हैप्पी फैमिली: भाग 2- श्वेता अपनी मां की दूसरी शादी के लिए क्यों तैयार नहीं थी?

अमृता को अजीब लगा मगर स्वामीजी ने तुरंत कुमार की ओर मुखातिब होते हुए कहा, ‘‘कैसे हो भक्त कुमार?’’

‘‘स्वामीजी मैं अच्छा हूं. बस आप से अपनी पत्नी अमृता को मिलाने लाया था.’’

‘‘आओ देवी अमृता मेरे करीब आ कर बैठो.’’

अमृता स्वामीजी के करीब चली गई. स्वामी ने उस का हाथ देखने के लिए कलाई पकड़ी और अपनी तरफ खींच लिया. अमृता को यह अच्छा नहीं लगा.

स्वामी ने जिस तरह उस का हाथ पकड़ रखा था और जिन आंखों से अमृता

को देख रहा था वह उस के लिए सहज नहीं था.

‘‘अद्भुत भक्त कुमार, आप की बीवी जितनी दिखने में खूबसूरत हैं उतनी ही खूबसूरत इन की किस्मत भी है. इन की वजह से आप जिंदगी में बहुत तरक्की करेंगे… कुछ लोगों के चेहरे पर ही लिखा होता है कि बस ये जिन के साथ होंगे उन की जिंदगी में सबकुछ वारेन्यारे ही होगा.’’

जिस अंदाज में और जिस तरह से स्वामी अमृता की तरफ देखते हुए ये सब बातें कह रहा था वे सब बातें अमृता को अच्छी नहीं लग रही थीं. उसे स्वामी के अंदर एक घिनौना जानवर दिख रहा था. जल्दी से हाथ छुड़ा कर वह खड़ी हो गई.

कुमार ने उसे घूर कर देखा और फिर से बैठने को कहा. इस बार स्वामी ने उसे चेहरे को ऊपर की तरफ करने को कहा. फिर खुद उस के गले में पीछे की तरफ हाथ रखा. अमृता को अजीब लिजलिजा सा एहसास हुआ.

स्वामी ने उस की गरदन की निचली हड्डी पर हाथ फिराते हुए कहा, ‘‘उम्र के 6ठे दशक में देवी अमृता के जीवन में राजयोग है. भक्त कुमार आप की बीवी आप को हर सुख देगी… धन्य है यह देवी, ‘‘कह कर स्वामी ने हाथ हटाया और आंखें बंद कर कोई मंत्र पढ़ने का दिखावा करने लगा.

कुमार इसी तरह जिद कर के अमृता को

3-4 बार स्वामी के पास ले गया. हर बार स्वामी की नजरें और बातें अमृता को आमंत्रण देती प्रतीत होतीं. एक बार तो सिद्धि के नाम पर अमृता को कमरे में बुला कर स्वामी ने उस के साथ छेड़छाड़ भी की. अमृता के लिए अब यह सब सहना कठिन होता जा रहा था और वह स्वामी से नफरत करने लगी थी.

मगर कुमार पर उस स्वामी का ज्यादा ही रंग चढ़ने लगा था. वह स्वामी का पक्का शिष्य बन गया था. हर महीने हजारों रुपए उसे भेंट चढ़ा कर आता, हर काम से पहले उस की आज्ञा लेता और अमृता से भी यही अपेक्षा रखता. अमृता और कुमार के बीच स्वामी को ले कर अकसर  झगड़ा होने लगा. फिर एक दिन जब अमृता के सब्र का बांध टूट गया तो वह सबकुछ छोड़ कर अपनी बेटी को ले कर मायके आ गई. जल्द ही आपसी सहमति से उन के बीच तलाक भी हो गया.

इस बात को 4 साल से ज्यादा हो गए थे. वह इतने समय से तनहा जीवन जी रही थी.

बेटी की खुशियों में अपनी खुशियां ढूंढ़ती बेटी की जिम्मेदारियों को दिल से निभाती मगर पहली बार प्रवीण से मिल कर उस ने अपने बारे में सोचना चाहा था. प्रवीण के साथ खुद को संपूर्ण महसूस किया था. उस ने भी जीवन में कुछ नए सपने देखने शुरू किए थे, मगर बेटी ने एक पल में उस के सपनों के पंख काट डाले.

बेटी के व्यवहार से अमृता आहत जरूर थी पर उसे तकलीफ दे कर अपनी खुशियां हासिल नहीं करना चाहती थी. बेटी के माथे को सहलाते हुए उस ने मन में सोचा, ‘‘ठीक है मेरी बच्ची तेरे लिए मैं कुछ भी कर सकती हूं. तु झे प्रवीण पापा की तरह पसंद नहीं तो न सही. हम दोनों ही अपनी जिंदगी में खुश रहेंगे.’’

इधर प्रज्ञा का पिता प्रवीण भी अपनी बेटी के रिएक्शन से बहुत दुखी था. प्रवीण का भी अपनी पत्नी सपना से तलाक हो गया था. प्रवीण और सपना की अरेंज्ड मैरिज हुई थी. शादी की शुरुआत में तो सब ठीक था पर फिर धीरेधीरे दोनों के बीच अनबन बढ़ती गई. सपना कभी प्रवीण को दिल से स्वीकार नहीं कर सकी थी. इसी बीच अपने औफिस के सीनियर श्रीकांत से उस का रिश्ता जुड़ गया और उस ने तलाक ले कर श्रीकांत से शादी कर ली.

प्रवीण ने अपनी बेटी प्रज्ञा के साथ जिंदगी को नए ढंग से जीना शुरू किया. वह प्रज्ञा को ही अपनी जिंदगी की सब से बड़ी पूंजी मानता था. मगर आज जिस तरह प्रज्ञा ने अमृता के बारे में जान कर रूखा रिएक्शन दिया वह प्रवीण को बहुत बुरा लगा. वह इस बारे में किसी से बात भी नहीं कर सकता था. प्रज्ञा अपनी मां सपना के बहुत क्लोज थी. भले ही वह रहती पिता के साथ थी पर हर बात मां से फोन या व्हाट्सऐप के जरीए शेयर जरूर करती थी. आज भी घर आते ही उस ने मां को व्हाट्सऐप कौल लगाई. उस के चेहरे पर गुस्सा और आंखों में आंसू साफ दिख रहे थे.

सपना ने तुरंत पूछा, ‘‘क्या बात है पीहू नाराज दिख रही हो?’’

‘‘आप को सचाई पता चलेगी तो आप को भी पापा पर गुस्सा आएगा.’’

‘‘ऐसा क्या हो गया बेटे?’’

‘‘पापा दूसरी शादी कर रहे हैं. वे मेरे लिए नई मम्मी ले कर आएंगे. अब आप ही बताओ मां क्या यह गुस्से की बात नहीं? उन्हें मेरी जरा भी चिंता नहीं. सब जानते हैं नई मांएं कैसी होती हैं और फिर जरूरत ही क्या है दूसरी शादी करने की? मैं तो हूं ही न उन के साथ?’’

‘‘नहीं बेटा ऐसा नहीं कहते. जरूरी नहीं कि हर नई मां बुरी ही हो. मैं तो तेरी अपनी मां थी फिर भी तेरे साथ नहीं रह पाई. हो सकता है नई मां तु झे मेरे से भी ज्यादा प्यार दे. वैसे भी मेरी बच्ची सम झदार हो चुकी है. कोई भी समस्या आए तो मु झे बता सकती है पर देख पहले से यह सोच कर मत बैठ कि वह बुरी ही होगी.’’

‘‘पर मम्मा आप ऐसा कह रही हो? मु झे लगता था आप मु झे प्यार करती हो पर नहीं न आप न पापा कोई मु झे प्यार नहीं करता, आप भी प्यार करते तो मुझ से दूर थोड़े ही जाते.’’

प्रज्ञा ने उदास स्वर में कहा, ‘‘बेटा ऐसी बातें सोचना भी मत. मैं तु झे बहुत प्यार करती

हूं और तेरे बेहतर भविष्य के लिए ही मैं तु झे वहां छोड़ कर आई थी. तेरे पापा तु झे मुझ से भी ज्यादा प्यार करते हैं. बेटा आज मैं बताती हूं कि मु झे तेरे पापा को तलाक क्यों देना पड़ा था, मैं तुझ से दूर क्यों आई थी?’’

‘‘मम्मा मैं जानना चाहती हूं मैं ने पहले जब भी पूछा आप टाल जाते थे. मैं जानना चाहती हूं कि आप अलग क्यों हुए. आप हमें छोड़ कर क्यों चले गए. जरूर पापा ने आप को परेशान किया होगा न.’’

‘‘बेटा ऐसा बिलकुल नहीं है. तेरे पापा की कोई गलती नहीं, फिर भी मु झे यह फैसला लेना पड़ा. दरअसल, मैं श्रीकांत नाम के एक लड़के

से प्यार करती थी और यह प्यार कालेज के

समय से शुरू हुआ था. उस वक्त परिस्थितियां ऐसी बनीं कि हम अलग हो गए और मेरी शादी तेरे पापा से हुई. बेटा तेरे पापा ने मु झे कभी तकलीफ नहीं दी. उन्होंने मु झे बहुत प्यार दिया पर अनजाने में मैं ने ही उन्हें तकलीफ दी. मैं उन्हें कभी दिल से अपना नहीं सकी क्योंकि मेरे दिल में हमेशा से श्रीकांत थे. तेरे पापा के साथ हो कर भी मैं उन के साथ नहीं थी. मैं इस तरह उन्हें अधूरा जीते हुए नहीं देखना चाहती थी पर अपने दिल के आगे विवश थी.

