10 Tips: जानें गर्मियों में जीन्स की देखभाल के टिप्स

गर्मियों में कॉटन, हैंडलूम, शिफॉन और लिनन से बने पतले फेब्रिक से बने कपड़े शरीर को बहुत आराम देते हैं क्योंकि इनमें हवा के आवागमन की सुविधा होती है जिससे शरीर ठंडा रहता है परन्तु जीन्स एक ऐसा परिधान है जिसका फेब्रिक भले ही काफी मोटा होता है परन्तु आजकल बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी का फेवरिट परिधान है जीन्स इसका कारण है कि इसे पहनने के बाद हर व्यक्तित्व में चार चांद लग जाते हैं. गर्मियों में चूंकि पसीना बहुत आता है इसलिए इसकी देखभाल थोड़ी मुश्किल हो जाती है.

गर्मियों में भी आप अपनी फेवरिट ड्रेस को  निम्न टिप्स अपनाकर बड़े आराम से सुरक्षित रख सकते हैं-

  1. एक जीन्स को आप कम से कम 6 से 7 बार तक आसानी से पहन सकते हैं. एक बार पहनने के बाद अच्छे से झटकारें ताकि उसकी धूल मिट्टी निकल जाए फिर इसे हाथ से दबाकर प्रेस करते हुए फोल्ड करें और हैंगर पर टांग दें इससे जब आप दोबारा पहनेंगे तो जींस में कोई सलवट नहीं होगी.

2. पहनने के बाद जीन्स को खूंटी या हुक पर टांगने की ग़ल्ती न करें क्योंकि ऐसा करने से जीन्स में सलवटें और टांगने के निशान बन जाते हैं जिससे जीन्स दोबारा पहनने के लायक ही नहीं रहती.

3. पहनने के बाद जीन्स को फ्रेश रखने के लिए आप 1 टेबलस्पून सफेद सिरका (वेनेगर) और 1 टेबलस्पून पानी को समान मात्रा में मिलाकर एक घोल बनाएं और इसे एक स्प्रे बॉटल में भर लें फिर इससे जीन्स पर स्प्रे कर दें और 2-3 घण्टे धूप में सुखा दें इससे जीन्स से हर तरह की दुर्गंध दूर हो जाएगी. इसी प्रकार आप लेवेंडर और टी ट्री आयल का पानी के साथ समान मात्रा में घोल बनाकर भी स्प्रे कर सकतीं हैं.

4. जीन्स को उल्टा करके ठंडे पानी के सर्फ के घोल में आधे घण्टे के लिए डालें फिर हल्के हाथ से रब करके अच्छी तरह ठंडे पानी में से निकालें और फ्लेट सरफेस पर रोल करके पानी निकाल दें और सुखाएं.

5. सर्फ के घोल में डालते समय ध्यान रखें कि एक से रंग वाली जीन्स को ही एक साथ डालें, अलग अलग रंग की जीन्स को एक साथ डालने से उनका रंग एक दूसरे में लग सकता है.

6. जीन्स को कभी भी मशीन में और गर्म पानी से न धोएं वरना इसका रंग निकल या फेड हो सकता है.

7. आमतौर पर जीन्स पर बहुत जल्दी जल्दी प्रेस करने की जरूरत नहीं होती परन्तु यदि बहुत ज्यादा सलवटें हैं या फिर आप बहुत अधिक क्रिस्प कपड़े पहनने के शौकीन हैं तो फिर प्रेस करने की जरूरत पड़ती है ऐसे में स्टीम मॉड पर प्रेस करें.

8 . प्रेस करते समय जीन्स व प्रेस के बीच में सॉफ्ट कॉटन का कपड़ा अवश्य रखें ताकि जीन्स के रेशे सीधे आयरन के टच में आने से बचे रहें.

9. आजकल डिस्ट्रेस जीन्स का काफी चलन है ऐसी जीन्स को बहुत सावधानी के साथ प्रेस करें ताकि प्रेस से ये फटने से बचीं रहें.

10. इस मौसम में एकदम फिट या स्किन टाइट जीन्स पहनने से बचें क्योंकि इनकी तंग फिटिंग आपकी त्वचा और ब्लड सर्कुलेशन को प्रभावित कर सकती है.

Afwaah Movie Review: दिग्भ्रमित निर्देशक की अजीबोगरीब सोच का नतीजा फिल्म अफवाह

  • रेटिंगः डेढ़ स्टार
  • निर्माताः अनुभव सिन्हा
  • लेखकः सुधीर मिश्रा, निसर्ग मेहता, षिवा बाजपेयी
  • निर्देशकः सुधीर मिश्रा
  • कलाकारः नवाजुद्दीन सिद्दिकी, भूमि पेडणेकर, सुमित व्यास, षारिब हाशमी, सुमित कौल, ईषा चोपड़ा,  रॉकी रैना,  कविराज लायके व अन्य
  • अवधि: दो घंटे छह मिनट

1983 में फिल्म ‘‘जाने भी दो यारो’’ से लेखक के तौर पर शुरूआत करने वाले सुधीर मिश्रा ने 1987 में ‘यह वो मंजिल तो नही’ से लेखक व निर्देशक के रूप में कैरियर शुरू किया था. उसके बाद ‘में जिंदा हॅूं’, , ‘धरावी’, ‘इस रात की सुबह नहीं’, ‘कलकत्ता मेल’, ‘चमेली’, ‘यह साली जिंदगी’, ‘इंकार’ व‘सीरियस मैन’सहित लगभग अठारह फिल्में निर्देषित कर चुके हैं. अब तक वह हर फिल्म में बेबाकी से अपनी बात कहते आए हैं, मगर अपनी ताजातरीन 5 मई को सिनेमाघरों में प्रदर्षित फिल्म ‘‘अफवाह’’ में वह बुरी तरह से चुक गए हैं.

इस फिल्म में उन्होेने मां के जिस रूप को चित्रित किया है, उससे सहमत होना मुष्किल है. तो वहीं वह राजनीति का भी असली चेहरा नही दिखा पाए. सुधीर मिश्रा ने अपनी इस फिल्म में जिस बात की खिलाफत की है, काश वह और पूरी फिल्म इंडस्ट्ी उस बात को समझ कर सोशल मीडिया और अफवाह का सहारा छोड़ कर फिल्म मेकिंग पर ध्यान देने लगे तो सिनेमा का भला हो जाएगा. बतौर सह लेखक व निर्देशक सुधीर मिश्रा ने जो कुछ राजनीति में होते दिखाया है, क्या वह दावा कर सकते हंै कि वैसा ही फिल्म इंडस्ट्ी में नहीं हो रहा है. फिल्मसर्जक सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘अफवाह’ के केंद्र में यह बात है कि अगर वायरल वीडियो या अफवाह बनाने वालों को ही वही वीडियो या अफवाह पलटकर डस ले तो क्या होगा?

कहानीः

कहानी शुरू होती है एक धर्म केंद्रित नेता विक्रम उर्फ विक्की सिंह के चुनाव प्रचार से. तो दूसरी तरफ अमरीका से वापस आए राहाब अहमद (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) अब मातृभूमि के लिए काम करना चाहते हैं. वह अपनी औटोमैटिक कार में जा रहे हैं और राजनीतिक बात से बचने के लिए रेडियो चैनल स्विच कर जैज सुनते हैं.  क्योंकि वह एक हाई-प्रोफाइल साहित्यिक उत्सव में जा रहे हैं, जहाँ उनकी पत्नी की किताब का लोकार्पण समारोह हो रहा है. इधर विक्की सिंह (सुमीत व्यास) के राजनीतिक मार्च के दौरान या यॅूं कहें कि राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के दौरान सांप्रदायिक संघर्ष छिड़ जाता है. इस संघर्ष के दौरान कई लोग आततायियों से अपनी जिंदगी के लिए विनती करते हैं. तो वहीं विक्की सिंह के वफादार सहयोगी चंदन (शारीब हाशमी) एक कसाई की दुकान में घुसकर उसकी हत्या कर देते हैं. यह वीडियो वायरल हो जाता है. इस वीडियो को देखकर विक्की सिंह की मंगेतर निवेदिता सिंह उर्फ निवी (भूमि पेडनेकर) परेशान हो जाती हंै,  जो एक पूर्व राजनीतिक दिग्गज की बेटी हैं.  निवी को बेवजह हिंसा पंसद नहीं. यहीं से निवी व विक्की के बीच दूरियां बढ़ने गलती हैं. उधर पुलिस इंस्पेक्टर तोमर पर चंदन सिंह के खिलाफ काररवाही का दबाव बढ़ता है. तो विक्की सिंह, तोमर को चंदन सिंह की हत्या करने का आदेश दे देता है. , पुलिस इंस्पेक्टर तोमर ऐसा करने का प्रयास करते हैं, पर वह चंदन सिंह की बजाय एक निर्दोश संतोश की हत्या कर बैठते हैं. उधर विक्की से षादी न करने के लिए निवी घर से भागती है. विक्की के गुंडे उसे रास्ते में परेषान करते हैं. तब राहाब अहमद निवी की मदद के लिए आते हैं और वहां तमाषा देख रहे लोगेां से कहते है कि वह इन सभी का वीडियो बनाए. राहाब ख्ुाद भी वीडियो बनाने लगता है. विक्की के गंुडे उसका मोबाइल तोड़ देते हैं. इस बीच निवी , राहाब की गाड़ी में बैठ जाती तो राहाब अपनी गाड़ी चलाकर वहां से भागता है. विक्की के गंुडे उसक पीछे हैं. इस घटना का राजनीतिक फायदा उठाने के लिए विक्की सिंह,  राहाब के साथ निवी के होने को ‘लव जेहाद’ बताकर वीडियो वायरल करा देते हैं.  उधर संतोश को मारते हुए तोमर को चंदन देख चुका होता है, तो वह समझ जाता है कि यह विक्की के ही इषारे पर हुआ है. अब वह विक्की से भी दूर भागता है. विक्की एक मुस्लिम ड्ायवर के ट्क में सवार होकर जा रहा है. विक्की के साथी ट्क के नंबर प्लेट की तस्वीर खींचकर विक्की के पास भेजते हैं. तब विक्की दूसरा वीडियो वायरल करवाता है कि ट्क मे गायों को ले जाया जा रहा है.  इधर पुलिस इंस्पेक्टर तोमर के षारीरिक संबंध अपनी सहायक महिला पुलिस इंस्पेक्टर(टी जे भानू ) के साथ हैं. महिला पुलिस इंस्पेक्टर को पता है कि तोमर षादीशुदा है, पर वह ऐसा अपनी मां के इषारे पर ऐसा कर रही है. लेकिन संतोश की हत्या के बाद से वह महिला पुलिस अफसर अपनी चाल चलने लगती है.  कहानी कई मोड़ों से होकर गुजरती है. ट्क ड्ायवर क ेअलावा चंदन सिंह मारे जाते हैं. अब ट्क के अंदर निवी और विक्की सिंह है. भीड़ ट्क पर हमला कर विक्की सिंह को राहाब समझकर पीट पीट कर मार डालती है. अंततः निवी चुनाव जीत जाती है.

