अपनी मेकअप किट को इन  कीटाणूों से बचने के लिये कुछ बातों का रखें ख्याल. किट को जर्म्स फ्री रखने के कुछ आसान  टिप्स.

  1. स्प्रे है जरूरी

अलकोहल स्प्रे को अपनी किट मे अवश्य जगह दे क्योंकि जर्म्स से बचाने मे इसका अहम रोल होता है .

2.आँखों के इन्फेक्शन से बचे

जब भी आप कोई भी आँखों के लिए पेंसिल काजल का इस्तेमाल करती हैं तो उसे पहले वेट टिश्यू से साफ़ कर लें या उसे इस्तेमाल से पहले हल्का सा छिल ले जिससे उसकी ऊपरी परत पर जमे जर्म्स निकल जाएं .क्योंकि आपकी आंखों की नम म्यूकस (श्लेष्मा) झिल्ली में त्वचा की तरह सुरक्षा कवच नहीं होता. इसलिए,आसानी से आपकी आंखों को इंफेक्ट कर सकता है.

3.एयर टाइट कंटेनर

हवा में तैरते जर्म्स आसानी से चिपक जाते हैं, इसलिए अपने प्रोडक्ट  को एयर टाइट  बॉटल में रखे. ताकि बाथरूम या ड्रेसिंग टेबल पर खुले में दिखने वाले कॉस्मेटिक्स, ब्रश जर्म्स फ्री रह सकें और आपकी स्किन तक नहीं पहुंच पाएं. बेहतर होगा  प्रॉडक्ट्स को निकालने के लिए सीधे हाथों का इस्तेमाल ना कर के साफ़ ब्रश का इस्तेमाल करें. व  सप्ताह में एक दिन अपने ब्रश को डिसइन्फेक्टर से साफ भी करें.

4. लिपस्टिक को रखें जर्म्स फ्री

लिपिस्टिक को सीधे होठों पर लगाने से ज्यादा बेहतर होगा की एक पैलेट  में  निकाल लें  और तब ब्रश की मदद से लगाएं.

5. टैस्टर अप्लाई करने से बचें

यदि आप कोई प्रोडक्ट खरीदने जा रही है तो उनके टेस्टर प्रोडक्ट्स को इस्तेमाल करने से बचे क्योंकि इन्हे कई लोग इस्तेमाल करते हैं. जिन पर स्टेफ, स्ट्रेप और ईं कोलाई जैसे जर्म्स होने का खतरा होता है और ये आपको जुखाम और स्किन इनफेक्शन का शिकार बना सकते हैं.

बेहतर होगा की अपने ब्यूटी प्रोडक्ट्स को किसी के भी साथ शेयर न करें. खास कर अपनी लिपस्टिक, मस्कारा और काजल को तो बिलकुल नहीं.  साथ ही यदि आप पार्लर में  तैयार होने जा रही हैं तो अपनी ब्यूटीशन से सुनश्चित कर ले की उनके प्रोडक्ट जर्म फ्री है या नहीं क्योंकि पार्लर में अलग अलग तरह की स्किन पर प्रोडक्ट्स का प्रयोग होता है जिस से इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है.

जिंदगी का सफर: भाग 2- क्या शिवानी और राकेश की जिंदगी फिर से पटरी पर लौटी?

राकेश और शिवानी के निरंतर बिगड़ रहे संबंधों में उन के अहं का टकराव महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था. कोई भी पहले  झक कर आपस में मिलने की समझदारी नहीं दिखा रहा था.

राकेश और उस के मातापिता मोहित से तब मिल आते जब शिवानी और उस की सहेली औफिस में होती. शिवानी से मिल कर सुलह की बातें करने को उन में से कोई राजी न था.

‘‘शिवानी बिना पूछे घर से आई थी. वह जब चाहे लौट सकती है, लेकिन वैसा करने के लिए हम उस के सामने हाथ नहीं जोड़ेंगे,’’ उन तीनों की ऐसी जिद के चलते जिद्दी शिवानी की ससुराल लौटने की संभावना बहुत कम होती गई.

शिवानी ने एक फ्लैट का इंतजाम कर लिया.

