सुहागन: पति की मौत के बाद किस ने भरे प्रिया की जिंदगी में रंग

क्षण भर में इतना बड़ा हादसा हो जाएगा प्रिया को पता न था. 2 घंटे पहले ही तो प्रवीण ने रात का खाना खाया था. फिर वह बिछावन पर ही पर्स और कागजकलम ले कर बैठ गया था. उस ने प्रिया से कहा था कि वह और पुनू सो जाएं. उसे कुछ हिसाब लिखना है, उस के बाद ही वह सोएगा.

प्रिया जब सवेरे सो कर उठी तो उस ने प्रवीण को जगाना चाहा पर यह क्या…उस का तो शरीर ठंडा पड़ चुका था. प्रवीण का लिखा हिसाब पर्स में अभी तक रखा हुआ था. कल ही तो वह अपनी तनख्वाह ले कर आया था. एक कागज में राशन का खर्च लिखा था और उस की रकम अलग रखी हुई थी. दूसरे कागज में पुनू की स्कूल फीस व अन्य खर्चे दर्ज थे और उन के लिए रुपए अलग कर दिए थे. प्रवीण आखिरी प्लान बना कर चला गया. उस ने अपने खर्चों का, अपनी गाड़ी के पैट्रोल का और जेबखर्च का कोई हिसाब नहीं लिखा था, शायद उसे मालूम हो कि अब इस की जरूरत नहीं.

प्रिया ने प्रवीण का सूटकेस खोला. उस में रखा सारा सामान ज्यों का त्यों पड़ा था. एकएक चीज को प्रवीण बड़े करीने से सजा कर रखता था. औफिस के कागजात रखने के लिए अलग ब्रीफकेस था. व्यक्तिगत चीजों का एक रजिस्टर था जिस में वह खुद के और प्रिया के नाम निवेश, शेयरों, डिबैंचरों, म्यूचुअल फंडों, जीवनबीमा पौलिसियों और बैंकों में सावधि जमा के खाते आदि दर्ज करता था.

दफ्तर से आते ही वह यह रजिस्टर ले कर बैठ जाता था. कई बार प्रिया उस के इस काम से ऊब कर फटकार भी दिया करती थी. प्रवीण बोलता, ‘ये सब तो भविष्य के लिए हैं…मेरे लिए, तेरे लिए और इस छोटी पुनू के लिए.’

प्रवीण को प्लान करने की आदत थी. बड़ी प्लानिंग, छोटी प्लानिंग और रोजमर्रा की प्लानिंग यानी प्लान करना ही उस की जिंदगी थी. वह कहा भी करता था, ‘प्रिया, बिना प्लानिंग के जिंदगी कुछ भी नहीं है. जितने दिन जियो अपने अनुसार जियो. यह जिंदगी बहुत छोटी होती है और कामों की शृंखला बहुत लंबी होती है. अपने सोचे हुए काम अगर पूरे नहीं हुए तो मन में मलाल रह जाता है. इसलिए कामों को चुनना है, जितने जरूरी लगें उतने ही पूरा करने की कोशिश करो. बाकी छोड़ो. वे तुम्हारे नहीं हैं. वे बस मोह हैं. इस मोह को त्यागना है.’

‘सचमुच तुम ने मोह त्याग दिया प्रवीण,’ अनायास प्रिया के मुख से निकला, ‘तुम ने प्लान किया मुझे अकेली छोड़ने का. ऐसा स्वार्थी तुम्हारा प्लान निकला. तुम ने सिर्फ अपना प्लान किया. मेरी जिंदगी की भी प्लानिंग कर के जाते.’

अपने पर्स को दफ्तर से आते ही प्रवीण इसी सूटकेस में रख दिया करता था. सूटकेस खोलते ही प्रिया को वह पर्स मिल गया. धीरे से प्रिया ने पर्स खोला. एक रंगीन पासपोर्ट साइज में प्रवीण का आइडैंटिटी कार्ड देखते ही उस की आंखों से आंसू छलक आए.

कहते हैं कि जीवनमरण प्रकृति के हाथ है. आदमी चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता. प्रिया सोचने लगी कि प्रकृति की यह कितनी बड़ी बेईमानी है. उस की शादी हुए मात्र 5 साल ही तो बीते हैं. एक स्वयंवरा की तरह उस ने प्रवीण के गले में वरमाला डाली थी. स्त्रीपुरुष का संबंध क्या इतना क्षणिक होता है? अभी उस ने जिंदगी देखी ही क्या है? क्यों प्रकृति ने उस का सुखचैन छीन लिया. उस का कुसूर ही क्या है?

इस जन्म में तो नहीं, तो क्या सचमुच कुछ जन्म और भी होते हैं? क्या किसी पूर्व जन्म का उस का किया कोई पाप है? लोग तो यही कहते हैं.

प्रिया के मम्मीपापा ने उसे समझाया, ‘बेटी, पाप, धर्म कुछ भी नहीं है. कौन कहता है कि तुम्हें किसी पाप का फल मिला है. बेटी, इस दुनिया में किसी को फूल मिलते हैं तो किसी को कांटे. जिस के हिस्से कांटे आते हैं वह संघर्षशील बन जाता है. जीवन तो एक संघर्ष है. इस को सहज रूप में लेना चाहिए. जो होना था वह हो गया. हिम्मत से काम लो. उठो, अपने को सहज बनाओ.’

कैसे सहज कर ले अपने को प्रिया? यह दुख क्या एक दिन का है जो सुबह होते ही दूर हो जाएगा अथवा किसी दवा द्वारा छुटकारा मिल जाएगा. क्या वैधव्य से भी बड़ा कोई दुख होता है एक स्त्री के लिए? एक विधवा का क्या स्थान होता है इस समाज में, वह खूब जानती है.

प्रिया को अच्छी तरह याद है, गांव में उस के दूर के एक रिश्ते की भाभी हुआ करती थीं जो बालविधवा थीं. लोगों ने उन का सिर मुंडवा दिया था. एक सादा धोती पहना करती थीं वे. अपने अंधेरे कमरे से गांव के मंदिर तक का ही था उन का संसार. शादीविवाह के शुभ अवसर पर उन की उपस्थिति की मनाही थी. उन की छाया तक से लोग दूर भागते थे.

प्रिया भी अब एक विधवा है. पति के दाहसंस्कार के दिन सास ने उस के हाथों की चूडि़यां तोड़ कर पानी में फेंक दी थीं. बिंदी और माथे का सिंदूर धुल गया. वह सुहागन नहीं रही. लोग उस से घृणा करेंगे. घर से और समाज से कट कर रह जाएगी वह. अब तो यही उस का हश्र है. क्या वह इस स्थिति को स्वीकार कर ले? नहीं, यह एक बुजदिली होगी. वह नए जमाने की लड़की है. वह दुनिया का सामना करेगी. वह गांव की निरीह भाभी नहीं बनेगी. जिंदगी में एक हादसा ही नहीं आता और भी आ सकते हैं, पहले से भी बड़े. तो क्या वह जिंदगी इसी तरह हारती रहेगी, नहीं, कदापि नहीं.

प्रिया ने पर्स को मोड़ कर ज्यों का त्यों रख दिया. अनायास उस का हाथ सूटकेस की पौकेट में चला गया.

इस पौकेट में प्रवीण द्वारा लाई लहठी (एक प्रकार की चूड़ी) रखी थीं जो कुछ दिनों पहले वह प्रिया के लिए लाया था. लेकिन अब वह इन लहठियों का क्या करेगी? किस के लिए पहनेगी अब? कौन देखने वाला है इन्हें? जो चाव से ले कर आया वही नहीं रहा. ये सब चीजें तो सुहागनों के लिए होती हैं न, वह तो अब सुहागन भी नहीं रही. उस की आंखों से फिर आंसू टपकने लगे.

कुछ देर के लिए वह निष्क्रिय हो गई. घर का सामान आदि जब भी कभी वह देखने लगती है तो ऐसा ही होता है. घर में उलटपुलट करने की आदत उस की पुरानी है. प्रवीण बारबार कहा करता था, ‘यह क्या तुम घर की चीजों की उठापटक में लगी रहती हो. क्या तुम्हें और कोई काम नहीं? क्यों नहीं तुम अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करती हो? मैं इस बार पटना जा कर तुम्हारे नए कोर्स की सारी किताबें ला देता हूं.’

प्रवीण फिर पटना नहीं जा पाया और प्रिया की पढ़ाई अधूरी ही रह गई. वह एमए नहीं कर पाई. अब तो और भी कुछ करने का उस का मन नहीं करता. पुनू को स्कूल पहुंचाने का काम आया कर देती है. स्कूल का रिकशा दोपहर में पुनू को घर पहुंचा जाता. पुनू स्कूल से आती है तो कुछ देर के लिए उस के साथ उस का मन बहल जाता, लेकिन पुनू के बारबार पूछने पर कि उस के पापा कब तक आएंगे? वह कुछ भी जवाब नहीं दे पाती. प्रवीण के मृत शरीर को जब श्मशानघाट ले जाया जा रहा था तब पुनू सवाल कर बैठी थी, ‘क्यों पापा को इस तरह लिए जा रहे हैं?’ उत्तर में प्रिया बोली थी, ‘तुम्हारे पापा की तबीयत रात से ही खराब है न, उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा है. जल्द ही वे अच्छे हो कर वापस आ जाएंगे.’

एक महीना गुजर गया लेकिन प्रिया पुनू के सवाल का जवाब नहीं दे पाई. पिछली शाम जब वह पुनू के साथ छत पर बैठी थी तब पुनू ने वही सवाल फिर किया था. अचानक प्रिया के मुख से निकल गया, ‘वह देखो, सब से बड़ा तारा जो तुम्हें दिखाई दे रहा है वही तुम्हारे पापा हैं. जब तुम्हें पापा की याद आए तब तुम इसी तारे को देख कर उन्हें पुकारना. वे सपने में तुम से मिलने जरूर आएंगे.’

इस तरह कितने दिन प्रिया पुनू को ढाढ़स देती रहेगी? कभीकभी वह सोचती कि इस पहाड़ सी जिंदगी को कैसे जी सकेगी. अब इस जिंदगी में रखा ही क्या है? किस सुख के लिए वह जिएगी? क्यों न वह मर जाए? जहर खा कर अपनी जीवन लीला खत्म कर दे? यह 5 वर्ष की बेटी पुनू जो उस की नजरों के सामने आ जाती है, नहीं तो उसी दिन जिस दिन प्रवीण का हादसा हुआ, वह भी अपना अंत कर लेती. पुनू के लिए ही तो उस को जीना होगा, चाहे जैसे भी हो, दुख से या सुख से, ताने सह कर या फिर लांछन सह कर. वह औरत है, एक विधवा, जिसे समाज बारबार ठुकराएगा, दुतकारेगा.

‘चल बेटी, यहां से अब चल. क्या करेगी यहां रह कर अब अकेली. प्रवीण की बीमा और भविष्य निधि आदि का सैटलमैंट तो घर से भी किया जा सकता है. वह मुझ पर छोड़ दे. मैं पटना से ही ये सब काम कर लूंगा,’ पापा ने उसे साथ ले जाने की जिद की थी.

प्रिया ने उन की बातों का कोई जवाब नहीं दिया था. वह सोच रही थी कि कितने दिन मां और पापा अपने साथ उस को रख पाएंगे. 5 वर्ष, 10 वर्ष. फिर उस के बाद घर में 2 छोटे भाई हैं. माना, वे उस को बेहद प्यार करते हैं. भाइयों की शादियां होंगी. एक विधवा ननद को भाभियां क्या सहज रूप में स्वीकार कर लेंगी? उस को उन लोगों के भरोसे ही तो जीना पड़ेगा. गांव की विधवा भाभी की ही तरह वह भी जिएगी.

मां ने भी उस को बहुत समझाया था कि तुम्हारे पापा ठीक ही कहते हैं बेटी. उन की बातें मान ले और घर चल. हम समझेंगे कि हमारी बेटी कुंआरी ही है. हम अपनी दुलारी बेटी को पाल लेंगे.

मां कहने को तो कह गईं, लेकिन वे खुद इस बात को समझती हैं कि उन के कथन में जरा भी सचाई नहीं है. कोई भी मां अपनी बेटी को जिंदगी भर नहीं पाल सकती. उस की ममता, उस का प्यार उस की थोड़ी सी जिंदगी तक ही सीमित है.  अपना भार बेटों या बहुओं पर नहीं थोपा जा सकता.

प्रिया गांव वाली भाभी की तरह दूसरों की दया पर नहीं जीना चाहती थी. उस ने मां को दोटूक जवाब दिया था, ‘तुम पापा को समझा दो मां कि वे मेरे लिए अधिक चिंता न करें. वे खुद ही कितने कमजोर हैं. इतनी सोचफिक्र करने से उन की सेहत और भी खराब हो जाएगी. मैं अपना दुख सहन करना सीख लूंगी, मां.’

प्रिया का जवाब सुन कर मां की आंखें छलछला उठी थीं. फिर उन्होंने प्रिया से साथ चलने को नहीं कहा.

प्रिया ने बिंदियों के पैकेट से एक छोटी सी बिंदी निकाली और ड्रैसिंग टेबल के सामने खड़ी हो कर अपने माथे पर लगा ली. कुछ देर के लिए उसे लगा कि जैसे उस ने कोई गुनाह किया हो. फिर उस ने अपने मन को समझाया, वह गांव वाली भाभी की तरह कभी नहीं बनेगी. यह बिंदियां तो प्रवीण ने उस को बड़े प्यार से दी हैं. इन पर तो केवल उसी का अधिकार है. उस की याद में वह इन्हें हमेशा अपने साथ रखेगी, चाहे लोग उसे कुछ भी कहें. ये कड़वे सच की तरह हैं, जिन्हें वह प्रवीण के लिए जिंदगी भर संजो कर रखेगी. बिंदी वाले पैकेट को उस ने फिर वापस रख दिया. अचानक उस की नजर प्रवीण की कंपनी के प्रबंधनिदेशक द्वारा भेजे गए उस लिफाफे पर पड़ी जो एक दिन पहले ही उसे मिला था. लिफाफा खोल कर उस ने पत्र निकाला और पढ़ने लगी. प्रबंधनिदेशक ने लिखा था, ‘प्रवीण के असमय निधन से कंपनी के हम सभी लोग दुख से स्तब्ध रह गए हैं. आप पर क्या गुजरती होगी, इसे हम अच्छी तरह समझते हैं. हम आप से अनुरोध करते हैं कि प्रवीण की जगह ले कर आप कंपनी की सेवा में आ जाएं. आप का समय भी कट जाएगा और हमें खुशी होगी कि हम अपने पूर्व कर्मचारी के परिवार के लिए कुछ कर सके.’

प्रिया कुछ क्षण सोचती रही और फिर उस ने फैसला ले लिया कि वह नौकरी जरूर जौइन करेगी…बिना देर किए. उस ने सूटकेस से साड़ी निकाली और डै्रसिंग टेबल के सामने आ कर खड़ी हो गई. साउथ सिल्क की साड़ी में वह खूबसूरत दिख रही थी. जैसे ही उस ने माथे पर बिंदी लगाई, उसे लगा जैसे गहरे अंधेरे के बाद उजाला हो गया हो. प्रवीण का दफ्तर वाला बैग उस ने अपने हाथ में उठाया और मां को कहा, ‘मां, पापा से कह देना, मैं उन के साथ नहीं जा सकती, मैं ने अपना रास्ता चुन लिया है. मैं प्रवीण की कंपनी जौइन कर रही हूं.’

मां प्रिया को एकटक देखती रहीं. उस के माथे की बिंदी और चेहरे के तेज भाव को. प्रिया का वह एक दूसरा ही रूप था जिसे देख कर मां के मन में कुतूहल के साथ एक अज्ञात भय पैदा हो गया. पता नहीं, यह लड़की क्या करेगी? घरबाहर किस प्रकार रहना चाहिए इसे मालूम नहीं? कुदरत ने उस से शानोशौकत, खानपान, रहनसहन और सामान्य ढंग से जीने का हक छीन लिया है, क्या वह नहीं जानती, कुदरत ने ही उस के साथ खिलवाड़ किया है? तब सच को छिपाने से क्या फायदा? अपने धर्म और परिवार का खयाल रखना पड़ेगा. आने दो आज, समझाऊंगी मैं उसे, एक विधवा को कैसे रहना है और कैसे जीना है.