लेखन व निर्देशन:

फिल्म ‘अफवाह’ देखकर इस बात का अहसास नही होता कि यह फिल्म सुधीर मिश्रा के तेवर की फिल्म है. बल्कि यह किसी अजेंडे के तहत बनायी गयी फिल्म होने का अहसास दिलाती है. व्हाट्सएप युनिवर्सिटी के फॉरवर्ड संदेश और वायरल होने वाली अफवाहों के खतरनाक परिणामो ंसे लोग वाकिफ हैं. लोग समझने लगे है कि इस तरह की अफवाहें ही माॅब लिंचिंग को बढ़ावा देती हैं. तो वहीं हर राजनीतिक दल व राजनेता अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक लाभ के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है. फिल्मकार ने अपने अंदाज में नफरत की प्रचलित राजनीति,  सामाजिक ध्रुवीकरण और गहरी जड़ें जमा चुकी पितृसत्ता की निंदा जरुर की है, मगर वह प्रभावी तरीके से कुछ नही कह पाए. एक दृष्य है जहां निवी यानी कि अभिनेत्री भूमि पेडण्ेाकर एक किरदार से कहती हंै कि उसने वीडियो को सच क्यांे मान लिया. उसने यह क्यों नहीं सोचा कि वह वीडियो कितना सही है या किस मकसद से बनाया गया है. मगर इससे अधिक कोई बात नहीं की गयी. जबकि इस पर दोनों किरदारांे के बीच ऐसी लंबी बात होनी चाहिए थी, जिससे फिल्म क्या कहना चाहती हैवह दर्षक तक पहुॅच पाता. पर फिल्मकार बुरी तरह से यहां मात खा गए.  सुधीर मिश्रा को ‘अफवाह’ और मौलिक वीडियो के साथ छेड़छाड़ कर बनाए गए वीडियो में अंतर नही पता, यह आष्चर्य की बात है. फिल्म में हाथ जोड़कर दया की भीख माँगते हुए आदमी का दृश्य सहित कुछ दृष्य गुजरात दंगों की चर्चित तस्वीरों की याद दिलाते हैं. आखिर फिल्मकार कब तक एक ही दृष्य को भुनाते रहेंगें? जिन लोगो ने सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘इस रात की सुबह नहीं’ देखी है, उनकी समझ मे आ जाएगा कि फिल्मकार अभी भी उस फिल्म से बहुत आगे नहीं बढ़ पाए हैं. इस फिल्म में भी कारपोरेट जगत का ंइसान अनजाने में अपराध जगत के लोगों में फंस जाता है और फिल्म का हीरो है, इसलिए उसी तरह पलटकर वार भी नही करता.  फिल्मकार सुधीर मिश्रा का संबंध राजनीतिक परिवार से रहा है. इसलिए वह राजनीति को गहराई से समझते हैं. इसी वजह से वह अतीत में ‘यह वो मंजिल तो नहीं’ और ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’जैसी जमीनी मुद्दों व युवाओं की भागीदारी पर आधारित फिल्में बनाकर खुद को बेहतरीन लेखक निर्देशक के रूप में स्थापित कर चुके हैं. मगर ‘अफवाह’ तो महज एक अजेंडे वाली फिल्म बनकर रह गयी है. अफसोस तीनों लेखक सुधीर मिश्रा,  निसर्ग मेहता और शिव बाजपेयी ने जिस समाज को समझने का दावा करते हुए महिला पुलिस की मंा के किरदार को गढ़ा है, उसे कदापि स्वीकार नही किया जा सकता. आज जब हर नारी स्वतंत्र है और ‘मेरा शरीर मेरा हक’ की बात करती हो, उस दौर में एक मां अपनी बेटी को एक षादीशुदा पुरूश से संबंध स्थापित करने के लिए समझाए, अजीब नही लगता.  इतना ही नही फिल्मकार नवाजुद्दीन सिद्दकी के किरदार को भी ठीक से चित्रित नही कर पाए. इस किरदार को लेकर वह पूरी तरह से दिग्भ्रमित नजर आते हैं.

अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है तो ‘यशराज फिल्मस’ की सहायक कंपनी ‘यशराज टैलेंट्स’ की कलाकार भूमि पेडणेकर ने जब अभिनय जगत में कदम रखा था, तब उनमें काफी संभावनाएं नजर आयी थीं. लेकिन धीरे धीरे ‘यशराज टैंलेंट्स’ के इषारे पर वह ‘कंुए का मेठक’ बनकर रह गयी हैं. न उनकी अभिनय क्षमता का विकास हो रहा है और न सोच का. इसी कारण वह अपने हर किरदार को एक ही तरह से घिसे पिटे अंदाज में निभाते हुए नजर आने लगी हैं. निवेदिता उर्फ निवी के किरदार में भी वह कुछ नया नही कर पायी. जबकि इस किरदार में उनके पास अपनी अभिनय क्षमता के नए अंदाज को दिखाने के अवसर थे. पर वह हर दृष्य में एक जैसा ही अभिनय करते हुए नजर आती हैं. षायद वह इस बात से खुश हैं कि उन्हे उनकी क्षमता से कहीं ज्यादा बड़ी फिल्में मिल रही हैं. पर वह यह भूल रही है कि वह इस तरह से उसी डाल को काट रही हैं, जिस पर वह बैठी हैं. इसी वजह से ‘शुभ मंगल ज्यादा सावधान’,  ‘भूत’,  ‘डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे’,  ‘दुर्गामती’,  ‘बधाई दो’,  ‘रक्षा बंधन’, ‘गोविंदा नाम मेरा’ और ‘भीड़’ जैसी फिल्में बाक्स आफिस पर अपना जलवा नही विख्ेार पायीं. जब वह एक युवक से वीडियो को सच न मानने की बात करती है, उस वक्त तो उनका अभिनय एकदम घटिया है.  राहाब अहमद के किरदार में नवाजुद्दीन सिद्दकी ने अपनी तरफ से कुछ रस डालने का प्रयास किया है. पर हकीकत में उनके हाथ बंधे हुए नजर आते हैं, क्योंकि लेखक व निर्देशक ने उनके किरदार को सही ढंग से विस्तार ही नही दिया. वैसे भी अतीत में उनकी कुछ फिल्में पहले ही निराश कर चुकी हैं. नेता विक्रम सिंह उर्फ विक्की के किरदार में सुमित व्यास अवष्य प्रभावित करते हैं. षारिब हाशमी भी इस फिल्म में अपने अभिनय का कोई नया पक्ष नहीं दिखा पाए. फिल्म खत्म होने पर दर्षक के दिमाग में अभिनेत्री टी जे भानू रह जाती हैं, जिसे अनचाहे महज अपनी मां के कहने पर अपने वरिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर संग जिस्मानी रिष्ते बनाने पड़ते हैं, उस वक्त उसके चेहरे के भाव बहुत कुछ कह जाते हैं. दो पाटों के बीच फंसी एक नारी की व्यथा को टी जे भानु ने बहुत अच्छे ढंग से पेश किया है.

बर्फ पिघल गई- भाग 2: जब प्यार के बीच आ गई नफरत

गरिमा से बात कर के तनु का मन और भी परेशान हो गया. बस एक तसल्ली थी कि चलो कोई तो है जिस से बात कर के मन का बोझ थोड़ा हलका हो जाएगा. उस ने सिर को झटका और बाथरूम में चली गई.

अगले दिन गरिमा से मिल बातें कर के उस ने एक निश्चय किया और घर आ कर रोहन का फोन मिलाया. फोन नहीं लग रहा था. काफी देर तक मिलाती रही. एक बार दिल धड़का कि कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गई है. फोन बंद ही आ रहा था लगातार. फिर अचानक जाने क्या सूझ कि उस की बहन का फोन मिला लिया, ‘‘घर छोड़ कर जा रही हूं. यही चाहते थे न तुम लोग. बता देना अपने भाई को. मैं बात कर के अपना मूड़ खराब नहीं करना चाहती हूं,’’ कहते ही फोन औफ कर दिया.

वही पहले वाला कंपनी का फ्लैट, वही औफिस और वही रूटीन फिर से शुरू हो गया.

हां हर दिन औफिस से लौट कर इंतजार रहता कि कोई मैसेज मिलेगा. कोई फोन आएगा पर रात होतेहोते सब निराशा में बदल जाता और वही अपनी पसंद के गाने सुन कर तनु सो जाती. कोई मैसेज, फोन, चिट्ठी, इंसान नहीं आया. महीने और फिर साल गुजर गया. मम्मीपापा से भी तनु ने संपर्क नहीं किया. बस खो गई अपने काम में फिर पहले की तरह, जब रोहन से मुलाकात नहीं हुई थी. कंपनी की बहुत सी जिम्मेदारियां अपने कंधों पर ले कर.

कंपनी की 25वीं वर्षगांठ मनाई जा रही थी. जोरदार तैयारियां चल रही थीं. गरिमा का बच्चा छोटा था, इसलिए तनु ही फंक्शन को और्गेनाइज करने में लगी थी. पुराने कर्मचारियों में सब से अधिक प्रतिभाशाली तनु और गरिमा ही थीं. दिनभर औफिस में काम चलता. शाम को वीडियोकौल कर के प्रोग्राम की तैयारी पर बात होती.

आखिर वह दिन आ ही गया जब तनु को एक बार फिर से अपनी काबलीयत साबित करने का मौका मिलने वाला था. मुख्य अतिथि के स्वागत से ले कर उन के जाने तक तनु ने एक पल के लिए भी खुद को कंपनी से अलग नहीं होने दिया. मन में डर भी था कि कहीं कोई चूक न हो जाए. सभी कुछ अपेक्षाओं के अनुरूप ही था. कंपनी में तनु की जोरदार वापसी हुई, रिलेशनशिप मैनेजर के रूप में. वेतन बढ़ गया और कंपनी के स्टाफ क्वार्टर्स में ही तनु को भी रहने की जगह मिल गई.

जिंदगी एक बार फिर से दौड़ने लगी. बस एक कसक दिल में बनी हुई थी कि रोहन ने पता भी नहीं किया मैं कहां हूं. किस हाल में हूं. क्या इसी बंधन को जन्मों का नाता कहते हैं लोग? ऐसे कई प्रश्न सुबह आंखें खुलने के साथ खड़े होते और रात में सोने के बाद भी सपनों में आते रहते. तनु अब वापस नहीं लौटना चाहती थी. इतनी मेहनत से जो कुछ हाथ आया था अब उसे संजो कर रखना चाहती थी.

‘‘क्या मेरी बात तनु से हो रही है?’’ सुबहसुबह औफिस पहुंची तो फोन पर एक सभ्य महिला की आवाज़ सुनाई दी.

‘‘जी मैं ही बोल रही हूं. बताइए आप की क्या सहायता कर सकती हूं?’’ तनु ने भी मधुर स्वर में उत्तर दिया.

‘‘मैम, ऐक्चुअली हमारी एक स्टार्टअप कंपनी है. शहर की सभी इंडस्ट्रीज को हम ने कल शाम को अपने प्रोडक्ट लौंच पर इन्वाइट किया है. आप की कंपनी भी हमारे प्रोडक्ट लौंच पर आएगी तो हमें मोटिवेशन मिलेगा.’’

तनु ने ध्यान से उस की बात सुनी और बौस को भी इन्फौर्म किया. अंदर ही अंदर उसे गर्व महसूस हो रहा था अपनी पोस्ट और बैस्ट कंपनी में काम करने पर. बौस ने जतिन और तनु 2 लोगों को जाने की अनुमति दे दी.

प्रोडक्ट लौंच के बाद स्टार्टअप कंपनी के सीईओ का भाषण भी था. जतिन को अचानक किसी काम से जाना पड़ा तो तनु को ही रुकना पड़ा. कंपनी के पहले फोन कौल से ले कर इवेंट मैनेजमैंट तक काफी प्रभावित थी तनु. यही

कारण था कि उस ने अंत तक रुकने का मन बना लिया था. बहुत देर से नाम की अनाउंसमैंट का इंतजार था, लेकिन सीधे ही सीईओ का भाषण शुरू हुआ.

जानीपहचानी आवाज सुन कर तनु ने सिर ऊपर उठाया, ‘‘रोहन. यह रोहन की कंपनी है?’’ अनायास ही मुंह से निकल गया.

‘‘यस मैम, एक्चुअली रोहन सर ही हमारे सीईओ हैं,’’ पीछे से उसी लड़की की आवाज सुनाई दी जिस से फोन पर बात हुई थी.

‘‘ग्रेट,’’ बस यों ही तनु के मुंह से निकल गया.

‘‘तनु मैं तुम्हारे घर की तरफ ही जा रहा हूं. इवेंट खत्म हो गया हो तो मेरे साथ ही आ जाओ. बाद में अकेले जाना पड़ेगा.’’

जतिन के फोन से पहले ही तनु जाने के लिए खड़ी हो चुकी थी. वह रोहन

के सामने नहीं जाना चाहती थी इसलिए जतिन के साथ ही निकल गई.

‘‘तनु कल का इवेंट कैसा रहा?’’ बौस ने पूछा.

तनु ने पहले से सोचा हुआ जवाब दिया, ‘‘सर मैं ने रिपोर्ट आप को मेल कर दी है,’’ स्वयं को व्यस्त दिखाने की कोशिश करते हुए तनु लैपटौप में टैब बदलने लगी.

‘‘रिपोर्ट मैं देख लूंगा परंतु तुम्हारा व्यक्तिगत अनुभव कैसा रहा?’’ बौस ने फिर से प्रश्न किया.

‘‘सर अच्छा ही रहा. एक स्टार्टअप कंपनी से बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं लगा सकते हैं.’’

बौस चौंक कर बोले, ‘‘मतलब तुम्हें प्रभावित नहीं कर पाई है उन की कोशिश,’’ बौस ने फिर से एक और प्रश्न पूछा.

‘‘वह बात नहीं है सर. अच्छा होता कि प्रोडक्ट लौंच पर यह सेमिनार होता. हमारे

लिए आकलन आसान हो जाता,’’ तनु ने अपनी बात रखी.

बौस की आंखों में जाने क्यों खुशी की चमक आ गई. वे मुसकराते हुए अपने कैबिन में चले गए. तनु को कुछ अजीब सा लगा, लेकिन चुप रह गई. शादी की उथलपुथल ने उसे शांत औब्जर्वर बना दिया था.

पूर्णाहूति: मणि ने क्यों किया घर छोड़ने का फैसला

सुरेखा जल्दीजल्दी सूटकेस में सामान रखने में व्यस्त थी. समय और आवश्यकता के अनुसार चुनी गईं कुछ साङियां, ब्लाउज के सैट्स, सूट के साथ मैचिंग दुपट्टे. 2-3 चूड़ियों के सैट्स, कुछ रूमालें और रोजमर्रा की जरूरत की ऐसी चीजें जिन की उपस्थिति जीवन में अनिवार्य होती हैं, धीरेधीरे संभाल कर रख रही थी.