कमर्शियल अपार्टमैंट जो एक सोसायटी में थी. करीब 2 महीने बाद मोहित का जन्मदिन आया. बर्थडे वह मायके में मनाएगी यह तय हुआ. इस अवसर पर राकेश आएगा, इस बात की शिवानी को पूरी उम्मीद थी. उस ने अच्छी पार्टी का इंतजाम करने के लिए अपनी मां को क्व5 हजार दिए.

‘आज शाम किसी न किसी तरह से मैं राकेश के पास लौटने की सूरत जरूर पैदा कर लूंगी,’ ऐसा निश्चिय शिवानी ने मन ही मन कर लिया.

जन्मदिन की पार्टी में शामिल होने को शिवानी जल्दी औफिस से निकलने ही वाली थी जब उस के पास उस की मां का फोन आया, ‘‘शिवानी, हम सब तेरी ससुराल में मोहित का जन्मदिन मनाने को इकट्ठे हुए हैं. तू भी यही आ जा.’’

मां के मुंह से निकले इन शब्दों को सुन कर शिवानी को गहरा धक्का लगा. बोली, ‘‘मां, पार्टी हमारे घर में होनी थी. मोहित को तुम वहां क्यों ले गई हो?’’ क्रोध की अधिकता के कारण शिवानी थरथर कांप रही थी.

‘‘तेरे सासससुर मोहित को लेने घर आए, तो  हम से इनकार करते नहीं बना. बेटी, तू गुस्सा थूक कर यहीं आ जा. इस से अच्छा मौका फिर तुझे जल्दी…’’

‘‘मां, मैं तुम सब की चालाकी समझ रही हूं,’’ शिवानी की आंखों में बेबसी के आंसू छलक आए,’’ मैं वहां नहीं आऊंगी. बस, मेरी एक बात ध्यान से सुन लो. अगर तुम रोहित को वहां छोड़ कर आई, तो मैं जिंदगीभर तुम लोगों से कोई संबंध नहीं रखूंगी.’’

अपनी मां को आगे कुछ कहने का मौका दिए बगैर शिवानी ने टैलीफोन काट दिया. फिर अपनी सीट से उठ कर बाथरूम में गई और वहां उस की आंखों से खूब आंसू बहे.

शिवानी औफिस में पूरा समय नहीं रुकी. उस ने अपना मोबाइल भी औफ कर दिया. एक रेस्तरां में कई व्यक्तियों के बीच में उस ने लंबा समय सोचविचार करने में गुजारा.

अपने मायके वालों की हरकत से वह बेहद खफा थी. गुस्सा उसे राकेश पर भी था. अपने बेटे के साथ आज की शाम न गुजार पाने का उसे सख्त अफसोस हो रहा था.

‘किसी को मेरी, मेरी भावनाओं की फिक्र नहीं है. मैं भी सब को दिखा दूंगी कि अपनी खुशियों के लिए मैं किसी पर निर्भर नहीं हूं,’ ऐसी सोचों के प्रभाव में आ कर शिवानी ने अपने मायके को छोड़ कर अलग रहने का निर्णय लेने के बाद ही कुछ शांति महसूस करी थी.

शिवानी ने अपने मनोभावों को सहेली अंजलि के साथ बांटते हुए मजबूत स्वर में कहा, ‘‘अंजलि, मैं शिक्षित और आत्मनिर्भर होने के कारण अन्याय के विरोध में अकेली खड़ी हो सकती हूं. राकेश इतना बदल गया है कि मैं उस के साथ पूरा समझौता कर के भी नहीं निभा पा रही थी. मेरे लिए सब से महत्त्वपूर्ण है मोहित का उचित पालनपोषण करना और वह मैं करूंगी सिर्फ अपने बलबूते पर.’’

शिवानी अकेले मोहित के साथ रहने का पक्का फैसला कर चुकी थी. कोई भी उसे समझने की कोशिश करता, तो वह उस से बहस में उलझ जाती या नाराजगीभरी खामोशी धारण कर लेती.

