शिणगारी: आखिर क्यों आज भी इस जगह से दूर रहते हैं बंजारे?

बंजारों के एक मुखिया की बेटी थी शिणगारी. मुखिया के कोई बेटा नहीं था. शिणगारी ही उस का एकमात्र सहारा थी. बेहद खूबसूरत शिणगारी नाचने में माहिर थी.

शिणगारी का बाप गांवगांव घूम कर अपने करतब दिखाता था और इनाम हासिल कर अपना व अपनी टोली का पेट पालता था.

शिणगारी में जन्म से ही अनोखे गुण थे. 17 साल की होतेहोते उस का नाच देख कर लोग दांतों तले उंगली दबाने लगे थे.

ऐसे ही एक दिन बंजारों की यह टोली उदयपुर पहुंची. तब उदयपुर नगर मेवाड़ राज्य की राजधानी था. महाराज स्वरूप सिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठे थे. उन के दरबार में वीर, विद्वान, कलाकार, कवि सभी मौजूद थे. एक दिन महाराज का दरबार लगा हुआ था. वीर, राव, उमराव सभी बैठे थे. महफिल जमी थी. शिणगारी ने जा कर महाराज को प्रणाम किया.

अचानक एक खूबसूरत लड़की को सामने देख मेवाड़ नरेश पूछ बैठे, ‘‘कौन हो तुम?’’ ‘‘शिणगारी… महाराज. बंजारों के मुखिया की बेटी हूं…’’ शिणगारी अदब से बोली, ‘‘मुजरा करने आई हूं.’’

‘‘ऐसी क्या बात है तुम्हारे नाच में, जो मैं देखूं?’’ मेवाड़ नरेश बोले, ‘‘मेरे दरबार में तो एक से बढ़ कर एक नाचने वालियां हैं.’’

‘‘पर मेरा नाच तो सब से अलग होता है महाराज. जब आप देखेंगे, तभी जान पाएंगे,’’ शिणगारी बोली.

‘‘अच्छा, अगर ऐसी बात है, तो मैं तुम्हारा नाच जरूर देखूंगा. अगर मुझे तुम्हारा नाच पसंद आ गया, तो मैं तुम्हें राज्य का सब से बढि़या गांव इनाम में दूंगा. अब बताओ कि कब दिखाओगी अपना नाच?’’ मेवाड़ नरेश ने पूछा. ‘‘मैं सिर्फ पूर्णमासी की रात को मुजरा करती हूं. मेरा नाच खुले आसमान के नीचे चांद की रोशनी में होता है…’’ शिणगारी बोली, ‘‘आप अपने महल से पिछोला सरोवर के उस पार वाले टीले तक एक मजबूत रस्सी बंधवा दीजिए. मैं उसी रस्सी पर तालाब के पानी के ऊपर अपना नाच दिखाऊंगी.’’

शिणगारी के कहे मुताबिक मेवाड़ नरेश ने अपने महल से पिछोला सरोवर के उस पार बनेरावला दुर्ग के खंडहर के एक बुर्ज तक एक रस्सी बंधवा दी.

पूर्णमासी की रात को सारा उदयपुर शिणगारी का नाच देखने के लिए पिछोला सरोवर के तट पर इकट्ठा हुआ. महाराजा व रानियां भी आ कर बैठ गए.

चांद आसमान में चमक रहा था. तभी शिणगारी खूब सजधज कर पायलें छमकाती हुई आई. उस ने महाराज व रानियों को झुक कर प्रणाम किया और दर्शकों से हाथ जोड़ कर आशीर्वाद मांगा. फिर छमछमाती हुई वह रस्सी पर चढ़ गई. नीचे ढोलताशे वगैरह बजने लगे.

शिणगारी लयताल पर उस रस्सी पर नाचने लगी. एक रस्सी पर ऐसा नाच आज तक उदयपुर के लोगों ने नहीं देखा था. हजारों की भीड़ दम साधे यह नाच देख रही थी. खुद मेवाड़ नरेश दांतों तले उंगली दबाए बैठे थे. रानियां अपलक शिणगारी को निहार रही थीं.

नाचतेनाचते शिणगारी पिछोला सरोवर के उस पार रावला दुर्ग के बुर्ज पर पहुंची, तो जनता वाहवाह कर उठी. खुद महाराज बोल पड़े, ‘‘बेजोड़…’’

कुछ पल ठहर कर शिणगारी रस्सी पर फिर वापस मुड़ी. बलखातीलहराती रस्सी पर वह ऐसे नाच रही थी, जैसे जमीन पर हो. इस तरह वह आधी रस्सी तक वापस चली आई.

अभी वह पिछोला सरोवर के बीच में कुछ ठहर कर अपनी कला दिखा ही रही थी कि किसी दुष्ट के दिल पर सांप लोट गया. उस ने सोचा, ‘एक बंजारिन मेवाड़ के सब से बड़े गांव को अपने नाच से जीत ले जाएगी. वीर, उमराव, सेठ इस के सामने हाथ जोड़ेंगे. क्षत्रियों को झुकना पड़ेगा और ब्राह्मणों को इस की दी गई भिक्षा ग्रहण करनी पड़ेगी…’ और तभी रावला दुर्ग के बुर्ज पर बंधी रस्सी कट गई.

शिणगारी की एक तेज चीख निकली और छपाक की आवाज के साथ वह पिछोला सरोवर के गहरे पानी में समा गई.

सरोवर के पानी में उठी तरंगें तटों से टकराने लगीं. महाराज उठ खड़े हुए. रानियां आंसू पोंछते हुए महलों को लौट गईं. भीड़ में हाहाकार मच गया. लोग पिछोला सरोवर के तट पर जा खड़े हुए. नावें मंगवाई गईं. तैराक बुलाए गए. तालाब में जाल डलवाया गया, पर शिणगारी को जिंदा बचा पाना तो दूर उस की लाश तक नहीं खोजी जा सकी.

अगले दिन दरबार लगा. शिणगारी का पिता दरबार में एक तरफ बैठा आंसू बहा रहा था.

मेवाड़ नरेश बोले, ‘‘बंजारे, हम तुम्हारे दुख से दुखी हैं, पर होनी को कौन टाल सकता है. मैं तुम्हें इजाजत देता हूं कि तुम्हें मेरे राज्य का जो भी गांव अच्छा लगे, ले लो.’’

‘‘महाराज, हम ठहरे बंजारे. नाच और करतब दिखा कर अपना पेट पालते हैं. हमें गांव ले कर क्या करना है. गांव तो अमीर उमरावों को मुबारक हो…’’ शिणगारी का बाप रोतेरोते कह रहा था, ‘‘शिणगारी मेरी एकलौती औलाद थी. उस की मां के मरने के बाद मैं ने बड़ी मुसीबतें उठा कर उसे पाला था. वही मेरे बुढ़ापे का सहारा थी. पर मेरी बेटी को छलकपट से तो नहीं मरवाना चाहिए था अन्नदाता.’’

मेवाड़ नरेश कुछ देर सिर झुकाए आरोप सुनते रहे, फिर तड़प कर बोले, ‘‘तेरा आरोप अब बरदाश्त नहीं हो रहा है. अगर तुझे यकीन है कि रस्सी किसी ने काट दी है, तो तू उस का नाम बता. मैं उसे फांसी पर चढ़वा कर उस की सारी जागीर तुझे दे दूंगा.’’

‘‘ऐसी जागीर हमें नहीं चाहिए महाराज. हम तो स्वांग रच कर पेट पालने वाले कलाकार हैं,’’ शिणगारी के पिता ने कहा. ‘‘तो तुम जो चाहो मांग लो,’’ मेवाड़ नरेश गरजे.

‘‘नहीं महाराज…’’ आंसुओं से नहाया बंजारों का मुखिया बोला, ‘‘जिस राज्य में कपटी व हत्यारे लोग रहते हैं, वहां का इनाम, जागीर, गांव लेना तो दूर की बात है, वहां का तो मैं पानी भी नहीं पीऊंगा. मैं क्या, आज से उदयपुर की धरती पर बंजारों का कोई भी बच्चा कदम नहीं रखेगा महाराज.’’

यह सुन कर सभा में सन्नाटा छा गया. वह बंजारा धीरेधीरे चल कर दरबार से बाहर निकल गया.

इस घटना को बीते सदियां गुजर गईं, पर अभी भी बंजारे उदयपुर की जमीन पर कदम नहीं रखते हैं. पीढ़ी दर पीढ़ी बंजारे अपने बच्चों को शिणगारी की कहानी सुना कर उदयपुर की जमीन से दूर रहने की हिदायत देते हैं.

लेखक- शिवचरण चौहान

अमेरिका जैसा मैंने देखा: बेटे-बहू के साथ कैसा था शीतल का सफर

अमेरिका पहुंचने के 2 महीने बाद ही बेटी श्वेता ने जब अपनी मां शीतल को फोन पर उस के नानी बनने का समाचार सुनाया तो शीतल की आंखों से खुशी और पश्चात्ताप के मिश्रित आंसू बह निकले. शीतल को याद आने लगा कि शादी के 4 वर्ष बीत जाने के बाद भी श्वेता का परिवार नहीं बढ़ा तो उस के समझाने पर, श्वेता की योजना सुन कर कि अभी वे थोड़ा और व्यवस्थित हो जाएं तब इस पर विचार करेंगे, उस ने व्यर्थ ही उस को कितना लंबाचौड़ा भाषण सुना दिया था. उस समय दामाद विनोद के, कंपनी की ओर से, अमेरिका जाने की बात चल रही थी. अब उस को एहसास हो रहा है कि पहले वाला जमाना तो है नहीं, अब तो मांबाप अपनेआप को बच्चे की परवरिश के लिए हर तरह से सक्षम पाते हैं, तभी बच्चा चाहते हैं.

4-5 महीने बाद श्वेता ने मां शीतल से फोन पर कहा, ‘‘ममा, आप अपना पासपोर्ट बनवा लीजिए, आप को यहां आना है.’’

‘‘क्यों क्या बात हो गई? तेरी डिलीवरी के लिए तेरी सास आ रही हैं न?’’

‘‘हां, पहले आ रही थीं लेकिन डाक्टर ने उन्हें इतनी दूर फ्लाइट से यात्रा करने के लिए मना कर दिया है, इसलिए अब वे नहीं आ सकतीं.’’

‘‘ठीक है, देखते हैं. तू परेशान मत होना.’’ फोन पर बेटी ने यह अप्रत्याशित सूचना दी तो वह सोच में पड़ गई, लेकिन उस ने मन ही मन तय किया कि वह अमेरिका अवश्य जाएगी.

पासपोर्ट बनने के बाद वीजा के लिए सारे डौक्युमैंट्स तैयार किए गए. श्वेता ने फोन पर शीतल को समझाया कि अमेरिका का वीजा मिलना बहुत ही कठिन होता है, साक्षात्कार के समय एक भी डौक्युमैंट कम होने पर या पूछे गए एक भी प्रश्न का उत्तर संतोषजनक न मिलने पर साक्षातकर्ता वीजा निरस्त करने में तनिक भी संकोच नहीं करता. उस के बाद वह कोई भी तर्क सुनना पसंद नहीं करता. अमेरिका घूमने जाने वालों को, वहां अधिक से अधिक 6 महीने ही रहने की अनुमति मिलती है, इसलिए उन की बातों से उन को यह नहीं लगना चाहिए कि वे वहीं बसने जा रहे हैं, लेकिन उन की कल्पना के विपरीत जब साक्षातकर्ता ने 2-3 प्रश्न पूछने के बाद ही मुसकरा कर वीजा की अनुमति दे दी तो उन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. सारे डौक्युमैंट्स धरे के धरे रह गए. बाहर प्रतीक्षा कर रहे अपने बेटे को जब उन्होंने हाथ हिला कर उस की जिज्ञासा पर विराम लगाया तो उस ने उन का ऐसे अभिनंदन किया, जैसे वे कोई मुकदमा जीत कर आए हों.

अंत में शीतल का अपने पति के साथ अमेरिका जाने का दिन भी आ गया. वे पहली बार वहां जा रहे थे. सीधी फ्लाइट नहीं थी, इसलिए बेटे ने पूछा, ‘‘यदि आप लोगों को यात्रा करने में तनिक भी असुविधा लग रही है तो व्हीलचेयर की सुविधा ले सकते हैं? पूरा समय आप लोग एक गाइड के संरक्षण में रहेंगे?’’

 ‘‘नहीं, इस की आवश्यकता नहीं है,’’ उन्होंने उत्तर दिया.