इन में भी सब से अधिक संभाल कर रखे गए उस के सारे सर्टिफिकैट्स, मार्कशीट्स और नौकरी के लिए आया कौल लेटर भी था.

इन व्यस्तताओं के बीच उस ने कई बार मणि की ओर बेपरवाही से देखा और फिर व्यस्त हो गई. सोफे पर स्थिर बैठा मणि उसे एकटक ऐसे देख रहा था मानों बहुत कुछ कहना चाह रहा हो, लेकिन उस के शब्द किसी अथाह सागर में डूबते जा रहे हों.

उधर सुरेखा थी कि उस की ओर स्थिर हो कर ताक भी नहीं रही थी मानों जताना चाह रही हो कि तुम ने मुझे कब सुना था, जो आज मैं तुम्हारी भावनाओं को समेट लूं?

जब मैं तुम्हें अपने पास रोकना चाहती थी, तब तुम हाथ छुड़ा कर चले जाते थे. जब मैं तुम से कुछ कहने का प्रयास करती, तब तुम ध्यान नहीं देते थे क्योंकि तुम्हारे अनुसार मैं बेमतलब की बातें ही तो करती थी. फिर एक अहंकारी पुरुष मेरी बातों में क्यों दिलचस्पी ले पाता?

ओह, मैं ने क्याक्या कहना चाहा था तुम से मणि. क्या एक पति का इतना भी कर्तव्य न था कि वह अर्धांगिनी कही जाने वाली अपनी पत्नी के मनोभावों को समझना तो दूर, सुन भी न सके?

मुझे आज भी याद है मणि, जब मैं ब्याह कर प्रथम दिवस तुम्हारे घर आई थी. ससुराल में पदार्पण करने के बाद नई दुलहन को देखने वालों के उत्साह ने मुझे क्षण भर भी आराम करने नहीं दिया था. हां, तुम ने आते ही सो कर अपनी थकान उतार ली थी, लेकिन मैं भारी बनारसी साड़ी के बोझ तले दुलहन बनी बैठी रही.

रात में जब सब सो गए तब मैं आधी रात कमरे में अकेली बैठी इंतजार करती रही थी. मेरे मन में कितने भाव आजा रहे थे. मैं चाहती थी कि अपने मन के सारे द्वार खोल दूं और तुम एक प्रेमाकुल भ्रमर के समान मेरे मन के कोष में बंद सारे भाव पढ़ लो. सारी नींद, सारी थकान भुला कर मैं तुम से रात भर बातें करती रहूं.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ. तुम ने आते ही कमरे के कपाट क्या बंद किए मेरे मन के द्वार पर मानो ताला लगा दिया. तुम ने आते ही मुझे जकङ लिया था और फिर ज्योंज्यों चूङियोंगहनों का बोझ कम होता गया त्योंत्यों मेरे व्याकुल हृदय का भार और बढ़ता चला गया. उस के बाद तो सपने, कल्पनाएं, भावनाएं न जाने क्याक्या मेरे भीतर ही भीतर टूटता रहा. मेरा तो जैसे संपूर्ण अस्तित्व अस्तव्यस्त हो गया, जिसे मैं आज तक नहीं समेट पाई.

मिलन की प्रथम रात्रि की मधुर बेला में तुम्हारे द्वारा पूछा गया वह क्रूर प्रश्न क्या मैं कभी भूल पाऊंगी मणि? तुम्हारे निर्दय शब्द आज भी मेरे मन को विचलित कर देते हैं.

तुम ने मेरी वर्जिनिटी पर सवाल उठाया था,”क्या इस के पहले तुम्हारा किसी से…?”

छिः मैं कैसे बोलूं तुम्हारे वे घृणित शब्द? मैं अवाक सी तुम्हें देखती रह गई थी.

तब तुम ने और दृढ़ता से कहा था,’’आजकल कालेज में पढ़ने वाले लड़केलड़कियों के लिए यह सामान्य सी बात है. मैं बुरा नहीं मानूंगा.‘‘

चरित्र पर उछाले गए उन छीटों से मैं आज भी स्वयं को कलुषित सा महसूस करती हूं मणि.

सुरेखा के सारे घाव हरे हो उठे थे. उस की डबडबाई आंखों से कुछ बूंदें छलक पड़ीं. तभी मणि ने उस का हाथ पकड़ लिया,’’रो रही हो? फिर क्यों जा रही हो? मुझे पता है तुम मेरे बिना नहीं रह पाओगी.”

“चलो आज तुम्हें मेरा रोना तो दिखाई दिया. पर उस के पीछे का कारण तुम आज भी नहीं समझ पाए,” कहते हुए सुरेखा ने धीरे से अपना हाथ छुड़ा लिया और फिर व्यस्त हो गई.

तुम समझ भी कैसे सकते थे, मणि क्योंकि तुम ने तो मुझे कभी पत्नी का स्थान दिया ही नहीं. तुम्हारे लिए तो मैं मात्र एक उपभोग की वस्तु ही थी. इस के अतिरिक्त तो तुम ने मेरे अस्तित्व को किसी अन्य रूप में स्वीकारा ही नहीं. मैं ने बहुत चाहा था कि तुम्हारे साथ मैं कुछ क्षण शांति से बिता पाती. कुछ तुम अपने मन की कहते कुछ मैं कहती. मनुष्य एकदूसरे के भावों को तो तभी समझ सकता है जब वह उसे सुने और समझे. धरती तभी नम होती है जब जल की बूंदें उसे सिंचित करती हैं. जल के स्नेहिल स्पर्श से ही भाव पूरित हो धरा में प्रेममयी बीज अंकुरित होते हैं, अन्यथा कोई कितना ही उस पर हल चलाता रहे सब बेकार है.

ऐसा नहीं कि तुम मुझे नहीं चाहते थे. जब तुम्हें एक स्त्री की आवश्यकता होती थी तब तुम मेरे पास ही आते थे. अपनी लालसा को तृप्त कर फिर मुझे अकेली छोड़ कर चले जाते थे. मेरे हृदय तक पहुंचने का प्रयास तो तुम ने कभी किया ही नहीं और मैं थी कि अब तक दरवाजे की ओर ही निहारती रह गई.

कई बार तो मैं तुम्हारे हाथ कस कर पकड़ लेती थी. तुम से अनुनयविनय करती कि कुछ क्षण मेरे निकट बैठ कर उस प्रेम को महसूस कर लेने दो जो मेरे हृदय को तुम्हारे साथ जोड़ सके. मगर तुम्हें मेरी भावनाओं से क्या मतलब था?

मेरे लिए प्रेम एक अमूर्त भाव था, एक ऐसी डोर जो 2 प्राणों को जनमजनम के लिए बांध लेते हैं. मगर तुम्हारे लिए प्रेम की परिभाषा कुछ और ही थी, तभी तो तुम निर्दयीभाव से मेरा हाथ छुड़ा कर चले जाया करते थे.

“आखिर तुम्हें किस बात ही कमी है यहां? क्या तुम्हें वास्तव में नौकरी की आवश्यकता है? वह भी इतनी दूर जा कर? अकेली रह पाओगी?”

मणि के शब्दों ने सुरेखा की तंद्रा तोड़ी थी. वह कुछ क्षणों के लिए मणि की ओर देखती रही, बिना कुछ कहे एकटक. सुरेखा मानों उन्हीं शब्दों की डोर थामे हुए कहीं डूबी चली जा रही थी.

यह तुम्हारे लिए मात्र एक नौकरी होगी, मणि. मेरे लिए तो तुम्हारे कारागार से मुक्त हो कर स्वच्छंद हवा में सांस लेने का एक माध्यम है. अपने आत्मसम्मान और स्वाभिमान को कुचल कर तुम्हारी दी हुई सुखसुविधाओं का भोग अब मेरे लिए सहन कर पाना असंभव हो गया है.

मैं कैसे भूल सकती हूं वह काला दिन जब तुम ने मेरी भावनाओं को खंडखंड कर डाला था.

मैं वह पल कैसे भूल सकती हूं, मणि? मेरा अपराध मात्र इतना था कि जब तुम मेरी कोई बात सुननेसमझने को तैयार न थे मैं ने अपनी भावनाओं को तुम तक पहुंचाने के लिए पत्र को माध्यम बनाया था. अपने भाव के मोती शब्दों की डोर में पिरो कर तुम्हें सौंप दिया था. यही मेरी भूल थी. सोचा था इसे पढ़ कर ही कदाचित किसी सीमा तक तुम मुझे समझ पाओगे. मगर नहीं, तुम तो पूरी तरह संवेदनाशून्य थे. इसीलिए तो तुम ने उस पत्र में लिखे 1-1 शब्द को सब के सामने बोल कर मेरा मजाक उड़ाया था.

घर में गूंजते ठहाकों से मेरा हृदय चीत्कार कर उठा था. उस दिन मैं टूट कर ऐसी बिखरी कि आजतक मैं स्वयं को समेटने का प्रयास ही कर रही हूं.

शायद राख के ढेर में कहीं एक चिनगारी शेष थी. बस, मन में एक निश्चय किया था,‘अब मुक्ति चाहिए…’ और इस के लिए मुझे स्वयं को स्थापित करना ही होगा.

एक नारी का हृदय जितना कोमल और विनम्र होता है, तिरस्कार और अपमान उसे उतना ही निष्ठुर और कठोर भी बना देता है.

मणि ने अपना अंतिम प्रयास किया. उस ने सुरेखा को कस कर भींच लिया,‘‘सोच लो, बस एक बार, मेरे लिए… इतना आसान नहीं होगा यह सब.’’

“आसान तो कुछ भी नहीं होता. अपने मातापिता और परिजनों को छोड़ कर किसी अजनबी को पति मान कर उस के साथ चल पड़ना कौन सा आसान होता है?’’ सुरेखा ने प्रश्नपूर्ण दृष्टि से मणि की ओर देखा था.

जीवन के एक नए सफर पर चल पड़ने की दृढ़ता उस के चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी.

‘‘तो तुम नहीं मानोगी?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘नहीं रुकोगी?’’

‘‘नहीं.”

“एक बार फिर सोच लो.’’

‘‘नहीं.”

सुरेखा ने अपने वैवाहिक जीवन की यज्ञवेदी में आज तक जितनी आहूतियां दी थीं, आज उस की पूर्णाहुति देने का समय था. सुरेखा इस के लिए पूरी तरह तैयार थी.

मणि के बाहुपाश से छूटते ही उस ने सूटकेस उठाया और दृढ़ता के साथ बाहर निकल गई.

Summer Special: गर्मियों में बनाएं कच्चे आम की कढ़ी

हमें चाहिए

  • बेसन – आधा कप
  • कच्चा आम – 1 मीडियम आकार का (150 ग्राम)
  • तेल – 2-3 टेबल स्पून
  • हरी मिर्च – 2
  • करी पत्ता – 10-12
  • हींग – 1 पिंच
  • जीरा – आधा छोटा चम्मच
  • हल्दी पाउडर – 1/4 छोटा चम्मच
  • लाल मिर्च पाउडर – 1/4 छोटा चम्मच
  • नमक – स्वादानुसार

बनाने का तरीका

सबसे पहले आम को छील कर गूदा निकाल लीजिये और इसे छोटा-छोटा काट लीजिये. पैन जिसमें कढ़ी बनानी है उसमें तेल डालकर गरम कीजिये, तेल गरम होने पर जीरा डालिये. जीरा भुनने पर, हल्दी पाउडर भी डाल दीजिये, अब कटा हुआ आम डाल दीजिये, हरी मिर्च को बीच से लम्बाई में काट कर डाल दीजिये, मसाले को थोड़ा सा भून कर, 1 कप पानी डाल कर ढककर आम के टुकड़ों को धींमी आग पर नरम होने तक पकने दीजिये.

जब तक आम के टुकड़े पककर तैयार होते हैं, तब तक बेसन का घोल बनाकर तैयार कर लीजिये. बेसन को किसी बड़े प्याले में डालिये और थोड़ा सा पानी डालकर गुठलियां खतम होने तक घोल लीजिये, और अब 3 कप पानी मिला कर बेसन को अच्छी तरह पानी में घोल लीजिये, बेसन का घोल तैयार है.

आम के टुकड़ों को खोल कर, चमचे से दबाकर चैक कीजिये, आम के टुकड़े नरम हो गये हैं वे आसानी से दब रहे हैं. पके हुये आम के टुकड़ों में बेसन का घोल डालिये और चमचे से चलाते हुये कढ़ी को को तब तक पकाइये जब तक कि कढ़ी में उबाल न आ जाय, गैस तेज रख लीजिये.

