रहे चमकता अक्स: आखिर क्या करना चाहती थी अनन्या

‘‘रजत की बेरुखी अनन्या को अंदर ही अंदर खाए जा रही थी. इसी बीच उसे हैदराबाद शिफ्ट होने की बात पता चली…’’

रजत के घर से जाते ही अनन्या चुपचाप बैड पर आ कर लेट गई. 5 दिन के लिए औफिस के काम से भीमताल जा रहा था रजत. पर जाते हुए रोज की तरह वही रूखा सा बाय. कितनी याद आई थी उसे रजत की जब वह पिछले महीने 1 सप्ताह के लिए गोवा गया था.

वह बेसब्री से रजत का इंतजार करते हुए उस के दिल में जगह बनाने के तरीके ढूंढ़ती रहती थी. तभी तो उस ने इंटरनैट पर वीडियो देख कर खाने की कुछ चीजें बनाना भी सीख लिया था. जिस दिन रजत लौटा था, उस दिन कुक से खाना न बनवा कर अपने हाथों से नर्गिसी कोफ्ते और लच्छेदार परांठे बनाए थे रजत के लिए. खाना खाने के बाद हलके से मुसकरा कर जब रजत ने थैंक्स बोला था, तो गदगद हो गई थी अनन्या.

आज उसे पूरी उम्मीद थी कि रजत खूब हिदायतें दे कर जाएगा, जैसेकि ज्यादा याद मत करना… बाई से अपने लिए अच्छा सा खाना बनवा कर खा लिया करना… रात में देर तक जागती मत रहना वगैरहवगैरह. पर रजत तो हमेशा की तरह सिर्फ बाय बोल टैक्सी में बैठ गया और मुड़ कर भी नहीं देखा.

सब सोचते हुए अनन्या को नींद आ गई. उस की नींद मोबाइल की रिंग बजने से टूटी.

‘‘अभीअभी लैंड हुई है फ्लाइट,’’ रजत का फोन था.

‘‘ओके… अभी तो कुछ देर लगेगी न एअरपोर्ट से बाहर निकलने में? फिर औफिस के गैस्ट हाउस तक पहुंचने में 1 घंटा और लगेगा… आप ने औफिस में इन्फौर्म कर के गाड़ी तो मंगवा ली थी न? रात को टैक्सी से जाना रिस्की होता है… ध्यान रखना अपना…’’

अनन्या हमेशा की तरह रजत को ले कर चिंतित हुई जा रही थी. इस के अलावा वह दूर गए रजत से बातचीत का कोई बहाना भी तलाशती रहती है.

‘‘मैं ठीक हूं,’’ और फोन काट दिया रजत ने.

अनन्या की रुलाई फूट पड़ी कि रजत थोड़ी देर और बात कर सकता था. अभी उस की शादी को 6 महीने ही तो हुए हैं, पर रजत तो लगता है उस से बोर हो गया. दिव्या की शादी भी तो उस के साथ ही हुई थी. वह तो जैसे अभी तक हनीमून पीरियड पर है.

उस दिन बाजार में कैसे अपने मियांजी के हाथ में हाथ डाले घूम रही थी… और एक वह है कि रजत को खुश करने में लगी रहती है दिनरात. खूब बातें बताती है वह रजत को अपने विषय में. पर रजत सुन भर लेता है. न चेहरे पर कोई भाव और न अपना सुनाने की उत्सुकता. चुपचाप अपनी धुन में मग्न घर पर भी लैपटौप लिए औफिस के काम में व्यस्त रजत अनन्या के लिए एक पहेली सा बनता जा रहा था.

अंधेरा घिरते ही अनन्या को उदासी ने पूरी तरह से घेर लिया. अपना ध्यान दूसरी ओर करने के उद्देश्य से उस ने व्हाट्सऐप पर जा कर दोस्तों के गु्रप की चैट खोली.

‘अरे वाह, कल सब ने इंडियागेट पर मिलने का कार्यक्रम बनाया है. मस्ती से बीतेगा कल का दिन,’ सोच कर उछल पड़ी अनन्या.

‘मैं भी आऊंगी,’ लिख कर वह कल पहनने के लिए अलमारी से कपड़े निकालने चल दी. कपड़ों से मैचिंग ऐक्सैसरी निकाल कर ड्रैसिंग टेबल पर रख वह खुशीखुशी सो गई.

सुबह उठ कर कामवाली से जल्दीजल्दी काम करवा कर खुशीखुशी तैयार होने लगी. ग्रे पैंट के साथ गुलाबी रंग का क्रौप टौप और रूबी का चोकर पहन जब वह लिपस्टिक लगाने लगी तो आईने में दपदप करते अपने रूप पर खुद ही फिदा हो गई. मुसकराते हुए हाथ में मैचिंग पर्स लिए वह मोबाइल ले कर कैब बुक कराने लगी. कैब के आते ही वह इंडिया गेट रवाना हो गई.

वहां पहुंची तो संजना, मनीष, निवेदिता, सारांश और कार्तिक पहले से ही पहुंचे हुए थे.

‘‘हाय ब्यूटीफुल,’’ मनीष हमेशा की तरह उसे देख कर हाथ हिलाते हुए बोला.

‘‘वाह कौन कहेगा कि तुम मैरिड हो… कितने लोग रोज प्रपोज करते हैं तुम्हें?’’ सारांश उसे ऊपर से नीचे तक निहारता हुआ बोला.

तभी किसी ने पीछे से आ कर अपने हाथों से अनन्या की आंखें बंद कर दीं.

‘‘साक्षी… पहचान लिया मैं ने,’’ साक्षी के हाथों को अपनी आंखों से हटाती हुए अनन्या खुशी से चहक उठी.

साक्षी अनन्या को आंखें फाड़े देखे जा रही थी, ‘‘अरे, यार मैं ने तो शादी के 2 महीने बाद ही वेट पुट औन कर लिया… तू कैसे अब तक… वाकई अनन्या, तुम सा नहीं देखा.’’

संजना भी पीछे नहीं रही, अनन्या की तारीफ में, ‘‘पता है सारे होस्टल में चर्चा होती थी उत्तराखंड से आई इस लड़की की… हम सब तो इसे डौल बुलाते थे… मेरी प्यारी सी…’’

‘‘कुछ भी कहो तुम सब इसे, मैं तो चुनचुन ही कहता था और वही कहूंगा,’’ संजना की बात पूरी होने से पहले रितेश आ गया और हमेशा की तरह अनन्या पर दुलार बरसाने लगा.

‘‘स्वाति अब तक नहीं आई?’’ सब को पहले की तरह ही अपने आगेपीछे घूमते देख अपनी इकलौती प्रतिद्वंद्वी स्वाति को याद करते हुए अनन्या बोली.

‘‘अरे, लो आ गई वह… साथ में पतिदेव हैं शायद,’’ दूर से आती स्वाति को देख मनीष बोला. स्वाति ने आ कर सब को हाय किया. इस से पहले कि वह सब से अपने पति की जानपहचान करवाती, स्वाति की ओर इशारा कर वह खुद ही बोल उठा, ‘‘बिना मैम के हमारा मन ही नहीं लगता, इसलिए इन का पल्लू पकड़ कर पीछेपीछे आ गए.’’

स्वाति अनन्या के रूप को देख कर हमेशा कुढ़ती रहती थी. पर आज स्वाति के पति को इस तरह मजाक करते और स्वाति के साथसाथ दोस्तों के बीच आया देख कर अनन्या को जलन हो रही थी.

कुछ ही देर में सब दोस्त इकट्ठे हो गए. एकदूसरे के साथ मौजमस्ती करते हुए वे अभी भी कालेज के स्टूडैंट्स ही लग रहे थे. इसी तरह हंसतेखेलते, खातेपीते पूरा दिन बीत गया. कुछ समय बाद फिर से मिलने का वादा कर सब ने एकदूसरे से विदा ले ली.

घर आ कर अनन्या के 2-3 दिन फेसबुक और व्हाट्सऐप पर तसवीरें डालते और शेयर करते हुए बीत गए. फेसबुक पर जब उस ने अपनी प्रोफाइल पिक बदली तो उस की खूबसूरती पर दनादन कमैंट्स आने लगे. खुद पर इतराती अनन्या कमैंट्स के रिप्लाई करने लगी. इसी बीच रजत के लौटने का दिन भी आ गया.

रजत ने आते ही बताया कि उन्हें 15 दिनों के अंदर ही दिल्ली से हैदराबाद शिफ्ट होना पड़ेगा, क्योंकि मीटिंग के दौरान उस के काम से प्रभावित हो कर उसे प्रमोशन दे दिया गया है. अगले ही दिन से दोनों जाने की तैयारियों में जुट गए.

हैदराबाद पहुंच कर रजत नई जिम्मेदारियां संभालते हुए बेहद व्यस्त हो गया. अनन्या सुबह से शाम तक नए मकान की सैटिंग करते हुए बहुत थक जाती थी. कामवाली रोजमर्रा का काम तो निबटा देती थी, पर अन्य कामों में अनन्या उस की मदद नहीं ले पा रही थी. अनन्या तेलुगु नहीं जानती थी और वह हिंदी ठीक से नहीं समझ पाती थी. अत: अनन्या के लिए बताना संभव नहीं हो पा रहा था कि वह किस काम में बाई की मदद चाहती है.

कुछ दिनों बाद अनन्या को कमजोरी के साथसाथ नींद भी बहुत आने लगी. दोपहर में वह कोई पत्रिका ले कर पढ़ने बैठती तो नींद के झोंके आने लगते. सुबह भी उसे उठने में देरी हो जाती थी, इसलिए बैड टी रजत ही बना रहा था इन दिनों. रजत का यह व्यवहार अनन्या को अच्छा तो लग रहा था, लेकिन अपनी सुस्ती को ले कर वह खुश नहीं थी. उस का मौर्निंगवौक भी छूट गया था. खुद को काम में लगाए हुए वह नींद और सुस्ती से दूर रहने का भरसक प्रयास करती, पर ऐसा हो नहीं पा रहा था.

उन लोगों को हैदराबाद आए हुए लगभग 1 महीना हो चुका था. उस दिन दोनों को पड़ोस में एक बच्चे के जन्मदिन की पार्टी में शामिल होना था. अनन्या ने पहनने के लिए ड्रैस निकाली, पर यह क्या, वह ड्रैस तो अनन्या को बहुत टाइट आ रही थी. उस ने सोचा कि ड्रैस धोने से सिकुड़ गई होगी, इसलिए 3-4 और ड्रैसेज निकाल कर पहनने की कोशिश की, पर कोई भी ड्रैस ठीक से पहनी नहीं जा रही थी. इन दिनों घर के काम में व्यस्त होने के कारण वह ढीली कुरती और गाउन ही पहन रही थी. अत: उसे अंदाज ही नहीं लग पाया कि उस का वजन बढ़ रहा है.

अनन्या ने सुबहसुबह टहलना शुरू कर दिया और साथ ही व्यायाम भी, पर वजन काबू में नहीं आ रहा था. थकान हो रही थी वह अलग. चेहरा भी निस्तेज पड़ गया था. जब उसे पैरों में सूजन दिखाई देने लगी तो वह रजत के साथ डाक्टर के पास गई.

वहां डाक्टर ने उसे ब्लड टैस्ट करवाने को कहा. रिपोर्ट आने पर पता चला कि अनन्या को हाइपरथायरोडिज्म हो गया है. गले में पाई जाने वाली थायराइड नामक ग्लैंड जब अधिक सक्रिय नहीं रह पाती तो यह बीमारी हो जाती है, जिस कारण शरीर को आवश्यक हारमोंस नहीं मिल पाते.

डाक्टर ने रोज खाने के लिए दवा लिख दी और कुछ समय बाद फिर टैस्ट करवाने को कहा ताकि दवा की सही मात्रा निर्धारित की जा सके. साथ ही उसे यह भी बता दिया कि एक बार यह ग्रंथि निष्क्रिय हो जाती है तो दोबारा सक्रिय होना लगभग असंभव है. लेकिन घबराने वाली बात नहीं है.

अनन्या ने अगले दिन से ही दवा लेनी शुरू कर दी. उस के असर से वह पहले से बेहतर महसूस कर रही थी पर अपने वजन को ले कर अकसर चिंतित हो जाती कि न जाने यह कब सामान्य होगा और फिर बाद में भी तो डोज कमज्यादा होने से वजन पर ही सब से पहले असर पड़ेगा. फिर डाक्टर की बताई यह बात याद कर कि बस अपना ध्यान रखते हुए रोज दवा की गोली खाने से एक सामान्य व्यक्ति जैसा ही जीवन व्यतीत होता रहेगा, खुद को तसल्ली देने की कोशिश करती.

कुछ दिनों बाद रजत को ट्रेनिंग के सिलसिले में 1 महीने के लिए दिल्ली जाना था.

इतने लंबे समय तक अजनबी शहर में अनन्या कैसे रहेगी, यही सोच कर उस ने अनन्या को भी साथ ले जाने का कार्यक्रम बना लिया.

दिल्ली पहुंच कर वे एक होटल में ठहरे. अनन्या का ज्यादातर समय टीवी देखने में बीत जाता था. एक दिन उस ने अपने दोस्तों को लंच पर बुलाने का कार्यक्रम रखा. जिस होटल में वह ठहरी थी, उस का पता सब को बता कर उस ने वहां के डाइनिंग हौल में ही टेबल्स बुक करवा लीं. अपनी मनपसंद ड्रैस पहन अनन्या बेसब्री से दोस्तों का इंतजार करने लगी.

मनीष ने सब से पहले आ कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. अनन्या उसे देखते ही खिल उठी. पर मनीष ने उसे देख मुंह बना कर आंखें सिकोड़ते हुए कहा, ‘‘अरे यह क्या? तू… तू… इतनी मोटी? क्या कर लिया?’’

इस से पहले कि अनन्या उस का जवाब देती, रितेश भी आ पहुंचा. फिर 1-1 कर के सब आ गए.

‘‘मैं अनन्या से मिल रहा हूं या किसी बहनजी से… कैसी थुलथुली हो गई इतने दिनों में… आलसियों की तरह पड़ी रह कर खूब खाती रहती है क्या सारा दिन?’’ सारांश हंसता हुआ बोला.

अनन्या रोंआसी हो गई, ‘‘अरे, नहीं… न मैं आलसी हूं और न ही कोई डाइटवाइट बढ़ी है मेरी… हाइपोथायरोडिज्म की प्रौब्लम हो गई है.’’