फिट रहने के लिए क्या मंत्र है एक्ट्रेस सुस्मिता मुखर्जी का, जानिए यहां

छोटे-बड़े पर्दे पर पिछले 40 सालों से अभिनय करने वाली अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी से कोई अपरिचित नहीं. सुष्मिता ना सिर्फ एक अभिनेत्री है, बल्कि डायरेक्टर और लेखक भी हैं.उन्होंने हर तरह की भूमिका की है, फिर चाहे वह निगेटिव हो या पोजिटिव, हर भूमिका को जीवंत किया है. उनको छोटे परदे पर प्रसिद्धि क्राइम शो करमचंद से मिली, जिसमे उन्होंने किट्टी की भूमिका निभाई थी. काम के दौरान उन्होंने पहले निर्देशक सुधीर मिश्रासे शादी की, लेकिन वह टिक नहीं पाई, डिवोर्स लेने के बाद उन्होंने एक्टर, प्रोडूसर, एक्टिविस्ट राजा बुंदेला से शादी की और दो बेटों की माँ बनी.

भाषा को लेकर लिए संघर्ष

कैरियर के दौरानसुस्मिता नेबहुत संघर्ष किये है. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि उनके शुरुआत दिन काफी संघर्षपूर्ण थे, क्योंकि जब वह नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से आई थी,तब उन्हें हिंदी नहीं आती थी.रत्ना पाठक शाह, दीपा शाही आदि ने उनकी खराब हिंदी का बहुत मजाक उड़ाया था, उसके बाद उन्होंने एक मास्टर से अच्छी हिंदी और उर्दू सीखी. दरअसल उन्हें हिंदी इसलिए भी नहीं आती थी, क्योंकि उनके घर पर  बंगला बोली जाती थी और बाहर वह अंग्रेजी बोलती थी.तब उन्हें हिंदी समझ में ही नहीं आती थी, लेकिन एनएसडी में आ कर हिंदी सीखी और अब वह बहुत ही अच्छे से हिंदी बोल लेती है.

सुस्मिता मुखर्जी ने नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से अभिनय की शिक्षा ली है. स्टार भारत पर उनकी शो ‘मेरी सास भूत है’ में उन्होंने एक अलग और मजेदार भूमिका निभाई है, जिसे सभी पसंद कर रहे है. उन्होंने गृहशोभा के लिए खास बात कीऔर गृहशोभा मैगज़ीन को डिजिटल वर्ल्ड में भी अपनी छवि बनाये रखने के लिए पूरी टीम को बधाई दी. आइये जानें उनकी कहानी उनकी जुबानी.

किये सास की भूमिका

शो के बारे में बात करते हुऐ सुष्मिता कहती हैं कि मैंने हर तरह के सास की भूमिका निभाई है, ये उन सबसे अलग है. ये एक मजेदार शो है. इस शो का बेस अपर्णा सेन की मशहूर बांग्ला फिल्म ‘गोयनार बाक्शो’ से प्रेरित है. फिल्म गोयनार बक्शो में मौसमी चटर्जी का जो किरदार है उसी का बेस बना कर मैंने इस शो में भूमिका की है. शो बड़ा इंटरेस्टिंग है, क्योंकि इसमें सास भूत बन जाती है, तो उसके जो रिश्ते होते हैं,जो उनके जिन्दा रहते ठीक नहीं थे, अब उनको ठीक करती है और परिवार में वर्चस्व की लड़ाई को दिखाया गया है. ये ड्रामा और कॉमेडी वाली शो है, जिसे दर्शक काफी पसंद कर रहे है.

कितने तरीके की सास की भूमिका आप कर चुकी है? पूछने पर वह कहती है कि मैंने 40 साल इंडस्ट्री में काम किया है, इसमें देश, समाज, जिंदगी बदली है और सास भी बदल चुकी है. सास की भूमिका कोई भी हो ये एक परफोर्मेंस है, जिसमे स्क्रिप्ट और संवाद लिखे जाते है, फिर जाकर अभिनय किया जाता है. बहुत मुश्किल नहीं होता है. इस शो में कहानी बनारस की है, जबकि मैं बंगाल की अंग्रेजी माध्यम में पढ़ी-लिखी महिला हूँ, इसलिए बातचीत के टच को थोडा बदला गया है. इसमें सास की सास ने उनके साथ बदसलूकी की है, इसलिए वह भी अपनी बहू के साथ ऐसा करती है, पर धीरे-धीरे वह बदल कर अच्छी सास भी बन जाती है.

बदले खुद को

इसके आगे सुस्मिता कहती है कि असल जिंदगी में बड़े शहरों मेंसास की भूमिका पहले से बहुत बदल चुकी है. लोग आज सास और बहूँ में अंतर नहीं कर पाते, क्योंकि आज की सास बहु को अपना बेटी मानती है, लेकिन कुछ छोटे शहरों के पारंपरिक परिवारों में अभी भी बाउंड्री है, सबके सामने बहु को घूँघट डालना या साड़ी पहनना पड़ता है. ये सब कुछ खास परिवारों में अभी भी है. वे पुराने ट्रेडिशन को जबरदस्ती पकडे रहते है. धीरे-धीरे इसमें बदलाव आ रहा है. आज मेरी मेड की लड़की ब्यूटिशियन है, उसके पहनावे और मेकअप को देखकर कोई ये कह नहीं सकता कि उसकी माँ मेड है. आज ऑनलाइन सब सामान सस्ते मिलते है, कोई भी खरीद सकता है, हर कोई आगे बढ़ना चाहता है, ऐसे में समाज और परिवार में बदलाव अवश्य होगा.

ख़ुशी से निभाएं रिश्ते

आज की अधिकतर लड़कियां शादी नहीं करना चाहती और करती भी है तो ससुराल पक्ष के साथ रहना नहीं चाहती, इस बारें में सुस्मिता की सोच है कि आज संयुक्त परिवार प्रथा ख़त्म हो चुकी है, सभी एकाकी परिवार में रहते है, ऐसे में बेटे की माँ की भूमिका बड़ी होती है, क्योंकि उन्हें बेटे को समझाना पड़ेगा कि उन्हें अपना काम खुद करना है, इसके लिए वह माँ, बहन की राह नहीं देखेगा. केवल बहन आपको चाय न पिलाएं, बल्कि भाई भी उसे चाय बनाकर पिलाएं. जेंडर के आधार पर बेटे की परवरिश माँ कभी न करें. इसकी सीख माँ को देनी है, क्योंकि सास-बहु के बीच में मनमुटाव हमेशा दिखाया जाता है, लेकिन मानसिक रूप से मजबूत, दयालू, और इंटेलिजेंट बेटा ही इसे आसानी से दूर कर सकता है. उसे अपनी पत्नी और माँ दोनों को सम्मान और प्यार के साथ व्यवहार करना है और माँ को भी अपने व्यवहार में बहू आने पर सुधार करने की आवशयकता है. इसकी नींव माँ को शुरू से रखनी है. मेरे दोनों बेटे 27 और 29 साल के है. प्रायोरिटी पेरेंट्स है, लेकिन उन्हें मैं जीवन को सवारने और अपनी गृहस्थी बसाने की सलाह देती हूँ. मुझे अभी बैक सीट पर बैठना पसंद है. आज जमाना बदला है. दुनिया डिजिटल हो चुकी है, ऐसे में किसी को रोकना या टोकना उचित नहीं. मेरा बड़ा बेटा रुद्रांश बुंदेला 29 वर्ष का राइटर, डायरेक्टर और एक्टर है,उसने छोटी-छोटी फिल्में बनाई है. छोटा बेटा न्यूजीलैंड में साइंटिस्ट है, उसका मेरे फील्ड से कोई लेना-देना नहीं है. मैंने काम के साथ-साथ बहुत मेहनत से बच्चों की परवरिश की है.

कोई काम छोटा नहीं

इंडस्ट्री में टिकने के लिए सुस्मिता के संघर्ष के बारें में पूछने पर वह कहती है कि मैं कभी हिरोइन बनने आई ही नहीं थी. मैं थिएटर करती थी और फिर मुंबई आ गई, क्योंकि काम चाहिए था. मेरा कभी कोई ऐसा संघर्ष नहीं रहा क्योंकि मैंने कभी अपनी जिंदगी और चीजों से समझौता नहीं किया. मैं एक बहुत ही आम परिवार से थी और कला दिल के करीब थी. मुझे मेरा घर चलाना होता था और घर चलाने के लिए जैसे काम मिलते थे, कर लिए, क्योंकि हमारे पास ऑप्शन नहीं था. कई बार ऐसा हुआ कि पैसों के लिए छोटे-छोटे अभिनय किए, लेकिन कभी समझौता नहीं किया. इंडस्ट्री में टिके रहने की वजह भी यही रही, क्योंकि मुझे अभिनय के अलावा कुछ भी करना नहीं था.

आज के बच्चे है होनहार

नए लोगों के साथ काम करने के अपने अनुभव पर सुष्मिता कहती हैं कि लोगों का ये कहना गलत है कि आज कल के बच्चे सिर्फ मोबाइल में रहते हैं.मेरे हिसाब से आज कल के बच्चे एकदम अपने काम पर फोकस्ड हैं और अपनी लाइन अच्छे से याद करके आते हैं, किरदार में रहते हैं, समय से आते हैं, कोई नखरे नहीं है ना ही कोई घमंड है. एक कलाकार को कला के लिए प्रेम होना चाहिए और आजकल के बच्चों में वो प्रेम नजर आता है. मैं हर दिन उनसे काफी कुछ सीखती हूँ.

सुस्मिता को हर भूमिका से लगाव और प्रेम है, वे किसी एक किरदार को सबसे अधिक अच्छा नहीं बता सकती. उनका कहना है कि हर भूमिका में रस होता है, हर भूमिका अलग होती है और हर किरदार को मैं शिद्दत से करती हूँ. अपने काम से अगर प्यार करते हैं, तो जिस दिन आप काम नहीं करते हैं, उस दिन खुद को बहुत कमजोर महसूस करते हैं. अमिताभ बच्चन ने 80 साल की उम्र में भी पूरी मेहनत से काम करते हैं, मैं तो उनसे काफी छोटी हूँ.