कढ़ी में उबाल आने के बाद, नमक और आधी लाल मिर्च डाल दीजिये और 8-10 मिनिट तक धींमी आग पर कढ़ी को पकने दीजिये, कढ़ी में हल्का हल्का उबाल आता रहे, कढ़ी को हर 2 मिनिट में चमचे से चलाते रहिये. कढ़ी बन गई है, गैस बन्द कर दीजिये, और कढ़ी में एक बार फिर से तड़का लगाइये.

छोटे पैन में बचा हुआ तेल डालकर गरम कीजिये, तेल गरम होने पर जीरा डालिये, जीरा भूनने के बाद, हींग डाल दीजिये, करी पत्ता को बारीक काट कर डाल दीजिये, गैस बन्द कर दीजिये और अब लाल मिर्च डाल दीजिये. तड़का को कढ़ी के ऊपर डालिये. बहुत ही स्वादिष्ट कच्चे आम की कढ़ी तैयार है.

कच्चे आम की कढ़ी को चपाती, पराठे या चावल के साथ परोसिये और खाइये.

खोया हुआ आशिक- शालिनी के लौटने पर विनीता क्यों थी परेशान

‘‘हैलोविन्नी… कैसी हो मेरी जान… अरे, मैं शालिनी बोल रही हूं… तुम्हारी शालू’’ सुन कर विनीता को समझने में कुछ समय लगा, मगर फिर जल्दी ही जैसे दिमाग सोते से जागा.

‘‘अरे, शालू तुम? अचानक इतने सालों बाद? तुम तो नितेश से शादी कर के अमेरिका चली गई थी… आज इतने सालों बाद अचानक मेरी याद कैसे आई? क्या इंडिया आई हो?’’ विनीता ने अपने मन की घबराहट छिपाते हुए पूछा.

‘‘अरे बाप रे, इतने सारे सवाल एकसाथ? बताती हूं… बताती हूं… अभी तो बातें शुरू हुई हैं…’’ शालिनी ने अपनी आदत के अनुसार ठहाका लगाते हुए कहा.

‘‘पहले तू यह बता कि मेरे खोए हुए आशिक यानी जतिन के बारे में तुझे कोई खबर है क्या? शायद मेरी तरह उस ने भी हमारे अतीत के कुछ पन्ने संभाल कर रखें हों…’’ शालिनी का सवाल सुनते ही विनीता के हाथ से मोबाइल छूटने को हुआ. वह उसे कैसे बताती कि उस का खोया हुआ आशिक ही अब उस का पाया हुआ प्यार है… जिन अतीत के पन्नों की बात ‘शालू कर रही थी वही पन्ने उस के जाने के बाद विनीता वर्तमान में पढ़ रही है… हां, वही जतिन जो कभी शालू का आशिक हुआ करता था आज विनीता का पति है.’

विनीता को एकाएक कोई जवाब नहीं सूझा तो उस ने 4-5 बार ‘‘हैलो… हैलो…’’ कह कर फोन काट दिया और फिर उसे स्विच औफ भी कर दिया. वह फिलहाल शालू के किसी भी सवाल का जवाब देने की स्थिति में नहीं थी.

विनीता बैडरूम में आ कर कटे पेड़ की तरह ढह गई. न जाने कितनी ही बातें… कितनी ही यादें थीं, जो 1-1 कर आंखों के रास्ते गुजर रही थी. कौन जाने… आंखों से यादें बह रही थीं या आंसुओं का सैलाब… कैसे भूल सकती है विनीता कालेज के आखिरी साल के वे दिन जब शालिनी ने अचानक नितेश से शादी करने के अपने पापा के फैसले को हरी झंडी दे दी थी. विनीता ने क्या कम समझाया था उसे?

‘‘शालू, तुम जतिन के साथ ऐसा कैसे कर सकती हो? उसे कितना भरोसा है तुम पर… बहुत प्यार करता है तुम से… वह टूट जाएगा शालू… मुझे तो डर है कि कहीं कुछ उलटासीधा न कर बैठे…’’ विनीता को शालू की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था. एक वही तो थी इस रिश्ते की चश्मदीद गवाह.

‘‘बी प्रैक्टिकल यार. प्यार अलग चीज है और शादी अलग… नितेश से जो मुझे मिल सकता है वह जतिन कभी नहीं दे सकता… नीतेश एअर इंडिया में पायलट है… महानगर में शानदार फ्लैट… अच्छी नौकरी… हैंडसम पर्सनैलिटी… रोज विदेश के दौरे… क्या

ये सब जतिन दे पाएगा मुझे? उसे तो अभी

सैटल होने में ही बरसों लग जाएंगे… तब तक

तो मैं बूढ़ी हो जाऊंगी…’’ शालू ने आदतन ठहाका लगाया.

‘‘देख शालू, तुझे जो करना है वह कर,

मगर प्लीज… फाइनल ऐग्जाम तक इस बारे में जतिन को कुछ मत बताना वरना वह एग्जाम भी नहीं दे पाएगा… उस का फ्यूचर खराब हो जाएगा…’’ विन्नी उस के सामने लगभग गिड़गिड़ा उठी.

‘‘ओके डन… मगर तू क्यों इतनी मरी जा रही है उस के लिए?’’ शालू विन्नी पर कटाक्ष करते हुए क्लास से चली गई.

फाइनल परीक्षा खत्म हो गई. आखिरी पेपर के बाद तीनों कालेज कैंटीन में मिले थे. तभी शालू ने नितेश के साथ अपनी सगाई की खबर सार्वजनिक की थी. विनीता की नजर लगातार जतिन के चेहरे पर ही टिकी थी. वह संज्ञा शून्य सा बैठा था. उन दोनों को सकते में छोड़ कर शालू कब की जा चुकी थी. विनीता किसी तरह जतिन को वहां से उठा कर ला पाई थी.

नितेश से शादी कर के 2 ही महीनों में शालू अमेरिका चली गई. फाड़ कर फेंक गई थी अपने अतीत के पन्ने… पीछे छोड़ गई थी टूटा… हारा… अपना आशिक… जिसे विनीता ने न केवल संभाला, बल्कि संवार निखार भी दिया. शालू की बेवफाई के गम को भुलाने के लिए जतिन ने अपने आप को पढ़ाई में डुबो दिया. विनीता ने उस के आंसुओं को कंधा दिया. वह लगातार उस का हौसला बढ़ाती रही. आखिर जतिन की मेहनत और विनीता की तपस्या रंग लाई. प्रशासनिक अधिकारी तो नहीं, मगर जतिन एक राजपत्रित अधिकारी तो बन ही गया था. अपनी सफलता का सारा श्रेय विनीता को देते हुए एक दिन जब जतिन ने उसे शादी के लिए प्रोपोज किया तो वह भी न नहीं कह सकी और घर वालों की सहमति से दोनों विवाहसूत्र में बंध गए. बेशक यह पहली नजर वाला प्रेम नहीं था, मगर हौलेहौले हो ही गया था.

तभी लैंडलाइन की घंटी ने उसे वर्तमान में ला दिया.

‘‘अरे, क्या बात है… तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न? मोबाइल स्विच औफ क्यों आ रहा है?’’ जतिन की आवाज में खुद के लिए इतनी फिक्र महसूस कर विनीता को दिली राहत मिली.

‘‘अच्छा… मोबाइल स्विच औफ है? मैं ने देखा नहीं… शायद चार्ज करना भूल गई,’’ विनीता साफ झूठ बोल गई.

‘‘सुनो, मुझे दोपहर बाद टूअर पर निकलना है. ड्राइवर को भेज रहा हूं, मेरा बैग पैक कर के दे देना. घर नहीं आ पाऊंगा, जरूरी मीटिंग है,’’ जतिन ने जल्दबाजी में कहा.

जतिन के टूअर अकसर ऐसे ही बनते. मगर हर बार की तरह इस बार विनीता परेशान नहीं हुई, बल्कि उस ने राहत की सांस ली, क्योंकि वह इस समय सचमुच एकांत चाहती थी ताकि शालिनी से आने से बनी इस परिस्थिति पर कुछ सोचविचार कर सके.

‘क्या होगा अगर उस ने घर आने और मेरे पति से मिलने की जिद की तो? क्या कहूंगी मैं शालू से? क्या जतिन से शादी कर के मैं ने कोई अपराध किया है?’ इन्हीं सवालों के जवाब वह एकांत में अपनेआप से पाना चाहती थी. पूरा दिन वह मंथन करती रही. उस की आशंका के अनुरूप अगले ही दिन दोपहर में शालिनी का फोन आ गया. अब तक विनीता अपनेआप को इस स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार कर चुकी थी.

‘‘यार विन्नी, तुम तो बड़ी छिपी रुस्तम निकली… मेरी ही थाली पर हाथ साफ कर लिया… मेरे आशिक को अपना पति बना लिया… मैं ने कल ही जतिन की फेसबुक आईडी देखी तो पता चला… क्या तुम्हारी पहले से ही प्लानिंग थी?’’ शालू का व्यंग्य सुन कर विन्नी गुस्से और अपमान से तिलमिला उठी.

‘‘नहीं शालू… थाली पर हाथ साफ नहीं किया, बल्कि जिस पौध को तुम कुचल कर खत्म होने के लिए फेंक गई थी मैं ने उसे सहेज कर फिर से गमले में लगा दिया… अब उस के फूल या फल, जो भी हों, वे मेरी ही झोली में आएंगे न… चल छोड़ ये बातें… तू बता क्या चल रहा है तेरी लाइफ में? कितने दिन के लिए इंडिया आई हो? अकेली आई हो या नितेश भी साथ है?’’ विन्नी ने संयत स्वर में पूछा.

‘‘अकेली आई हूं, हमेशा के लिए… हमारा तलाक हो गया.’’

‘‘क्यों? कैसे? वह तो तुम्हारे हिसाब से बिलकुल परफैक्ट मैच था न?’’

‘‘अरे यार, दूर के ढोल सुहावने होते हैं… नितेश भी बाहर से तो इतना मौडर्न… और भीतर से वही… टिपिकल इंडियन हस्बैंड… यहां मत जाओ… इस से मत मिलो… उस से दूर रहो… परेशान हो गई थी मैं उस से… खुद तो चाहे जिस से लिपट कर डांस करे… और कोई मेरी कमर में हाथ डाल दे तो जनाब को आग लग जाती थी… रोज हमारा झगड़ा होने लगा… बस, फिर हम आपसी सहमति से अलग हो गए. अब मैं हमेशा के लिए इंडिया आ गई हूं,’’ शालू ने बड़ी ही सहजता से अपनी कहानी बता दी जैसे यह कोई खास बात नहीं थी, मगर विनीता के मन में एक अनजाने डर ने कुंडली मार ली.

‘‘अगर यह हमेशा के लिए इंडिया आ गई है, तो जतिन से मिलने की कोशिश भी जरूर करेगी… कहीं इन दोनों का पुराना प्यार फिर से जाग उठा तो? कहते हैं कि व्यक्ति अपना पहला प्यार कभी नहीं भूलता… फिर? उस का क्या होगा?’’ विनीता ने डर के मारे फोन काट दिया.

विनीता के दिल में शक के बादलों ने डेरा जमाना शुरू कर दिया. उस का शक विश्वास में बदलने लगा जब एक दिन उस ने फेसबुक पर नोटिफिकेशन देखा, ‘‘जतिन बिकम्स फ्रैंड विद शालिनी.’’

‘‘जतिन ने मुझे बताना भी जरूरी नहीं समझा? हो सकता है शालिनी इन से मिली भी हो…’’ विनीता के दिल में शक के नाग ने फुफकार भरी. विनीता अपने दिल की बात किसी से भी शेयर नहीं कर पा रही थी. धीरेधीरे उस की मनोस्थिति उस पर हावी होने लगी. नतीजतन उस के व्यवहार में एक अजीब सा रूखापन आ गया. जतिन जब भी उसे हंसाने की कोशिश करता वह बिफर उठती.

‘‘तुम्हें पता है शालिनी वापस लौट आई है?’’ एक दिन औफिस से आते ही जतिन ने विस्फोट किया.

‘‘हां, उस ने एक दिन मुझे फोन किया था. मगर तुम्हें किस ने बताया?’’ विनीता ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा. जतिन की आंखों में उसे जरा भी चोरी नजर नहीं आई, बल्कि उन में तो विश्वास भरी चमक थी.

‘‘अरे, उसी ने आज मुझे भी फोन किया था. उसे टाइम पास करने के लिए कोई जौब चाहिए. मुझ से मदद मांग रही थी.’’

‘‘फिर तुम ने क्या कहा?’’

‘‘1-2 लोगों से कहा है… देखो, कहां बात बनती है.’’

‘‘मगर तुम्हें क्या जरूरत है किसी पचड़े में पड़ने की?’’

‘‘अरे यार, इंसानियत नाम की भी कोई चीज होती है या नहीं… चलो छोड़ो, तुम बढि़या सी चाय पिलाओ,’’ कहते हुए जतिन ने बात खत्म कर दी.