‘‘वह तो मेरी भाभी को भी है, पर तू तो कुछ ज्यादा ही…’’ अपने गालों को फुला कर दोनों हाथों से मोटापे का इशारा करती हुई स्वाति ठहाका लगा कर हंस पड़ी.

सब की बातों से उदास अनन्या ने वेटर को खाना लगाने को कहा. खाना खाते हुए भी दोस्त उस की प्लेट उस के सामने से हटा कर बस कर कितना खाएगी जैसी बातें करते हुए उस का मजाक उड़ाने से बाज नहीं आ रहे थे. खाना खाने के बाद अनन्या सब को बाहर तक छोड़ने आई.

‘‘ओके… बाय चुनचुन नहीं टुनटुन…’’ रितेश के कहते ही सब जाते हुए खूब हंसे, पर अनन्या का मन छलनी हुआ जा रहा था. उदास मन से वह अपने कमरे में आ कर बैठ गई.

रात को सोने के लिए जब वह बैड पर लेटी तो रजत के करीब जा कर उस के सीने में अपना मुंह छिपाए कुछ देर यों ही चुपचाप लेटी रही.

‘‘क्या हुआ? तबीयत तो ठीक है? दोस्तों के साथ गप्पें मारते हुए ज्यादा ही थक गईं शायद?’’ रजत उस की पीठ पर हाथ रख कर बोला.

अनन्या अपना चेहरा रजत की ओर घुमाते हुए बोली, ‘‘एक बात पूछूं रजत… क्या तुम्हें बुरा नहीं लगता कि मैं इतनी मोटी हो गई हूं. फेस भी बदलाबदला सा लग रहा है…तुम ने तो एक स्लिमट्रिम, गोरी लड़की से शादी की थी…

7-8 महीनों में ही वह क्या से क्या हो गई.’’ ‘‘हा… हा… हा…’’ पहले तो रजत ने एक जोरदार ठहाका लगाया. फिर मुसकरा कर अनन्या की ओर देखते हुए बोला, ‘‘ओह अनन्या, कैसा सवाल है यह? यह सच है कि तुम्हें एक बीमारी हो गई है और उस में वेट कंट्रोल में नहीं रहता…पर यह बताओ कि क्या हम हमेशा वैसे ही दिखते रहेंगे जैसे शादी के वक्त थे? क्या जब बुढ़ापे में मैं गंजा हो जाऊंगा या फिर मेरे दांत टूट जाएंगे तो तुम्हें खराब लगने लगूंगा?’’

‘‘तुम मुझे प्यार तो करते हो न?’’ अनन्या के चेहरे पर निराशा अभी भी झलक रही थी. रजत एक बार फिर खिलखिला पड़ा, ‘‘अनन्या तुम इतनी समझदार हो कि मैं कब तुम से पूरी तरह जुड़ गया मैं ही नहीं समझ पाया. तुम मेरी केयर तो करती ही हो, मुझ से अपने मन की हर बात शेयर करती हो, बिना वजह कभी भी झगड़ा नहीं करतीं… और इतना क्वालिफाइड होने के बाद भी घर का काम करना पड़े तो नाकभौं नहीं सिकोड़ती… तुम सच में अपने नाम की तरह ही सब से बिलकुल अलग, बहुत खास हो.’’

‘‘पर इस से पहले तो आप ने कभी ऐसा कुछ नहीं कहा?’’ रजत की प्रेममयी बातें सुन भावविभोर हो अनन्या बोली.

‘‘मैं हूं ही ऐसा… बोलना कम और सुनना बहुत कुछ चाहता हूं… अनन्या यकीन करो, मुझे बिलकुल तुम सा ही पार्टनर चाहिए था.’’

अनन्या मंत्रमुग्ध हुए जा रही थी.

‘‘एक बात और कहूंगा…अपने शरीर का ध्यान रखना हम सब के लिए जरूरी है… पर बाहरी सुंदरता कभी मन पर हावी नहीं होनी चाहिए… तुम जब भी मेरे इस मन में झांक कर अपनी सूरत देखोगी, तुम्हें अपनी वही सूरत दिखाई देगी जो कल थी. आज भी वही और आने वाले कल भी.’’

‘‘ओह रजत… कुछ नहीं चाहिए मुझे अब… कोई मुझे कुछ भी कहता रहे परवाह नहीं… बस तुम्हारे दिल के आईने में मेरा अक्स यों ही चमकता रहे.’’

अनन्या नम आंखों को मूंद कर रजत से लिपट गई. रजत के प्रेम की लौ में पिघल कर वह स्वयं को बहुत हलका महसूस कर रही थी.

Summer Special: गर्मियों में पिएं ये 5 रिफ्रेशिंग ड्रिंक्स

  1. सत्तू मिंट शरबत

सामग्री

  • 2 बड़े चम्मच सत्तू
  • थोड़ी सी पुदीनापत्ती बारीक कटी
  • 1 छोटा चम्मच प्याज बारीक कटा
  • 2 छोटे चम्मच नीबू का रस
  • 1 छोटा चम्मच भुना जीरा पाउडर
  • नमक स्वादानुसार.

विधि

एक बाउल में सत्तू व नमक डाल कर 1 गिलास पानी मिलाएं. अब इस में पुदीनापत्ती, नीबू का रस, प्याज व जीरा पाउडर डाल कर मिलाएं. फिर गिलास में भर कर कूल सत्तू मिंट शरबत का लुत्फ उठाएं.

  1. वाटरमैलन चुसकी

सामग्री

  • 1 बाउल तरबूज के टुकड़े
  • थोड़ी सी पुदीनापत्ती
  • 1 बड़ा चम्मच नीबू का रस
  • 1 छोटा चम्मच चीनी पिसी
  • 1 कप बर्फ का चूरा.

विधि

तरबूज को मिक्सर में पुदीनापत्ती के साथ ग्राइंड कर रस निकाल लें. फिर उसे कांच के गिलास में भर कर इस में नीबू का रस व चीनी डाल कर मिक्स करें. ऊपर से बर्फ का चूरा भर ठंडी चुसकी सर्व करें.

  1. लैमन मिंट आइस्ड टी

सामग्री

  • 1 नीबू
  • थोड़ी सी पुदीनापत्ती
  • 5-6 छोटे चम्मच चीनी
  • 1/4 छोटा चम्मच चायपत्ती
  • 11/2 गिलास पानी.

विधि

एक सौसपेन में पानी व चीनी डाल कर आंच पर पकने दें. जब पानी में उबाल आ जाए तो चायपत्ती व पुदीनापत्ती डाल कर 2-3 मिनट और पकने दें. फिर आंच बंद कर थोड़ी देर के लिए ढक कर रख दें. अब इस पानी को छान कर इस में नीबू रस मिलाएं. थोड़ा पानी अलग निकाल कर ठंडा करें और बाकी पानी को आइस ट्रे में भर कर आइस बना लें. कांच के गिलास में पहले तैयार आइस, फिर नीबू स्लाइस और ठंडा लैमन मिंट टी पानी डाल कर सर्व करें.

  1. कूल औरेंज डिलाइट

सामग्री

  • 1 लिटर दूध फुलक्रीम
  • 1 कप औरेंज जूस
  • 1 बड़ा चम्मच काजू व बादाम
  • 1 छोटा चम्मच टूटी फ्रूटी
  • 1/2 छोटा चम्मच इलायची पाउडर
  • औरेंज जेस्ट गार्निशिंग के लिए.

विधि

दूध में काजूबादाम डाल कर दूध के आधा रह जाने तक उबालें. ठंडा होने पर ग्राइंडर में फेंट कर फ्रिज में रखें. ठंडा हो जाए तो इस में इलायची पाउडर, टूटी फ्रूटी, औरेंज जूस मिला कर गिलास में डालें. ऊपर से ठंडा दूध डाल कर औरेंज जेस्ट से गार्निश करें.

  1. स्ट्राबेरी रोज लैमोनेड

सामग्री

  • 4 स्ट्राबेरी
  •  2-3 बड़े चम्मच नीबू रस
  • 1 छोटा चम्मच शहद
  • 4 बड़े चम्मच स्ट्राबेरी स्क्वैश
  • 8-10 बूंदें गुलाबजल
  • 2 छोटे चम्मच रोज स्क्वैश
  • चीनी स्वादानुसार.

विधि

ठंडे पानी में शहद, चीनी, गुलाबजल व नीबू का रस डाल कर मिक्स करें. स्ट्राबेरी धो कर उस का पेस्ट बना लें. अब छलनी से छान कर तैयार मिश्रण में मिला दें. सर्व करने से पहले स्ट्राबेरी व रोज स्क्वैश डालें

गुलदस्ता-भाग-2: गलत पते पर आखिर क्यों गुलदस्ता आता था?

काश खड़ूस समर से पहले यह मिल गया होता मम्मीपापा को… ऐसे की ही तो तलाश थी मुझे.. तो जिंदगी गा उठी होती मेरी,’’ उस ने लंबी सी सांस ली.पति समर का खयाल आते ही उस का मन कसैला होने लगा. अच्छा ही तो हुआ

पिछले महीने की 22 तारीख को उस से सारी कार्यवाही पूरी हो कर तलाक मिल गया और मुझे उस बगैर दिल के जंगली रईस से सदा के लिए मुक्ति मिल गई. एक तो बदमाश ऊपर से पहले से शादीशुदा था. उस से भी तलाक हुआ था, जिस से उस का एक 6 साल का बेटा भी था. मेरे सीधेसादे मांबाप की आंखों में धूल झोंक कर मुझ से शादी रचा ली. कितना बड़ा धोखेबाज था… सोच में गुम वह अमन के ‘वैलकम’ कहने पर तंद्रा से लौट आई…

‘‘भूल ही गया…’’ उस ने जेब में हाथ डाला… यह लैटर… यह उसी रिनी मैडम का खत फिर मेरे घर…

‘‘वह तो आप की दोस्त हैं. इन्हें तो आप अपना सही अड्रैस बता सकती हैं…’’ पहले भी तो कितनी बार कह चुका है फिर कहने की हिम्मत नहीं हुई. जाने कब कौन मेरे फ्लैट में सरका जाता है मिले तो अच्छे से बताऊं उसे… फिर आजकल फोन की सुविधा है कोई लैटर कहां लिखता है… इन की दोस्त भी अजीब हैं. नीची निगाह किए कुछ सोचते शरमीले अमन को देख वह मुसकरा उठी. इसे यों सताने में उसे बहुत मजा आता. वह गुनगुना उठी, ‘‘आप यों ही अगर हम से मिलते रहे देखिए एक दिन प्यार हो जाएगा….’’ फिर बोली, ‘‘मैं ने बताया था न बेचारी बहुत गरीब है… शराफत में… वह मेरे बचपन की सहेली थोड़ी दिमाग से हटी हुई है. एक दिन मैं आप के दरवाजे तक ही पहुंची थी उस ने मुझे देख लिया और यही मेरा घर समझ लिया. किसी बच्चे से ड्रौप करवा देती है मुझ से मिलती भी नहीं बस अपनी भावनाएं लैटर से शेयर कर देती है अपना पता भी नहीं बताती कि मैं जा कर उसे सही क्या है बता सकूं… अपनी दोस्त दर्शाया संचालित अपने नाटक पर वह मन ही मन मुसकरा उठी.

न चाहते हुए भी अमन ने ओके कहा और नीची निगाह किए कुछ सोचता सीढि़यां उतरने लगा कि गरीब है बेचारी मगर शराफत में? मतलब? उस ने गौर किया था मतलब पाजी या बदमाश… वह भी जाने क्या बला हो.

अजीब मुसीबत है, आखिर मेरे ही गले पड़ी रही. वाकई शनिवार को 39

फैमिली, 37, 36 फैमिली सभी जाने कहां मरने चले जाते हैं. एक मैं ही मिलता रहूंगा इस के गुलदस्ते संभालने. एक ही दिन तो काम के बाद चैन का मिलता है कि जल्दी सोऊं आराम से देर से उठूं, पर मैडम का यह बुके… इस परेशानी का हल सोचता बिस्तर में समा गया. झल्लाहट के मारे नींद भी देर तक नहीं आई. वह करवटें ही बदलता रहा. 8 बज रहे थे कि उस की डोरबैल बज उठी.

‘‘अब संडे इतनी सुबह कौन आ गया…’’ उनींदे से उस ने आंखें मलते हुए दरवाजा खोला.

सामने दोस्त संचित खड़ा मुसकरा रहा था, ‘‘अरे तू अभी तक सो रहा है?’’

अमन फिर बिस्तर में घुस गया.

‘‘तू सुबहसुबह मुझे पकाने कैसे आ गया? फैमिली कहां गई तेरी?’’

‘‘मायके… व्हाट ए रियली?’’

‘‘अरे तो मेरा रिलीफ छीनने क्यों आ गया?’’

‘‘पूछा नहीं 3-4 महीने बाद क्यों आ रहा हूं? मिस्टर बोर, चल आज आजाद हूं, अपने टाइप की मारधाड़, ससपैंस वाली मूवीशूवी देखते हैं. वह जैकी चेन की सुपर्ब मूवी लगी है, आईनौक्स में. चल उठ 10 बजे का शो है.’’

‘‘अबे छोड़ न मेरा मूड वैसे ही औफ है.’’

‘‘क्यों हुआ? बोला था शादी कर ले वरना घरपरिवार से दूर तेरा मूड हमेशा औफ ही रहने वाला है. मगर लड़कियों को तू पास भी नहीं फटकने देता है, शादी कैसे कर पाएगा.’’

‘‘अरे यार ड्यूटी के बाद छुट्टी में भी दूसरी ड्यूटी से माथा खराब हो रखा है.’’

‘‘कैसी दूसरी ड्यूटी?’’

‘‘चल छोड़?’’

‘‘अरे बता न?’’

‘‘जाने दे तू हंसेगा…’’

अमन ने जब बुके, लैटर आराधना और रिनी लड़कियों की बात बताई तो संचित हंसतेहंसते लोटपोट हो गया.

‘‘उड़ा ले मजाक…’’

‘‘वाह बेटा याद है बड़ी अकड़ से कहता था कि और लड़कों की तरह कभी किसी लड़की को फूलवूल देने की बेवकूफी मैं कभी नहीं कर सकता और अब तो हर हफ्ते बुके ही पहुंचाए जा रहा है और लैटर भी हा… हा…’’

‘‘अच्छा किया संचित इसे उठा दिया बड़ी देर तक सोता है यह… हम वौक कर दूध, फ्रूट भी ले आए,’’ अमन के पापामम्मी सुबह सैर कर लौट आए थे.