मुंबई से 9 घंटे की उड़ान के बाद वे लंदन के हीथ्रो हवाईअड्डे पर पहुंचे. वहां से अमेरिका के एक राज्य टेक्सास के लिए दूसरे विमान से जाना था. अब फिर उन को 9 घंटे की यात्रा करनी थी. उन लोगों ने एक बात का अनुभव किया कि घरेलू विमान से यात्रा करते समय जो झटके लगते हैं, वो इस में बिलकुल नहीं लग रहे थे. उड़ान मंथर गति से निर्बाध अपनी मंजिल की ओर अग्रसर थी.

टेक्सास हवाईअड्डे के बाहर श्वेता अपने पति विनोद के साथ उन की प्रतीक्षा कर रही थी. बेटी पर निगाह पड़ते ही शीतल को एहसास हुआ कि औरत मातृत्व के रूप में सब से अधिक गरिमा से परिपूर्ण लगती है, वह बहुत सुंदर लग रही थी.

उस का चेहरा कांति से दमक रहा था. उस का मन अपनी बेटी के लिए गर्व से भर उठा. भावातिरेक में उस ने उस को गले लगा लिया. वहां से वे लोग कार से डेलस, उन के घर पहुंचे, जो कि लगभग 40 किलोमीटर दूर था. शाम हो गई थी.

बेटी ने घर पहुंचने के लगभग 1 घंटे बाद कहा, ‘‘मेरी क्लास है, यहां डिलीवरी के पहले बच्चे की होने वाली मां को जन्म के बाद बच्चे की कैसे देखभाल की जाए, समझाया जाता है. आप लोग आराम कीजिए, मैं क्लास अटैंड कर के आती हूं.’’

रास्ते की थकान होने के कारण  हम दोनों जल्दी ही गहरी नींद में सो गए. जब जोरजोर से दरवाजा खटखटाने की आवाज हुई तो वह जल्दी से उठ कर दरवाजा खोलने के लिए भागी. उस को याद आया कि बेटी ने जातेजाते चौकस हो कर सोने के लिए कहा था, जिस से कि वे दरवाजा खोल सकें, क्योंकि वहां दरवाजे की घंटी नहीं होती है.

अंदर आते हुए श्वेता बड़बड़ा रही थी, ‘‘अरे ममा, यहां पर जरा सी आवाज होते ही पड़ोसी अपनेअपने दरवाजों को खोल कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगते हैं.’’ जब उस ने बताया कि लगभग आधे घंटे से वह बाहर खड़ी थी तो उस को बड़ी ग्लानि हुई.

लेकिन तुरंत ही वह अपनी मां को सांत्वना देती हुई बोली, ‘‘कोई बात नहीं, जेट लैग (अमेरिका में जब रात होती है, तब भारत में दिन होता है इसलिए शरीर को वहां के क्रियाकलापों के अनुसार ढालने में समय लगता है, उसी को जेट लैग कहते हैं) में ऐसी ही नींद आती है.’’ आगे उस ने अपनी बात को जारी रखते हुए बताया, ‘‘यहां पर आप की किसी भी गतिविधि से यदि पड़ोसी को असुविधा होती है तो वे पुलिस को बुलाने में जरा भी संकोच नहीं करते. यहां तक कि ऊपरी फ्लोर में रहने वालों के छोटे बच्चों के भागनेदौड़ने की आवाज के लिए भी निचले फ्लोर में रहने वाले एतराज कर सकते हैं, यहां का कानून बहुत सख्त है.’’

श्वेता के साथ जब कभी शीतल बाजार जाती तो भारत के विपरीत वह देखती कि सड़क पार करते समय पैदल यात्री की सुविधा के लिए ट्रैफिक रुक जाता था. कहीं पर भी कितनी भी भीड़ क्यों न हो, कोई किसी से टकराता नहीं था. हमेशा एक दूरी निश्चित रहती थी, चाहे वह आम लोगों में हो या यातायात के साधनों में हो. किसी भी मौल में या किसी भी सार्वजनिक स्थल पर अजनबी भी मुसकरा कर हैलो अवश्य कहते हैं. गर्भवती स्त्रियों के साथ उन का बड़ा सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार होता है.

घरों में कामवाली मेड के अभाव में सभी गृहकार्य और बाजार के कार्य स्वयं करने के कारण भारत में जो उन से सुविधा मिलने से अधिक जो मानसिक यंत्रणा को भोगना पड़ता है, वह न होने से जीवन सुचारु रूप से चलता है. गृहकार्य को सुविधाजनक बनाने के लिए बहुत सारे उपकरण भी घरों में उपलब्ध होते हैं. वातानुकूलित घर होने के कारण निवासियों की ऊर्जा का हृस नहीं होता. सड़क पर टै्रफिक जाम न होने के कारण समय बहुत बचता है और उस से उत्पन्न मानसिक तनाव नहीं होता. वहां पर इंडियन स्टोर्स के नाम से बहुत सारी दुकानें खुली हैं, जहां लगभग सभी भारतीय खा- पदार्थ और चाट आदि मिलती हैं. वहां जा कर लगता ही नहीं कि हम भारत में नहीं हैं.

श्वेता की ससुराल में गर्भकाल के 7वें या 9वें महीने में बहू की गोदभराई की रस्म होती है. शीतल के वहां पहुंचने की प्रतीक्षा हो रही थी, इसलिए 9वें महीने में समारोह के आयोजन का विचार किया गया. जिन को बुलाना था उन को उन की  ईमेल आईडी पर निमंत्रण भेजा गया. उन लोगों ने अपनी उपस्थिति के लिए हां या न में लिखने के साथ यह भी लिखा कि वे कितने लोग आएंगे, साथ में अपना बजट लिख कर यह भी पूछा कि उपहार में क्या चाहिए. अमेरिका में अजन्मे बच्चे के लिंग के बारे में पहले से ही डाक्टर बता देते हैं, इसलिए उपहार भी उसी के अनुकूल दिए जाते हैं. उस को यह देख कर आश्चर्य हुआ कि अपने बच्चे के प्रयोग में आई हुई कीमती वस्तुओं को भी वहां के लोग उपहार में देने और लेने में तनिक भी संकोच नहीं करते. इस से समय और पैसे की बहुत बचत हो जाती है.

समारोह में जितने भी लोग आए थे, लगभग सभी भारतीय पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित हो कर आए थे और हिंदी में बात कर रहे थे. उन की जिज्ञासा को उस की बेटी ने यह कह कर शांत किया कि हमेशा मजबूरी में पाश्चात्य कपड़े पहन कर और अंगरेजी बोल कर सब ऊब जाते हैं, इसलिए समारोहों में ऐसा कर के अपने भारतीय होने के सुखद एहसास को वे खोना नहीं चाहते. उस ने सोचा कि यह कैसी विडंबना है कि भारत में भारतीय पाश्चात्य सभ्यता को अपना कर खुश होते हैं.

वहां पर सभी कार्य स्वयं करने होते हैं, इसलिए जितने भी मेहमान आए थे, सब ने मिलजुल कर सभी कार्य किए और कार्यक्रम समाप्त होने के बाद सब पूरे हौल को साफ कर के सारा कूड़ा तक कूड़ेदान में डाल कर आए. और तो और, बचा हुआ खा- पदार्थ भी जिन को जितना चाहिए था, सब ने मिल कर बांट लिया.

अंत में श्वेता के डिलीवरी का दिन भी आ गया. विनोद उस को डाक्टर को दिखाने के लिए अस्पताल ले कर गए तो वहां से उन का फोन आया कि उसे आज ही भरती करना पड़ेगा. सुन कर शीतल के मन में खुशी और चिंता के मिश्रित भाव उमड़ने लगे. अस्पताल गई तो बेटी को हलके दर्द में ही कराहते देख कर उस ने कहा, ‘‘बेटा, अभी से घबरा रही है, अभी तो बहुत दर्द सहना पड़ेगा.’’ उसे अपना समय याद आ गया था. आगे की तकलीफ कैसी झेलेगी, यह सोच कर उस का मन व्याकुल हो गया. इतने में डाक्टर विजिट पर आ गईं. उस ने शीतल का परिचय श्वेता से पाना चाहा तो उस के बताने पर मुसकरा कर ‘हैलो’ कह कर उस ने उस का स्वागत किया और बेटी व दामाद से आगे की प्रक्रिया के बारे में बातचीत करने लगी. उस के बाद डाक्टर ने श्वेता को एक इंजैक्शन दिया और सोने के लिए कह कर चली गई.

जब डाक्टर ने बेटी को सोने के लिए कहा तो उसे आश्चर्य हुआ कि दर्द में कोई कैसे सो सकता है? जिस का समाधान बेटी ने किया कि जो इंजैक्शन दिया है उस से दर्द का अनुभव नहीं होगा. उस के मन में जो दुश्चिंता थी कि कैसे वह अपनी बेटी को दर्द में तड़पते देख पाएगी, लुप्त हो चुकी थी और उस ने राहत की सांस ली. विज्ञान के नए आविष्कार को मन ही मन धन्यवाद दिया. बेटी ने कहा, ‘‘ममा, आप भी सो जाइए.’’ डाक्टर बारबार आ कर श्वेता को संभाल रही थी तो उस को वहां अपनी उपस्थिति का कोई औचित्य भी नहीं लगा, इसलिए वेटिंगरूम में जा कर सो गई. वहां की व्यवस्था से संतुष्ट होने और अपने थके होने के कारण शीतल तुरंत ही गहरी नींद में सो गई.

सुबह 5 बजे के लगभग विनोद ने उसे जगाया और कहा, ‘‘औपरेशन करना पड़ेगा, चलिए.’’ अपनी नींद को कोसती हुई औपरेशन के नाम से कुछ घबराई हुई बेटी के पास गई तो उस ने देखा कि वह औपरेशन थिएटर में जाने के लिए तैयार हो रही है. शीतल को देख कर वह मुसकराने लगी तो उस ने सोचा कि बेकार ही वह उस की हिम्मत पर शक कर रही थी. मन ही मन उस को अपनी बेटी पर गर्व हो रहा था.

औपरेशन थिएटर में विनोद भी श्वेता के साथ पूरे समय रहे. उन्होंने वहां सारी प्रक्रिया की फोटो भी खींची जो देख कर वह आश्चर्यचकित रह गई, जैसे कोई खेल हो रहा है. भारत में तो उस ने ऐसा कभी देखासुना भी नहीं था. वहां पर मां को प्रसव के लिए मानसिक रूप से इतना तैयार कर देते हैं कि परिवार वालों को चिंता करने की या उसे संभालने की आवश्यकता ही नहीं होती. आधे घंटे में ही दामाद बच्चे को गोद में ले कर बाहर आ गए. चांद सी बच्ची की नानी बन कर शीतल फूली नहीं समा रही थी. उस ने देखा बच्चे की दैनिक क्रियाकलापों को सुचारु रूप से करने की पूरी जानकारी नर्स दामाद को दे रही थी. उस की तो किसी भी कार्य में दखलंदाजी की आवश्यकता ही नहीं महसूस की जा रही थी. वह तो पूरा समय केवल मूकदर्शक बनी बैठी रही.

उस ने सोचा, तभी बेटी ने वीजा के साक्षात्कार के समय भूल कर भी बेटी की डिलीवरी के लिए जा रहे हैं, ऐसा न कहने के लिए समझाया था. उस ने चैन की सांस ली कि उस की यह चिंता भी कि कैसे वह मां और बच्चे को संभालेगी, उस को तो कुछ पता ही नहीं है, निरर्थक निकली. घर आ कर बेटी ने बच्चे को संभाल कर पूरी तरह साबित भी कर दिया.

वहां पर बच्चे को अस्पताल से ले जाने के लिए कारसीट का होना अति आवश्यक है, उस के बिना बच्चे को डिस्चार्ज ही नहीं करते. इसलिए उस की भी व्यवस्था कर के उसे नियमानुसार कार की पिछली सीट पर स्थापित किया गया. अस्पताल की साफसफाई और रखरखाव किसी फाइवस्टार होटल से कम नहीं था. डाक्टर और नर्स सभी कमरे में मुसकराते हुए प्रवेश करते थे और उस को ‘हैलो’ कहना नहीं भूलते थे, जो उस की उपस्थितिमात्र को महत्त्वपूर्ण बना देता था. जिस दिन डिस्चार्ज होना था, उस दिन उन सब ने श्वेता को काफी देर बैठ कर बच्चे से संबंधित बातें समझाईं. उस के लिए ये सारी प्रक्रिया किसी सपने से कम नहीं थी.

घर आने के बाद, भारत के विपरीत, मिलने आने वालों के असमय और बिना सूचित किए न आने से बच्चे के किसी भी कार्यकलाप में विघ्न नहीं पड़ता था. बच्चे के कमरे में भी बिना अनुमति के कोई प्रवेश नहीं करता था. बच्चे को दूर से ही देखने की कोशिश करते थे और गोद में उठाने से पहले हाथ अवश्य धोते थे, जिस से उस को किसी भी संक्रमण से बचाया जा सके. वह विस्मित सी सब देखती रहती थी. बेटी से पर्याप्त बातचीत करने का समय मिल जाता था.