फ्लैट में रहना आरंभ करने के कुछ दिन बाद राकेश ने उस से फोन पर बात करी, ‘‘तुम ने अकेले रहने का फैसला किसलिए किया है. शिवानी? क्या तुम मेरे पास लौटने में दिलचस्पी नहीं रखती हो?’’ राकेश की आवाज में गुस्से और शिकायत के मिलेजुले भाव थे.

‘‘राकेश, यह फ्लैट हम दोनों का है, तुम जब चाहे यहां हमारे साथ आ कर रहना शुरू कर दो,’’ अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए शिवानी ने गंभीर लहजे में जवाब दिया.

‘‘मेरी यह गलतफहमी टूट चुकी है कि हर चीज के हम दोनों बराबर के भागीदार हैं. फ्लैट और कार तुम्हारी है क्योंकि उन की किस्त तुम भरती हो. अब तो फ्रिज और टैलीविजन, सोफा और गैस जैसी चीजें भी तुम ने अपनी खरीद ली हैं. मेरा तुम पर या तुम्हारी चीजों पर कोई अधिकार नहीं रहा, यह मुझे अच्छी तरह से समझ आ गया है,’’ राकेश का स्वर कड़वाहट व व्यंग्य से भर उठा.

‘‘राकेश, हम अधिकार के बजाय भागीदारी के नजरिए से जिंदगी के बारे में सोचें, तो क्या वह बेहतर नहीं होगा?’’

‘‘भागीदारी के नाम पर तुम मुझे जो दबाना और शर्मिंदा करना चाहती हो, वह कभी नहीं होगा शिवानी.’’

‘‘राकेश, तुम समझदारी के बजाय अहंकार और गुस्से से काम…’’

‘‘मुझे तुम्हारा लैक्चर नहीं सुनना है,’’ राकेश ने गुस्से से फटते हुए उसे टोका, ‘‘तुम्हारी जैसी बददिमाग औरत के पास में कभी नहीं लौटूंगा. तुम अब जिंदगीभर अकेली रहने का मजा लो,’’ यह धमकी दे कर राकेश ने संबंधविच्छेद कर दिया.

राकेश का कठोर व्यवहार उस रात शिवानी को रुला नहीं पाया. उलटे उस का अकेले रह कर मोहित और अपने जीवन की भावी खुशियां सुनिश्चित करने का संकल्प और ज्यादा मजबूत हो गया.

आगामी हफ्तों में शिवानी ने कई समस्याओं का सामना किया, पर सहायता के लिए उस ने अपने मायके व ससुराल वालों की तरफ नहीं देखा.

मोहित क्रैच में जाने लगा. सुबह मेड आ कर

शिवानी का काम में हाथ बंटाती, पर रात का सारा काम वह खुद करती. बहुत थक कर कभीकभी काफी परेशान हो जाती, पर न उस ने औफिस के काम पर विपरीत प्रभाव पड़ने दिया और न ही अपना मनोबल टूटने दिया.

शिवानी की मां को छोड़ कर कोई उस से मिलने नहीं आता था. बाकी सब शायद उस के टूट कर पुरानी परिस्थितियों में लौटने का इंतजार कर रहे हैं, ऐसी सोच शिवानी को हर परेशानी का सामना करने की ज्यादा हिम्मत प्रदान करती.

शिवानी और राकेश की करीब 5 महीने बाद पहली मुलाकात मोहित की स्कूल की प्रिंसिपल अनिता के औफिस में हुई. उन्होंने दोनों को एकसाथ अपने पास संदेशा दे कर बुलवाया था.

शिवानी ने जब अनिता के कक्ष में प्रवेश किया तब राकेश वहां पहले से उपस्थित था.

वार्त्तालाप के आरंभ में अनिता ने उन्हें जो स्कूल में मोहित के व्यवहार के बारे में बताया वह दोनों को चौंका गया.

अपरिचित -भाग-3: जब छोटी सी गलतफहमी ने तबाह किया अर्चना का जीवन

नीले मोती से अक्षरों में लिखा था, ‘अर्चना, मैं आप को पंसद करता हूं, बहुत… बहुत… बहुत… इतना जितना कभी किसी ने किसी को नहीं किया होगा. आप के साथ जिंदगी बिताना चाहता हूं मैं, इसलिए सिर्फ प्रेमनिवेदन नहीं कर रहा हूं, ब्याह का प्रस्ताव भी रख रहा हूं. न जाने फिर कब मिलना हो, इसलिए जवाब अभी ही दे दें प्लीज. ‘हां’ या ‘ना’ जो भी होगा मैं कबूल कर लूंगा.

