Vegan Diet को हेल्दी बनाएंगे प्रोटीन से भरपूर ये 5 Food

क्या है वीगन डाइट

वीगन डाइट जिसे वीगानिज़्म भी कहा जाता है, एक ऐसी डाइट है, जिसमें मांस, अंडा, दूध, दही या पशु से बनने मिलने वाले उत्पादों को नहीं खाया जाता. बल्कि वीगन डाइट में सबसे अधिक पेड़पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थों को खाया जाता है.  इस डाइट में कच्चे ऑर्गेनिक आहार का अधिक सेवन किया जाता है. साबुत फल, सब्जियां और अनाज इस डाइट की विशेषता हैं.  इसे शुद्ध शाकाहारी आहार या प्लांट बेस्ड डाइट भी कहा जाता है.

अब ऐसे में सवाल उठता है कि वीगन डाइट में मांस, अंडा, दूध, दही जैसे खाद्य पदार्थ न होने की वजह से प्रोटीन की कमी को कैसे पूरा किया जाए? इस संबंध में पल्लवबिहानी बोल्डफ़िट के फाउंडर ऐसे सुपरफूड्स के बारे में बताएंगे, जिनके सेवन से आप वीगन डाइट को फॉलो करते हुए प्रोटीन का भरपूर सेवन कर सकते हैं.

वीगन डाइट में प्रोटीन के स्रोत –

शाकाहारी लोगों में प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए बहुत से खाद्य उत्पाद हैं.  उच्च गुणवत्ता वाले शाकाहारी प्रोटीन स्रोतों की कमी नहीं है, लेकिन बता दें कि सबसे अधिक सोया से बने उत्पादों में प्रोटीन की मात्रा पाई जाती है. बता दें कि टोफू, दालें, बीन्स, अनाज सभी में प्रोटीन भरपूर मात्रा में होता है.  जैसे-

  • दाल एक कप18 ग्राम प्रोटीन
  • काले राजमा एक कप15 ग्राम प्रोटीन
  • चना एक कप12 ग्राम प्रोटीन
  • 114ग्राम टोफू में 11 ग्राम प्रोटीन
  • क्विनोआ एक कप9 ग्राम प्रोटीन

इसके अतिरिक्त नट, नट बटर, कई प्रकार की फलियों और अनाज में भी प्रोटीन पाया जाता है. वीगन डाइट में प्रोटीन की कमी पूरी करने के लिए वेजीटेरियन प्रोटीन पाउडर या वेगन प्लांट प्रोटीन का भी स्मूदी में मिलाकर सेवन किया जा सकता है. इसमें कार्ब की मात्रा बहुत कम होती है, शुगर शून्य के बराबर और यह कीटो फ्रेंडली भी होता है.

वीगन डाइट के लिए प्रोटीन से भरपूर 5 सुपरफूड्स –  

आपने सुना होगा कि वीगन डाइट को फॉलो करने के दौरान प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ या मल्टी विटामिन्स से भरपूर डाइट लेना जरूरी होता है. आइए जानते हैं वीगन डाइट के लिए प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ कौन से हैं.

टोफू टोफू पनीर या चीज का वीगन स्वरूप है.  टोफू डेयरी उत्‍पादों के बेहतरीन विकल्‍प के रूप में इस्‍तेमाल होता है.  हालांकि इसका स्‍वाद पनीर से थोड़ा अलग होता है. प्रोटीन से भरपूर टोफू का इस्‍तेमाल कई व्‍यंजनों को बनाने में किया जा सकता है. वीगन डाइट में टोफू को शामिल करके आप प्रोटीन की कमी को आसानी से दूर कर सकते हैं. इसके अलावा टोफू में अमीनो एसिड के नौ सभी जरूरी तत्‍व शामिल होते हैं.  इसमें आयरन, कैल्शियम और कई मिनरल्स जैसे मैंगनीज और फास्फोरस होता है. टोफू मैग्नीशियम, कॉपर, जिंक और विटामिन बी1 से भी भरपूर होता है.  ये सभी मल्टीविटामिन शरीर को सुचारू रूप से चलाने में मदद करते हैं.

फ्लैक्सीड्स–  फ्लैक्सीड्स यानि अलसी के बीज.  फ्लैक्सीड्स प्रोटीन, फाइबर और ओमेगा -3 फैटी एसिड से भरपूर होते हैं. फ्लैक्सीड्स को दिनभर में किसी भी वक्त स्नैक्स के रूप में या स्मूीदी में मिलाकर या डेजर्ट के रूप खा सकते हैं. ये न सिर्फ कुछ समय के लिए भूख को शांत करेगा बल्कि इससे शरीर को आवश्यक प्रोटीन भी प्राप्त होता है. 100 ग्राम फ्लैक्सीड्स में 18 ग्राम प्रोटीन शामिल होता है. इसके अलावा इसमें विटामिन बी1, विटामिन बी6, फोलेट, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, फास्फोरस,पोटेशियम जैसे शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व शामिल होते हैं.

दाल हम सभी जानते हैं कि दालों में उच्‍च मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है. दाल चावल भारत में दोपहर के भोजन में बहुत मशहूर हैं. इसके सेवन से आप पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन का सेवन करते हैं. दालें कई प्रकार की हैं आप अपनी पसंद के मुताबिक किसी भी दाल का सेवन करके प्रोटीन की कमी को दूर कर सकते हैं.  इसके अलावा इनमें कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, आयरन, सेलेनियम और फोलेट होता है, जोकि शरीर को आवश्यक पोषण देने का काम करता है.

बीन्स  अगर आप वीगन डाइट को खास बनाने के लिए कुछ अलग सोर्स की तलाश कर रहे हैं तो बीन्स से बेहतर कुछ नहीं. राजमा, काले चने, छोले, इनमें से किसी को भी उबाल कर सलाद के तौर पर खाया जा सकता है. ये ना सिर्फ प्रोटीन से भरपूर होते हैं बल्कि ये एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो कि शरीर में फ्री रेडिकल्स के प्रभाव से लड़ते हैं , इसके अलावा इनमें फोलेट, आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम,फाइबर जैसे आवश्यक तत्व भी होते हैं.

एडामे: एडामे एक प्रकार की फली है, जिसमें सोयाबीन पाया जाता है.  ये फली भी मटर के समान दिखती है और हरी सब्जियों के परिवार से संबंधित है. यह एशिया और जापान में बहुत लोकप्रिय है. एडामे को उबालकर इसमें और थोड़ा नमक डालकर और अपनी पसंद के कई तरह के मसालों को मिलाकर इसे खाया जाता है. एडामे में उच्च स्तर का प्रोटीन भी होता है जो शरीर के संपूर्ण विकास में मदद करता है. एडामे फोलेट, विटामिन-के और फाइबर से भी भरपूर होता है. कम कैलोरी होने के कारण ये न सिर्फ वजन घटाने, बल्कि कॉलेस्ट्रॉफल को नियंत्रि‍त करने और कैंसर से लड़ने में भी मददगार साबित होता है.

ऐसी स्थिति में जरूरी होते हैं सप्लीमेंट्स

आमतौर पर देखा गया है कि वीगन डाइट फॉलो करने वाले लोगों में विटामिन बी 12, विटामिनडी, आयोडीन, ओमेगा-3डीएचए और ईपीए, विटामिन के2, जिंक, सेलेनियम, मैगनीशियम की कमी हो जाती है.  ऐसे में लोगों को प्रोटीन और अन्य विटामिन्स से भरपूर खाद्य पदार्थ लेने की सलाह दी जाती है, लेकिन किन्हीं कारणों से जब खाद्य पदार्थों के माध्यम से विटामिन और मिनरल्स की कमी पूरी नहीं होती तो उन्हें वीगन एसेंशियल न्यूट्रिशन से भरपूर सप्लीमेंट्स लेने की सलाह दी जाती है.

औरत को पुरूष की जरुरत नहीं- टीवी एक्ट्रेस गौरी प्रधान

‘नूरजहां’,‘कुटुंब’,‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’,‘मेरी आषिकी तुमसे’ और ‘तू आषिकी’ जैसे सीरियलों की चर्चित अदाकारा गौरी प्रधान अपने 25 वर्ष के अभिनय कैरियर के बाद अब पहली बार फिल्म ‘‘ ए विंटर टेल एट शिमला’’ में अभिनय करते हुए नजर आने वाली हैं,जो कि मैच्योर प्रेम कहानी के साथ ही नारी अस्मिता,नारी के सपनों,पति की पितृसत्तात्मक सोच से लेकर नारी उत्थान की बात करती है.

आर्मी बैकग्राउंड में पली बढ़ी और 2000 में सीरियल ‘नूरजहां’ से अभिनय कैरियर की शुरूआत करने वाली गौरी प्रधान की दूसरे सीरियल ‘कुटुंब’ की शूटिंग के दौरान अभिनेता हितेन तेजवानी से मुलाकात हुई. और दोनो ने 2004 में शादी कर ली. यह गौरी प्रधान की पहली शादी थी,जबकि हितेन तेजवानी की यह दूसरी शादी थी. लेकिन गौरी को हितेन की यह बात पसंद आयी थी कि हितेन ने पहली मुलाकात में ही स्पष्ट कर दिया था कि उनका अपनी पत्नी से ग्यारह माह बाद ही तलाक हो गया था.

बहरहाल,गौरी प्रधान व हितेन तेजवानी की शादी के 19 वर्ष हो चुके हैं. दोनों के जुड़वा बच्चे हैं. गौरी व हितेन दोनों के बीच बराबरी का संबंध है. मगर फिल्म ‘ए विंटर टेल एट शिमला’ में पति पत्नी के बीच बहुत अलग रिश्ता है.

प्रस्तुत है गौरी प्रधान से हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के अंश.

हर इंसान पर उसकी परवरिश का असर होता है. आपकी परवरिश आर्मी पृष्ठभूमि में हुई. तो फिर कला से नाता कैसे बना? –

मैं बचपन से ही बहुत ही ज्यादा कलात्मक व रचनात्मक रही हॅूं. मेरी रूचि पेंटिंग, ड्ाइंग, स्कैचिंग आदि में रही है. इसके अलावा मेरे माता पिता ने मुझे हमेषा छूट दी. मैने जो करना चाहा,उसमें कभी रोक टोक नहीं की. उनकी एक ही शर्त थी कि मुझे अपनी पढ़ाई पूरी करनी है. इसलिए मैंने पढ़ाई पूरी करने के बाद ‘मिस इंडिया’ मंे हिस्सा लिया. उसके बाद मुंबई आकर में माॅडलिंग कर रही थी. माॅडलिंग से बोर होकर मैं पुनः पुणे वापस जाकर उच्च षिक्षा हासिल करना चाहती थी. उससे दो दिन पहले ही एक पार्टी में किसी ने मुझे देखा और उन्होने मुझसे कहा कि दूरदर्षन के लिए ‘नूरजहां’ नामक सीरियल बन रहा है.

निर्माता अब तक दो सौ लड़कियों का आॅडीशन ले चुके हैं,पर नूरजहां के लिए सही लड़की नही मिली. उस इंसान की सलाह पर मैने आॅडीशन दिया और मेरा चयन हो गया. यह दूरदर्षन और बीबीसी का कोलेब्रेशन था. इसे उर्दू और अंग्रेजी में बनाया गया था. इसके लिए हमें उर्दू भाषा की ट्ेनिंग भी दी गयी. हम हर सीन की षूटिंग पहले उर्दू में और फिर अंग्रेजी में करते थे. इस सीरियल में अभिनय करना बहुत अच्छा अनुभव था. इस तरह मेरे अभिनय कैरियर की षुरूआत हुई.

 

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आपके कैरियर के टर्निंग प्वाइंट्स क्या रहे?

पहला टर्निंग प्वाइंट तो सीरियल ‘‘नूरजहां’’ ही था,जिससे मेरे अभिनय कैरियर की षुरूआत हुई थी. उसके बाद जब मैने ‘बालाजी’ के लिए सीरियल ‘कुटुंब’ किया,तो यह भी बहुत बड़ा टर्निंग प्वाइंट्स था. इसके बाद टर्निंग प्वाइंट रहा-‘‘क्यांेकि सास भी कभी बहू थी’’,जो कि आठ वर्ष से भी अधिक लंबे समय तक चला था. उसके बाद तो कई सीरियल किए. लेकिन अब मेरे कैरियर में सबसे बड़ा और अहम टर्निंग प्वाइंट फिल्म ‘‘ए विंटर टेल एट षिमला’ है. यह मेरे कैरियर की पहली फिल्म है,जो कि 12 मई को सिनेमाघरों में पहुॅचने वाली है.

आपने 25 वर्ष के अभिनय कैरियर में हमेशा छोटे परदे से जुडी रहीं,तो अब फिल्म ए विंटर टेल एट षिमलाकरने की क्या खास वजह रही?

-सच तो यही है कि मुझे टीवी पर इतना काम मिल रहा था कि मेरे पास कुछ और सोचने का वक्त ही नहंी था. ऐसा नही है कि मुझे फिल्मों के आफर नही मिल रहे थे,मिल रहे थे,पर मेरेे पास वक्त नही था. 11 नवंबर 2009 को जब मै एक बेटे व एक बेटी की जुड़वा मां बनी,तो मैने चार वर्ष का ब्रेक लिया था. क्योंकि मुझे अपने बच्चों पर ध्यान देना था. 2019 तक टीवी में व्यस्त रही. फिर कोविड के कारण सभी को ब्रेक लेना पड़ा. उसी दौरान मेरे पास योगेश वर्मा जी अपनी फिल्म ‘‘ए विंटर टेल एट षिमला’’ का आफर लेकर आ गए. अमूमन हर फिल्म पुरूष प्रधान होती हैं. मगर यह फिल्म नारी प्रधान फिल्म है. पूरी फिल्म के केंद्र में नारी व उसकी सोच है.

जब मैने पटकथा व किरदार सुना,तो मुझे लगा कि यह फिल्म मेरे लिए ही लिखी गयी है. इसलिए मंैने इस फिल्म को करने का फैसला लिया. यह फिल्म वैदेही के बारे में है.

अपने किरदार को लेकर क्या कहना चाहेंगी?

-मैने इसमें वैदेही का किरदार निभाया है,जो कि डीआईजी यानी कि पुलिस अफसर की पत्नी है. उसकी अपनी बेटी है. कभी उसे चिंतन नामक युवक से प्यार हुआ था,पर कुछ कारणों से चिंतन के संग विवाह नहीं हो पाया था. वैदेही अपनी पारिवारिक जिंदगी में मस्त है. लेकिन बीस वर्षों बाद जब फिर से चिंतन की उसकी मुलाकात होती है,तो उसे अहसास होता है कि वास्तव में उसकी जिंदगी क्या बनकर रह गयी है. वह तो अपने पति के लिए महज ‘सेक्स गुलाम’ ही है. तो फिल्म की षुरूआत से अंत तक वैदेही की ही कहानी चलती है.