शाम को प्रिया जैसे ही अपने दफ्तर से लौट कर आई, मां ने उसे अपने पास बैठा लिया. प्रिया बहुत खुश थी. मां से उस ने कहा कि दफ्तर का माहौल उस के माकूल है. एमडी से ले कर जीएम, अन्य अधिकारी तथा स्टाफ के सभी सदस्यों से उस को आदर मिला. प्रवीण कंपनी में एजीएम के पद पर था.

वही जगह प्रिया को भी मिली. दफ्तर में एक एजीएम का एक और पद है जिस पर फिलहाल मुंबई से सतीश ने जौइन किया है. सतीश और प्रवीण ने एक ही दिन नागपुर में कंपनी में जौइन किया था. सतीश से नागपुर में ही प्रिया की मुलाकात हुई थी. एक बार प्रवीण ने अपने घर उसे खाने पर बुलाया था, फिर उस का ट्रांसफर मुंबई हो गया. आज दफ्तर में उस से भेंट होने पर पुरानी याद ताजा हो गई. उस ने प्रवीण की मृत्यु पर काफी अफसोस प्रकट करते हुए कहा, ‘‘भाभी, आप इस दफ्तर में आ गईं, अच्छा हुआ.’’

‘‘यह सब तो ठीक है बेटी. कंपनी जौइन कर ली, मैं मना नहीं कर रही लेकिन तुम इस तरह मत रहो कि लोग तुम पर उंगली उठाएं. तुम्हें रंगीन कपड़े, बिंदी छोड़ कर सादे ढंग से जीना है,’’ मां ने जैसे अपना हुक्म जारी कर दिया.

‘‘मां, ऐसा न कहो, मैं एक विधवा की तरह नहीं जी सकती. मेरा दम घुट जाएगा. मेरी पुनू मर जाएगी. मुझे इन खोखले बंधनों से उबरने दो, मां. मैं अपनी जिंदगी को अपनी बेटी के साथ भरपूर जीना चाहती हूं. मुझे बल दो मां कि मैं इन बुरे रीतिरिवाजों का खुल कर सामना कर सकूं,’’ प्रिया ने अपना साहस दिखाया.

‘‘यह कैसे होगा बेटा, मैं मान भी जाऊं लेकिन तुम्हारे पापा, अपना धर्म, यह समाज हमें सुखचैन से नहीं रहने देगा.’’

‘‘उस की चिंता तुम मत करो मां. हमें ढंग से जीने का पूरा अधिकार है. जो धर्म हमें अपने पथ से डिगा दे उसे हम नहीं मानते और यह समाज जो खुद कुरीतियों के दलदल में फंसा हुआ है, उस की हम क्यों सुनेंगे. हम जैसा करेंगे समाज वैसा ही बनेगा.’’

मांने फिर कुछ जवाब नहीं दिया. शायद, प्रिया की बातों का उन पर अनुकूल असर हुआ. वे समझने लगीं कि जमाना अब बदल गया है. नए विचारों का साथ देने में ही अब भलाई है. वक्त के साथ पुराने पत्ते झड़ते गए और उस की जगह नए पत्ते मुसकराने लगे. प्रिया के भीतर भी नईनई कोंपलें उग आईं. दफ्तर में प्रिया का मन लगने लगा. वहां काम करने वाले सभी कर्मियों से उस की दोस्ती बढ़ती गई, खासकर सतीश से. एक दिन सतीश को उस ने अपने घर बुला कर मां से भी मिलाया. मां ने उत्सुकतावश उस से पूछ ही लिया कि वह कहां का रहने वाला है, उस के घर और कौनकौन हैं तथा वह किस बिरादरी का है? सतीश ने स्पष्ट शब्दों में मां को समझाया था कि वह रांची के आदिवासी परिवार से है. उस के घर में मातापिता और शादीशुदा 2 बहनें हैं. वैसे हम खांटी हिंदू हैं. लेकिन किसी दकियानूस धर्म या नीति से बंधे नहीं हैं. हमारा परिवार एक उन्मुक्त परिवार है. उस में दुनिया की सभी जातियां और धर्म समाहित हैं. इंसानियत ही हमारी जाति है और वही हमारा धर्म है.

‘‘बेटा, यह सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन हमारा समाज और धर्म इस की इजाजत नहीं देते. हम इन से बंधे हैं. अपने मन से कुछ नहीं कर सकते.’’

‘‘मांजी, आप लोगों को कुछ नहीं करना. करने वाले तो हम लोग हैं ही. आप बुजुर्ग लोग बस स्वीकारते जाइए. समाज और धर्म में बदलाव अपनेआप आ जाएगा.’’

‘‘ठीक है बेटा.’’

‘‘मांजी, आप ने स्वीकार कर लिया, फिलहाल बस इतना ही काफी है,’’ सतीश बोल कर जैसे निश्ंिचत हो गया.

एक दिन आखिर सतीश ने प्रिया के सामने शादी का प्रस्ताव रख ही दिया. इस पर प्रिया ने कहा, ‘‘मेरे साथ मेरी 5 वर्ष की बेटी पुनू भी है सतीश, क्या तुम उसे स्वीकार करोगे?’’

‘‘ऐसा क्यों बोलती हो? पुनू तुम्हारी बेटी है तो वह मेरी बेटी भी है. हमारे लिए एक बच्चा काफी है अब और की हमें जरूरत नहीं.’’

‘‘मुझ जैसी एक बच्ची की मां और विधवा औरत से तुम शादी के लिए तैयार हो गए सतीश, यह तुम्हारा बड़प्पन है.’’

‘‘अरे, तुम्हारी तुलना में मेरा बड़प्पन कोई अर्थ नहीं रखता, प्रिया. तुम जैसी उच्च खानदान की लड़की एक आदिवासी से संबंध करने को तैयार हो गई, इस पर आज ही नहीं, आने वाली पीढ़ी भी नाज करेगी. धर्म, समाज और जातिवाद की कुरीतियों पर जो तुम ने कुठाराघात करने का साहस किया है वह प्रशंसनीय है.’’

आखिर दोनों की सहमति मिल गई और एक दिन दफ्तर के सहकर्मियों के साथ दोनों ने कोर्ट में शादी कर ली. मां ने जाना तो प्रिया से बस इतना ही कहा कि मैं तो मान गई लेकिन तुम्हारे पापा बर्दाश्त नहीं करेंगे और धर्मसमाज से तुम्हें जिंदगी भर लड़ना पड़ेगा.

प्रिया ने मां को साथ रहने के लिए मना लिया. सोचा, मां साथ रहेंगी तो पापा जरूर आएंगे और किसी भी तरह उन्हें वह मना ही लेगी. यह सोच कर ही प्रिया के भीतर एक खुशी की लहर दौड़ गई.

प्रिया ने अपने ऊपर लगने वाले विधवा के ठप्पे का अंत कर दिया. कोई अब उस को विधवा नहीं कह सकता. वह सदा सुहागन रहेगी. अब उस की ओर कोई उंगली नहीं उठा सकेगा.

लेखक- बिलास बिहारी

क्या मैं गलत हूं: शादीशुदा मयंक को क्या अपना बना पाई मायरा?

पियाबालकनी में आ कर खड़ी हो गई. खुली हवा में सांस ले कर ऐसा लगा जैसे घुटन से बाहर आ गई हो. आसपास का शांत वातावरण, हलकीहलकी हवा से धीरेधीरे लहराते पेड़पौधे, डूबता सूरज सबकुछ सुकून मन को सुकून सा दे रहा था. सामने रखी चेयर पर बैठ कर आंखें मूंद लीं. भरसक प्रयास कर रही थी अपने को भीतर से शांत करने का. लेकिन दिमाग शांत होने का नाम नहीं ले रहा था. एक के बाद एक बात दिमाग में आती जा रही थी…

मैं पिया इस साल 46 की हुई हूं. जानपहचान वाले अगर मेरा, मेरे परिवार का खाका खींचेंगे तो सब यही कहेंगे, वाह ऐश है पिया की, अच्छाखासा खातापीता परिवार, लाखों कमाता पति, होशियार कामयाब बच्चे, नौकरचाकर और क्या चाहिए किसी को लाइफ में खुद भी ऐसी कि 4 लोगों के बीच खड़ी हो जाए तो अलग ही नजर आती है. खूबसूरती प्रकृति ने दोनों हाथों से है. ऊपर से उच्च शिक्षा ने उस में चारचांद लगा दिए. तभी तो मयंक को वह एक नजर में भा गई थी.

‘नैशनल इंस्टिट्यूट औफ फैशन टैक्नोलौजी, बेंगलुरु’ से मास्टर डिगरी ली थी उस ने.

जौब के बहुत मौके थे. मयंक का गारमैंट्स का बिजनैस देशविदेश में फैला था. फैशन इलस्टेटर की जौब के लिए उस ने अप्लाई किया था. उस के डिजाइन्स किए गारमैंट्स के कंपनी को काफी बड़ेबड़े और्डर मिले. मयंक की अभी तक उस से मुलाकात नहीं हुई, बस नाम ही

सुना था.

पिया के काम की तारीफ और स्पैशल इंसैंटिव के लिए मयंक ने उसे स्पैशल अपने कैबिन में बुलाया. कंपनी के सीईओ से मिलना पिया के लिए फक्र की बात थी.

मयंक को देखा तो देखती रह गई. किसी फिल्मी हीरो जैसी पर्सनैलिटी थी उस की. लेकिन पिया कौन सी कम थी. मयंक के दिल में उसी दिन से उतर गई थी. पिया कंपनी के सीईओ के लिए कुछ ऐसावैसा सोच भी नहीं सकती थी, लेकिन मयंक ने तो बहुत कुछ सोच लिया था पिया को देख कर. अब तो वह नित नए बहाने बना कर पिया को डिस्कस करने के लिए कैबिन में बुला लेता. पिया बेवकूफ तो थी नहीं कि कुछ सम?ा न पाती. मयंक ने उस से जब बातों ही बातों में शादी का प्रस्ताव रखा तो पिया को लगा कि कहीं वह कोई सपना तो नहीं देख रही. सपनों का राजकुमार उसे मिल गया था.

शादी के बाद पिया का हर दिन सोना और रात चांदी थी. 1 साल के अंदर ही पिया बेटे अनुज की मां बन गई और डेढ़ साल बाद ही स्वीटी की किलकारियों से घर फिर से गुलजार हो गया.

कहते हैं न जब प्रकृति देती है तो छप्पर फाड़ कर देती है. दोनों बच्चे एक से बढ़ कर एक होशियार. अनुज 12वीं के बाद ही आस्ट्रेलिया चला गया और वहां से बीबीए करने के बाद उस ने मयंक के साथ बिजनैस संभाल लिया. बापबेटे की देखरेख में बिजनैस खूब फूलफल रहा था. स्वीटी का एमबीबीएस करते हुए शशांक के साथ अफेयर हो गया तो दोनों की पढ़ाई खत्म होते हुए उन की शादी कर दी. आज दोनों मिल कर अपना बड़ा सा क्लीनिक चला रहे हैं.

पिया की यह कहानी सुन कर यह लगेगा न वाऊ क्या लाइफ है. पिया को भी ऐसा लगता है. लेकिन लाइफ यों ही मजे से गुजरती रहे ऐसा भला होता है? बस पिया की जिंदगी में भी ट्विस्ट आना बाकी था.

मयंक का अपने बिजनैस के सिलसिले में दुबई काफी आनाजाना था. मायरा जरीवाला गुजरात से थी. गारमैंट्स स्टार्टअप से शुरुआत की थी उस ने और आज उस की गुजराती टचअप लिए क्लासिक और मौडर्न ड्रैसेज की खूब डिमांड हो रही थी. बहुत महत्त्वाकांक्षी लड़की थी. मयंक की गारमैंट इंडस्ट्री के साथ टाइअप कर के वह अपने और पांव पसारना चाहती थी. इसी सिलसिले में उस ने दुबई में मयंक के साथ एक मीटिंग रखी थी.

मयंक 48 वर्ष का हो चुका था. कहते हैं कि पुरुष इस उम्र में अपने अनुभव, अपने धीरगंभीर व्यक्तित्व और पैसे वाला हो तो उस की पर्सनैलिटी में गजब की रौनक आ जाती है. माएरा मयंक के इस रोबीले व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना न रह सकी. उस की कंपनी के साथ टाइअप के साथसाथ उस की जिंदगी के साथ भी टाइअप करने की उस ने ठान ली.

पता नहीं क्यों पत्नी चाहे कितनी ही खूबसूरत, प्यार करने वाली हो, हर तरह से खयाल रखने वाली हो, लेकिन जहां कोई दूसरी औरत, ऊपर से खूबसूरत लाइन देने लगे तो पुरुष को उस की तरफ खिंचते हुए ज्यादा देर नहीं लगती. मयंक भी पुरुष था. मायरा एक बिजनैस वूमन थी. ऊपर से पूरी तरह आत्मविश्वास से भरी 35 साल की खूबसूरत औरत.

मयंक धीरेधीरे उस की ओर आकर्षित होता गया. मायरा नए दौर की औरत थी, जिस के लिए पुरुष के साथ रिलेशनशिप बनाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी. अपनी खुशी उस के लिए सब से ज्यादा माने रखती थी. मयंक और वह अब अकसर दुबई में ही मिलते और हफ्ता साथ बिता कर अपनेअपने बिजनैस में लग जाते. दोनों बिजनैस वर्ल्ड में अपनी रैपो बना कर रखना चाहते थे.

‘‘मयंक डियर, मु?ो बुरा लगता है कि मेरे कारण तुम पिया के साथ धोखा कर रहे हो. लेकिन मैं क्या करूं. मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं. अब मेरी खुशी तुम से जुड़ी है,’’ मायरा मयंक को अपनी बांहों के घेरे में घेरती हुई बोली.

‘‘मायरा, मैं तुम से ?ाठ नहीं बोलूंगा. पिया से मैं भी प्यार करता हूं. लेकिन अब जब भी तुम्हारे साथ होता हूं मु?ो अजीब सा सुकून मिलता है. मैं उसे कोई दुख नहीं पहुंचाना चाहता, लेकिन तुम्हें अब छोड़ भी नहीं सकता. वह मेरी जिंदगी है तो तुम मेरी सांस हो. मायरा, अब मैं तुम्हें जीवनभर यों ही प्यार करना चाहता हूं. मेरी जिंदगी में अब तक पिया की जगह एक तरफ

है और तुम्हारी दूसरी तरफ. मैं दोनों को ही शिकायत का मौका नहीं देना चाहता,’’ मयंक ने मायरा को एक भरपूर किस करते हुए अपने आगोश में ले लिया.

मयंक ने पूरी कोशिश की थी कि पिया को मायरा के बारे में कुछ पता न चले.

वह मायरा के साथ अपनी सारी चैट साथ ही

साथ डिलीट कर देता था. मोबाइल में अपना फिंगर पासवर्ड लगा रखा था. पिया खुद भी मयंक का मोबाइल कभी चैक नहीं करती थी, पूरा विश्वास जो था उस पर, लेकिन उस दिन मयंक नहाने के लिए जैसे ही बाथरूम में गया मायरा के 2-3 व्हाट्सऐप मैसेज आ गए.

पिया की नजर मोबाइल पर पड़ी. मोबाइल पर 2-3 बार बीप की आवाज हुई. नोटीफिकेशन में माई डियर लिखा दिख गया.

पिया का माथा ठनक गया. अब उसे मयंक की हरकतों पर शक होना शुरू हो गया. मयंक का बिजनैस ट्रिप की बात कह कर जल्दीजल्दी दुबई जाना, मोबाइल चैट पढ़ते हुए मंदमंद मुसकान, उस पर जरूरत से ज्यादा प्यार लुटाना, बातवेबात उसे गिफ्ट दे कर खुश रखना.

