हक की लड़ाई

इस में अब संदेह नहीं रह गया है कि जनता के हित के जो काम वोटों से चुन कर आई सरकारों को करने चाहिए, अदालतें उन्हीं सरकारों के बनाए कानूनों की जनहित व्याख्या करते हुए काम करने लगी है. अदालतों ने साबित कर दिया है कि हमारी सरकारों के पास या तो मंदिर बनाने का काम रह गया है या ठेके देने का जिन में जनता का गला घोंट कर पैसा छीन कर लगाया जा रहा है, सरकारों को आम जनता के दुखदर्द की ङ्क्षचता दाव ही होती है जब मामला टैक्स का हो या वोट का या फिर धर्म का.

चेन्नै उच्च न्यायालय ने एक अच्छे फैसले में कहा है कि हालांकि एक मुसलिम औरत को खुला प्रथा के अनुसार तलाक लेने का हक पूरा है पर इस का सॢटफिकेट कोर्ई भी 4 जनों की जमात नहीं दे सकती. अब तक शरीयत कोर्ट ऐसे सॢटफिकेट देती थी जिन्हें कैसे बनाया जाता था और उन के तर्कवितर्क क्या होते थे, वहीं रिकार्ड नहीं किए जाते थे. उच्च न्यायालय ने औरत को फैमिली कोर्ट जा कर अपना सॢटफिकेट लेना चाहिए जहां उस के खाङ्क्षवद की भी सुनी जाएगी. इसी तरह सेना में एउल्ट्री यानी पतिपत्नी में से एक का किसी दूसरे से सैक्स संबंध इंडियन पील्ल कोर्ड में अब आपराधिक गुनाह नहीं रह गया हो, सेनाओं में सेना कानूनों के हिसाब से चलता रहेगा. यह बहुत जरूरी है क्योंकि सैनिकों को महीनों घरों से बाहर रहना पड़ता है और उन के पास उन के पीछे वीबियों के गुलछर्रे उड़ाने की खबरें आती रहती हैं.

इसी तरह महीनों पत्नी से दूर रहे सैनिक पति कहां किसी……….औरत से संबंध न बना लें, इस गम में पत्नियां घुलती रहती हैं. अपराधी होने का साया देशों के काबू में रख सकता है. सैनिक युद्ध में बिना घर की फिक्र किए तैनात रहे पर देश की सुरक्षा के लिए जरूरी है. केंद्र सरकार मुसलिम कानून में 3 तलाक को बैन करने का ढोल बजाती रहती है पर उसे इन लाखों ङ्क्षहदू औरतों की ङ्क्षचता नहीं है जो तलाकों के मुकदमों के अदालतों के गलियारों में चप्पलें घिस रही हैं. अगर पति या पत्नी में से एक मीनिट पर अड़ जाए से तलाक महीनों बरसों टलता रहता है. जैसे ङ्क्षहदू कानून शादी मिनटों में कोई भी तिलकधारी करा सकता है, तलाक भी क्यों नहीं हो सकता.

हां, अगर ङ्क्षहदू औरतें इतनी पतिव्रता, धर्मकर्म, जन्मजन्मांतरों को मानने वाली वो बात दूसरी होती. वे तो आम दुनिया भर की औरतों की तरह जिन्हें तलाक की तलवार के नीचे आता पड़ सकता है. सरकार उन्हें तरसातरसा कर तलाक दिलवाती है, सरकार कानून में रद्दोबदल करने में कोई इंटरेस्ट ही नहीं लेती क्योंकि यह मुद्दा न तो वोट का है न नोट का.

बड़बोला: विपुल से आखिर क्यों परेशान थे लोग

पैरों की खूबसूरती बढ़ाने के घरेलू टिप्स

पैरों को साफ और स्वस्थ रखना भी उतना ही जरूरी है, जितना शरीर के किसी दूसरे अंग को. पैरों की साफसफाई एक निश्चित अंतराल पर होती रहनी चाहिए. इस के लिए आप नियमित साफसफाई के अलावा पैडिक्योर का सहारा भी ले सकती हैं.