बातों ही बातों में उस ने बताया कि वहां पर एकल मातृत्व के कारण और एक उम्र के बाद मांबाप और बच्चों के बीच में मानसिक, शारीरिक व आर्थिक जुड़ाव न होने के चलते अवसाद की समस्या भारत की तुलना में बहुत अधिक है. लेकिन अब वे बहुतकुछ भारतीय संस्कृति से प्रभावित हो कर उसे अपना रहे हैं. दूसरी ओर भारतीय उन की अच्छी बातों को न सीख कर, बुराइयों का अनुकरण कर के गर्त में जा रहे हैं. वहां दूसरी गंभीर समस्या मोटापे को ले कर है क्योंकि वहां अधिकतर डब्बाबंद खा- पदार्थों का अत्यधिक सेवन किया जाता है. इस का भी असर भारत की नई पीढ़ी में देखा जा सकता है.

अमेरिका में 6 महीने कब बीत गए, शीतल को पता ही नहीं चला. वहां के सुखद एहसासों और यादों के साथ भारत लौटने के बाद, एक कसक उस को हमेशा सालती रहती है कि यदि हर भारतीय वहां की बुरी बातों के स्थान पर अच्छी बातों को अपना ले और युवापीढ़ी को उन के बौद्धिक स्तर के अनुसार नौकरी व वेतन मिले तो कोई भी अपनों को छोड़ कर अमेरिका पलायन का विचार भी मन में न लाए.

आधी सी रेखा: फैंस के दिलों पर राज करने वाली अभिनेत्री की अधूरी प्रेम कहानी

रेखा भले ही बेमन से फिल्मी दुनिया में आई थीं, लेकिन जब उन्होंने अपनी ऐक्टिंग का जादू दिखाया तो वह दर्शकों के दिल में बस गईं. दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली इस हसीना का नाम कई अभिनेताओं के साथ जुड़ा, लेकिन बदकिस्मती से दिल का कोना खाली ही रह गया. इस गम को दबा कर हमेशा मुसकान बिखेरने वाली यही है आधीअधूरी रेखा, जो…

निर्देशक और अपने दौर के नामी व कामयाब लेखक एस. अली राजा की साल 1974 में प्रदर्शित फिल्म ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ हालांकि एक चलताऊ मसाला फिल्म थी, लेकिन यह फिल्म बौक्स औफिस पर जबरदस्त हिट रही थी. इस फिल्म में वह सब कुछ था, जो किसी भी फिल्म को हिट करवाने के लिए जरूरी होता है. मसलन रहस्य, रोमांच, प्यार, सैक्स, मारधाड़, डाकू, तवायफ, पुलिस और ठाकुर साहब वगैरह. लेकिन हकीकत में यह चली अभिनेत्री रेखा की वजह से थी, जिन्होंने 70 के दशक के चलन को धता बताते हुए एक निहायत ही उत्तेजक दृश्य दिया था.

इस सीन को देखने के लिए उस दौर के बड़ेबूढ़े तो बड़ेबूढ़े, स्कूली बच्चे और कालेज के छात्र तक पगला उठे थे. जिन्होंने ‘प्राण जाए पर…’ को दसियों बार देखा था और हर बार लाइन में लग कर टिकट लिया था. तब नीचे का टिकट महज 35 पैसे का आता था, लेकिन यह रकम भी उस दौर में कम नहीं होती थी.

कम इस लिहाज से कही जा सकती है कि वे तालाब से नहा कर निकलती गदराई ऐक्ट्रैस रेखा को एकदम नग्न देख पा रहे थे. जिन्होंने यह फिल्म देखी होगी, वे अब बूढ़े हो गए हैं लेकिन शायद ही याद्दाश्त जाने तक वे तालाब से नहा कर निकलती रेखा का नग्न बदन भूल पाए होंगे.

‘प्राण जाए पर…’ के एक और आकर्षण नायक सुनील दत्त थे, जो तब तक 1957 की ‘मदर इंडिया’ के बाद से कोई दरजन भर हिट फिल्में दे चुके थे. इस के पहले दर्शकों ने रेखा को उन की पहली फिल्म ‘सावन भादों’ में भी देखा और सराहा था, जो एक देहाती अल्हड़ लड़की चंदा की भूमिका में थीं, लेकिन तब फिल्मी पंडितों ने रेखा के चलने में शक जताया था, क्योंकि वे सांवली थीं, मोटी भी थीं और उन का चेहरामोहरा तब लगने वालों को हिंदी फिल्मों जैसा नहीं लगा था.

रेखा ने एकएक कर सारी आशंकाएं न केवल ध्वस्त कर दीं, बल्कि अपनी जबरदस्त अभिनय प्रतिभा का ऐसा लोहा मनवाया कि आज भी उन की कई फिल्मों की मिसाल दी जाती है. साल 1970 में प्रदर्शित उन की पहली फिल्म ‘सावन भादों’ का हिट होना किसी अजूबे से कम नहीं था, क्योंकि इस में अधिकांश कलाकार चाहे फिर वे इफ्तिखार जैसे मंझे और सधे चरित्र अभिनेता ही क्यों न हों, अनजाने से थे.

रेखा के साथ साथ खुद नवीन निश्चल की भी यह पहली फिल्म थी, लेकिन दर्शकों ने हाथोंहाथ लिया. बाद में नवीन यदाकदा ही सफल हुए, पर रेखा ने फिर कभी मुड़ कर नहीं देखा. कुछ दिनों बाद एक्टिंग के साथ साथ लोग उन की सुंदरता के भी कायल हो गए, जो आज तक हैं.

त्रासद बचपन

रेखा के नाम का सिक्का चल निकला तो लोग उन की व्यक्तिगत जिंदगी टटोलने उधेड़ने लगे, जो उन के सेलिब्रेटी और कामयाब होने की एक और निशानी थी. जब धीरेधीरे कर उन की जिंदगी की कहानी उजागर होने लगी तो लोगों की दिलचस्पी उन में और बढ़ने लगी. क्योंकि अब तक उन के इश्क के किस्से भी मीडिया और महफिल में चटखारे लेले कर कहे और सुने जाने लगे थे. 70 के दशक में प्रिंट मीडिया ही हुआ करता था. रेखा खासतौर से अखबारों और मैगजींस की जरूरत बन गई थीं.

दरअसल, रेखा उन बदकिस्मत करार दे दी गईं अभिनेत्रियों में से एक हैं, जिन का बचपन आम बच्चों सरीखा नहीं था. हालांकि उन के पिता जेमिनी गणेशन दक्षिण भारतीय फिल्मों का बड़ा नाम थे. लेकिन उन्होंने कभी रेखा को अपना नाम और प्यार नहीं दिया.

मां पुष्पवल्ली छोटीमोटी ऐक्ट्रैस थीं, जिन की पटरी कभी पति से बैठी नहीं. रेखा के जन्म के बाद तो दोनों के बीच इतनी कड़वाहट आ गई कि दोनों अलग हो गए. इन दोनों ने विधिवत शादी की भी थी या नहीं, यह रहस्य अभी तक रहस्य ही है.

रेखा जो उस वक्त भानुरेखा गणेशन थीं, मां के हिस्से में आईं. पुष्पवल्ली की माली हालत ठीक नहीं थी, इसलिए पैसा कमाने की गरज से उन्होंने 13 साल की इकलौती बेटी को फिल्मों में ढकेल दिया.

ढकेलना शब्द इसलिए भी सटीक बैठता है, क्योंकि रेखा फिल्मों में काम नहीं करना चाहती थीं. वह बचपन में मोटी भी थीं और काली या सांवली भी, जैसी कि आमतौर पर दक्षिण भारतीय लड़कियां होती हैं. लेकिन इस में कोई शक नहीं कि इस हालत में भी वे आकर्षक लगती थीं. उन में एक अपील थी, जो हिंदी फिल्मों में आने के बाद और निखरती गई.

प्यार के अधूरे किस्से

9वीं क्लास से ही रेखा को पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी थी. जब वे मां के साथ चेन्नई से मुंबई आईं तब अभाव और संघर्ष भी जरूरी घरेलू सामान की तरह उन के साथ लदे थे. लगता नहीं कि तब ही रेखा को यह एहसास हो गया होगा कि उन की जिंदगी में उन का अपना कुछ नहीं है. वे एक अधूरेपन के साथ पैदा हुई थीं, जो अब तक साए की तरह उन के साथ है.

अच्छी इकलौती बात यही है कि उन्होंने इस अधूरेपन से समझौता कर लिया है और इस के साथ जीने की आदत भी डाल ली है, वह भी मुसकराते हुए. मानो यही उन की जिंदगी भर की जमापूंजी है. अब 69 की उम्र में उन के चेहरे की रौनक देखते लगता नहीं कि उन्हें कोई गिलाशिकवा किसी से है और है भी तो वह उन के दिल के बेसमेंट के भी नीचे कहीं दफन है.

रेखा के प्यार के किस्से सच्चेझूठे जैसे भी हों, आज भी चर्चा में रहते हैं. ‘सावन भादों’ के रिलीज होने के तुरंत बाद ही फिल्म इंडस्ट्री में यह हवा फैल गई थी कि वे और नवीन निश्चल एकदूसरे से प्यार करते हैं. सत्तर के दशक का यह रिवाज था कि जो जोड़ी हिट हो जाती थी, उस पर प्यार का ठप्पा झट से लग जाता था. पहली फिल्म हिट हो जाना एक तरफ वरदान होता है तो किसी श्राप से भी कम नहीं होता.

नवीन निश्चल को शायद रेखा से इश्क के चर्चों से कुछ हासिल नहीं हो रहा था. दूसरे उन्हें अपने भविष्य के राजकपूर या दिलीप कुमार हो जाने का भी गुमान था, लिहाजा उन्होंने रेखा से जल्द कन्नी काट ली.

मुंबई में रेखा का पहला अनुभव ही बहुत कड़वा था. ‘सावन भादों’ भले ही उन की पहली प्रदर्शित फिल्म थी, लेकिन उन की साइन की गई पहली हिंदी फिल्म ‘अनजाना सफर’ थी, जिस में उन के अपोजिट विश्वजीत चटर्जी थे. इस फिल्म की शूटिंग महबूब स्टूडियो में हुई थी.

एक दृश्य में विश्वजीत को रेखा का चुंबन लेना था. रेखा तब महज 15 साल की थीं और इस दृश्य को फिल्माने में उन के साथ जो हुआ, उस के लिए वे बिलकुल भी तैयार नहीं थीं.

कमसिन रेखा को सेट पर देखते ही उम्र में उन से 25 साल बड़े विश्वजीत सुधबुध खो बैठे थे. उन्होंने जानबूझ कर एक के बाद एक वहशियों की तरह दरजन भर जबरिया चुंबन रेखा के होंठों के ले डाले, जिस से रेखा न केवल सहम गई थीं बल्कि डर कर रोने भी लगी थीं.

यह फिल्म ‘दो शिकारी’ नाम से 1979 में रिलीज हुई और बौक्स औफिस पर ज्यादा चली नहीं थी. जबकि तब तक रेखा कई हिट फिल्में दे चुकी थीं और किसी फिल्म में उन का होना ही उस की सफलता की गारंटी माना जाता था.

इस हादसे से जैसेतैसे उबरी रेखा का नाम नवीन निश्चल के बाद अभिनेता विनोद मेहरा से तेजी और इतनी शिद्दत से जुड़ा था कि उन्हें पतिपत्नी मान लिया गया था. विनोद मेहरा के साथ रेखा की मानिक चटर्जी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘घर’ काफी सफल रही थी, जिस में रेखा ने बलात्कार पीडि़ता गृहिणी के रोल में जान डाल दी थी.

रेखा ने जमाई धाक

इस फिल्म के गाने ‘तेरे बिन जिया जाए न…’, ‘आप की आखों में कुछ…’ और ‘आजकल पांव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे…’ आज भी खूब गुनगुनाए जाते हैं. रेखा और विनोद मेहरा की कथित शादी भी बड़ी रहस्यमय थी, जिस के बारे में साल 2004 में सिम्मी ग्रेवाल के एक शो में रेखा ने खंडन किया था कि उन्होंने विनोद मेहरा से कभी शादी नहीं की.

70 के दशक में फिल्म इंडस्ट्री जितनी बदली, उतनी पहले कभी नहीं बदली थी. अभिनेत्रियों के लिहाज से भी यह पीढ़ी परिवर्तन का दौर था. मधुबाला, नरगिस और मीना कुमारी जैसी प्रतिभावान अभिनेत्रियों का दौर गुजर चुका था, जिन की जगह हेमा मालिनी, जया बच्चन मुमताज और रेखा लेती जा रही थीं.