अपनी बौडी फिटनैस के लिए जिम एक दिन भी मिस न करना, डाइट पर पूरापूरा ध्यान देना जिस के लिए वह कहतेकहते थक जाती थी, लेकिन वह लापरवाही करता था. पिया को एक के बाद एक सब बातें जुड़ती नजर आने लगीं.

मयंक की जिंदगी में आजकल क्या चल रहा है उस का पता लगाना उस के लिए मुश्किल नहीं था. मयंक का ऐग्जीक्यूटिव असिस्टैंट समीर को एक तरह से पिया ने ही जौब पर रखा था. वह उस की फ्रैंड सीमा का कजिन था. समीर पिया की बहुत इज्जत करता था और अपनी बड़ी बहन मानता था.

पिया ने जब समीर से मयंक के प्रेमप्रसंग के बारे में पूछा तो उस ने अपना नाम बीच में न आने की बात कह पिया को मायरा के बारे में सबकुछ बता दिया.

समीर उसे मायरा और मयंक के बीच के बारे में बताता जा रहा था और पिया को लग रहा था जैसे उस के सपनों का महल जिसे उस ने प्यार से मजबूत बना दिया था आज रेत की तरह ढह गया है.

कहां कमी छोड़ दी थी उस ने. सबकुछ तो मयंक के कहे अनुसार करती रही थी. उस ने कहा नौकरी छोड़ दो, उस ने छोड़ दी. अपने कैरियर के पीक पर थी वह लेकिन मयंक के प्यार के आगे सब फीका लगा. उस ने कहा कि पिया बच्चों की देखभाल तुम्हारी जिम्मेदारी है, मैं अपने काम में बिजी हूं, तो यह बात भी उस ने मयंक की चुपचाप मान ली थी.

बच्चों की हर जिम्मेदारी उस ने खुद पर ले ली थी. अड़ोसपड़ोस, नातेरिश्तेदार, घरबाहर की सब व्यवस्था उस ने संभाल ली थी. किस के लिए, मयंक के लिए न, क्योंकि मयंक ही उस की दुनिया था. सबकुछ उस से ही तो जुड़ा था और उस ने कितनी आसानी से मायरा को उस के हिस्से का प्यार दे दिया. यह भी नहीं सोचा कि उस पर क्या बीतेगी, जब उसे पता चलेगा.

पिया को ऐसा लग रहा था जैसे उस की नसों में गरम खून दौड़ रहा है. तनमन दहक रहा है. मन कर रहा था कि मयंक को सब के सामने शर्मसार कर दे.

पिया यह सब तू क्या सोच रही है’, अचानक पिया को अपने मन की आवाज सुनाई दी, ‘पिया, यह तो तु?ो मयंक के बारे में अचानक शक हो गया तो तू ने सच पता कर लिया. अगर उस दिन फोन नहीं देखती तो? सबकुछ वैसा ही चलता रहता जैसे पिछले कई बरसों से चलता आ रहा है.’

पिया की सोच जैसे तसवीर का दूसरा पहलू देखने लगी थी. आज समाज में मयंक का एक रुतबा है. बेटे की बिजनैस टाइकून की इमेज बनी हुई. बेटी स्वीटी अपनी ससुराल में सिरआंखों पर बैठाई जाती है, क्योंकि उस का मायका रुसूखदार है. खुद का सोसाइटी में हाई प्रोफोइल स्टेट्स रखती है. आज अगर वह मुंह खोलती है तो मयंक के इस अफेयर को ले कर मीडिया वाले मिर्चमसाला लगा कर जगजाहिर कर देंगे. उन के बिजनैस पर इस का बहुत फर्क पड़ेगा.

बरसों से कमाई गई शोहरत पर ऐसा धब्बा लगेगा जिस का खमियाजा अनुज को भुगतना पड़ेगा, बेटा जो है. अभी तो उस का पूरा भविष्य पड़ा है आगे अपनी शोहरत बटोरने के लिए. स्वीटी के लिए मयंक उस के आइडियल पापा हैं. समाज में कितना रुतबा है उन के खानदान का. ऊफ, सब मिट्टी में मिल जाएगा. सोचतेसोचते पिया का सिर चकराने लगा था.

‘‘पिया मैडम, जरा संभल कर. आप ठीक तो हैं न, आप यहां आराम से बैठिए,’’ समीर ने पिया को कुरसी पर बैठाते हुए कहा.

पिया को पानी का गिलास दिया तो वह एक सांस में पी गई. उस की चुप्पी सबकुछ वैसा ही चलते रहने देगी जैसे चलता आ रहा है और अपने साथ हो रही बेवफाई को सरेआम करती है तो सच बिखर जाएगा. दिल और दिमाग में टकराव चल रहा था.

अचानक पिया कुरसी से उठ खड़ी हुई. पर्स से मोबाइल निकाला और

मयंक को फोन मिलाया, ‘‘मयंक, कहां हो तुम.’’

‘‘डार्लिंग, मीटिंग के लिए बाहर आया था. क्यों क्या बात है?’’ मयंक ने पूछा.

‘‘वह मैं तुम्हारे औफिस आई थी कि साथ लंच करते हैं.’’

‘‘ओह, यह बात है. नो प्रौब्लम, ऐसा करो तुम शंगरिला होटल पहुंचो, मैं सीधा तुम्हें वहां

15 मिनट में मिलता हूं. साथ लंच करते हैं वहां,’’ मयंक ?ाट से बोला.

‘‘ठीक है मैं पहुंचती हूं,’’ बोल कर पिया ने फोन काट दिया.

पिया जब होटल पहुंची तो मयंक उसे उस का इंतजार करता मिला.

पिया को लगा जैसे मयंक वही तो है जैसे पहले था. उस का खयाल रखने वाला. उसे इंतजार न करना पड़े इसलिए खुद पहले पहुंच जाना. मयंक के प्यार में कमी तो उसे कहीं दिख नहीं रही.

दोनों ने साथ लंच किया और मयंक ने उसे घर छोड़ा और औफिस चला गया, क्योंकि 4 बजे उस की क्लाइंट के साथ फिर मीटिंग थी.

घर आ कर पिया बालकनी में बैठ गई थी. उस ने निर्णय ले लिया. मयंक का सबकुछ बिखेर कर रख देगा. जो कुछ वह देख पा रही है शायद मयंक ने उस बारे में सोचा तक नहीं है. उस का सबकुछ तबाह हो जाएगा.

मयंक ने शायद सोचा ही नहीं कि मायरा के साथ उस की खुशी बस तभी तक है जब तक सब परदे के पीछे है. सच सामने आ गया तो सब खत्म हो जाएगा. न प्यार का यह नशा रहेगा, न परिवार में इज्जत, न समाज में मानप्रतिष्ठा.

‘उस की तो दोनों तरफ हार है. मयंक की तबाही से उसे क्या हासिल होगा. खुशी तो मिलने से रही. फिर यह ?ाठ ही क्यों नहीं अपना लिया जाए,’ पिया दिल को एक तरफ रख दिमाग से सोचने लगी, ‘मयंक उस से मायरा का सच छिपाने के लिए उस से बेइंतहा प्यार करने लगा है. प्यार तो कर रहा है न.

‘उस के प्यार के बिना वह नहीं रह सकती. नहीं जी पाएगी वह उस के बिना. मयंक इस भुलावे में रहे कि वह उस की सचाई जानती तो अच्छा ही है. सब अच्छी तरह तो चल रहा है.

‘पत्नी हूं मैं उस की, मेरा हक कोई और छीन नहीं सकता. पतिपत्नी के रिश्ते में सचाई होनी चाहिए. यह बात मानती है वह लेकिन अगर आज वह मयंक को उस के सच के साथ नंगा कर देगी तो क्या उन के बीच वह पहले जैसा प्यार रह पाएगा? नहीं, कई बार ?ाठ को ही अपनाना पड़ता है. दवा कड़वी होती है, लेकिन इलाज के लिए खानी ही पड़ती है.’

पिया ने अब निर्णय ले लिया और एक नई पहल शुरू करने के लिए वह कमरे के भीतर गई. लाइट औन की. पूरा कमरा लाइट से जगमगा उठा. अब अंधेरा नहीं था. मयंक के सामने जाहिर नहीं होने देगी कि वह सब जान चुकी है. शायद यही सब के लिए ठीक है. गलत तो नहीं है वह कहीं?

सरप्राइज: मां और बेटी की अनोखी कहानी- भाग 3

उधर पलभर के लिए सन्नाटा छाया तो तनुजा ने कहा, ‘‘अरे बेटा, सौरी, प्लीज रिनी को मत बताना कि मेरे मुंह से ये सब निकल गया है. उस ने मुझे धमकी दी है कि अगर मैं ने अपना मुंह खोला तो वह हम मांबेटे पर झूठा केस कर के फंसवा देगी.’’

अरुण को जैसे धक्का लगा था, ‘‘आंटी, रिनी के मेरी तरह और दोस्त भी हैं?’’

‘‘नहीं बेटा, मुझे कुछ नहीं पता,’’ घबराने की ऐक्टिंग करते हुए कह कर तनुजा ने फोन रख कर गहरी सांस ली.

पलभर बाद ही अरुण का फिर फोन आ गया, ‘‘आंटी, आप मुझे इन लोगों के फोन नंबर दे सकती हैं?’’

‘‘नहीं बेटा, मुझे नहीं पता.’’

‘‘ठीक है आंटी, आप मेरा नंबर लिख लें. जब भी इन में से कोई आए आप प्लीज मुझे फोन पर बता देना… मेरी रिक्वैस्ट है आप से. अब मेरी समझ में आ रहा है कि क्या हो रहा है. आप मेरे हैल्प करें आंटी, मैं आप की हैल्प करूंगा.’’

‘‘ठीक है बेटा, तुम तो मेरे बेटे की तरह हो.’’

2 दिन बाद ही यश आया था. दोनों ‘बार्बेक्यूनेशन’ डिनर के लिए जा रहे हैं, तनुजा ने सुन लिया. उन्होंने अरुण को फोन पर बता दिया. यह भी कहा, ‘‘बस बेटा, मेरा नाम न लेना. यह लड़की हमें फंसा देगी.’’

‘‘नहीं आंटी, आप चिंता न करें, थैक्स.’’

‘बार्बेक्यूनेशन’ में जो हुआ उस की तो रिनी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. अरुण ने रिनी और यश को वहां ऐसा लताड़ा कि रिनी के मुंह से बोल न फूटा. यश की आंखों से भी परदा हट गया था. अरुण और यश ने मिल कर रिनी को ऐसीऐसी गालियां दीं कि म्यूजिक तेज था, इसलिए तमाशा नहीं बना वरना वह लोगों की नजरों का सामना ही न कर पाती. वह तो वहां से भाग ही गई. उस के बाद अरुण और यश जो मिले तो पहली बार थे पर रिनी से मिले धोखे का, बेवकूफ  बनने का जो दुख था, दोनों ने जबदरदस्त डिनर कर शेयर किया.

रिनी घर पहुंची तो उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ी हुई थीं, जिसे देख कर तनुजा के

दिल को कुछ सुकून मिला, तसल्ली हुई. अंदाजा लगाया कि कुछ तो हुआ है. रिनी ने न कुछ खायापीया, न कोई बात की, बस, अपने कमरे में पड़ी रही.

तनुजा ने अपना मोबाइल नंबर अरुण को दे दिया था. देर रात उस ने फोन किया. कहा, ‘‘आंटी, थैक्यू वैरी मच. आज यश और मेरे सामने रिनी की पोल खुल गई. वह वहां से भाग ही गई और हां आंटी, यश और मेरी दोस्ती भी हो गई. आंटी, लड़के ऐसा करते हैं तो कितना तमाशा होता है… यहां एक विवाहित लड़की 4-4 लड़कों को मूर्ख बना रही थी. उस के नाटकों का अंत अभी हुआ नहीं है… मेरी यश से बात हो गई है… हम उसे सबक सिखा कर रहेंगे, आप का पीछा छुड़वाएंगे.’’

‘‘जीते रहो, बेटा.’’

‘‘अभी बहुत कुछ बाकी है. बस, ईशान और अनिल का पता चल जाए तो आगे काम करें.’’

‘‘अनिल अकसर जिम में रिनी के साथ ही वर्कआउट करता है और ईशान का साडि़यों का कोई शोरूम है, शायद ‘नारी’ नाम है.’’

‘‘आंटी, बस हो गया काम.’’

‘‘हां बातों में मैं ने इतना सुना है.’’

‘‘बस, अब हम ढूंढ़ लेंगे.’’

अरुण और यश ने दोनों का पता लगा ही लिया. इतना भी मुश्किल नहीं था. चारों जब साथ बैठे तो रिनी की असलियत जान कर पहले तो हैरान हुए, फिर गुस्सा हुए और फिर हंसने लगे. ईशान ने कहा, ‘‘यार, बदनाम हम हैं और ये लड़कियां क्या कम हैं? कितनी साडि़यां ले गई मुझ से और पहनी तुम लोगों के सामने.’’

चारों अब एकदूसरे के साथ हंसीमजाक कर रहे थे.

अनिल बोला, ‘‘मैं तो जिम में वर्कआउट करतेकरते फंस गया, यार सिर्फ शरीर की नहीं, दुष्ट लड़की ने पैसों की भी अच्छी ऐक्सरसाइज करवा दी.’’

अरुण ने कहा, ‘‘ऐसी लड़की को इतनी आसानी से हम भी नहीं छोड़ेंगे. भला हो उन आंटी का जिन्होंने हमें सब सच बता दिया.

चलो, अगर 5वां मूर्ख नहीं मिला होगा तो इस समय घर पर ही होगी. चल कर उस का थोड़ा इलाज कर आते हैं. तभी चैन मिलेगा. आंटी तो हमारा ही साथ देंगी. बेचारे मांबेटा बुरे फंसे. चलो, उन्होंने हमारी आंखें खोलीं. हम भी उन की हैल्प कर आते हैं,’’ और फिर चारों हंसते हुए खड़े हो गए.

दरवाजा तनुजा ने ही खोला, रिनी तो अपने बैडरूम में थी. तनुजा मुसकराते हुए फुसफुसाई, ‘‘तुम सब को ढेर सा धन्यवाद.’’

अरुण भी फुसफुसाया, ‘‘आप को भी धन्यवाद आंटी. आप ने हमें और मूर्ख बनने से बचा लिया… कहां है मैडम?’’ तनुजा ने बैडरूम की तरफ इशारा कर दिया.

ईशान ने कहा, ‘‘अब आप चुप रहना आंटी. आज हम आप की परेशानी भी खत्म करते हैं. बस, अब आप देखना.’’

अनिल जोर से चिल्लाया, ‘‘कहां है धोखेबाज लड़की?’’ रिनी ने अंदर सुना तो बदहवास सी बाहर आई. चारों लड़कों को साथ खड़ा देख उस की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. कांपते स्वर में बोली, ‘‘क्या है? यहां क्यों आए सब?’’

‘‘तुम लड़कों को धोखा देती हो, पैसे लूटती हो, सास को धमकी देती हो, हम सब तुम्हारे खिलाफ रिपोर्ट करने पुलिस स्टेशन जा रहे हैं.’’

रिनी पुलिस के नाम से घबरा गई. फिर तनुजा की तरफ देख कर बोली, ‘‘सौरी, प्लीज हैल्प मी.’’

यश चिल्ला रहा था, ‘‘तुम्हारी पोल हम खोल कर रहेंगे. हम सब के पास तुम्हारे साथ खिंचे बहुत फोटो हैं… मैरिड होते हुए 4-4 बौयफ्रैंड्स को बेवकूफ बना रखा था. मैं तो न्यूजपेपर में छपवाऊंगा तुम्हारे कारनामे.’’

रिनी सचमुच घबरा रही थी. तनुजा को बोलने का यही सही समय लगा. कहा, ‘‘चलो बच्चो, मुझे भी इस के खिलाफ रिपोर्ट करनी है… धमकियां दे दे कर इस ने हमें बहुत परेशान किया है… अब तो तुम लोग भी गवाह हो, चलो, पुलिस स्टेशन चलते हैं.’’