फिल्म में दो अलग अलग वैदेही हैं. एक युवा वैदेही है,जिसका किरदार एक अन्य लड़की ने निभाया है. यह फुल आफ लाइफ व फन लविंग है. मगर दूसरी वैदेही षादी के बाद की है,जिसे मैंने निभाया है. इस वैदेही को परिस्थितियों ने गढ़ा है. उसकी आदतें बदलती हैं, उसका व्यक्तित्व बदलता है. उसके पति की वजह से उसकी जिंदगी से ‘फन लिविंग’ जा चुका है. अब वह समझौतावादी और त्याग करने वाली नारी बन चुकी है. अब उसके लिए पति की खुशी ही उसकी खुशी बन चुकी है.

युवावस्था में वह बहुत रचनात्मक हुआ करती थी, जो कि अब उसकी जिंदगी से गायब हो चुकी है. अब उसे भी अहसास है कि उसका व्यक्तित्व बहुत बोरिंग हो गया है. पर जब फिर से चिंतन मिलता है,तो वैदेही को अहसास दिलाता है कि उसने क्या खो दिया है. तब वह कैसे अपने आपको पुनः बदलती है और जकड़न से खुद को छुड़ाती है.

हर लड़की शादी के बाद अपने परिवार को संभालने के लिए समझौते करते हुए खुद को बदलती है. ऐसा ही वैदेही के साथ हो रहा था या कोई अन्य वजह रही?

-वैदेही को अपनी बेटी की खतिर समझौते करने पड़ते हैं. उसका पति नामचीन इंसान है. डीआईजी है. लेकिन इंसान के तौर पर वह बेहतर इंसान नही है. वैदेही ने अपनी जिंदगी के जो सपने देखे थे,उससे उसके पति का दूर दूर तक कोई नाता नही है. इसलिए वह अपनी जिंदगी में बहुत मायूस हो गयी है. अब उसकी जिंदगी पति की सुविधाओं का ध्यान रखना,घर को संवारने,पेड़ पौधों की देखभाल करने में ही गुजरने लगी है. इसके अलावा अब उसकी जिंदगी में कुछ बचा नही है. यह सब वह सिर्फ अपनी बेटी के लिए कर रही है. वह चाहती है कि पति की रिप्युटेशन खराब न हो और बेटी को हर सुविधा व अच्छी षिक्षा मिल सके,यही अब उसका मकसद है.लेकिन चिंतन उसे अहसास दिलाता ैहै कि वह अपनी जिंदगी मंे क्या ‘मिस’ कर ही है,तब वह बदलती है.

 

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फिल्म के ट्रेलर में एक संवाद है जहां वैदेही अपने पति से कहती है कि उसने उसे सेक्स स्लेवबना रखा है. यह क्या है?

-इस बारे में सब कुछ बताना उचित नही है,फिल्म देखें तो समझ में आएगा.  सेक्स स्लेव वह अपने पति को कहती है. उसके पति के लिए वह रात में महज ‘सेक्स’ के लिए यानी कि ‘भोग्या’ है. कहने का अर्थ यह कि वैदेही का पति उसे ‘सेक्स स्लेव्स’ की ही तरह उपयोग करता है. उसके पति ने उसे एक ‘ट्ाफी वाइफ’ बनाकर रख दिया है. वह डीआईजी है,इसलिए अपने अफसरों के सामने या पार्टीयों में अपनी पत्नी को ट्राफी की तरह लेकर जाए,लोगों को दिखाए. इसके अलावा वैदेही की उसके पति की जिंदगी में कोई महत्व नही है. उसके पति ने उससे महज इसीलिए शादी की है और बेटी पैदा की है. यही उसका काम है.

तो फिल्म ‘‘ए विंटर टेल एट शिमला’’ में पितृसत्तात्मक सोच व नारी स्वतंत्रता की बात की गयी है?

-मेरी समझ से पितृसत्तात्मक सोच बहुत पुराना ख्याल हो गया. अब यह बात सभी की समझ में आ गयी है कि पुरूष जो काम कर सकता है, वह काम नारी नही कर सकती. अब तो औरतें हर क्षेत्र में बढ़चढ़कर हिस्सा ले रही हैं. महिलाएं एथलिट भी हैं,घर की जिम्मेदारी भी संभालती हैं. सेना में भी नौकरी करते हुए दुष्मनों के दांत खट्टे कर रही हैं. क्या आप वायुसेना की जांबाज सिपाही गुंजन सक्सेना की दिलेरी को किसी पुरूष से कम आंक सकते हैं? सिक्किम की पुलिस अफसर इक्षा केरूंग को कौन नही जानता. मेरी कॉम को कम आंक सकते हैं.

अब औरतें उद्योगपति हैं,राजनेता हैं. सब कुछ हैं. कुछ मौकों पर आप शारीरिक ताकत के मामले में भले ही कम आंक सकते हैं,पर इसकी मूल वजह यह है कि औरतें हमेशा भावुक होती हैं. आज की औरतें ज्यादा आत्मनिर्भर हैं. वह जो हासिल करना चाहती हैं,उसे हासिल कर लेती हैं.

हमारी इस फिल्म में मूल मुद्दा यह है कि पति महज अपनी अकड़ व अपने स्वाभिमान के चलते अपनी पत्नी की भावनाओं, उसकी इच्छा,उसके सपनों की कद्र करने की बजाय उन्हे दबाता है. यह सब आज भी हमारे समाज में महज छोटे परिवारों,छोटे शहरों या गांवो की ही नहीं,बल्कि बड़े घरानों व उच्च पदस्थ पुरूषों की वस्तुस्थिति है. अपने साथ ‘शो पीस’ की तरह अपनी पत्नी को पार्टी में ले जाना किसी भी पुरूष की महानता नहीं हो सकती. मैं नारी उत्थान की बात करने की बजाय पुरूष और नारी दोनों को समान रूप से देखने की बात करती हूं.

वुमन इम्पावरमेंट तभी आता है. जिस दिन हर पुरूष, औरत के साथ बराबरी का व्यवहार करने लगेगा, उस दिन वुमन इम्पावरमेंट की जरुरत ही नहीं पड़ेगी. जहा तक हमारी फिल्म ‘‘ए विंटर टेल एट शिमला’’ में ओमन इम्पावरमेंट का मुद्दा बहुत अलग तरीके से उठाया गया है. फिल्म में जब वैदेही को अहसास होता है कि वह अपनी जिंदगी से समझौता क्यों कर रही है? उसे समझौते करने की जरुरत नही है. जब उसे पुनः अहसास होता है कि वह खुद भी रचनात्मक व प्रतिभाशाली नारी है.

वह स्वतंत्र तरीके से जिंदगी जी सकती है. वह महज अपनी बेटी के कारण एक रिश्ते में बंधी हुई है,तो बेटी के सेटल होने के बाद वह अपनी जिंदगी जीने के लिए स्वतंत्र है. यदि कोई औरत स्वतंत्र है,आत्म निर्भर है,तो उसे पुरूष की जरुरत नही होती. वह अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीते हुए खुश रह सकती है. फिल्म में जब वैदेही की बेटी खुद अपनी मां के लिए खड़ी होती है,तो वहां भी वुमन इम्पावरमेंट’ की बात सशक्त तरीके से कही गयी है. इस पूरे वाकिए को फिल्म में देखेंगें, तो ही बेहतर होगा.

हाल ही में मैने एक दिग्गज अभिनेत्री से बात की थी,उनका मानना है कि हर नारी को जिंदगी में किसी न किसी मोड़ पर पुरूष की जरुरत पड़ती ही है?

-सभी का अपना नजरिया होता है. मैं ऐसा नही मानती. मैने पहले ही कहा कि आज की तारीख में जो काम पुरूष कर सकता है,वह सारे काम औरत भी कर रही है. ऐसे में किसी औरत को पुरूष की कहीं जरुरत नजर नहीं आती. इमोशनल सपोर्ट के लिए भले ही पुरूष की जरुरत हो सकती है,पर वह पर्सन टू पर्सन निर्भर करता है. लेकिन अन्य किसी भी बात के लिए नारी को पुरूष की जरुरत नही होना चाहिए.

 

 

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निजी जिंदगी में क्या आपके पति और आपके बीच बराबरी का मसला है?

जी हां!देखिए,मैने पहले ही बताया कि मुझे टीवी इंडस्ट्री से ही मेरा पति मिला. मेरे पति हितेन तेजवानी अभिनेता है. हम देानों ने एक साथ टीवी सीरियल ‘कुटुंब’ में अभिनय किया था और एक दूसरे के करीब आए थे. 2004 में हमने विवाह किया. पर मैने अभिनय करना जारी रखा. 2009 में मैं एक बेटे व एक बेटी यानी कि जुड़वा बच्चों की मां बनी. तब मैने स्वयं चार वर्ष केवल अपने बच्चों को देने का निर्णय लिया था. अन्यथा लगातार अभिनय कर रही हॅूं. मैं अपने शौक को पूरा करते हुए ‘पोर्सलीन पेंटिंग’ भी करती हॅूं. मेरे पति मुझे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने के लिए पूरी छूट देते हैं. हम दोनों मिलकर एक दूसरे की जिंदगी आदि को लेकर निर्णय लेते हैं. हर निर्णय हम दोनों मिलकर ही लेते हैं.

निजी जिंदगी में आप एक बेटे व एक बेटी की मां है. फिल्म में भी आप एक बेटी की मंा वैदेही के किरदार में हैं. किसी दृष्य के फिल्मांकन के दौरान आपको अपनी निजी जिंदगी की कोई घटना याद आयी थी?

-ऐसा नही हुआ. इसकी वजह यह है कि निजी जिंदगी में मेरी बेटी बहुत छोटी है. जबकि फिल्म में बेटी किषोरावस्था में पहुच चुकी है. उसका अपना प्रेमी है. मतलब वह ज्यादा उम्र की है. तो फिल्म के अंदर मां बेटी के बीच जिस तरह की बातें होती हैं,वैसी बाते अभी तक निजी जिंदगी में मेरी बेटी के साथ मेरी नही हुई हैं. लेकिन जब मेरी बेटी उस उम्र की हो जाएगी,तो मैं उसके साथ उस तरह की बाते जरुर करना चाहूंगी. हमारी इस फिल्म में वैदेही और उाकी बेटी के बीच जिस तरह के रिष्ते का चित्रण है,वैसा रिष्ता अभी तक किसी भी फिल्म में मां बेटी के बीच नहीं दिखाया गया है. बहुत ही मीठा रिष्ता है. दोनों एक दूसरे को समझते हैं. फिल्म में बेटी को जब अपनी मां की जिंदगी में कुछ गलत लगता है,तो वह अपनी मां से कहती है. उसी तरह मां भी अपन बेटी से हर बात कहती है. मैं खुद निजी जीवन में अपनी बेटी के साथ उसी तरह का रिष्ता रखना चाहूंगी.

 

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आप लोग दावा कर रहे हैं कि इस फिल्म में क्लासिक प्यार की बात की गयी है. पर जिस तरह से समाज बदला है, उसमें तो अब प्यार काफी डे से षुरू होता है और काफी डे पर ही जाकर खत्म हो जाता है?

-जी हां! समाज में ऐसा ही हो रहा है. पर हम लोगों को बताना चाहते है कि ‘काफी डे से शुरू और काफी डे पर खत्म होने वाला प्यार’ हकीकत मे प्यार नही है. वह तो महज एक आकर्षण का नतीजा है. यह आकर्षण अलग अलग लड़की व लड़के के बीच उनकी अपनी सोच के चलते अलग अलग हो सकता है. वर्तमान में जो कुछ हो रहा है, उसकी एक वजह यह भी है कि आज औरतें आत्मनिर्भर हो गयी हैं, उन्हें पुरूषों की जरुरत नही है. आज हर लड़की व औरत को उनके हिसाब से, उनकी शर्तों पर प्यार मिलता है, तो उन्हे चाहिए, अन्यथा नही चाहिए.

सोशल मीडिया पर आप कितना सक्रिय हैं?

पहले मुझे सोशल मीडिया पसंद नहीं था,पर अब थोड़ा बहुत सक्रिय हो गयी हूं. आज की तारीख में कलाकार के लिए सोशल मीडिया पर रहना अनिवार्य सा हो गया है.

मेरी स्किन टोन डार्क है, मुझे समझ नहीं आता मैं किस रंग की लिपस्टिक लगाऊं, कृप्या सलाह दें?

सवाल

मेरा रंग सांवला है और मुझे सम नहीं आता मैं किस रंग की लिपस्टिक लगाऊं जो मु पर सब से ज्यादा समय सुंदर लगे?

जवाब

सांवला रंग आजकल ज्यादा पसंद किया जाता है. इसे सैक्सी और ग्लैमरस कहा जाता है. ऐसे रंग पर ब्राइट रैड कलर की लिपस्टिक बहुत अच्छी लगती है. आप चाहें तो औरेंज और फुसिआ लिपस्टिक भी लगा सकती हैं. सावले रंग पर डीप ब्राउन जैसेकि सिनेमन व चौकलेट ब्राउन लिपस्टिक बहुत अच्छी लगती हैं. रोज पिंक से ले कर मोव तक सभी अच्छी लगती हैं. मैरून वाली भी अच्छी लगती है पर ब्राउनी मैरून को अवौइड करें. पर्पल शेड वाली लिपस्टिक सांवले रंग पर भी अच्छी लगती है, लेकिन डीप पर्पल लिपस्टिक को अवौइड करें. सांवले रंग पर न्यूड शेड की लिपस्टिक को अवौयड करने चाहिए.

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सवाल

मेरी उम्र 32 साल है. मेरे पैरों की स्किन पर कई जगह काले धब्बे हैं. इन्हें रिमूव करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

उम्र की मैच्योरिटी के साथ स्किन के रिजुविनेशन होने की क्षमता कम होती जाती है और सनलाइट के अधिक कौंटैक्ट में आने के कारण स्किन में लेंटिगो सोलारिस नामक छोटेछोटे धब्बे बनने लगते हैं. ये स्पौट हलके भूरे रंग से काले रंग के होते जाते हैं. हालांकि हारमोनल उतारचढ़ाव के कारण भी चेहरे पर दागधब्बे पैदा हो जाते हैं. सनलाइट के अधिक कौंटैक्ट में आने पर ऐस्ट्रोजन और प्रोजेस्टोरोन हारमोन स्किन को मैलेनिन के अत्यधिक उत्पादन को प्रेरित करते हैं. जिस कारण स्किन पर धब्बे पड़ जाते हैं. इन धब्बों को हटाने के लिए पपीते के टुकड़ों को पीस कर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को काले धब्बों पर लगा कर सूखने के लिए छोड़ दें. पेस्ट के सूखने के बाद त्वचा को पानी से धो लें या आलू को छोटे टुकड़ों में काट कर थोड़ा भिगो लें. उन टुकड़ों को कद्दूकस कर लें. फिर उस में शहद मिला कर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को अपने काले धब्बों पर 10 से 20 मिनट तक लगा कर रखें. इस के बाद अपनी स्किन को कुनकुने पानी से धो लें.