साल 1976 से इंडस्ट्री में अमिताभ बच्चन और रेखा के इश्क के चर्चे होने लगे, जिस की शुरुआत ‘दो अनजाने’ फिल्म से हुई थी. इस के बाद इस जोड़ी ने एक के बाद एक सुपरहिट फिल्में दीं, जिन में ‘आलाप’, ‘खून पसीना’, ‘गंगा की सौगंध’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘मिस्टर नटवर लाल’, ‘सुहाग’, ‘राम बलराम’ और ‘सिलसिला’ उल्लेखनीय हैं.

अमिताभ उन दिनों टौप पर थे तो रेखा भी उन्नीस नहीं थीं, जिन्होंने कौमेडी के साथसाथ समांतर सिनेमा वाली ‘उत्सव’, ‘कलयुग’, ‘विजेता’ और ‘उमराव जान’ जैसी फिल्मों के जरिए अपनी एक्टिंग की धाक जमा ली थी.

अमिताभ रेखा की जोड़ी को गोल्डन जोड़ी कहा जाने लगा था. इन के इश्क में हकीकत का तड़का ‘मुकद्दर का सिकंदर’ फिल्म से लगा था, जिस में रेखा तवायफ जोहरा बाई की भूमिका में थीं. यूं तो प्रकाश मेहरा की इस फिल्म के सारे फ्रेम कसे हुए थे, पर वह फ्रेम ऊपर और नीचे दोनों तबकों के दिलोदिमाग में गहरे तक बैठ गया था, जिस में रेखा कहती हैं कि जोहरा अब नाचेगी तो सिर्फ सिकंदर के लिए.

यह सिलसिला साल 1981 में प्रदर्शित यश चोपड़ा की ‘सिलसिला’ फिल्म तक चला था, जो एक खास मकसद से बनाई गई थी. आप इसे प्रतीकात्मक तौर पर दोनों की बायोपिक भी कह सकते हैं.

परिपक्व प्रेम त्रिकोण पर बनी ‘सिलसिला’ में रेखा के सामने जया थीं या जया के सामने रेखा थीं, यह तय कर पाना बेहद मुश्किल भरा काम है. आज तक कोई विश्लेषक यह तय नहीं कर पाया कि किस ने अच्छी एक्टिंग की थी. पत्नी की भूमिका में जया ने या फिर प्रेमिका बनी रेखा ने जो रियल लाइफ में भी क्रमश: अमिताभ की पत्नी और प्रेमिका थीं.

जो भी हो, तब यह फिल्म अमिताभ बच्चन के करिअर की डूबती नैया पार लगाने के लिए बेहद जरूरी हो गई थी, जिस में अपने दौर की 2 धाकड़ नायिकाएं एक तरह से वास्तविक जिंदगी को परदे पर साकार कर रही थीं.

हकीकत में भी रेखा कभी अमिताभ को जया से छीन नहीं पाईं और शायद इस का ज्यादा मलाल भी उन्हें अब न होता हो, लेकिन तब अमिताभ से ध्यान बंटाने के लिए उन्होंने कामयाब बिजनैसमैन मुकेश अग्रवाल से शादी कर ली थी, जिस का हश्र फिल्मों सरीखा ही हुआ.

शादी के 6 महीने बाद ही मुकेश ने आत्महत्या कर ली थी, जिस का जिम्मेदार रेखा को ही ठहराया गया था.

सभी को दी टक्कर

अकेले जया बच्चन को ही नहीं, बल्कि रेखा ने ड्रीम गर्ल के खिताब से नवाजी गई हेमा मालिनी को भी कड़ी चुनौती दी थी, जिन के साथ 2 ही फिल्मों में काम किया, पहली थी 1972 में आई ‘गोरा और काला’ जिस में जुबली कुमार यानी राजेंद्र कुमार डबल रोल में थे. यह फिल्म सुपरहिट रही थी और 1975 में प्रदर्शित ‘धर्मात्मा’ ने भी तगड़ा बिजनैस किया था.

दोनों ही फिल्मों में हेमा और रेखा का आमनासामना न के बराबर हुआ था, लेकिन जितना भी हुआ उस में रेखा भारी पड़ी थीं.

अपनी समकालीन अभिनेत्रियों पर रेखा हमेशा हावी नजर आईं तो इस की वजह उन की अकड़, ठसक या स्टारडम नहीं, बल्कि एक्टिंग ही थी. निर्देशक रमेश तलवार की 1981 में आई फिल्म ‘बसेरा’ एक ऐसी ही पारिवारिक फिल्म थी, जिस में रेखा को अपनी पागल हो गई बड़ी बहिन राखी के पति शशि कपूर से शादी करनी पड़ती है.

इस फिल्म में रेखा ने बहुत ही सटीक और जमीनी एक्टिंग कर दर्शकों और समीक्षकों का दिल जीत लिया था. इस किरदार में एक्टिंग की गुंजाइश बहुत ज्यादा नहीं थी, लेकिन रेखा ने जताया था कि गुंजाइश होती नहीं बल्कि पैदा की जाती है.

1981 में ही प्रदर्शित एक और फिल्म ‘एक ही भूल’ में उन्होंने शबाना आजमी को जरा भी स्पेस नहीं दिया था. हालांकि इस फिल्म के हीरो जितेंद्र के साथ उन की जोड़ी जमने लगी थी. इन दोनों की फिल्मों का अपना एक अलग ही फ्लेवर होता था.

ऐसी ही एक फिल्म ‘मांग भरो सजना’ में रेखा के सामने मौसमी चटर्जी थीं, जिस के भावुक दृश्यों में रेखा ज्यादा प्रभावी साबित हुई थीं. शुद्ध व्यावसायिक मसाला फिल्म ‘राम बलराम’ में जीनत अमान रेखा के सामने ज्यादा टिक नहीं पाई थीं.

इन फिल्मों ने चौंकाया भी

180 के लगभग फिल्मों में अभिनय कर चुकीं रेखा ने अपने सुनहरे दिनों में कुछ ऐसी भी फिल्मों में काम किया, जिन से दर्शक चौंके भी थे. मसलन मीरा नायर की 1996 में आई ‘कामसूत्र’ और बासु भट्टाचार्य निर्देशित फिल्म ‘आस्था’, जिस में नायक ओम पुरी थे. इन फिल्मों में हालांकि सैक्स और सहवास दृश्यों की भरमार थी, लेकिन उन में एक मैसेज भी था. पर रेखा 90 के दशक तक इतना नाम कमा चुकी थीं कि दर्शकों और उन के प्रशंसकों ने उन्हें इन भूमिकाओं में खारिज कर दिया था.

इस के पहले ‘कलयुग’, ‘विजेता’ और ‘उत्सव’ जैसी कला फिल्मों में उन्होंने अपनी एक्टिंग की गहरी छाप छोड़ी थी. श्याम बेनेगल की 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘कलयुग’ में तो उन्हें एक चुनौतीपूर्ण भूमिका मिली थी. आज महाभारत होता तो कैसा होता, यह इस फिल्म में व्यापारिक घरानों की लड़ाई के जरिए बताया गया था.

फिल्म में शशि कपूर, अमरीश पुरी, अनंत नाग, ओम पुरी, राज बब्बर, कुलभूषण खरबंदा, सुषमा श्रेष्ठ, सुप्रिया पाठक और विक्टर बनर्जी जैसे मंझे हुए कलाकारों के सामने द्रौपदी के शेड वाली रेखा ने अपनी चमक बरकरार रखी थी. इस फिल्म को तब मास्को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में दिखाया गया था और इसे फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला था.

गिरीश कर्नाड की ‘उत्सव’ फिल्म में वसंत सेना के रोल में भी रेखा ने चौंकाया था, क्योंकि यह फिल्म भी वात्स्यानन के कामसूत्र पर आधारित थी, जिस में सहवास दृश्यों की भरमार थी. रेखा ने उन्मुक्त लेकिन सहज ढंग से इन दृश्यों में अभिनय किया था.

मुमकिन है उन की मंशा यह दिखाने की रही हो कि वे सभी शेड्स में एक्टिंग कर सकती हैं और दूसरी समकालीन सफल अभिनेत्रियों सरीखी पूर्वाग्रही और कुंठित नही हैं, जो इमेज के चलते ऐसे रोल करने में हिचकिचाती हैं.

रेखा होने के मायने

रेखा की जिंदगी देख कर कहा जा सकता है कि जो उन्होंने चाहा वह उन्हें कभी नहीं मिला. अपने दौर के मशहूर शायर निदा फाजली की यह गजल उन पर फिट बैठती है ‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता…’ लेकिन बहैसियत एक ऐक्ट्रैस रेखा को जो प्यार और प्रशंसा मिली, वह भी हर किसी को नहीं मिलती. उन्होंने जो भी हासिल किया, अपने दम पर किया. उन का कोई गौडफादर नहीं था. यह सहज ही साबित हो गया कि अभिनय उन के खून में है और वे बनी ही एक्टिंग के लिए हैं.

तीन दशक तक उन्होंने जम कर शानदार एक्टिंग की. सेट पर खूब मौजमस्ती की. भीतर से रोते हुए मुसकराती रहीं. वह कोई साधारण औरत नहीं कर सकती. रेखा ने जताया कि कोई भी औरत बदसूरत नहीं होती, बशर्ते वह सलीके से रहे और अपनी सेहत और फिटनेस पर ध्यान देती रहे.

एक वक्त में अभिनेता शशि कपूर ने उन्हें बदसूरत और मोटी कह कर बेइज्जत किया था, लेकिन बाद में वही शशि कपूर अपनी फिल्मों में उन्हें लेने के लिए मोहताज रहने लगे थे और यही रेखा होने के अपने अलग माने हैं.

जिस पूर्णता की तलाश में रेखा जिंदगी भर भटकती रहीं और उसे प्यार में ढूंढती रहीं, वह रेगिस्तान के पानी की तरह होता है, जो होता नहीं है बस उस के होने का भ्रम भर होता है.

8 Summer Hair Care Tips: गरमी के मौसम में ऐसे करें बालों की देखभाल

बढ़ती गरमी के साथ जब नमी हाथ मिलाती है तो उस का असर बालों पर सब से पहले दिखाई पड़ता है. कभी रेशमी नजर आने वाले बाल उमस भरी गरमी में शैंपू करने के बाद एक दिन में ही चिपचिपे और तैलीय हो जाते हैं जिस के चलते जहां पहले हफ्ते में 2-3 बार शैंपू से काम चल जाता था वहां अब रोजाना शैंपू की जरूरत पड़ने लगती है. मगर रोजाना शैंपू का इस्तेमाल बालों को कमजोर और ड्राई कर सकता है.

आप को शैंपू का इस्तेमाल कैसे और कब करना चाहिए यह जानकारी आप के लिए बेहद अहम साबित होगी ताकि समर की हीट हो या उमस आप के बाल हैल्दी और खूबसूरत बने रहें.

  1. पसीना और प्रदूषण होता है खतरनाक

आजकल के भागदौड़ वाले लाइफस्टाइल में बालों का ?ाड़ना, ड्राई हेयर, उल?ो बाल, डैंड्रफ, दोमुंहे बालों की प्रौब्लम आम बात हो गई है. गरमी के मौसम में स्कैल्प ज्यादा तेल छोड़ती है जिसे से पसीना, प्रदूषण और स्कैल्प पर मैल जमा होने से बाल बहुत जल्दी चिपचिपे और गंदे नजर आने लगते हैं. पसीने के साथ स्कैल्प पर निकला नमक बालों की सेहत के लिए नुकसानदेह साबित होता है. यह बालों की जड़ों को कमजोर करता है, जिस से हेयरफौल की समस्या पैदा होती है.

साथ ही गरमियों में बालों से आने वाली गंदी बदबू से अकसर महिलाएं व पुरुष दोचार होते हैं. दरअसल, हमारी स्कैल्प पर आया पसीना और गरमी का मौसम दोनों फंगस और बैक्टीरिया पैदा होने के लिए बेहतरीन वातारवरण प्रदान करते हैं जिस से बालों में से अजीब सी दुर्गंध आने लगती है. इन सभी समस्याओं का इलाज बालों की अच्छी तरह साफसफाई करने और देखभाल से ही संभव है.

2. शैंपू करने का सही तरीका

हो सकता है कि आप शैंपू करती हों, लेकिन वह स्कैल्प से तेल को न हटा पाता हो. इस के लिए जरूरी है कि आप शैंपू करते वक्त जल्दबाजी न करें. इस के साथ ही शैंपू में झाग बनाने के लिए सर्क्यूलर मोशन का उपयोग करने से बाल एकदूसरे से रगड़ खा कर कमजोर हो जाते हैं. ऐसे में बालों के उलझ कर टूटने की समस्या भी देखने को मिलती है. इसलिए झाग बनाने के लिए साइडटूसाइड मोशन का उपयोग करें.