रिनी ने धीरे से कहा, ‘‘प्लीज, आई एम सौरी.’’

तनुजा ने कहा, ‘‘एक ही शर्त है कि इसी समय इस घर से दफा हो जाओ. अजय आए तो तलाक के पेपर आराम से साइन कर देना नहीं तो तुम अब बच नहीं पाओगी. तुम्हें केस करने का बहुत शौक था न? मैं करूं अब केस? ये सब गवाही देंगे.’’

‘‘ठीक है, मैं कल ही चली जाऊंगी.’’

‘‘नहीं, अभी जाओ,’’ चारों लड़के घूरते हुए रिनी की हालत पस्त कर रहे थे.

रिनी ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं अपना सामान ले लूं.’’

‘‘कोई सामान नहीं ले जाओगी,’’ तनुजा ने कठोर स्वर में कहा, ‘‘बस, अब जाओ.’’

रिनी अंदर गई अपना पर्स और एक बैग में जल्दी से अपने कपड़े डाल कर बाहर आई.

तनुजा ने लड़कों से कहा, ‘‘तुम भी जाओ बच्चो… भविष्य में तुम लोगों की जरूरत होगी तो फोन करूंगी.’’

‘‘हां आंटी, यह जरा भी परेशान करे तो हमें जरूर बताना. हमारे पास इस के खिलाफ बहुत सुबूत हैं.’’

रिनी सिर झुकाए चली गई. लड़के भी चले गए. तनुजा सोफे पर बैठ गईं. चैन की सांस ली. सब एक सपना सा लग रहा था. कितने दिनों से वे किस मानसिक यंत्रणा में जी रही थीं, यह वही जानती थीं.

अजय को तनुजा ने फोन पर ये सब नहीं बताया. विदेश गए बेटे को वे किसी भी तरह का तनाव नहीं देना चाहती थीं.

जब अजय लौटा तो घर में रिनी को न देख तनुजा से पूछा तो उन्होंने पूरी बात बेटे को बताई. सुन कर वह तो मां का मुंह ही देखता रह गया. फिर दोनों खूब जोरजोर से हंस पड़े और एकदूसरे के गले लग गए.

अजय ने कहा, ‘‘मां, बड़ा कमाल किया. इतनी बड़ी मुसीबत से इतनी जल्दी छुटकारा मिल गया, मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा है.’’

‘‘बेटे की मुसीबत दूर करने के लिए थोड़ा नाटक किया, जो सफल रहा. ये सब जरूरी था. मेरी कोशिश यही थी कि मैं तुम्हें तुम्हारे लौटने पर यह सरप्राइज दे सकूं? कैसा रहा सरप्राइज?’’

‘‘शानदार,’’ अजय ने मां के गले लगते हुए कहा, ‘‘थैंक्यू, मां.’’

Summer Special: गर्मियों में बनाएं ये 12 हैल्दी और टेस्टी चटनियां

चटनी हमारे भोजन की शान है. यदि खाने की थाली में कोई चटपटी चटनी मिल जाए तो खाने का स्वाद कई गुना बढ़ जाता है. चटपटी चटनी का सेवन तृप्ति का भाव तो देता ही है, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी चटनी बहुत लाभदायक होती है.

चटनियां ताजे फल, हरी पत्तियों व विविध हैल्दी मसालों को मिला कर बनाई जाती हैं. फिर इन्हें पकाया भी नहीं जाता, इसलिए इन में प्रयोग मसाले, फल, सब्जियां, दाल आदि के खनिज व विटामिन पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं. चटनियां फैट फ्री होती हैं, इन के सेवन से वजन नियंत्रित रहता है. अधिक कैलौरी खाने की समस्या भी नहीं होती, पाचनतंत्र सुचारु रूप से काम करता है.

टमाटर, आंवला, अलसी, लहसुन, तिल व इमली जैसी चीजों की चटनी ऐंटीऔक्सीडैंट का काम करती है. जहां धनिया, पुदीना, बैगन व तोरई की चटनी आयरन व क्लोरोफिल से भरपूर होती है, वहीं दालों व दही के साथ बनाई गई चटनी प्रोटीन से भरपूर होती है. अपने स्वाद व मौसम के अनुसार विविध प्रकार चटनियां बना कर फ्रिज में रखें. किसीकिसी चटनी को साल भर तक भी सुरक्षित रखा जा सकता है जैसे आम, आंवला व मेथी की चटनी. लहसुन, अलसी, तिल व टमाटर की चटनी को भी 10-15 दिन फ्रिज में सुरक्षित रखा जा सकता है. दालों, धनिया, पुदीना, तोरई व बैगन आदि की चटनी को भी 5-6 दिन तक फ्रिज में सुरक्षित रखा जा सकता है.

पेश हैं, विभिन्न प्रकार की चटनियां बनाने की विधियां:

1. मूंगफली की चटनी

सामग्री: 1 कप छिलका हटी मूंगफली भुनी हुई, 4-5 हरीमिर्चें, 1 छोटा चम्मच चीनी, 1 बड़ा चम्मच नीबू का रस, नमक स्वादानुसार.

विधि: सारी सामग्री को मिला कर पीस लें. 8-10 दिन इस चटनी को फ्रिज में रखा जा सकता है.

लाभ: मूंगफली प्रोटीन, आयरन, कैल्सियम व फास्फोरस का उत्तम स्रोत है. इस से गैस की समस्या में आराम मिलता है.

2. अंगूर की चटनी

सामग्री: 2 कप अंगूर, 50 ग्राम पिसी चीनी, चुटकी भर पिसी कालीमिर्च, 1/4 छोटा चम्मच पिसी छोटी इलायची 1/2 – 1/2 छोटे चम्मच भुना व पिसा जीरा व काला नमक.

विधि: सारी सामग्री को मिला कर ग्राइंडर में 1 मिनट पीसें. पौष्टिक खट्टीमीठी चटनी तैयार है. इसे 5-6 दिन तक रखा जा सकता है.

3. खजूर व किशमिश की चटनी

सामग्री: 1 कप बिना बीज के खजूर,1 कप किशमिश, 1 छोटा चम्मच कालीमिर्च पिसी, 1 छोटा चम्मच छोटी इलायची पिसी, 1-1 छोटा चम्मच काला नमक व भुने जीरे का पाउडर, चुटकी भर हींग, 1 बड़ा चम्मच नीबू का रस, 1 छोटा चम्मच गरममसाला, नमक स्वादानुसार.

विधि: खजूर व किशमिश को गरम पानी से धो कर 1/2 घंटा भिगोए रखें. फिर सारी सामग्री को मिक्सी में डाल कर पीस लें. इस चटनी को 8-10 दिन तक रखा जा सकता है.

लाभ: किशमिश व खजूर दोनों ही आयरन के अच्छे श्रोत हैं. खजूर में खनिज, फाइबर, कैल्सियम व विटामिन होते हैं.

4. आलू बुखारे की चटनी

सामग्री: 250 ग्राम आलूबुखारे, 2 बड़े चम्मच किशमिश, 1 बड़ा चम्मच खजूर कटे, 1-1 छोटा चम्मच काला नमक व भुना जीरा पाउडर, 1 छोटा चम्मच अदरक का पेस्ट, 1 छोटा चम्मच लालमिर्च, 1/2 कप नीबू का रस, 1 बड़ा चम्मच चीनी पिसी, नमक स्वादानुसार.

विधि: किशमिश, खजूर व आलूबुखारों को धो लें. अब आलूबुखारों को काट कर बीज निकाल दें और फिर तीनों चीजों को नीबू के रस में 1 घंटे तक भिगोए रखें. फिर सारी सामग्री को मिक्सी में बारीक पीस लें. अब एक पैन में डाल कर धीमी आंच पर थोड़ा गाढ़ा होने तक पकाएं. ठंडी होने पर बोतल में भर कर रखें. इसे 2-3 महीने तक रखा जा सकता है.

5. मेथीदाना की चटनी

सामग्री: 2 बड़े चम्मच मेथीदाना, 1/4 कप किशमिश, 1/2-1/2 छोटा चम्मच हलदी व लालमिर्च पाउडर, 1 छोटा चम्मच सौंफ पिसी, 1 छोटा चम्मच अमचूर पाउडर, 1/2 कप कद्दूकस किया गुड़, चुटकी भर हींग, 1 छोटा चम्मच तेल, नमक स्वादानुसार.

विधि: मेथी को धो कर साफ पानी में 2 घंटों के लिए भिगो दें. फिर स्टीम कर लें. पैन में तेल गरम कर हींग भून कर हलदी डालें. मैथी डाल कर थोड़ी देर भूनें. अब 1/2 कप पानी डाल शेष सामग्री डाल कर धीमी आंच पर गाढ़ा होने तक पकाएं.

लाभ: यह चटनी पित्त व वायु की वृद्धि रोकती है, वात रोग में भी लाभदायक है, पाचनशक्ति को सुचारु बनाती है. इस चटनी को 5-6 महीने तक रखा जा सकता है.

6. अदरक की चटनी

सामग्री: 50 ग्राम अदरक,1 छोटा चम्मच इमली का पेस्ट, 1 बड़ा चम्मच गुड़, 1 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर, 1 छोटा चम्मच तेल, नमक स्वादानुसार.

विधि: अदरक को धो छील कर कद्दूकस करें. पैन में तेल गरम करें. अदरक लच्छा डाल कर थोड़ी देर भूनें फिर इमली का पेस्ट डाल कर भूनें. ठंडा कर के गुड़ छोड़ कर सारी सामग्री मिला कर पीस लें. अब गुड़ कद्दूकस कर के मिलाएं और थोड़ी देर पकाएं. ठंडा होने पर बोतल में रखें. इसे 3-4 महीने तक रखा जा सकता है.

लाभ: आमवात की शिकायत में लाभदायक है. गैस, जुकाम, दमा व खांसी आदि में भी इस का सेवन लाभदायक है.

7. लहसुन व अलसी की चटनी

सामग्री: 1/2 कप लहसुन की कलियां, 2 बड़े चम्मच अलसी, 8-10 सूखी लालमिर्चें, 1 बड़ा चम्मच नीबू का रस, नमक स्वादानुसार.

विधि: लहसुन छील कर सारी सामग्री मिला कर बारीक पीस लें. ब्रैड स्पै्रड की तरह इसे प्रयोग किया जा सकता है. इसे 10-15 दिन तक रखा जा सकता है.

लाभ: लहसुन ऐंटीऔक्सीडैंट है, अलसी ओमेगा ऐसिड से भरपूर है, जो ब्लडप्रैशर को नियंत्रित करती है. इस से कोलैस्ट्रौल कम होता है.

8. तिल व नारियल की चटनी

सामग्री: 1 कप भुने सफेद तिल, 1 कप कद्दूकस किया नारियल, 5-6 कलियां लहसुन, 3-4 हरीमिर्चें, 2 बड़े चम्मच धनियापत्ती कटी, 1 कप इमली का रस, नमक स्वादानुसार.

विधि: तिल, नारियल, लहसुन, हरीमिर्च व धनियापत्ती को मिला कर पीसें. नमक व इमली का रस मिलाएं. इसे 5-6 दिन रखा जा सकता है.

लाभ: तिल कैल्सियम से भरपूर है. नारियल में फास्टोरस, प्रोटीन कैल्सियम व आयरन जैसे खनिज विटामिन होते हैं.

9. सेब की चटनी

सामग्री: 250 ग्राम खट्टीमीठे सेब, 1/2 छोटा चम्मच दालचीनी पाउडर, 1/2 छोटी चम्मच कालीमिर्च पिसी, 50 ग्राम चीनी पिसी, भुना चीरा, 1 छोटा चम्मच नीबू का रस, कालानमक व नमक स्वादानुसार.

विधि: सेब छील कर छोटे टुकड़ों में काटें. सारी सामग्री मिला कर पीस लें. इसे 4-5 दिन फ्रिज में रखा जा सकता है.

लाभ: सेब में कैल्सियम, फास्फोरस, विटामिन सी, पोटैशियम, आयरन आदि खनिज होते हैं.

10. दही की चटनी

सामग्री: 1 कप दही, 1 कप धनियापत्ती या पुदीनापत्ती, 5-6 हरीमिर्चें, 1/2 कप कद्दूकस किया नारियल, 2 बड़े चम्मच नीबू का रस, 2 बड़े चम्मच चीनी, नमक स्वादानुसार.

विधि: सारी सामग्री को मिक्सी में डाल कर बारीक पीस लें. फ्रिज में ठंडा कर के सर्व करें. इसे 5-6 दिन फ्रिज में रखा जा सकता है.

लाभ: दही, धनिया, व नारियल सभी विटामिन व खनिज से भरपूर होते हैं. गरमी के मौसम में यह चटनी विशेष ठंडक प्रदान करती है.

11. करीपत्ते की चटनी

सामग्री: 1/2-1/2 कप नारियल व करीपत्ता, 6 हरीमिर्चें, 1 बड़ा चम्मच इमली का पेस्ट, 1 बड़ा चम्मच उरद दाल, नमक स्वादानुसार.

विधि: उरद दाल को ड्राई रोस्ट करें. फिर सारी सामग्री मिला कर पीस लें. इसे 7-8 दिन फ्रिज में रखा जा सकता है.

लाभ: करीपत्ता औषधीय गुणों की खान है, यह कब्ज दूर करता है, बाल काले रखता है व पाचनतंत्र ठीक करता है.

12. चना दाल चटनी

सामग्री: 1/2 कप चने की दाल, 3 लालमिर्चें, चुटकी भर हींग, 5-6 करीपत्ते, 1 बड़ा चम्मच तेल, 1 बड़ा चम्मच नीबू का रस, 1/2 छोटा चम्मच राई, 2 बड़े चम्मच दही, नमक स्वादानुसार.

विधि: दाल को सूखा रोस्ट करें. फिर धो कर 1/2 घंटे के लिए पानी में भिगो दें. दाल, लालमिर्च को बारीक पीसें. पैन में तेल गरम कर राई, हींग भूनें. फिर कटे करीपत्ते डाल कर भूनें. पिसी दाल में यह तड़का डालें. दही व नमक मिलाएं.

इसे भी 4-5 दिन फ्रिज में रखा जा सकता है.

लाभ: यह प्रोटीन व फाइबर से भरपूर होती है.

– माधुरी गुप्ता

Summer Special: इन 5 फेस सीरम से बनाएं स्किन को यंग और फ्रैश 

अभी तक आपने फेस स्क्रब , मॉइस्चराइजर के बारे में तो खूब सुना ही होगा और इसे आप अपने स्किन केयर रूटीन में इस्तेमाल भी करते होंगे. लेकिन फेस सीरम ज्यादा प्रचलित नहीं होने के कारण या फिर इसके फायदों से अनजान रहने के कारण हम सब इसे अपने मेकअप रूटीन में शामिल करने से डरते हैं , लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये फेस सीरम स्किन के लिए किसी मैजिक से कम नहीं होता है. जो भी लड़की या महिला इसे रोजाना इस्तेमाल करती है , उसकी स्किन ज्यादा यंग व जवां नजर आती है. ऐसे में आपके लिए ये जानना बहुत जरूरी है कि फेस सीरम है क्या और आप किन इंग्रीडिएंट्स से बने फेस सीरम का इस्तेमाल करके अपनी स्किन को फायदा पहुंचा सकती हैं. तो आइए जानते हैं .

फेस सीरम है क्या 

स्किन को जवां बनाए रखने के लिए हम क्या क्या नहीं करते हैं. कभी क्रीम्स बदलते हैं , कभी महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स का चयन करते हैं तो कभी स्किन ट्रीटमेंट्स का सहारा लेते हैं. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि अगर आप एक बार फेस सीरम को अपने डेली रूटीन में शामिल कर लेंगे फिर तो आपकी स्किन चमक दमक उठेगी. ऐसा ग्लो देखकर हर कोई यही सोचेगा कि आपने फेशियल लिया है. अगर आप भी ऐसा कॉम्प्लिमेंट पाना चाहती हैं तो जरूर ट्राई करें फेस सीरम.