खुश रहना है मंत्र

वह आगे कहती है कि मेरी फिटनेस का राज है बाहर की परिस्थितियों से अधिक प्रभावित न होना, मसलन मैं ओल्ड हो चुकी हूँ, या अच्छी नहीं दिखती आदि के बारें में नहीं सोचती. अंदर से हमेशा खुश रहती हूँ.इसका मोटिवेशन करोड़ों की संख्या में हमें देखने वाले दर्शक ही होते है, जो हर दिन हमारे शो को प्यार से देखते है और उसकी आलोचना या प्रसंशा करते है.इसके अलावा कही भी जाने पर वे हमें आसानी से पहचान लेते है. इससे ख़ुशी मिलती है.

एक्टिंग, डायरेक्शन, और प्रोडक्शन में सबसे ज्यादा मेहनत सुस्मिता को प्रोड्यूसर बनने पर करनी पर पड़ती है, क्योंकि वह उनके खून में नहीं है. उनके हिसाब से कलाकार केवल काम देखते हैं, पैसा अधिक नहीं देखते, जबकि प्रोड्यूसर सबसे पहले पैसा देखता है. मैं एक प्रोड्यूसर के तौर पर फ्लॉप हो गई, क्योंकि मैं प्रोडक्शन कर नहीं पाई और बाद में बहुत सारा काम करके लोगों के पैसे लौटाने पड़े.वह कहती है कि उस जमाने में हमारी कंपनी का 1 करोड़ का नुकसान हुआ था, क्योंकि मुझे प्रोडक्शन की सही जानकारी नहीं थी. अब मैंने उस काम को छोड़ दिया है.

योजनायें आगे की

सुस्मिता कहती है कि अभी मैं 5 वीं किताब निकालने वाली हूँ. उसपर काम चल रहा है. इसके अलावा मैंने एक सोलो कहानी ‘नारी बाई’ लिखी है, उसकी परफोर्मेंस करती हूँ. तीन फिल्में आने वाली है, इसके अलावा मैं मध्यप्रदेश के ओरछा में एक एनजीओ चलाती हूँ. उस क्षेत्र की उन्नति के लिए मैं और मेरे पति काम करते है. मेरे पति ने हमेशा मुझे हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है. रात में कभी-कभी साथ में मिलकर खा लिया करते है. मेरे लाइफ में मैंने जितना माँगा सब मिला. मानसिक और शारीरिक सुख मेरे लिए बहुत जरुरी है.

महिलाओं के लिए सुस्मिता का मेसेज है कि वे खुद को किसी से कम न समझे और अपनी इच्छाओं को खुद पूरा करें, किसी को इसका जिम्मेदार न समझे.

Anupama: शाह हाउस में माया मचाएगी बवाल,अनुपमा-अनुज में बढ़ी नजदिकियां

टीवी सीरियल अनुपमा दर्शको के बीच काफी फेमस है. आए दिन शो में नए-नए ट्विस्ट होते रहते है. अनुपमा में बीते शनिवार के एपिसोड में दिखाया कि अनुज अपनी अनु से गुरूकुल में मिलता है वहां वह माया का सारा सच बता देता है. लेकिन अब अनुपमा के नए एपिसोड में अनुपमा-अनुज में बढ़ी नजदिकियां.

अनुपमा संग दोस्ती करेंगे अनुज

टीवी सीरियल अनुपमा में देखने को मिलेगा कि अनुपमा अकेले जाने लगती है, लेकिन अनुज उसके पीछे कार लेकर आ जाता है. वह उसे साथ में चलने के लिए कहता है, लेकिन अनुपमा मना कर देती है. इस पर अनुज उससे कहता है कि हमारे बीच रिश्ता न सही, प्यार तो है। हम पहले भी दोस्त थे, आज भी दोस्त बन सकते हैं. इसपर अनुपमा कहती है कि लोग प्यार में आगे बढ़ते हैं, लेकिन हमारा तो डिमोशन हो गया.

शाह हाउस में माया मचाएगी बवाल

अनुपमा में आगे देखने को मिलेगा कि अनुज के घर आने पर माया पहले कपाड़िया हाउस में ड्रामा करती है. इसके बाद वह शाह हाउस में चिल्लाती है तथा माया बा और वनराज से अनुज और अनुपमा के बारे में पूछती है. इस पर बा कहती है वे दोनों यहां पर नहीं है. इसके बाद भी माया रूकती नहीं है. वह चिल्ला-चिल्लाकर कहती है अनुपमा मेरे अनुज के पीछे पड़ी है. अनुपमा मेरे अनुज के आगे-पीछे घूमती है. वह मेरे अनुज को हासिल करना चाहती है.

आगे ‘अनुपमा’ में देखने को मिलेगा कि माया की बातें सुनकर वनराज माया पर भड़क जाता है. वह कहता है कि अनुपमा को तुम्हारे अनुज की जरा भी जरूरत नहीं है. तुम्हारा अनुज ही है जो उसके आगे-पीछे घूमता रहता है. अनुपमा अब अमेरिका जाने वाली है और उसे कोई फर्क नहीं पड़ता किसी से. तो तुम अपना मुंह बंद करो और यहां से चलती बनो.

बदरंग इश्क: भाग 3- क्यों वंशिका को धोखा दे रहा था सुजीत?

सुजीत घर में कम औफिस में ज्यादा रहने लगा था. महीने में 1-2 बार शहर से बाहर भी जाता रहता और फिर एक दिन उस ने ऐलान कर दिया, ‘‘वंशिका, मैं और स्वीटी लिव इन में रहना चाहते हैं. तुम इस घर में आराम से रहो. मैं स्वीटी के साथ जा कर रह लूंगा. उसे तलाक के एवज में उस के पति का एक फ्लैट मिल गया है.’’ मां तो सुन कर जैसे जड़ हो गई.

अपने रिश्तेदार से मो ने गुहार लगाई अपना घर बचाने की लेकिन हुआ कुछ नहीं. पापा भी गहरे सदमे में थे. खुद को गुनहगार मान रहे थे कि बेटी से पूछे बिना उस की शादी का फैसला लिया था. ‘‘सुजीत, मैं घर छोड़ कर जा रही हूं. अभि मेरे पास ही रहेगा,’’ वंशिका ने अपना फैसला सुना दिया. सुजीत ने फिर से दांव खेला, ‘‘अभि और घर दोनों में से किसी एक को चुन लो.

दोनों चाहिए तो अपना फैसला बदल लो. घर में ही रहो. मैं तुम्हें छोड़ नहीं रहा हूं बस स्वीटी के साथ रहने की अनुमति मांग रहा हूं.’’ वंशिका भीतर तक तिलमिला उठी थी लेकिन बोलने का कोई फायदा नहीं था.

अपना सामान पैक कर, अभि की उंगली पकड़े स्टेशन पर आ गई. जिंदगी का पहला फैसला उस ने खुद लिया था. यह पहला सफर था जिस पर अकेली निकली थी. अभि के सिवा अपना कोई नहीं था. उस के सिवा जीवन का कोई मकसद भी नहीं था. दरवाजे की घंटी बजी.

मम्मीपापा शादी से वापस लौट आए थे. पापा शादी में खाना खा कर नहीं आते थे इसलिए उन्हें खाना देने रसोई में चली गई. खाने का उन का मन नहीं था बस एक कप चाय की फरमाइश की उन्होंने. वंशिका भी थकान सी महसूस कर रही थी इसलिए 3 कप चाय बना कर ले आई. मां तो चाय के लिए कभी मना ही नहीं करती थी.

‘‘वंशु, हम ने सोचा है इस बार तुम्हारे जन्मदिन पर एक बड़ा सा फंक्शन करते हैं. क्या कहती हो?’’ पापा ने चाय पीते पीते पूछा. ‘‘पर क्यों पापा? आप का रिटायरमैंट भी है इसी महीने. तो उस दिन करेंगे बड़ा सा फंक्शन,’’ वंशिका ने तुरंत जवाब दिया. ‘‘2 दिन ही हैं बीच में. जन्मदिन और रिटायरमैंट दोनों की पार्टी एकसाथ कर लेंगे,’’ मां कपड़े बदल कर आ गई थी.

चाय का कप उठा कर बोली. ‘‘सुजीत और उस की मां को भी बुलाते हैं इस बार,’’ पापा की इस बात पर वंशिका और मां दोनों चौंक गए. ‘‘उन का क्या मतलब है हमारी पार्टी से? कुछ भी कहते हैं आप भी,’’ मां ने चाय का कप नीचे रख दिया. ‘‘गलत क्या है इस में? सब को बुलाएंगे तो अभि के पापा और उस की दादी को कैसे छोड़ सकते हैं?’’ पापा ने अपनी बात दोहराई.

‘‘अभि का उन से कोई रिश्ता नहीं है, पापा. एक मकान के बराबर कीमत लगाई थी उन्होंने अभि की और रिश्ते शब्द से उन का कोई सरोकार नहीं है. जो औरत मकान के लालच में अपने ही बेटे का घर तुड़वा सकती है वह अभि की कोई नहीं लगती है… वह इंसान जो न मां का हुआ, न प्रेमिका का, न अपने परिवार का. उस से कैसा रिश्ता हो सकता है अभि का?’’

मां और पापा दोनों ने वंशिका को रोका नहीं. सब कहने दिया. उस के बहते आंसुओं को  भी नहीं पोंछा. बस इतना ही कहा, ‘‘यही तो उन लोगों को बताना है, बेटा. तुम्हें भी, मु झे भी और तुम्हारी मां को भी… लगातार संपर्क कर रहे हैं वे दोनों. पुरानी रिश्तेदारी का हवाला दे रहे हैं.

उन्हे आईना दिखाना है. सब के सामने यह ऐलान करना है कि उन का तुम से या अभि से कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता है. हर रिश्ता लिव इन नहीं होता है कि जब चाहा निभाया जब चाहा तोड़ दिया.’’ पापा चाय के कप रख कर रसोई से बाहर आए तो वंशिका ने उन का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘यस पापा, आप सही कह रहे हैं.’’ तभी वंशिका का फोन बजा. रितु का फोन था. वंशिका सम झ गई कि यह सब उसी का कियाधरा है.

बदरंग इश्क: भाग 2- क्यों वंशिका को धोखा दे रहा था सुजीत?