इस तरीके से हेयर स्ट्रैंड्स को नुकसान नहीं पहुंचता. इस के साथ ही शैंपू के वक्त स्कैल्प पर उंगलियों का हलका दबाव ही इस्तेमाल करें. शैंपू को सिर पर सीधे लगाने से पहले बालों को  अच्छी तरह गीला करें और शैंपू को भी सीधे सिर में डालने के बजाय थोड़े से पानी में घोल लें. इस से शैंपू अच्छी तरह बालों की सफाई भी करेगा और उस से बालों को नुकसान भी नहीं होगा.

3. हेयर टाइप के अनुसार चुनें शैंपू

ड्राई स्कैल्प और बालों के लिए आप सल्फेट फ्री शैंपू का औप्शन चुन सकती हैं. दरअसल, सल्फेट से स्कैल्प ड्राई होती है और वहीं स्कैल्प को साफ करने के लिए आप माइल्ड फौर्मूले का यूज कर सकती हैं. गरमियों में डैड सैल्स, हेयर स्टाइलिंग प्रोडक्ट्स और डैंड्रफ से छुटकारा पाने के लिए हमेशा क्लैरिफाइंग शैंपू का इस्तेमाल करें. अगर स्कैल्प बहुत ज्यादा औयली रहती है तो सल्फेट शैंपू इस्तेमाल करने की आवश्यकता है.

4. बाल धोने के लिए उपयोग करें ठंडा पानी

बालों को धोने के लिए ठंडे पानी से बेहतर कुछ भी नहीं. यह हेयर क्यूटिकल्स को बंद कर देता है और बालों को शाइनी टैक्स्चर देता है. यह स्कैल्प को बिना ड्राई किए नैचुरल औयल को बरकरार रखता है, साथ ही बालों को मजबूत बना कर उन्हें टूटने से भी रोकता है.

5. स्कैल्प नहीं बालों के लिए बना है कंडीशनर

स्कैल्प पर कंडीशनर का इस्तेमाल करने से बालों के औयली होने की समस्या लगातार बनी रहती है. इसलिए कंडीनशर का इस्तेमाल सिर्फ बालों की लंबाई में ही करें. कंडीशनर लगाने के बाद बालों को धोने के लिए ठंडे पानी का ही इस्तेमाल करें.

6. बेजान बालों में जान डाल देगा ऐप्पल साइडर विनेगर

स्कैल्प में तेल स्राव को कम करने के लिए सैलिसिलिक ऐसिड या ग्लाइकोलिक ऐसिड शैंपू का उपयोग करने की सलाह दी जाती है. ऐप्पल साइडर विनेगर बालों के पीएच लैवल को संतुलित करने के साथसाथ किसी भी बिल्डअप को गहराई से साफ करने के लिए अच्छा काम करता है. शैंपू से बाल धोने के बाद थोड़े से पानी में एक टेबलस्पून ऐप्पल साइडर विनेगर डाल कर उस से बालों को धो लें. इस से बालों में पसीने की बदबू से भी लंबे वक्त तक छुटकारा मिलेगा.

7. हीट स्टाइलिंग टूल्स का इस्तेमाल

गरमियों में हीट स्टाइलिंग टूल्स का इस्तेमाल जितना हो सके उतना कम करें. यह आप के हेयर हैल्थ के लिए बेहतर होता है. दरअसल, गरमियों में बारबार स्टाइलिंग टूल्स के इस्तेमाल से बाल कमजोर और जल्दी दोमुंहे हो जाते हैं, जिस से हेयर ग्रोथ प्रभावित होती है. ड्रायर का अधिक इस्तेमाल भी बालों को बेजान बना देता है. हेयर ड्रायर के इस्तेमाल के बजाय बालों को प्राकृतिक तरीके से सूखने दें. इस से बाल जल्दी औयली नहीं होंगे.

8. गरमियों में ट्राई करें हेयर मास्क

गरमियों में बालों को डीप कंडीशनिंग के साथसाथ बेहतर मौइस्चराइजिंग की आवश्यकता होती है. बालों की सेहत को दुरुस्त करने के लिए हेयर मास्क मददगार साबित होते हैं. 15 दिन में एक बार हेयर मास्क का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए, फिर बाल चाहे किसी भी हेयर टाइप के क्यों न हों.

हेयर मास्क के लिए एक बाउल में 1 चम्मच जैतून का तेल लें और उस में आधा केला मैश कर लें. अब इस में 1/4 कप दही मिक्स करें. इन सब को अच्छी तरह मिला कर बालों में लगा कर 20 मिनट लगा रहने दें. फिर बालों को धो लें.

-सोनिया राणा

क्या आपको पता है इन 10 नूडल्स के बारे में

‘‘टू मिनट नूडल्स,’’ यानी मैगी से तो सब वाकिफ हैं, पर क्या आप को पता है की दुनियाभर में कितनी तरह के नूडल्स खाए जाते हैं? जी हां, ढेरों तरह के.

कोई झक सफेद, तो कोई पतली सुतली जैसे या फिर कोई चौड़े रिबन जैसे बने होते हैं. कुछ आटे से बने होते हैं तो कुछ चावल, मैदे, आलू, अंडे, शकरकंद या कुट्टू से. और भी तरहतरह के नूडल्स मार्केट में उपलब्ध हैं. आकार, रंग में भिन्न ये नूडल्स बनाए भी कई तरीके से जाते हैं और नाम भी अलगअलग होते हैं.

बच्चे तो इन्हें चाव से खाते ही हैं, बड़े भी खूब पसंद करते हैं. बनाने में भी आसान और स्वाद भी भरपूर. मनचाही सब्जियों को मिला कर इन्हें पौष्टिक भी बनाया जा सकता है.

आज ऐसे ही कुछ नूडल्स के बारे में जानते हैं जो चीन की सीमा को लांघ कर कई अन्य देशों में भी उतने ही लोकप्रिय बन गए हैं.

  1. यूनान राइस नूडल्स

यों तो चावल के नूडल्स कई आकर के मिलते हैं, लेकिन गोल और सामान्य स्पैगेटी की तरह के नूडल्स सब से ज्यादा लोकप्रिय हैं जिन्हें यूनान नूडल्स या मी जिआन भी कहते हैं. दक्षिणी पश्चिमी चीन के यूनान प्रोविंस से लोकप्रिय हुए ये नूडल्स अकसर ग्लूटेन फ्री चावल और पानी के मिश्रण से बनाए जाते हैं. कई तरह की डिशेज बनाई जाती हैं जिन में सब से ज्यादा लोकप्रिय ‘क्रौसिंग द ब्रिज राइस नूडल्स’ है. चिकन, पोर्क एवं मसाले खासकर स्टार ऐनीज और अदरक के साथ बनाए गए सूप के साथ तैयार नूडल्स को परोसा जाता है.

  1. मी फेन या राइस सेंवइयां

पतले नूडल्स जो भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका में आम मिलते हैं, चीनी में इन्हें मी फेन और थाई में सन मी कहते हैं. दक्षिणी चीन से आए ये नूडल्स बहुत ही पतले, भंगुर और उजले होते हैं. इन्हें पकाना बहुत ही आसान होता है. 10 मिनट तक गरम पानी में डुबो कर रखना पर्याप्त है. पानी निकाल कर चाहें तो ब्राथ में डाल लीजिए अथवा तवे पर सब्जियों के साथ हलका फ्राई कर लीजिए. बहुत ही फ्लेवरफुल और कम तैलीय होने की वजह से ये लोगों में बहुत ही लोकप्रिय हैं. फिलीपींस के प्रसिद्ध व्यंजन ‘पंसित’ भी राइस नूडल्स, सब्जियां, चिकन, श्रिंप, सोया सौस आदि के साथ टौस कर बनाए जाता हैं. ‘पैड थाई’ बनाने में भी इसी तरह के नूडल्स प्रयोग किए जाते हैं.

  1. हे फन

ये मोटे और चपटे नूडल्स हैं जिन्हें थाई में सन यई कहा जाता है. माना जाता है कि ये सर्वप्रथम दक्षिणी चीन के ग्वांग?ाउ प्रांत में बने थे. कैंटोनीज डिश ‘चाउ फन’ में ये नूडल्स मीट अथवा वैजिटेबल्स के साथ ड्राई फ्राई किए जाते हैं या फिर इन्हें गाढ़ी और स्टार्ची सौस के साथ पका लिया जाता है. चावल के आटे और पानी से बने नूडल्स अमूमन लंबी स्ट्रिप्स या शीट्स के रूप में मार्केट में मिलते हैं जिन्हें मनचाहे आकार में काट कर काम में लाया जा सकता है.

यीन जेन फन या सिल्वर नीडल नूडल्स एकदम सफेद और बहुत ही छोटे आकार के होते हैं. महज 5 सीएम लंबे और 5 एमएम व्यास के. इन नूडल्स के दोनों सिरे नुकीले होते हैं. मलयेशिया और सिंगापुर में इन्हें रत नूडल्स के नाम से भी जाना जाता है. राइस और पानी के मिश्रण को महीन छलनी के माध्यम से सीधे उबलते हुए पानी में डाल कर बनाया जाता है. इन्हें टूटने से बचाने के लिए बनाने वक्त कौर्न स्टार्च भी मिलाया जाता है.

  1. लामिआन या हैंड पुल्ड नूडल्स

हाथ से खींच कर लंबे किए गए चीनी नूड्ल्स. गेहूं के आटे, नमक, पानी से बनाए जाने वाले इन नूडल्स में कभीकभी लचीलापन देने के लिए अल्कलाइन भी मिलाए जाते हैं. पकने के बाद ये बहुत मुलायम, चिकने होते हैं और ये हमेशा ताजे ही परोसे जाते हैं. उत्तर पश्चिमी चीन के प्रसिद्ध व्यंजन ‘डानडान नूडल्स’ में यही नूडल्स उपयोग में लाए जाते हैं.

  1. फन जी या ग्लास नूडल्स

बहुत ही पतले, लंबे और लगभग पारदर्शी इन नूडल्स के रंगों में भिन्नता, इन्हें बनाने में प्रयुक्त स्टार्च सामग्री पर निर्भर करती है. मूंग बींस, आलू, शकरकंद अथवा सागूदाने के हिसाब से ये या तो सफेद, हलके स्लेटी या फिर भूरे रंग के हो सकते हैं. इन्हें या तो 3 से 5 मिनट के लिए उबाल कर या फिर गरम पानी में कुछ देर तक भिगोने के बाद प्रयोग में लाया जा सकता है.

  1. मीसुआ

चीन के फुजिआन राज्य के पतले नमकीन और सब से लंबे नूडल्स. गीले आटे को 30 मीटर तक खींच कर इन नूडल्स को बनाया जाता है. चीन में जन्मदिन की पार्टियों में यही नूडल्स सर्व किए जाते हैं. चीनी मान्यताओं के हिसाब से इन नूडल्स को लंबी उम्र से जोड़ कर देखा जाता है. इन नूडल्स को सूप के साथ सर्व कर सकते हैं या फिर कम आंच पर सब्जियों के साथ टौस कर भी तैयार किया जाता है.

  1. चाउमिन

चाउमिन के तो हम सब दीवाने हैं. चाउमिन का शाब्दिक अर्थ है फ्राइड नूडल्स. आकर में पतले और क्रिस्पी नूडल्स सब से पहले ग्वांगडोंग चीन में बने थे. इन्हें बनाने से पहले उबालना जरूरी होता है. इन की मोटाई के हिसाब से 2 से 6 मिनट तक. इन्हें ठंडे पानी से धो कर और पानी निकाल कर मनचाही  सब्जियों, अंडों अथवा मांस के साथ टौस कर तैयार किया जाता है.

  1. वानटोन नूडल्स

पतले आकार के ये नूडल्स अंडे, पानी और लाइ वाटर (सोडियम या पोटैशियम हाईड्राक्साइड का घोल) से बनाया जाता है. इन्हें इन के आकार और रंग की वजह से एंजेल हेयर पास्ता भी कहते हैं. दक्षिणी चीन और हौंगकौंग में बने इन नूडल्स को थोड़ी देर तक गरम पानी में उबाल कर ठंडे पानी के नीचे रखा जाता है. कैंटोनी डिश ‘श्रिंप वानटोन’ लोगों को बहुत भाती है.