ऐसे करें पैडिक्योर

पैडिक्योर करने से पहले नाखूनों पर लगी नेल पौलिश को हटा दें. फिर टब या बालटी में कुनकुने पानी में अपना पसंदीदा साल्ट या क्रीम सोप डालें. अगर आप के पैरों की त्वचा ज्यादा रूखी है, तो उस में औलिव आयल भी डाल लें. साल्ट आप के पैरों की त्वचा को नरम बनाएगा, तो औलिव आयल उस के लिए माश्चराइजर का काम करेगा. पैरों का कम से कम 15 मिनट तक इस पानी में रखने के बाद बाहर निकाल कर बौडी स्क्रबर से स्क्रब करें. स्क्रब करने के बाद ठंडे पानी से पैरों को अच्छी तरह साफ कर लें. ध्यान रहे कि पैरों की उंगलियों के बीच में  कहीं सोप बचा न रहे. अब पैरों पर कोल्ड क्रीम से हलकी मालिश करें. रूई की सहायता से उंगलियों के बीच फंसी क्रीम को साफ करें. अब पैरों के नाखूनों पर नेल पौलिश का सिंगल कोट लगाएं और इसे सूखने दें. जब यह सूख जाए तो नेल पौलिश से फाइनल टच दें.

पैराफिन वैक्स के साथ पैडिक्योर

इस तरीके से पैडिक्योर करने के लिए सब से ज्यादा जरूरी चीज है वक्त. जब भी आप पैराफिन वैक्स से पैडिक्योर करें, इसे कम से कम सवा घंटे का समय दें. पैराफिन वैक्स से पैडिक्योर करते समय सब से पहले अपने पैरों को पैराफिन वैक्स से साफ कर लें. इस के लिए पैराफिन वैक्स को पिघला कर एक मिट्टी की बड़ी कटोरी या बरतन में डाल लें. अब अपने पैरों को इस बरतन में डाल दें. यह काम करते वक्त इस बात का खयाल रखें कि वैक्स आप के पैरों के ऊपर बहे. इस के बाद पेडिक्योर की पहली प्रक्रिया की तरह पैरों को कुनकुने साफ पानी से धो कर क्रीम से इन की मसाज करें और नेल पौलिश लगा लें.

कुछ काम की बातें

सर्दियों में गरम जुराबें पहनें, जिस से आप के पैर गरम रहें. मगर इस बात का ध्यान जरूर रखें कि जुराबें पैरों के लिए टाइट न हों.

अगर आप पैरों के नाखून बड़े रखना चाहती हैं, तो जुराबें पहनते समय इस बात का ध्यान रखें कि नाखूनों पर नेल पौलिश लगी हो. इस से उन के नरम हो कर टूटने का डर नहीं रहता, नेल पौलिश उन्हें सहारा दे कर मजबूत बनाए रखती है.

धोने या पैडिक्योर ट्रीटमेंट लेने के  बाद पैरों को बिना सुखाए जुराबें न पहनें. इस से इन्फेक्शन होने का खतरा बढ़ता है.

पैरों को गरमी देने के लिए हीटिंग पैड का इस्तेमाल न करें, क्योंकि यह आप के पैरों के लिए जरूरत से ज्यादा गरम साबित होने के साथ उन्हें नुकसान भी पहुंचा सकते हैं.

बाजार से पैरों के लिए जूते या चप्पल खरीदते समय खयाल रखें कि पंजों पर ज्यादा दबाव न पड़े. पंजों का रक्तप्रवाह किसी भी तरह से दुष्प्रभावित नहीं होना चाहिए.

पैरों को धोते समय कुनकुने पानी का इस्तेमाल करें. ज्यादा गरम पानी नुकसानदेह हो सकता है.

एडि़यों को फटने से बचाने के लिए माश्चराइजर का इस्तेमाल करना अच्छा रहता है. मगर इसे उंगलियों के बीच में नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि इस स वहां फंगस लगने का डर रहता है.

अगर आप के पैरों में पसीना बहुत ज्यादा आता है, तो जूते पहनते समय एंटी फगस पाउडर का इस्तेमाल करना न भूलें.

लंच में बनाएं टेस्टी कटहल के कोफ्ते

कटहल के कोफ्ते बेहद स्वादिष्ट होते हैं. आज हम आपको कटहल के कोफ्ते बनाने की रेसिपी बताने जा रहे हैं. तो आइए जानते है.