मां की बात सुन कर वंशिका का शक सच में बदल गया. अगले हफ्ते अंगूठी की रस्म और उस के अगले हफ्ते शादी. लड़के वाले देर करना ही नहीं चाहते थे. वंशिका भी लड़के के व्यक्तित्व के प्रभाव में आ ही गई. ससुराल में बस लड़का और उस की मां ही थे. लड़का ऐडवोकेट था और मां एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका. एक बड़ा सा घर था उन का. मांग बस इतनी सी कि लड़की घरेलू हो और घर को रहने लायक बना पाए. सब एक सपने के जैसा था.

अभि के होने तक रानियों की तरह रह रही थी ससुराल में सिवा इस के कि वंशिका जान गई थी कि मांबेटे की आपस में ज्यादा नहीं बनती है. दबी जबान से कुछ पहचान वालों ने यह भी कानों में डाल दिया था कि उस के पति सुजीत का किसी विजातीय लड़की से लंबा संबंध रहा है.

मां की असहमति के कारण वह रिश्ता नहीं हो पाया और आननफानन में वंशिका से शादी कर दी.  उस लड़की की भी शादी हो गई थी अपनी ही जाति के एक लड़के के साथ. समय एक  जैसा नहीं रहता. समय बदला या फिर बदलाव वंशिका ने 2 साल बाद महसूस किया. पुरानी गर्लफ्रैंड स्वीटी उस के पति सुजीत की जिंदगी में फिर लौट आई अपने पति को तलाक दे कर.

इस बार पूरी तैयारी के साथ उस ने वंशिका की गृहस्थी पर हमला बोला. सुजीत की मां के दिमाग में यह बात डाल कर कि सुजीत की डोर वंशिका के नियंत्रण में है और ज्यादा समय नहीं लगेगा जब वह उस की संपत्ति पर कब्जा जमा लेगी. अपने बेटे अभि को हथियार बना कर. सुजीत की मां को बेटे का वंशिका पर प्यार लुटाना ज्यादा पसंद नहीं था. अपने बेटे अभि को भी वह हाथों पर रखता था. मकान के आधे हिस्से को उस ने अपने नाम कर लिया था.

इसी कुंठा को स्वीटी ने अपना रास्ता साफ करने में इस्तेमाल किया. ‘‘मौम कब तक सोते रहोगे. देखो कितने खिलौने दिलाए हैं नानू ने. मेरी सारी विश नानू ने पूरी कर दी हैं,’’ और वंशिका को हाथ पकड़ कर अपने खिलौने दिखाने ले गया. सिर को एक  झटका दिया. मन ही मन अभि को शुक्रिया कहा उस तड़प से बाहर निकालने के लिए जो पुरानी यादों के दिमाग में आ जाने से होती है.

नौकरी में शुरूशुरू में तो बहुत असुविधा होती लेकिन जब पापा ने नौकरी का मतलब सम झाया तो नजरिया बदल गया. समस्या ही खत्म हो गई, ‘‘बेटा, जब खुद को नौकर बोल ही दिया तो आदेशों के पालन में दुविधा कैसी?’’  सही कहा था पापा ने. रितु ने भी सुना तो खुद को हंसने से रोक नहीं पाई. जिंदगी  अब गतिमान हो गई थी. रोज ही सुजीत का कोई न कोई मैसेज आ जाता. वंशिका देख लेती लेकिन जवाब नहीं देती. अजनबी नंबर से कौल अटैंड करना भी बंद.

पूरा फोकस अभि और नौकरी पर. ‘‘काफी दिनों से रितु से नहीं मिली थी इसलिए एक कैफे में मिलने को बुला लिया. घर पर बात तो हो जाती लेकिन मां हर बात जानने की कोशिश करती और फिर पापा को भी बताती. उन के मन में डर सा बैठ गया था वंशिका को ले कर,’’ सब सही चल रहा है, वंशिका. सुजीत का फिर से कौल तो नहीं आई?’’ रितु ने बैठते ही पूछा.  ‘‘नहीं कौल तो नहीं बस मैसेज आते रहते हैं,’’ वंशिका ने तुरंत जवाब दिया. ‘‘मैसेज में क्या लिखता है?’’ रितु ने उत्सुकता से पूछा. ‘‘वही कि तुम दोनों वापस आ जाओ. अपना परिवार वापस चाहता हूं.

दूसरे के बच्चे को पिता का प्यार देने से अच्छा है खुद के बेटे को दूं. बस यही.’’ ‘‘जब तलाक लिया था तब उस की अक्ल घास चरने गई थी क्या? एक नंबर का फरेबी इंसान है. ढाई साल के बच्चे पर भी उसे प्यार नहीं आया था. एक  झटके में अपनी खूबसूरत और वफादार पत्नी से अलग हो गया,’’ रितु गुस्से में बोल रही थी. वंशिका ने उसे चुप किया. याद दिलाया, ‘‘कैफे में बैठे हैं. तू बता शादी कब कर रही है? अब तो तु झे सही गिफ्ट दूंगी. नौकरी कर रही हूं. खाली नहीं हूं.’’ वंशिका ने ऐसे बोला कि रितु को हंसी आ गई, ‘‘मम्मीपापा लगे हैं अपने काम पर. मैं तो बस फाइनल करूंगी.

जो फाइनल होगा बात भी उसी से करूंगी.फालतू में इन सिरफिरों को मुंह लगाना मु झे नहीं पसंद,’’ रितु ने सड़ा सा मुंह बना कर कहा. ‘‘हमारे पापा तो ऐसे नहीं हैं न. मेरे साथ जो हुआ उस में मेरी भी नासम झी थी. न शादी को मना कर पाई. शादी की पहली जरूरत विश्वास है.’’ वंशिका की बात पर रितु चौंक कर बोली, ‘‘तू महान है. इतने बड़े धोखे के बाद भी विश्वास की बात करती है. मैं तेरी तरह नहीं हूं. जो विश्वास के लायक हो उसी पर किया जाता है विश्वास. सब पर नहीं.’’ वंशिका बात को खत्म करने के इरादे से बोली, ‘‘रितु, आज की यह छोटी सी ट्रीट मेरी तरफ से है.

जो भी मंगाना हो और्डर कर दे.’’ ‘‘आज जो खिलाएगी खा लूंगी,’’ रितु थोड़ी सामान्य हुई. दोनों अपनीअपनी नौकरी के बारे में बातें करती रहीं. कपड़ों की, जूतेचप्पलों की, पर्स और ज्वैलरी की भी बातें हुईं. कैफे से बाहर आईं तो दोनों का मन हलका हो चुका था. अभि को सुला कर वंशिका भी बिस्तर पर लेट गई. मम्मीपापा किसी शादी में गए हुए थे. कल छुट्टी थी तो सोने की जल्दी नहीं थी. दिमाग भी शरीर को आराम मिलने तक शांत रहता है. आराम मिलते ही सक्रिय हो जाता है.

3 साल पुरानी घटनाएं फिर से यादों में ताजा हो गईं… ‘‘सुजीत, मैं ने सुना है, स्वीटी तलाक ले कर अपने घर वापस आ गई है?’’ वंशिका के सवाल पर सुजीत घबराया नहीं, सहजता से जवाब दिया, ‘‘अपने घर नहीं, अकेली रह रही है किराए के घर में.’’  वंशिका का शक सही था, ‘‘आप मिले उस से,’’ इस प्रश्न पर सुजीत को  गुस्सा आ गया. दोस्त तो अब भी है मेरी. मिलने में क्या समस्या है? तलाक का केस चल रहा है उस का. मैं वकील हूं, उसे सलाह की जरूरत पड़ती है तो बात हो जाती है.

कभीकभी परेशान होती है तो मिलने आ जाती है.’’ पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई वंशिका के. उसे सास का ताना याद आ गया कि कभी तेरा नहीं होगा. पुरानी गर्लफ्रैंड का तलाक करवा रहा है. अपना ठिकाना ढूंढ़ लेना. मेरे घर के 2 हिस्से करवाए थे तूने. अब तेरी गृहस्थी के 2 हिस्से हो जाएंगे.  अभि के पहले जन्मदिन पर घर का आधा हिस्सा सुजीत ने वंशिका के नाम किया  था अपनी मां को बिना बताए. इसी वजह से सास उस की दुश्मन बन गई थी.

जानें लिवर फेलियर क्या है और इसके उपचार?

सवाल

मेरे पति की उम्र 56 साल है. उन का लिवर फेलियर हो चुका है. मैं जानता चाहता हूं कि लिवर फेलियर क्या है और इस के लिए कौनकौन से उपचार उपलब्ध हैं?

जवाब

लिवर फेलियर तब होता है जब लिवर का एक बड़ा भाग क्षतिग्रस्त हो जाता है और उसे किसी उपचार से ठीक नहीं किया जा सकता है. लिवर फेल्योर जीवन के लिए एक घातक स्थिति है जिस के लिए तुरंत उपचार की जरूरत होती है. लिवर फेल्योर लिवर की कई बीमारियों की आखिरी स्टेज है. शुरुआती चरण में लिवर फेल्योर का उपचार दवा से किया जाता है. इस के उपचार का प्रारंभिक उद्देश्य यह होता है कि लिवर के उस हिस्से को बचा लिया जाए जो अभी भी कार्य कर रहा है. अगर यह संभव नहीं है तब लिवर प्रत्यारोपण जरूरी हो जाता है. इस में या तो पूरा लिवर बदल जाता है या फिर लिवर का कुछ भाग. अत्याधुनिक तकनीकों ने लिवर प्रत्यारोपण को काफी आसान और सफल बना दिया है.

सवाल

मैं 57 वर्षीय महिला पेशे से वकील हूं. डायग्नोसिस में मेरे लिवर में 2 मिलीमीटर का ट्यूमर होने का पता चला है. क्या इस का सर्जरी से पूरी तरह उपचार संभव है?