समस्याओं के समाधान

ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.

गुलदस्ता- भाग-3: गलत पते पर आखिर क्यों गुलदस्ता आता था?

अचानक अमन को कुछ याद आया, ‘‘उठ ही गया हूं तो चल के उस फूल वाले को पकड़ते हैं पहले. भेजने वाले का हुलिया पता करते हैं, वह कब आता है उस के पास… पुलिस की धमकी दे कर उगलवाते हैं. वैसे भी कोई बदमाश हो सकता है. फिर कोई कांड ही न हो जाए लड़की के साथ और हम सोचते रहें कि पहले क्यों नहीं ध्यान दिया. चलचल…’’

‘‘यार अभी भी खोजबीन में लगा रहता है. तुझे तो सीबीआई, विजिलैस में होना चाहिए था या समाज सुधारक एनजीओ का बाबाजी. फूल देतेदेते तुझे कहीं प्यारव्यार तो नहीं हो गया उस से जो इतना कंसर्न दिखा रहा है अब समझ, सही में तू…’’ संचित हंसा.

‘‘बकवास मत कर… चल उठ.’’

‘‘देख बता दे कुछ गलत नहीं होता यह जैसा तेरे दिमाग में भरा हुआ है… प्रेम, प्यार, आकर्षण यह तो नैचुरल इंस्टिंग्ट है, मानव की प्रकृति है. अगर किसी के साथ अच्छा महसूस होता है, कोई अच्छा लगता है तो यह नौर्मल बात है. मर्द या औरत की इस में कोई तौहीन नहीं, यह लज्जा का विषय नहीं न ही जबरदस्ती का. यार समझ समझकर थक गया तुझे…’’

‘‘बाबाजी मत बन… बस चल उठ.’’

‘‘मूवी के लिए लेट हो जाएंगे…’’

‘‘अगला शो देखते हैं न… पहले चल…’’

‘‘तुझे परेशानी क्या है अंकलआंटी को पसंद है और जहां तक मैं समझ रहा हूं तुझे भी…’’

दोनों बाइक से निकल पड़े एक फूल वाले से दूसरे फूलवाले…

‘‘यार पास के फूल वाले तो यही 2-3 हैं… यहां तो कोई दूसरा ही बैठा है.’’

‘‘अरे घर चल तैयार हो मूवी के लिए निकलते हैं… तू बेकार के चक्करों में पड़ा हुआ है.

‘‘भेजने वाला बड़ा चालाक है. शायद पीछे वाली कालोनी से लाता होगा कि पता न चले…’’ उस ने बाइक घुमा ली.

‘‘वह देख फूल वाला उधर…’’ संचित ने दिखाया.

‘‘देखा मिल गया न… वही है…’’ अमन खुश हुआ.

‘‘साहब आप? गुलदस्ता चाहिए कि ये

ताजे गुलाब… अभी लाया ही हूं… बिलकुल ताजाताजा हैं.’’

‘‘पहले बताओ कि कौन है जो तुम्हें

40 नंबर में फूल भिजवाता है तुम से? कहां से आता है? सवारी से आता है या पैदल? कैसा दिखता है, क्या पहनता है? पैंट, जींस या निकर? तुम से कहा था न उस का पता पूछ के रखना…’’

‘‘साहबजी पूछा था पर उन्होंने बताया नहीं…’’ वह घबरा कर इधरउधर देखने लगा.

‘‘झठ… उस के साथ मिल कर कुछ कांड करने वाले हो? मैं पुलिस में खबर दे दूंगा वरना सच सच बता दो.’’

‘‘नहींनहीं साहबजी ऐसा मत करना… वह वैसा बिलकुल नहीं पर उन्होंने कुछ भी बताने को मना किया है साहबजी,’’ वह हाथ जोड़ने लगा.

‘‘कितने पैसे दिए हैं बदमाश ने तुम्हें?’’

‘‘गुलदस्ते के पैसों के अलावा हजार रुपये महीना… एडवांस,’’ वह डर गया.

‘‘देखा, शातिर बदमाश है फिर तो… देखा लड़कियों को जाल में कैसे फांसते हैं लोग…’’ अमन ने संचित को देखते हुए कहा.

‘‘छोटे बाल हैं या बड़े?’’ फूल वाले लड़के से पूछा.

‘‘लंबे… पोनी… कभी खुले.’’

‘‘मतलब मौर्डन मजनू… पूछा न, पैंट, निकर, जींस क्या पहनता है?’’

‘‘इन में से कुछ नहीं साहब… छोड़ो न साहब दर्द हो रहा है.’’

‘‘मतलब?’’ वह उस की बाजू कस के पकड़े हुए था.

‘‘वह तो सलवार, कभी चूड़ीदार… चुन्नी.’’

‘‘अबे मतलब लड़की… खोदा पहाड़ निकली चुहिया…’’ संचित अमन की पीठ पर कस कर धौल जमाते हुए जोर से हंस पड़ा.

‘‘मगर सवाल यह है कि लड़की एक लड़की को हर हफ्ते फूल क्यों भेजेगी?’’

‘‘दोस्त होगी… सता कर सरप्राइज करना चाहती होगी और क्या… अब चल बस… आज पहली है तीसरी को अंजू आ जाएगी… इसी संडे देख सकते हैं यार.’’

‘‘दोस्त नहीं, पूरा गैंग होगा इन का जिस में लड़कियां भी शामिल होंगी और

वह मैडम अकेले रहती है कुछ बुरा न हो जाए उस के साथ… पैसे देने कब आती है?’’ अमन ने लड़के से फिर पूछा.

‘‘आज ही तो साहब… पहली तारीख को… लो वह आ गईं दूर… काला चश्मा लगाए हुए.’’

‘‘बहुत खूब… सूरत,’’ संचित के मुंह से निकल ही गया. अमन ने घूर कर देखा और संचित को पेड़ों के ?ारमुट के पीछे खींच लिया. शर्म कर, भाभी का तो खयाल किया कर… श… श… मुझे समझने दे…’’

‘‘हां भाभी…’’ संचित ने शरारत से आ

रही लड़की की ओर इशारा किया. तो उस ने

फूल वाले और संचित दोनों को चुप रहने का इशारा किया.

‘‘लड़की पास आ गई तो अमन हैरान हो गया. यह तो 40 नंबर वाली ही लड़की है… उसे कोई धोखा तो नहीं हो रहा,’’ अमन संचित के कान में फुसफुसाया.

फिर वह हिम्मत कर के किसी इंस्पैक्टर की तरह अकड़ कर बाहर निकल आया, ‘‘यह क्या माजरा है मैडम?’’

अमन को अचानक सामने देख कर थोड़ा सकपका गई थी. पहली बार अमन का यह रूप देखा था. यह क्या बात है. नजरें मिलीं तो अमन की रहीसही अकड़ फिर जाती रही.

वह नजरें चुराने लगा तो आराधना मुसकराते हुए शरारत से बोली, ‘‘अपनी दोस्त रिनी से कई बार आप के बारे में बातें हुईं, बहुत तारीफें भी की थीं मैं ने आप की, आप की शराफत और शरमीले स्वभाव की.’’

‘‘मगर आप तो… वह गरीब… हटी हुई?’’

‘‘उसी ने आप से ये सब झठ कहने के लिए कहा था… वह सच में गरीब है पर दिमाग, दिल, दौलत में कतई अमीर, अलबत्ता जहीन शायर भी है. एक दिन जब पहली बार उस ने आप को देखा, फिर क्या, अपना फड़कता शेर उस की जबान पर मचल उठा कि निगाहें नीची ही रखते हैं जो कभी बात भी नहीं करते, काश उन के हाथ कभी मुझे पेश दस्ता ए गुलाब करते.

‘‘बस मेरी सहेली रिनी ने आप को देख कर आह भरते हुए मजाक में कुछ यों शेर पढ़ा तो मेरे दिल में आप के लिए दबा प्यार बाहर आ ही गया. मैं ने भी उस से शेर के अंदाज में ही शर्त लगा डाली कि गुलाब क्या 10 गुलदस्ते भी उन से ले कर दिखा दूंगी. बातें भी करूंगी उन से, कुछ अपनी बातें भी बना लूंगी.’’

‘‘फिदा तो मैं पहले ही थी जनाब की शराफत पर, आंटीअंकल की मंशा जान कर मेरा हौसला और बढ़ गया. बस मैं ने ठान लिया कि हाथ थामूंगी तो बस आप का… आप में अपना सुखद मस्त भविष्य जो मुझे दिखने लगा…’’ कह वह मुसकराने लगी.

अमन किसी लड़की के अचानक इस बेबाक अंदाज से झेपने लगा. कान व गाल सुर्ख हो उठे.

संचित अमन को घबराता देख खिलखिला कर हंस पड़ी, ‘‘हाय मरजांवा.’’

‘‘अब बोल मिस्टर सीबी आई…’’ संचित अमन की पीठ ठोंक कर मुसकराते हुए उस का चेहरा निहारने लगा जो लाल हुआ जा रहा था.

अमन मन ही मन मुसकरा भी रहा था, ‘‘क्या अजब

लड़की है.’’

‘‘वाह, बहुत अच्छा किया आप ने… मैडम जो आप ने अपनी सहेली से यह शर्त लगा ली… जिस से इस का भी किसी लड़की

को फूल न देने का प्रण आखिर टूट ही गया… बड़ा अकड़ता फिरता था हम सब से, इस बात

को ले कर कि तुम ही सब पड़े रहते हो लड़कियों के पीछे मैं तो घास भी न डालूं… वैसे सच तो यही है मैडम बड़ा शरमीला है मेरा यार… लड़कियों से जरा बात भी करनी पड़े तो घबरा उठता है. आप को प्यार करता है पर कह नहीं दे पाता. मगर सच यही है आप से प्यार है इसे इसीलिए तो आप को ले कर इतना पजैसिव है

कि आप की सुरक्षा के लिए आप पर ही गुस्सा करने लगा और इंस्पैक्टर बना फिर रहा है,’’ संचित खुलासा करने लगा था, ‘‘अब कैसे शरमा कर खिसियाए जा रहा है देखिए…’’

‘‘सारी बकवास बंद कर अपनी चलचल अब देर नहीं हो रही तुझे?’’ अमन ने खिसियाए हुए, बाइक को किक मारी और हंस रहे संचित के हड़बड़ी में किसी तरह आधेअधूरे बैठते ही फर्र से वह बाइक दूर भगा ले जाता उस से पहले संचित फूल वाले लड़के को चिल्लते हुए बोलता गया, ‘‘बेटा अब एक गुलदस्ता नहीं, जयमाला और मोगरे की लडि़यां इन भैया को दे जाना अगले महीने की 3-4 तारीख के बाद, जब तक मेरी मुहतरमा भी आ जाएंगी… मैं इन की शादी की तारीख तय होते ही बताता हूं तुझे. अब मैं तेरे को एडवांस पैसे दूंगा पूरे 5 हजार कुछ समझ?’’ वह हंसता ही जा रहा था.

अमन को शरमा कर जाने के लिए तेजी से पैर बढ़ाते देख आराधना भी खडी मस्त हो ताली पीट कर हंसे जा रही थी.

‘जाइए… आप कहां जाएंगे अपनी उसी बिल्डिंग में तो आएंगे…’ आराधना सोच कर गुनगुनाते हुए मुसकरा उठी.

‘‘भैया आज तो बस लाल गुलाबों का

ही गुलदस्ता वहां पहुंचा आना,’’ उस ने उत्साहपूर्वक खबर अपडेट के लिए रिनी को

फोन मिला दिया.

‘‘आ कर देख ले अपनी आंखों से तेरी सहेली शर्त आज शाम को ही जीतने वाली है… सच्ची… वह दस्ता ए गुलाब…’’

उधर अमन सोच रहा था कि काश वह लड़कियों से घबराता न तो शायद कब का इसे प्यार करता है, बता चुका होता और पहले झठी अकड़ दिखाने के लिए अपने दोस्तों से अपने बारे में कभी ऐसे बेतुके ऐलान भी नहीं करता… सही तो कहता है संचित प्यार ही तो है उसे आराधना से… कुबूल क्यों नहीं कर पाता… बन गया न आज पूरी तरह…’’

व्यू मिरर में संचित का हंसता चेहरा देख कर खिसियाहट, शर्म में उस ने झटके से

ऐक्सीलेटर कस के दबा दिया. शायद क्या यकीनन वह भी यही चाहता है कि आराधना जैसी खुशमिजाज जिंदादिल लड़की उस की जीवनसंगिनी बन जाए. प्यार करता है वह इस से तभी तो इस को ले कर इतना परेशान हो गया… मम्मी लोगों ने सही ही निर्णय लिया है. उस का मन अचानक बहुत हलका महसूस कर रहा था. दिमाग की टैंशन खत्म हो गई थी. उसे लगा उस की बाइक हवा में उड़ने लगी है.

अमन आराधना को पीछे मुड़ कर देखना चाहता था, किंतु चेहरे पर मुसकान के साथ गुलाबी हो रही शर्म ने उसे रोक दिया.

थोड़ा  झुक कर व्यू मिरर में संचित ने उस

के गुलाबी गालों को देख लिया था. ‘‘बेटा,

बहुत सही’’ के अंदाज में अंगूठा दिखा कर मुसकराते हुए उस की पीठ पर कस कर एक धौल जमा दी

बोझ: क्या 3 बच्चों का बोझ उठा पाई वह

मां ने फुसफुसाते हुए मेरे कान में कहा, ‘‘साफसाफ कह दो, मैं कोई बांदी नहीं हूं. या तो मैं रहूंगी या वे लोग. यह भी कोई जिंदगी है?’’ इस तरह की उलटीसीधी बातें मां

2 दिनों से लगतार मुझे समझा रही थी. मैं चुपचाप उस का मुख देखने लगी. मेरी दृष्टि में पता नहीं क्या था कि मां चिढ़ कर बोली, ‘‘तू मूर्ख ही रही. आजकल अपने परिवार का तो कोई करता नहीं, और तू है कि बेगानों…’’ मां का उपदेश अधूरा ही रह गया, क्योंकि अनु ने आ कर कहा, ‘‘नानीअम्मा, रिकशा आ गया.’’ अनु को देख कर मां का चेहरा कैसा रुक्ष हो गया, यह अनु से भी छिपा नहीं रहा.