सामग्री

कटहल – 300 ग्राम

हरी मिर्च – 2 बारीक कटी

अदरक – 1 इंच लम्बा टुकड़ा

हरा धनियां – थोड़ा कटा हुआ

नमक – स्वादानुसार

बेसन – दो बड़ी चम्मच

तेल – कोफ्ते तलने के लिये

टमाटर – 2

हरी मिर्च – 2-3

अदरक – 1 इंच लम्बा टुकड़ा

काजू – 9-10

जीरा – आधा छोटी चम्मच

हल्दी पाउडर – आधा छोटी चम्मच

धनियां पाउडर – एक छोटी चम्मच

लाल मिर्च पाउडर – एक चौथाई छोटी चम्मच

नमक – स्वादानुसार

गरम मसाला – एक चौथाई छोटी चम्मच

हरा धनियां – एक टेबिल स्पून

विधि

कटहल को बड़े-बड़े टुकड़ों में काट लीजिए. कटहल में थोड़ा पानी डालकर कुकर में उबलने के लिए रख दीजिए. एक सीटी आने पर गैस बन्द कर दीजिए. अब इसे निकाल कर अच्छी तरह मिला लीजिए. कटहल, हरी मिर्च, अदरक, हरा धनियां, नमक और बेसन सभी को अच्छी तरह मिला लीजिए. कोफ्ते बनाने के लिए मिश्रण तैयार है.

अब कढ़ाई में तेल डालकर गरम कीजिए. मिश्रण से थोड़ा सा मिश्रण लेकर गरम तेल में डालिए. एक-एक कर सारे कोफ्ते ब्राउन होने तक तलिए. कोफ्ते तैयार है. इसकी करी बनाने के लिए काजू को आधा घंटे के लिए पानी में भीगने दीजिए. टमाटर, हरी मिर्च, अदरक और काजू को मिक्सी में बारीक पीस लीजिए.

एक कढाई में 2 टेबिल स्पून तेल डालकर गरम करें. गरम तेल में जीरा, हल्दी पाउडर, धनियां पाउडर, लाल मिर्च पाउडर डालिए. अब इसमें पिसा हुआ टमाटर-काजू का पेस्ट डालकर तेल छोड़ने तक भूने. अब एक गिलास पानी और नमक डाल दीजिए. तरी में उबाल आने दें अब इसमें गरम मसाला और हरा धनियां डाल दीजिए. तरी में कोफ्ते डाल कर ढक दीजिए.

आपकी कटहल के कोफ्ते तैयार हैं. इसे पराठे, नान या चावल के साथ परोसिये और खाइए.

शरणागत: कैसे तबाह हो गई डा. अमन की जिंदगी- भाग 3

एक दिन डा. अमन ने नीरा को समझाया, ‘‘खुदगर्ज लोगों के लिए क्यों अपने तन और मन को कष्ट दे रही हैं, जो एक दुर्घटना की खबर सुन कर आप से दूर हो गए. अच्छा हुआ ऐसे खुदगर्ज लोगों से आप का रिश्ता पक्का न हुआ.’’

इस के बाद नीरा अमन को अपना मित्र समझने लगी. वह अमन के आने का बेसब्री से इंतजार करती. अब वह अमन को अपने नजदीक पाने लगी थी. अमन अपने फुरसत के लमहे नीरा के कमरे में बिताता. राजनीति, सामाजिक समस्याओं, फिल्मों, युवा पीढ़ी आदि के बारे में खुल कर बहस होती. अमन का ऐसे रोजरोज बेझिझक आना और बातें करना नीरा के दिल पर लगी चोट को कम करने लगा था.

प्लस्तर खुलने में अब कुछ ही दिन बचे थे. नीरा के घर सूचना भेज दी गई थी. अमन जब नीरा के कमरे में गया तो वह एकाएक अमन से पूछने लगी, ‘‘क्या आप मुझे कोई छोटीमोटी नौकरी दिलवा सकते हैं?’’

अमन ने कारण पूछा तो वह बोली, ‘‘मैं अब घर नहीं जाऊंगी.’’

अमन यह सुन कर हैरान रह गया. अमन ने बहुत समझाया कि छोटीछोटी बातों पर घर नहीं छोड़ देते हैं, पर नीरा ने एक न सुनी.

वह बोली, ‘‘डा. अमन, मैं सिर्फ आप पर भरोसा करती हूं, आप को अपना समझती हूं. आप मेरे लिए कुछ कर सकते हैं? मैं इस समय आप की शरण में आई हूं.’’

अमन गहरी उलझन में पड़ गया. फिर कुछ सोच कर बोला, ‘‘आप का बीए का रिजल्ट तो अभी आया नहीं है. हां, कुछ ट्यूशन मिल सकती है, परंतु तुम रहोगी कहां?’’