असल में ये वाटर बेस्ड व बहुत ही लाइट वेट होने के कारण स्किन में आसानी से अब्सॉर्ब हो जाता है. साथ ही इसमें इतने ज्यादा एक्टिव इंग्रीडिएंट्स होते हैं , जो स्किन को हाइड्रेट, यंग व उसकी प्रोब्लम्स पर फोकस करके उसमें अलग ही तरह का ग्लो व अट्रैक्शन लाने का काम करते हैं. ये असल में त्वचा में कसाव, चमक व नमी लाकर उसे यंग बनाने का काम करता है. लेकिन तभी जब आपका फेस सीरम बना होगा इन इंग्रीडिएंट्स से.

कैसा हो आपका सीरम 

विटामिन सी 

अगर बात हो विटामिन सी की तो ये न सिर्फ शरीर की इम्युनिटी को बूस्ट करने का काम करता है , बल्कि ये स्किन की भी इम्युनिटी को बूस्ट करने में काफी मददगार होता है. साथ ही इसकी एंटी एजिंग प्रोपर्टीज स्किन को हमेशा यंग बनाए रखती है. बता दें कि विटामिन सी त्वचा में असामान्य मेलेनिन के उत्पादन को रोकने का काम करता है. जिससे त्वचा की रंगत सामान्य हो जाती है, साथ ही डार्क स्पोट्स , सन स्पोर्ट्स , मुंहासों के कारण होने वाले दागधब्बों को कम करने व मेलास्मा के कारण होने वाली हाइपरपिगमेंटेशन को कम करने का काम करता है. बता दें कि ये इंग्रीडिएंट कोलेजन का निर्माण करके हैल्दी स्किन देने का भी काम करता है. इससे स्किन चमक उठती है. तभी तो ये एक्टिव इंग्रीडिएंट स्किन सीरम की जान बन जाता है.

बेस्ट फोर स्किन वैसे तो विटामिन सी हर किसी की स्किन के लिए बेस्ट है, लेकिन अगर आप झुर्रियों व फाइन लाइन्स से फाइट करना चाहते हैं या फिर आप एजिंग से दूर रहना चाहते हैं तो आपके सीरम में विटामिन सी इंग्रीडिएंट का होना बहुत जरूरी है. इसके लिए आप बायोटिक का विटामिन सी डार्क स्पोट फेस सीरम, द मोम्स कंपनी नेचुरल विटामिन सी फेस सीरम, लक्मे 9 टू 5 विटामिन सी फेशियल सीरम का चयन कर सकती हैं.

ह्यलुरोनिक एसिड 

स्किन की अगर नमी खत्म होने लगती है , तो स्किन बेजान व स्किन का सारा चार्म खत्म  होने लगता है. लेकिन ह्यलुरोनिक एसिड स्किन को हाइड्रेट करने का काम करता है, स्किन के मोइस्चर को स्किन में लौक करने का काम करता है . ये स्किन को रिपेयर करने में भी मदद करता है, साथ ही ये डैमेज टिश्यू तक ब्लड फ्लो को पहुंचाता है. जिस भी फेस सीरम में ह्यलुरोनिक एसिड होता है , वो सीरम स्किन के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है.

बेस्ट फोर स्किन अगर आपकी स्किन ड्राई है और आप उसे नौरिश करना चाहते हैं तो आप ह्यलुरोनिक एसिड युक्त सीरम का ही चयन करें. क्योंकि ये स्किन सेल्स में वाटर को बाइड करके उसे स्मूद , हाइड्रेट और फ्रेश फील करवाने का काम करता है. और जब स्किन हाइड्रेट रहती है तो स्किन पर एजिंग के निशान भी नहीं दिखाई देते हैं. इसके लिए आप इट्स स्किन का ह्यलुरोनिक एसिड मॉइस्चराइजर सीरम, लोरियल पेरिस के ह्यलुरोनिक एसिड फेस सीरम का चयन करके अपनी स्किन को ग्लोइंग व हाइड्रेट कर सकते हैं.

3 रेटिनोल 

रेटिनोल का सीधा संबंध कोलेजन के उत्पादन में तेजी लाने व हैल्दी सेल्स में तेजी से वृद्धि करना होता है. आप कह सकते हैं कि सीरम में रेटिनोल स्टार इंग्रीडिएंट के रूप में काम करता है. ये झुर्रियों, फाइन लाइन्स व एक्ने मार्क्स को हलका करके स्किन के ग्लो व उसकी स्मूदनेस को बनाए रखने का काम करता है.

बेस्ट फोर स्किन– ये नार्मल से ड्राई स्किन सभी पर सूट करता है. साथ ही ये पोर्स को अनब्लॉक करके एक्ने से लड़ने में बहुत ही असरदार होता है. इसी के साथ ये एजिंग के साइन को कम करने व स्किन के टेक्सचर व टोन को इम्प्रूव करने का काम करता है. इसके लिए आप डर्मा कंपनी रेटिनोल सीरम का इस्तेमाल कर सकते हैं.

हेक्सीलयेरीसोरकिनोल 

इसमें एन्टिओक्सीडेंट, एस्ट्रिंजेंट , ब्राइटनिंग और इवन स्किन टोन प्रोपर्टीज होती हैं. इसकी स्किन ब्राइटनिंग प्रोपर्टीज स्किन की रंगत को इम्प्रूव करके चेहरे को निखारने का काम करती है. इसकी एन्टिओक्सीडेंट प्रोपर्टीज प्रर्यावरण में मौजूद फ्री रेडिकल्स से स्किन की सुरक्षा करती है.

बेस्ट फोर स्किन  अगर आपकी डल स्किन है यानि आपको हाइपरपिग्मेंटेड स्किन डिसआर्डर है तो आप इस इंग्रीडिएंट से बने सीरम का इस्तेमाल करके अपने कॉम्प्लेक्सन  में निखार लाकर स्किन के टेक्सचर को भी इम्प्रूव कर सकती हैं. इसके लिए आप लक्मे एब्सलूट परफेक्ट रेडियंस स्किन  ब्राइटनिंग सीरम का चयन कर सकती हैं.

एंटी इंफ्लेमेटरी प्रोपर्टीज 

इस बात का खास ध्यान रखें कि अगर आपकी स्किन सेंसिटिव है तो आपको ऐसे सीरम का चयन करना होगा, जिसमें एंटी इंफ्लेमेटरी प्रोपर्टीज हो. जिससे स्किन में जलन, रेडनेस , ब्रेअकाउट्स की समस्या न हो. इसके लिए आप चेक करें कि उसमें एलोवीरा , ग्रीन टी , विटामिन बी 3 , कैमोमाइन इत्यादि तत्व जरूर हो. इसके लिए आप द मोम्स कंपनी व न्यूट्रोजेना का सीरम इस्तेमाल कर सकते हैं.

मिसेज पॉपुलैरिटी 2022-23 विनर अलीशा ओहरी से जाने, सुंदरता के लिए क्या है खास

सपनों को पूरा करने में उम्र कभी आड़े नहीं आती, जरुरत होती है, मेहनत, लगन और पैशन, ये सारी चीजे कुछ भी करने से रोक नहीं पाती और इसे ही कर दिखाया है दिल्ली की 36 वर्षीय खूबसूरत और गोर्जियस अलीशा ओहरी, उन्होंने बुल्गारिया में होने वाली ‘मिसेज यूनिवर्स 2022 – 23’ की प्रतियोगिता में ‘मिसेज पॉपुलैरिटी 2022-23’ का ख़िताब जीती.

इस ख़िताब के पाने के बादअलीशा ओहरी को ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि दो बच्चों की माँ होने पर भी उन्हें ये ख़िताब मिला. 120 सुंदरियों में ये ख़िताब जीतना उनके लिए आसान नहीं था. इसमें उसके पति ध्रुव ओहरी और बेटा 13 साल का और बेटी 10 साल का सहयोग रहा है.अलीशा ने मेहनत, लगन और कठिन परिश्रम से फाइनल दौर में पहुंची, कैसे उन्हें ये ख़िताब मिला, आइये जाने उन्ही से.

जरुरत है अच्छे व्यक्तित्व की

ब्यूटी पेजेंट में जाने के लिए सुंदर होना कितना जरुरी है ? पूछने पर अलीशा कहती है कि सौन्दर्य प्रतियोगिता में अच्छा व्यतित्व सुन्दरता से अधिक महत्वपूर्ण होता है. आज ऐसे बहुत से माध्यम है, जिससे आप बहरी सुन्दरता को निखार सकते है मसलन मेकअप, सर्जरी, ड्रेसिंग आदि , लेकिन आतंरिक ब्यूटी का दिखावा नहीं किया जा सकता. हम अंदर से जैसे है, हमारे व्यवहार से वह साफ पता चल जाता है. आप दूसरों के प्रति कैसा व्यवहार रखती है,उसे ही लोग हमेशा याद रखते है, आपकी सुन्दरता को नहीं. इसलिए आपका सुंदर होना या न होना आवशयक नहीं, जितना आपको एक अच्छा व्यक्ति होना आवश्यक है. यह केवल समाज के लिए ही नहीं, हर ब्यूटी पीजेंट प्रतियोगिताओं के लिए जरुरी है. इसके अलावा आत्मविश्वास बहुत आवश्यक है, क्योंकि इससे किसी अपूर्णता में भी व्यक्ति कॉन्फिडेंस रख सकेंगे और आगे बढ़ते जायेंगे.

मिस इंडिया बनने का था सपना

अलीशा कहती है कि बचपन से ही मिस इंडिया बनने का सपना था, लेकिन पढाई और शादी की वजह से मैं कुछ नहीं कर पाई थी, लेकिन ड्रीम मैंने देखा है तो उसे पूरा करने के लिए मैंने हर तरह से खुद की देखभाल की. मुझे ये मौका 13 साल बाद मिला और मैंने मिसेज इंडिया में भाग लिया. इसमें शामिल होना मेरे लिए बड़ी चुनौती रही, क्योंकि मैं एक होममेकर हूँ. मैंने प्रोफेशनली कुछ भी नहीं किया था, जब मैंने इसमें भाग लिया तो जो भी चीजे मुझे सीखाई गई, फिर चाहे वह बोलचाल,रहन-सहन, डाइट आदि में हर चीज में मैंने पूरी मेहनत की. इस प्रतियोगिता में पूरे इंडिया से महिलाएं आई हुई थी, जिसमे कोई डॉक्टर, तो कोई पुलिस ऑफिसर आदि सभी अपने क्षेत्र में माहिर थी, लेकिन मैंने खुद पर विश्वास को नहीं छोड़ा और फॅमिली के सहयोग से मिसेज इंडिया के ख़िताब को पाने की होड़ में जुड़ गई. मेरे पति ,बच्चे सभी मेरे साथ रहे और मैं ‘मिसेज इंडिया 2022’का ख़िताब जीत गई और मुझे मिसेज यूनिवर्स में जाने का मौका मिला. मैंने अपने देश को रिप्रेजेंट किया और मेरे लिए एक बड़ी जिम्मेदारी थी. इसमें मैंने पिछले साल की मिसेज यूनिवर्स को देखा उनकी खूबियों को अपने अंदर लाने की कोशिश की और मैंने ‘मिसेज पॉपुलैरिटी 2022-23’का ख़िताब जीत कर आई.

क्रिएटिविटी है पसंद

अलीशा आगे कहती है कि मेरे पेरेंट्स हमेशा पढाई में आगे बढ़ने को कहते थे,उनका काम पढ़ाई में आगे बढ़ने को कहना था, लेकिन मुझे क्रिएटिविटी बहुत पसंद थी. जिसमे डांस, सिंगिंग,फैशन इन्ही चीजों में आगे बढ़ना था. उन्हें भी ये सब पसंद था, लेकिन उनके लिए पढ़ाई सबसे उपर थी. कॉलेज के साथ-साथ मैंने मेकअप में एक साल का डिप्लोमा भी किया है. उसके बाद शादी और बच्चे हो गए. मेरे पति ने कभी मुझे कुछ करने से रोका नहीं. पति के सहयोग के बिना ये संभव भी नहीं था, उन्हें मुझपर विश्वास रहा है कि मैं ये सब कर सकती हूँ. उनका प्रोत्साहन मुझे हमेशा मिला है.

उद्देश्य पर थी नजर

अलीशा का कहना है कि पहली बार मंच पर जाने की नर्वसनेस मुझे नहीं थी, क्योंकि पति का सहयोग बहुत अधिक रहा. इसके अलावा मैंने सेल्फ लव कभी कम नहीं किया है. बच्चों का ध्यान रखने के साथ-साथ खुद का ध्यान रखना, कभी नहीं छोड़ा. स्टेज पर भी मुझे किसी प्रकार की नर्वसनेस नहीं थी, 4 दिन की इस सेशन में मैने अपनी नजर अपने गोल पर टिकाये रखी. बहुत सारे राउंड होते रहे, उन सभी में आगे बढ़ना बहुत कठिन था,इतनी सारी लड़कियों को देखकर मैं घबराई नहीं. कुछ भारतीय महिलाएं ऐसी भी थी, जो इंडियन थी, लेकिन बाहर से आई हुई थी. मेरे लिए मेरा ‘मिसेज इंडिया’का टाइटलजीतना बड़ी जीत रही, क्योंकि मेरे परिवार में किसी ने इसकी कल्पना नहीं की थी. मेरे पति के आँखों में आसू तक आ गए थे. मेरा पूरा परिवार ख़ुशी से झूम उठा था. बुल्गारियां में जाकर 120 प्रतिभागी में कुछ भी जीतना आसान नहीं था, क्योंकि सभी सुंदरियाँ अपने देश की विनर थी.

बदलनी है सोच

मिसेज यूनिवर्स में सभी सुन्दरियों को डोमेस्टिक वायलेंस पर बोलना पड़ा, जो आसान नहीं था. अलीशा कहती है कि पुराने ज़माने से पुरुष को अधिक शक्तिशाली माना जाता है और ये सोच ही गलत है. जब तक सभी ये नहीं सोच पाते कि पुरुष और महिला दोनों ही ताकतवर है, तब तक कुछ भी सकता. महिला और पुरुष दोनों बराबर है. ये बातें बच्चों को बचपन से ही सिखाना जरुरी है. बहन और भाई में फर्क नहीं है. देखा जाय तो हर देश में पुरुष, महिला को पीटते है, केवल भारत में ही नहीं हर देश में डोमेस्टिक वायलेंस है. इसमें औरतों को भी समझना पड़ेगा कि वे किसी से कम नहीं है. मैंने देखा है कि महिलाएं खुद को पुरुषों से कमजोर समझती रहती है. गलत चीजों को अपने ऊपर लेती है, जो ठीक नहीं. समस्या है तो सुलझाये, अपने ऊपर न लें. असल में ये सारी चीजे बचपन से ही शुरू होती है, जहाँ पुरुषों को मजबूत बता दिया जाता है.

किये ग्रो

इस अवार्ड शो से मैंने बहुत कुछ सीखा है, क्योंकि मुझे हमेशा से ब्यूटी पेजेंट में भाग लेने की इच्छा रही. मैंने ग्रूमिंग क्लासेज से खुद को बहुत पॉलिश किया और कॉन्फिडेंस भी मिला. आगे मैं एक्टिंग, मॉडलिंग और फैशन से जुड़े रहना चाहती हूँ. मैं हमेशा सोशल वर्क से जुडी रही और आगे भी करुँगी.

खुद से करें प्यार

अलीशा कहती है कि मैंने 13 साल तक कुछ भी नहीं किया था, बच्चों को पूरा टाइम दिया, लेकिन बच्चों के थोड़े बड़े होने पर मैंने इस ओर ध्यान दिया, क्योंकि अब वे खुद अपना काम कर सकते है. होममेकर को लगता है कि बच्चे हो गए है तो अब उनकी जिंदगी में कुछ करने को नहीं रह गया है, बच्चे या पति ही कुछ करेंगे, जबकि ऐसा नहीं होता, आपकी जिंदगी खुद की जिंदगी है, जब भी समय मिले आगे बढे, क्योंकि इससे परिवार और बच्चे भी प्रेरित होते है. खुद पर विशवास करना और अपनी देखभाल करना कभी न छोड़े. सपने है तो उन्हें पूरा करें. खुद से प्यार करना सीखे.