  1. नाइफ कट नूडल्स

इस तरह के नूडल्स की स्ट्रैंड हर दूसरे स्ट्रैंड से आकार, लंबाई में भिन्न होती  है. गौरतलब है कि काफी अभ्यास के बाद ही कोई शैफ इन नूडल्स को बनाने में महारत हासिल करता है. अन्य नूडल्स के मुकाबले ये नूडल्स मोटे होते हैं और नूडल्स के दोनों किनारे भी खुरदरे होते हैं.

  1. लामिआन

मुलायम, सिल्की और चाउमिन से थोड़े मोटे इन एग नूडल्स को बनाने का तरीका अलग होता है. इस का शाब्दिक अर्थ है टास्ड नूडल्स. इन्हें उबालना पड़ता है फिर बहुत ही कम सौस, पकी हुई सब्जियों, मांस के साथ टौस कर लिया जाता है.

-चेतना वर्धन           

शार्क टैंक की नमिता थापर जूझ रही हैं IVF से, जानिए ये कैसे करता है काम

‘शार्क टैंक इंडिया’ का दूसरा सीजन भी पहले सीजन की तरह बहुत प्रचलित हो रहा है. इस शो में नए उद्यमी यानी इंटरप्रेन्योर पार्टिसिपेट करते हैं और अपने बिजनेस आइडियाज को इस शो के जजेज के सामने बताते हैं ताकि वो उनके बिजनेस में निवेश करें. यह शो के जजेज न केवल सक्सेसफुल और अमीर हैं, बल्कि उनका जीवन अन्य लोगों को प्रेरित भी करता है. समय- समय पर शो में यह जजेज अपने निजी जीवन के बारे में बताते हैं. हाल ही में इसकी एक जज नमिता थापर ने अपनी  IVF जर्नी के बारे में बताया था. आईये जानें नमिता थापर की IVF जर्नी के बारे में और पाएं जानकारी IVF के बारे में.

नमिता थापर की IVF जर्नी

नमिता थापर एमक्योर फार्मा की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं. ‘शार्क टैंक इंडिया’ की जज अनुसार उनकी पहली प्रेग्नेंसी सामान्य थी. लेकिन, दूसरी प्रेग्नेंसी में उन्हें बहुत समस्या हुई क्योंकि वो कंसीव नहीं कर पा रही थी. वो इसके बाद दो बार IVF ट्रीटमेंट से गुजरी, जो दोनों बार फेल हो गया. उनके मुताबिक यह ट्रीटमेंट बहुत ही मुश्किल होता है, जिसमें महिला शारीरिक और मानसिक समस्याओं से गुजरती है. नमिता थापर का कहना था कि चार साल में दो अटेम्प्स के बाद उन्होंने इस ट्रीटमेंट को न लेने का निर्णय लिया. लेकिन, इसके कुछ समय बाद उन्होंने नेचुरली कंसीव किया. आज वो दो बच्चों की हैप्पी मदर है.

क्या है IVF और कैसे करता है यह काम?

IVF का फुल फॉर्म है इन विट्रो फर्टिलाइजेशन. यह प्रोसिजर्स की एक काम्प्लेक्स सीरीज है जिनका इस्तेमाल फर्टिलिटी में मदद करता है और यह जेनेटिक प्रॉब्लम्स को दूर करने में भी सहायक है. इस प्रोसीजर में पुरुषों के स्पर्म और महिलों के अंडाणुओं को आर्टिफिशियल तरीके से फर्टिलाइज किया जाता है. बाद में फीटस के विकसित होने पर इसे महिला के यूटरस में ट्रांसफर कर दिया जाता है. IVF की मदद से हेल्दी बेबी की मां बनना कई फैक्टर्स पर निर्भर करता है जैसे उम्र और इंफर्टिलिटी का कारण आदि. इसके साथ ही यह प्रोसीजर महंगा और इंवेसिव भी है. यही नहीं, इसमें बहुत अधिक समय भी लगता है.

IVF ट्रीटमेंट एक मुश्किल प्रोसीजर है लेकिन आजकल बहुत से लोग इसका इस्तेमाल कर के पेरेंट्स बनने का सुख पा रहे हैं. आजकल का लाइफस्टाइल ऐसा है कि लोग या तो अधिक उम्र में शादी करते हैं या फॅमिली प्लानिंग देरी से करते हैं. जिससे पुरुषों और महिलाओं में इनफर्टिलिटी की परेशानियां बढ़ रही हैं. ऐसे में आज के दौर में यह कई लोगों के लिए प्रोसीजर वरदान की तरह साबित हो रहा है.

जब जिंदगी तमाशे में डूब जाए

छिछली होती सोच का नतीजा यह है कि आज किसी भी हिंदी, अंगरेजी अखबार या चैनल को खोल लें उस में ज्यादातर खबरें सैलिब्रिटीज के खाने, पहनने, बीच पर नहाने, एअरपोर्ट पर आनेजाने पर होती हैं. ऐश्वर्या राय, अभिषेक बच्चन और उन की बेटी आराध्य न्यूयौर्क से मुंबई आईं तो फोटोग्राफरों का हुजूम जमा था और जब ये फोटो इंस्टाग्राम पर डाले गए तो हजारों नहीं लाखों तक लाइक्स मिले.

शाहरुख खान के जन्मदिन के मौके पर उन के घर के सामने खड़ी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा. तमन्ना भाटिया और विजय का किसिंग फोटो इतना वायरल हुआ कि टाइम्स औफ इंडिया ने इस की पूरी खबर बना कर छाप दी और उस का औनलाइन वीडियो जम कर चला. दीया मिर्जा अपने पति वैभव और स्टैप डौटर समायरा के साथ दिखीं, यह इंडियन एक्सप्रैस के लिए खबर थी.

आखिर इस सब का मतलब क्या है? ये आम जिंदगी को किस तरह प्रभावित करते हैं कि इन सैलिब्रिटीज के कपड़ों पर, बोलने पर, रंग पर, फैशन पर समय और शक्ति बरबाद की जाए? तमाशा हरेक को अच्छा लगता है पर जब जिंदगी तमाशे में डूब जाए और हरकोई टिकटौक या इंस्टाग्राम की रील्स के लाइक्स गिनने शुरू कर दे तो साफ है कि जनता की सोच की शक्ति गहरे पानी में डूब चुकी है.

तमाशा उबाऊ मेहनती जिंदगी से राहत पाने के लिए अच्छा है पर इस के लिए अपना समय और मेहनत मोबाइलों पर लाइक्स डालने में लगा लेने वाली जनता को वे परेशानियां उठानी ही पड़ेंगी, जो आज दिख रही हैं. आज दुनियाभर में एक तरह की अशांति है. कोविड-19 का डर इतना नहीं रह गया जितना कि नौकरियां खोने का. पैसे की तंगी का, पतिपत्नी या प्रेमीप्रेमिका का भय है.

यह इसलिए है कि जिंदगी को जिस गंभीरता से जीना जरूरी है उसे हम भूलने लगे हैं. हमारी जिंदगी की डोर अब कुछ सितारों, कुछ सैलिब्रिटीज के हाथों में हो गई है. ऐसा नहीं है कि पहले सबकुछ अच्छा था. सदियों तक लोग राजाओं और देवीदेवताओं के गुलाम रहते थे और वे जो अत्याचार करते, अनाचार करते, सहते थे. इतिहास बारबार अकालों, बीमारियों, युद्धों से भरा है. दुनियाभर में विशाल किले और मंदिर, चर्च, मसजिदें हैं पर आम लोगों के घर अभी पिछले कुछ सौ साल पहले बनने शुरू हुए जब साइंस और तकनीक ने धर्म और राजाओं की थोपी सोच से मुक्ति दिलाई.

अफसोस कि कहीं पेले, कहीं विराट कोहली, कहीं अमिताभ, कहीं लेडी गागा की चर्चाएं लोगों को फिर बहकाने लगी हैं और शासक व धर्म भी उन की सहायता से जनता को बेवकूफ बनाए रखने में सफल हो रहे हैं. आज वैज्ञानिक व चिंतक सिर्फ दिखावटी मजदूर रह गए हैं. वे गुलामों की तरह के हैं. उन से ज्यादा नहीं. यह चुनना हरेक का अपना फैसला कि उस का आदर्श कोई तमाशबीन है या वह जो खोज करता है, सवालों के हल ढूंढ़ता है, निर्माण करता या करवाता है. आप का फैसला क्या है?

मकड़जाल – रवि की कोनसी बात से मानवी के होश उड़ गए ?

आज मानवी की आंख जरा देर से खुली, लेकिन जब वह सो कर उठी तब उस ने एक अजीब सी बेचैनी महसूस की. अपनी बिगड़ी हालत देख कर वह समझ गई कि जरूर उस का गर्भपात हुआ है. तब उस ने अधीरता से रवि को आवाज लगाई, पर उस की आवाज उसे नहीं सुनाई दी.

‘जरूर रवि मेरे लिए चाय बना रहा होगा,’ यही सोच कर वह देर तक आंखें मूंदे बिस्तर पर पड़ी रही, लेकिन जब काफी देर के बाद भी रवि नहीं आया तब मानवी का माथा ठनका.

फिर वह किसी तरह अपनी बची शक्ति समेट कर बड़ी मुश्किल से उठी और धीरेधीरे चलती हुई किचन की तरफ बढ़ गई.

पर यह क्या? रवि तो किचन में भी नहीं था. तभी उस की नजर घर में फैले सामान पर पड़ी. सामने वाली अलमारी का ताला टूटा पड़ा था और उस में रखा सारा कीमती सामान गायब था.

ये सब देख कर मानवी की चीख निकल गई. तब वह धम से सामने पड़े सोफे पर बैठ गई और अनायास ही उस का दिल भर आया.

एक तरफ वह बहुत कमजोरी महसूस कर रही थी तो दूसरी तरफ मानसिक व आर्थिक रूप से भी अक्षम हो चुकी थी.

उसे आज समझ आ रहा था कि उस ने रवि के साथ लिव इन में रह कर कितनी बड़ी भूल की है.

‘कुछ भी ऐसा मत करना मेरी बेटी, जिस से बाद में हमें पछताना पड़े,’ दिल्ली आते समय उस के बाबूजी उस से बोले थे.

‘ओह, बाबूजी… मैं वहां कुछ बनने जा रही हूं, इसलिए कुछ भी ऐसेवैसे की तो गुंजाइश ही नहीं है…’ इतना कह कर उस ने आगे बढ़ कर अपने बाबूजी के चरणस्पर्श कर लिए थे.

फिर वह अपनी आंखों में ढेर सारे सपने लिए दिल्ली आ पहुंची थी. छोटे शहर की मानवी को दिल्ली स्वप्न नगरी से कम नहीं लगी थी. अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते हुए कब रवि उस का हमसफर बन बैठा, इस का एहसास तो उसे बहुत देर में हुआ.

तभी अचानक मानवी को याद आने लगा कि रात को रवि ने जो ड्रिंक उसे औफर किया था, जरूर उस में उस ने कुछ मिलाया होगा. तभी तो उस ड्रिंक को पीते ही उसे बेहोशी छाने लगी थी और शायद इसी वजह से उस का यह गर्भपात हुआ.

अब तो जैसे उस की सोचनेसमझने की शक्ति चुक गई थी. अभी कल ही तो रवि ने उस से मंदिर में शादी की थी. वैसे यह बात नहीं थी कि मानवी ने यह निर्णय जल्दबाजी में लिया था बल्कि लगातार 2 साल लिव इन में रहने के बाद ही उस ने यह निर्णय लिया था.

फिर अचानक मानवी को सारी बीती बातें रवि की सोचीसमझी चाल का हिस्सा लगने लगी थीं.

‘2 महीने का गर्भ है मुझे, अब तो शादी कर लो मुझ से,’ मानवी जब रवि से बोली तो वह खुश होने के बजाय उलटा उस पर ही बरस पड़ा था.

‘पता नहीं, तुम आजकल की लड़कियों को क्या होता जा रहा है. सरकार गर्भनिरोध के नितनए तरीकों पर लाखों रुपए बरबाद कर रही है, पर तुम लोगों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती. मैं तो मस्तमौला हूं पर तुम तो ध्यान रख सकती थी,’ रवि अचानक आक्रामक हो उठा था.

ये सब सुन कर मानवी का मुंह उतर गया था. फिर वह रोंआसी सी अपने कमरे की तरफ बढ़ गई थी.

थोड़ी देर रो लेने के बाद जब उस का जी हलका हुआ, तब उस ने रवि को अपने सामने खड़ा पाया. उस के हाथ में एक ट्रे थी, जिस में कौफी के 2 मग और मानवी के मनपसंद वैज सैंडविच थे.