यह सुन कर नीरा बेबसी से रो पड़ी. घर जाना नहीं चाहती थी और कोई ठौरठिकाना था नहीं. अमन उसे प्यार से समझाने लगा पर वह जिद पर अड़ गई. बोली, ‘‘मैं तो आप की शरण में हूं. आप मुझे अपना लो नहीं तो आत्महत्या का रास्ता तो खुला ही है,’’ और वह अमन के पैरों में झुक गई.

अमन बहुत बड़ी दुविधा में पड़ गया. उस ने नीरा को दिलासा दे कर पलंग पर बैठाया और फिर तेजी से बाहर निकल डा. जावेद के कमरे में पहुंच गया. वह उन्हें अपना बड़ा भाई व मार्गदर्शक मानता था. अमन ने अपनी सारी उलझन उन्हें कह सुनाई.

सब सुन कर डा. जावेद गंभीर हो गए. बोले, ‘‘मेरे विचार से तुम नीरा और उस के पारिवारिक झगड़े से दूर ही रहो. नीरा अभी नासमझ है. बहुत गुस्से में है, इसलिए ऐसा कह रही है. जब और कोई सहारा न मिलेगा तो खुद ही घर लौट जाएगी. अपनी सगाई न हो पाने का गुस्सा अपने परिवार पर निकाल रही है.’’

डा. जावेद की बातें उस के सिर के ऊपर से निकल रही थीं. अत: वह वहां से चुपचाप चला आया.

अमन सोच रहा था कि लड़की बेबस है, दुखी है. बड़ी उम्मीद से उस की शरण में आई है. अब वह उसे कैसे ठुकरा दे? इसी उधेड़बुन में वह अपने घर पहुंच गया.

अमन को देख मां और पिता खुश हो गए. मां जल्दी से चाय बना लाई. अमन गुमसुम सा अपनी बात कहने के लिए मौका ढूंढ़ रहा था.

पिता ने उस का चेहरा देख कर पूछा, ‘‘कुछ परेशान से लग रहे हो?’’

बस अमन को मौका मिला गया. उस ने सारी बात उन्हें बता दी. मातापिता हैरानपरेशान उसे देखते रह गए. थोड़ी देर कमरे में सन्नाटा छाया रहा. फिर पिताजी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा, ‘‘ऐसा फैसला तुम कैसे ले सकते हो? अपने सगे मातापिता को ठुकरा कर आने वाली दूसरे धर्म वाली से विवाह? यह कैसे मुमकिन है? माना हम गरीब हैं पर हमारा भी कोई मानसम्मान है या नहीं?’’

मां तो आंसू भरी आंखों से अमन को देखती ही रह गईं. उन के इस योग्य बेटे ने कैसा बिच्छू सा डंक मार दिया था. 1 घंटे तक इस मामले पर बहस होती रही पर दोनों पक्ष अपनीअपनी बात पर अडिग रहे.

पिता गुस्से में उठ कर जाने लगे तो अमन भी उठ खड़ा हुआ. बोला, ‘‘मैं नहीं मानता आप के रूढि़वादी समाज को, आडंबर और पाखंडभरी परंपराओं को… मैं तो इतना जानता हूं कि एक दुखी, बेबस लड़की भरोसा कर के मेरी शरण में आई है. शरणागत की रक्षा करना मेरा फर्ज है,’’ कहता हुआ वह बार निकल गया.

अस्पताल पहुंच कर अमन ने अपने खास 2-3 मित्रों को बुला कर उन्हें बताया कि वह नीरा से शादी करने जा रहा है. शादी कोर्ट में होगी.

यह सुन कर सारे मित्र सकते में आ गए. उन्होंने भी अमन को समझाना चाहा तो वह गुस्से में बोला, ‘‘तुम सब ने मेरा साथ देना है बस. मैं उपदेश सुनने के मूड में नहीं हूं.’’

‘विनाश काले विपरीत बुद्धि,’ कह कर सब चुप हो गए. अमन अस्पताल से मिलने वाले क्वार्टर के लिए आवेदन करने चला गया. इस समय उस के दिमाग में एक ही बात चल रही थी कि नीरा उस की शरण में आई है. उसे उस की रक्षा करनी है.