‘…अखिल आनंद.’

खत पढ़ कर कंपकंपी छूट गई अर्चना की… जैसे जाड़ा लग कर ताप चढ़ रहा हो और न जाने किस भावना के अधीन हो कर उस ने खत के पीछे ही 2 पंक्तियां लिख डाली थीं, कांपते हाथों से… ‘हमारे घरों में ब्याहशादी के फैसले मातापिता करते हैं. पिता मेरे हैं नहीं, इसलिए जो बात करनी हो मेरी मां से करें.

‘…अर्चना.’

अर्चना ने नजरें झुका कर उसे पत्र लौटाया था, जिसे पढ़ कर भावावेश में अखिल ने उस का हाथ थाम लिया था, ‘आप की तो ‘हां’ होगी न?’

और लज्जाते हुए अर्चना ने ‘हां’ में गरदन हिला दी थी और उसी पल उस के दिल में बस गया था वह.

परीक्षा की तैयारी करतेकरते किताबकापियों में भी जैसे अखिल का चेहरा नजर आने लगा था अर्चना को. उस का वह स्पर्श याद आते ही तनमन सिहर उठता था उस का. पढ़ने में दिल नहीं लग रहा था, जबकि परीक्षा में कुछ ही दिन बाकी थे. पढ़ना जरूरी है, यह भी जानती थी वह, पर क्या करती मन के हाथों मजबूर हो चुकी थी. दिल हसरतों के मोती चुनने लगा था और आंखें सौसौ ख्वाब बुनने लगी थीं, लेकिन तब कहां जानती थी अर्चना कि उस की जिंदगी में प्यार की यह चांदनी सिर्फ चार दिन के लिए ही छाई थी… हां, सिर्फ चार दिन के लिए ही.

5वें दिन मां ताऊजी के घर गई हुई थीं और अर्चना अपने कमरे में बैठी अर्थशास्त्र के एक चैप्टर से सिर खपा रही थी कि मां आ गई धड़धड़ाती हुईं. उन्होंने भीतर से दरवाजा बंद कर लिया और धीमे मगर चुभते स्वर में बोलीं, ‘ये अखिल आनंद के साथ क्या चक्कर है तेरा?’

‘कौन अखिल आनंद? कैसा चक्कर?’ उस ने नाटक किया.

‘बन मत और साफसाफ बता. क्या बात है? पता है कल शाम उस का बाप तेरे ताऊजी की दुकान पर आया था और कह रहा था कि ‘आप की भतीजी मेरे बेटे को फांस रही है. संभाल लें उसे.’ मैं तो जैसे शर्म से मर गई. बड़ा नाज था मुझे तुझ पर,’ मां रोने लगीं तो उस के भी आंसू निकल पड़े कि यह कैसा मजाक किया उस के साथ अखिल ने. रोतेरोते उस ने पूरा किस्सा मां के सामने बयां कर दिया तो मां ने उसे बांहों में भर लिया.

‘देख बच्चे, वे पैसे वाले लोग हैं. उन का हमारा कोई जोड़ नहीं, बस तू इतना समझ ले. तू मेरी बड़ी सयानी बच्ची है. तुझे ज्यादा समझाने की जरूरत नहीं. तू पढ़ाई में दिल लगा बस.’ कैसे लगता दिल पढ़ाई में? दिल टूटा था… चोट लगी थी… दर्द भी होता था और टीसें भी उठती थीं कि अभीअभी तो जन्म लिया था उस के प्यार ने और अभी ही उस की मौत भी हो गई.

परीक्षाओं के दौरान ही जैसे आसमान से उतर कर उस के लिए एक रिश्ता आया, परीक्षाएं खत्म होने के फौरन बाद सगाई हो गई और एक महीने बाद ब्याह भी. मां ने उसे सख्त हिदायत दी थी, ‘बेटा, भूल कर भी रजत को कुछ न बताना. बात तो है भी नहीं कुछ, पर मर्द का क्या भरोसा, किस बात को किस तरह से ले ले.’