मगर यह बात इतनी आसानी से कहां खत्म होने वाली थी. विनीता के कानों में रहरह कर शालिनी की चैलेंज देती आवाज गूंज रही थी. अब उस के पास शालिनी के फोन आने बंद हो गए थे. इस बात ने भी विनीता की रातों की नींद उड़ा दी थी.

‘‘अब तो सीधे जतिन को ही कौल करती होगी… मैं तो शायद कबाब में हड्डी हो चुकी हूं,’’ विनीता अपनेआप से ही बातें करती परेशान होती रहती. इन सब के फलस्वरूप वह कुछ बीमार भी रहने लगी थी.

‘‘मेरे कहने पर एक होटल में शालिनी को एचआर की जौब मिल गई. इस खुशी में वह आज मुझे इसी होटल में ट्रीट देना चाहती है… तुम चलोगी?’’ एक शाम जतिन ने घर आते ही कहा.

‘‘पूछ रहे हो या चलने को कह रहे हो?’’ विनीता भीतर ही भीतर सुलग रही थी.

‘‘आजकल तुम्हें बाहर का खाना सूट नहीं करता न, इसलिए पूछ रहा हूं,’’ जतिन ने सहजता से कहा.

विनीता कुछ नहीं बोली. चुपचाप हारे हुए खिलाड़ी की तरह जतिन को अपने से दूर जाते देखती रही.

धीरेधीरे उस ने चुप्पी ही साथ ली. उस ने जतिन से दूरी बढ़ानी शुरू करदी. उन के रिश्ते में ठंडापन आने लगा. वह मन ही मन अपनेआप को जतिन से तलाक के लिए तैयार करने लगी. वहीं जतिन इसे उस की बीमारी के लक्षण समझ कर बहुत ही सामान्य रूप से ले रहा था. हमेशा की तरह वह उसे घर आते ही औफिस से जुड़ी मजेदार बातें बताता था. इन दिनों उस की बातों में शालिनी का जिक्र भी होने लगा था. हालांकि शालू कभी उन के घर नहीं आई, मगर जतिन के अनुसार वह कभीकभार उस से मिलने औफिस आ जाती. वह भी 1-2 बार उस के बुलावे पर होटल गया था.

जतिन की साफगोई के विपरीत विनीता इसे अपने खिलाफ शालिनी की साजिश समझ रही थी. भीतर ही भीतर घुटती विनीता आखिरकार एक दिन हौस्पिटल के बिस्तर पर पहुंच गई. जतिन घबरा गया. वह समझ नहीं पा रहा था कि हंसतीखेलती विन्नी को अचानक क्या हो गया है. ठीक है वह पिछले दिनों कुछ परेशान थी, मगर स्थिति इतनी बिगड़ जाएगी, यह उस ने कल्पना भी नहीं की थी. जतिन उस का अच्छे से अच्छा इलाज करवा रहा था. जतिन की गैरमौजूदगी में एक दिन अचानक शालिनी उस से मिलने हौस्पिटल आई. विन्नी अनजाने डर से सिहर गई.

‘‘थैंक यू विन्नी, तुम्हारी बीमारी ने मेरा रास्ता बहुत आसान कर दिया… तुम जतिन से जितनी दूर जाओगी, वह उतना ही मेरे करीब आएगा…’’ शालिनी ने बेशर्मी से कहा. उस ने जतिन के साथ अपनी कुछ सैल्फियां भी उसे दिखाईं जिन में वह उस के साथ मुसकरा रहा था, साथ ही कुछ मनगढ़ंत चटपटे किस्से भी परोस दिए. शालू की बातें देखसुन कर विनीता ने मन ही मन इस रिश्ते के सामने हथियार डाल दिए.

‘‘जतिन, तुम शालू को अपना लो… अब तो तलाक की बाध्यता भी नहीं रहेगी… मैं ज्यादा दिन तुम्हें परेशान नहीं करूंगी…’’

विनीता के मुंह से ऐसी बात सुन कर जतिन चौंक गया. बोला, ‘‘आज तुम ये कैसी पागलों सी बातें कर रही हो? और यह शालू कहां से आ गई हमारे बीच में?’’

‘‘तुम्हें मुझ से कुछ भी छिपाने की जरूरत नहीं है. मुझे शालू ने सब बता दिया,’’ विन्नी ने किसी तरह अपनी सुबकाई रोकी, मगर आंखें तो फिर भी छलक ही उठीं.

‘‘तुम उस सिरफिरी शालू की बातों पर भरोसा कर रही हो मेरी बात पर नहीं… बस, इतना ही जानती हो अपने जतिन को? अरे, लाखों शालू भी आ जाएं तब भी मेरा फैसला तुम ही रहोगी… मगर शायद गलती तुम्हारी भी नहीं है… जरूर मेरे ही प्यार में कोई कमी रही होगी… मैं ही अपना भरोसा कायम नहीं रख पाया… मुझे माफ कर दो विन्नी… मगर इस तरह मुझ से दूर जाने की बात न करो…’’ जतिन भी रोने को हो आया.

‘‘यही सब बातें मैं अपनेआप को समझाने की बहुत कोशिश करती हूं. मगर दिल में कहीं दूर से आवाज आती है कि विन्नी तुम यह कैसे भूल रही हो कि शालू ही वह पहला नाम है जो जतिन ने अपने दिल पर लिखा था और फिर मैं दो कदम पीछे हट जाती हूं.’’

‘‘मुझे इस बात से इनकार नहीं कि शालू का नाम मेरे दिल पर लिखा था… मगर तुम्हारा नाम तो खुद गया है मेरे दिल पर… और खुदी हुई इबारतें कभी मिटा नहीं करतीं पगली…’’

‘‘तुम ने मुझे न केवल जिंदगी दी है,

बल्कि जीने के मकसद भी दिए हैं. तुम्हारे बिना न मैं कुछ हूं और न ही मेरी जिंदगी. अगर इस बीमारी की वजह शालू है, तो मैं आज इसे जड़ से ही खत्म कर देता हूं… अभी होटल के मालिक को फोन कर के शालू को नौकरी से हटाने को कह देता हूं, फिर जहां उस की मरजी हो चली जाए,’’ कह जतिन ने जेब से मोबाइल निकाला.

‘‘नहीं जतिन, रहने दीजिए… शायद सारी गलती मेरी ही थी… मुझे अपने प्यार पर भरोसा रखना चाहिए था… मगर मैं नहीं रख पाई… आशंकाओं के अंधेरे में भटक गई थी… मेरी आशंकाओं के बादल अब छंट चुके हैं… हमारे रिश्ते को किसी शालू से कोई खतरा नहीं…’’ विनीता मुसकरा दी.

तभी जतिन का मोबाइल बज उठा. शालिनी कौलिंग देख कर वह मुसकरा दिया. उस ने मोबाइल को स्पीकर पर कर दिया.

‘‘हैलो जतिन, फ्री हो तो क्या हम कौफी साथ पी सकते हैं? वैसे भी विन्नी तो हौस्पिटल में है… आ जाओ,’’ शालिनी ने मचलते हुए कहा.

‘‘विन्नी कहीं भी हो, हमेशा मेरे साथ मेरे दिल में होती है. और हां, यदि तुम ने मुझे ले कर कोई गलतफहमी पाल रखी है तो प्लीज भूल जाओ… तुम मेरी विन्नी की जगह कभी नहीं ले सकती… नाऊ बाय…’’ जतिन बहुत संयत था.

‘‘बाय ऐंड थैंक्स शालू… हमारे रिश्ते को और भी ज्यादा मजबूत बनाने के लिए…,’’ विन्नी भी खिलखिला कर जोर से बोली और फिर जतिन ने फोन काट दिया. दोनों देर तक एकदूसरे का हाथ थामे अपने रिश्ते की गरमाहट महसूस करते रहे.’’

The Kerala Story Film Review: जानें कैसी है विवादों में घिरी फिल्म द केरला स्टोरी

  • रेटिंगः एक स्टार
  • निर्माता व रचनात्मक निर्देशक: विपुल अमृतलाल शाह
  • लेखकः सूर्यपाल सिंह,  सुदीप्तो सेन, विपुल अमृतलाल शाह
  • निर्देशकः सुदीप्तो सेन
  • कलाकारः अदा शर्मा, योगिता बिहानी,  सोनिया बलानी, सिद्धि इदनानी, विजय कृष्णा, प्रणय पचोरी, प्रणव मिश्रा
  • अवधिः दो घंटा 18 मिनट

यूं तो देश की सरकारें बदलने के साथ ही देश का सिनेमा सदैव बदलता रहा है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों से हर फिल्मकार किसी न किसी खास ‘अजेंडा’ के तहत फिल्में बना रहा है. ऐसा करते समय वह तथ्यों को भी अपने अजेंडा के अनुसार तोड़ मरोड़कर पेश करने में हिचकिचाता नहीं है. इसी संदर्भ के तहत आज हम फिल्मकार सुदीप्तो सेन की फिल्म ‘‘द केरला स्टोरी’’ की समीक्षा करने जा रहे हैं.  फिल्म देखते हुए अहसास होता है कि फिल्मकार कहीं न कहीं भ्रमित है.

फिल्म का प्रचार करते हुए कहा गया कि केरला राज्य से 32000 लड़कियां गायब है. मगर फिल्म में एक संवाद है जहां फिल्म की एक नायिका पुलिस स्टेशन में एफआईआर लिखाने गयी है. उस वक्त वह कहती है कि, ‘‘ हमारे राज्य की 32 हजार लड़कियां गायब है. अब तक 761 एफआईआर ही लिखी गयी हैं. और इनमें से 261 लड़कियां को उनके माता पिता तक पहुॅचाया गया है. ’’अब सवाल है कि यह 32 हजार का आंकड़ा कहां से आया? यदि यह आंकड़े सोशल मीडिया व इंटरनेट की देन है, तो ‘द केरला स्टोरी’ के साथ ही फिल्मकार सुधीर मिश्रा की फिल्म ‘‘अफवाह’’ भी प्रदर्षित हुई है, जिसका संदेश यही है कि सोशल मीडिया व इंटरनेट पर जो भी वीडियो या बातें आती हैं, उन्हे सच नहीं मानना चाहिए. ऐसे मंे दर्षक किस फिल्मकार की किस बात को कितना सही या गलत माने?

दूसरी बात फिल्म में संवाद है कि एक मुख्यमंत्री ने कहा था कि यदि इसी तरह से राज्य में धर्मांतरण होता रहा, तो एक दिन केरला राज्य इस्लामिक राज्य बन जाएगा. यहां पर फिल्मकार को उस मुख्यमंत्री का नाम उजागर करने से परहेज नहीं करना चाहिए था.  बहरहाल,  फिल्म ‘द केरला स्टोरी’ के निर्देशक सुदीप्तो सेन का दावा है कि 2016 और 2018 के बीच केरल में 32, 000 महिलाएं आईएसआईएस में शामिल हुई थीं.


इतना ही नहीं फिल्म के निर्देशक सुदीप्तो सेन और रचनात्मक निर्माता विपुल अमृतलाल शाह जोर देकर कहते हैं कि उनकी फिल्म ‘द केरला स्टोरी’ केरल की ‘32, 000 युवा लड़कियों की सच्ची कहानी‘ पर आधारित है,  जिन्हें इस्लाम धर्म स्वीकार करवाने के बाद अफगानिस्तान -तुर्की-सीरिया की सीमा पर आईएसआईएस शिविरों में बंदी बना कर रखा गया था. जिनका काम इस्लाम के जेहादियों की सेक्स भूख को षांत करना था. इन शिविरों में हर लड़की के साथ हर दिन कई बार बलात्कार किया जाता था. यदि यह सच है, तो केरला सरकार ही नहीं केंद्र सरकार की भी इस मसले पर चुप्पी समझ से परे है.

वैसे 2021 में ‘द हिंदू’ अखबार में अफगानिस्तान की जेल मे चार लड़कियोें की कहानी बतायी गयी थी.  फिल्मकार का काम होता है कि वह अपनी फिल्म में हर मुद्दे के विभिन्न पहलुओं को चित्रित कर उस मुद्दे पर समाज व देश में बहस का माहौल बनाए. मगर ‘द केरला स्टोरी’ ऐसा कुछ नहीं करती. फिल्म के कुछ दृष्य तो फिल्मकार की भावनाओं, संवेदनाओं के साथ संजीदगी पर भी सवाल उठाते हैं?

फिल्म ‘‘द केरला स्टोरी’’ देखकर यह बात साफ नजर आती है कि फिल्मकार का एक मात्र मकसद हर दर्षक का ‘ब्रेनवाश’ करना मात्र है. फिल्म कहती है कि कोई भी मुसलमान अच्छा नहीं होता. नास्तिकता व साम्यवाद में अंतर नहीं है.  फिल्म इस बात को भी रेखंाकित करती है कि कोई जान-बूझकर धर्मांतरण नहीं है,  गुप्त उद्देश्यों के बिना आपसी प्रेम नहीं है. . . वाह क्या बात है? पर यह समझ से परे है कि जब नर्स बनने की पढ़ाई कर रही शालिनी का मुस्लिम प्रेमी रमीज उसे धोखा दे देता है, तब वह एक बार अपने माता पिता से मिलने की बजाय मौलवी की बातों मे आकर इस्लाम धर्म कबूल कर एक अनजान मुस्लिम युवक इशाक संग शादी कैसे कर लेती है?