‘‘नमस्ते अंकल, नमस्ते आंटी… आप

लोग कब आए? अच्छा किया आ गए… संचित

ने दोनों के पैर छुए. इस ने फोन पर कुछ बताया

ही नहीं…’’

‘‘अरे कुछ न पूछो बेचारे का बहुत मूड औफ रहता है आजकल… इस बेचारे को ऊपर एक आराधना मैडम को हर शनिवार बुके देना पड़ रहा है… बीचबीच में उस की चिट्ठियां भी देनी पड़ती हैं जिन्हें डाकिया गलती से हमारे पते पर डाल जाता है. तू तो जानता है संचित लड़कियों से कितना दूर भागता है. सो बहुत परेशान है…’’ चुटकी लेते हुए मम्मी मुसकराईं, ‘‘इसी से तो शादी नहीं कर रहा… इस बार तो इस का रिश्ता करवा कर ही जाएंगे हम, यह सोच लिया है… तू कैसा दोस्त है संचित कुछ करता क्यों नहीं इस के लिए… कितने अच्छे रिश्ते हैं हाथ में… इस आराधना से भी हम मिलते रहे हैं. वह भी अच्छी एकदम मस्त लगती है… हंसतीबोलती है, मनहूस नहीं इस के जैसी. आज भी हमें योग करवाने के बाद वौक कर के हमारे साथ ही लौटी है. चुस्त भी है, सुंदरसमझदार भी… वह भी चलेगी पर, अब इसे करनी ही पड़ेगी शादी किसी को भी पसंद करे…’’ उन्होंने हंसते हुए अमन की पीठ थपथपाई थी.

‘‘मम्मी आप फिर शुरू हो गईं सुबहसुबह…’’ वह थोड़ा रूठते

हुए बोला. फिर स्लीपर्स डाली और बाथरूम चला गया.

‘‘पूछ न तू संचित इसे आराधना पसंद है तो हम उस के लिए भी तैयार हैं. हम आगे बात चलाएं… वैसे उस से ही सब पता कर लिया इस के बारे में… सुबहसुबह रोज वह भी पार्क में टहलने आती है न… बड़े साफ दिल की है… कितना दुख है उस की जिंदगी में पर हर समय हंसतीहंसाती ही रहती है… पहले ही बातोंबातों में अमन से उस की शादी के लिए पूछा था. तभी उस ने सब बता दिया अपने बारे में. कहा कि वह हमें किसी धोखे में नहीं रख सकती. वह शादीशुदा है, मगर अब उस का तलाक हो रहा है. उस के मांपापा उस के इसी गम में चल बसे कि बेटी की कितने गलत आदमी से शादी करवा दी थी… अब वह बिलकुल अकेली है.’’

‘‘तो क्या हुआ? 22 अगस्त को उस के खड़ूस पति से उस का तलाक भी हो गया, जिस की पहले भी एक और शादी, फिर उस से तलाक हो चुका था, जिस से एक 6 साल का बेटा भी है, बोर्डिंग में रहता है… शादी से पहले इस को, इस

के मांबाप को कुछ बताया नहीं था… आराधना

सुंदर है, सो एक्स पति समर ने अच्छे बन कर,

उस के गरीब मांबाप को धोखे से, बिना दहेज की शादी के लिए मना लिया. पर अब वह उस की ज्यादतियों से परेशान हो कर उस का घर छोड़ आई. केस दर्ज किया, उसी परेशानी में अपने दम से नौकरी ढूंढ़ी, फिर आगे की पढ़ाई पूरी की और फिर दूसरी यह इतनी अच्छी नौकरी मिल गई उसे कि यह फ्लैट किराए पर ले लिया. फिर अब कोर्ट द्वारा दिलवाए पैसों का भी सहारा हो गया है तो किराए की जगह फ्लैट की किस्तें ही देने लगी है. कुछ सालों में यह उस का अपना हो जाएगा…

उस के केस की आखिरी तारीख पर अंकल और मैं भी इस के साथ कोर्ट गए थे. तब उस बदसूरत, बदसीरत इस के पति समर को देखा था हम ने… अच्छा ही हुआ वह किसी तरह इस के योग्य नहीं था.

‘‘हम को तो कोई एतराज नहीं अगर यह आराधना से ब्याह कर ले, बल्कि हमें तो बहुत खुशी ही होगी एक जिंदादिल समझदार बहू घर आएगी. हमें तो बहुत पसंद आई वह. हिम्मती है, दृढ़निश्चयी है. अपने दम से सबकुछ हासिल कर लिया और हौसले से जिंदगी जी रही है. इस अमन को सारा कुछ हम ने पहले भी बताया था… तभी अमनआ गया.

‘‘संचित समझ इसे कब तक अकेले रहेगा… किसी को तो पसंद करे…’’

मम्मीपापा जब अंदर चले गए तो संचित मुसकराया, ‘‘बेटा क्या इरादा है?’’

कमजोर नस: वंदना को क्यों था अपने पति पर शक

किरण से मेरी पहली मुलाकात राजीव से शादी होने के करीब 6 महीने बाद हुई थी. वह अपनी भाभी के साथ स्कूल आई थी. तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले उस के भतीजे समीर की मैं क्लास टीचर हूं.

‘‘मैं किरण हूं. राजीव और मैं कालेज में साथसाथ पढ़े हैं और हम बहुत अच्छे दोस्त भी थे,’’ उस की भाभी जब दूसरी टीचर से मिलने चली गई तो उस ने मुसकराते हुए अपना परिचय मुझे दिया था.

उस का नाम सुनते ही मेरा दिमाग एक बार को सुन्न सा हो गया. एकदम से समझ में ही नहीं आया कि मैं आगे क्या बोलूं.

उस ने मेरी चुप्पी का गलत अर्थ लगाया और बिदा लेते हुए बोली, ‘‘कभी राजीव को ले कर घर जरूर आना. बाय.’’

‘‘उसे यों जाते देख कर मैं चौंकी और फिर हड़बड़ाती सी बोली, ‘‘मैं अकेले में आप से कुछ बातें करना चाहती हूं.’’

‘‘श्योर,’’ उस का जवाब सुन कर मैं कुरसी से उठी और उसे हौल के एक कोने में ले आई. फिर मैं ने इधरउधर की बातें करने में समय नष्ट किए बिना उस से सीधा सवाल पूछा, ‘‘तुम ने राजीव से शादी क्यों नहीं करी?’’

‘‘मुझे राजीव से शादी क्यों करनी चाहिए थी?’’ उस ने मुसकराते हुए उलटा सवाल पूछा.

‘‘क्योंकि तुम दोनों एकदूसरे से प्यार करते थे. राजीव विजातीय थे तो क्या हुआ? तुम्हें अपने मातापिता की इच्छा के खिलाफ जा कर उन से शादी करनी चाहिए थी.’’

‘‘क्योंकि उन्होंने आज भी तुम्हारी तसवीर को दिल में बसा रखा है. तुम से जुड़ी यादों के कारण मैं कभी उन के दिल की रानी नहीं बन पाऊंगी,’’ मैं गुस्सा हो उठी थी.

‘‘क्या मेरे साथ जुड़ी यादें तुम्हारे व राजीव के प्यार में बीच में आ रही है?’’ वह चौंक पड़ी.

‘‘हां, उन्होंने सिवा प्यार की गरमाहट के मुझे सबकुछ दे रखा है,’’ न चाहते हुए भी मेरा गला भर आया था.

‘‘यह तो राजीव बहुत गलत कर रहा है,’’ उस ने सहानुभूति

भरे अंदाज में मेरा कंधा पकड़

कर दबाया.

‘‘तुम ने अपने मातापिता की क्यों सुनी? जब प्यार किया था तो शादी क्यों नहीं करी?’’

उस ने कुछ देर खामोश

रहने के बाद जवाब दिया, ‘‘इन सवालों के जवाब देने मैं तुम्हारे घर आती हूं.’’

‘‘नहीं, तुम्हारा मेरे घर आना ठीक नहीं रहेगा,’’ मैं एकदम

घबरा उठी.

‘‘क्या तुम्हें डर है कि अगर मैं ने तुम्हारे घर आनाजाना शुरू कर दिया तो तुम कहीं राजीव को पूरी तरह से ही न खो दो?’’

मैं जवाब में खामोश रही तो उस ने प्यार से मेरा गाल थपथपा कर कहा, ‘‘मुझे तुम आज से अपनी बड़ी बहन समझो. मैं कभी तुम्हारा अहित नहीं करूंगी.’’

‘क्या तुम और राजीव मिलते रहते हो?’’

‘‘तुम्हारे सब सवालों के जवाब अगली मुलाकात में तुम्हारे घर आ कर दूंगी.’’

‘‘कब आओगी?’’

‘‘जल्द ही,’’ उस ने मुझ से हाथ मिलाया और अपनी भाभी की तरफ चली गई.

मैं ने राजीव को किरण से हुई इस मुलाकात की जानकारी शाम को दी तो उन्होंने सब से पहला सवाल यह पूछा, ‘‘कैसी लगी किरण की पर्सनैलिटी तुम्हें?’’

‘‘तुम बिना बात गुस्सा हो रही हो. अरे, वह मुझ से प्यार जरूर करती थी पर अब हमारे बीच कोई चक्कर नहीं चल रहा है.’’

‘‘चक्कर नहीं चल रहा है पर आप उसे भूले भी कहां हैं,’’ मेरा मूड खराब होता जा रहा था.

‘‘तुम सचसच बताओ कि क्या उस जैसी शानदार शख्सीयत को कोई भुला सकता है?’’ उन्होंने गहरी आह सी भरी.

‘‘यह बिडंबना ही है कि मेरी सेवा और समर्पण की आप की नजरों में कोई कीमत नहीं है,’’

मैं बुरी तरह से चिड़ उठी, ‘‘आप मेरी यह बात कान खोल कर

सुन लो. मैं बिलकुल नहीं चाहती हूं कि उस का मेरे घर में आनाजाना शुरू हो.’’

‘‘किसी का दिल ईर्ष्या की आग में जलने की बू आ रही है,’’ मेरा मजाक सा उड़ाते ये कमरे से बाहर चले गए और मैं देर तक किलसती रही.

अगले रविवार सुबह 11 बजे के करीब किरण

अपनी 2 सहेलियों शिखा व नेहा के साथ अचानक हमारे घर आ पहुंची. ये दोनों भी कालेज में राजीव के साथ पढ़ी थीं. इन के आते ही घर का माहौल तो एकदम से खुशनुमां हो गया, पर मैं खिंचीखिंची सी

बनी रही.

‘‘राजीव, जितनी तुम तारीफ फोन पर करते थे, वंदना तो उस से कहीं गुणा ज्यादा सुंदर और स्मार्ट है,’’ शिखा के मुंह से मेरी तारीफ सुन कर राजीव खुश हो गए.

‘‘तुम्हारी तो लौटरी निकल आई इै इतनी अच्छी पत्नी पा कर. इसी बात पर आज पार्टी हो जाए?’’ नेहा की आंखों में भी मैं ने अपने लिए प्रशंसा के भाव साफ देखे.

‘‘बिलकुल हो जाए,’’ राजीव ने फौरन खुशी से जवाब दिया.

‘‘मिठाई में हमारी पसंद याद है या भूल गए हो?’’ किरण ने बड़ी अदा से पूछा.

‘‘नेहा को रसमलाई, शिखा को रसगुल्ले और तुम्हें काजू की बरफी पसंद है. मैं कुछ नहीं भूला हूं.’’

‘‘तो किस की पसंद की मिठाई खिलाओगे?’’

‘‘मेरी.’’

‘‘मेरी.’’

‘‘नहीं, मेरी.’’

‘‘अरे, परेशान मत होओ.

मैं तीनों की पसंद की मिठाई ले आता हूं.’’

‘‘यह हुई न बात. तुम बिलकुल नहीं बदले हो. कितना बड़ा दिल है तुम्हारा,’’ किरण के मुंह से अपनी तारीफ सुनते ही राजीव ने विजयी भाव से मेरी तरफ देखा.

‘‘मैं अभी गया और अभी आया,’’ कह वे एकदम बाजार जाने को उठ खड़े हुए.

‘‘अभी रुको. थोड़ी देर बाद सब साथ चलेंगे. पहले तुम्हारी जानेमन वंदना के हाथ की बनी चाय तो पी लें.’’

‘‘चाय तो मैं अभी बना कर लाती हूं पर मुझे इन की जानेमन समझने की भूल न करें. इन की जानेमन तो कोई और है,’’ अपनी शिकायत बताने के बाद मैं रसोई में जाने को उठ खड़ी हुई.

‘‘लगता है कालेज में इस के सिर के ऊपर हर लड़की से प्रेम करने का जो भूत सवार रहता था, वह अभी भी उतरा नहीं है,’’ शिखा की इस टिप्पणी पर वे तीनों खिलखिला कर हंसीं.

किरण ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे किचन में जाने से रोका और अपने पास बैठाते हुए बोली, ‘‘हमें जाने की कोई जल्दी नहीं है. चाय कुछ देर बाद पी लेंगे. वैसे सहेलियां आज बहुत समय बाद राजीव के हाथ की बनी चाय पी जाए तो

कैसा रहेगा?’’

राजीव तो चाय बनाने को फौरन तैयार हो गए थे. वे तीनों उन के साथ रसोई में चली आई. वहां उन्होंने मुझे कोई काम नहीं करने दिया.

कुछ देर बाद ही रसोई में बहुत शोर मचने लगा.

‘‘अरे, इतनी ज्यादा चाय की पत्ती मत डालो.’’

‘‘अरे, अभी से चीनी क्यों डाल रहे हो?’’

‘‘कैसे भोंदू हो गए हो जो ढंग की चाय बनाना भी भूल गए हो. लगता है वंदना कोई काम तुम से नहीं कराती है.’’

‘‘आज पकौड़े बना कर नहीं खिलाओगे?’’

‘‘पकौड़ों को रहने दें… हमें पेट खराब नहीं करना है.’’

वे तीनों राजीव का खूब मजाक उड़ा रही थीं. लेकिन उन का व्यवहार बहुत दोस्ताना था. कभीकभी मुझे भी अपनी हंसी रोकना मुश्किल हो जाता था.

कुछ देर बाद हम सब ड्राइंगरूम में बैठ कर राजीव द्वारा बनाई गई चाय का आनंद ले रहे थे. चाय अच्छी बनी थी और सब के मुंह से अपने काम की प्रशंसा सुन वे फूले नहीं समा रहे थे.

‘‘राज, आज एक बढि़या सा गाना भी हो जाए,’’ किरण के मुंह से निकला तो बाकी दोनों भी गाना सुनाने के लिए उन के पीछे पड़ गई.