तारीफ: अपनी पत्नी की तारीफ क्यों कर पाए रामचरण

रामचरणबाबू यों तो बड़े सज्जन व्यक्ति थे. शहर के बड़े पोस्ट औफिस में सरकारी मुलाजिम थे और सरकारी कालोनी में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सुख से रहते थे. लेकिन उन्हें पकौड़े खाने का बड़ा शौक था. पकौड़े देख कर वे खुद पर कंट्रोल ही नहीं कर पाते थे. रविवार के दिन सुबह नाश्ते में पकौड़े खाना तो जैसे उन के लिए अनिवार्य था. वे शनिवार की रात में ही पत्नी से पूछ लेते थे कि कल किस चीज के पकौड़े बना रही हो? उन की पत्नी कभी प्याज के, कभी आलू के, कभी दाल के, कभी गोभी के, तो कभी पालक के पकौड़े बनाती थीं और अगले दिन उन्हें जो भी बनाना होता था उसे रात ही में बता देती थीं. रामचरण बाबू सपनों में भी पकौड़े खाने का आनंद लेते थे. लेकिन बरसों से हर रविवार एक ही तरह का नाश्ता खाखा कर बच्चे बोर हो गए थे, इसलिए उन्होंने पकौड़े खाने से साफ मना कर दिया था.

उन का कहना था कि मम्मी, आप पापा के लिए बनाओ पकौड़े. हमें तो दूसरा नाश्ता चाहिए. रविवार का दिन जहां पति और बच्चों के लिए आराम व छुट्टी का दिन होता, वहीं मिसेज रामचरण के लिए दोहरी मेहनत का. हालांकि वे अपनी परेशानी कभी जाहिर नहीं होने देती थीं, लेकिन दुख उन्हें इस बात का था कि रामचरण बाबू उन के बनाए पकौड़ों की कभी तारीफ नहीं करते थे. पकौड़े खा कर व डकार ले कर जब वे टेबल से उठने लगते तब पत्नी द्वारा बड़े प्यार से यह पूछने पर कि कैसे बने हैं? उन का जवाब यही होता कि हां ठीक हैं, पर इन से अच्छे तो मैं भी बना सकता हूं.

मिसेज रामचरण यह सुन कर जलभुन जातीं. वे प्लेटें उठाती जातीं और बड़बड़ाती जातीं. पर रामचरण बाबू पर पत्नी की बड़बड़ाहट का कोई असर नहीं होता था. वे टीवी का वौल्यूम और ज्यादा कर देते थे. रामेश्वर रामचरण बाबू के पड़ोसी एवं सहकर्मी थे. कभीकभी किसी रविवार को वे अपनी पत्नी के साथ रामचरण बाबू के यहां पकौड़े खाने पहुंच जाते थे. आज रविवार था. वे अपनी पत्नी के साथ उन के यहां उपस्थित थे. डाइनिंग टेबल पर पकौड़े रखे जा चुके थे.

‘‘भाभीजी, आप लाजवाब पकौड़े बनाती हैं,’’ यह कहते हुए रामेश्वर ने एक बड़ा पकौड़ा मुंह में रख लिया.

‘‘हां, भाभी आप के हाथ में बड़ा स्वाद है,’’ उन की पत्नी भी पकौड़ा खातेखाते बोलीं.

‘‘अरे इस में कौन सी बड़ी बात है, इन से अच्छे पकौड़े तो मैं बना सकता हूं,’’ रामचरण बाबू ने वही अपना रटारटाया वाक्य दोहराया.

‘‘तो ठीक है, अगले रविवार आप ही पकौड़े बना कर हम सब को खिलाएंगे,’’ उन की पत्नी तपाक से बोलीं.

‘‘हांहां ठीक है, इस में कौन सी बड़ी बात है,’’ रामचरण बड़ी शान से बोले. ‘‘अगर आप के बनाए पकौड़े मेरे बनाए पकौड़ों से ज्यादा अच्छे हुए तो मैं फिर कभी आप की बात का बुरा नहीं मानूंगी और यदि आप हार गए तो फिर हमेशा मेरे बनाए पकौड़ों की तारीफ करनी पड़ेगी,’’ मिसेज रामचरण सवालिया नजरों से रामचरण बाबू की ओर देख कर बोलीं.

‘‘अरे रामचरणजी, हां बोलो भई इज्जत का सवाल है,’’ रामेश्वर ने उन्हें उकसाया.

‘‘ठीक है ठीक है,’’ रामचरण थोड़ा अचकचा कर बोले. शेखी के चक्कर में वे यों फंस जाएंगे उन्हें इस की उम्मीद नहीं थी. खैर मरता क्या न करता. परिवार और दोस्त के सामने नाक नीची न हो जाए, इसलिए उन्होंने पत्नी की चुनौती स्वीकार कर ली.

‘‘ठीक है भाई साहब, अगले रविवार सुबह 10 बजे आ जाइएगा, इन के हाथ के पकौड़े खाने,’’ उन की पत्नी ने मिस्टर और मिसेज रामेश्वर को न्योता दे डाला. सोमवार से शनिवार तक के दिन औफिस के कामों में निकल गए शनिवार की रात में मिसेज रामचरण ने पति को याद दिलाया, ‘‘कल रविवार है, याद है न?’’

‘‘शनिवार के बाद रविवार ही आता है, इस में याद रखने वाली क्या बात है?’’ रामचरण थोड़ा चिढ़ कर बोले.

‘‘कल आप को पकौड़े बनाने हैं. याद है कि भूल गए?’’

‘‘क्या मुझे…?’’ रामचरण तो वाकई भूल गए थे.

‘‘हां आप को. सुबह थोड़ा जल्दी उठ जाना. पुदीने की चटनी तो मैं ने बना दी है, बाकी मैं आप की कोई मदद नहीं करूंगी.’’ रामचरण बाबू की तो जैसे नींद ही उड़ गई. वे यही सोचते रहे कि मैं ने क्या मुसीबत मोल ली. थोड़ी सी तारीफ अगर मैं भी कर देता तो यह नौबत तो न आती. रविवार की सुबह 8 बजे थे. रामचरण खर्राटे मार कर सो रहे थे.

‘‘अजी उठिए, 8 बज गए हैं. पकौड़े नहीं बनाने हैं क्या? 10 बजे तो आप के दोस्त आ जाएंगे,’’ उन की मिसेज ने उन से जोर से यह कह कर उन्हें जगाया. मन मसोसते हुए वे जाग गए. 9 बजे उन्होंने रसोई में प्रवेश किया.

‘‘सारा सामान टेबल पर रखा है,’’ कह कर उन की पत्नी रसोई से बाहर निकल गईं.

‘‘हांहां ठीक है, तुम्हारी कोई जरूरत नहीं मैं सब कर लूंगा,’’ कहते हुए रामचरण बाबू ने चोर नजरों से पत्नी की ओर देखा कि शायद वे यह कह दें, रहने दो, मैं बना दूंगी. पर अफसोस वे बाहर जा चुकी थीं. ‘जब साथ देने की बारी आई तो चली गईं. वैसे तो कहती हैं 7 जन्मों तक साथ निभाऊंगी,’ रामचरण भुनभुनाते हुए बोले. फिर ‘चल बेटा हो जा शुरू’ मन में कहा और गैस जला कर उस पर कड़ाही चढ़ा दी. उन्होंने कई बार पत्नी को पकौड़े बनाते देखा था. उसे याद करते हुए कड़ाही में थोड़ा तेल डाला और आंच तेज कर दी. पकौड़ी बनाने का सारा सामान टेबल पर मौजूद था. उन्होंने अंदाज से बेसन एक कटोरे में निकाला. उस में ध्यान से नमक, मिर्च, प्याज, आलू, अजवाइन सब डाला फिर पानी मिलाने लगे. पानी जरा ज्यादा पड़ गया तो बेसन का घोल पतला हो गया. उन्होनें फिर थोड़ा बेसन डाला. फिर घोल ले कर वे गैस के पास पहुंचे. आंच तेज होने से तेल बहुत गरमगरम हो गया था. जैसे ही उन्होंने कड़ाही में पकौड़े के लिए बेसन डाला, छन्न से तेल उछल कर उन के हाथ पर आ गिरा.

‘‘आह,’’ वे जोर से चिल्लाए.

‘‘क्या हुआ?’’ उन की पत्नी बाहर से ही चिल्लाईं और बोलीं, ‘‘गैस जरा कम कर देना वरना हाथ जल जाएंगे.’’

‘‘हाथ तो जल गया, ये बात पहले नहीं बता सकती थीं?’’ वे धीरे से बोले. फिर आंच धीमी की और 1-1 कर पकौड़े का घोल कड़ाही में डालने लगे. गरम तेल गिरने से उन की उंगलियां बुरी तरह जल रही थीं. वे सिंक के पास जा कर पानी के नीचे हाथ रख कर खड़े हो गए तो थोड़ा आराम मिला. इतने में ही उन का मोबाइल बजने लगा. देखा तो रामेश्वर का फोन था. उन्होंने फोन उठाया तो रामेश्वर अपने आने की बात कह कर इधरउधर की बातें करने लगे.

‘‘अजी क्या कर रहे हो, बाहर तक पकौड़े जलने की बास आ रही है,’’ उन की मिसेज रसोई में घुसते हुए बोलीं. रामचरण बाबू ने तुरंत फोन बंद कर दिया. वे तो रामेश्वर से बातचीत में इतने मशगूल हो गए थे कि भूल ही गए थे कि वे तो रसोई में पकौड़े बना रहे थे. दौड़ कर उन की मिसेज ने गैस बंद की. रामचरण भी उन की ओर लपके, पर तब तक तो सारे पकौड़े जल कर काले हो चुके थे. पत्नी ने त्योरियां चढ़ा कर उन की ओर देखा तो वे हकलाते हुए बोले, ‘‘अरे वह रामेश्वर का फोन आ गया था.’’

तभी ‘‘मम्मी, रामेश्वर अंकल और आंटी आ गए हैं,’’ बेटी ने रसोई में आ कर बताया.

‘‘अरे रामचरणजी, पकौड़े तैयार हैं न?’’ कहते हुए रामेश्वर सीधे रसोई में आ धमके. वहां जले हुए पकौड़े देख कर सारा माजरा उन की समझ में आ गया. वे जोरजोर से हंसने लगे और बोले, ‘‘अरे भई, भाभीजी की तारीफ कर देते तो यह दिन तो न देखना पड़ता?’’

‘‘जाइए बाहर जा कर बैठिए. मैं अभी दूसरे पकौड़े बना कर लाती हूं. बेटा, पापा की उंगलियों पर क्रीम लगा देना,’’ मिसेज रामचरण ने कहा. उस के आधे घंटे बाद सब लोग उन के हाथ के बने पकौड़े खा रहे थे. साथ में चाय का आनंद भी ले रहे थे.

‘‘क्यों जी, कैसे बने हैं पकौड़े?’’ उन्होंने जब रामचरण बाबू से पूछा तो, ‘‘अरे, तुम्हारे हाथ में तो जादू है. लाजवाब पकौड़े बनाती हो तुम तो,’’ कहते हुए उन्होंने एक बड़ा पकौड़ा मुंह में रख लिया. सभी ठहाका मार कर हंस दिए.

मोह के धागे: क्यों पति का घर छोड़ने पर मजबूर हो गई वृंदा

दरवाजे की घंटी बजी तो वृंदा ने सोचा कौन होगा इस वक्त? घड़ी में 8 बज रहे थे. पैरों में जल्दी से चप्पलें फंसा कर चलतेचलते पहनने की कोशिश करते हुए दरवाजा खोला तो सामने मानव खड़ा था. ‘‘ओह, तुम?’’ धीरे से कह कर रास्ता छोड़ दिया.

अचानक कमरे में गहरा सन्नाटा पसर गया था. टेबल पर रखे गिलास में पानी भरते हुए पूछा, ‘‘कैसे आना हुआ?’’ ‘‘वह… मां का देहांत हो गया… आज… मैं ने सोचा… शायद… तुम घर आना चाहो.’’

वृंदा के हाथ थमे से रह गए, ‘‘ओह, आई एम सौरी,’’ कह कर पलकें झुका लीं. आंखों में आंसू भर आए थे. फिर से एक लंबी चुप्पी पसर गई थी. ‘‘तो… कल मैं… इंतजार करूंगा,’’ कह कर मानव उठा और दरवाजे तक पहुंच कर फिर मुड़ा, ‘‘आई विल वेट फौर यू.’’

वृंदा ने हामी में सिर हिलाते हुए नजरें झुका लीं. मानव के सीढि़यां उतरने की आवाज धीरेधीरे दूर हो गई तो वृंदा ने दरवाजा बंद कर लिया और आ कर सोफे पर ही लेट गई. उस की आंखें अब भी नम थीं. 9 वर्ष बीत गए… वृंदा ने गहरी सांस ली… खाने का वक्त हो गया, मगर भूख न जानें कहां चली गई थी. अपार्टमैंट की बत्तियां बुझा धीमी रोशनी में बालकनी में आ खड़ी हुई. तेज रफ्तार से दौड़ती गाडि़यां मानो एकदूसरे का पीछा कर रही हों.

वृंदा का मन बोझिल सा हो गया था. कपड़े बदले, पानी पीया और बिस्तर में लेट गई. आंखें बंद कीं तो आवाजें कानों में गूंजने लगीं… ‘‘वृंदा, मां को खाना दे दो.’’

‘‘हां, बस बन गया है.’’ मानव थाली निकाल मां का खाना ले कर उन के कमरे की तरफ चल दिया.

‘‘सुनो, मैं दे रही हूं.’’ ‘‘रहने दो,’’ कह कर, मानव चला गया.

‘‘वृंदा, देखो मां क्यों खांस रही हैं.’’ ‘‘अरे, ऐसे ही आ गई होगी.’’

मानव ने दवा निकाली और मां के कमरे में चला गया. वृंदा सुबह भागभाग कर काम निबटा रही थी. मानव के औफिस का वक्त हो रहा था.

‘‘वृंदा, मेरा नाश्ता? उफ, ये सब तुम बाद में भी कर सकती हो,’’ मुंह बना कर मुड़ गया. मां के कपड़े धोना, प्रैस करना, उन का खाना, नाश्ता, दूध, फ्रूट काटना, जूस देना और भी कई छोटेछोटे काम करते वृंदा थक जाती.

शाम को मानव घर लौटा, तुम मां का खयाल नहीं रखतीं… बूढ़ी हैं वे… सब कामवाली पर छोड़ रखा है.’’

सुन कर वृंदा अवाक रह गई. गुस्सा आने लगा था उसे. मानव और उस के बीच जो मीठा सा प्रेम था वह मर सा गया था. क्या यह वही आदमी है जो जरा सा रूठते ही मनाने लगता था. मेरी छोटीछोटी बातों का भी ध्यान रखता था. अब मां के सिवा उसे कुछ नजर ही नहीं आता. मां पर भी गुस्सा आने लगा था कि इतना करने के बावजूद कभी कोई आशीर्वाद या तारीफ का शब्द उन के मुंह से न निकलता. फिर भी मानव पर प्यार आ जाता बारबार. शायद वृंदा का प्रेम मोह में बदल गया था. खुद पर गुस्सा आ रहा था. चाह कर भी मानव को समझा नहीं पा रही थी कि वह भी मां की परवाह करती है, प्यार करती है, देखभाल करती है… जाने कैसा चक्र सा बन गया था. मानव मां की ओर झुकता जाता. वृंदा को गुस्सा आता तो कुछ भी बोल देती. बाद में अफसोस होता. मगर मानव उन शब्दों को ही सही मान कर मां के लिए और परेशान रहता.