यहां तो प्रेम यानी कि ‘लव जिहाद’ भी नहीं है.  उत्तेजना से भरी फिल्म की पटकथा उन ‘तथ्यों और आंकड़ों‘ को प्रस्तुत करती है, जो व्यापक रूप से विवादित रहे हैं. अथवा व्हाट्सअप युनिवर्सिटी, सोशल मीडिया व इंटरनेट की देन है.  वैसे फिल्मकार सुदीप्तो सेन का यह पहला प्रयास नहीं है. वह इससे पहले 2022 में इसी पर ‘‘इन द नेम आफ लव’’ नामक डाक्यूमेंट्ी भी बना चुके हैं. इस डाक्यूमेंट्ी में सुदीप्तो सेन ने कहा है कि केरला राज्य से 17 हजार और मंगलोर से 15 हजार हिंदू व क्रिष्चियन लड़कियों का धर्म बदलवाकर उन्हे मुस्लिम बनाया गया. यह ‘लव जेहाद’ का परिणाम है.

 

कहानीः

फिल्म की कहानी के केंद्र में कासरगोड के एक नर्सिंग कॉलेज के होस्टल में रहकर पढ़ाई कर रही शालिनी उन्नीकृष्णन (अदा शर्मा) और उसकी तीन रूममेट्स,  एक हिंदू लड़की गीतांजली (सिद्धि इदनानी),  दूसरी ईसाई लड़की निमाह (योगिता बिहानी) और तीसरी मुस्लिम लड़की आसिफा (सोनिया बलानी) है.  फिल्म शुरू होती है आसिफा (सोनिया बलानी) द्वारा अन्य तीन का ब्रेन-वॉश करने के मिशन से. वह इन तीनों को समझाती है कि जो लड़कियां हिजाब पहनती हैं, वह पुरुषों की बुरी नजरों से सुरक्षित रहती हैं. आसिफा बार बार इन्हे बाती है कि अगर ईसा मसीह को सूली पर चढ़ने से बचाने उनके ईष्वर क्यो नहीं आए? इसी तरह वह बताती है कि भगवान शिव को भी अपनी पत्नी के मृत शरीर को लेकर डर डर क्यों भटकना पड़ा? भगवान राम को अपनी पत्नी सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए वानर सेना की मदद लेनी पड़ी. क्योकि ‘अल्लाह’ के अलावा किसी ईष्वर या भगवान में कोई ताकत नहीं है. यह सभी कमजोर हैं. आसिफा इन तीनों को समझाती है कि केवल अल्लाह ही ‘काफिरों‘ को बचा सकता है,  जिन्हें (दोजख) नरक की आग और लानत का सामना करना पड़ेगा. आसिफा तीनों लड़कियों को समझाती है कि अल्लाह ही एकमात्र सच्चा भगवान है और इस्लाम ही एकमात्र धर्म है, जो अस्तित्व में रहने का हकदार है.

आसिफा के साथ ही शालीनष्युवक रमीज (प्रणय पचोरी) , अब्दुल (प्रणव मिश्रा) व इशाक (विजय कृष्णन ) मिले हुए हैं. इनका काम अनजान युवतियों को अपने प्रेम जाल में फंसाना और इस्लाम धर्म से संस्कारित करना है. इस काम में चालाक मौलवी भी अपनी भूमिका अदा करते हैं. कुछ ही समय में,  शालिनी,  निमाह (योगिता बिहानी) और गीतांजलि (सिद्धि इदनानी) आसिफा के जादू के दायरे में आ जाती हैं.

अधीर मौलवी अपने अनुयायियों को सलाह देता है कि ‘‘उन्हें करीब लाओ,  उन्हें दवा खिलाओ,  उनके साथ यौन संबंध बनाओ,  और यदि संभव हो तो उन्हें गर्भवती करो. ‘‘उनकी सलाह का पूरी तरह से पालन किया जाता है शालिनी शादी से पहले ही रमीज के बच्चे की मां बनने वाली होती है. रमीज उससे इस शर्त पर शादी करने को तैयार होता है कि शालिनी, इस्लाम धर्म स्वीकार ले. जब वह ऐसा करने को तैयार हो जाती है, तो मौलवी बताते है कि रमीज तो केरला के बाहर चला गया. अब उसे इशाक से शादी कर सीरिया जाकर अल्लाह की सेवा कर अपने सारे गुनाहों से मुक्त होना चाहिए.

शामिली, फातिमा बनकर इशाक से शादी कर कोलंबो होते हुए अफगानिस्तान तुर्की व सीरिया की सीमा पर सुनसान क्षेत्र में बने आई एसआईएस के शिविर में पहुंच जाती है. जहां उसकी समझ में आता है कि उसकी हैसियत महज सेक्स स्लेब या आतमघाती हमलावर के अलावा कुछ नहीं है.

लेखन व निर्देशनः

फिल्मकार के दावे हैं कि उन्होंने फिल्म में सच को पेश किया है. पर फिल्म देखकर ऐसा नहीं लगता. फिल्म की पटकथा पूरी तरह से दर्षक के अंदर उत्तेजना पैदा करती है. जबकि फिल्म का काम होता है कि दर्षक को सच व गलत के बारे में सोचने पर मजबूर करे? इस पर यह फिल्म खरी नहीं उतरती. दूसरी बात ‘धर्म परिवर्तन’ के सच से इंकार नहीं किया जा सकता.

हमारे देश में इसाई मशीनरी से लेकर हर धर्म से जुड़े लोग दूसरे धर्मावलंबियो का ब्रेन वाश कर उन्हें अपने धर्म के साथ जोड़ते हैं, इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता. पर हम देखते आए हैं कि किसी न किसी रूप में कमजोर लोग ही धर्मांतरण के लिए आसानी से तैयार होते हैं. पर इस फिल्म को देखते हुए हम इस बात को नजरंदाज नहीं कर सकते कि केरला देश का सबसे अधिक शिक्षित राज्य है.

क्या शिक्षित लड़की जन्म से सिखायी गयी विचार धारा को त्याग कर इस्लाम स्वीकार करने के साथ ही अपने हृदयाघात के कारण अस्पताल में बेहोश पड़े पिता के चेहरे पर थूंकेगी? क्या भारतीय सभ्यता व कोई भी धर्म यही सिखाता है? इस दृष्य से ही इस बात का अहसास होता है कि निर्देशक सुदीप्तो सेन कितने असंवेदनशील,  असंजीदा और भावनाओं से परे इंसान हैं.  पूरी फिल्म सिर्फ आग लगाने व वैमनस्यता पैदा करने का ही काम करती है.

हम यह नहीं कहते कि केरल की कुछ लड़कियों के साथ ऐसा नहीं हुआ होगा? हम जानते है कि क्रूर तालिबान ने दुनिया के कई हिस्सों की महिलाओं के साथ बहुत कुछ भयानक किया है.  मगर यह दावा करना कि यह निश्चित रूप से भारत के राज्य ‘केरल 32000 लड़कियों की कहानी‘ है, साफ तौर पर सही नहीं लगता. इसके अलावा हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जहां हिंसा सर्वोपरी हो, वह अच्छी विचारधारा हो ही नहीं सकती.

अफसोस फिल्मकार की लेखकीय व निर्देशकीय कमजोरी के चलते उनके एक खास धर्म के प्रति ध्रुवीकरण का प्रयास पूरी तरह से विफल हो गया है. फिल्म की कहानी के अनुसार हिंदू लड़की शालिनी का विष्वास डगमगाता है, पर कट्टर कैथोलिक मिमाह अपने विश्वास में डगमगाती नहीं है. तो वहीं कम्यूनिस्ट नेता की बेटी गीतांजली अपना कौमार्य खोने के बाद संभलकर शैतानों की पोल खोलने लगती है. अब इसे क्या कहा जाए. जब शालिनी को पता चलता है कि वह बिन ब्याही मां बनने वाली है, तो ऐसा व्यवहार करती है, जैसे कि यह दुनिया का अंत है. जबकि वह नर्स बनने की पढ़ाई करने के साथ ही अत्याधुनिक परिवार की सदस्य है. यह निर्देशकीय कमजोरी के साथ ही कमजोर पटकथा का परिचायक है.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पूरे देश की ही तरह केरल राज्य में धार्मिक कट्टरता बढ़ रही है,  जिसका विरोध किया जाना चाहिए. किसी भी धर्म की धार्मिक कट्टरता हर समाज व देश के लिए नुकसान दायक ही होती है. दूसरी बात आतंकवाद के प्रति उदारता भी सही नहीं है. अफसोस हमारे देश में असहिष्णुता का रोना रोने वाले आश्चर्यजनक रूप से आतंकवाद पर चुप्पी साधे रहते हैं. यह चुनिंदा सक्रियता है, जो एक राष्ट्र के लिए अधिक खतरनाक है.

इसी परिदृष्य में हमें इस तथ्य पर भी गौर करना चाहिए कि केरला राज्य में 1911 से 1941 तक ईसाई आबादी में लगातार वृद्धि हुई थी. लेकिन 1981 के बाद से यह वृद्धि कम हुई है. 1981 में केरला में 58. 2 प्रतिशत हिंदू, 21. 3 प्रतिशत मुस्लिम, 20. 6 प्रतिशत इसाई थे.  जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार 54. 9 प्रतिशत हिंदू, 26. 6 प्रतिशत मुस्लिम और 18. 4 प्रतिशत इसाई थे. यानी कि केरला में मुस्लिम आबादी में लगातार इजाफा होता जा रहा है. क्या यह आंकड़े अपने आप में कोई सवाल नहीं उठाते. मगर इसमें कोई दो राय नहीं कि ‘द केरला स्टोरी’ बहुत ही खराब फिल्म है.

क्योंकि निर्देशक सुदीप्तो सेन में विवादास्पद सामाजिक मुद्दों को सेल्युलाइड पर लाने के लिए आवष्यक परिपक्वता व संवेदनशीलता की कमी है. हालांकि कठोर अल्पसंख्यक भले ही खुश न हों,  लेकिन द केरला स्टोरी हिंदुत्व के कट्टर विश्वासियों को भी परेशान कर सकती है. धर्म की आड़ में हिंसा को जायज ठहराना, माता पिता का अपमान करवाना, बर्बरता सही नहीं है. फिल्म का कंट्टर धर्मावलंबियों पर सवाल उठाना जायज है.

हर धर्म में अच्छाई व बुराई है.  इसकी मूल वजह यह है कि हम लोग उसके अंदर निहित व्यापक सच को समझ नहीं पाते. शालिनी के प्रेमी रमीज के घर लगे पोस्टर पर लिखा है,  ‘राष्ट्रवाद हराम है. मुसलमान आपकी पहचान है. ’’ तो वहीं एक संवाद है-‘‘हमें औरंगजेब के अधूरे काम को पूरा करना है. ’फिल्मकार ने हर भारतीय मुस्लिम चरित्र को कट्टर बनाकर इस्लामोफोबिया के आरोपों से खुद को बचाने की कोशिश करते हैं. जबकि पूरी फिल्म ‘इस्लाम’ को सर्वश्रेष्ठ बताती है.

मगर आईएसआईएस ‘अल्लाह हो अकबर’ के नारों के साथ दुनिया भर की औरतों को ‘सेक्स स्लेब’ मानकर औरतों व युवा लड़कियों के साथ जिस तरह की क्रूरता के साथ पेश आता है, वह क्या है? इसे किसी भी सभ्य समाज में या किसी भी धर्म में जगह नहीं दी जा सकती. ऐसे आतंकवाद के खिलाफ तो हर किसी को धर्म व राजनीतिक विचारारा के परे जाकर एक साथ आना होगा. अफसोस फिल्मकार इस संदेश को दर्षक तक सही ढंग से नहीं पहुॅचा सके. काश, फिल्मकार ने केरला राज्य की सामाजिक समस्याओं को भी अपनी फिल्म का हिस्सा बनाया होता.

अभिनयः

शालिनी उर्फ फातिमा बा के किरदार में अदा शर्मा का अभिनय अजीबोगरीब है.  वह सिर्फ हंसने व रोने के अलावा कुछ नहीं जानती. लेकिन इंटरवल के बाद के दृष्यों में अदा शर्मा का अभिनय निखर कर आता है.

योगिता बिहानी सम्मानजनक प्रदर्शन किया है. एक कम्युनिस्ट नेता की बेटी गीतांजली के किरदार में सिद्धि इदनानी अपने अभिनय से लोगों के दिलो में जगह बना लेती हैं.