उस ने मां की हिदायत को हमेशा याद रखा था. रजत एक अच्छा पति साबित हुआ. उस ने उसे प्यार भी दिया और सुखसुविधाएं भी, फिर राहुलरिया की मां बन कर तो वह निहाल हो उठी थी. आहिस्ताआहिस्ता वह प्रेमप्रसंग गुजरे जमाने की असफल और कमजोर लघुकथा बन गया. उस की यादों के अक्स भी दिल के दर्पण से धुंधलाने लगे और अब वह इतने बरसों बाद फिर अचानक सामने आ कर खड़ा हो गया.

‘‘अर्चना,’’ अखिल खड़ा था सामने कोक के 2 टिन और ढेरों पैकेट्स हाथों में थामे.

‘‘अखिल,’’ उस के हाथ से कोक का टिन लेते हुए अर्चना ने वह सवाल पूछा जो अब भी उस के मन में गीली लकड़ी सा सुलग रहा था, ‘‘आप ने इतना बड़ा मजाक क्यों किया था मेरे साथ?’’

‘‘कैसा मजाक अर्चना?’’

‘‘बनिए मत, पहले तो मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखा, फिर अपने पापा को भेज दिया मेरे ताऊजी के पास कहने को कि आप की बेटी मेरे बेटे को फांस रही है, क्यों?’’

‘‘यह आप क्या कह रही हैं अर्चना? मेरे पापा ने ऐसा कुछ नहीं कहा था. मैं उन के साथ ही तो था. पापा ने तो हाथ जोड़ कर आप का रिश्ता मांगा था. आप के ताऊजी ने कहा था, ‘‘अर्चना को टीबी है, पता नहीं ठीक भी होगी या नहीं.’’

अर्चना के हाथ से ‘कोक’ का टिन छूट गया. जल बिन मछली सी तड़प उठी वह, ‘‘ऐसा कहा था ताऊजी ने? मेरे अपने ताऊजी ने, जिन्हें मैं पापा की तरह मानती थी.’’

‘‘आगे तो सुनिए. वह 2 दिन बाद हमारे घर आए, अपनी बेटी का रिश्ता ले कर, पर पापा ने इनकार कर दिया.’’

‘‘ये थे मेरे अपने? हाय, मैं 12 साल तक धोखे में रही, पर आप ने कैसे यकीन कर लिया उन की बातों पर? यही थी आप की चाहत? अच्छा, एक बात बताइए अखिल, टीबी तो दूर की बात है,  आप ने किसी भी बीमारी की छाया तक देखी थी मेरे चेहरे पर? आप मुझ से मिलते. खुल कर बात करते, लेकिन नहीं… आप ने तो मुझ से मिलने की कोशिश तक नहीं की अखिल. सब ने छल किया मेरे साथ,’’ बोलतेबोलते हांफने लगी थी अर्चना.

‘‘की थी कोशिश… बहुत कोशिश की थी मैं ने आप से मिलने की, पर आप की मां ने कभी आप से मिलने ही नहीं दिया, फिर सोचा वक्त सब ठीक कर देगा, पर फिर सुना कि परीक्षाओं के बाद ही आप का ब्याह हो गया. मैं तब भी आप के ताऊजी के पास गया था, ‘आप तो कह रहे थे, अर्चना को टीबी है, बचेगी नहीं,’ तो उन्होंने रूखे स्वर में कहा था, ‘वह ठीक हो गई. आप पूछ कर देखिएगा उन से.’

‘‘किस से पूछूं? न अब मां हैं और न ही ताऊजी,’’ वह कैसे और क्यों बताती अखिल को कि जो बीमारी उन्होंने उस पर आरोपित की थी, उसी से मिलतीजुलती बीमारी से 2 साल एडि़यां रगड़रगड़ कर मरे वह, और अपनी जिस बेटी के लिए उन्होंने अर्चना का पत्ता काटा था, उस की कैसी दुर्गति हुई ससुराल में.