मां ने क्रोध से उस पर दृष्टि डाली. उस का वश चलता तो वह अपनी दृष्टि से ही अनु, विनू और विजू को जला डालती. फिर कुछ रुक कर तनिक कठोर स्वर में बोली, ‘‘सामान रख दिया क्या?’’ ‘‘हां, नानीअम्मा.’’

अनु के स्वर की मिठास मां को रिझा नहीं पाई. मां चली गई किंतु जातेजाते दृष्टि से ही मुझे जताती गई कि मैं बेवकूफ हूं. मां विवाह में गई थी. लौटते हुए 2 दिन के लिए मेरे यहां आ गई. मां पहली बार मेरे घर आई थी. मेरी गृहस्थी देख कर वह क्षुब्ध हो गई. मां के मन में इंजीनियर की कल्पना एक धन्नासेठ के रूप में थी. मां के हिसाब से घर में दौलत का पहाड़ होना चाहिए था. हर भौतिक सुख, वैभव के साथसाथ सरकारी नौकरों की एक पूरी फौज होनी चाहिए थी. इन्हीं कल्पनाओं के कारण मां ने मेरे लिए इंजीनियर पति चुना था.

मां की इन कल्पनाओं के लिए मैं कभी मां को दोषी नहीं मानती. हमारे नानाजी साधारण क्लर्क थे, लेकिन वे तनमन दोनों से पूर्ण क्लर्क थे. वेतन से दसगुनी उन की ऊपर की आमदनी थी. पद उन का जरूर छोटा था किंतु वैभव की कोई कमी नहीं थी. हर सुविधा में पल कर बड़ी हुई मां ने उस वैभव को कभी नाजायज नहीं समझा. यही कारण था कि मेरे नितांत ईमानदार मास्टर पिता से मां का कभी तालमेल नहीं बैठा. मुझे अब भी याद है कि मैं जब भी मायके जाती, मां खोदखोद कर इन की कमाई का हिसाब पूछती. घुमाफिरा कर नानाजी के सुखवैभव की कथा सुना कर उसी पथ पर चलने का आग्रह करती, किंतु हम सभी भाईबहनों की नसनस में पिता की शिक्षादीक्षा रचबस गई थी. विवाह भी हुआ तो पति पिता के मनोनुकूल थे.

मां के इन 2 दिनों के वास ने मेरी खुशहाल गृहस्थी में एक बड़ा कांटा चुभो दिया. आज जब सभी अपने काम पर चले गए तो रह गई हैं रचना और मां की बातों का जाल. रचना को दूध पिला कर सुला देने के बाद मैं घर में बाकी काम निबटाने लगी. ज्यादातर काम तो अनु ही निबटा जाती है, फिर भी गृहस्थी के तो कई अनदेखे काम हैं. सब कामों से निबट कर जब मैं अकेली बैठी तो मां की बातें मुझे बींधने लगीं. ‘क्या हम ने गलत किया है? क्या मैं रचना और आशीष का हक छीन रही हूं? क्या उन की इच्छाओं को मैं पूर्ण कर पा रही हूं? मुझे अपने पति पर क्रोध आने लगा. सचमुच मैं मूढ़ हूं. कितनी लच्छेदार बातें बना कर मुझ से इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठवा दी. मुझे अपनी स्थिति अत्यंत दयनीय नहीं, असह्य लगने लगी. मां के आने से पूर्व भी तो परिस्थितियां यही थीं. सब बच्चे अनु, विनू और विजू साथ रहे किंतु आज उन का रहना असह्य क्यों लग रहा है?’

मन बारबार अतीत में भटकने लगा है. 3 साल पहले की घटना मेरे मनमस्तिष्क पर भी स्पष्ट रूप से अंकित थी. रचना तब होने वाली थी. होली की छुट्टियां हो चुकी थीं. उसी दिन हमें अपनी बड़ी ननद के यहां जाना था. किंतु वह जाना सुखद नहीं हुआ. उस दिन बिजली का धक्का लगने से उन्हें बचाते हुए जीजी और भाईसाहब दोनों मृत्यु के ग्रास बन गए. रह गए बिलखते, विलाप करते उन के बच्चे अनु, विनू और विजू, सबकुछ समाप्त हो गया. आज के युग में हर व्यक्ति अपने ही में इतना लिप्त है कि दूसरे की जिम्मेदारी का करुणक्रंदन मन को विचलित किए दे रहा था.

रात्रि के सूनेपन में मेरे पति ने मुझ से लगभग रोते हुए कहा, ‘आभा, क्या तुम इन बच्चों को संभाल सकोगी?’ मैं पलभर के लिए जड़ हो गई. कितनी जोड़तोड़ से तो अपनी गृहस्थी चला रही हूं और उस पर 3 बच्चों का बोझ.

मैं कुछ उत्तर नहीं दे पाई. अपना स्वार्थ बारबार मन पर हावी हो जाता. वे अतीत की गाथाएं गागा कर मेरे हृदय में सहानुभूति जगाना चाह रहे थे. अंत में उन्होंने कहा, ‘अपने लिए तो सभी जीते हैं, किंतु सार्थक जीवन उसी का है जो दूसरों के लिए जिए.’ अंततोगत्वा बच्चे हमारे साथ आ गए. घरबाहर सभी हमारी प्रशंसा करते. किंतु मेरा मन अपने स्वार्थ के लिए रहरह कर विचलित हो जाता. फिर धीरेधीरे सब कुछ सहज हो गया. इस में सर्वाधिक हाथ 17 वर्षीय अनु का था.

उन लोगों के आने के बाद हम पारिवारिक बजट बना रहे थे, तभी ‘मामी आ जाऊं?’ कहती हुई अनु आ गई थी. उस समय उस का आना अच्छा नहीं लगा था, किंतु कुछ कह नहीं पाई. ‘मामी,’ मेरी ओर देख कर उस ने कहा था, ‘आप को बजट बनाते देख कर चली आई हूं. अनावश्यक हस्तक्षेप कर रही हूं, बुरा नहीं मानिएगा.’ ‘नहींनहीं बेटी, कहो, क्या कहना चाहती हो?’

‘आप रामलाल की छुट्टी कर दें. एक आदमी के खाने में कम से कम 2,000 रुपए तो खर्च हो ही जाते हैं.’ मेरे प्रतिरोध के बाद भी वह नहीं मानी और रामलाल की छुट्टी कर दी गई. अनु ने न केवल रामलाल का बल्कि मेरा भी कुछ काम संभाल लिया था.

उस के बाद रचना का जन्म हुआ. रचना के जन्म पर अनु ने मेरी जो सेवा की उस की क्या मैं कभी कीमत चुका पाऊंगी? रचना के आने से खर्च का बोझ बढ़ गया. उसी दिन शाम को अनु ने आ कर कहा, ‘‘मम्मा, मेरी एक टीचर ने बच्चों के लिए एक कोचिंग सैंटर खोला है. प्रति घंटा 300 रुपए के हिसाब से वे अभी पढ़ाने के लिए देंगी. बहुत सी लड़कियां वहां जा रही हैं. मैं भी कल से जाऊंगी.’’

हम लोगों ने कितना समझाया पर वह नहीं मानी. अपनी बीए की पढ़ाई, घर का काम, ऊपर से यह मेहनत, किंतु वह दृढ़ रही. इन के हृदय में अनु के इस कार्य के लिए जो भाव रहा हो, पर मेरे हृदय में समाज का भय ही ज्यादा था. दुनिया मुझे क्या कहेगी? बड़े यत्न से अच्छाई का जो मुखौटा मैं ने ओढ़ रखा है, वह क्या लोगों की आलोचना सह सकेगा?

पर वह प्रतिमाह अपनी सारी कमाई मेरे हाथ पर रख देती. कितना कहने पर भी एक पैसा तक न लेती. यह देख कर मैं लज्जित हो उठती. विनू भी पढ़ाई के साथसाथ पार्टटाइम ट्यूशन करता. इन्होंने बहुत मना किया, पर बच्चों का एक ही नारा था- ‘मेहनत करते हैं, चोरी तो नहीं.’

3 साल देखतेदेखते बीत गए. आशीष और रचना दोनों की जिम्मेदारियों से मैं मुक्त थी. वह अपने अग्रजों के पदचिह्नों पर चल रहा था. कक्षा में वह कभी पीछे नहीं रहा. मेरी आंखों के सामने बारीबारी से अनु, विनू और विजू का चेहरा घूम जाता. उस के साथसाथ आशीष का भी. क्या इन बच्चों को घर से निकाल दूं? मेरा बाह्य मन हां कहता. 3 का खर्च तो कम होगा. किंतु अंतर्मन मुझे धिक्कारता. कल अगर हम दोनों नहीं रहे तो आशीष और रचना भी इसी तरह फालतू हो जाएंगे. मैं फफकफफक कर रोने लगी.

‘‘क्या बात है, मामी, रो क्यों रही हैं?’’ अनु के कोमल स्वर से मेरी तंद्रा भंग हो गई. शाम हो चुकी थी. मां ने कितना अत्याचार किया मात्र

2 दिनों में. आशीष और रचना को छिपा कर हर चीज खिलाना चाहती थी. बारबार बच्चों को उलटीसीधी बातें सिखाती. मैं अनु की ओर देखने लगी. मुझे लगा अनु नहीं, मेरी रचना बड़ी हो गई है और हम दोनों के अभाव में मां की दी हुई मानसिक यातनाएं भोग रही है.

मैं ने अनु को हृदय से लगा लिया. ‘‘नहींनहीं, मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी.’’ ‘‘मुझे आप से अलग कौन कर रहा है?’’ अनु ने हंस कर कहा.

‘‘किंतु इसे जाना तो होगा ही,’’ यह करुण स्वर मेरे पति का था. पता नहीं कब वे आ गए थे. ‘‘क्या?’’ मैं ने अपराधी भाव से पूछा.

‘‘अनु का विवाह पक्का हो गया है. मेरे अधीक्षक ने अपने पुत्र के लिए स्वयं आज इस का हाथ मांगा है. दहेज में कुछ नहीं देना पड़ेगा.’’ अनु सिर झुका कर रोने लगी. मेरे हृदय पर से एक बोझ हट गया. उसे हृदय से लगा कर मैं भी खुशी में रो पड़ी.

सरप्राइज: मां और बेटी की अनोखी कहानी- भाग 2

अजय से असलियत ज्यादा दिन छिपी न रह सकी. एक दिन अजय को उस का सहयोगी हार्दिक जबरदस्ती लंच के लिए बाहर ले गया. रेस्तरां में जाते ही उस ने एक कोने में किसी लड़के के साथ बैठी रिनी को देख लिया, हार्दिक ने भी देख लिया था, हार्दिक अजय का बहुत अच्छा दोस्त था. थोड़ी दूर एक कोने में बैठ कर अजय ने रिनी को फोन किया.

रिनी ने फोन उठाया.

‘‘रिनी, कहां हो?’’

‘‘एक फ्रैंड के घर.’’

‘‘घर कब तक आओगी?’’

‘‘देखती हूं.’’

फोन पर बात करते हुए अजय रिनी की टेबल पर जा कर खड़ा हो गया. उस का चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था.

रिनी ने बेशर्मी से कहा, ‘‘अच्छा तो मेरी जासूसी हो रही है? तुम्हारी मां ने भेजा होगा?’’

‘‘शटअप.’’

‘‘इस से मिलो, यह है मेरा खास दोस्त, यश.’’

अजय ने कुछ कहने के लिए जैसी ही मुंह खोला, रिनी ने चेतावनी दी, ‘‘यहां तमाशा खड़ा कर के अपना ही नुकसान करोगे अजय.’’

अजय ने माहौल पर नजर डाली, लंचटाइम था, रेस्तरां पूरा भर चुका था.

‘‘मैं तुम से घर पर बात करूंगा, उठो, चलो.’’

‘‘नहीं मैं तो अभी लंच कर रही हूं. शाम को मिलते हैं.’’

रिनी की बेहयाई देख अजय का गुस्सा काबू के बाहर हो रहा था. हार्दिक उस का हाथ पकड़ उसे रेस्तरां से बाहर ले गया. पास के ही किसी और रेस्तरां में बैठ कर हार्दिक ने कहा, ‘‘जो हुआ, बुरा हुआ. ठंडे दिमाग से काम लेना, अजय. रिनी के तेवर मुझे ठीक नहीं लग रहे.’’

अजय फिर औफिस नहीं गया. सीधा घर आ गया. हार्दिक को ही उस ने

अपना सामान संभालने के लिए बोल दिया.

बेटे को असमय आए देख तनुजा चौंकी. अजय ने पूरी बात मां को बता दी. दोनों सिर पकड़ कर बैठे रह गए. रिनी घर में घुसी. मजाक उड़ाते हुए बोली, ‘‘मांबेटे ने पंचायत कर ली?’’

अजय दहाड़ उठा, ‘‘निकल जाओ यहां से.’’

पर्स सोफे पर पटकते हुए आराम से पसर गई रिनी, ‘‘कौन निकालेगा मुझे?’’ ज्यादा होशियारी की तो मांबेटे को ऐसी चक्की पिसवाऊंगी कि दोनों बाहर आने के लिए तरस जाओगे. मेरी लाइफ में दखलंदाजी न करना ही तुम दोनों के लिए अच्छा रहेगा.’’

‘‘तुम ने मुझ से शादी क्यों की थी? कोई जोरजबरदस्ती तो थी नहीं.’’

‘‘हां, मुझे कौन मजबूर कर सकता है. पति का नाम चाहिए था, घरपैसा चाहिए था, नौकरी करने का मुझे शौक नहीं… मेरे नखरे उठाने के लिए इतने बेवकूफ घूमते हैं. मैं बस ऐंजौय करती हूं,’’ फिर गुनगुनाते हुए अपने बैडरूम में चली गई.

तनुजा को बेटे पर बड़ा तरस आया. क्या करें… वे दोनों तो फंस गए थे. सारे अरमान चूरचूर हो गए थे. अजय ने रिनी से बात करना ही बंद कर दिया. इस के 10 दिन बाद ही अजय को 15 दिनों के लिए सिंगापुर जाना पड़ा. उस का तो वैसे ही आजकल दम घुट रहा था. सोचा, टूर पर रह कर आराम से सोचूंगा कि क्या किया जाए. मां को ढेर सारी हिदायतें दे कर अजय चला गया. रिनी की जैसे लौटरी निकल आई.

रातदिन तनुजा की आंखों के आगे बेटे का उदास चेहरा घूमता रहता. फोन

पर उस की गंभीर, उदास आवाज पर दिल रो उठता.