बहुत कम मामलों में ही लिवर  कैंसर का शुरुआती चरण में पता चल पाता है और इस स्तर पर सर्जरी  के द्वारा इस का लगभग सफल उपचार संभव है. सर्जरी के द्वारा ट्यूमर के कुछ स्वस्थ ऊतकों को निकाल दिया जाता है जो ट्यूमर के आसपास होते हैं. मिनिमली इनवेसिव लैप्रोस्कोपिक या रोबोटिक सर्जरी ने सर्जरी को काफी आसान बना दिया है. यह एक अत्याधुनिक विकसित तकनीक है जिस में सर्जरी करने में कंप्यूटर और रोबोट की मदद ली जाती है. कंप्यूटर द्वारा नियंत्रित इस सर्जरी में सर्जन रोबोट को नियंत्रित करने के लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं, जिस से जटिलताएं कम होती हैं और मरीज को ठीक होने में कम समय लगता है तथा अस्पताल में ज्यादा रुकने की जरूरत भी नहीं पड़ती है.

-डा. संजय गोजा

प्रोग्राम डाइरैक्टर ऐंड क्लीनिकल लीड-लिवर ट्रांसप्लांटएचपीबी सर्जरी ऐंड रोबोटिक लिवर सर्जरीनारायणा हौस्पिटलगुरुग्राम.

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दोष कहीं और है

अब बच्चों को पालने में पहले से कई गुना मेहनत ही नहीं, पैसा भी लगने लगा है. पहले बच्चे कई होते थे और साधन कम तो बच्चों को अपनेआप पलने दिया जाता था. उन के खाने और सुरक्षा का इंतजाम तो होता था पर बाकी वे अपनी जिंदगी में क्या करेंगे यह उन पर छोड़ दिया जाता था. अब बच्चे चाहत का नतीजा हैं, किसी बायोलौजिकल सैक्स ऐक्शन का औटोमैटिक रिजल्ट नहीं हैं. बच्चे प्लान कर के किए जाते हैं और कानून के बावजूद कोशिश की जाती है कि मनचाहे सैक्स का बच्चा पैदा हो.

मगर इस पूरी 15-20 साल की ऐक्सरसाइज का आफ्टर इफैक्ट दिखने लगा है. बच्चों का जन्म ही प्लान नहीं किया जाता, वे क्या करेंगे, कैसे करेंगे यह भी प्लान किया जाने लगा है और उन से ढेरों उम्मीदें लगा कर उन पर खूब इनवैस्ट किया जाने लगा है. नतीजा है कि बच्चों के मांबाप तो टैंशन में रहते ही हैं, बच्चे भी मांबाप की टैंशन को अपने सिर पर ले लेते हैं.

गत 29 मार्च को मोहनलालगंज, लखनऊ, के डी फार्मा के फर्स्ट ईयर के आशुतोष श्रीवास्तव ने अपने कमरे में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. उस ने जो नोट छोड़ा उस में लिखा था, ‘‘मुझे लगता है कि मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा, मम्मीपापा के सपनों को साकार नहीं कर पाऊंगा. मुझे माफ करना…’’

22 साल का युवा जो अब तक कमाऊ हो जाता था न केवल घर पर बोझ बना हुआ था, लगता है पढ़ाई में पीछे रह गया था.

आजकल मांबाप से बहुत कहा जा रहा है कि वे अपने बच्चों पर दबाव न बनाएं, उन्हें अपनी मरजी के काम करने दें. काफी चली फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ का मेन थीम भी यही था कि एमबीए की पढ़ाई में फर्स्ट आना और मोटा वेतन पाना जीवन का लक्ष्य हो जरूरी नहीं, जीवन में और भी बहुत कुछ है करने को. मांबाप बच्चों पर अब बहुत प्यार उडे़लते हैं, उन्हें नामी व महंगे स्कूलों में दाखिल कराने के लिए उन पर बहुत पैसा खर्चते हैं, बहुत पैसा कोचिंग क्लासों पर खर्च करते हैं तो बहुत सी उम्मीदें पाल लेते हैं. ये उम्मीदें युवाओं के सिर पर तलवार की तरह लटकती हैं. डिलिवर और पैरिश- सपने पूरे करो या नष्ट हो जाओ.

यह उम्मीद करना गलत नहीं है क्योंकि तीनचौथाई सफल लोग इसी दबाव में रह कर पले होते हैं. जब तक दबाव न हो कोई नया काम नहीं होता. पिरामिड तब के पुरोहितों के झठे दबावों में आ कर फैरों ने इजिप्ट में बनवाए जिन्हें देख कर आज भी अच्छे से अच्छे सिविल इंजीनियर भी कहते हैं कि यह कैसे किया गया.

दबाव में आ कर मानव अफ्रीका के जंगलों से हो कर पहाड़ों, नदियों, समुद्रों को पार कर दुनियाभर में फैला. उस समय का मानव सैर करने या ऐडवैंचर करने के लिए अपने जन्मस्थल से 100-200 किलोमीटर 8-10 दिनों में यों ही नहीं चला होगा.

मांबापों पर दोष दे कर उन्हें जो गिल्ट फील कराई जा रही है वह गलत है. इस के पीछे भ्रांति यह है कि हरेक का कल तो पहले से भाग्य में लिखा है और किसी के करने से कुछ नहीं होता. आज तो हम तकनीक देख रहे हैं, उस का सुख भोग रहे हैं, यह भाग्य की देन नहीं है, मेहनत और लक्ष्य पूरा करने की तमन्ना का परिणाम है.

कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने में हजारों वैज्ञानिकों ने रातदिन एक किए. दुनियाभर में कैंसर से निबटने का प्रयास चल रहा है. सोलर पावर का इस्तेमाल हर रोज बढ़ाया जा रहा है ताकि कार्बन फुटप्रिंट कम किए जा सकें.

मांबापों को इस गिल्ट से मुक्त हो जाना चाहिए कि वे बच्चों पर अनावश्यक दबाव के दोषी हैं. दोष कहीं और है. यह धर्म का हो सकता है जो पूजापाठ की लत बच्चों में डाल देता है. यह मोबाइलों का हो सकता है जो गलत या ध्यान भटकाने वाली चीजें सुलभ करा कर बच्चों को बहका देते हैं. दोष स्कूलों के प्रबंधकों का हो सकता है जो कोचिंग व्यवसाय को बढ़ाने के लिए पढ़ाई के घंटों को बरबाद करते हैं. दोष कोचिंग दुकानदारों का हो सकता है जो विज्ञापनबाजी कर के ग्राहक तो पटा लेते हैं पर एक बार पैसा ले कर उन्हें मंझदार में छोड़ देते हैं और नई मछली को दाना डालने में लग जाते हैं.

22 साल के आशुतोष श्रीवास्तव को खुद सोचना चाहिए था कि जिन सपनों को पूरा न कर पाने के कारण आत्महत्या कर रहा है, आत्महत्या के बाद वे पूरे नहीं हो जाएंगे. मांबाप उस अवसाद में से गुजरेंगे जो वह जिंदा रहता तो नहीं गुजरते. गलती मांबाप की नहीं कि वे सपने देख रहे हैं. उन्हें संतोष करना चाहिए कि जो उन के बस का था, उन्होंने किया.

जिंदगी का सफर: भाग 1- क्या शिवानी और राकेश की जिंदगी फिर से पटरी पर लौटी?

जिस  सुबह गुस्से से भरी शिवानी अपनी ससुराल छोड़ कर मायके रहने चली आई, उस से पिछली रात उस का अपने पति राकेश से जबरदस्त झगड़ा हुआ था.

‘‘रात को 11 बजे तुम पार्टी में गुलछर्रे उड़ा कर घर लौटो, यह मुझे मंजूर नहीं. आगे से तुम औफिस की किसी पार्टी में शामिल नहीं होगी,’’ शिवानी के घर में कदम रखते ही राकेश गुस्से में फट पड़ा था.

‘‘मेरे नए बौस ने अपनी प्रमोशन की पार्टी दी थी. मैं उस में शामिल होने से कैसे इनकार कर सकती थी?’’ शिवानी का अच्छाखासा मूड फौरन खराब हो गया.

‘‘इस बारे में मैं कोई बहस नहीं करना चाहता हूं.’’

‘‘जो संभव नहीं, उस काम को करने की हामी मैं भी नहीं भर सकती हूं.’’

‘‘अगर ऐसी बात है, तो नौकरी छोड़ दो.’’

‘‘बेकार की बात मत करो, राकेश. 75 हजार रुपये वाली नौकरी न आसानी से मिलती है और न किसी के कहने भर से छोड़ी जाती है.’’

‘‘तुम्हारे, 75 हजार से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण मोहित की उचित परवरिश है, घर की सुखशांति है. इन की बलि चढ़ा कर तुम्हें नौकरी करने की इजाजत नहीं मिलेगी,’’ राकेश का गुस्सा पलपल बढ़ता जा रहा था.

‘‘मोहित के उज्ज्वल भविष्य व घर की सुखसुविधा की आज हर चीज मौजूद है. हमारे सुखद व सुरक्षित भविष्य के लिए समाज में मानसम्मान से जीने के लिए क्या मेरा नौकरी करते रहना जरूरी नहीं है?’’

‘‘यों डींगें मार कर तुम मुझे अपने से कम कमाने का ताना मत दो. सिर्फ अपनी कमाई के बल पर भी मैं मोहित को और तुम्हें इज्जत व सुख से भरी जिंदगी उपलब्ध करा सकता हूं,’’ शिवानी को गुस्से से घूरते हुए राकेश ने दलील दी.

‘‘कम और ज्यादा कमाने की पीड़ा तुम ही महसूस करते हो राकेश. मु?ो इस बात का ध्यान भी नहीं आता. मेरी नौकरी को ले कर गुस्सा करने के बजाय तुम अपनी मानसिकता बदलो. बेकार की हीनभावना का शिकार हो कर अपना और मेरा दिमाग खराब मत…’’

राकेश को उस के मुंह से निकली बात ऐसी चुभी कि उस का हाथ उठ गया. गाल पर लगे चांटे की पीड़ा और अपमान को सहते हुए शिवानी उसी पल से बिलकुल खामोश रह गई. अपनी नाराजगी बरकरार रखते हुए राकेश ने उसे न सम?ाया, न मनाया और न ही किसी दूसरे ढंग से अफसोस प्रकट किया.