‘‘लो जानेमन, गुस्सा थूको और नाश्ता कर लो, ऐसी स्थिति में तो तुम्हें बिलकुल भूखा नहीं रहना चाहिए और फिर हमारा नन्हा शैतान भी तो भूखा होगा…’’ इतना कह कर रवि ने अपने हाथों में पकड़ी ट्रे मानवी के सामने रख दी थी.

‘‘वैसे तुम जानते सबकुछ हो पर अनजान बनने का नाटक करते हो, शायद इसी वजह से मैं तुम्हें अपना दिल दे बैठी,’’ इतना कह कर मानवी ने रवि को खींच कर अपने पास बैठा लिया और फिर वे दोनों नाश्ता करने लगे.

‘‘मानवी, ऐसा करते हैं कि आज दोपहर में मूवी देखते हैं और फिर लंच भी बाहर ही कर लेंगे,’’ रवि खाली ट्रे उठाते हुए बोला, ‘‘पर हां, आज का सारा खर्च तुम्हें ही करना होगा, क्योंकि मेरी हालत जरा टाइट है.’’

‘‘वह तो ठीक है जनाब, पर आज तुम्हारा आशिकी भरा व्यवहार देख कर मुझे तुम पर बहुत प्यार आ रहा है,’’ यह कहतेकहते वह रवि से लिपट गई थी.

‘‘मैं एक बात सोच रहा था कि अगर अब जिम्मेदारी आ रही है तो उस से निबटने के लिए प्लानिंग भी करनी पड़ेगी.’’

रवि मानवी को चूमते हुए बोला, ‘‘अगर कुछ इंतजाम हो जाए तो मैं अपना कोई काम ही शुरू कर लूं. मुझे तो इस बंधीबंधाई कमाई वाली प्राइवेट नौकरी में आगे बढ़ने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं और फिर क्या शादी के बाद भी हर छोटेछोटे खर्च के लिए मैं तुम पर ही निर्भर रहूंगा?’’

‘‘अच्छा जानू, एक बात तो बताओ जरा कि अगर किसी और की मदद लेने की जगह मैं ही तुम्हें फाइनैंस कर दूं तो?’’

‘‘वाह, इस से बढि़या बात तो कोई हो ही नहीं सकती. यह तो वही कहावत हुई, ‘बगल में छोरा और शहर में ढिंढोरा.’ मुझ से ज्यादा तो तुम आर्थिक रूप से सबल हो. इस का तो मुझे तनिक भी एहसास नहीं था,’’ यह कहतेकहते रवि की आंखों में अचानक ही चमक नजर आने लगी थी.

फिर उस ने अचानक ही मानवी को अपनी ओर खींच लिया था और प्यार भरे स्वर में उस से बोला था, ‘‘मैं तो सोच रहा था कि तुम शायद अपने किसी परिचित या सहकर्मी से मदद लोगी पर तुम्हारे पास तो गढ़ा हुआ धन है, मेरी छिपीरुस्तम…’’

‘‘जनाब, जरा अपनी सोच को ब्रेक लगाइए और ध्यान से मेरी बात सुनिए,’’ मानवी हंसते हुए बोली, ‘‘मेरे पास कोई गढ़ा हुआ धन नहीं बल्कि खूनपसीने से कमाए हुए पैसों की बचत है जिस की मैं ने एफडी करवाई हुई है.’’

अब तक मैं ने इस बारे में तुम्हें नहीं बताया था पर अब जब हम दोनों एक होने जा रहे हैं तो भला यह दुरावछिपाव क्यों?’’

‘‘ओह, मेरी प्यारी मानवी,’’ इतना कह कर रवि ने एक प्यारा सा चुंबन मानवी के गाल पर अंकित कर दिया था.

फिर वे दोनों अपने प्यार की खुमारी में डूबे पिक्चर हौल की तरफ बढ़ गए थे.

पहले उन्होंने मस्त मूवी का मजा लिया और फिर एक बढि़या रेस्तरां में लजीज खाना खाया.

जब रात को दोनों सोने के लिए बिस्तर पर लेटे तब फिर से रवि ने सुबह वाली बात का जिक्र छेड़ दिया.

‘‘मैं क्या कह रहा था मानवी,’’ रवि जरूरत से ज्यादा अपने स्वभाव को नम्र करते हुए बोला, ‘‘कल सोमवार है तो तुम औफिस जाने से पहले बैंक से पैसे निकाल कर मुझे दे देना. पैसे हाथ में होंगे तो आगे की प्लानिंग आसान हो जाएगी,’’ फिर रवि मानवी के बालों में अपना हाथ फेरने लगा था.

‘‘वह तो ठीक है जानू,’’ मानवी रवि को गलबहियां डालती हुई बोली, ‘‘पर पहले हमारी शादी होगी, तभी तुम्हें पैसे मिलेंगे, क्योंकि मैं ने यह पैसे अपने फ्यूचर पार्टनर के लिए ही तो बचा कर रखे थे.’’

‘‘ओह, तो तुम्हें मुझ पर भी विश्वास नहीं है,’’ रवि खुद को मानवी की पकड़ से छुड़ाते हुए बोला, ‘‘क्या, मैं तुम्हें ऐसा लगता हूं जो तुम्हें धोखा दे कर भाग जाऊंगा?’’

‘‘सच, बहुत प्यारे लगते हो तुम, जबजब गुस्से में होते हो,’’ मानवी फिर से रवि से लिपटते हुए बोली, ‘‘मेरे जानेजिगर, अब जब तुम्हें अपना तनमन ही सौंप दिया तो भला शक की कैसी गुंजाइश?

‘‘मैं तो यह सोच रही थी कि अब जब शादी करनी ही है तो फिर देरी कैसी? इधर हमारी शादी हुई तो उधर मैं अपनी सारी जमापूंजी तुम्हें सौंप दूंगी,’’ मानवी रवि के आगोश में समाते हुए बोली.

इतना कह कर मानवी तो सो गई पर रवि बेचैनी से लगातार करवटें बदलता रहा था.

‘‘जल्दी से तैयार हो जाओ. हम लोग अभी मंदिर जा कर शादी करेंगे,’’ इतना कह कर रवि ने एक पैकेट उसे थमा दिया, जिस में एक प्यारी सी लाल साड़ी, लाल चूडि़यां और एक प्यारा सा महकता गजरा था.

‘‘पर रवि, इतनी भी क्या जल्दी है? थोड़ा समय दो मुझे,’’ मानवी चाय बनाते हुए बोली.

‘‘तुम लड़कियां न वाकई में कमाल हो. पहले तो जल्दीजल्दी की रट लगाती हो और फिर अगर तुम्हारी बात मान लो तो उस में भी तुम्हें प्रौब्लम होती है,’’ इतना कह कर रवि गुस्से में पैर पटकता हुआ बाहर चला गया.

वैसे मानवी को ये सब इतनी जल्दी होते देख अटपटा तो अवश्य लग रहा था पर अब शक की कोई गुंजाइश नहीं थी.

इसलिए वह सबकुछ भुला कर खुशीखुशी तैयार होने लगी थी. बीचबीच में उसे अपने घर वालों की याद भी आ रही थी पर फिर उस ने सोच लिया था कि वह शादी होते ही रवि को ले कर अपने घर जाएगी.

मानवी को दुलहन के रूप में देख कर पहले तो वे लोग अवश्य उस से गुस्सा होंगे पर फिर जल्दी ही मान भी जाएंगे, क्योंकि वह सभी की लाड़ली जो है.

‘‘वाह, क्या गजब ढा रही हो तुम दुलहन के रूप में, आज तो सब तुम पर फिदा हो जाएंगे,’’ रवि की इस चुटकी पर मानवी शरमा कर उस के गले जा लगी थी.

‘‘अरे सुनो, तुम्हारा बैंक भी तो मंदिर के रास्ते में ही पड़ता है न. ऐसा करना तुम अपनी चैकबुक भी रख लेना,’’ रवि कुछ सोचते हुए बोला.

‘‘तुम भी न, हर काम जल्दी में ही करते हो,’’ मानवी अपना मांगटीका ठीक करते हुए बोली, ‘‘वैसे मुझे कम से कम इतना तो बता दो कि तुम कौन सा काम शुरू करने वाले हो?’’

‘‘मैडम, यह सरप्राइज है तुम्हारे लिए. बस, यह समझ लो कि यह शादी का तोहफा होगा तुम्हारे लिए,’’ इतना कह कर उस ने मानवी का हाथ पकड़ा और फिर वे दोनों शादी करवाने वाली दुकान की तरफ बढ़ गए. वहां एक पंडित बैठा था. उस ने जल्दबाजी में रीतिरिवाज निबटा कर उन की शादी करवा दी और एक प्रमाणपत्र पकड़ा दिया. फिर लौटते समय मानवी ने बैंक से पैसे निकाल कर रवि को दे दिए.

पैसे मिलते ही रवि के रंगढंग बदल गए, इस का एहसास मानवी को हुआ तो जरूर पर फिर उस ने इसे वहम मान कर आगे बढ़ने में ही भलाई समझी.

मानवी कपड़े चेंज कर के अभी लेटी ही थी कि तभी रवि आ गया, ‘‘यह क्या जानेमन, आज तो सैलिब्रेशन की रात है और तुम इतनी सुस्त सी लेटी हो. दैट्स नौट फेयर माई लव,’’ इतना कह कर उस ने विदेशी शराब 2 गिलासों में उड़ेल दी.

वैसे तो मानवी थकी होने के कारण सोना चाहती थी पर वह रवि को परेशान भी तो नहीं कर सकती थी.

फिर वह तुरंत उठी और रवि के पास जा कर बैठ गई.

‘‘चीयर्स,’’ कह कर इधर दोनों के गिलास आपस में टकराए तो उधर एक अजीब सा उन्माद छा गया मानवी पर. फिर थोड़ी देर बाद उस की आंखें भारी होने लगीं और वह सो गई. अब जब आंखें खुलीं तो रवि का सारा सच उस के सामने आ गया था.

अभी वह इसी उहापोह में थी कि क्या करे? तभी उस के मोबाइल पर उस की सहेली रम्या का फोन आ गया.

‘‘क्या यार, 2 दिन से औफिस क्यों नहीं आई?’’ रम्या हंसते हुए बोली.

‘‘कुछ नहीं यार.’’

‘‘तू अभी बिजी है तो मैं बाद में कौल करती हूं,’’ रम्या ने चुटकी ली.

‘‘ऐसा कुछ नहीं है यार,’’ इतना कह कर मानवी रोने लगी.

‘‘तू रो मत, मैं अभी आती हूं,’’ फिर चिंतातुर रम्या सारा काम बीच में ही छोड़ कर मानवी के पास पहुंच गई.

मानवी की इतनी बुरी हालत देख कर रम्या भी सकते में आ गई. फिर मानवी ने भारी मन से रम्या को सबकुछ बता दिया.

‘‘मैं तो तुझे पहले ही समझाती थी कि मत पड़ इस लिव इन के चक्कर में, पर तब तो मैडम पर इश्क का भूत जो सवार था. लिव इन एक कच्चा रिश्ता होता है जो किसी को भी सुख नहीं देता,’’ रम्या गुस्से में बोले जा रही थी.

‘‘मैं तो आत्महत्या कर के अपना जीवन ही समाप्त कर दूंगी. आखिर किस मुंह से मैं सामना करूंगी अपने घर वालों का?’’ इतना कह कर मानवी फिर से रोने लगी.

‘‘आत्महत्या के बारे में सोचना भी मत,’’ यह कह कर रम्या मानवी को समझाने लगी, ‘‘देख मानवी, अब तक तो तू ने जो कुछ गलत किया सो किया पर अब संभल जा. रही बात तेरे परिवार वालों की, तो यह बात समझ ले कि हमारी लाख गलतियों के बावजूद जो हमें स्वीकार करता है, वह हमारा परिवार ही होता है.

‘‘तू शायद यह नहीं जानती थी कि अपने दोस्त तो हम चुनते हैं पर हमें हमारी फैमिली चुनती है.

‘‘शुरू में तो तेरे परिवार वाले तेरे शुभचिंतक होने के नाते तुझे अवश्य डांटेंगे, लेकिन फिर तुझे खुले मन से स्वीकार भी कर लेंगे.

‘‘आत्महत्या तो रवि को करनी चाहिए तूने तो उसे सच्चे दिल से चाहा था, पर दगाबाज तो वही निकला, जो तुझे आर्थिक, मानसिक व शारीरिक स्तर पर धोखा दे कर चंपत हो गया. वह शातिर तो तेरे पैसों पर ऐश कर रहा होगा और तू यहां रोरो कर बेहाल हो रही है.’’

फिर रम्या ने उस के आंसू पोंछे और उसे अपनी कार में बैठा कर डाक्टर के पास ले गई.

डाक्टर ने पहले मानवी का चैकअप किया और फिर थोड़े उपचार के बाद उसे कुछ दवाएं लिख दीं, जिन से मानवी को बहुत आराम मिला.