नीरा का प्लस्तर खुल गया था. छड़ी की मदद से चलने का अभ्यास कर रही थी. धीरेधीरे बिना छड़ी के चलने लगी. 4 दिन बाद अस्पताल से छुट्टी होनी थी. अमन ने 2 दिन बाद ही अपने मित्रों के साथ जा कर कोर्ट में नीरा से शादी कर ली. फिर मित्रों के साथ जा कर घर का कुछ सामान भी खरीद लिया. क्वार्टर तो मिल ही गया था. नीरा अमन के साथ जा कर अपने और अमन के लिए कुछ कपड़े, परदे वगैरा खरीद लाई. दोनों ने छोटी सी गृहस्थी जमा ली.

डिस्चार्ज की तारीख को नीरा के पिता उसे लेने आए, परंतु जब उन्हें नीरा की अमन के साथ शादी की सूचना मिली तो उन के पैरों तले की जमीन खिसक गई. मारे गुस्से के वे अस्पताल के प्रबंध अधिकारी और डाक्टरों पर बरसने लगे. वह पुलिस को बुलाने की धमकी देने लगे. ये सब सुन कर अमन और नीरा अस्पताल आ पहुंचे. नीरा को देख पिता आगबबूला हो गए. नीरा पिता के सामने तन कर खड़ी हो गई. बोली, ‘‘आप पहले मुझ से बात करिए. मैं और अमन दोनों बालिग हैं… किसी पर तोहमत न लगाइए. हम ने अपनी इच्छा से शादी की है.’’

नीरा के पिता यह सुन कर हैरान रह गए. फिर पैर पटकते हुए वहां से चले गए. उधर जब अमन के घर यह खबर पहुंची तो मातापिता दोनों टूट गए. पिता तो सदमे के कारण बुरी तरह डिप्रैशन में चले गए. मां के आंसू न थम रहे थे. डाक्टर ने बताया कि मानसिक चोट लगी है. इस माहौल से दूर ले जाएं. तब शायद तबीयत में कुछ सुधार आ जाए. दोनों बहनों ने अपनी बचत से मांपिताजी का हरिद्वार जाने और रहने का इंतजाम कर दिया.

आगे पढ़ें- 2 महीने में ही नीरा अपनी…

ब्रेस्टफीडिंग को बढ़ाने के लिए खाएं ये फूड्स

भारत भर में कई महिलाओं को अक्सर दूध उत्पादन की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. देश के कई हिस्सों में, नई माताओं को बच्चे के जन्म के बाद पहले चालीस दिनों के दौरान ताकत और पोषण प्राप्त करने के लिए कुछ विशेष खाद्य पदार्थों को शामिल किया जाता है, और उसमें से एक प्रसिद्ध ‘गोंद का लड्डू’ है. खाने वाली गोंद, देसी घी, चीनी, किशमिश, नट्स और ड्राई फ्रूट्स इत्यादि से तैयार किया गया, गोंद का लड्डू, कैलोरी से भरपूर होता है और एक नई मां में आवश्यक अतिरिक्त कैलोरी को पूरा करना बहुत ही आवश्यक होता है, और वैसे में जबकि वह नए जन्मे बच्चे को ब्रेस्टफीडिंग कराती है.

नई माताओं में लैक्टेशन को बढ़ावा देने वाले खाद्य और जड़ी-बूटियों को गैलेक्टोगोग्स कहा जाता है. ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली मां के आहार में बहुत सारे प्राकृतिक खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और मात्रा दोनों, माताओं में प्राकृतिक दूध को प्रोत्साहित कर उसे बनाए रखा जा सकता है. तथा, बहुत ज़रूरी है कि जितनी भी नई माताओं को प्राकृतिक रूप से कम दूध आता है, वे अच्छी डाइट और कुछ ख़ास फूड्स का अवश्य सेवन करें.

फूड्स जो कि ब्रेस्टफीडिंग को बढ़ाते है:

1. मेथी: मेथी के बीज और पत्ते दोनों ही ब्रेस्टमिल्क उत्पादन को बेहतर बनाने के लिए बेहद उपयोगी हैं. मेथी एक गैलेक्टागॉग साबित हुआ है जिसका अर्थ है कि इनके बीजों के सेवन से महिलाओं में लैक्टेशन ग्रंथियों को प्रोत्साहित करेगा, जिससे दूध की आपूर्ति बढ़ जाएगी. चूंकि इसका सेवन करना आसान है और इसे कई रूपों में खाया जा सकता है. मेथी के बीज, दूध की आपूर्ति के लिए संघर्ष कर रहे नए माताओं के लिए एक आशीर्वाद रहा है. ब्रेस्टफीड को बढ़ाने के लिए मेथी के बीज का उपयोग सबसे महत्वपूर्ण रहा है.