एकदूसरे के प्रति शिकायतों व नाराजगी से भरे दोनों ही रातभर ठीक से सो नहीं पाए. उन्होंने 6 साल पहले प्रेम विवाह किया था. शायद इस कारण दोनों दिलों में मायूसी, निराशा व टीस का एहसास ज्यादा गहरा था.

‘राकेश शादी होने से पहले ही मेरे व्यक्तित्व को अच्छी तरह से जानतापहचानता था. मैं बेहद महत्त्वाकांक्षी और मेहनती लड़की हूं. हर तरह से अव्वल रहना मेरा स्वभाव है. प्रेमी के रूप में उस ने हर कदम पर मेरा साथ दे कर मेरे सपनों को पूरा करने का वादा किया था. अब वह तरक्की की दौड़ में मुझ से पिछड़ गया है, तो मैं क्या करूं? जोरजबरदस्ती कर के वह मेरी जिंदगी को नर्क नहीं बना सकता. मैं अपनी जिंदगी अपने ढंग से अपने सपनों को पूरा करने को जीऊंगी… वह साथ नहीं देगा, तो अकेले ही,’ ऐसी सोचों के चलते शिवानी ने रातभर आंसू भी बहाए और गुस्से की आग में भी जलती रही.

राकेश के मन में भी अपनी प्रेमिका बनी पत्नी के प्रति नाराजगी व शिकायतों से भरे विचार रात भर चले…

‘मुझ से ज्यादा कमाने का मतलब यह नहीं कि वह घर के कायदेकानूनों का उल्लंघन करे, सारी मर्यादाओं को तोड़ती जाए. बहुत अमीर बनने के ख्वाब ने उसे अंधा और पागल कर दिया है. मैं ने कभी सोचा भी न था कि यह इतनी स्वार्थी और घमंडी हो जाएगी. अब न तो यह मेरी भावनाओं को समझती है और न ही मोहित पर ध्यान देती है. मुझे  झुका और दबा कर हमेशा अपनी मनमानी कर सकती है, उस की ये गलतफहमी इस बार में तोड़ ही दूंगा,’ इस तरह के विचारों ने राकेश के गुस्से की आग को भड़काए रखा.

अगले दिन रविवार की सुबह शिवानी डरेसहमे 4 वर्षीय मोहित को ले कर अपनी सहेली के साथ रहने उस के घर चली गई. सहेली एक बड़े मकान में अकेले रहती थी. उस ने शादी नहीं की थी. जब तक कोई और इंतजाम न हो जाए, उसे उस के घर जाना ही ठीक लगा. वह अपनी मेड को भी ले गई. राकेश या उस के सासससुर ने उस से एक शब्द नहीं बोला. शिवानी ने विदा होने के समय खुद को बेहद अपमानित और अकेला महसूस किया.

शिवानी के अलग रहने की जानकारी सास ने उस की मां को खबर कर दी कि वह नाराज हो कर और बिना बड़ों की इजाजत लिए घर से गई.

शिवानी इसलिए मां के पास नहीं गई कि वहां तो उस के मातापिता और भैयाभाभी उसे समझने के लिए पहले से भरे बैठे होंगे. शिवानी जानती थी कि कोई भी उस के पक्ष को गंभीरता से सुनने में दिलचस्पी नहीं दिखाएगा.

उन सभी के एकसाथ लैक्चर उन के फोन आने पर शिवानी पहले भी सुन चुकी है जब उस ने प्रेम विवाह का फैसला किया था.

चिढ़ कर शिवानी को गुस्सा आ गया और फिर कहा, ‘‘मेरी नौकरी को ले कर

राकेश रातदिन क्लेश करता था, पर मैं सब सब्र से सहती रही. कल रात उस ने मुझ पर हाथ उठा कर भारी भूल करी है. वह जब तक माफी नहीं मांगेगा मैं नहीं लौटूंगी. अपना फैसला बदलने के लिए अगर आप सब ने मुझ पर दबाव डाला, तो मैं किसी दूसरे शहर रहने चली जाऊंगी.’’

जिद्दी शिवानी की धमकी सुन कर वे चुप तो जरूर रहने लगे पर उन के हावभाव साफ कहते हैं कि यों उस का अलग रहना उन्हें जरा भी प्रसंद नहीं.

अपने मातापिता व सासससुर को बता शिवानी बिलकुल अलगथलग सी पड़ गई. किसी ने उस के मन की पीड़ा को समझने की कोशिश नहीं करी, इस बात का वह बहुत दुख मान रही थी.

उस के पिता ने भी फोन पर कहा था, ‘‘ज्यादा पैसे कमाने का घमंड मत कर. जिद करेगी, तो तेरा घर उजड़ जाएगा.’’

‘‘हमें लोगों की नजरों में शर्मिंदा मत कर और लौट जा. कहीं बात ज्यादा बिगड़ गई, तो बहुत पछताएगी,’’ उस की मां वक्तबेवक्त आंसू बहाते हुए उसे समझाती.

शिवानी के बड़े भाई संजय ने उसे फोन करना बंद कर दिया. अपनी भाभी कविता के व्यवहार में भी शिवानी रूखापन साफ महसूस करती.

2-4 बार जब वह सब से मिलने गई तो सब के मुंह फूले हुए थे.

मोहित अपने दादादादी व पिता से रोज फोन पर बातें हो जातीं. इन तीनों ने शिवानी से बात करने की एक बार भी इच्छा जाहिर नहीं करी, तो उस ने भी चिढ़ कर इन से संपर्क बनाने की कोई कोशिश नहीं करी.

अपरिचित- भाग-2: जब छोटी सी गलतफहमी ने तबाह किया अर्चना का जीवन

नालडेहरा में किसी हिंदी फिल्म की शूटिंग चल रही थी. रजत और बच्चे उस ओर चले गए और वह घूमघूम कर कुदरती नजारों के चित्र लेने लगी. अर्चना एक पहाड़ी बच्ची की तसवीर उतारने लगी तो सहसा फे्रम में ‘वह’ आ गया. अर्चना ने कैमरा हटा कर देखा तो जैसे वह हिल कर रह गई. एक पेड़ से टिक कर खड़ा था ‘वह’ और नीली जींस और क्रीम कलर की जैकेट में कल से भी ज्यादा डेशिंग लग रहा था.

‘क्या चाहते हैं आप?’ यह पूछने के लिए जैसे ही अर्चना आगे बढ़ी, वह पलक झपकते ही न जाने कहां गायब हो गया.

घूमघाम कर शाम को लौट आए थे वे लोग. बच्चे अंत्याक्षरी खेल रहे थे और अर्चना उन से बेखबर ‘उस की’ ही सोच में डूबी थी कि रजत ने टोका, ‘‘भई अर्ची, आज तुम्हारा चैटर बौक्स क्यों बंद है? कुछ बकबक करो बेगम, चुप्पी तुम्हें शोभा नहीं देती.’’

‘‘थोड़ा सिरदर्द है. थकान भी हो रही है,’’ कह कर टाल दिया उस ने.

रात फिर नींद गायब थी अर्चना की. उसे ‘उसी’ की सोच ने जकड़ा हुआ था. एक बार तो जी में आया कि रजत को सब बता दे पर यह सोच कर रुक गई कि रजत न जाने इस बात को किस रूप में लें? वह उस का मजाक भी उड़ा सकते हैं, उस पर शक भी कर सकते हैं या हो सकता है कि ‘वह’ फिर मिले तो उस से झगड़ने ही बैठ जाएं और एक बात तो पक्की है कि उसे फिर कहीं अकेले नहीं जाने देंगे. इस से तो बेहतर है कि वह चुप ही रहे. जो होगा देखा जाएगा.

अगले दिन ‘रिवोली’ पर सुबह का शो देख कर रजत और बच्चे जाखू चले गए. उन के लाख कहने पर भी अर्चना नहीं गई और सड़क के किनारे बनी दुकानों से छोटीछोटी कलात्मक वस्तुएं खरीदती हुई वह माल रोड पर घूमती रही.

आखिर थक कर वह अनमनी सी चर्च के सामने बिछी एक बैंच पर बैठ गई.

सहसा मन में चाह उठी कि ‘वह’ दिख जाए तो चैन आए. अपनेआप पर हैरानी भी हो रही थी अर्चना को कि जिस की उपस्थिति की कल्पना भी उसे 2 दिन से भयभीत कर रही थी और जिस के आसपास मौजूद होने के एहसास मात्र से वह असहज होती रही, आज उसी को देखने की ललक क्यों जाग रही है मन में? कहीं चला तो नहीं गया ‘वह’? फिर  झरने से बहते एक खनकते हंसी के स्वर ने उस के भटकते मन को जैसे रोक दिया.

अर्चना ने देखा सामने वाली बैंच पर बैठा एक नवविवाहिता जोड़ा दीनदुनिया से बेखबर आपस में हंसीठिठोली कर रहा था. नई नर्म कोंपल सी कोमल वह लड़की चूड़ा खनकाते हुए कभी हंस रही थी, कभी इतरा रही थी तो कभी इठला रही थी और छैलछबीला सा उस का पति खिदमती अंदाज में उस के नाजनखरे उठा रहा था. कभी भाग कर कुल्फी लाता, कभी पौपकौर्न तो कभी चाट के पत्ते. ‘कितने खुशनुमा होते हैं जिंदगी के ये कुछ दिन… फिर तो वही घरगृहस्थी के झगड़ेपचड़े,’ एक ठंडी सांस ले कर सोचा अर्चना ने.

‘‘एक्सक्यूज मी.’’ मुड़ कर देखा अर्चना ने, तो सिर से पांव तक कांप गई. सामने ‘वही’ खड़ा था.

‘‘आप?’’ कह कर वह हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई.

‘‘जी, आप अर्चना हैं न? अर्चना सचदेव, अमृतसर से?’’

‘‘जी हां, मगर आप?’’

‘‘मुझे पहचाना नहीं आप ने?’’ उस के स्वर में न पहचाने जाने का दर्द था.