नहीं, ऐसे तो नहीं चलेगा. वह अपने बेटे का जीवन यों खराब होते नहीं देख सकती. रिनी के मातापिता से बात करनी चाहिए, इस से पहले उन से बहुत कम ही बात होती थी. उन के बात करने का ढंग तनुजा को कभी पसंद तो नहीं आया था पर अभी मजबूरी थी शायद कोई रास्ता निकले, यह सोच कर तनुजा ने रिनी की मम्मी दीप्ति को सब बता कर अपनी परेशानी का कोई हल बताने के लिए कहा तो तनुजा को हैरत का एक तेज झटका लगा जब दीप्ति ने कहा, ‘‘हमारी बेटी ऐसी ही है. एक के साथ बंधना उस का स्वभाव ही नहीं और हम पतिपत्नी तो बहुत बिजी रहते हैं… हमारा तो बड़ी मुश्किल से रिनी से पीछा छूटा है… आप जानें वह जानें. हां यह बात तो है कि कानून उस की ही सुनेगा इसलिए आप मांबेटा अपना मुंह बंद ही रखो तो अच्छा होगा.’’

इस चेतावनी के बाद फोन रख कर तनुजा सिर पकड़े बैठी रह गईं. समझ गईं उस के मातापिता ने अपनी बला उन के सिर टाल दी है.

दिनरात सोचने के बाद रातदिन रिनी की हरकतें देख तनुजा के मन में कई योजनाएं आ ही गईं, जिन पर अमल करने के लिए वे मन ही मन तैयार हो गईं. वे अपने बेटे के जीवन से यह धोखा देने वाली, झूठे इलजाम लगाने की धमकी देने वाली लड़की को भगा कर रहेंगी. यश, अरुण, ईशान और अनिल… में से एक समय पर एक ही आता था, रिनी के लिए ये सब गिफ्ट्स लाते, उसे बाहर घुमाने ले जाते, रिनी इन लड़कों को खूब मूर्ख बनाती है, समझ गई थीं तनुजा.

एक दिन तनुजा ने फोन पर सुन लिया कि ईशान रिनी को लेने 3 बजे नीचे आएगा. तनुजा जान गई थीं कि रिनी को टाइम पर तैयार रहने की आदत नहीं है. वह लेट करती है.

अपनी योजना को रूप देने के लिए मार्केट से घर के सामान का भारी बैग लाते हुए नीचे ही ईशान को मिल गईं, तनुजा को यह लड़का हमेशा कुछ भला सा लगता था. उन्हें देखते ही उस ने बाइक खड़ी की और पास आ कर बोला, ‘‘अरे आंटी, आप इतना सामान अकेले ला रही हैं?’’

‘‘और कौन लाएगा, बेटा? पिछली बार तो सब अनिल ले आया था… अब वह काफी दिन से आया नहीं. खैर, थैंक्स, बेटा.’’

‘‘कौन अनिल आंटी?’’

‘‘अनिल को नहीं जानते? जैसे रिनी के पास तुम आते हो, जैसे तुम दोस्त हो, वैसे ही अनिल, यश और अरुण भी तो हैं.’’

‘‘मैं समझा नहीं आंटी… ये लोग कौन हैं?’’

‘‘नहीं बेटा, सौरी, मेरे मुंह से निकल गया. प्लीज रिनी को मत बताना, उस ने कहा है कि मैं ने उस की कोई भी हरकत किसी को बताई तो वह मांबेटे को झूठे इलजाम में फंसा कर जेल भेज देगी.’’

ईशान सचमुच शरीफ  ही था. उसे तो रिनी ने अपने प्यार की दुहाई दे कर फंसाया था. उस के मन में पहले ही एक विवाहित लड़की से संबंध रखने का अपराधबोध था. युवा था, गलती कर बैठा था, रिनी के रूपजाल में फंस गया था पर अब एक सभ्य, संभ्रांत महिला के मुंह से जो भी सुना, धक्का लगा.

तभी रिनी नीचे उतर आई. माथे पर त्योरियां डाल कर तनुजा से पूछा, ‘‘आप यहां क्या कर रही हैं?’’

‘‘कुछ नहीं, घर का सामान लेने गई थी,’’ रिनी ईशान की बाइक पर बैठ कर बेशर्मी से बिना बात किए हंसती हुई चली गई. तनुजा ने नोट किया कि ईशान का चेहरा गंभीर है.

तनुजा ने फोन पर तो सुना था कि रिनी ईशान के साथ मूवी जाएगी पर 1 घंटे में ही रिनी पैर पटकते हुए वापस आई और सीधे अपने बैडरूम में चली गई. शायद ईशान पर तनुजा के कहे की कुछ प्रतिक्रिया हुई है, यह सोच कर तनुजा को बड़ी आशा बंधी कि वह कोशिश करेगी तो अपनी योजना में जरूर सफल होगी.

एक दिन अरुण ने घर के लैंडलाइन पर फोन कर दिया. फोन ये लड़क अकसर करते

रहते थे, कभी भी. रिनी देर तक सो रही होती थी और उस का फोन बंद होता था तो भी अकसर कोई न कोई लैंडलाइन पर फोन कर लेता था. तनुजा अब ऐसे ही किसी मौके की तलाश में थी.

अरुण ने संकोचपूर्वक पूछा, ‘‘आंटी, रिनी कहां है?’’ फोन नहीं उठा रही है.

तनुजा अलर्ट हुईं. कहा, ‘‘बेटा, यश, अनिल या ईशान के साथ ही होगी.’’

‘‘ये लोग कौन हैं, आंटी? आप के रिश्तेदार हैं?’’

‘‘न… न… बेटा, जैसे तुम हो, ऐसे ही लोग हैं… उस की दोस्ती तो कई लोगों से है न, बेटा.’’

आगे पढ़ें- सच जानने के बाद क्या था अरूण का फैसला

छोटे छोटे सुख दुख: राशि ने फ्लैट बेचने का मन क्यों बना लिया?

राशि हाथों का सामान संभालती हुई तेजी से बिल्डिंग के अंदर घुस कर लिफ्ट की तरफ बढ़ी. लिफ्ट का दरवाजा खुला था. जल्दी से अंदर प्रवेश कर चौथी मंजिल का बटन दबा दिया. अब उस ने ध्यान दिया तो उस के पड़ोसी तीसरी मंजिल पर रहने वाले रोनितजी तना हुआ चेहरा लिए खड़े थे. राशि ने हलके से मुसकराने की कोशिश की यह सोच कर कि अगर रोनितजी के चेहरे पर कुछ सहज भाव दिखे तो वह दुआसलाम कर सकती है पर रोनितजी का तना चेहरा तना ही रहा.

कैसेकैसे लोग होते हैं इस दुनिया में… मिनटों की बात घंटों, घंटों की बात दिनों, दिनों की बात महीनों और महीनों की सालों… यहां तक कि पूरी जिंदगी याद रखते हैं, राशि मन ही मन बड़बड़ाई. रोनित तीसरी मंजिल पर बाहर निकल गए. अपने फ्लैट पर जा कर राशि ने बैल बजाई.

‘‘बहुत देर कर दी… मोबाइल भी नहीं उठा रही थी… मुझे बहुत चिंता हो रही थी,’’ सुमित राशि को देखते ही बोला. ‘‘उफ, अंदर तो आने दो… कितनी गरमी है बाहर… सड़क के शोर में मोबाइल की आवाज सुनाई नहीं दी होगी,’’ कह वह अंदर आ गई. सुमित उस के लिए पानी ले आया. अक्तूबर का महीना खत्म होने को था पर गरमी अभी भी जारी थी. राशि ने पंखा चला दिया और सुस्ताने बैठ गई.

‘‘पता है, अभी लिफ्ट में रोनितजी मिल गए… लगता है इन लोगों का गुस्सा तो जिंदगीभर खत्म नहीं होगा… मनीषा भी पता नहीं आए दिन क्या कह कर भरमाती रहती है अपने पति को… बात खत्म होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है,’’ राशि कुछकुछ हताश सी बोली. ‘‘छोड़ो न उन को…’’ सुमित उसे शब्दों से दिलासा देते हुए बोला, ‘‘मैं तो पहले ही सोसाइटी के फ्लैट्स में आने के पक्ष में नहीं था… अपना इंडीपैंडैंट घर चाहता था… फ्लैट्स में न फर्श अपनी न छत… कुछ भी गड़बड़ होती है तो ऊपरनीचे वालों के साथ मुश्किल हो जाती है… पर तुम्हें ही शौक था फ्लैट लेने का कि वहां साथ हो जाता है… मिलजुल कर तीजत्योहार मन जाते हैं…’’ ‘‘गलत भी तो नहीं कहा था… और लोग तो ठीक ही हैं… पर अपने निकट पड़ोसी ही ऐसे निकलेंगे सोचा नहीं था.’’ राशि हंसमुख स्वभाव की खुशमिजाज महिला थी. छोटेछोटे 2 बच्चे स्कूल में पढ़ते थे. अनामिका अपार्टमैंट नामक इस बिल्डिंग में 1 साल पहले ही उन्होंने फ्लैट खरीदा था. 4 मंजिला इस बिल्डिंग में कुल मिला कर 16 फ्लैट्स थे.

उन की सोसाइटी की एक समिति बनी हुई थी, जिस में हर तीजत्योहार या नया साल आने पर परिवार को कुछ रुपए जमा करने पड़ते थे. मिलजुल कर त्योहार मनता, डिनर होता अच्छा लगता था. कभी कपल्स के प्रोग्राम होते तो कभी सिर्फ लेडीज के. तीज, करवाचौथ या वूमंस डे पर लेडीज मिल कर प्रोग्राम कर लेतीं. 16 परिवारों में 2-3 परिवारों को छोड़ कर बाकी सब परिवार समझदार व मिलजुल कर रहने वाले थे. अलगअलग एजग्रुप के होने के बावजूद कभी किसी के बीच कोई खास दिक्कत नहीं आई.

जब 1 साल पहले उन्होंने यह फ्लैट खरीदा था तो सामने के फ्लैट में रहने वाली शिवानी ने उसे आगाह किया था कि तुम्हारे नीचे के फ्लैट में रहने वाली मनीषा से जरा बच कर चलना, बहुत ही सैंसिटिव नेचर की है. जराजरा सी बात पर बुरा मान कर मुंह फुला कर बैठ जाती है… अब ऐसा भी कहीं होता है, सब के साथ रह कर तो थोड़ाबहुत हंसीमजाक चलता ही है… छोटीछोटी बातें तो होती रहती हैं. नजरअंदाज करना आना चाहिए… पर मनीषा का स्वभाव ही निराला है… कोई ऐसा नहीं है, जिस से उस की नाराजगी न हुई हो. राशि ने यह बात जब सुमित को बताई, तो वह ठठा कर हंस पड़ा था, ‘‘हो गई न तेरीमेरी उस की बात शुरू… टिपिकल औरतों वाली बात… इन सब चक्करों में ज्यादा मत उलझना… तुम्हारा लेखन कार्य बाधित होगा… बस हैलो सब से रखो. खिचड़ी किसी के साथ मत पकाओ…’’ धीरेधीरे राशि की सब से जानपहचान होने लगी. मनीषा से शुरू में तो उसे कोई परेशानी नहीं महसूस हुई. वैसे भी वह किसी के व्यक्तिगत जीवन से अधिक लेनादेना नहीं रखती थी.

इसलिए उस की अधिकतर लोगों से पट जाती थी. उस ने ध्यान दिया कि मनीषा, रजनी व संजना की आपस में खूब बनती थी. संजना राशि के ऊपर वाले फ्लैट में रहती थी और रजनी शिवानी के नीचे वाले फ्लैट में यानी सारा कबाड़ मेरे आसपास ही इकट्ठा है. राशि मन ही मन हंसी. मनीषा, संजना व रजनी ये तीनों महिलाएं अपने असहयोगी स्वभाव के लिए पूरे अनामिका अपार्टमैंट में बदनाम थीं और जानेअनजाने उन के पति भी. राशि को अभी कुछ ही महीने हुए थे यहां आए हुए. एक दिन सुबह दूधवाले के घंटी बजाने पर उस ने दरवाजा खोला तो ठीक दरवाजे पर कुत्ते ने पौटी की हुई थी. सुबहसुबह पौटी देख कर दिमाग भन्ना गया. दूध ले कर वह अंदर चली गई. उस दिन सफाई वाली से मिन्नत कर के अलग से पैसे दे कर उस ने पौटी साफ करवा दी. लेकिन उस के बाद यह रोज ही होने लगा. एक दिन राशि ने तैश में आ कर सामने शिवानी के फ्लैट की घंटी बजा दी.

शिवानी बाहर आ गई.  ‘‘शिवानी, यह कुत्ता किस ने पाल रखा है… रोज मेरे दरवाजे पर पौटी कर जाता है… मैं परेशान हो गई हूं.’’ जवाब में शिवानी के होंठों पर रहस्यमय मुसकराहट उभर आई. बोली, ‘‘मनीषा ने पाल रखा है… छोड़ देती है उसे सुबह बाहर… फिर यह नहीं देखती कि नीचे गया या ऊपर… आजकल ऊपर आने की आदत पड़ गई होगी… मैं भी परेशान हो गई थी इस बात से… कुछ बोलो तो बुरा मान जाती है…’’ कुछ सोच कर राशि नीचे उतरी और मनीषा के फ्लैट की घंटी दबा दी. दरवाजा खुलने तक वह अपने चेहरे पर शांत मुसकराहट ले आई थी. मनीषा ने दरवाजा खोला, तो राशि ने कहा, ‘‘हैलो मनीषा…’’ ‘‘अरे राशि तुम… आओआओ बैठो…’’ ‘‘नहीं इस समय मैं बैठने नहीं आई हूं… बस एक छोटी सी समस्या थी… दरअसल, तुम्हारा डौगी रोज ऊपर जा कर मेरे दरवाजे के सामने पौटी कर देता है… मुझे रोज सफाई करवानी पड़ती है… बहुत दिक्कत होती है… मैं सोच रही थी, अगर तुम उसे चेन से बांध कर सड़क पर ले जाओ तो मेरी परेशानी खत्म हो जाएगी और डौगी को भी अच्छी आदत पड़ जाएगी.’’ सुनते ही मनीषा का चेहरा गुस्से से तन गया, ‘‘राशि तुम तो ऐसे बोल रही हो जैसे तुम ने उसे खुद पौटी करते देखा हो… बिल्डिंग का गेट खुला रहता है हर वक्त. दरबान भी ध्यान नहीं रखता है… आसपास के अपार्टमैंट वाले भी अपनाअपना कुत्ता खुला छोड़ देते हैं सड़क पर… पता नहीं कौन आ कर जाता होगा.’’ मनीषा की ऊंची होती आवाज से राशि संकोच से गड़ गई कि आसपास के फ्लैट्स के दरवाजे न खुलने लग जाएं. ‘‘हो सकता है मनीषा,’’ कह कर वह बात खत्म कर लौट गई.