‘‘अब प्रैक्टिस नहीं रही है. मैं नहीं गा पाऊंगा,’’ राजीव ने गाने से बचने की कोशिश करी.

‘‘मेरी खातिर गाओ न,’’ किरण ने बड़ी अदा से जोर डाला तो ये गाना गाने को सचमुच तैयार हो गए और कमरे में एकदम से वे तीनों हल्ला मचाने लगीं.

‘‘कौन सा गाना सुनाओगे?’’

‘‘जब मुझ से इश्क लड़ा रहे थे तब ‘चौहदवीं का चांद हो…’ सुनाया था. आज वही सुना दो.’’

‘‘नहीं, पार्क में मेरे साथ घूमते हुए मेरी तारीफ में जो ‘तेरे हुस्न की क्या तारीफ करूं…’ गीत गुनगुनाते थे वही सुना दो.’’

‘‘नहीं, वह मेरी पसंद का गाना सुनाइगा.’’

कुछ देर बाद जब राजीव ने किरण की पसंद का गाना गाया तो हम सब की हंसतेहंसते हालत खराब हो गई. उन से न सुर सध रहा था, न ताल. आवाज कहीं की कहीं जा रही थी.

वे बारबार रुक जाते थे पर उन तीनों ने पीछे पड़ कर गाना पूरा करवा ही लिया. गाना खत्म कर के इन्होंने मुझे सफाई सी दी, ‘‘मैं कालेज के दिनों में अच्छा सिंगर होता था. कुछ दिन रियाज करने के बाद देखना मैं कितना बढि़या गाने लगूंगा.’’

‘‘यह राजीव लड़कियों में भी सब से पौपुलर युवक होता था हमारे कालेज का, वंदना.’’

‘‘जब यह लड़कियों पर अनापशनाप खर्चा करने को हमेशा तैयार रहता था तो पौपुलर कैसे न होता?’’

‘‘मुझे इस ने कम से कम 20 फिल्में तो दिखाई ही होंगी.’’

‘‘मैं ने 50 देखी होंगी.’’

‘‘मैं ने 100 से ऊपर.’’

‘‘तू तो खास सहेली थी न इस की.’’

वे राजीव की पुरानी बातें याद कर खूब देर तक हंसती रहीं और फिर अचानक किरण ने कहा, ‘‘अब चलो भी. देर हो रही है. मेरा बेटा और पति लंच करने को तैयार बैठे होंगे.’’

‘‘ऐसे कैसे जाओगी? अभी तो तुम लोगों ने मनपसंद मिठाई भी नहीं खाई है,’’ राजीव बाजार जाने को फौरन उठ खड़े हुए.

‘‘मिठाई फिर कभी खा लेंगे. अभी तो तुम बस कोल्ड ड्रिंक ही पिला दो अपने हाथों से ला कर,’’ किरण ने राजीव को रसोई की तरफ जबरदस्ती धकेल दिया.

वे चले गए तो किरण ने संजीदा हो कर मुझ से कहा, ‘‘मैं ने राजीव से शादी क्यों नहीं करी, अब जल्दी से अपने सवाल का जवाब सुनो, वंदना. हमारे आज के व्यवहार से तुम्हें अंदाजा हो गया होगा कि राजीव को हम ने मनोरंजन के माध्यम से ज्यादा कभी कुछ नहीं समझा था. उस जैसे सीधेसादे लड़केलड़कियों के अच्छे दोस्त बन ही जाते हैं पर उस से शादी करने का विचार कभी हम में से किसी के दिल में आया ही नहीं था.

‘‘मैं इस के साथ बस फ्लर्ट करती थी पर जब यह सीरियस हो गया तो मुझे मजबूरन अपनी मम्मी को बीच में लाना पड़ा था. वे विजातीय लड़के से मेरी शादी करने को बिलकुल तैयार नहीं हैं, यह कह कर मैं ने अपनी जान छुड़ाई थी.

‘‘अब मेरी एक बात ध्यान से सुनो. अगर तुम हमारी तरह इसे अपनी उंगलियों पर नचाना चाहती हो तो इस की एक कमजोर नस मैं तुम्हें बताती हूं. यह दूसरों की नजरों में खास बने रहने को कुछ भी करेगा और कहेगा. इस के डींग मारने वाले व्यवहार से नाराज व दुखी रहने के बजाय तुम इस की झूठीसच्ची तारीफ कर के इस से कुछ भी करा सकती हो.’’

राजीव के लौट आने के कारण वह आगे और कुछ नहीं कह पाई थी. कोल्ड ड्रिंक पीने के बाद उन तीनों ने बारीबारी से मेरा माथा चूमा और खूब होहल्ला मचाते हुए अपनेअपने घर चली गईं.

उन के जाते ही राजीव ने मुझ से छाती चौड़ी करते हुए पूछा, ‘‘तुम्हें बुरा तो नहीं लग रहा है न?’’

‘‘किस बात का?’’ मैं ने उन की आंखों में प्यार से झांक कर पूछा.

‘‘यही कि मेरी चाहने वालियों की आज भी कोई कमी नहीं है.’’

‘‘बिलकुल भी नहीं. आप हो ही इतने स्मार्ट,’’ पहले वाले अंदाज में नाराज हो कर मुंह फुलाने के बजाय मैं ने इन के गले में प्यार से बांहें डाल कर यह जवाब दिया तो इन का चेहरा खिल उठा.

‘‘वैसे आज की तारीख में ये सब तुम्हारे सामने कुछ भी नहीं हैं,’’ इन के मुंह से यों उलटी गंगा बहती देख मैं मन ही मन खुशी से झूम उठी और मन ही मन किरण को धन्यवाद दिया जिस ने मुझे इन की कमजोर नस पकड़वा दी थी.

Summer Special: फ्रोजेन फूड के इस्तेमाल से पहले जानें कुछ बातें 

आजकल वर्क फ्रॉम होम सामान्य स्थिति बन चुकी है। घरेलू कार्य में मदद करने वाले की कमी और लंबे समय तक कार्य करने की वजह से हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। मेडिटेशन, योग और लंबी सांस वाले व्यायाम के जरिए हम इस तरह के चुनौतीपूर्ण समय में मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की लगातार कोशिश की जा रही है. इसके अलावा सुरक्षित, स्वास्थ्यवर्धक, स्वच्छ और स्वादिष्ट होने के साथ समय की बचत करने वाला भोजन का विकल्प आज की जरूरत बन गया है.

इस बारें में गोल्ड फ्रोजेन फ़ूड के डायरेक्टर और एक्सपर्ट अर्चित गोयल बताते है कि अगर आप हर दिन आसानी से बनने वाले और स्वादिष्ट और कुछ अलग भोजन की तलाश में है तो फ्रोजेन फूड्स को ट्राय कर सकते है, जो गुणवत्ता और स्वाद में अच्छा होता है. आजकल फ्रोजेन फूड्स की उपयोगिता बढ़ चुकी है. आइये जाने इसकी उपयोगिता और खरीदते वक्त कुछ सावधानियां, जो जरुरी है, ताकि आपको घर पर स्वादिष्ट भोजन के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता भी मिल सकें. ध्यान रखने योग्य बातें निम्न है,

  • ऐसा माना जाता है कि मार्केट में उपलब्ध कोई भी खाना कई हाथों से गुजरकर आपके घर तक पहुंचता है, लेकिन ऐसा नहीं होता, फ्रोजेन फूड्स सुरक्षित और ताजा होता है, क्योंकि वो ब्लास्ट, आईक्यूएफ या स्पायरल फ्रीजिंग तकनीक के जरिए तैयार होता है, जो आपके भोजन को कई बार ताजे बनाए, भोजन से भी ज्यादा ताजा रख सकता है, वो भी 12 महीने तक आपको वैसी ही गुणवत्ता और स्वाद मिल सकता है.
  • इसके लिए किसी भी नामचीन ब्रांड के फ्रोजेन फ़ूड को लें, ताकि व्यंजन की प्रिजर्वेटिव, कलर, फ्लेवर या ट्रांस फैट्स न हो, जो आपके स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक न हो, क्योंकि भोजन फ्रोजेन है, सही तरीके से प्रोसेस किया गया फ़ूड उसके पोषक तत्व और स्वाद को अधिक दिनों तक बनाये रखती है.
  • अभी अधिकतर लोग वर्क फ्रॉम होम कर रहे है, ऐसे में काम का बोझ सभी पर अधिक हो चुका है, क्योंकि काम के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियां भी पूरी तरह से निभानी पड़ रही है. साथ ही कोरोना संक्रमण की वजह से लोग बाहर से खाना मंगाने से भी डर रहे है, ऐसे में फ्रोजेन फ़ूड का आप्शन काफी अच्छा विकल्प है, जिसमें आप रोज-रोज के खाने से कुछ अलग ट्राय कर सकते है. जिसे बनाने में भी समय कम लगता है. ‘रेडी टू कुक’ खाने को कोई भी आसानी से इसके निर्देश के अनुसार बनाकर खा सकता है.
  • मिलेनियल्स और पेशेवर जिंदगी में व्यस्त लोगों के लिए, परिवार के लिए और बैचलर्स के लिए फ्रोजेन फूड्स एक व्यावहारिक विकल्प है, जो कि स्वादिष्ट, स्वच्छ और किफायती होने के साथ ही पौष्टिक और लंबे समय तक ताजा रहने वाला भी होता है.
  • फ्रोजेन मटर, स्माइली, नगेट्स, पोटैटो फ्राइज के अलावा कई कंपनियों ने नए और बेहद स्वादिष्ट अलग अलग तरह के भारतीय व्यंजन मसलन किनोआ पैटिज, सोया शमी कबाब, कई प्रकार के पराठे, स्नैक्स आदि कई आप्शन शुरू किये है, जिसे आप अपनी स्वादनुसार खरीद सकते है.
  • फ्रोजेन फूड्स सुरक्षित होते है, क्योंकि इसमें बाहर जाकर या मंगवाकर खाना नहीं पड़ता, इसलिए किसी प्रकार के संक्रमण से आप दूर रह सकते है, अलग-अलग तरह के स्वादिष्ट भोजन का आनंद आप इसके द्वारा ले सकते है.
  • फ्रोजेन फूड्स एक बेहद फ्लेक्सिबल पैकेजिंग के साथ आता है जो खाने को सुरक्षित रखने की पूरी जिम्मेदारी निभाता है, इसलिए ये भोजन को दूषित होने से बचाता है और सुरक्षित स्टोर करता है जिससे उपभोक्ता आसानी से इसका प्रयोग कर सकें.
  • फ्रोजेन फूड का विकल्प अक्सर ताजे और ऑर्गेनिक उत्पादों से सस्ता होता है, ये रेडी टू ईट खाने का विकल्प है जो समय बचाने के साथ-साथ कई प्रकार की सहूलियतें भी देता है.
  • इसे खरीदने से पहले पैकेट पर लगाए गए लेबल को भी देखें जिससे कि आप ये जान सकें कि जो खरीद रहे हैं उसमें क्या है और जो तैयार खाना आप खरीदते हैं उसमें क्या क्या मिलाया गया है, जो भी सामग्री उसमें डाली गई है चाहे प्रिजर्वेटिव, ट्रांसफैट, नमक, चीनी या सॉस हो उसे देखे और अपने अनुसार ही ख़रीदे.
  • याद रखें कि फ्रोजेन फूड्स को 18 डिग्री या उससे कम तापमान पर रखना होता है और एकबार निकालने के बाद उनका दोबारा इस्तेमाल करना सही नहीं होता.

एकांत कमजोर पल: जब सनोबर ने साहिल को गैर महिला की बांहों में देखा

वकील साहब का हंसताखेलता परिवार था. उन की पत्नी सीधीसाधी घरेलू महिला थी. वकील साहब दिलफेंक थे यह वे जानती थीं पर एक दिन सौतन ले आएंगे वह ऐसा सोचा भी नहीं था. उस दिन वे बहुत रोईं.

वकील साहब ने समझाया, ‘‘बेगम, तुम तो घर की रानी हो. इस बेचारी को एक कमरा दे दो, पड़ी रहेगी. तुम्हारे घर के काम में हाथ बटाएगी.’’

वे रोती रहीं, ‘‘मेरे होते तुम ने दूसरा निकाह क्यों किया?’’

वकील साहब बातों के धनी थे. फुसलाते हुए बोले, ‘‘बेगम, माफ कर दो. गलती हो गई. अब जो तुम कहोगी वही होगा. बस इस को घर में रहने दो.’’

बेगम का दिल कर रहा था कि अपने बच्चे लें और मायके चली जाएं. वकील साहब की सूरत कभी न देखें. पर मायके जाएं तो किस के भरोसे? पिता हैं नहीं, भाइयों पर मां ही बोझ है. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि शादी के 14 साल बाद 40 साल की उम्र में वकील साहब यह गुल खिलाएंगे. बसाबसाया घर उजड़ गया.

वकील साहब ने नीचे अपने औफिस के बगल वाले कमरे में अपनी दूसरी बीवी का सामान रखवा दिया और ऊपर अपनी बड़ी बेगम के पास आ गए जैसे कुछ हुआ ही नहीं. बड़ी बेगम का दिल टूट गया. इतने जतन से पाईपाई बचा कर मकान बनवाया था. सोचा भी न था कि गृहस्थी किसी के साथ साझा करनी पड़ेगी.

दिन गुजरे, हफ्ते गुजरे. बड़ी बेगम रोधो कर चुप हो गईं. पहले वकील साहब एक दिन ऊपर खाना खाते और एक दिन नीचे. फिर धीरेधीरे ऊपर आना बंद हो गया. उन की नई बीवी में चाह इतनी बढ़ी कि वकालत पर ध्यान कम देने लगे. आमदनी घटने लगी और परिवार बढ़ने लगा. छोटी बेगम के हर साल एक बच्चा हो जाता. अत: खर्चा बड़ी बेगम को कम देने लगे.

बड़ी बेगम ने हालत से समझौता कर लिया था. हाईस्कूल पास थीं, इसलिए महल्ले के ही एक स्कूल में पढ़ाने लगीं. बच्चों की छोटीमोटी जरूरतें पूरी करतीं. शाम को घर पर ही ट्यूशन पढ़ातीं जिस से अपने बच्चों की ट्यूशन की फीस देतीं. अब उन का एक ही लक्ष्य था अपने बेटेबेटी को खूब पढ़ाना और उन्हें उन के पैरों पर खड़ा करना. पति और सौतन के साथ रहने का उन का निर्णय केवल बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए ही था. वे जानती थीं कि बच्चों के लिए मांपिता दोनों आवश्यक हैं.