प्रेम में डूबी लड़की से लेकर अपनी अस्मिता गंवाकर होश में आई लड़की की घुटने न टेकने वाले एलान तक के दृष्यों में उनका अभिनय शानदार है. लेकिन विजय कृष्ण, प्रणव मिश्रा व प्रणय पचोरी निराश करते हैं.

मुझे डायबिटीज है तो क्या मुझे फल खाना बंद कर देना चाहिए?

सवाल

मुझे फल खाना बहुत पसंद है, लेकिन मुझे डायबिटीज है. ऐसे में क्या मुझे इन्हें खाना बंद कर देना चाहिए?

जवाब

यह एक सामान्य लेकिन पूरी तरह से गलत धारणा है. जिन्हें डायबिटीज है वे सामान्य लोगों की तरह सभी फल खा सकते हैं, लेकिन उन्हें केवल मात्रा का ध्यान रखना चाहिए. आप रोज 150-200 ग्राम फल बिना किसी परेशानी के खा सकती हैं. जिन्हें डायबिटीज है उन्हें ऐसे फल खाना चाहिए जिन का ग्लाइसेमिक इंडैक्स कम हो, जैसे सेब, संतरा, पपीता, नाशपाती, अमरूद, अनार. अंगूर, आम, चीकू, पाइनऐप्पल से परहेज करना चाहिए, लेकिन अगर बहुत मन करे तो कभीकभार बिलकुल थोड़ी मात्रा में इन्हें ले सकते हैं.

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सवाल

मेरे 12 वर्षीय बेटे को डायबिटीज है. मैं जानना चाहती हूं जुवेनाइल डायबिटीज के प्रबंधन में कैसे करूं?

जवाब

टाइप 1 डायबिटीज टाइप 2 डायबिटीज से ज्यादा गंभीर होती है क्योंकि इस का प्रबंधन मुश्किल होता है. जब एक बार बच्चे इंसुलिन पर निर्भर हो जाते हैं, तो फिर हमेशा उन्हें इस की जरूरत पड़ती है. लेकिन खानपान में बदलाव ला कर इंसुलिन पर निर्भरता को कम किया जा सकता है. डाक्टर से मिल कर डाइट चार्ट तैयार कराएं और अपने बच्चे को इस का कड़ाई से पालन करने के लिए प्रेरित करें. अपने खानपान में भी बदलाव लाएं ताकि बच्चा खुद को अलगथलग महसूस न करे. उसे अपने साथ वाक पर ले जाएं, ऐक्सरसाइज और योग करने के लिए प्रेरित करें. जुवेनाइल डायबिटीज से पीडि़त बच्चों में कभीकभी रक्त में शुगर का स्तर खतरनाक स्तर तक बढ़ जाता है. इसलिए स्कूल में भी बताएं कि आप का बच्चा जुवेनाइल डायबिटीज से पीडि़त है. उस के दोस्तों को भी इस बारे में बताएं ताकि किसी आपातकालीन स्थिति से निबटने में परेशानी न हो.

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सवाल

मेरे पति को पिछले 10 साल से डायबिटीज है. मैं आजकल डायबिटीज रिवर्सल के बारे में बहुत सुन रही हूं. डायबिटीज रिवर्सल क्या होता है? क्या अब डायबिटीज से छुटकारा पाना संभव है?

जवाब

डायबिटीज रिवर्सल उस स्थिति को कहते हैं जब मरीज का शुगर लैवल सामान्य रेंज में है और उसे दवाइयां लेने की जरूरत नहीं होती है. लेकिन इसे क्योर नहीं रिवर्सल इसलिए कहा जाता है क्योंकि शरीर में डिजीज मैकेनिज्म और पैथोलौजी बनी रहती है. किसी भी बीमारी के लिए क्योर शब्दावली तभी इस्तेमाल की जाती है जब यह कभी दोबारा न हो. लेकिन डायबिटीज रिवर्सल में दोबारा होने का खतरा बना रहता है. डायबिटीज रिवर्सल टाइप 2 डायबिटीज में होता है. यह टाइप 1 डायबिटीज में नहीं होता है क्योंकि यह इंसुलिन डिपैंडैंट होता है.

डायबिटीज रिवर्सल तभी हो पाता है, जब मरीज डाक्टर की देखरेख में एक अत्यधिक अनुशासित जीवनशैली का पालन करता है, संतुलित भार बनाए रखता है, नियमित रूप से ऐक्सरसाइज करता है और खानपान पर नियंत्रण रखता है.

डा. ए.के. झिंगन

चेयरमैन, डेल्ही डायबिटीज रिसर्च सैंटर,

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बर्फ पिघल गई- भाग 1: जब प्यार के बीच आ गई नफरत

गरिमा रोहन से प्यार करती थी. मगर एक दिन उस के साथ एक ऐसी घटना घट गई कि वह रोहन से नफरत करने लगी. घटना के सालों बाद जब उस की मुलाकात रोहन से हुई तो वह अपने किए पर शर्मिंदा थी. आखिर क्या सच जान गई थी वह…

‘‘तुम ने अपने घर वालों के सामने मुझ से बिना पूछे ही घोषणा कर दी कि डायवोर्स ले रहे हो,’’ तनु ने लगभग चीखते हुए रोहन से सवाल किया. वह औफिस से आया ही था. तनु ने उस पर बरसना शुरू कर दिया, ‘‘जवाब क्यों नहीं दे रहे हो. मुझ से छुटकारा चाहिए तो मुझ बोलना था. अपने घर फोन क्यों किया?’’

रोहन ने बैग टेबल पर रखा और बहस से बचने के लिए वाशरूम में घुस गया.

तनु अब भी बड़बड़ा रही थी, ‘‘मेरी ही बुद्धि फिर गई थी जब शादी के लिए हां कह दी थी.

2 साल लिव इन में थी तो पैर पकड़ने को तैयार रहता था और अब देखो बात का जवाब दिए बिना वाशरूम में जा कर बंद हो गया.’’

थोड़ी देर तक रोहन नहीं आया तो तनु भी अंदर कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया. रोहन बाहर आया तो न तो चाय ही बनी हुई थी न ही खाने को कुछ और था. उस ने रसोई में जा कर खुद ही चाय बनाई और तनु के कमरे का दरवाजा खटखटाया. बहुत देर तक खड़ा रहा? लेकिन अंदर से कोई आवाज नहीं आई. उस ने चाय बाहर लौबी में मेज पर रख दी और लैपटौप खोल कर किसी काम में जुट गया.

‘‘मैं पुलिस में तुम्हारी शिकायत करूंगी,’’ तुम्हारी तरह घर वालों के कान नहीं भरूंगी… हिम्मत होनी चाहिए लड़ने की भी,’’ तनु दनदनाती हुई बाहर आई. लगातार बोल रही थी.

रोहन का सिर दर्द कर रहा था, लेकिन तनु तो आज ही सारे फैसले करने पर तुली हुई थी. वह लौबी से उठा. चाय कप में ही छोड़ दी. वाशरूम में जा कर बंद हो गया. कुछ देर जमीन पर ही बैठा रहा, फिर शावर औन कर दिया. उसे कुछ नहीं सूझ रहा था बस उस घड़ी को कोस रहा था जब उस ने तनु से शादी करने का फैसला लिया था.

उधर तनु पहले तो बोलती जा रही थी, फिर रोने लगी. अंदर ही अंदर डर रही थी

कि कहीं रोहन कुछ गलत न कर बैठे. थोड़ी देर इधरउधर बिना किसी काम के घूमती रही, फिर अलबम ले कर बैठ गई. उस ने महसूस कर लिया था कि अब उस की शादी नहीं बचेगी

बस यादें ही रह जाएंगी. रोहन का फोन बज रहा था, लेकिन वह बाहर नहीं आया. शावर की आवाज में शायद सुना ही नहीं उस ने. 3 साल पहले का फोटो थी जब पहली बार दोनों के मातापिता ने इस अन मेलविवाह के लिए सहमति दी थी.

‘‘काश उन लोगों ने माना नहीं होता तो हम लोग अच्छे दोस्त तो बने रहते. शादी ही नहीं करते,’’ उस के मन में भावनाएं उमड़ रही थीं

और आंसू बह रहे थे. कई महीनों से यही सब चल रहा था. तनु और रोहन या तो एकदूसरे से बात ही नहीं करते थे या केवल झगड़ा ही करते थे. अपनेआप को सही सिद्ध करने की कोशिश से ज्यादा दूसरे को गलत साबित करने की कोशिश में लगे रहते. रोहन औफिस से आता तो तनु उस की कोई गलती बताने के लिए तैयार बैठी रहती. रोहन भी कभी सुलझने की कोशिश नहीं करता था, इसलिए जिंदगी पूरी तरह उलझ गई थी.

अलबम देखतेदेखते तनु सोफे पर लेट पर ही गई. रोहन कब वाशरूम से बाहर आया उसे पता ही नहीं चला.

रोहन सुबह जल्दी उठ कर औफिस के लिए निकल गया. तनु सो कर उठी तो वह घर में नहीं था. कामवाली भी आ गई थी. रसोई में बरतन धो रही थी. तनु को उठा देख कर उस ने पूछा, ‘‘क्या मैडम आज नाश्ता भी नहीं बनाया. तबीयत ठीक नहीं है क्या? भैया का टिफिन भी इधर ही रखा है?’’

तनु रसोई में आ गई थी. उस ने चाय बनाने के लिए आंच जलाई, ‘‘मेरी तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है. रोहन को आज जल्दी जाना था इसलिए औफिस में ही नाश्ता करेंगे. तुम्हें चाय पीनी हो तो बोलो.’’

‘‘नहीं मैडम, नाश्ता कर के ही चली थी. वह मेरा घर वाला सवेरे ही खाना ले कर जाता है, मजदूरी करने. मेरी भी सुबह ही खाने की आदत हो गई है,’’ बाई ने अपने काम में लगेलगे ही जवाब दिया.

लेकिन तनु के दिल में कुछ खटक गया. रोहन तो रोज खुद ही चायनाश्ता बना कर जाता है. उस के लिए भी बना कर रख जाता है. किसी दिन ही वह उठ पाती है वरना सोती रहती है. रोहन ने कभी कुछ नहीं कहा. जब दोनों लिव इन में रह रहे थे तब भी रोहन ही सुबह जल्दी उठा करता था. तनु को भी औफिस जाना होता था इसलिए वह तैयार हो कर चली जाती थी. उस का टिफिन भी रोहन ही लगाता था.

रोहन से शादी करने के फैसले का बड़ा कारण यह भी था. पहले दिन से रोहन को बताया था कि वह खाना बनाना नहीं जानती है और बनाने में उस की कोई रुचि भी नहीं है.’’

‘‘खाना बनाएंगे तो होटल और रैस्टोरैंट

वाले क्या करेंगे? उन्हें भी रोजीरोटी कमानी है, इसलिए खाना नहीं बना कर तुम तो कुछ लोगों को रोजगार मिलने में मदद ही कर रही हो,’’ रोहन ने हंसते हुए कहा था तो तनु भी हंस दी थी.

मां भी बहुत खुश हुई थीं दामाद के विचारों को सुन कर. उन्होंने भी इस शादी को अपनी मंजूरी दे दी थी.

‘‘जो मेरी अनुमति के लिए 3 साल शादी टाल सकता है उस से बेहतर इंसान मेरी बेटी को दूसरा नहीं मिल सकता है,’’ पापा ने भी यह कहते हुए खुशी से अपनी सहमति दे दी थी. इस के बाद तो तनु निश्चिंत हो गई थी रोहन को लेकर. लेकिन वर्तमान स्थिति उस के एकदम उलट थी. रोहन ने बात करना बंद ही कर दिया था. उस की बहन के फोन से तनु को पता चला था कि वह अब तनु के साथ नहीं रहना चाहता है. सुन कर तिलमिला गई थी तनु. साथ में नहीं रहना चाहता यह जानना उतना दुखद नहीं था जितना इस बात का उस की बहन से पता लगना.

‘‘तनु, मैं ने डिलिवरी के बाद फिर से औफिस जौइन कर लिया है. तुम ने कोई तरक्की की या अपने शानदार फ्लैट की बालकनी में ही उलझ हो अभी?’’ गरिमा औफिस से ही फोन कर रही थी.

तनु सोच में पड़ गई कि आज अचानक गरिमा ने फोन क्यों किया और उस से यह प्रश्न क्यों पूछा. क्या गरिमा उस और रोहन के बिगड़ते रिश्ते के बारे में जान गई है?

‘‘कुछ जवाब तो दो मैडम? औफिस से फोन कर रही हूं. ज्यादा देर बात नहीं कर पाऊंगी. औफिस आते ही तुम्हारी याद आई, इसलिए

फोन किया तुम्हें,’’ गरिमा के स्वर में थोड़ी नाराजगी थी.

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है, तुम जानती हो घर में रह कर रूटीन बदल गया है. अभी सो कर उठी हूं,’’ तनु ने अलसाते स्वर में उत्तर दिया.

‘‘तो वापस जौइन कर ले. वह जो तेरी

जगह आई थी, उस की भी शादी हो गई है.