पर उस के बाद उस के दरवाजे पर कुत्ते की पौटी बंद हो गई. इस के बाद वह जब भी मनीषा से टकराई, मनीषा ने सीधे मुंह बात नहीं की. उस का व्यवहार देख कर राशि सोच में पड़ गई कि आखिर उस की गलती क्या है. शायद शिवानी सही कहती है. उस दिन राशि सुबह उठी तो फ्लश जाम हो गया. फ्लश से पानी नीचे नहीं जा पा रहा था और ऊपर के फ्लैट से फ्लश हो कर पानी नीचे न जा पाने के कारण नाली में भर कर उन के पौट से बाहर निकलने को हो रहा था.

वह और सुमित परेशान हो गए. नीचे जा कर उस ने मनीषा को अपनी परेशानी बताई व सुमित ने ऊपर वाले फ्लैट में जा कर संजना के पति से फिलहाल उस वाले बाथरूम को इस्तेमाल न करने की प्रार्थना की. पर मनीषा, जो पहले से ही नाराज चल रही थी, सुनते ही भड़क गई. ‘‘हमारे यहां तो कोई दिक्कत नहीं…तुम्हारे यहां है, तुम जानो.’’  ‘‘मैं यह नहीं कह रही मनीषा कि तुम्हारे कारण दिक्कत है… समस्या तो कहीं बीच  में है… प्लंबर को बुलाने जा रहे हैं सुमित… पर थोड़ी दिक्कत तुम्हें भी होगी… प्लंबर यहां भी आएगा… देखेगा कि आखिर दिक्कत कहां है…’’ ‘‘मुझे तो आज बाहर जाना है… घर पर नहीं हूं.’’ ‘‘उफ, तो ऐसा करो तुम मुझे चाबी दे जाना… मैं खुद यहां पर खड़ी हो कर काम करवा लूंगी.’’ ‘‘अरे ऐसे कैसे चाबी दे दूं… पता नहीं कौन प्लंबर है… हर ऐरेगैरे नत्थु खैरे को घर में घुसा दो,’’ मनीषा बड़बड़ाने लगी. ‘‘देखो मनीषा, प्लंबर को दिखाना तो पड़ेगा… यह परेशानी भुगती तो नहीं जा सकती… ठीक तो करवानी ही पड़ेगी,’’ कह कर राशि ऊपर आ गई. उस दिन मनीषा के पति रोनित ने बात संभाल ली. प्लंबर आया. मनीषा के फ्लैट से ही उसे पाइप की प्रौबलम ठीक करनी पड़ी.

लेकिन मनीषा का राशि से उखड़ा मूड और भी उखड़ गया. शिवानी के नीचे वाले फ्लैट में रहने वाली रजनी भी कुछ कम नहीं थी. शिवानी तो इन तीनों से कई बार उलझ भी पड़ती, फिर ठीक भी हो जाती. पर राशि के बस का नहीं था ये सब कि कभी झगड़ा कर पीठ पीछे बुराइयां करो और फिर साथ बैठ कर कौफी पी लो. छोटीछोटी बातों पर किसी से झगड़ा करना नहीं आता था. एक दिन कूड़े वाला राशि की कूड़े की थैली उठा कर ले गया और रजनी के दरवाजे के सामने रख कर भूल गया.

रजनी ने शोर मचा दिया, ‘‘न जाने किस बदतमीज ने रख दिया यहां कूड़ा… शर्म नहीं आती… अनपढ़गंवार कहीं के…’’ बाहर शोर सुन कर राशि भी बाहर निकल आई. राशि दरवाजे पर रखी अपनी कूड़े की थैली तुरंत पहचान गई. जल्दी से नीचे उतर कर उस ने थैली उठा ली, ‘‘सौरी रजनी… लगता है कूड़ेवाला भूल से छोड़ गया,’’ पर रजनी के चेहरे के भाव व पहले सुने गए शब्द उसे अंदर तक अपमानित कर गए थे. अपार्टमैंट में होने वाले होली, दीवाली, नए साल, क्रिसमस के प्रोग्राम राशि को भी अच्छे लगते, खुशी देते पर ये छोटीछोटी परेशानियां उसे अंदर तक आहत कर देतीं.

सुमित राशि को समझाता, ‘‘मैं तो सोसाइटी के फ्लैट में आना ही नहीं चाहता था पर अब आ गए हैं तो सब के स्वभाव को झेलने की आदत बना लो… शिवानी भी तो यहीं रह रही है… इतना सैंसिटिव होने की जरूरत नहीं है. सब की अपनी फितरत होती है… कोई हमारी तरह का नहीं हो सकता… जो जैसा है उसे वैसे ही स्वीकार कर लो… और क्या कर सकते हैं…’’ ‘‘पर फिर भी सुमित… आतेजाते ऐसे तनाव भरे चेहरे देख कर अच्छा नहीं लगता… थोड़े दिन ठीक रहती हैं ये तीनों, फिर लड़ पड़ती हैं किसी न किसी बात पर… अब फ्लैट्स इतने जुड़े होते हैं कि किसी से बिना मतलब रखे भी नहीं रहा जा सकता.’’

‘‘जैसे उस से रहा जाता है वैसे ही तुम भी रहो… तुम हर बात की परवाह क्यों करती हो. कुछ न कुछ प्रौबलम तो सब जगह होगी.’’ ऐसे ही छोटेछोटे सुखदुख के बीच जिंदगी बीत रही थी. राशि को भी धीरेधीरे 1 साल रहते होने को आ गया था. सुमित का प्रमोशन हुआ तो उस ने 16 परिवारों से सिर्फ 16 लेडीज को चाय पर बुला लिया. सब आईं सिवा मनीषा, रजनी व संजना के. बाकी सब ने कारण पूछा तो राशि को कारण ठीक से पता हो तो बताए. इतने छोटेछोटे भी कोई कारण होते हैं न्योता ठुकराने के. शिवानी को इन सब बातों से फर्क नहीं पड़ता था.

जब वे तीनों ठीक रहतीं तो वह भी अच्छे से बात कर लेती, जब नहीं रहतीं तो वह भी खुद मुंह पलट कर चली जाती. ‘‘लगता है, रजनी के घर आजकल मेहमान आए हैं. काफी चहलपहल रहती है,’’ एक दिन सुबह चाय पीती हुई राशि सुमित से कह रही थी कि तभी 3-4 बार जल्दीजल्दी घंटी बज उठी. ‘‘इतनी सुबह ऐसी घंटी कौन बजा रहा है,’’ हड़बड़ाहट में दोनों दरवाजे की तरफ बढ़े. रजनी की कामवाली खड़ी थी, ‘‘भाभीजी, जल्दी नीचे चलिए रजनी भाभी के ससुरजी गुजर गए.’’ ‘‘ससुरजी गुजर गए… उन के सासससुर आए हुए थे क्या?’’ ‘‘हां, जल्दी चलिए… रात में उन की तबीयत खराब हुई… भैया अस्पताल ले कर गए थे… सुबह गुजर गए. घर में सिर्फ भाभीजी और उन की सास हैं…भैया अभी अस्पताल में ही हैं.’’ सुमित और राशि हड़बड़ाहट में सीढि़यां उतर गए.

अंदर दोनों सासबहू विलाप कर रही थीं. राशि दोनों को सांत्वना देने लगी. थोड़ी देर में पार्थिव शरीर घर आ गया. फ्लैट रिश्तेदारों व जानपहचान वालों से भरने लगा. राशि ने रजनी के दोनों बच्चों की जिम्मेदारी सहर्ष अपने ऊपर ले ली. वह उन्हें अपने घर ले आई. जितनी मदद कर सकती थी उस ने सारे पूर्वाग्रह भूल कर उन की 13 दिन तक की.  13वीं हो गई. इस मुसीबत के वक्त राशि का सहयोग रजनी के दिल को छू  गया. अब वह संजना व मनीषा की परवाह करे बगैर राशि से ठीक से रिश्ता रखने लगी. संजना से राशि का आमनासामना तब भी कम होता था पर मनीषा से अकसर हो जाता था. इसलिए मनीषा का दुर्व्यवहार उसे बहुत अखरता था. संजना का बेटा मयंक और मनीषा की बेटी खुशी एक ही स्कूल में पढ़ते व एक ही रिकशे से स्कूल आतेजाते थे.

उस दिन सुमित की छुट्टी होने के कारण राशि और सुमित मार्केट से लौट रहे थे तो रास्ते में सड़क में भीड़ देख कर वे भी रुक गए. ‘‘क्या हुआ? उन्होंने एक राहगीर से पूछा.’’ ‘‘ऐक्सीडैंट हुआ है… एक रिकशे को कार ने टक्कर मार दी… 2 बच्चे बैठे थे रिकशे में…’’ ‘‘उफ, बच्चे तो ठीक हैं.’’ ‘‘चोटें आई हैं काफी.’’ सुमित उतर कर देखने चला गया. घायल मयंक व खुशी सड़क पर बैठे रो रहे थे. रिकशे वाले व कार चालक के बीच लड़ाई हो रही थी.

‘‘तुम यहां झगड़ा करने लगे हो… बच्चों के कितनी चोटें लगी हैं… तुम से यह नहीं दिख रहा. इन्हें पहले तुरंत अस्पताल ले जाओ,’’ सुमित रिकशे वाले पर बरस पड़ा.  रिकशे वाला उसे पहचानता था. बोला, ‘‘साहब, मेरा रिकशा तो पूरी तरह टूट गया… जब तक भरपाई नहीं होगी तब तक नहीं छोड़ूंगा इन को.’’ ‘‘चाहे बच्चों का नुकसान हो जाए,’’ सुमित दहाड़ते हुए बोला, ‘‘मैं बच्चों को अस्पताल ले कर जा रहा हूं,’’ कह वह बच्चों को अपने साथ कार तक ले आया. बच्चों को इस हाल में देख कर राशि भी घबरा गई, ‘‘यह क्या हुआ?’’ ‘‘ऐक्सीडैंट हो गया… बच्चे इस समय स्कूल से लौट रहे होंगे,’’ सुमित बोला, ‘‘तुम मनीषा व संजना को फोन कर दो. मैं कार मोड़ कर इन्हें अस्पताल ले जाता हूं. उन्हें वहीं आने के लिए कह दो,’’ और फिर सुमित बच्चों को अस्पताल ले गया. जब तक दोनों बच्चों के मातापिता अस्पताल पहुंचे तब तक मयंक के सिर पर टांके और खुशी के हाथ में प्लास्टर चढ़ चुका था. संजना व मनीषा और उन के पतियों के कृतज्ञन चेहरे बिना कहे भी बहुत कुछ कह रहे थे.

‘‘अभी तो स्थिति कुछ ऐसी बन गई है कि तुम्हारी तीनों सहेलियों के मुंह से फिलहाल बोल नहीं फूटेंगे…’’ सुमित हंस कर राशि की खिंचाई करते हुए बोला, ‘‘फिलहाल कुछ दिन तक तो बहुत मिठास घोल कर बातें करने वाली हैं तीनों… कम से कम जब तक बच्चे ठीक नहीं हो जाते.’’ ‘‘हां, यह तो है. थोड़े दिन की टैंशन खत्म, राशि हंसने लगी.’’ आजकल सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा है. शिवानी, संजना, मनीषा, राशि चारों नीचे टहलती हुई मिल जातीं तो बढि़या बातें होतीं. चारों में हंसीमजाक होती, चुहलबाजी भी होती. राशि को अच्छा लग रहा था कि चलो अब सब अच्छा रहेगा. 2 महीने गुजर गए. एक दिन सुबह राशि ने दूध लेने के लिए दरवाजा खोला तो दरवाजे के बीचोंबीच कुत्ते की पौटी पड़ी थी, उफ, राशि मन ही मन भड़क गई कि फिर वही… अब कुछ कहेगी तो मनीषा फिर भड़क जाएगी और नहीं कहती है तो रोज पौटी साफ करनी पड़ेगी. दूसरे दिन सुबह थोड़ा जल्दी उठ कर राशि ने दरवाजा खोल दिया और ऐसे बैठ गई कि यदि कुत्ता पौटी करने आए तो उसे दिखाई दे.

थोड़ी देर में मनीषा का कुत्ता सचमुच आ गया. राशि ने जोर से डांट कर भगा दिया.  इसी बीच दूध वाला भी आ गया. दूध वाले से बोली, ‘‘भैया, जरा नीचे की घंटी बजा कर बता देना कि आप का डौगी फिर यहां दरवाजे के आगे पौटी करने लगा है.’’ दूसरे दिन राशि नीचे टहल रही थी, तो मनीषा ने उसे देख कर फिर मुंह फेर लिया. ‘उफ, अब संजना और रजनी भी यही करेंगी.’

वह मन ही मन बड़बड़ाई. फिर उस ने भी तय कर लिया कि वह भी किसी की परवाह नहीं करेगी और फिर मुंह पलट टहलने दूसरी तरफ चली गई. रात को सुमित से बोली, ‘‘तुम ठीक कहते थे… मुझे भी यहां रहना अच्छा नहीं लग रहा… यह फ्लैट बेच कर कहीं इंडीपैंडैंट घर देखो.’’   सुमित ने थोड़ी देर उस के चेहरे को निहारा, फिर बोला, ‘‘ठीक है, कल  ही बात करता हूं किसी प्रौपर्टी डीलर से.’’ सुमित के गालब्लैडर में पथरी थी. काफी समय से डाक्टर उसे औपरेशन के लिए कह रहे थे. पर आजकल करतेकरते सुमित टाल रहा था. लेकिन इस बार जब उसे दोबारा से दर्द हुआ तो डाक्टर ने उसे औपरेशन कराने की सख्त हिदायत दे डाली. आखिर सुमित औपरेशन के लिए तैयार हो गया. औपरेशन की डेट फिक्स कर उस ने औफिस से छुट्टी ले ली.

राशि के दोनों बच्चे बहुत छोटे तो नहीं थे, पर उन के खानेपीने की समस्या तो थी ही. औपरेशन के विषय में उस ने सिर्फ शिवानी को ही बताया था, पर यह खबर जंगल में आग की तरह पूरे अपार्टमैंट में फैल गई. सुमित औपरेशन के लिए अस्पताल में ऐडमिट हुआ तो सारा ‘अनामिका अपार्टमैंट’ जैसे वहीं आ गया. सुमित का औपरेशन ठीकठाक हो गया. अस्पताल में कहां से उस के लिए खाना पहुंच रहा है, कहां से सूप, दलिया, खिचड़ी पहुंच रही है, उस के बच्चे कहां खाना खा रहे हैं, बच्चे स्कूल कैसे जा रहे हैं, उन को टिफिन कौन बना कर दे रहा है, घर में काम करने वाली से काम कौन करवा रहा है ये सब सोचने की राशि को फुरसत नहीं थी. बस सारे काम हो रहे थे.