अब सारे घर पर छोटी बेगम का राज था. बड़ी बेगम और उन के बच्चे एक कमरे में रहते थे जहां कभी किसी विशेष कारण से वकील साहब बुलाए जाने पर आते.

इस तरह समय बीतता गया और फिर एक दिन वकील साहब अपनी 5 बेटियों और छोटी बेगम को छोड़ कर चल बसे. छोटी बेगम ने जैसेतैसे बेटियों की शादी कर दी. मकान भी बेच दिया.

बड़ी बेगम की बेटी सनोबर की एक अच्छी कंपनी में जौब लग गई थी. देखने में सुंदर भी थी पर शादी के नाम से भड़कती थी. वह अपनी मां का अतीत देख चुकी थी अत: शादी नहीं करना चाहती थी. बड़ी बेगम के बहुत समझाने पर वह शादी के लिए राजी हो गई. साहिल अच्छा लड़का था, परिवार का ही था.

सनोबर ने शादी के लिए हां तो कर दी पर अपनी शर्तें निकाहनामे में रखने को कहा.

साहिल ने कहा, ‘‘मुझे तुम्हारी हर शर्त मंजूर है.’’

सनोबर ने बात साफ की, ‘‘ऐसे कह देने से नहीं, निकाहनामे में लिखना होगा की मेरे रहते तुम दूसरी शादी नहीं करोगे और अगर कभी हम अलग हों और हमारे बच्चे हों तो वे मेरे साथ रहेंगे.’’

सनोबर को साहिल बचपन से जानता था. उस के दिल का डर समझता था. बोला, ‘‘सनोबर निकाहनामे में यह भी लिख देंगे और भी जो तुम कहो. अब तो मुझ से शादी करोगी?’’

सनोबर मान गई और दोनों की शादी हो गई. दोनों की अच्छी जौब, अच्छा प्लैट, एक प्यारी बेटी थी. कुल मिला कर खुशहाल जीवन था सनोबर का. शादी के 12 साल कैसे बीत गए पता ही नहीं चला.

सनोबर का प्रमोशन होने वाला था. अत: वह औफिस पर ज्यादा ध्यान दे रही थी. घर बाई ने ही संभाल रखा था. बेटी भी बड़ी हो गईर् थी. वह अपना सब काम खुद ही कर लेती थी. सनोबर उस को भी पढ़ाने का समय नहीं दे पाती. अत: ट्यूशन लगा दिया था. सनोबर का सारा ध्यान औफिस के काम पर था. घर की ओर से वह निश्चिंत थी. बाई ने सब संभाल लिया था.

औफिस के काम से सनोबर 2 दिनों के लिए बाहर गई थी. आज उसे रात को आना था पर उस का काम सुबह ही हो गया तो वह दिन में ही फ्लाइट से आ गई. इस समय बेटी स्कूल में होगी, पति औफिस में और बाई तो 5 बजे आएगी. वह अपनी चाबी से दरवाजा खोल कर अंदर आई तो देखा लाईट जल रही है. बैडरूम

से कुछ आवाज आई तो वह दबे पैर बैडरूम तक गई तो देख कर अवाक रह गई. साहिल और बाई एक साथ…

वह वापस ड्राइंगरूम में आ गई. साहिल दौड़ता हुआ आया और बाई दबे पैर खिसक ली.

साहिल सनोबर को सफाई देने लगा, ‘‘मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था. मेरी तबीयत खराब थी तो वह सिर दबाने लगी और मैं बहक गया. उस ने भी मना नहीं किया.’’

वह और भी जाने क्याक्या कहता रहा. सनोबर बुत बनी बैठी रही. वह माफी मांगता रहा.

सनोबर धीरे से उठी और अपने और अपनी बच्ची के कुछ कपड़े बैग में डालने लगी. बच्ची आई तो उसे ले कर अपनी अम्मी के पास चली गई. साहिल उसे रोकता रहा, माफी मांगता रहा पर सनोबर को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.

घर आ कर मां से सारी बात बताई और फफक कर रो पड़ी, ‘‘साहिल ने मुझे धोखा दिया. अब मैं उस के साथ नहीं रह सकती.’’

बड़ी बेगम का दिल रो पड़ा. वर्षों पहले जिस आग में उन का घर जला था आज उन की बेटी के घर पर उस की आंच आ गई.

निकाह में शर्तें रखने से भी क्या हुआ? सब मर्द एकजैसे होते हैं, जब जिसे मौका मिल जाए कोई नहीं चूकता.

बड़ी बेगम ने बेटी को संभाला, ‘‘बेटी मैं तुम्हारा दुख समझ सकती हूं. तुम सो जाओ.’’ और उस का सिर अपनी गोद में रख कर सहलाने लगीं.

दूसरे दिन जब सनोबर औफिस गई और बच्ची स्कूल तो साहिल आया. जानता था बड़ी बेगम अकेली होगी. नौकरानी ने बैठाया. बड़ी बेगम को सलाम कर के बैठ गया. धीरे से बोला, ‘‘खालाजान, मुझ से बड़ी गलती हो गई. मैं एक कमजोर पल में बहक गया था. मुझ से गलती हो गई. मैं कसम खाता हूं अब कभी ऐसा नहीं होगा. मुझे माफ कर दीजिए, सनोबर से माफ करवा दीजिए,’’ इतना सब वह एक सांस में ही कह गया था.

बड़ी बेगम चुप रहीं. उन को बहुत दुख था और गुस्सा भी. साहिल की बातों और आंखों में शर्मिंदगी और पछतावा था. वे धीरे से बोलीं, ‘‘मैं कुछ नहीं कर सकती, जैसा सनोबर चाहे.’’

‘‘खालाजान मेरा घर टूट जाएगा, मेरी बेटी मेरे बारे में क्या सोचेगी? मैं सनोबर के बिना जी नहीं सकता.’’

बड़ी बेगम कुछ न कह सकीं.

शाम को जब सनोबर औफिस से आई तो बड़ी बेगम ने बताया कि साहिल आया था और माफी मांग रहा था.

सनोबर ने गुस्सा किया, ‘‘आप ने उसे आने क्यों दिया? हमारा कोई रिश्ता नहीं उस से. मैं तलाक लूंगी.’’

बड़ी बेगम को याद आया जब वकील साहब दूसरी बीवी ले आए थे तो वे भी मायके जाना चाहती थीं पर उन का न तो कोई सहारा था न वे अपने पैरों पर खड़ी थीं. आज सनोबर अपने पैरों पर खडी है. अपने फैसले खुद ले सकती है. फिर सोचने कि लगीं तलाक से इस मासूम बच्ची का क्या होगा? मां या बाप किसी एक से कट जाएगी. अगर दोनों ने दूसरी शादी कर ली तो इस का क्या होगा? वे अंदर ही अंदर डर गईर्ं. अपने बेटे को सनोबर और साहिल के बारे में बताया तो वह दूसरे दिन ही आ गया. दोनों बहनभाई की एक ही राय थी कि तलाक ले लिया जाए. साहिल रोज फोन करता, मैसेज भेजता पर सनोबर जवाब न देती.

साहिल बड़ी बेगम से मिन्नतें करता, ‘‘खालाजान, आप सब ठीक कर सकती हैं. एक बार मुझे माफ कर दीजिए और सनोबर से भी माफ करवा दीजिए. मैं अपनी गलती के लिए बहुत शर्मिंदा हूं.’’

एक दिन सनोबर औफिस से अपने फ्लैट पर कुछ सामान लेने गई तो उस ने देखा घर बिखरा है. किचन में भी कुछ बाहर का खाना पड़ा है. वह समझ गई बाई नहीं आ रही है. घर में हर तरफ लिखा था, ‘आई एम सौरी, वापस आ जाओ सनोबर.’ सनोबर को लगा साहिल 40 साल का नहीं, कोई नवयुवक हो और उसे मना रहा हो.

धीरेधीरे कई कोशिशों के बाद साहिल ने बड़ी बेगम को विश्वास दिला दिया कि यह एक कमजोर पल की भूल थी. उस ने पहले कभी कोई बेवफाई नहीं की. बड़ी बेगम ने सोचा यह तो सच है कि साहिल से भूल हो गई, अपनी गलती पर उसे शर्मिंदगी भी है, माफी भी मांग रहा है. प्रश्न बच्ची का भी है. वह दोनों में से किसी एक से छिन जाएगी. तो क्या इसे एक अवसर देना चाहिए?

बड़ी बेगम ने साहिल को बताया कि सनोबर तलाक लेने की तैयारी कर रही है. यह सुनते ही साहिल दौड़ादौड़ा आया, ‘‘खालाजान, अगर सनोबर ने तलाक की अर्जी डाली तो मैं मर जाऊंगा, मुझे एक मौका दीजिए और बच्चों की तरह रोने लगा.’’

बड़ी बेगम को दया आने लगी बोलीं, ‘‘तुम रो मत मैं आज बात करूंगी.’’

सनोबर बोली, ‘‘औफकोर्स अम्मी.’’

बड़ी बेगम ने भूमिका बांधी, ‘‘जब तुम्हारे अब्बू दूसरी बीवी ले आए थे तो मैं भी उन्हें छोड़ना चाहती थी पर सामने तुम दोनों बच्चे थे.’’

‘‘आप की बात अलग थी मैं खुद को और अपनी बच्ची को संभाल सकती हूं. उस की गलती की सजा उसे मिलना ही चाहिए, सनोबर बोली.’’

‘‘उस की गलती की सजा उस के साथसाथ तुम्हारी बेटी को भी मिलेगी या तो उस का बाप छिनेगा या मां और अगर तुम दोनों ने दूसरी शादी कर ली तो इस का क्या होगा?’’

‘‘अम्मी एक शादी से दिल नहीं भरा जो दूसरी करूंगी? रह गया पिता तो ऐसे पिता के होने से ना होना भला,’’ सनोबर के मन की सारी कड़वाहट होंठों पर आ गई.

बड़ी बेगम जानती थीं इस का गुस्सा निकलना अच्छा है. उन्होंने बहस नहीं की.

बोलीं, ‘‘ठीक है तुम को लगता है तुम अकेली ही अच्छी परवरिश कर सकती हो तो ठीक है, पर मैं चाहती हूं कि तुम तलाक की अर्जी 6 महीने बाद दो. कुछ वक्त दो फिर जो तुम्हारा फैसला होगा मैं मानूंगी.’’

‘‘नो वे अम्मी मैं 6 दिन भी न दूं. जबजब मुझे याद आता है साहिल और बाई… घिन आती है उस के नाम से. कोई इतना गिर सकता है?’’

बड़ी बेगम ने दुनिया देखी थी. अपने पति को बहुतों के साथ देखा था. उन्होंने अपने अनुभव का निचोड़ बताया, ‘‘वह एक वक्ती हरकत थी. उस का कोई अफेयर नहीं था. जब एक औरत और एक मर्द अकेले हों तो दोनों के बीच तनहाई में एक कमजोर पल आ सकता है.’’

मैं भी तो औफिस में अकेली मर्दों के साथ घंटों काम करती हूं. मेरे साथ तो कभी ऐसा नहीं हुआ. आत्मसंयम और मर्यादा ही इंसान होने की पहचान हैं वरना जानवर और आदमी में क्या फर्क है?’’

‘‘मैं ने अब तक तुम से कुछ नहीं कहा पर बहुत सोच कर तुम से समय देने को कह रही हूं. आगे तुम्हारी जो मरजी.’’

‘‘ठीक है आप कहतीं हैं तो मान लेती हूं पर मेरे फैसले पर कोई असर नहीं पड़ेगा.’’

सनोबर यह सोच कर मान गई कि उसे भी तो कुछ काम निबटाने हैं. प्रौपर्टी के पेपर अपने नाम करवाना और सेविंग्स में नौमिनी बदलना आदि. फिर अभी औफिस का भी प्रैशर है. रात को रोज की तरह साहिल ने फोन किया तो सनोबर ने उठा लिया.

साहिल खुशी और अचंभे के मिलेजुले स्वर में बोला, ‘‘सनोबर मुझे माफ कर दो, वापस आ जाओ.’’

सनोबर ने तटस्थ स्वर में कहा, ‘‘मुझे तुम से मिलना है.’’

साहिल बोला, ‘‘हां, हां… जब कहो.’’

सनोबर बोली, ‘‘कल औफिस के बाद घर पर.’’ और फोन रख दिया.

औफिस के बाद सनोबर घर पहुंची. साहिल उस की प्रतिक्षा कर रहा था. घर भी उस ने कुछ ठीक किया था. साहिल ने सनोबर का हाथ पकड़ना चाहा तो उस ने झिड़क दिया और दूर बैठ गई.

‘‘साहिल मैं कोई तमाशा नहीं करना चाहती. शांति से सब तय करना चाहती हूं. मेरातुम्हारा जौइंट अकाउंट बंद करना है. इंश्योरैंस पौलिसीज में नौमिनी हटाना है. इस फ्लैट में तुम्हारा जो पैसा लगा वह तुम ले लो. मैं इसे अपने नाम करवाना चाहती हूं. मुझे तुम से कोई पैसा नहीं चाहिए, मैं काजी के यहां खुला (औरत की ओर से निकाह तोड़ना) की अर्जी देने जा रही हूं.’’

थोड़ी देर के लिए साहिल चुप रहा फिर बोला, ‘‘सनोबर, मेरा जो कुछ है सब तुम्हारा और हमारी बेटी का है. तुम सब ले लो मुझे मेरी सनोबर दे दो. मुझे एक बार माफ कर दो. मेरी गलती की इतनी बड़ी सजा न दो. अगर तुम मेरी जिंदगी में नहीं तो मैं यह जिंदगी ही खत्म कर दूंगा,’’ सनोबर जानती थी साहिल भावुक है पर इतना ज्यादा है यह नहीं जानती थी. वह उठ कर चली गई.

अब बस औफिस जाने और मन लगा कर काम करने में और बेटी के साथ उस का समय बीतने लगा. बड़ी बेगम के कहने पर और बेटी की जिद पर वह राजी हुई कि साहिल सप्ताह में एक बार बेटी से मिल सकता है. उसे बाहर ले जा सकता है. वह नहीं चाहती थी कि उस की बेटी को उस के पिता की असलियत पता चले. इस आयु में यदि उसे पिता के घिनौने कारनामे का पता चलेगा तो वह जाने क्या प्रतिक्रिया करे. साहिल सप्ताह में 2 घंटे के लिए बेटी को घुमाने ले जाता, गिफ्ट दिलाता और सनोबर की पसंद का भी कुछ बेटी के साथ भेजता पर सनोबर आंख उठा कर भी न देखती.