तेरी सीट खाली ही है. मेरे सामने ही है. सच

बोल रही हूं, फिर से आ जा. तुझे मिस कर रही हूं, यार.’’

‘‘अभी तो कुछ नहीं सोचा है. कल लंच ब्रेक में तुझ से आ कर मिलती हूं. कैफेटेरिया में. अपनी पसंद की टेबल पर,’’ तनु ने कहा तो गरिमा का उत्साह उस के शब्दों में झलक पड़ा.

‘‘सच? मैं वेट करूंगी. बहुत सी बातें करनी हैं यार. एक साल से नहीं मिले हैं. चल फोन रखती हूं. किसी खबरी ने बौस को बता दिया है शायद. बौस का ही फोन आ रहा है.’’

मूव औन माई फुट: मिताली को देख क्या कर बैठा था विक्रम

‘‘तुम यकीन नहीं करोगी पर कुछ दिनों से मैं तुम्हें बेइंतहा याद कर रहा था,’’ विक्रम बोला.

‘‘अच्छा,’’ मिताली बोली.

‘‘तुम अचानक कैसे आ गईं?’’

‘‘किसी काम से दिल्ली आई थी और इसी तरफ किसी से मिलना भी था. मगर वह काम हुआ नहीं. फिर सोचा इतनी दूर आई हूं तो तुम से ही मिलती चलूं. तुम्हारे औफिस आए जमाने हो चले थे.’’

‘‘औफिस के दरदीवार तुम्हें बहुत मिस करते हैं?’’ विक्रम फिल्मी अंदाज में बोला.

वह बहुत जिंदादिल और प्रोफैशनल होने के साथसाथ बेहद कामयाब इंसान भी था.

‘‘यार प्लीज, तुम अब फिर से यह फ्लर्टिंग न शुरू करो,’’ मिताली हंसती हुई बोली.

‘‘क्या यार, तुम खूबसूरत लड़कियों की यही परेशानी है कि कोई प्यार भी जताए तो तुम्हें फ्लर्टिंग लगती है.’’

‘‘सच कह रहे हो… तुम क्या जानो खूबसूरत होने का दर्द.’’

‘‘उफ, अब तुम अपने ग्रेट फिलौसफर मोड में मत चली जाना,’’ विक्रम दिल पर हाथ रख फिल्मी अंदाज में बोला.

‘‘ओ ड्रामेबाज बस करो… तुम जरा भी नहीं बदले,’’ वह खिलखिलाती हुई बोली.

‘‘मैं तुम सा नहीं जो वक्त के साथ

बदल जाऊं.’’

‘‘अरे इतने सालों बाद आई हूं कुछ खानेपीने को तो पूछ नालायक,’’ उस ने बातचीत को हलका ही रहने दिया और विक्रम का ताना इग्नोर कर दिया.

‘‘ओह आई एम सौरी. तुम्हें देख कर सब भूल गया. चाय लोगी न?’’

‘‘तुम्हारा वही पुराना मुंडू है क्या? वह तो बहुत बुरी चाय बनाता है,’’ उस ने हंसते हुए पूछा.

‘‘हां वही है. पर तुम्हारे लिए चाय मैं बना कर लाता हूं.’’

‘‘अरे पागल हो क्या… तुम्हारा स्टाफ क्या सोचेगा. तुम बैठो यहीं.’’

‘‘अरे रुको यार तुम फालतू की दादागीरी मत करो. अभी आया बस 5 मिनट में. औफिस किचन में बना कर छोड़ आऊंगा. सर्व वही करेगा,’’ कह वह बाहर निकल गया.

मिताली भी उठ कर औफिस की खिड़की पर जा खड़ी हुई. कभी इसी

बिल्डिंग में उस का औफिस भी था और वह भी सेम फ्लोर पर. वह और विक्रम 11 बजे की चाय और लंच साथ ही लेते थे. शाम को एक ही वक्त औफिस से निकलते थे. हालांकि अलगअलग कार में अपने घर जाते थे पर पार्किंग में कुछ देर बातें करने के बाद.

पूरी बिल्डिंग से ले कर आसपास के औफिस एरिया तक में सब को यही लगता था कि उन का अफेयर है. पर…

‘‘तुम फिर अपनी फैवरिट जगह खड़ी

हो गई?’’

‘‘बन गई चाय?’’

‘‘और क्या? मैडम आप ने हमारे प्यार की कद्र नहीं की… हम बहुत बढि़या हसबैंड मैटीरियल हैं.’’

‘‘स्वाह,’’ कह मिताली जोर से हंस पड़ी.

‘‘स्वाह… सिरमिट्टी सब करा लो पर अब तो हां कर दो.’’

तभी औफिस बौय चाय रख गया.

‘‘अब किस बात की हां करनी है?’’

‘‘मुझ से शादी की.’’

चाय का कप छूटतेछूटते बचा मिताली के हाथ से. बोली, ‘‘पागल हो क्या?’’

‘‘दीवाना हूं.’’

‘‘मेरा बेटा है 3 साल का… भूल गए हो तो याद दिला दूं.’’

‘‘सब याद है. मुझे कोई प्रौब्लम नहीं. उस के बिना नहीं रहना तुम्हें. साथ ले आओ.’’

‘‘अच्छा, बहुत खूब. क्या औफर है. और तुम्हें यह क्यों लगता है कि मैं इस औफर को ऐक्सैप्ट कर लूंगी?’’

‘‘शादी के बाद आज मिली हो इतने सालों बाद पर साफ दिख रहा है तुम अब भी मुझ से ही प्यार करती हो. तुम्हारी आंखें आज भी पढ़ लेता हूं मैं.’’

‘‘तो?’’

‘‘मतलब तुम मानती हो तुम अब भी मुझ से ही प्यार करती हो.’’

‘‘नहीं. मैं यह मानती हूं कि मैं तुम से भी प्यार करती हूं.’’

‘‘वाह,’’ विक्रम तलख हो उठा.

‘‘प्यार भी 2-4 से एकसाथ किया जा सकता है, यह मुझे मालूम न था.’’

‘‘ये सब क्या है यार… इतने समय बाद आई हूं और तुम यह झगड़ा ले बैठे.’’

विक्रम जैसे नींद से जागा, ‘‘सौरी, मुझे तुम्हें दुखी नहीं करना चाहिए है न? यह राइट तो तुम्हारे पास है.’’

‘‘विक्रम तुम्हें अच्छी तरह पता है मैं आदित्य से प्यार करती हूं. वह बेहद अच्छा और सुलझा हुआ इंसान है. उसे हर्ट करने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती. तुम्हारी इन्हीं बातों की वजह से मैं ने तुम्हारा फोन उठाना बंद कर दिया. और अब लग रहा है आ कर भी गलती की.’’

विक्रम बेहद गंभीर हो गया. सीट से उठ कर खिड़की के पास जा खड़ा हुआ. फिर मुड़ कर पास की अलमारी खोली. अलमारी के अंदर ही अच्छाखासा बार बना रखा था.

मिताली बुरी तरह चौंकी, ‘‘यह क्या है?’’

‘‘क्यों, दिख नहीं रहा? शराब है और क्या.’’

‘‘यह कब से शुरू की?’’

‘‘डेट नोट नहीं की वरना बता देता.’’

‘‘मैं मजाक नहीं कर रही.’’

‘‘मैं भी मजाक नहीं कर रहा.’’

‘‘अच्छा, तो यह नुमाइश मुझे इमोशनल ब्लैकमेल करने के लिए कर रहे हो कि देखो तुम्हारे गम में मेरी क्या हालत है.’’

‘‘तुम हुईं?’’

‘‘नहीं रत्तीभर भी नहीं,’’ मिताली मुंह फेर कर बोली.

‘‘मुझे पता है तुम स्ट्रौंग हैड लड़की हो… यह तुम्हें मेरे करीब नहीं ला सकता, बल्कि तुम इरिटेट हो कर और दूर जरूर हो सकती हो. वैसे इस से दूर और क्या जाओगी,’’ कह तंज भरी हंसी हंसा.

‘‘मैं ने तो सुना था तुम्हारी सगाई हो गई है. मैं तो मुबारकबाद देने आई थी.’’

‘‘वाह, क्या खूब. तो नमक लगाने आई हो या अपना गिल्ट कम करने?’’

‘‘मैं ने सचमुच आ कर गलती की.’’

‘‘मैं तो पहले ही कह रहा हूं तुम और इरिटेट हो जाओगी.’’

‘‘ठीक है तो फिर चलती हूं?’’

‘‘जैसा तुम्हें ठीक लगे.’’

मिताली उठ खड़ी हुई.

विक्रम बेचैन हो उठा. बोला, ‘‘सुनो…’’

‘‘कुछ रह गया कहने को अभी?’’

‘‘मुझे ही क्यों छोड़ा?’’

‘‘तुम ज्यादा मजबूत थे.’’

‘‘तो यह मजबूत होने की सजा थी?’’

‘‘पता नहीं, पर आदित्य बहुत इमोशनल है और उसे बचपन से हार्ट प्रौब्लम भी है और यह मैं पहले ही बता चुकी हूं.’’

‘‘तुम्हें ये सब पहले नहीं याद रहा था?’’

‘‘विक्रम क्यों ह्यूमिलिएट कर रहे हो यार… जाने दो न अब.’’

‘‘नहीं मीता… बता कर जाओ आज.’’

‘‘विक्रम मैं इस शहर में पढ़ने आई थी. फिर अच्छी जौब मिल गई तो और रुक गई.’’

‘‘आदित्य और मैं बचपन के साथी थे. उस का प्यार मुझे हमेशा बचपना या मजाक लगा. सोचा नहीं वह सीरियस होगा इतना. फिर तुम्हारे पास थी यहां इस शहर में बिलकुल अकेली तो तुम से बहुत गहरा लगाव हो गया. पर मैं ने शादी जैसा तो कभी न सोचा था न चाहा. न कभी कोई ऐसी बात ही कही थी तुम से. कोई हद कभी पार नहीं की.’’

‘‘अरे कहना क्या होता है?’’ वह लगभग चीख पड़ा, ‘‘सब को यही लगता था हम प्यार में हैं. सब को दिखता था… तुम ने ही जानबूझ कर सब अनदेखा किया और जब उस आदित्य का रिश्ता आया तो मुझे पलभर में भुला दिया. बस एक कार्ड भेज दिया?’’ सालों का लावा फूट पड़ा था.

मिताली चुप खड़ी रही.

‘‘बोलो कुछ?’’ वह फिर चिल्लाया.

‘‘क्या बोलना है अब. मुझे इतना पता है जब आदित्य ने प्रोपोज किया, तो मैं उसे न कर के हर्ट नहीं कर पाई. मेरे और उस के दोनों परिवार भी वहीं थे. पापा को क्या बोलूं कुछ समझ न आया और सब से बड़ी बात आदित्य मुझे ले कर ऐसे आश्वस्त था जैसे मैं बरसों से उसी की हूं. उसे 15 सालों से जानती थी और तुम्हें बस सालभर से. श्योर भी नहीं थी तुम्हें ले कर. तुम्हारे लिए मुझे लगता था तुम खुशमिजाज मजबूत लड़के हो, जल्दी मूव औन कर जाओगे.’’

‘‘मूव औन,’’ विक्रम बहुत ही हैरानी से चीखा, ‘‘मूव औन माई फुट. ब्लडी हैल… साला जिंदगीभर यह सालेगा. इस से तो लड़कियों की तरह दहाड़ें मार कर तुम्हारे आगे रो लिया होता. कम से कम तुम छोड़ के तो न जातीं.’’

‘‘ओ हैलो… कहां खोए हो?’’

विक्रम सोच के समंदर से बाहर आया. मिताली तो कब की जा चुकी थी और वह खुद ही सवालजवाब कर रहा था.

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‘‘तुम गई नहीं?’’

‘‘पर्स छूट गया था उसे लेने आई हूं.’’

‘‘बस पर्स?’’

‘‘हां बस पर्स,’’ वह ठहरे लहजे में बोली, ‘‘बाय, अपना खयाल रखना,’’ कह कर बाहर निकल गई.

लिफ्ट बंद होने के साथ ही उस की आंखें छलक उठीं, ‘‘छूट तो बहुत कुछ गया यहां विक्रम. पर सबकुछ समेटने जितनी मेरी मुट्ठी नहीं. कुछ समेटने के लिए कुछ छोड़ना बेहद जरूरी है.’’

‘‘सर, आप मैडम को बहुत प्यार करते थे न?’’ टेबल से चाय के कप उठाते हुए उस के मुंडू ने पूछा. आखिर वही था जो तब से अब तक नहीं बदला था.

‘‘प्यार तो नहीं पता रे, पर साला आज तक यह बरदाश्त न हुआ कि मुझ पर इतनी लड़कियां मरती थीं… फिर यह ऐसे कैसे छोड़ गई मुझे…’’ कह उस ने गहरी सांस ली.

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