अर्चना ने पहली बार उसे सिर से पांव तक देखा. काले ट्राउजर और बंद गले के काले स्वैटर में वह पिछले दिनों से ज्यादा आकर्षक लग रहा था. कश्मीरी सेबों सी लालिमा लिए गोरा रंग और घनेघुंघराले बाल, किसी हिट फिल्म का नायक लग रहा था वह. अर्चना ने अपने दिमाग पर पूरा जोर डाला, स्मृतियों की सारी डायरियां टटोल डालीं, लेकिन उस की पहचान नहीं मिली तो हार कर अर्चना ने इनकार में गरदन हिलाते हुए कहा, ‘‘सौरी, मैं नहीं पहचान पाई आप को.’’

‘‘मैं अखिल हूं… अखिल आनंद… वह खालसा कालेज…’’

‘‘ओ, माय गौड, वहां तक तो मैं पहुंची ही नहीं. कितना बदल गए हैं आप? कैसे पहचानती मैं आप को?’’

‘‘लेकिन आप बिलकुल नहीं बदलीं. बिलकुल वैसी ही हैं आप, तभी तो मैं आप को देखते ही पहचान गया, जब आप गाड़ी से सामान निकाल रही थीं, इत्तेफाक से मैं भी ‘हिमलैंड’ में ही ठहरा हूं.’’

‘‘तभी क्यों नहीं बात कर ली आप ने? इस तरह मेरे पीछेपीछे क्यों घूमते रहे?’’

‘‘डर गया था कि आप न जाने कैसा बरताव करें.’’

‘‘तो अब क्यों सामने चले आए?’’

‘‘डर गया था कि कहीं आप चली न जाएं और मैं आप से दो बातें भी न कर पाऊं.

‘‘अकेले आए हैं आप घूमने?’’

‘‘मैं घूमने नहीं, काम से आया हूं यहां. शिमला में हमारे सेब के बाग हैं, इसी सिलसिले में आनाजाना लगा रहता है.’’

‘‘और बाकी सब… पत्नी वगैरा, वहीं हैं अमृतसर में?’’

‘‘नहीं, अमृतसर तो कब का छूट गया, अब चंडीगढ़ में हैं हम. एक बेटी भी है मेरी, बिलकुल आप की तरह खूबसूरत. सच कहूं अर्चना मैं आप को अभी भी भूल नहीं पाया,’’ बड़े हसरत भरे स्वर में कहा अखिल ने.

‘‘अब इन बातों का क्या फायदा?’’ एक निश्वास के साथ कहा अर्चना ने.

‘‘आप कहां हैं आजकल?’’ अखिल ने बात बदली.

‘‘दिल्ली में.’’

‘‘अर्चना, आप यहीं रुकिए, प्लीज. कहीं जाइएगा नहीं. मैं अभी आया, 5 मिनट में,’’ कह कर वह चला गया और अर्चना का दिलोदिमाग 12 बरसों को चीर कर अमृतसर के खालसा कालेज में जा पहुंचा.

बीकाम अंतिम वर्ष में थी वह. 4 सहेलियों की चौकड़ी थी उन की. मस्त, खिलंदड़ और शरारती. उन के अंतिम 3 पीरियड्स खाली रहते थे, इसलिए वे कालेज बस के बजाय पैदल ही घर चल देती थीं. हंसतीबतियाती आधी सड़क घेर कर चलती थीं वे चारों. उन दिनों एक हैंडसम लड़का एक निश्चित दूरी बना कर उन के पीछे आया करता था बाइक पर. वे उसे कभी मजनू कहतीं तो कभी रोमियो. वे तो यह भी नहीं जानती थीं कि वह दीवाना किस का है.

पहेली तो तब सुलझी, जब परीक्षाएं शुरू होने से पहले लाइबे्ररी की किताबें लौटाने वह अकेली कालेज गई. लाइब्रेरी से निकल कर कोरीडोर तक ही पहुंची थी कि अचानक ‘वह’ सामने आ गया और एक खुलापत्र उस के हाथ में थमा कर न जाने कहां गायब हो गया और अर्चना ने कांपते मन और लरजते हाथों से उस अमराई में जा कर वह खत पढ़ा जहां अपनी हमजोलियों के साथ बैठ कर उस ने हरिवंश राय बच्चन की ‘मधुशाला’ पढ़ी थी, ‘नीरज’ के गीत गाए थे और भविष्य के आकाश को चांदसितारों से सजाने की योजनाएं बनाई थीं.

कहीं मेला कहीं अकेला- संयुक्त परिवार में शादी से क्यों डरती थी तनु?

‘‘यह रिश्ता मुझे हर तरह से ठीक लग रहा है. बस अब तनु आ जाए तो इसे ही फाइनल करेंगे,’’ गिरीश ने अपनी पत्नी सुधा से कहा.

‘‘पहले तनु हां तो करे, परेशान कर रखा है उस ने, अच्छेभले रिश्ते में कमी निकाल देती है…संयुक्त परिवार सुन कर ही भड़क जाती है. अब की बार मैं उस की बिलकुल नहीं सुनूंगी और फिर यह रिश्ता उस की शर्तों पर खरा ही तो उतर रहा है. पता नहीं अचानक क्या जिद चढ़ी है कि बड़े परिवार में विवाह नहीं करेगी, क्या हो गया है इन लड़कियों को,’’ सुधा ने कहा.

‘‘तुम्हें तो पता ही है न, यह सब उस की बैस्ट फ्रैंड रिया का कियाधरा है… ऐसी कहां थी हमारी बेटी पर आजकल के बच्चों पर तो दोस्तों का प्रभाव इतना ज्यादा रहता है कि पूछो मत,’’ गिरीशजी बोले.

दोनों पतिपत्नी चिंतित और गंभीर मुद्रा में बातें कर ही रहे थे कि तनु औफिस से

आ गई. मातापिता का गंभीर चेहरा देख चौंकी, फिर हंसते हुए बोली, ‘‘फिर कोई रिश्ता आ गया क्या?’’

उस के कहने के ढंग पर दोनों को हंसी आ गई. पल भर में माहौल हलकाफुलका हो गया. तीनों ने साथ बैठ कर चाय पी. फिर गिरीश का इशारा पा कर सुधा ने कहा, ‘‘इस रिश्ते में कोई कमी नहीं लग रही है, यहीं लखनऊ में ही लड़के के मातापिता अपने बड़े बेटेबहू के साथ रहते हैं. छोटा बेटा मुंबई में ही कार्यरत है, वह दवा की कंपनी में प्रोडक्ट मैनेजर है.’’

तनु पल भर सोच कर मुसकराती हुई बोली, ‘‘अच्छा, वहां अकेला रहता है?’’

‘‘हां.’’

‘‘फिर यह तो ठीक है. बस, उस के मातापिता बारबार मुंबई न पहुंच जाएं.’’

‘‘क्या बकवास करती हो तनु,’’ सुधा को गुस्सा आ गया, ‘‘उन का बेटा है, क्या वे वहां नहीं जा सकते? कैसी हो गई हो तुम? ये सब क्या सीख लिया है? हम आज भी तरसते हैं कोई बड़ा हमारे सिर पर होता तो कितना अच्छा होता पर सब का साथ सालों पहले छूट गया और एक तुम हो… क्या ससुराल में बस पति से मतलब होता है? बाकी रिश्ते भी होते हैं, उन की भी एक मिठास होती है.’’

‘‘नहीं मां, मुझे घबराहट होती है, रिया बता रही थी…’’

सुधा गुस्से में  खड़ी हो गईं, ‘‘मुझे उस लड़की की कोई बात नहीं सुननी… उस लड़की ने हमारी अच्छीभली बेटी का दिमाग खराब कर दिया है…हमारे परिवार में हम 3 ही हैं. थोड़े दिन पहले तुम जौइंट फैमिली में हर रिश्ते का आनंद उठाना चाहती थी पर इस रिया ने अपनी नैगेटिव बातों से तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया है.’’

तनु को भी गुस्सा आ गया. वह भी पैर पटकती हुई अपने रूम में चली गई.

गिरीश और सुधा सिर पकड़े बैठे रह गए.

तनु की बैस्ट फ्रैंड रिया का विवाह 6 महीने पहले ही दिल्ली में हुआ था. उस की ससुराल में सासससुर और पति अनुज थे, समृद्ध परिवार था. रिया भी अच्छी जौब में थी. तनु से ही रिया के हालचाल मिलते रहते थे. दिन भर दोनों व्हाट्सऐप पर चैट करती थीं. अकसर छुट्टी वाले दिन दोनों की बातें सुधा के कानों में पड़ती थीं तो वे मन ही मन बेचैन हो उठती थीं. उन्होंने अंदाजा लगा लिया था कि रिया सासससुर की, यहां तक कि अनुज की भी कमियां निकाल कर तनु को किस्से सुनाती रहती है. वह तनु की बैस्ट फ्रैंड थी,  जिस के खिलाफ एक शब्द भी सुनना तनु को मंजूर नहीं था. तनु को हर बात सुधा से भी शेयर करने की आदत थी इसलिए वह कई बातें उन्हें खुद ही बताती रहती थी.

कभी तनु कहती, ‘‘आज रिया का मूड खराब है मम्मी, उसे अनुज ने मौर्निंग वाक के लिए उठा दिया, उसे सोना था, बेचारी अपनी मरजी से सो भी नहीं सकती.’’

एक दिन तनु ने बताया, ‘‘रिया की सास हैल्थ पर बहुत ध्यान देती हैं… उसे वही बोरिंग टिफिन खाना पड़ता है.’’

सुधा ने पूछा, ‘‘उस की सास ही टिफिन बनाती हैं?’’

‘‘हां, रिया औफिस जाती है तो वे ही घर का सारा काम देखती हैं. उन के यहां कुक है पर उस की सास अपनी निगरानी में ही सब खाना तैयार करवाती हैं.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है. रिया को खुश होना चाहिए, इस में शिकायत की क्या बात है?’’

क्या खुश होगी बेचारी, उसे वह टिफिन अच्छा नहीं लगता. वह किसी और को खिला देती है. अपने लिए कुछ मनचाहा और्डर करती है बेचारी.