तभी सनोबर की पदोन्नति हुई साथ ही मुख्यालय में तबादला भी. सनोबर को न चाह कर भी दिल्ली जाना पड़ा. बेटी को नानी के पास छोड़ना पड़ा. स्कूल का सैशन समाप्त होने में अभी 2 महीने थे. बड़ी बेगम ने आश्वासन दिया, ‘‘मैं संभाल लूंगी तुम जाओ मगर हर वीकैंड पर आ जाना.’’

मुख्यालय में उस के कुछ पूर्व साथी भी थे, सब ने स्वागत किया. एक प्रोजैक्ट में उस को समीर के साथ रखा गया. समीर भी सनोबर का पुराना साथी था और उस पर फिदा भी था.

समीर और सनोबर साथसाथ काम करते हुए काफी समय एकदूसरे के साथ बिताते. सनोबर ने साहिल और अपने बारे में समीर को नहीं बताया. जिस प्रोजैकट पर दोनों काम कर रहे थे उस में क्लाइंट की लोकेशन पर भी जाना होता था. दोनों साथसाथ जाते, होटल में रहते और काम पूरा कर के आते. घंटों अकेले एकसाथ काम करते. आज भी दोनों सुबह की फ्लाइट से गए थे. दिन भर काम कर के रात को होटल पहुंचे. समीर बोला, ‘‘फ्रैश हो लो फिर खाना खाने नीचे डाइनिंगरूम में चलते हैं.’’

सनोबर बोली, ‘‘तुम जाओ. मैं अपने रूम में ही कुछ मंगवा लूंगी.’’

समीर बोला, ‘‘ठीक है मेरा भी कुछ और्डर कर देना, साथ ही खा लेंगे.’’

सनोबर को समीर चाहता भी था, उस का आदर भी करता था. सनोबर के हैड औफिस आने के बाद समीर ने कभी अपने पुराने प्यार को प्रकट नहीं किया. वह अपनी पत्नी और बच्चों में खुश था.

समीर सनोबर के कमरे में आ गया. खाना आने की प्रतीक्षा में दोनों काम से जुड़ी बातें ही करते रहे. समीर की पत्नी का फोन भी आया. समीर की और उस की पत्नी की बातों से लग रहा था दोनों सुखी व संतुष्ट हैं.

समीर ने साहिल के बारे में पूछा तो सनोबर बात टाल गई. फिर खाना आया, दोनों खाना खातेखाते पुराने दिनों की बातें करने लगे.

समीर ने सनोबर से पूछा, ‘‘अच्छा एक बात बताओ यदि तुम साहिल से शादी न करतीं तो क्या मुझ से शादी करतीं?’’

सनोबर झिझकी फिर बोली, ‘‘शायद हां.’’

समीर ने मजाकिया अंदाज में कहा, ‘‘अरे पहले बताती तो मैं उस को गोली मार देता,’’ बात आईगई हो गई. दोनों ने खाना खाया फिर समीर अपने कमरे में चला गया.

सनोबर सोचने लगी समीर अच्छा दोस्त हैं. फिर जाने क्यों साहिल याद आ गया. वह काफी थकी थी. कुछ ही देर में सो गई. अगले दिन भी दोनों बहुत व्यस्त रहे.

‘‘आज भी खाना कमरे में मंगवाते हैं ठीक है?’’ समीर ने पूछा तो सनोबर बोली, ‘‘हां, ठीक है.’’

फिर समीर फ्रैश हो कर सनोबर के कमरे में आ गया. खाना और्डर कर के दोनों बातें करने लगे. सनोबर को खाते समय खाना सरक गया वह खांसने लगी. समीर ने उसे जल्दी से पानी निकाल कर दिया. पानी पी कर ठीक हुई. खाने के बाद समीर ने चाय बना कर सनोबर की दी तो दोनों का हाथ एकदूसरे से टकराया. दोनों चुपचाप धीरेधीरे चाय पीने लगे.

एक अजीब सा सन्नाटा छा गया. दोनों पासपास बैठे थे. एक अजीब सी चाह सनोबर ने अपने मन में महसूस की जैसे वह समीर के सीने से लग के रोना चाहती हो. फिर उस ने देखा समीर की निगाहें भी उस के ऊपर टिकी हैं. शायद वह भी सनोबर को अपनी बांहों में जकड़ना चाहता है. तभी उसे लगा कहीं यही वह एकांत कमजोर पल तो नहीं है जिस के बारे में अम्मी कह रही थी. वह संभल गई और उठ कर इधरउधर कुछ रखनेउठाने लगी. समीर से बोली, ‘‘अच्छा, कल मिलते हैं.’’

समीर भी उठते हुए बोला, ‘‘हां देर हो गई, गुड नाईट.’’

अगले दिन दोनों वापस आ गए. सनोबर अपनी अम्मी के पास चली गई. अम्मी उसे बताने लगीं कि उस की बेटी खाने में नखरा करती है. साहिल बेटी का बहुत ध्यान रखता है. अपने साथ ले जाता है, बराबर फोन करता है. अम्मी साहिल की प्रशंसा किए जा रही थीं.

सनोबर ने साहिल को फोन किया, ‘‘मैं तुम से मिलना चाहती हूं अभी.’’ वह साहिल से मिलने चल पड़ी. साहिल पलकें बिछाए उस की राह ताक रहा था. घर लगता था साहिल ने ही साफ किया था. बैडरूम पर नजर गई तो बदलाबदला लग रहा था. साहिल बहुत प्यार से बोला, ‘‘अब तो वापस आ जाओ, मुझे माफ कर दो.’’

सनोबर एकांत कमजोर पल क्या होता है यह जान चुकी थी. उस ने साहिल को माफ कर दिया. साहिल ने सनोबर का हाथ पकड़ा और दोनों एकदूसरे के बहुत पास आ गए.

तितली: जूनी के दिल में क्यों थी कसमसाहट

आजजूनी का पार्लर में अपौइंटमैंट था. जब जूनी की नईनई शादी हुई थी तो उसे बहुत मजा आता था पर अब उसे ये सब सजा सा लगता है. कारण है कि पहले उस का मन करता था पर अब उस का शरीर और मन दोनों ही शिथिल हो गए हैं.

जूनी 27 साल की है. बड़ीबड़ी आंखें, हलकी सी उठी हुई नाक, हलके गुलाबी होंठ, कंधे तक बिखरे गहरे काले बाल जो स्टैप, कटिंग के कारण बिखरे हुए लगते थे. गेहूं की लुनाई लिए रंग, सुडौल बदन और मध्यम कद. कुल मिला कर जूनी का व्यक्तित्व सब को लुभावना लगता था.

इसी ने तो पारस को बांध लिया था. जूनी एक मध्यवर्गीय परिवार की मंझली बेटी थी. बड़की और छोटी बहनें अपने खुलते रंग के कारण सब का ध्यान आकर्षित करती थीं, वहीं जूनी उन के रंग के कारण दबीदबी और थकीथकी लगती थी पर न जाने उस की आंखों की चमक में ऐसा क्या था कि पारस उस से ऐसा बंधा कि उस के मन को कोई अप्सरा भी न भाई.

पारस के मातापिता खुश थे या दुखी जूनी आज तक शादी के 5 वर्ष बाद भी समझ नहीं पाई. पारस भी उस से खुश हैं या नहीं वह इस बात को ले कर भी दुविधा में थी.

पार्लर वाली की सधी उंगलियां उस के चेहरे पर चल रही थीं और उस का मन अतीत की गलियों में भटक रहा था… उस का पारस के साथ विवाह एक सपना ही तो था. उस की दोनों बहनें, सारी सहेलियां उस से कितनी ईर्ष्या कर रही थीं उस के गहने और कपड़े देख कर. मयूरपंखी रंग का लहंगा था उस का, उस पर दबके का काम हो रखा था, लाल शिफौन की चुनर पर सोने के तार से सुनहरा काम हुआ था.

हीरों का सैट पहने सच में जूनी राजकुमारी ही तो लग रही थी. पार्लर वाली ने अपने मेकअप की तूलिका से उस की काया पलट कर दी थी. वह वास्तव में सिनेतारिका लग रही थी.

विदाई के बाद जब वह पारस के घर या यों कहें राजमहल में उस ने प्रवेश किया तो उस का दिल धुकधुक कर रहा था. सारी रस्में बीतने के बाद उस की सास उस के कमरे में आई और उसे एक पारदर्शी फ्रौक देते हुए बोली, ‘‘उम्मीद करती हूं तुम्हें पता होगा कि आज क्या करना है?’’

जूनी के कान और गाल लाल हो गए थे.पर पारस ने उसे प्यार की पगडंडी पर बड़े प्यार से चलना सिखाया था. वहां के तौरतरीके, कपड़े पहनने का रिवाज सबकुछ अलग था और धीरेधीरे जूनी अपने पुराने तौरतरीकों को बिसरा कर पूरी तरह नए रंग में रंग गई.

1 माह बाद जब वह अपने घर आई तो उस के अपने ही उसे नहीं पहचान पा रहे थे. ऐसा लग रहा था जूनी को देख कर जैसे एक कैटरपिलर में से तितली निकल आई हो, जिंदगी के नए रंगों से सराबोर. पर उस समय कोई नहीं जानता था कि इन पंखों की उड़ान कितनी दूरी तक होगी.

जब वह घर वापस आई तो पारस के पास वर्ल्ड टूर के टिकट थे. 2 महीने कैसे 2 दिन बन कर उड़ गए उसे पता भी नहीं चला. वहीं जूनी ने पहली बार शराब के घूंट लिए. तब उसे कहां पता था यह शौक बाद में लत बन जाएगा. पहली बार जब वोडका उस ने होंठों से लगाई तो आधे घंटे तक सिर्फ हंसती ही रही थी.

वापस आने के बाद देखा जूनी का पूरा वार्डरोब ही बदला हुआ था. सासूमां ने नियमकायदों की पूरी लिस्ट थमा दी थी. अगले 2 माह तक वह ड्राइविंग, स्विमिंग, घुड़सवारी आदि सीखने में लगी रही. फिर उसे उस के जन्मदिन पर तोहफे के रूप में कार मिली. उसे ड्राइव कर के जब वह अपने घर पहुंची तो मम्मीपापा की आंखों में खुशी के आंसू आ गए.

मगर जूनी के ख्वाब अब आजाद कब थे. उसे एक आजाद और आधुनिक जिंदगी मिल गई थी.

उस के मम्मीपापा तो कुदरत का शुक्रिया अदा करते नहीं थकते थे कि उन की बेटी को इतना अच्छा घरवर मिला है. कौन देता है इतनी आजादी अपनी बहू को… पारस के मातापिता बेटीबहू में कोई फर्क नहीं करते मगर जूनी सोचती थी कि आजादी तो सब का मौलिक अधिकार है, कोई किसी को कैसे दे सकता है. आजाद है जूनी आधुनिकता के नाम पर, आजादी है पर शर्तों और नियमों के साथ. मन की आजादी, शायद नहीं. ये सब सोचतेसोचते उस के होंठ व्यंग्य से टेढ़े हो गए. अब तक फेशियल भी पूरा हो चुका था.

मन था जूनी का कि गोलगप्पे खाए पर कैसे खा सकती है, पिछले कुछ दिनों से डाइटीशियन ने सब बंद करा रखा है.

घर आ कर देखा, बेस्वाद उबला खाना मुंह चिड़ा रहा था. बिना मन के 1 चपाती खाई  और फिर कुछ देर अपने रूम में आराम करने के लिए आ गई.

शाम को एक महिला जनसभा में सासूमां के साथ जाना था, उस के लिए एक भाषण भी तैयार करना था. काम समाप्त करतेकरते शाम के 5 बज गए. कितना मन था कि मसाला चाय पी जाए.

जूनी रसोई की तरफ गई ही थी कि महाराज आ गए और बोले, ‘‘बिटिया, चुकुंदर और गाजर का रस तैयार है.’’

बिना मन के फिर से काढ़े की तरह उस ने वह पीया और तैयार होने के लिए अपने कमरे में चल दी.

पिस्ता रंग की खादी की जामदानी साड़ी और साथ में पन्ना का हलका सा सैट पहन कर जूनी ने बड़ी सी गोल बिंदी लगा कर अपने को आईने में देखा तो पूरी तरह से संतुष्ट थी.

कार में बैठ कर उस ने सासूमां को पूरा भाषण समझाया. विषय ही कुछ ऐसा था-‘‘मां मेरा अधिकार या परिवार का भार.’’

सभा में पहुच कर जूनी का मन नहीं लग रहा था. इस भाषण में उस ने अपनी कलम तोड़ कर रख दी थी. दरअसल, मन से जुड़ा हुआ कोई भी विषय कलम से नहीं दिल से लिखा जाता है.

बात तब की है जब वे लोग हनीमून से वापस आए थे. जूनी को अपनी तबीयत कुछ

ढीली लग रही थी. पारस का इश्क का खुमार तब उबाल पर था, जबरदस्ती वह जूनी को डाक्टर के पास ले गया. डाक्टर परिवारिक मित्र भी था, इसलिए मुसकराते हुए बोला, ‘‘मिठाई की तैयारी कीजिए, कोई तीसरा दस्तक दे रहा है.’’

जूनी के गाल लाल हो गए पर पारस खुश नहीं लग रहा था. कार में बैठते ही बोला, ‘‘तुम ने कोई गोली मिस करी है क्या?’’

जूनी सोचते हुए बोली, ‘‘वो जब उस रात शराब पी थी…’’

पारस थोड़े ऊंचे स्वर में बोला, ‘‘हाउ कैन यू बी सो इरिस्पौंसिबल.’’

जूनी सहम गई. पूरा रास्ता जूनी सोचती रही कि शायद पारस एकाएक जिम्मेदारी से घबरा गया है. ऐसा कुछ नहीं था कि जूनी के जीवन का मुख्य उद्देश्य मां बनना ही था पर जो हुआ है उसे वह ठुकराना नहीं चाहती थी.

घर आ कर पारस ने जब यह बात बताई तो उस की मम्मी छूटते ही बोली, ‘‘इन मध्यवर्गीय लड़कियों से और क्या उम्मीद कर सकते हो…

ये शादी को बस बच्चे पैदा करने का जरीया समझती हैं.’’

जूनी की आंखों में अपमान के आंसू आ गए. पारस जूनी से बोला, ‘‘यह बच्चा हम दोनों का साझा फैसला होना चाहिए. मुझे दुख है अनजाने में ये सब हुआ पर मैं इस जिम्मेदारी के लिए तैयार नहीं हूं, अभी तो जिंदगी की शुरुआत है.’’