वृंदा को लगता मानव कहीं दूर चला गया है. अजनबी सा बन गया था. वृंदा उठ कर बिस्तर में बैठ गई. एसी चलने के बावजूद पसीना आ रहा था. पानी पीया और फिर लेट गई. रोज झगड़ा होने लगा. वृंदा इंसिक्योर होती गई. धीरेधीरे डिप्रैशन में जाने लगी. मानव बेखबर रहा. मां भी मूकदर्शक बनी रही. तनाव सा रहने लगा घर में.

एक दिन वृंदा ने मां को मानव से कुछ कहते सुना. वृंदा सामने आ गई, ‘‘मां… मेरे ही घर में मेरे खिलाफ बातें?’’

मानव बोला, ‘‘मां हैं मेरी इज्जत करो… बूढ़ी हैं,’’ वृंदा बूढ़ी हैं… बूढ़ी हैं सुनसुन कर तंग आ चुकी थी. बोली, ‘‘जानती हूं मैं,’’ चीखने लगी थी वह, ‘‘मैं किस के लिए हूं… अगर मैं ही प्रौब्लम हूं तो मैं ही चली जाती हूं.’’

‘‘जाना है तो जाओ… निकलो,’’ मानव ने कहा. वृंदा ने घर छोड़ दिया. मानव ने कोई खबर न ली. वृंदा ने भी गिरतेपड़ते राह खोज ली. आंसू भर आए थे. जख्म फिर हरे हो गए थे. वृंदा फफकफफक कर रो पड़ी थी.

सुबह मानव के घर में मां का क्रियाकर्म चलता रहा. मानव सफेद कुरतापाजामा पहने नजरों के सामने से गुजरता रहा. कितना जानापहचाना सा था सबकुछ. वृंदा भी हाथ बंटाती रही. 15 दिन बीत गए. मानव एक बार फिर उस के दरवाजे पर खड़ा था, ‘‘वृंदा… घर लौट आओ… अब तो मां नहीं रही.’’

वृंदा ने मानव की ओर देखा, ‘‘मानव, तुम आज तक समझ ही नहीं पाए… इट वाज नैवर अबाउट योर मदर… मैं तुम से उम्मीद करती थी कि तुम मेरी भावनाओं को समझोगे… जिस के लिए मैं अपना सब कुछ छोड़ आई थी… कितनी आसानी से उस घर से निकलने को कह दिया… मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती थी. तुम्हारा प्यार पाना चाहती थी… मां के सामने तुम मुझे देख ही नहीं पाए… मैं ने खुद को तुम्हारे प्रेम में खो दिया था. अच्छा किया जो तुम ने मुझे बेसहारा छोड़ दिया. मैं ने अपने पैरों पर खड़ा होना सीख लिया. अपना आत्मविश्वास पा लिया. अब जो पाया है उसे फिर नहीं खोना चाहती. अच्छा होगा तुम फिर यहां न आओ.’’ मानव धीरे से उठा और बोझिल कदमों से चलता हुआ दरवाजे से निकल गया. वृंदा ने दरवाजा बंद किया और बंद हो गईं वे आवाजें जो उस का पीछा करती रहीं… वे मोह के धागे जो उसे बांधे हुए थे और कमजोर बना रहे थे आज तोड़ दिए थे और एक नए अध्याय की शुरुआत की थी.

Mother’s Day Special: वह मेरे जैसी नहीं है

मैं ने तो यही सुना था कि बेटियां मां की तरह होती हैं या ‘जैसी मां वैसी बेटी’ लेकिन जब स्नेहा को देखती हूं तो इस बात पर मेरे मन में कुछ संशय सा आ जाता है. इस बात पर मेरा ध्यान तब गया जब वह 3 साल की थी. उसी समय अनुराग का जन्म हुआ था. मैं ने एक दिन स्नेहा से पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हारा बेड अलग तैयार कर दूं, तुम अलग बेड पर सो पाओगी?’’ स्नेहा तुरंत चहकी थी, ‘‘हां, मम्मी बड़ा मजा आएगा. मैं अपने बेड पर अकेली सोऊंगी.’’

मुझे थोड़ा अजीब लगा कि जरा भी नहीं डरी, न ही उसे हमारे साथ न सोने का कोई दुख हुआ. विजय ने कहा भी, ‘‘अरे, वाह, हमारी बेटी तो बड़ी बहादुर है,’’ लेकिन मैं चुपचाप उस का मुंह ही देखती रही और स्नेहा तो फिर शाम से ही अपने बेड पर अपना तकिया और चादर रख कर सोने के लिए तैयार रहती.

स्नेहा का जब स्कूल में पहली बार एडमिशन हुआ तो मैं तो मानसिक रूप से तैयार थी कि वह पहले दिन तो बहुत रोएगी और सुबहसुबह नन्हे अनुराग के साथ उसे भी संभालना होगा लेकिन स्नेहा तो आराम से हम सब को किस कर के बायबाय कहती हुई रिकशे में बैठ गई. बनारस में स्कूल थोड़ी ही दूरी पर था. विजय के मित्र का बेटा राहुल भी उस के साथ रिकशे में था. राहुल का भी पहला दिन था. मैं ने विजय से कहा, ‘‘पीछेपीछे स्कूटर पर चले जाओ, रास्ते में रोएगी तो उसे स्कूटर पर बिठा लेना.’’ विजय ने ऐसा ही किया लेकिन घर आ कर जोरजोर से हंसते हुए बताया, ‘‘बहुत बढि़या सीन था, स्नेहा इधरउधर देखती हुई खुश थी और राहुल पूरे रास्ते जोरजोर से रोता हुआ गया है, स्नेहा तो आराम से रिकशा पकड़ कर बैठी थी.’’

मैं चुपचाप विजय की बात सुन रही थी, विजय थोड़ा रुक कर बोले, ‘‘प्रीति, तुम्हारी मम्मी बताती हैं कि तुम कई दिन तक स्कूल रोरो कर जाया करती थीं. भई, तुम्हारी बेटी तो बिलकुल तुम पर नहीं गई.’’ मैं पहले थोड़ी शर्मिंदा सी हुई और फिर हंस दी.

स्नेहा थोड़ी बड़ी हुई तो उस की आदतें और स्वभाव देख कर मेरा कुढ़ना शुरू हो गया. स्नेहा किसी बात पर जवाब देती तो मैं बुरी तरह चिढ़ जाती और कहती, ‘‘मैं ने तो कभी बड़ों को जवाब नहीं दिया.’’ स्नेहा हंस कर कहती, ‘‘मम्मी, क्या अपने मन की बात कहना उलटा जवाब देना है?’’

अगर कोई मुझ से पूछे कि हम दोनों में क्या समानताएं हैं तो मुझे काफी सोचना पड़ेगा. मुझे घर में हर चीज साफ- सुथरी चाहिए, मुझे हर काम समय से करने की आदत है. बहुत ही व्यवस्थित जीवन है मेरा और स्नेहा के ढंग देख कर मैं अब हैरान भी होने लगी थी और परेशान भी. अजीब लापरवाह और मस्तमौला सा स्वभाव हो रहा था उस का. स्नेहा ने 10वीं कक्षा 95 प्रतिशत अंक ला कर पास की तो हमारी खुशियों का ठिकाना नहीं था. मैं ने परिचितों को पार्टी देने की सोची तो स्नेहा बोली, ‘‘नहीं मम्मी, यह दिखावा करने की जरूरत नहीं है.’’

मैं ने कहा, ‘‘यह दिखावा नहीं, खुशी की बात है,’’ तो कहने लगी, ‘‘आजकल 95 प्रतिशत अंक कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, मैं ने कोई टौप नहीं किया है.’’ बस, उस ने कोई पार्टी नहीं करने दी, हां, मेरे जोर देने पर कुछ परिचितों के यहां मिठाई जरूर दे आई. अब तक हम मुंबई में शिफ्ट हो चुके थे. स्नेहा जब 5वीं कक्षा में थी, तब विजय का मुंबई ट्रांसफर हो गया था और अब हम काफी सालों से मुंबई में हैं.

10वीं की परीक्षाओं के तुरंत बाद स्नेहा के साथ पढ़ने वाली एक लड़की की अचानक आई बीमारी में मृत्यु हो गई. मेरा भी दिल दहल गया. मैं ने सोचा, अकेले इस का वहां जाना ठीक नहीं होगा, कहीं रोरो कर हालत न खराब कर ले. मैं ने कहा, ‘‘बेटी, मैं भी तुम्हारे साथ उस के घर चलती हूं,’’ अनुराग को स्कूल भेज कर हम लोग वहां गए. पूरी क्लास वहां थी, टीचर्स और कुछ बच्चों के मातापिता भी थे. मेरी नजरें स्नेहा पर जमी थीं. स्नेहा वहां जा कर चुपचाप कोने में खड़ी अपने आंसू पोंछ रही थी, लेकिन मृत बच्ची का चेहरा देख कर मेरी रुलाई फूट पड़ी और मैं अपने पर नियंत्रण नहीं रख पाई. मुझे स्वयं को संभालना मुश्किल हो गया. स्नेहा की दिवंगत सहेली कई बार घर आई थी, काफी समय उस ने हमारे घर पर भी बिताया था.

स्नेहा फौरन मेरा हाथ पकड़ कर मुझे धीरेधीरे वहां से बाहर ले आई. मेरे आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे. हम दोनों आटो से घर आए. कहां तो मैं उसे संभालने गई थी और कहां वह घर आ कर कभी मुझे ग्लूकोस पिला रही थी, कभी नीबूपानी. ऐसी ही है स्नेहा, मुझे कुछ हो जाए तो देखभाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ती और अगर मैं ठीक हूं तो कुछ करने को तैयार नहीं होगी. मैं कई बार उसे अपने साथ मार्निंग वाक पर चलने के लिए कहती हूं तो कहती है, ‘‘मम्मी, टहलने से अच्छा है आराम से लेट कर टीवी देखना,’’ मैं कहती रह जाती हूं लेकिन उस के कानों पर जूं नहीं रेंगती. कहां मैं प्रकृतिप्रेमी, समय मिलते ही सुबहशाम सैर करने वाली और स्नेहा, टीवी और नेट की शौकीन.

5वीं से 10वीं कक्षा तक साथ पढ़ने वाली उस की सब से प्रिय सहेली आरती के पिता का ट्रांसफर जब दिल्ली हो गया तो मैं भी काफी उदास हुई क्योंकि आरती की मम्मी मेरी भी काफी अच्छी सहेली बन चुकी थीं. अब तक मुझे यही तसल्ली रही थी कि स्नेहा की एक अच्छी लड़की से दोस्ती है. आरती के जाने पर स्नेहा अकेली हो जाएगी, यह सोच कर मुझे काफी बुरा लग रहा था. आरती के जाने के समय स्नेहा ने उसे कई उपहार दिए और जब वह उसे छोड़ कर आई तो मैं उस का मुंह देखती रही. उस ने स्वीकार तो किया कि वह बहुत उदास हुई है, उसे रोना भी आया था, यह उस की आंखों का फैला काजल बता रहा था. लेकिन जिस तरह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख कर उस ने मुझ से बात की उस की मैं ने दिल ही दिल में प्रशंसा की. स्नेहा बोली, ‘‘अब तो फोन पर या औनलाइन बात होगी. चलो, कोई बात नहीं, चलता है.’’

ऐसा नहीं है कि वह कठोर दिल की है या उसे किसी से आंतरिक लगाव नहीं है. मैं जानती हूं कि वह बहुत प्यार करने वाली, दूसरों का बहुत ध्यान रखने वाली लड़की है. बस, उसे अपनी भावनाओं पर कमाल का नियंत्रण है और मैं बहुत ही भावुक हूं, दिन में कई बार कभी भी अपने दिवंगत पिता को या अपने किसी प्रियजन को याद कर के मेरी आंखें भरती रहती हैं. जैसेजैसे मैं उसे समझ रही हूं, मुझे उस पर गुस्सा कम आने लगा है. अब मैं इस बात पर कलपती नहीं हूं कि स्नेहा मेरी तरह नहीं है. उस का एक स्वतंत्र, आत्मविश्वास से भरा हुआ व्यक्तित्व है. डर नाम की चीज उस के शब्दकोश में नहीं है. अब वह बी.काम प्रथम वर्ष में है, साथ ही सी.पी.टी. पास कर के सी.ए. की तैयारी में जुट चुकी है. हमें मुंबई आए 9 साल हो चुके हैं. इन 9 सालों में 2-3 बार लोकल टे्रन में सफर किया है. लोकल टे्रन की भीड़ से मुझे घबराहट होती है. हाउसवाइफ हूं, जरूरत भी नहीं पड़ती और न टे्रन के धक्कों की हिम्मत है न शौक. मेरी एक सहेली तो अकसर लोकल टे्रन में शौकिया घूमने जाती है और मैं हमेशा यह सोचती रही हूं कि कैसे मेरे बच्चे इस भीड़ का हिस्सा बनेंगे, कैसे कालिज जाएंगे, आएंगे जबकि विजय हमेशा यही कहते हैं, ‘‘देखना, वे आज के बच्चे हैं, सब कर लेंगे.’’ और वही हुआ जब स्नेहा ने मुलुंड में बी.काम के लिए दाखिला लिया तो मैं बहुत परेशान थी कि वह कैसे जाएगी, लेकिन मैं हैरान रह गई. मुलुंड स्टेशन पर उतरते ही उस ने मुझे फोन किया, ‘‘मम्मी, मैं बिलकुल ठीक हूं, आप चिंता मत करना. भीड़ तो थी, गरमी भी बहुत लगी, एकदम लगा उलटी हो जाएगी लेकिन अब सब ठीक है, चलता है, मम्मी.’’

मैं उस के इस ‘चलता है’ वाले एटीट्यूड से कभीकभी चिढ़ जाती थी लेकिन मुझे उस पर उस दिन बहुत प्यार आया. मैं छुट्टियों में उसे घर के काम सिखा देती हूं. जबरदस्ती, कुकिंग में रुचि लेती है. अब सबकुछ बनाना आ गया है. एक दिन तेज बुखार के कारण मेरी तबीयत बहुत खराब थी. अनुराग खेलने गया हुआ था, विजय टूर पर थे. स्नेहा तुरंत अनुराग को घर बुला कर लाई, उसे मेरे पास बिठाया, मेरे डाक्टर के पास जा कर रात को 9 बजे दवा लाई और मुझे खिला- पिला कर सुला दिया. मुझे बुखार में कोई होश नहीं था. अगले दिन कुछ ठीक होने पर मैं ने उसे सीने से लगा कर बहुत प्यार किया. मुझे याद आ गया जब मैं अविवाहित थी, घर पर अकेली थी और मां की तबीयत खराब थी. मेरे हाथपांव फूल गए थे और मैं इतना रोई थी कि सब इकट्ठे हो गए थे और मुझे संभाल रहे थे. पिताजी थे नहीं, बस हम मांबेटी ही थे. आज स्नेहा ने जिस तरह सब संभाला, अच्छा लगा, वह मेरी तरह घबराई नहीं.

अब वह ड्राइविंग सीख चुकी है. बनारस में मैं ने भी सीखी थी लेकिन मुंबई की सड़कों पर स्टेयरिंग संभालने की मेरी कभी हिम्मत नहीं हुई और अब मैं भूल भी चुकी हूं, लेकिन जब स्नेहा मुझे बिठा कर गाड़ी चलाती है, मैं दिल ही दिल में उस की नजर उतारती हूं, उसे चोरीचोरी देख कर ढेरों आशीर्वाद देती रहती हूं और यह सोचसोच कर खुश रहने लगी हूं, अच्छा है वह मेरी तरह नहीं है. वह तो आज की लड़की है, बेहद आत्मविश्वास से भरी हुई. हर स्थिति का सामना करने को तैयार. कितनी समझदार है आज की लड़की अपने फैसले लेने में सक्षम, अपने हकों के बारे में सचेत, सोच कर अच्छा लगता है.

दूध की धुली

पृथ्वी सड़क के किनारे चुपचाप चल रहा है. संगीता हरे रंग का सूट पहने हुए है, उस का चेहरा पीला पड़ गया है. हाथों में जेवर की पोटली और किताबों का बैग है. संगीता चलतचलते सरसरी निगाह से पृथ्वी को देख रही है. जब बाजार समाप्त हो गया, तो दोनों पासपास आ गए और एक रिकशे में बैठ कर स्टेशन की ओर चल दिए. संगीता बोली, ‘‘मुझे बहुत डर लग रहा है.’’