‘‘इस में बेचारी की क्या बात है? उस की सास हैल्दी खाना बनवा कर क्या गलत कर रही है?’’

तनु को गुस्सा आ गया, ‘‘आप उस की परेशानी क्यों नहीं समझतीं?’’

‘‘यह कोई परेशानी नहीं है. बेकार के किस्से सुना कर तुम्हारा टाइम और दिमाग दोनों खराब करती है वह लड़की.’’

2 दिन तो तनु चुप रही, फिर आदतन तीसरे दिन ही शुरू हो गई, ‘‘रिया के सारे रिश्तेदार दिल्ली में ही रहते हैं. कभी किसी के यहां कोई फंक्शन होता है, तो कभी किसी के यहां. पता नहीं  कितने तो रिश्ते के देवर, ननदें हैं, जो छुट्टी वाले दिन टाइमपास के प्रोग्राम बनाते रहते हैं. रिया थक जाती है बेचारी.’’

सुधा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. रिया की बातें सुनसुन कर थक गई थीं. तनु की सोच बिलकुल बदल गई थी. अच्छीखासी स्नेहमयी मानसिकता की जगह नकारात्मकता ने ले ली थी.

कुछ दिन बाद तनु के उसी रिश्ते की बात को आगे बढ़ाया गया. तनु और रजत मिले. दोनों ने एकदूसरे को पसंद किया. सब कुछ सहर्ष तय कर दिया गया. रजत मुंबई में अकेला रह रहा था, इसलिए उस के मातापिता गौतम और राधा को उस के विवाह की जल्दी थी. विवाह अच्छी तरह से संपन्न हो गया था.

रिया भी अनुज के साथ आई थी. वह तनु से कह रही थी, ‘‘तुम्हारी तो मौज हो गई तनु. सब से दूर अकेले पति के साथ रहोगी. काश, मुझे भी यही लाइफ मिलती पर वहां तो मेला ही लगा रहता है.’’

इस बात को सुन कर सुधा को गुस्सा आया था. सब रस्में संपन्न होने के बाद 1 हफ्ते बाद तनु और रजत मुंबई जाने की तैयारी कर रहे थे. तनु के औफिस की ब्रांच मुंबई में भी थी. उस की योग्यता को देखते हुए उस का ट्रांसफर मुंबई ब्रांच में कर दिया गया. रजत के भाई विजय, भाभी रेखा और 3 साल का भतीजा यश और स्नेह लुटाते सासससुर सब के साथ तनु का समय बहुत अच्छा बीता था.

बीचबीच में  रिया भी निर्देश देती रहती थी, ‘‘मुंबई आने के लिए कहने की फौर्मैलिटी में मत पड़ना, नहीं तो वहां सब डट जाएंगे आ कर.’’ भरपूर स्नेह और आशीर्वाद के साथ दोनों परिवार उन्हें एअरपोर्ट तक छोड़ने आए.

तनु ने मुंबई पहुंच कर रजत के साथ नया जीवन शुरू किया. रजत के साथ ने उस का जीवन खुशियों से भर दिया. दोनों सुबह निकलते रात को आते. वीकैंड में ही दोनों को थोड़ी राहत रहती. सुबह लताबाई आ कर घर का सारा काम कर जाती. तनु फटाफट किचन का काम देखते हुए तैयार होती. 2 जनों का काम ज्यादा नहीं था पर रात को लौट कर किचन में घुसना अखर जाता.

रजत ने कई बार कहा भी था, ‘‘डिनर के लिए भी किसी बाई को रख लेते हैं.’’

‘‘पर हमारा कोई आने का टाइम तय नहीं है न और फिर घर की चाबी देना भी सेफ नहीं रहेगा.’’

‘‘चलो, ठीक है, मिल कर कुछ कर लिया करेंगे.’’ तनु की रिया से अब भी लगातार चैट चलती रहती थी. रिया उस के आजाद जीवन पर आंहें भरती थी. 5 महीने बीत रहे थे. रजत को 1 हफ्ते की ट्रैनिंग के लिए सिंगापुर भेजा जा रहा था. उस ने कहा, ‘‘अकेली कैसे रहोगी? लखनऊ से मातापिताजी को बुला लेते हैं…वैसे भी अभी तक घर से कोई नहीं आया.’’

‘‘नहीं, अकेली कहां, रिया का बहुत मन कर रहा है आने का, वह आ जाएगी… मातापिताजी को तुम्हारे लौटने के बाद बुला लेंगे,’’ तनु ने अपनी तरफ से बात टालने की कोशिश की तो रजत मान गया.

तनु ने मौका मिलते ही रिया को फोन किया, ‘‘अपना प्रोग्राम पक्का रखना, कोई बहाना नहीं.’’

‘‘अरे, पक्का है. मैं पहुंच जाऊंगी. मुझे भी इस भीड़ से छुट्टी मिलेगी. तेरे पास शांति से रहूंगी 1 हफ्ता.’’

जिस दिन रजत गया, उसी दिन शाम तक रिया भी मुंबई पहुंच गई. दोनों सहेलियां गले मिलते हुए चहक उठी थीं. बातें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं. देर रात तक रिया के किस्से चलते रहे. सासससुर की बातें, देवरननदों में हंसीमजाक के किस्से, रिश्तेदारों के फंक्शनों के किस्से.

अगले दिन तनु ने छुट्टी ले ली थी. दोनों खूब घूमीं, मूवी देखी, शौपिंग की, रात को ही घर वापस आईं.

रिया ने कहा, ‘‘हाय, ऐसा लग रहा है दूसरी दुनिया में आ गई हूं. तेरे घर में कितनी शांति है तनु, दिल खुश हो गया यहां आ कर.’’

तनु मुसकरा दी, ‘‘अब थक गई हैं, सोती हैं. कल औफिस जाऊंगी, शाम को जल्दी आ जाऊंगी. सुबह मेड आ कर सब काम कर देगी, अपने टिफिन के साथ तेरा खाना भी बना कर रख दूंगी, आराम से उठना कल.’’

अगले दिन सब काम कर के तनु औफिस चली गई. बारह बजे रिया का फोन आया, ‘‘तनु, क्या बताऊं, मजा आ गया अभी सो कर उठी हूं, कितनी शांति है तेरे घर में, कोई आवाज नहीं, कोई शोर नहीं.’’

थोड़ी देर बातें कर रिया ने फोन काट दिया. तनु सुधा को भी रिया के आने का प्रोगाम बता चुकी थी. सुधा ने कहा था, ‘‘कितने अच्छे लोग हैं, बहू को आराम से 1 हफ्ते के लिए फ्रैंड से मिलने भेज रखा है, फिर भी रिया कद्र नहीं करती उन का.’’

रिया ने आराम से फ्रैश हो कर खाना खाया, टीवी देखा, फिर सो गई. शाम को तनु आई तो दोनों ने चाय पीते हुए ढेरों बातें कीं. रिया की बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं.

अचानक रिया ने कहा, ‘‘तू भी तो बता कुछ…कुछ किस्से सुना.’’

‘‘बस, किस की बात बताऊं, हम दोनों ही तो हैं यहां, सुबह जा कर रात को आते हैं, पूरा हफ्ता ऐसे ही भागतेदौड़ते बीत जाता है, वीकैंड पर ही आराम मिलता है. घर में तो कोई बात करने के लिए भी नहीं होता.’’

‘‘हां कितनी शांति है यहां. वहां तो घर में घुसते ही सासूमां चाय, नाश्ता, खाने की पूछताछ करने लगी हैं. मैं तो थक गई हूं वहां. आए दिन कुछ न कुछ चलता रहता है.’’

तनु आज अपने ही मनोभावों पर चौंकी. उस ने दिल में एक उदासी सी महसूस की. उस ने रिया की बातें सुनते हुए डिनर तैयार किया, बीचबीच में रिया के पति और उस के सासससुर फोन पर बातें करते रहे थे.

दोनों जब सोने लेटीं तो दोनों के मन में अलगअलग तरह के भाव उत्पन्न हो रहे थे. रिया सोच रही थी वाह, क्या बढि़या लाइफ जी रही है तनु. घर में कितनी शांति है, न कोई शोरआवाज, न किसी की दखलंदाजी कि क्या खाना है, कहां जाना है, अपनी मरजी से कुछ भी करो. वाह, क्या लाइफ है. उधर तनु सोच रही थी रिया इतने दिनों से ससुराल का रोना रो रही है कि काश, वह अकेली रह पाती पर मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा कि अकेले रहने में क्या सुख है? यहां तो हम दोनों के अलावा सुबह बस बाई दिखती है जो मशीन की तरह काम कर के चली जाती है. हमारी चिंता करने वाला तो कोई भी नहीं यहां. मायके में भी हम 3 ही थे, कितना शौक था मुझे संयुक्त परिवार की बहू बन कर हर रिश्ते का आनंद उठाने का. यहां हर वीकैंड में किसी मौल में या कोई मूवी देख कर छुट्टी बिता लेते हैं. घर आते हैं तो थके हुए. कोई भी अपना नहीं दिखता. इस अकेले संसार में ऐसा क्या सुख है, जिस के लिए रिया तरसती रहती है. ऐसे अकेलेपन का क्या फायदा जहां न देवर की हंसीठिठोली हो न ननद की छेड़खानी और न सासससुर की डांट और उन का स्नेह भरा संरक्षण.

दोनों सहेलियां एकदूसरे के जीवन के बारे में सोच रही थीं. पर तनु मन ही मन फैसला कर चुकी थी कि वह कल सुबह ही लखनऊ फोन कर ससुराल से किसी न किसी को आने के लिए जरूर कहेगी. उसे भी जीवन में हर रिश्ते की मिठास को महसूस करना है. अचानक उस की नजर रिया की नजरों से मिली तो दोनों हंस दीं.

रिया ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही थी?’’

‘‘तुम्हारे बारे में और तुम?’’

‘‘तुम्हारे बारे में,’’ और फिर दोनों हंस पड़ीं, पर तनु की हंसी में जो रहस्यभरी खनक थी वह रिया की समझ से परे थी.

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