जूनी को उस घटना के वक्त पहली बार महसूस हुआ कि उस के पंखों की उड़ान का रिमोर्ट कंट्रोल उस के हाथ में नहीं है.

सबकुछ आराम से निबट गया था. जूनी के जिस्म में तो दर्द नहीं हुआ पर दिल का घाव वह किसे दिखाए और कैसे दिखाए. वह पहली घटना थी और फिर एक सिलसिला बन गया. हर बार तितली के पंखों में रंग भरा जाता पर वह रंग तितली की पसंद का है या नहीं, यह कोई भी तितली से पूछता नहीं था.

पर दुनिया को तो तितली से ज्यादा आधुनिक और कोई नहीं लगता था. होगी किसी और की ससुराल दूरदूर तक, जहां बहू को इतने अधिकार हैं, एक से एक आधुनिक कपड़े, देशविदेश घूमना, आजादी अपनी पसंद का काम करने की, हर माह सब से महंगे पार्लर का दौरा, खानेपीने का इतना ध्यान.

आज जूनी को अपने घर जाना था. हलके आसमानी रंग के सूती सलवारकुरते के

साथ बस छोटा सा मंगलसूत्र और 2-2 सोने की चूडि़यां, जैसे ही बाहर निकली कि पापाजी सामने खड़े थे, ‘‘जूनी, यह क्या हाल बना रखा है… ऐसे जाओगी अपने घर?’’

जूनी कुछ समझ न पाई. फिर पारस बोला, ‘‘अरे बाबा, घर जा रही हो तो ठीक से जाओ… यह लो मीनाबाजार से मैं नई साड़ी लाया हूं.’’

एक बहुत ही खूबसूरत और महंगी आसमानी रंग की साड़ी जिस पर लाललाल फूल खिले हुए थे. जूनी असमंजस में खड़ी थी पर फैसला हो चुका था कि आज तितली के पंख आसमानी और लाल रंग के ही होंगे. कैसे बताए जूनी के ये कपड़े और गहने उस के और उस के परिवार के बीच एक दीवार खड़ी कर देते हैं. हर बार वे जूनी के कपड़े और गहने देख कर सिमट जाते हैं.

कार को गली के बाहर ही छोड़ कर वह दबे पांव घर में घुस गई. मम्मी बोली, ‘‘जूनी, आ गई क्या?’’

जूनी फिर से वही पुरानी जूनी बन गई और बोली, ‘‘आप को कैसे पता चला मम्मी?’’

फिर वहीं रसोई में घुस कर भरवां करेले और रोटी का रोल बना कर खाने लगी.

मम्मी बोली, ‘‘जूनी, देख संभल कर कहीं साड़ी खराब न हो जाए.’’

बड़ी दीदी ने जुमला उछाला, ‘‘मम्मी, हम हैं न सफाई, बरतन और सब चीजों के लिए.’’

‘‘जूनी तुम अपने पांव जमीन पर मत रखना.’’

‘‘जूनी सब बातों को नजरअंदाज करते हुए अपने भानजे और भानजियों के लिए अमेरिका से खरीदे खिलौने निकालने लगी.’’

छोटी बहन हंसते हुए बोली, ‘‘दीदी, इतने महंगे खिलौने मत लाया करो. अगर खराब हो जाते हैं तो हम तो इन्हें ठीक भी नहीं करवा पाते.’’

जूनी क्या बोले, कैसे अपनी बहनों को बताए कि ये पंख तो विवाह के समय ही कुतर दिए गए थे. अब उड़ती है पर बस जितना बोला जाता है.

शाम को खाने के वक्त जूनी मां के हाथ के बनाए कोफ्ते और कड़ी पर भिखारी की तरह टूट पड़ी.

मम्मी हंसते हुए बोली, ‘‘देशविदेश के पकवान खा कर भी लड़की का मन नहीं भरा.’’

रात को जूनी सोने की तैयारी कर ही रही थी कि पारस के घर से फोन आ गया. बड़ी बूआजी आ गई हैं, उसे फौरन बुलाया गया था.

ड्राइवर अदब से अंदर आया, साथ में थे परिवार के लिए ढेरों तोहफे. सब के चेहरे महंगे तोहफों की चमक में चमक रहे थे पर किसी ने जूनी का बुझाबुझा सा चेहरा नहीं देखा. जूनी फीकी हंसी के साथ कार में बैठ गई. मम्मी को एक बार लगा भी कि अपनी बेटी को गले लगा कर पूछे कि क्या हुआ है जूनी तुझे? पर दूसरी ओर महंगी गाड़ी, महंगे कपड़े, ढेरों तोहफों ने फिर से उन की आंखों पर पट्टी बांध दी.

उधर जूनी को पता था कि किसी न किसी बहाने से पारस और उस का परिवार उसे उस के घर नहीं रुकने देते हैं.

मम्मी ने आते ही उसे गले लगा लिया और बोली, ‘‘बूआ तेरे बिना हलकान हो रही थी.’’

बूआ के सामने जाने से पहले फिर उस ने कपड़े बदले. बूआ उसे अपनी निगाहों से तोलते हुए बोली, ‘‘खुशखबरी कब सुना रही हो… कुछ खायापीया करो.’’

‘‘रंग तो खूब चढ़ रहा है तुम पर… यहां की सुखसुविधा रास आ गई तुम्हें?’’

जूनी चुपचाप बैठी रही. क्या जवाब दे वह इस बात का.

उस रात फिर से पीतेपीते उस की आंख लग गई. पीने में जूनी को एक अलग सा सुकून मिलता था. वह एक अलग दुनिया में चली जाती थी, जहां वह बस जूनी होती थी, अपने रंगों के साथ, जहां अपनी उड़ान वह खुद तय करती थी.

सुबह बहुत देर तक सोती रही. जब सो कर उठी तो सूर्य सिर पर चढ़ आया था. पारस दफ्तर के लिए निकल रहा था. उसे देख कर बोला, ‘‘क्यों पीती हो जब डिं्रक्स कैरी नहीं कर पाती हो?’’

जूनी मुसकराते हुए बोली, ‘‘तो फिर पीना ही क्या अगर सभ्य ही रहना हो…’’

एक शून्य, एक एकाकीपन जूनी को अपने शिकंजे में घेरे था, पर किसी को

समझ नहीं आता था. वह जिंदगी को अपने हिसाब से समझना चाहती थी पर कोई यह समझ नहीं पा रहा था.

जब जूनी ने पारस से कहा कि ‘‘मुझे भी तुम्हारे साथ दफ्तर जाना है, तो पारस ने उस के निर्णय का तहेदिल से स्वागत किया. आखिर वह एक प्रगतिशील परिवार का पुत्र है जो अपनी पत्नी के हर निर्णय में साथ रहता है. पर वहां जूनी के पास करने के लिए कुछ नहीं था. वह बस शतरंज की बिसात पर एक सफेद हाथी थी, कहने को सबकुछ पर उस के नियंत्रण में कुछ भी नहीं था.’’

जूनी की जिंदगी का सफर रेत के रेगिस्तान सा था. जगहजगह मरुस्थल बिखरे हैं पर क्या मरुस्थल से कभी किसी की प्यास बुझी है जो उस की बुझती? कुछ माह बाद उस ने दफ्तर जाना बंद कर दिया, क्योंकि वहां बस उस की हैसियत पारस की बीवी के रूप में थी.

जूनी फिर से तैयार हो रही थी एक कौकटेल पार्टी के लिए. लाल औफशोल्डर गाउन और रूबी के कर्णफूल में वह बेहद सुंदर लग रही थी.

पारस के कजिन की शादी थी. धीरेधीरे सब डांस कर रहे थे और 2 पेग के बाद जूनी भी झूमने लगी. पारस को कस कर पकड़ कर बोली, ‘‘पारस, उड़ना है मुझे, पिंजरे में कैद मत करो, आम हूं मैं, मुझ को खास बनाने की जिद मत करो.’’

पारस इस से पहले कुछ बोलता, जूनी जोरजोर से गाने लगी, ‘‘जूनी हूं मैं, मुझे ना छूना…’’

सब जूनी को देख रहे थे. अच्छाखासा तमाशा हो गया था. पारस खींच कर उसे कार में

बैठा कर घर ले आया. वह पूरी रात सोचता रहा आखिर क्या कमी रह गई है… जो वह चाहती है वही होता है.

सुबह पारस ने जूनी से कहा, ‘‘जूनी, तुम्हें क्या चाहिए? लोग ऐसी जिंदगी के लिए तरसते हैं और तुम हो कि  तुम्हें इस की कद्र नहीं है.’’

जूनी कुछ न बोली बस शून्य में ताकती रही. क्या उसे वास्तव में यही चाहिए था?

आज जूनी फिर से अपनी सासूमां के साथ एक समारोह में सम्मिलित होने गई थी. बस यही अब उस की दिनचर्या थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि उस की जिंदगी सबकुछ होते हुए भी क्यों इतनी बेरंग है. तभी एक दिन उस ने स्थानीय कालेज में लैक्चरर की पोस्ट काविज्ञापन देखा. उस ने बिना किसी से पूछे आवेदन भेज दिया. साक्षात्कार भी चुपचाप दे आई. नियुक्तिपत्र हाथ में आने के बाद ही उस ने सब को सूचित किया.

‘‘क्या जरूरत है, धक्के खाने की?’’

‘‘जितना कमाओगी उस से ज्यादा तो पैट्रोल में खर्च हो जाएंगे?’’

‘‘एक ही दिन में आटेदाल का भाव मालूम पड़ जाएगा जब गरमी और  सर्दी में दौड़धूप करनी पड़ेगी.’’

‘‘इतना नौकरी का शौक चराया है तो फिर खुद ही आनाजाना करना और खुद का खर्च स्वयं उठाना.’’

ये तो कुछ ही वाक्य थे, न जाने ऐसे कितने ताने चुपचाप जूनी सुनती रही और झेलती रही. गलती उस की ही थी कि उस ने ही विवाह के बाद अपने पंखों की बागडोर अपने पति और सासससुर के हाथों में दे दी थी. पर अब वह अपनी उड़ान खुद तय करना चाहती है, गिरेगी तो उठेगी भी… वह जीवन के हर रंग को समझना चाहती है.

‘सफर है मेरा तो निर्णय भी होगा मेरा, मेरे छोटेछोटे सपनों में ही है मेरा बसेरा’ यह सोचते हुए अपने मन के टूटे पंखों को फिर से समेट कर यह तितली उड़ान को तैयार है.

Summer Special: 6 टिप्स- बालों में दही का ऐसे करें इस्तेमाल

ब्यूटी प्रॉडक्ट के रूप में भी दही का इस्तमाल किया जाता है. हम में से बहुत से लोग बालों को सॉफ्ट और शाइनी बनाने के लिए, रूसी दूर करने के लिए दही का इस्तेमाल करते हैं.

आमतैर पर हम अपनी जरूरत के हिसाब से दही लेकर, उसे थोड़ा फेटकर बालों में लगा लेते हैं लेकिन सिर्फ इतना करना ही पर्याप्त नहीं है. अगर आप भी बालों में दही लगाती हैं तो आपका ये जानना बहुत जरूरी है कि हर समस्या के लिए दही को अलग तरह से प्रयोग में लाना चाहिए.

बालों की खूबसूरती को बरकरार रखने के लिए ऐसे करें दही का प्रयोग.

1 खूबसूरत बाल

दही एक नेचुरल कंडिशनर है. दही लेकर उसे अच्छी तरह फेट लें और इसके बाद पूरे बाल में अच्छी तरह लगा लें. इसके बाद बालों को ढक लीजिए. इसे 30 मिनट के लिए यूं ही छोड़ दीजिए. इस पूरी प्रक्रिया से आपके बाल खूबसूरत हो जाएंगे.

2 मुलायम बाल

दही को शहद के साथ मिलाकर लगाएं. आप इस पेस्ट का इस्तेमाल मास्क के रूप में भी कर सकती हैं. 15 से 20 मिनट बाद बालों को धो लीजिए. इससे बाल बेहद मुलायम हो जाएंगे.

3 खूबसूरत घनें बाल

अगर आपके बाल सिरे से खराब हो रहे हैं तो दही से बना कोई भी मास्क आपके लिए फायदेमंद रहेगा. सप्ताह में दो बार मास्क लगाएं. इससे बालों के सिरे ठीक हो जाएंगे.

4 दही दूर करे डैंड्रफ की समस्या

अगर आपके सिर में रूसी है तो दही में कुछ बूंदे नींबू की मिलाएं. इस पेस्ट को स्कैल्प पर लगाएं और कुछ देर के लिए छोड़ दें. सप्ताह में दो बार के इस्तेमाल से ही रूसी की प्रॉब्लम दूर हो जाएगी.

5 काले बाल

अगर आपके बाल झड़ रहे हैं तो दही में कुछ करी पत्तियां मिला लें. इससे बालों का झड़ना कम हो जाएगा साथ ही बाल काले भी होंगे.

6 बढ़ाएं बालों की ग्रोथ

बालों के बढ़ने के लिए भी दही का इस्तेमाल करना फायदेमंद होता है. दही में थोड़ी मात्रा में नारियल तेल और गुड़हल के फूल की कुछ पत्तियों को मिलाकर बालों पर लगाएं. इससे फायदा होगा.

देश के इन राज्यों में है मिलता है जल्दी न्याय, जबकि यहां लंबित है कई मामले

तीसरी बार भारतीय न्याय रिपोर्ट के अनुसार दक्षिणी राज्यों का दबदबा जारी है. ये तीन राज्यों कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना ने न्याय तक पहुंच प्रदान करने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की लिस्ट में टॉप 3 जगह हासिल की है. इसके अलावा गुजरात और आंध्र प्रदेश को क्रमशः चौथा और पांचवां स्थान दिया गया है. न्याय के मामले में सबसे बुरा प्रदर्शन करने वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश टॉप पर है. रिपोर्ट में यूपी को 18 बड़े और ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों में सबसे खराब प्रदर्शन वाला राज्य बताया गया है.

कम आबादी वाले राज्यों में सिक्किम न्याय प्रदान करने के मामले में सबसे ऊपर है. 1 करोड़ से कम आबादी वाले राज्यों में सिक्किम के बाद दो नॉर्थ-ईस्ट राज्यों अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा का नाम भी शामिल है. गोवा इस लिस्ट में सातवें नंबर पर है.