सच है, यह धरती कर्मों की खेती है. ‘न जाने उस साजिश में कौनकौन शामिल था,’ एक उसांस ले कर सोचा अर्चना ने.

कुछ देर वहां खामोशी पसरी रही, फिर एकाएक अखिल ने जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकाला और उस के हाथ में थमाते हुए कहा, ‘‘आप लौटते हुए चंडीगढ़ आइएगा, रजत और बच्चों के साथ हमारे घर. मुझे बहुत अच्छा लगेगा.’’

अर्चना ने देखा कि उस की आंखों में वही सितारे झिलमिला रहे थे जो बरसों पहले ‘प्रणय निवेदन’ करते वक्त झिलमिलाए थे. एक हूक सी उठी अर्चना के कलेजे में.

वह कुछ देर तक मुग्ध निगाहों से निहारता रहा अर्चना को, फिर अचानक उठ कर खड़ा हो गया, ‘‘मैं चलता हूं अर्चना, मुझे आज ही वापस जाना है. आज की इस मुलाकात को मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा… कभी नहीं,’’ भीगे स्वर में कह कर वह चल दिया, फिर चार कदम चल कर उस ने मुड़ कर देखा. न जाने क्या कहा उस की खामोश निगाहों ने कि अर्चना की आंखें छलक आईं. उन आंसुओं को बहने दिया उस ने, फिर आहिस्ता से नरमी से उस विजिटिंग कार्ड को सहलाया और पर्स में रख लिया सहेज कर एक मधुर एहसास की तरह. वह देखती रही… देखती रही, जुदा हो कर जाते अपने उस परिचित से अपरिचित को तब तक जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गया.

आखिरी बिछोह: अनुज और नित्या के बीच क्या था रिश्ता?

Aazam flim review: प्यादे के शहंशाह बनने की रोमांचक कहानी

रेटिंगः दो स्टार

निर्माताः टी बी पटेल, बीएमएक्स मोषन पिक्चर्स

लेखक व निर्देषकः श्रवण तिवारी

कलाकारः जिम्मी शेरगिल, अभिमन्यू सिंह,इंद्रनील सेन गुप्ता, रजा मुराद,गोविंद नाम देव, सयाजीष्दे, मुष्ताक खान, संजीव त्यागी,अली खान,अभिजीत सिन्हा,विवेक घमंडे, आलोक पांडे व अन्य.

अवधिः दो घंटे आठ मिनट

अंडरवर्ल्ड और अंडरवर्ल्ड से जुड़ी कहानियां हमेशा से बॉलीवुड के फिल्मकारों को अपनी तरफ आकर्षित करती रही हैं.अब अंडरवर्ल्ड में प्यादे के शहंशाह बनने की रोमांचक कहानी ‘आजम’ लेकर फिल्मकार श्रवण तिवारी आए हैं,जो कि 26 मई से सिनेमाघरों में दिखायी जा रही है..फिल्मकार ने अपनी इस फिल्म के माध्यम से इस बात को रेखांकित किया है कि अंडरवर्ल्ड डॉन तब तक रहता है,जब तक उस पर सरकार और पुलिस विभाग का वरदहस्त रहता है.