शिवानी के साथ रजनी, संजना, मनीषा बढ़चढ़ कर सब कुछ कर रही थीं. कहीं से नहीं लग रहा था कि वे कभी नाराज भी होती होंगी. सुमित घर आ गया और फिर ठीक हो कर औफिस भी जाने लगा. लेकिन राशि की सोच इस बीच रास्ता बदल चुकी थी. कहीं नहीं जाना है उसे यहां से. यहीं रहेगी. अजीब सा दिल जुड़ गया है इन सब के साथ… छोटेछोटे सुखदुख हैं सब के साथ रहने में… सब जगह कुछ न कुछ होंगे… चलता है. उस ने सोचा सुमित को आज ही न करना पड़ेगा. शिवानी का तरीका सही है, सब के साथ भी और सब से अलग भी सोच कर राशि मुसकरा पड़ी.

Summer Special: शाइनी नेल्स के लिए घर पर करें नींबू से मैनीक्‍योर

हाथों में मात्र कुछ तेल ग्रंथियां होने के कारण हमारी उंगलियां जल्‍द ही सूख जाती हैं. रोज धूल और मिट्टी के संपर्क में आने वालें हमारे हाथों को जरुरत होती है एक अच्‍छे मैनीक्‍योर की, जिससे नाखूनों की सही देखभाल हो सके और वह चमकदार बन सकें.

आप चाहें तो अपने घर में भी मैनीक्‍योर कर सकती हैं जो न केवल सस्‍ते में होगा बल्कि काफी प्रभावपूर्ण भी होगा. नींबू द्वारा किया गया मैनीक्‍योर काफी लाभकरी होता है. चलिए जानते हैं कि चमकदार नाखून पाने के लिए आप इसका प्रयोग कैसे कर सकती हैं.

1. नींबू –

अगर आप ज्‍यादा कुछ नहीं कर सकतीं तो केवल नींबू को स्‍लाइस में काट लीजिए और उसी से अपना मेनीक्‍योर करिए. अपने नाखूनों को 2-4 मिनट के लिए गरम पानी में डाल कर उसे नींबू से रगडिए. इससे उगंलियों का कालापन चला जाएगा. यह करने के बाद अपनी उंगलियों को गरम पानी से धो लें ओर क्रीम लगा लें.

2. नींबू और नमक –

नींबू को रगड़ते समय अपने नाखूनों पर नमक छिड़क लें और उंगलियों के आस पास मृत त्‍वचा को साफ कर लें. एक तरीका यह भी है कि गरम पानी में नमक और नींबू निचोड़ लें और उसमें 5-7 मिनट के लिए अपनी उंगलियों को डुबोएं और ब्रश की मदद से उन्‍हें साफ करें.

3. नींबू और ग्लिसरीन –

अगर आप की त्‍वचा ड्राई है तो नींबू से मेनीक्‍योर करते वक्‍त उसमें 4-5 बूदें ग्‍लिसरीन की डाल लें. इस घोल में अपनी उंगलियों को 5-7 मिनट डाले और मृत त्‍वचा को साफ कर लें. केवल नींबू के प्रयोग से त्‍वचा के ड्राई हो जाने का डर रहता है पर अगर आप ग्‍लिसरीन का उपयोग करेगीं तो आपके नाखून चमक उठेगें.

4. नींबू और शक्‍कर –

जहां आप नींबू का उपयोग मेनीक्‍योर के लिए करेगीं वहीं पर शक्‍कर का उपयोग स्‍क्रब के रूप में होगा. नींबू के रस में थोड़ी सी चीनी मिला लें और उससे स्‍क्रब करें.

तपस्या: क्या शिखर के दिल को पिघला पाई शैली?

शैली उस दिन बाजार से लौट रही थी कि वंदना उसे रास्ते में ही मिल गई.

‘‘तू कैसी है, शैली? बहुत दिनों से दिखाई नहीं दी. आ, चल, सामने रेस्तरां में बैठ कर कौफी पीते हैं.’’

वंदना शैली को घसीट ही ले गई थी. जाते ही उस ने 2 कप कौफी का आर्डर दिया.

‘‘और सुना, क्या हालचाल है? कोई पत्र आया शिखर का?’’

‘‘नहीं,’’ संक्षिप्त सा जवाब दे कर शैली का मन उदास  हो गया था.

‘‘सच शैली कभी तेरे बारे में सोचती हूं तो बड़ा दुख होेता है. आखिर ऐसी क्या जल्दी पड़ी थी तेरे पिताजी को जो तेरी शादी कर दी? ठहर कर, समझबूझ कर करते. शादीब्याह कोई गुड्डेगुडि़या का खेल तो है नहीं.’’

इस बीच बैरा मेज पर कौफी रख गया और वंदना ने बातचीत का रुख दूसरी ओर मोड़ना चाहा.

‘‘खैर, जाने दे. मैं ने तुझे और उदास कर दिया. चल, कौफी पी. और सुना, क्याक्या खरीदारी कर डाली?’’

पर शैली की उदासी कहां दूर हो पाई थी. वापस लौटते समय वह देर तक शिखर के बारे में ही सोचती रही थी. सच कह रही थी वंदना. शादीब्याह कोई गुड्डेगुडि़या का खेल थोड़े ही होता है. पर उस के साथ क्यों हुआ यह खेल? क्यों?

वह घर लौटी तो मांजी अभी भी सो ही रही थीं. उस ने सोचा था, घर पहुंचते ही चाय बनाएगी. मांजी को सारा सामान संभलवा देगी और फिर थोड़ी देर बैठ कर अपनी पढ़ाई करेगी. पर अब कुछ भी करने का मन नहीं हो रहा था. वंदना उस की पुरानी सहेली थी. इसी शहर में ब्याही थी. वह जब भी मिलती थी तो बड़े प्यार से. सहसा शैली का मन और उदास हो गया था. कितना फर्क आ गया था वंदना की जिंदगी में और उस की  अपनी ंिंजदगी में. वंदना हमेशा खुश, चहचहाती दिखती थी. वह अपने पति के साथ  सुखी जिंदगी बिता रही थी. और वह…अतीत की यादों में खो गई.

शायद उस के पिता भी गलत नहीं होंगे. आखिर उन्होंने शैली के लिए सुखी जिंदगी की ही तो कामना की थी. उन के बचपन के मित्र सुखनंदन का बेटा था शिखर. जब वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था तभी  उन्होंने  यह रिश्ता तय कर दिया था. सुखनंदन ने खुद ही तो हाथ मांग कर यह रिश्ता तय किया था. कितना चाहते थे वह उसे. जब भी मिलने आते, कुछ न कुछ उपहार अवश्य लाते थे. वह भी तो उन्हें चाचाजी कहा करती थी.

‘‘वीरेंद्र, तुम्हारी यह बेटी शुरू से ही मां के अभाव में पली है न, इसलिए बचपन में ही सयानी हो गई है,’ जब वह दौड़ कर उन की खातिर में लग जाती तो वह हंस कर उस के पिता से कहते.

फिर जब शिखर इंजीनियर बन गया तो शैली के पिता जल्दी शादी कर देने के लिए दबाव डालने लगे थे. वह जल्दी ही रिटायर होने वाले थे और उस से पहले ही यह दायित्व पूरा कर लेना चाहते थे. पर जब सुखनंदन का जवाब आया कि शिखर शादी के लिए तैयार ही नहीं हो रहा है तो वह चौंक पड़े थे. यह कैसे संभव है? इतने दिनों का बड़ों द्वारा तय किया रिश्ता…और फिर जब सगाई हुई थी तब तो शिखर ने कोई विरोध नहीं किया था…अब क्या हो गया?

शैली के पिता ने खुद भी 2-1 पत्र लिखे थे शिखर को, जिन का कोई जवाब नहीं आया था. फिर वह खुद ही जा कर शिखर के बौस से मिले थे. उन से कह कर शायद जोर डलवाया था उस पर. इस पर शिखर का बहुत ही बौखलाहट भरा पत्र आया था. वह उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं, यह तक लिखा था उस ने. कितना रोई थी तब वह और पिताजी से भी कितना कहा था, ‘क्यों नाहक जिद कर रहे हैं? जब वे लोग नहीं चाहते तो क्यों पीछे पड़े हैं?’

‘ठीक है बेटी, अगर सुखनंदन भी यही कहेगा तो फिर मैं अब कभी जोर नहीं दूंगा,’ पिताजी का स्वर निराशा में डूबा हुआ था.

तभी अचानक शिखर के पिता को दिल का दौरा पड़ा था और उन्होंने अपने बेटे को सख्ती से कहा था कि वह अपने जीतेजी अपने मित्र को दिया गया वचन निभा देना चाहते हैं, उस के बाद ही वह शिखर को विदेश जाने की इजाजत देंगे. इसी दबाव में आ कर शिखर  शादी के लिए तैयार हो गया था. वह तो कुछ समझ ही नहीं पाई थी.  उस के पिता जरूर बेहद खुश थे और उन्होंने कहा था, ‘मैं न कहता था, आखिर सुखनंदन मेरा बचपन का मित्र है.’

‘पर, पिताजी…’ शैली का हृदय  अभी  भी अनचाही आशंका से धड़क रहा था.

‘तू चिंता मत कर बेटी. आखिरकार तू अपने रूप, गुण, समझदारी से सब का  दिल जीत लेगी.’

फिर गुड्डेगुडि़या की तरह ही तो आननफानन में उस की शादी की सभी रस्में अदा हो गई थीं. शादी के समय भी शिखर का तना सा चेहरा देख कर वह पल दो पल के लिए आशंकाओं से घिर गई थी. फिर सखीसहेलियों की चुहलबाजी में सबकुछ भूल गई थी.

शादी के बाद वह ससुराल आ गई थी. शादी की पहली रात मन धड़कता रहा था. आशा, उमंगें, बेचैनी और भय सब के मिलेजुले भाव थे. क्या होगा? पर शिखर आते ही एक कोने में पड़ रहा था, उस ने न कोई बातचीत की थी, न उस की ओर निहार कर देखा था.

वह कुछ समझ ही नहीं सकी थी. क्या गलती थी उस की? सुबह अंधेरे ही वह अपना सामान बांधने लगा था.

‘यह क्या, लालाजी, हनीमून पर जाने की तैयारियां भी शुरू हो गईं क्या?’ रिश्ते की किसी भाभी ने छेड़ा था.

‘नहीं, भाभी, नौकरी पर लौटना है. फिर अमरीका जाने के लिए पासपोर्ट वगैरह भी बनवाना है.’

तीर की तरह कमरे से बाहर निकल गया था वह. दूसरे कमरे में बैठी शैली ने सबकुछ सुना था. फिर दिनभर खुसरफुसर भी चलती रही थी. शायद सास ने कहा था, ‘अमरीका जाओ तो फिर बहू को भी लेते जाना.’

‘ले जाऊंगा, बाद में, पहले मुझे तो पहुंचने दो. शादी के लिए पीछे पड़े थे, हो गई शादी. अब तो चैन से बैठो.’

न चाहते हुए भी सबकुछ सुना था शैली ने. मन हुआ था कि जोर से सिसक पड़े. आखिर किस बात के लिए दंडित किया जा रहा था उसे? क्या कुसूर था उस का?

पिताजी कहा करते थे कि धीरेधीरे सब का मन जीत लेगी वह. सब सहज हो जाएगा. पर जिस का मन जीतना था वह तो दूसरे ही दिन चला गया था. एक हफ्ते बाद ही फिर दिल्ली से अमेरिका भी.

पहुंच कर पत्र भी आया था तो घर वालों के नाम. उस का कहीं कोई जिक्र नहीं था. रोती आंखों से वह देर तक घंटों पता नहीं क्याक्या सोचती रहती थी. घर में बूढ़े सासससुर थे. बड़ी शादीशुदा ननद शोभा अपने बच्चों के साथ शादी पर आई थी और अभी वहीं थी. सभी उस का ध्यान रखते थे. वे अकसर उसे घूमने भेज देते, कहते, ‘फिल्म देख आओ, बहू, किसी के साथ,’ पर पति से अपनेआप को अपमानित महसूस करती वह कहां कभी संतुष्ट हो पाती थी.

शोभा जीजी को भी अपनी ससुराल लौटना था. घर में फिर वह, मांजी और बाबूजी ही रह गए थे. महीने भर के अंदर ही उस के ससुर को दूसरा दिल का दौरा पड़ा था. सबकुछ अस्तव्यस्त हो गया. बड़ी कठिनाई से हफ्ते भर की छुट्टी ले कर शिखर भी अमेरिका से लौटा था, भागादौड़ी में ही दिन बीते थे. घर नातेरिश्तेदारों से भरा था और इस बार भी बिना उस से कुछ बोले ही वह लौट गया था.

‘मां, तुम अकेली हो, तुम्हें बहू की जरूरत है,’ यह जरूर कहा था उस ने.

शैली जब सोचने लगती है तो उसे लगता है जैसे किसी सिनेमा की रील की तरह ही सबकुछ घटित हो गया था उस के साथ. हर क्षण, हर पल वह जिस के बारे में सोचती रहती है उसे तो शायद कभी अवकाश ही नहीं था अपनी पत्नी के बारे में सोचने का या शायद उस ने उसे पत्नी रूप में स्वीकारा ही नहीं.

इधर सास का उस से स्नेह बढ़ता जा रहा था. वह उसे बेटी की तरह दुलराने लगी थीं. हर छोटीमोटी जरूरत के लिए वह उस पर आश्रित होती जा रही थीं. पति की मृत्यु तो उन्हें और बूढ़ा कर गई थी, गठिया का दर्द अब फिर बढ़ गया था. कईर् बार शैली की इच्छा होती, वापस पिता के पास लौट जाए. आगे पढ़ कर नौकरी करे. आखिर कब तक दबीघुटी जिंदगी जिएगी वह? पर सास की ममता ही उस का रास्ता रोक लेती थी.

‘‘बहूरानी, क्या लौट आई हो? मेरी दवाई मिली, बेटी? जोड़ों का दर्द फिर बढ़ गया है.’’

मां का स्वर सुन कर तंद्रा सी टूटी शैली की. शायद वह जाग गई थीं और उसे आवाज दे रही थीं.

‘‘अभी आती हूं, मांजी. आप के लिए चाय भी बना कर लाती हूं,’’ हाथमुंह धो कर सहज होने का प्रयास करने लगी थी शैली.

चाय ले कर कमरे में आई ही थी कि बाहर फाटक पर रिकशे से उतरती शोभा जीजी को देखते ही वह चौंक गई.

‘‘जीजी, आप इस तरह बिना खबर दिए. सब खैरियत तो है न? अकेले ही कैसे आईं?’’

बरामदे में ही शोभा ने उसे गले से लिपटा लिया था. अपनी आंखों को वह बारबार रूमाल से पोंछती जा रही थी.

‘‘अंदर तो चल.’’