पहल करना जरुरी

इस बारें में इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के एडिटर माजा दारूवाला कहती है कि ये जस्टिस रिपोर्ट पिछले 3 साल से किया जा रहा है, इसमें मेरी टीम अलग – अलग राज्यों में जाती है और वहां के इंटेलेक्चुअल और ब्यूरोक्रेट्स से बात कर निरिक्षण करती है, जिसमे बातचीत से काफी बातें सामने आती है. कनार्टक के चीफ सेक्रेट्री ने बुलाकर बात की रिपोर्ट के आंकड़े देखे, तो उन्होंने मीटिंग बुलाई और लोगों की समस्याओं पर  चर्चा की और उसमें सुधार करने के बारें में सोचा है. फैले हुए आकड़ों को समेटने के बाद, इजी फोर्मेट में आने पर इसे समझना आसान हो जाता है और इसपर काम करने के अलावा एक बातचीत शुरू हो जाती है.

कर्नाटक में जस्टिस का आकड़ा सबसे अच्छा दिखने की वजह के बारें में पूछने पर माजा बताती है कि परफेक्ट वजह बताना संभव नहीं. एक वजह यह भी हो सकता है कि चुनाव आ रहे है, तो राज्य सरकार कुछ जल्दी सुधार कर लोगों का विश्वास पाना चाह रही हो, लेकिन ये सही है कि उन्होंने इस दिशा में काम करने का प्रयास किया है, जिसका परिणाम सामने दिख रहा है.

चौकाने वाले आंकड़े

भारत में लंबित मामलों के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. इंडिया जस्टिस की रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे देश में तेजी से कैदियों की संख्या बढ़ती जा रही है. इसके साथ ही इंडिया जस्टिस ने भारत की न्यायपालिका को लेकर भी आंकड़े जारी किए हैं, जिनमें बताया गया है कि देश की तमाम अदालतों में जजों की भारी कमी है. रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि देश के किन राज्यों में जस्टिस सिस्टम ने सबसे बेहतरीन काम किया है और कहां न्याय मिलने या मामलों के फैसलों में देरी हो रही है.

रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि हर एक जज पर लंबित मामलों का कितना भार है. जजों की कमी के चलते ये भार काफी ज्यादा बढ़ गया है. दिसंबर 2022 तक, देश में 10 लाख लोगों पर 19 जज थे और करीब 4.8 करोड़ मामलों का बैकलॉग था. जबकि लॉ कमीशन ऑफ इंडिया की तरफ से 1987 में ही सुझाव दिया गया था कि एक दशक में प्रत्येक 10 लाख लोगों के लिए 50 जज होने चाहिए. देश में कई राज्य ऐसे हैं जहां एक जज पर 15 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं.

अलग-अलग राज्यों के हाईकोर्ट के आंकड़े देखने पर पता चलता है कि पिछले कई सालों के मामले अब तक लंबित पड़े हैं. इसमें यूपी सबसे उपर है. यहां औसतन 11.34 सालों के केस भी अब तक लंबित हैं. वहीं इसके बाद पश्चिम बंगाल का नंबर आता है, जहां 9.9 साल औसत पेंडेंसी है. इस मामले में सबसे अच्छा प्रदर्शन त्रिपुरा का है, जहां औसत पेंडेंसी करीब एक साल है. इसके बाद सिक्किम (1.9 साल) और मेघालय (2.1 साल) लिस्ट में हैं.

11 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की जिला अदालतों में प्रत्येक चार में से एक मामले 5 साल से अधिक समय से लंबित हैं. देश में ऐसे मामलों की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (53 प्रतिशत), और सिक्किम में सबसे कम (0.8 प्रतिशत) है. बड़े और ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों में पश्चिम बंगाल में ऐसे मामले 48.4 प्रतिशत और बिहार में 47.7 प्रतिशत हैं.

सरकारी क्षेत्रों में महिलाओं के भर्ती की कमी

प्रोजेक्ट लीड वलय सिंह कहते है कि जब मैंने साल 2019 में पहली रिपोर्ट शेयर की थी, तो कर्नाटक के हाई कोर्ट में 47 परसेंट बहुत वेकेंसियाँ थी,जिसमे उन्होंने भर्तियाँ बढाई है, हाई कोर्ट की वेकेंसियाँ आधी कर दी. जेल के बजट को भी कम किया गया. सेशंस में सीसी टीवी कैमरे लगाये गए. पिछले सालों की तुलना करें, तो सभी राज्यों में कुछ न कुछ सुधार अवश्य हुआ है, कोशिश सभी कर रहे है. लेकिन बहुत धीमा काम होने पर जरुरत के हिसाब से कमी बढती जाती है. कारागारों की व्यवस्था ख़राब होता जा रह है, औरतों का आरक्षण बहुत धीरे-धीरे सुधर रहा है. औरते है, काम नहीं बेरोजगार है, वे काम करने के लिए तैयार भी है. देखा जाय तो आई टी सेक्टर में महिलाएं सबसे अधिक काम करती है,जबकि सरकारी निचली अदालतों में महिलाओं का राष्ट्रिय औसत 35 प्रतिशत है, बाकी सब जगह ये 20, 15 और 10 के नीचे है. लोअर जुडीशियरी में 33 प्रतिशत या 35 प्रतिशत या कई राज्यों में उससे भी अधिक महिलाएं जज बन रही है, लेकिन आई टी सेक्टर से तुलना करने पर पता चलता है कि महिलाएं और अधिक काम सरकारी क्षेत्र में कर सकती है. महिला पुलिस ऑफिसर का प्रतिशत 5 है.माजा दारूवाला आगे कहती है कि पुलिस का 90 प्रतिशत काम किसी टेरोरिस्ट या गैंग को पकड़ना नहीं होता. पुलिस का काम प्रसाशनिक, दिमाग और डेस्क वाला होता है. इसे कोई भी महिला कर सकती है.

100 फीसदी तक नहीं केस क्लीयरेंस रेट

राज्यों के केस क्लीयरेंस रेट की बात करें, तो हाईकोर्ट्स में 2018-19 से 2022 के बीच राष्ट्रीय औसत में छह प्रतिशत (88.5 प्रति प्रतिशत से 94.6 प्रतिशत) की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन निचली अदालतों में 3.6 (93 प्रतिशत से 89.4 प्रतिशत) की गिरावट आई है. 2018 से 2022 के बीच त्रिपुरा ही इकलौता राज्य है जहां जिला अदालतों में केस क्लीयरेंस रेट 100 प्रतिशत से ऊपर रहा. हालांकि 2020 में कोरोनाकाल के दौरान त्रिपुरा में भी केस क्लीयरेंस रेट 40 प्रतिशत तक पहुंच गया था.

सही आंकड़ों का मिलना होता है मुश्किल

समस्या क्या होती है? मेरी टीम अच्छी है और मेरे पार्टनर ने सहयोग दिया है. ये समस्या आकड़ों की है, केवल सरकारी रिपोर्ट को देखते है, नेशनल, राज्य, पार्लियामेंट, बजट, असेम्बली को देखते हुए काम करते है,जो नहीं मिलता है, उसे राईट टू इनफार्मेशन में एप्लीकेशन डाल-डालकर देता निकलना पड़ता है. डेटा कई बार मुश्किल से देते है, या फिर उसमे खामिया होती है, जब इसे रिपोर्ट बनाते है, लोग आलोचना करते है और कहते है कि ये गलत रिपोर्ट है, लेकिन ये एक आइना है, क्रिटिक नहीं. इसमें बाधा होने पर दिखेगा. इसके अलावा इसमें हार्ड वर्क और पैशन होना जरुरी होता है, इसे देश के लिए ही किया जा रहा है. वह आगे कहती है कि भारत ने यह वादा किया है कि 2030 तक वह प्रत्येक व्यक्ति की न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करेगा और सभी स्तरों पर प्रभावी, जवाबदेह और समावेशी संस्थानों का निर्माण करेगा, लेकिन इस साल आईजेआर के द्वारा प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि अभी हमें लंबा सफर तय करना है. मेरा  फिर से आग्रह है कि हम सब के लिए किफायती, कुशल, और सुलभ न्याय सेवाओं को भोजन, शिक्षा या स्वास्थ्य की तरह ही आवश्यक माना जाए. इसके लिए इसमें और अधिक संसाधनों को लगाने की, बहुत अधिक कैपेसिटी बिल्डिंग की लंबे समय से चली आ रही खामियों को दूर करने पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है.

मीडिया को ध्यान देने की है जरुरत

मीडिया में विश्वसनीयता की कमी,कितना नुकसान दायक है? माजा कहती है कि ये सही है आज की मीडिया में लोगों को कुछ सही खबर देने की जो परमंपरा पहले थी, वह अब ख़त्म हो गयी है. ऐसे में डेटा को लेकर कुछ लिखने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. यही वजह है कि लोग हमें रिपोर्ट के द्वारा ओपिनियन देने की बात कहते है. राय तो है,लेकिन उससे क्या बदलाव हो सकेगा.मैंने इन आंकड़ों पर रिपोर्ट तैयार की है. ये आंकड़े भी हमारी सरकार के है, इसका मुझसे कुछ लेना-देना नहीं है. मेरा सरकार के प्रति पक्षपाती होना भी नहीं है. सिर्फ सुधार जो हुआ है या कम हुआ है, उसकी प्रतिबिम्ब को दिखाना है. रिपोर्ट भी बनाने से पहले हमने डेटा को इकट्ठा किया और उसे ग्राउंड पर जाकर मिलान भी किया. रिपोर्ट एक छोटा पार्ट है, जिसमें काम करने के तरीके, लोग क्या सह रहे है, क्या नहीं, पारदर्शिता है या नही आदि कई बातों को सामने लाने की कोशिश की गई है.

बॉक्स में :

न्याय पालिका पर दबाव

  • सिक्किम हाई कोर्ट और चंडीगढ़ डिस्ट्रिक्ट हाई कोर्ट को छोड़कर देश के किसी भी कोर्ट में जजों की संख्या पूरी नहीं,
  • 18 बड़े और ज्यादा जनसँख्या वाले राज्यों में केस और क्लियरेंस रेट के मामले में सिर्फ केरल ने छुआ 100 फीसदी का आंकड़ा,
  • डिस्ट्रिक्ट कोर्ट लेवल पर किसी भी राज्य ने एससीएसटी और ओबीसी कोटा को पूरा नहीं किया,
  • न्याय के मामले में साउथ के राज्य सबसे आगे, जिसमे कर्णाटक, तमिलनाडु, और तेलंगाना ही 3 सबसे उपरी पायदान पर,

प्रति जज लंबित मामलों की औसत संख्या

  • राजस्थान –24000
  • मध्यप्रदेश –12000 से अधिक
  • उत्तरप्रदेश –करीब 12000
  • हिमाचल प्रदेश – करीब 9 हज़ार
  • आंध्रप्रदेश – करीब 9 हज़ार
  • हरियाणा – करीब 8 हज़ार

5 टिप्स: पतले होने का अफसोस नहीं, बस ड्रेसिंग सेंस मे बदलाव है जरूरी

राधिका एक मल्टी नेशनल कंपनी मे काम करती है नये फैशन के साथ चलना उसको बहुत पसन्द है लेकिन अफसोस की खुद को स्टाइलिश दिखाने मे वो हमेशा नाकाम ही रहती है क्योंकि वह बहुत दुबली पतली है. कोई उसे हैंगर कहता है तो कोई लकड़ी. कोई भी ड्रेस पहनने से पहले उसे कई बार सोचना पड़ता है. वह भी चाहती है कि वह खूबसूरत दिखे और एक नए आत्म विश्वास के साथ ज़माने के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके. तो आज हम इस लेख के जरिए उन सभी ल़डकियों को बताना चाहते कि आप जेसी भी है बहुत खूबसूरत हैं बस जरूरत है तो खुद को आकर्षित बनाने की.

स्टाइलिश दिखने के लिए जरूरी नहीं कि हमारे पास ब्रांडेड कपड़ों की भरमार हो, या हर ड्रेस के मैचीग की ज्वेलरी और फुट वियर हो. बल्कि आपका ड्रेसिंग सेन्स आपके फिगर के अनुसार होना चाहिए.. तो फोलो करें हमारे ये टिप्स और दिखें खूबसूरत.

1 बॉडी फिट ड्रेस को करें इग्नोर

बॉडी  कर्व्स हर किसी को पसन्द आते हैं लेकिन यदि आप बहुत ज्यादा पतले हो तो यही आपका ओवर ऑल लुक खराब कर देते है इसलिए फिटिंग की ड्रेसेस को ना पहने , और  अपने फिगर को भरा हुआ दिखाने के लिए लेअर्स वाली ड्रेस आपके लिए बेहतर ऑप्शन हैं. लेकिन ध्यान रखें कि आपने साइज से ज्यादा ढीले कपड़े ना पहने , वरना आपका लुक खराब लगने लगेगा.

2 रंगों को दें महत्तव

रंग हमारा आत्मविश्वास बढ़ाने मे मदद करते हैं इसलिए जरूरी है कि आप ऐसे रंग के कपड़े पहने जो वाइब्रेंट और ब्राइट हों इस रंग के कपड़ों में आप पतली नहीं लगेगी.

3 होरिजेंटल पैटर्न चुने

आप होरिजेंटल लाइनों के पैटर्न वाले कपड़े चुनें.वर्टिकल लाइंस के पैटर्न को अवॉइड करें क्योंकि वर्टिकल मे आप और भी पतली लगेंगी. अच्छा होगा कि आप अबस्ट्रेक पैटर्न या प्रिंटेड कपड़ों का चयन करें.

4 वेस्टर्न ड्रेस खरीदते समय रखे ध्यान

यदि आपको वेस्टर्न ड्रेस पहनना पसंद है, तो वो   कट, बेबी डॉल कट और पफ स्लीव्स पहनें. इनसे आपका शरीर भरा- भरा लगेगा.जैगिंग या स्किन फिट जीस पहनने से बचे. स्ट्रेट कट, बूटकट या फलेयर्ड जींस आपके लिए बेहतर ऑप्शन है .पैंसिल स्कर्ट की जगह आप फलेयर्ड मिड स्कर्ट पहन सकती हैं.

5 एथनीक वियर में ना करें गलती

एथनीक वियर में ऐसी कुर्तियों को चुनें, जिनमें शोल्डर और हिप्स पर वॉल्यूम हो, यानी वे थोड़े लूज फिट मे हों. शिफोन, जोरजट जैसे हल्के कपड़े ना चुने बल्कि सिल्क जैसे मोटे कपडों का चयन आपके लिए बेहतर है.

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