इसी बीच रम्या ने मानवी द्वारा बताए गए नंबर पर उस के घर वालों से संपर्क किया और उन्हें सारी बात बता दी.

फिर क्या था? शाम होते ही मानवी के घर वाले उसे लेने आ पहुंचे.

मानवी की मनोदशा उस की मां ने तुरंत भांप ली और उसे अपने प्यार भरे आंचल में समेट लिया. पर मानवी की गलतियों पर उस के बाबूजी ने उसे बहुत डांटा. फिर इस बात का एहसास होते ही कि मानवी को अपनी गलतियों का एहसास है, उन्होंने उसे माफ भी कर दिया.

मानवी अपने घर वालों के साथ अपने घर चली गई. रम्या उस की कार को जाते हुए तब तक देखती रही, जब तक  कार उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई.

एक तरफ जहां उसे अपनी सहेली से बिछुड़ना बहुत खल रहा था वहीं दूसरी तरफ उसे इस बात की बेहद खुशी थी कि चाहे देर से ही सही, उस की सहेली उसे उस मकड़जाल से बाहर निकालने में सफल हो गई थी, जिसे उस ने अपनी नासमझी से अपने इर्दगिर्द बुना था.

क्या परमानैंट नेलपौलिश करवाना सही है, इसका कोई नुकसान तो नहीं है?

सवाल

मैं जब भी मैनीक्योर कराने जाती हूं तो मुझे परमानैंट नेलपौलिश की सलाह दी जाती है. क्या यह सेफ है?

जवाब

जी हां परमानैंट या जैल नेलपौलिश लगाना काफी सेफ है क्योंकि इस में जैल से नेलपौलिश लगाई जाती है और उसे मशीन से सैट किया जाता है. यह नेलपौलिश जल्दी से उतरती नहीं है. इसलिए एक तो हर वक्त खूबसूरत लगती है  और दूसरा जो जनरल नेलपौलिश चिपचिप होती है वह ज्यादातर आप के या आप के बच्चों के खाने में जाती है क्योंकि यह चिप नहीं होती तो आप के लिए सेफ बनी रहती है.

दूसरा यह काफी दिनों तक टिकती है. 1 से डेढ़ महीने तक चल जाती है. एक बात और है जिस की हमें गलतफहमी रहती है कि एक बार परमानैंट नेलपौलिश लगा दी जाए तो उस के ऊपर कलर बदला नहीं जा सकता. हमें आदत होती है कि जब भी हम कहीं जाते हैं तो हम नेलपौलिश बदलना चाहती हैं.

आप चाहें तो इस जैल नेलपौलिश के ऊपर दूसरी लगा सकती हैं. उसे उतार भी सकती हैं. नीचे की टिकी रहेगी.

ध्यान रखने की बात यह है कि जब भी आप परमानैंट नेलपौलिश लगवाएं तो किसी ऐक्सपर्ट से लगवाएं क्योंकि इसे लगाने से पहले नेल्स को ब्फ किया जाता है. ज्यादा बफिंग करने से नेल्स वीक हो जाते हैं.

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सवाल

मेरा रंग तो गोरा है पर मेरी गरदन का कलर काफी डार्क रहता है. कोई भी ज्वैलरी पहनती हूं तो अच्छी नहीं लगती. बताएं क्या करूं?

जवाब

आप अपनी गरदन को सब से पहले ब्लीच कर लें. कुछ हद तक उस का रंग ठीक हो जाएगा. उस के बाद नियमित स्क्रब करें. स्क्रब बनाने के लिए फ्रैश ऐलोवेरा का जैल निकाल लें और उस में चीनी डाल कर उस से अपनी

गरदन पर रोज मसाज करें. उस के बाद उसे सूखने दें. सूखने के बाद धो लें. ऐसा करने से 15 दिन में आप की गरदन का कलर पहले से बैटर हो जाएगा. जब भी घर से बाहर जाएं अपने फेस के साथसाथ गरदन पर भी या जितना हिस्सा दिखता है उस पर सनस्क्रीन जरूर लगा कर जाएं.

-समस्याओं के समाधान

ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा 

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.

आलिया- अनुष्का से लेकर शिल्पा शेट्टी तक, क्या है इन 4 सैलिब्रिटी मौम्स की खूबसूरती का राज

बच्चे के जन्म के साथ ही औरत की जिंदगी कई मानों में बदल जाती है. चाहे उस का सोचने का नजरिया हो या फिर बात अपीयरैंस की हो, फिजिकल. अधिकतर महिलाएं पोस्ट डिलिवरी वजन बढ़ने से परेशान रहती हैं. इस मोटापे से तो हमारी खूबसूरत सैलिब्रिटिज भी नहीं बच सकी हैं. मगर सवाल यहां यह है कि पोस्ट डिलिवरी सैलिब्रिटिज बेहद कम वक्त में अपनी पहली जैसी छरहरी काया हासिल कर लेती हैं.

लेकिन कैसे? आप के इसी सवाल का जवाब आज हम देंगे कि कैसे करीना कपूर से ले कर अनुष्का शर्मा, शिल्पा शेटी, सोनम कपूर, आलिया तक कैसे फैट लौस में कामयाब हुई हैं.

  1. घर का खाना खाना है करीना को पसंद

20 दिसंबर, 2016 को करीना ने तैमूर और 21 फरवरी, 2021 को अपने दूसरे बेटे जेह को जन्म दिया. इन दोनों ही जर्नी में करीना ने अपनी अपीयरैंस को ले कर लोगों को खासा प्रभावित किया है. बहरहाल करीना ने पहली प्रैगनैंसी के दौरान काफी वजन बढ़ा लिया था, बावजूद इस के करीना ने अपने मनोबल को टूटने नहीं दिया और 18 महीने में अपनी बौडी को रिकवर किया.

करीना का मानना है कि सादा और स्वच्छ खाना, हलका व्यायाम और वाकिंग से वजन कम किया जा सकता है. लेकिन इस में कोई जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. आप धीरेधीरे अपने वजन को नियंत्रित करने के ओर कदम बढ़ाएं. इस दौरान महिलाएं कम कार्बोहाइड्रेट का सेवन करने लग जाती हैं ताकि जल्दी वजन कम हो, लेकिन करीना ने धीरेधीरे अपनी डाइट को पोषण से भर कर तब अपना वजन कम किया है. करीना कई बार मंच से अपनी फिटनैस का श्रेय अपनी खानपान की आदतों को देती हैं.

सैलिब्रिटी न्यूट्रिशनिस्ट रुतुजा दिवेकर करीना के साथ लंबे अरसे से जुड़ी हुई हैं. वे बताती हैं कि करीना ने सिर्फ घर के बने खाने और मौसमी फलसब्जियों के जरीए ही हैल्दी प्रैगनैंसी और पोस्ट प्रैगनैंसी वजन को नियंत्रित किया है.

प्रैगनैंसी और पोस्ट प्रैगनैंसी के वक्त करीना ने दाल हो या चावल सब चीजों में घी का तड़का जरूर लगाया है और वे अपने दोनों बच्चों के खाने में भी देशी घी का इस्तेमाल जरूर करती हैं. करीना को ऐक्सपोर्टेड फल और सब्जियों से ज्यादा मौसमी फल, दहीचावल, ज्वार, मक्का, गेहूं के आटे की रोटी, लौकी, करेले, दाल आदि बहुत पसंद हैं.

करीना परांठों से भी परहेज नहीं करतीं, बस उनका कहना है कि आप जो खा रहे हैं उस की मात्रा नियंत्रित करें. रुतुजा का कहना है कि सब से पहले आप सोचिए आप को कितनी भूख है और अपनी प्लेट में क्या रखना चाहते हैं उस के बाद अपनी सोच से आधा खाना प्लेट में रखें और दोगुना वक्त ले कर धीरेधीरे चबा कर खाएं. मान लीजिए आप 5 मिनट में खाना खाते हैं तो 10 मिनट में उसे खत्म करें.

करीना को पावर योगा और हौट योगा भी काफी पसंद है. इस के साथ ही वे वाकिंग को अपने लिए जरूरी मानती हैं.

2. न्यू सैलिब्रिटी मौम आलिया हैं सब की फैवरिट

प्रैगनैंसी के दौरान क्यूट बेबीबंप फ्लौंट करना हो या पोस्ट प्रैगनैंसी एरियल योगा कर वेट लौस, हर अवतार में आलिया लोगों को काफी पसंद आ रही हैं. 6 नवंबर, 2022 को ऐक्ट्रैस ने अपनी बेटी राहा कपूर को जन्म दिया और उस के बेहद कम वक्त बाद ही वे एरियल योगा और सही डाइट से पहले की तरह फिट नजर आ रही हैं.

 

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आप को हैरानी होगी लेकिन करीना की तरह ही आलिया भी घर का खाना बेहद पसंद करती हैं. चुकंदर तड़का दही इनका मनपसंद है जिसे वे अपनी डाइट में शामिल करना नहीं भूलतीं. आलिया घर की बनी रोटीसब्जी, दालचावल खाना बेहद पसंद करती हैं और उन्हें भी खाने में देशी घी का तड़का बेहद पसंद है. बहरहाल आलिया रोज एक जैसा खाना न खा कर अपने खाने में वैरायटी लाना नहीं भूलतीं और न ही वे अपना कोई मील स्किप करती हैं. बस कंट्रोल पोर्शन और घर के बने सिंपल खाने से ही उन्होंने अपना वजन कम किया है.

हालांकि स्नैक्स क्रेविंग को कम करने के लिए अनुष्का नीबू पानी में केसर मिला कर पीती हैं. वर्कआउट के बाद आलिया पैक्ड जूस के बदले फ्रैश निकाला हुआ गन्ने का जूस पीना पसंद करती हैं. रोजाना ब्रेकफास्ट में भी आलिया किसी न किसी वैजिटेबल जूस को जरूर शामिल करती हैं. बौडी को हाइड्रेट रखने के लिए वे रोजाना कम से कम 2-3 लिटर पानी जरूर पीती हैं.

3. 1 महीने में फैट टू फिट हो गई थीं अनुष्का

अभिनेत्री अनुष्का शर्मा ने प्रैगनैंसी के दौरान कठिन योगाभ्यास की तसवीरें शेयर कर लोगों को हैरान कर दिया था, लेकिन उस से भी ज्यादा लोगों को अनुष्का की पोस्ट प्रैगनैंसी वेट लौस जर्नी देख कर हैरानी हुई है. उन्होंने मात्र 1 महीने में अपनी पहले जैसी छरहरी काया को हासिल कर लिया था. उन की न्यूट्रिशनिस्ट का कहना है कि अच्छी नींद किसी की भी वेट लौस जर्नी में काफी अहम भूमिका निभाती है

 

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बहरहाल मां बनने के बाद भरपूर नींद लेना किसी सपने जैसा लगता है, लेकिन जैसे ही आप का बच्चा  सोए, आप भी उसके साथ ?ापकी लें. यह आप की स्किन, मानसिक स्थिति और स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा और इस से आप की रिकवरी भी जल्दी होगी तथा ऐनर्जी भी मिलेगी.

इस के अलावा बच्चे को सही पोस्चर में पकड़ना, स्तनपान करवाते समय कमर के पीछे तकिया लगाना ताकि बैकपेन न हो, इस की सलाह अनुष्का की न्यूट्रिशनिस्ट देती हैं. प्रैगनैंसी फैट को घटाने के लिए अनुष्का शर्मा ने संतुलन बढ़ाने वाली ऐक्सरसाइज का सहारा लिया. उन के लिए मैडिटेशन और डीप ब्रीदिंग ऐक्सेरसाइज भी मददगार साबित हुई हैं. इस से पोस्टपार्टम डिप्रैशन से राहत पाने में भी मदद मिलती है.

4. शिल्पा हैं नई मांओं के लिए प्रेरणा

शिल्पा शेट्टी का नाम आते ही हमारे सामने बहुत ही फिट अदाकारा की छवि बन जाती है. लेकिन मदरहुड की जर्नी में शिल्पा भी मोटापे का शिकार हुई हैं. उन के अनुसार वे अपने बेटे के जन्म के बाद इतनी मोटी हो गई थीं कि उन्हें उन का कोई कपड़ा फिट नहीं होता था और उन्हें घर से बाहर निकलने में भी शर्म आती थी.

उन्होंने बेटे वियान के जन्म के बाद 32 किलोग्राम वजन बढ़ा लिया था, लेकिन सिर्फ 4 महीनों की कड़ी मेहनत और हैल्दी खानपान के जरीए उन्होंने वापस अपनी बौडी को पहले की शेप में कर लिया.

-सोनिया राणा डबास      

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