और कमरे में आते ही उस की रुलाई फूट पड़ी थी. शोभा ने बताया कि अचानक ही जीजाजी की आंखों की रोशनी चली गई है, उन्हें अस्पताल में दाखिल करा कर वह सीधी आ रही है. डाक्टर ने कहा है कि फौरन आपरेशन होगा. कम से कम 10 हजार रुपए लगेंगे और अगर अभी आपरेशन नहीं हुआ तो आंख की रोशनी को बचाया न जा सकेगा.

‘‘अब मैं क्या करूं? कहां से इंतजाम करूं रुपयों का? तू ही शिखर को खबर कर दे, शैली. मेरे तो जेवर भी मकान के मुकदमे में गिरवी  पड़े  हुए हैं,’’ शोभा की रुलाई नहीं थम रही थी.

जीजाजी की आंखों की रोशनी… उन के नन्हे बच्चे…सब का भविष्य एकसाथ ही शैली के  आगे घूम गया था.

‘‘आप ऐसा करिए, जीजी, अभी तो ये मेरे जेवर हैं, इन्हें ले जाइए. इन्हें खबर भी करूंगी तो इतनी जल्दी  कहां पहुंच पाएंगे रुपए?’’

और शैली ने अलमारी से निकाल कर अपनी चूडि़यां और जंजीर  आगे रख दी थीं.

‘‘नहीं, शैली, नहीं…’’ शोभा स्तंभित थी.

फिर कहनेसुनने के बाद ही वह जेवर लेने के लिए तैयार हो पाई थी. मां की रुलाई फूट पड़ी थी.

‘‘बहू, तू तो हीरा है.’’

‘‘पता नहीं शिखर कब इस हीरे का मोल समझ पाएगा,’’ शोभा की आंखों में फिर खुशी के आंसू छलक पड़े थे.

पर शैली को अनोखा संतोष  मिला था. उस के मन ने कहा, उस का नहीं तो किसी और का परिवार तो बनासंवरा रहे. जेवरों का शौक तो उसे वैसे ही नहीं था. और अब जेवर पहने भी तो किस की खातिर? मन की उसांस को उस ने दबा  दिया था.

8 दिन के बाद खबर मिली थी, आपरेशन सफल रहा. शिखर को भी अब सूचना मिल गई थी, और वह आ रहा था. पर इस बार शैली ने अपनी सारी उत्कंठा को दबा लिया था. अब वह किसी तरह का उत्साह  प्रदर्शित नहीं कर  पा रही थी. सिर्फ तटस्थ भाव से रहना चाहती थी वह.

‘‘मां, कैसी हो? सुना है, बहुत बीमार रही हो तुम. यह क्या हालत बना रखी है? जीजाजी को क्या हुआ था अचानक?’’ शिखर ने पहुंचते ही मां से प्रश्नों की झड़ी लगा दी.

‘‘मेरी  तो तबीयत तू देख ही रहा है, बेटे. बीच में तो और भी बिगड़ गई थी. बिस्तर से उठ नहीं पा रही थी. बेचारी बहू ने ही सब संभाला. तेरे जीजाजी  की तो आंखों की रोशनी ही चली गई थी. उसी समय आपरेशन नहीं होता तो पता नहीं क्या होता. आपरेशन के लिए पैसों का भी सवाल था, लेकिन उसी समय बहू ने अपने जेवर दे कर तेरे जीजाजी  की आंखों की रोशनी वापस ला दी.’’

‘‘जेवर दे दिए…’’ शिखर हतप्रभ था.

‘‘हां, क्या करती शोभा? कह रही थी कि तुझे खबर कर के रुपए मंगवाए तो आतेआते भी तो समय लग जाएगा.’’

मां बहुत कुछ कहती जा रही थीं पर शिखर के सामने सबकुछ गड्डमड्ड हो गया था. शैली चुपचाप आ कर नाश्ता रख गई थी. वह नजर उठा कर  सिर ढके शैली को देखता रहा था.

‘‘मांजी, खाना क्या बनेगा?’’ शैली ने धीरे से मां से पूछा था.

‘‘तू चल. मैं भी अभी आती हूं रसोई में,’’ बेटे के आगमन से ही मां उत्साहित हो उठी थीं. देर तक उस का हालचाल पूछती रही थीं. अपने  दुखदर्द  सुनाती रही थीं.

‘‘अब बहू भी एम.ए. की पढ़ाई कर रही है. चाहती है, नौकरी कर ले.’’

‘‘नौकरी,’’ पहली बार कुछ चुभा शिखर के मन में. इतने रुपए हर महीने  भेजता हूं, क्या काफी नहीं होते?

तभी उस की मां बोलीं, ‘‘अच्छा है. मन तो लगेगा उस का.’’

वह सुन कर चुप रह गया था. पहली बार उसे ध्यान आया, इतनी बातों के बीच इस बार मां ने एक बार भी नहीं कहा कि तू बहू को अपने साथ ले जा. वैसे तो हर चिट्ठी में उन की यही रट रहती थी. शायद अब अभ्यस्त हो गई हैं  या जान गई हैं कि वह नहीं ले जाना चाहेगा. हाथमुंह धो कर वह अपने किसी दोस्त से मिलने के लिए घर से निकला  पर मन ही नहीं हुआ जाने का.

शैली ने शोभा को अपने जेवर दे  दिए, एक यही बात उस  के मन में गूंज रही थी. वह तो शैली और उस के पिता  दोनों को ही बेहद स्वार्थी समझता रहा था जो सिर्फ अपना मतलब हल करना जानते हों. जब से शैली के पिता ने उस के बौस से कह कर उस पर शादी के लिए दबाव डलवाया था तभी से उस का मन इस परिवार के लिए नफरत से भर गया था और उस ने सोच लिया था कि मौका पड़ने पर वह भी इन लोगों से बदला ले कर रहेगा. उस की तो अभी 2-4 साल शादी करने की इच्छा नहीं थी, पर इन लोगों ने चतुराई से उस के भोलेभाले पिता को फांस लिया. यही सोचता था वह अब तक.

फिर शैली का हर समय चुप रहना उसे खल जाता. कभी अपनेआप पत्र भी तो नहीं लिखा था उस ने. ठीक है, दिखाती रहो अपना घमंड. लौट आया तो  मां ने उस का खाना परोस दिया था. पास ही बैठी बड़े चाव से खिलाती रही थीं. शैली रसोई में ही थी. उसे लग रहा था कि  शैली जानबूझ कर ही उस  के सामने आने से कतरा रही है.

खाना खा कर उस ने कोई पत्रिका उठा ली थी. मां और शैली ने भी खाना खा लिया था. फिर मां को दवाई  दे कर शैली मां  के कमरे से जुड़े अपने छोटे से कमरे में चली गई और कमरे की बत्ती जला दी थी.

देर तक नींद नहीं आई थी शिखर को. 2-3 बार बीच में पानी पीने के बहाने  वह उठा भी था. फिर याद आया था पानी का जग  तो शैली  कमरे में ही  रख गई थी. कई बार इच्छा हुई थी चुपचाप उठ कर शैली को  आवाज देने की. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आज  पहली बार उसे क्या हो रहा है. मन ही मन वह अपने परिवार के बारे में सोचता रहा था. वह सगा बेटा हो कर भी घरपरिवार का इतना ध्यान नहीं रख पा रहा था. फिर शैली तो दूसरे घर की है. इसे क्या जरूरत है सब के लिए मरनेखपने की, जबकि उस का पति ही उस की खोजखबर नहीं ले रहा हो?

पूरी रात वह सो नहीं सका था.

दूसरा दिन मां को डाक्टर के यहां दिखाने के लिए ले जाने, सारे परीक्षण फिर से करवाने में बीता था.

सारी दौड़धूप में शाम तक काफी थक चुका था वह. शैली अकेली कैसे कर पाती होगी? दिनभर वह भी तो मां के साथ ही उन्हें सहारा दे कर चलती रही थी. फिर थकान के  बावजूद रात को मां से पूछ कर उस की पसंद के कई व्यंजन  खाने  में बना लिए थे.

‘‘मां, तुम लोग भी साथ ही खा लो न,’’ शैली की तरफ देखते हुए उस ने कहा था.

‘‘नहीं, बेटे, तू पहले गरमगरम खा ले,’’ मां का स्वर लाड़ में भीगा हुआ था.

कमरे में आज अखबार पढ़ते हुए शिखर का मन जैसे उधर ही उलझा रहा था. मां ने शायद खाना खा लिया था, ‘‘बहू, मैं तो थक गईर् हूं्. दवाई दे कर बत्ती बुझा दे,’’ उन की आवाज आ रही थी. उधर शैली रसोईघर में सब सामान समेट रही थी.

‘‘एक प्याला कौफी मिल सकेगी क्या?’’ रसोई के दरवाजे पर खड़े हो कर उस ने कहा था.

शैली ने नजर उठा कर देखा भर था. क्या था उन नजरों में, शिखर जैसे सामना ही नहीं कर पा रहा था.

शैली कौफी का कप मेज पर रख कर जाने के लिए मुड़ी ही थी कि शिखर की आवाज सुनाई दी, ‘‘आओ, बैठो.’’

उस के कदम ठिठक से गए थे. दूर की कुरसी की तरफ बैठने को उस के कदम बढ़े ही थे कि शिखर ने धीरे से हाथ खींच कर उसे अपने पास पलंग पर बिठा लिया था.

लज्जा से सिमटी वह कुछ बोल भी नहीं पाई थी.

‘‘मां की तबीयत अब तो काफी ठीक जान पड़ रही है,’’ दो क्षण रुक कर शिखर ने बात शुरू करने का प्रयास किया था.

‘‘हां, 2 दिन से घर में खूब चलफिर रही हैं,’’ शैली ने जवाब में कहा था. फिर जैसे उसे कुछ याद हो आया था और वह बोली थी, ‘‘आप शोभा जीजी से भी मिलने जाएंगे न?’’

‘‘हां, क्यों?’’

‘‘मांजी को भी साथ ले जाइएगा. थोड़ा परिवर्तन हो जाएगा तो उन का मन बदल जाएगा. वैसे….घर से जा भी कहां पाती हैं.’’

शिखर चुपचाप शैली की तरफ देखता भर रहा था.

‘‘मां को ही क्यों, मैं तुम्हें भी साथ ले चलूंगा, सदा के लिए अपने साथ.’’

धीरे से शैली को उस ने अपने पास खींच लिया था. उस के कंधों से लगी शैली का मन जैसे उन सुमधुर क्षणों में सदा के लिए डूब जाना चाह रहा था.

Summer special: बौडी इम्युनिटी और मेटाबोलिज्म को बढाती है नींबू की चाय 

वैसे तो हम सभी जानते है की नींबू बहुत ही गुणकारी होता है. कई रूपों में यह हमारे स्वास्थ्य के लिए फयदेमंद साबित होता है. नींबू विभिन्न विटामिन्स व मिनरल्स का खजाना माना जाता है. नींबू विटामिन C का बेहतर स्रोत है. इसमें विभिन्न विटामिन्स जैसे थियामिन, रिबोफ्लोविन, नियासिन, विटामिन B – 6, और विटामिन-E की थोड़ी मात्रा मौजूद रहती है.

पर क्या आप ये जानते है की नींबू से भी ज्यादा फायदेमंद नींबू की चाय (lemon tea )होती है.
सुबह एक चाय की चुस्की से ही हम तरोताजा फील करते हैं. लेकिन इस चाय में थोड़ा सा बदलाव करके इसे स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद भी बनाया जा सकता है. चाय को सिर्फ सामान्य चाय की तरह ही इस्तेमाल ना करके इसे नींबू की चाय (lemon tea )यानी लेमन टी की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है.

लेमन टी में पोलीफीनोल और विटामिन-C अधिक मात्रा में पाया जाता है. जिस कारण लेमन टी शरीर में कैंसर सेल्स को बनने से भी रोकता है. जिससे लेमन टी के सेवन से कैंसर से भी बचा जा सकता है. लेमन टी पीने से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में आसानी होती है. जिससे कई बीमारियों और इन्फेक्शन से बचा जा सकता है.

लेमन टी में फ्लेवोनोइड्स नाम का केमिकल पाया जाता है. इससे धमनियों में रक्त के थक्के नहीं बनते हैं. जिसके कारण हार्ट अटैक का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है.

अगर आपको वजन कम करना है और स्‍वस्‍थ्‍य रहना है तो नींबू की चाय (lemon tea )बना कर रोज सुबह पियें. एनसीबीआई (नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफार्मेशन) की वेबसाइट पर प्रकाशित एक मेडिकल रिसर्च के अनुसार, नींबू में शरीर को डिटॉक्स करने का गुण पाया जाता है. साथ ही इसे लो-कैलोरी माना गया है, जिस कारण यह वजन को कम करने में मदद कर सकता है.

रोग-प्रतिरोधक क्षमता के लिए भी लेमन टी का उपयोग फायदेमंद हो सकता है. एनसीबीआई की वेबसाइट पर प्रकाशित शोध के अनुसार, लेमन टी बनाने में उपयोग किए जाने वाले नींबू में इम्युनिटी बढ़ाने का गुण पाया जाता है. यह न केवल इम्युनिटी को बढ़ा सकता है, बल्कि संक्रमण से भी बचाने में आपकी मदद कर सकता है.

पाचन के लिए भी नींबू की चाय (lemon tea )बहुत बढ़िया हो सकती है. यह मतली और उल्टी जैसे लक्षणों को दूर करने में फायदेमंद हो सकती है. बशर्ते आप इसमें थोड़ा सा अदरक मिलाएं. यह अपच और ऐसी अन्य गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं से राहत दिलाने के लिए असरदार हो सकती है.
पर ध्यान रहे जिन लोगों को अल्सर की परेशानी हो वे नींबू का या नींबू की चाय का सेवन न करें.
तो चलिए जानते है की नींबू की चाय (lemon tea )कैसे बनायीं जाती है-

हमें चाहिए-(2 कप चाय के लिए )

पानी -2 कप
नींबू -1/2
चाय पत्ती -1/2 छोटी चम्मच
अदरक का टुकड़ा -1 इंच
लौंग-2
काली मिर्च -2 से 3
शक्कर या शहद -2 से 3 चम्मच या स्वादानुसार

बनाने का तरीका –

1-सबसे पहले एक केतली में 2 कप पानी गर्म करें .अब उसमे ½ चम्मच चाय पत्ती डालें .
2-अब अदरक ,लौंग और कालीमिर्च को अच्छे से पीस कर केतली में डालें.
3-अब उसमे स्वादानुसार शक्कर डाल दें .आप चाहे तो शक्कर की जगह शहद का उपयोग भी कर सकते हैं.
4-अब उसे अच्छे से पका ले.जब चाय अच्छे से पक जाये तब उसमे नींबू का रस डाल दें और तेज़ आंच पर 1 से 2 मिनट पका लें .
5-अब गैस को बन्द करके चाय को कप में छान लें.

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