कहानीः

फिल्म ‘‘आजम’’ कीक हानी के केंद्र में अंडरवर्ल्ड डॉन की कुर्सी

हथियाने की मंशा रखने वाले जावेद (जिम्मी शेरगिल) के इदगिर्द घूमती है.वह अपने दोस्त कादर (अभिमन्यु सिंह) और मुंबई के माफिया डॉन नवाब (रजा मुराद) के लिए काम करता है.नबाब मरणासन्न है और नबाब अपने बेटे कादर को अपनी गद्दी सौंपना चाहते हैं.जबकि जावेद खुद उस गद्दी पर बैठना चाहता है. हालांकि वह अकेला नहीं है जो -रु39याहर का सबसे बड़ा डॉन बनने की को-िरु39या-रु39या कर रहा है.इसलिए साइबर क्राइम  माहिर विशाल ( आलोक पांडे ) की मदद से जावेद हर किसी को अपने रास्ते से हटाने का निर्णय लेता है.एक ही रात में लगातार हत्याओं का दौर चलता है.पुलिस अपने स्तर पर काम कर रही है.तो वहीं गृहमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक अपने आदमी को नबाब की कुर्सी पर बैठाना चाहते हैं.कादर,जावेद की मंषा व योजनाओं को समझे बगैर जावेद की बनायी गयी रणनीति के अनुसार प्रताप शेट्टी (गोविंद नामदेव) के बेटे अन्या ( विवेक घमंडे ) की हत्या कर देता है.उसके बाद एक के बाद एक हत्याओें का दौर चलता है.जावेद खुद प्रताप के सामने ही कादर को गाली मार देता है.प्रताप को नबाब मरवा देता है.अंततः नबाब की कुर्सी पर बैठने का सपना देख रहे सारे गैंगस्टर मारे जाते हैं.तब मुख्यमंत्री देषमुख, जावेद को नबाब की कुर्सी का हकदार स्वीकार कर लेते हैं. अंडरवर्ल्ड डॉन की कुर्सी पर बैठने से पहले खुद जावेद,नबाब को गोली मार देता है.

लेखन व निर्देशनः

कुछ समाचार पत्रों में मार्केटिंग हेड के रूप में काम करते हुए फिल्मकार बन जाने वाले श्रवण तिवारी ने सबसे पहले गुजराती भाुनवजयाा में ‘‘द एडवोकेट’’ बनायी थी. उसके बाद उन्होने ‘706’ और ‘कमाठीपुरा’ जैसी फिल्में बनायीं. अब ‘‘आजम’’ लेकर आए हैं. कहानी के स्तर पर वह एक बेहतरीन कहानी लेकर आए हैं. मगर कथा कथन की उनकी शैली के चलते फिल्म में बार बार अवरोध आते हैं.बार-बार जावेद यानी कि जिम्मी शेरगिल के अतीत की कहानियों के चलते कहानी ठहर सी जाती है.फिल्म के षुरू होने के 20 मिनट के अंदर ही जिम्मी षेरगिल की मंशा साफ हो जाने से रहस्य व रोमांच में कमी आ जाती है.एक तरह से फिल्म पर से उनकी पकड़ -सजयीली हो जाती है.नबाब के बेटे कादर को जिस तरह से मूर्ख दिखाया गया है,वह गले नहीं उतरता.इसी तरह लगभग हर किरदार को मारने को लेकर एक कहानी है.इतने सारे किरदार हैं कि दर्षक भ्रमित हो जाता है.मगर पटकथा जबरदस्त है.फिल्म का क्लायमेक्स भी प्रभावित करता है.अंडरवर्ल्ड,सियासत और पुलिस के संबंधो को वह ठीक से परदे पर उकेरने में असफल रहे हैं.फिल्म का पार्ष्व संगीत कानफोडू है.एडीटिंग भी गड़बड़ है.फिल्म की गति भी काफी धीमी है.

अभिनयः

जिम्मी शेरगिल एक बेहतरीन अभिनेता हैं,इस बात को वह कई बार साबित कर चुके हैं.पिछले कुछ समय से वह पुलिस अफसर के किरदार में ज्यादा नजर आ रहे थे,पर लंबे समय बाद वह एकदम अलग तरह के गेंगस्टर के किरदार में नजर आए है और अपनी अभिनय प्रतिभा से वह लोगों दिलों मे पहुॅच जाते हैं.उनका अंदाज धारदार है. वह कम बोलते हैं,मगर उनकी आंखें और चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है.कादर के किरदार मे अभिमन्यू सिंह निराष करते हैं.रजा मुराद अपनी छाप छोड़ जाते हैं. डीसीपी जोशी के किरदार में इंद्रनील सेनगुप्ता का अभिनय भी अच्छा है. सयाजीशेंद ठीक ठाक हैं.प्रताप शेट्टी के किरदार में गोविंद नामदेव का अभिनय लाजवाब है.मगर अनंग देसाई व मुष्ताक खान सहित कई प्रतिभाषाली कलाकारों की प्रतिभा को जाया किया गया है.

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