पृथ्वी बोला, ‘‘जब मैं हूं तब किस बात का डर. एक बात बताओ, रास्ते में तुम्हें कोई जानने वाला तो नहीं मिला?’’ संगीता ने कहा, ‘‘नहीं, एक लड़की मिली थी. परंतु तब तुम मेरे से दूर थे. मातापिता परेशान होंगे, मैं उन से कह कर आई थी कि कालेज जा रही हूं. न जाने दिल क्यों इतना घबरा रहा है?’’

पृथ्वी ने आश्वासन दिया, ‘‘डरने की क्या बात है, ट्रेन में बैठ कर सीधे मुंबई पहुंच जाएंगे. एक दिन का तो सफर है. वहां बिलकुल अपरिचित लोग होंगे. बस, मैं और तुम. वहां जा कर एक होटल में ठहर जाएंगे. वैसे भी हमारे घर वालों को, हम पर किसी तरह का शक थोड़े ही हुआ होगा. संगीता घबराती हुई बोली, ‘‘मुझे घर पर न पा कर मम्मीपापा कितने परेशान होंगे, बहुत डर लग रहा है. पता नहीं क्यों?’’

पृथ्वी हंसते हुए बोला, ‘‘सब से पहले तो तुम्हारे कालेज में पूछताछ होगी. बहरहाल, यह गहने कैसे ले कर आ पाई?’’ ‘‘मुझे जगह पता थी. रात को ही अलमारी खोल कर निकाल लिए थे. अलमारी का ताला बंद कर दिया है,’’ संगीता ने बताया.

रिकशा वाला सब सुन रहा था. उन्होंने स्टेशन के लिए 50 रुपए में रिकशा तय किया था. जब स्टेशन आया तो रिकशा वाला हेकड़ी से बोला, ‘‘मैं तो 500 रुपए लूंगा.’’ ‘‘500 रुपए,’’ दोनों एकसाथ बोले, ‘‘500 रुपए किस बात के?’’

‘‘चुपचाप 500 रुपए दे दो वरना अभी पुलिस को बुलाता हूं,’’ रिकशे वाले ने कहा. पृथ्वी ने चुपचाप जेब से 500 रुपए निकाल कर दे दिए. संगीता घबरा रही थी. जल्दीजल्दी पृथ्वी ने मुंबई के फर्स्टक्लास के 2 टिकट ले लिए. टिकट ले कर तेजी से दोनों ट्रेन के फर्स्टक्लास के डब्बे में जा कर बैठ गए और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.

संगीता ने रोते हुए कहा, ‘‘अब तो मुझे और भी ज्यादा डर लग रहा है.’’ पृथ्वी ने समझाया, ‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. फियर इंस्टिंक्ट एक चीज है. लिखने वाले ने तो यह भी लिखा है कि… मगर… खैर छोड़ो… हां, तुम्हारी जरा सी घबराहट ने रिकशा वाले को 500 रुपए का फायदा करा दिया. यदि तुम रिकशे में यह बात न बोलती तो ऐसा कुछ भी न होता. मुझे कुछ नहीं कहना. मगर दुख है तो सिर्फ इस बात का कि मैं मनोविज्ञान का विद्यार्थी और रिकशे वाला मुझे लूट कर चला गया.’’

बाहर दरवाजे पर खटखट हुई, दोनों ने एकदूसरे को डरते हुए देखा. पृथ्वी बोला, ‘‘साले ने 500 रुपए ले कर भी पुलिस को खबर कर दी.’’ संगीता घबराहट के मारे कांप रही थी, वह बोली, ‘‘अब क्या होगा?’’

‘‘चुपचाप देखती रहो, मुझ पर विश्वास रखो. पीछे के दरवाजे से उतर कर किसी दूसरे डब्बे में बैठ जाते हैं,’’ कह कर पृथ्वी ने पिछला दरवाजा खोला और दोनों उतर कर चल दिए. परंतु दूसरे किसी डब्बे में नहीं बैठ पाए, क्योंकि किसी भी डब्बे का दरवाजा खुला हुआ नहीं था. दोनों चुपचाप प्लेटफौर्म पर चलने लगे. ‘‘अपना किताबों का यह बैग तो छोड़ दो,’’ पृथ्वी ने संगीता से कहा.

एक सिपाही घूमता हुआ उधर ही आ रहा था. संगीता ने जल्दी से अपना बैग एक मालगाड़ी के डब्बे में रख दिया. सिपाही इतने में पास आ कर पृथ्वी से बोला, ‘‘आप लोग कहां जाएंगे?’’ पृथ्वी बोला, ‘‘हम तो ऐसे ही घूमने चले आए हैं. अब जा रहे हैं.’’

‘‘मगर आप की गाड़ी तो छूटने वाली है. आप ने फर्स्टक्लास का टिकट बुक कराया था,’’ सिपाही अपनी बात पर जोर देते हुए बोला. ‘‘ऐ मिस्टर, मैं ने कहीं का भी टिकट बुक कराया हो आप को इस से क्या लेनादेना. बोलो, क्या कर लोगे तुम? कौन होते हो यह सब पूछने वाले?’’

‘‘अरे भाई, गुस्सा क्यों होते हो? मैं तो सेवक हूं आप का. जब 50 रुपए की जगह 500 रुपए रिकशे वाले को दे सकते हो, तो हुजूर, थोड़ा सा ईनाम हमें भी मिल जाए.’’ पृथ्वी पूरी बात समझ गया. उसे 500 रुपए का नोट देते हुए बोला, ‘‘हांहां, तुम भी लो.’’ सिपाही रुपए ले कर चला गया. संगीता बोली, ‘‘हमारे मन में चोर है न, इसलिए हम हर बात से डरते हैं. चलो, फिर वापस चलते हैं.’’

‘‘बेकार में डरडर कर इधरउधर भटकते रहें, क्या फायदा,’’ पृथ्वी ने खीझते हुए कहा, ‘‘बेकार ही कंपार्टमैंट से आए. चलो, वापस वहीं चलते हैं.’’ दोनों तेजी से दौड़े परंतु कंपार्टमैंट में घुसने से पहले ही एक और पुलिस वाला आया और बोला, ‘‘अरे, झगड़ा बढ़ाने से क्या फायदा, हम सब को 1000-1000 रुपए दो और मौज करो,’’ और हाहा कर हंसने लगा.

संगीता तो डर के मारे बुरी तरह से कांप रही थी. पृथ्वी बोला, ‘‘मैं कोई ईनाम वगैरा नहीं दूंगा. मैं ने कोई दानखाता खोल रखा है क्या? मैं आप लोगों की फितरत समझ रहा हूं.’’ ‘‘देखिए साहब, आप पढ़ेलिखे मालूम पड़ते हैं. आओ, पहले डब्बे में बैठ जाएं. यहां भीड़ इकट्ठी हो जाएगी और आप की बदनामी होगी. जब दोनों कंपार्टमैंट में चढ़ गए तो पुलिस वाला भी पीछेपीछे पहुंच गया और बोला, ‘‘थोड़ी देर के लिए आप थाने चलिए.’’

‘‘मैं किसी थानेवाने नहीं जाऊंगा. मेरी गाड़ी छूट जाएगी,’’ गुस्से से पृथ्वी ने कहा. ‘‘देखिए भाईसाहब, अब आप इस गाड़ी से तो नहीं जा सकते. मैं ने तो पहले ही आप से कहा था कि आप हमारे साहब की सेवा में 1000 रुपए दे दीजिए.’’ अब की बार साहब भी उसी कंपार्टमैंट में आ गए, बोले, ‘‘क्यों बे शकीरा के बच्चे, जाओ, हथकड़ी ले कर आओ. यह लड़का इस लड़की को भगा कर लिए जा रहा है. इस को गिरफ्तार कर के हवालात में बंद कर दो.’’

पृथ्वी ने 2-2 हजार रुपए के 5 नोट निकाल कर उन के हाथ में थमा दिए. बड़े साहब उन नोटों को जेब में रखते हुए बोले, ‘‘अच्छा सर, चलिए, बिना हथकड़ी लगाए ही आप को ले कर चलते हैं.’’

अब पृथ्वी बोला, ‘‘अब मैं थाने क्यों जाऊं. मैं ने 10,000 रुपए किस बात के दिए हैं?’’ ‘‘देखो लड़के, यह 10,000 रुपए मैं ने सिर्फ इस बात के लिए हैं कि तुम्हें थाने हथकड़ी डाल कर न ले कर जाऊं.’’

संगीता बहुत देर से साहस जुटा रही थी, बोली, ‘‘देखिए, मैं अपनी मरजी से जा रही हूं. आप बेकार में हमें परेशान मत कीजिए.’’ ‘‘हांहां मुन्नी, मैं भी तो यही कह रहा हूं, थाने चल कर थोड़ी देर बैठिएगा. वहीं आप के मम्मीपापा को बुलाया जाएगा. तब जैसा होगा, कर दिया जाएगा और उस सूरत में आप इसी ट्रेन से शाम को जा सकते.’’ तभी पहला सिपाही भी आ गया और बैग देते हुए बोला, ‘‘संगीताजी, आप का बैग. आप ने मालगाड़ी में छोड़ दिया था.’’

संगीता ने बैग हाथ में ले लिया. उस के बाद दोनों चुपचाप नीचे प्लेटफौर्म पर उतर गए. पृथ्वी ने पुलिस अफसर से इजाजत मांगी कि वह संगीता से एकांत में कुछ बात कर ले. उस पर पुलिस वाले ने कहा, ‘‘हांहां, जरूर कर लीजिए.’’ और थोड़ी दूर जा कर खड़ा हो गया. आसपास काफी भीड़ इकट्ठी हो गई थी. पृथ्वी काफी परेशान था, बोला, ‘‘अब क्या होगा?’’

‘‘मुझे मेरे घर या कालेज भेज दीजिए,’’ संगीता ने रोते हुए कहा. ‘‘घर मैं भी जाना चाहता हूं, लेकिन ये कमीने आसानी से पीछा नहीं छोड़ रहे.’’

‘‘कोई ऐसी तरकीब निकालें, जिस से पिताजी को पता न चले,’’ संगीता ने पृथ्वी से घबराते हुए कहा. ‘‘कोशिश तो ऐसी ही करूंगा. मेरा विचार है कि जितना भी रुपया है, इन्हें दे दिया जाए और यहां से वापस चलते हैं. यहां अगर हमें किसी ने पहचान लिया तो मुसीबत हो जाएगी.’’ इस बीच, सिपाही बोला, ‘‘चलिए साहब, थाने.’’

‘‘इंस्पैक्टर साहब, हम से गलती हुई है. अब हम वापस जा रहे हैं,’’ संगीता ने इंस्पैक्टर साहब को अपनी पोटली दे दी. पृथ्वी का साथ दम तोड़ चुका था. संगीता निर्जीव सी सब कार्य कर रही थी. इसी झगड़े में 11 बज गए. संगीता एक रिकशे पर बैठ कर कालेज चली गई. पृथ्वी दूसरे रिकशे पर बैठ कर अपने घर चला गया. शकीरा ने इंस्पैक्टर से पूछा, ‘‘अगर इन लोगों ने अपने मांबाप को बता दिया तो क्या होगा?’’

‘‘तू गधा है. क्या वे अपने मांबाप को यह बताएंगे कि हम भाग रहे थे. फिर मैं तो उन को जानता भी नहीं. हमें कोई कुछ क्यों बताएगा या देगा?’’ शाम को 4 बजे जब संगीता घर पहुंची तो उस का चेहरा उतरा हुआ था. फिर भी वह हंस रही थी. कहने लगी, ‘‘मम्मी, आज तो कालेज में यह हुआ वह हुआ.’’ उस के बाद कमरे में अकेली जा कर लेट गई और सोचने लगी, ‘अब क्या होगा, कैसे होगा?’

संगीता को कड़वा लग रहा था. उस ने अधिक नहीं खाया. बस, एक ही सवाल उस के जेहन में घूम रहा था, ‘कैसे होगा?’

अलमारी की तरफ अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया था. कैसे होगा? शाम को उस की सहेली आ गई थी. उस ने बताया, ‘‘आज उस के कालेज में फिजिक्स के पीरियड में सब लड़कियां खिड़कियों पर चढ़ गईं और जब फिजिक्स की टीचर आईं, तो उन के कहने पर नीचे उतरीं.’’ संगीता ने कुछ नहीं सुना. बस, उस का दिल घबरा रहा था, ‘अब क्या होगा, कैसे होगा?’

रात को उसे नींद भी नहीं आई. पुलिस, भीड़, रेलवे स्टेशन, बैग, गहने, पोटली बराबर दिमाग में घूम रहे थे और एक ही सवाल बारबार दिमाग में हथियार के जैसे प्रहार कर रहा था, अब कैसे होगा?’ 2 बजे रात चुपके से संगीता उठी. उस ने छिपाई हुई चाबी को हाथ में ले कर अलमारी का दरवाजा खोल दिया. बचे हुए गहनों को तितरबितर कर दिया. एक हार पोटली में से जमीन पर डाल दिया. कपड़े आंगन में फैला दिए. दरवाजे की चटकनी खोल दी और फिर जा कर अपने बैड पर लेट गई. दिमाग में एक ही बात हथौड़े जैसे प्रहार कर रही थी कि अब क्या होगा?

सुबह होते ही अड़ोसपड़ोस में शोर मचा हुआ था कि रामप्रकाश के घर में चोरी हो गई. चोर अलमारी खोल कर कुछ लाख रुपए और गहने ले गए हैं. शायद किसी आवाज से डर गए थे. इसलिए सारे गहने ले कर नहीं गए. रामप्रकाश ने लोगों को बताया कि बड़े कमाल की बात है. उन चोरों ने बाहर का दरवाजा कैसे खोला? समझ में नहीं आ रहा है. मैं तो रात को सबकुछ देख कर सोता हूं और सब से बड़ी बात, वे सारे गहने ले कर नहीं गए. यों समझो कि भारी नुकसान होने से बच गए. चोरी की सूचना पुलिस को दी गई. वहां से एक इंस्पैक्टर और 2 सिपाही जांचपड़ताल के लिए आए. उन्होंने दरवाजे को गौर से देखा. वह अलमारी भी देखी. अलमारी की चाबी भी देखी. लेकिन संगीता को देखते ही पहचान गए. संगीता भी उस पुलिस औफिसर और सिपाही को पहचान गई. तब पुलिस वाले ने संगीता की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘यह काम तो किसी घर वाले का ही लगता है.’’

इस पर संगीता की आंखें, पुलिस वाले की आंखों से जा मिलीं. उन में याचना थी. पुलिस वाले ने घर के चारों और देखा और बोला, ‘‘कोई किराएदार ऊपर रहता है क्या?’’ ‘‘नहीं साहब,’’ राम प्रकाश ने कहा.

‘‘यह घर के आदमी का काम नहीं हो सकता. मेरा एक लड़का 8 साल का है. एक लड़की है, जो दूध की जैसी धुली हुई है. मैं हूं. मेरी पत्नी है. यह सच्ची बात है कि दरवाजा बाहर से ही खुला है. मगर कमाल है, साहब,’’ राम प्रकाश बोला. पुलिस वाले ने कहा, ‘‘चोरी का पता लगाने की पूरी कोशिश की जाएगी. मगर मेरी सलाह मानिए, आप अपना जेवरपैसा. अब अलमारी में न रख कर, बैंक में रखें. हो सकता है चोर दोबारा चोट करे.’’

पुलिस वाले ने वहीं बैठ कर रिपोर्ट तैयार की. वहां उपस्थित लोगों के हस्ताक्षर लिए. पुलिस वाले के साथ आए सिपाही ने जाते हुए सरकारी निगाह से संगीता की तरफ देखा और बोला, ‘दूध की धुली’ और लंबी सी डकार लेता हुआ दरवाजे से बाहर निकल गया.

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