2. पालक: यह आयरन का एक उत्कृष्ट स्रोत है. आयरन ऊर्जा को बहाल करने और एनीमिया और कमजोरी से लड़ने में मदद करता है. किसी भी संक्रमण से बचने के लिए, खासकर मानसून के दौरान, पालक को सेवन से पहले अच्छी तरह से उबाला जाना चाहिए.

3. सौंफ: सौंफ या सौंफ के बीज फाइबर युक्त होने के अलावा, यह पोटेशियम, फोलेट, विटामिन सी, विटामिन बी -6 और फाइटोन्यूट्रिएंट से भी भरा हुआ है.साथ ही इनमें ओस्ट्रोजेनिक गुण होते हैं. इसीलिए सौंफ भी नई माताओं में दुग्ध उत्पादन में मदद करते हैं.

4. लौकी: यह सब्जी ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली महिला को अच्छी तरह से हाइड्रेटेड रखने में मदद करती है. लौकी पानी से भरा है, जो आपके शरीर को हाइड्रेटेड रखता है. साथ ही विटामिन सी, ए और के का एक समृद्ध स्रोत भी है और सोडियम, कैल्शियम, आयरन, जिंक और मैग्नीशियम जैसे आवश्यक खनिजों में भी समृद्ध है. इसीलिए लौकी का सेवन भी नई माताओं में दुग्ध उत्पादन करने में मदद करते हैं.

5. नट्स: ये सेरोटोनिन का एक उत्कृष्ट स्रोत हैं, जो लैक्टेशन को बढ़ाने में मदद करता है. साथ ही ये विटामिन और स्वस्थ ओमेगा- 3 फैटी एसिड से भरपूर होते हैं. ब्रेस्टफीडिंग के एक सत्र के बाद मुट्ठी भर काजू और बादाम को मिलाकर उसे बारीकी से पीसकर एक पाउडर बनाएं और स्मूदी और फ्रूट जूस में मिलाकर इसका सेवन करें.

6. लहसुन: यह ब्रेस्टफीडिंग कराने के लिए सबसे अच्छा खाद्य पदार्थों में से एक है. आहार में एक नया स्वाद प्रदान करने के अलावा, यह एक उत्कृष्ट पाचन के रूप में भी कार्य करता है.

लगभग 88% ब्रेस्टमिल्क पानी से बना होता है, एक ब्रेस्टफीडिंग कराने वाली मां के लिए ज़रूरी है कि वह खुद को अच्छी तरह से हाइड्रेटेड रखें. ब्रेस्टफीडिंग कराने के दौरान नई माताओं को बहुत अधिक भूख और प्यास लगना स्वाभाविक है. ऐसे कई युवा माताओं को इन समान चुनौतियों से निपटने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा होंगा. ऐसे में, इन सभी खाद्य पदार्थों का बारी-बारी से सेवन करते रहें और मातृत्व का आनंद उठाते रहें.

डौ. रीता बक्शी, स्त्री रोग विशेषज्ञ व आईवीएफ एक्सपर्ट, इंटरनेशनल फर्टिलिटी सेंटर

जानें क्यों होते हैं इमोशनल अफेयर्स

कहते हैं इंसान के विचार समुद्र की लहरों की तरह हरदम मचलने को तैयार रहते हैं, वहीं उस की भावनाओं की कोई थाह नहीं होती और यही भावनाएं हमें अपनों से जोड़े रखती हैं. भावनात्मक रिश्ता सीधा दिल से जा कर जुड़ता है. जरूरी नहीं कि भावनात्मक रिश्ता सिर्फ अपनों से ही जोड़ा जाए बल्कि यह कभी भी किसी के भी साथ जुड़ सकता है.

कई भावनात्मक रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन का कोई नाम नहीं होता. इन में एकदूसरे के प्रति प्रेम, अपनेपन का भाव होता तो है लेकिन जरूरी नहीं कि इन के बीच शारीरिक आकर्षण भी हो. इसे हम दिल का रिश्ता कहते हैं. इस में उम्र का कोई बंधन नहीं होता है.

पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के 24 वर्षीय बेटे बिलावल भुट्टो और पाकिस्तान की 35 वर्षीय विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार के बीच कुछ ऐसा ही रिश्ता देखने को मिला, जिस में उम्र का कोई बंधन नहीं दिखा.

क्यों होता है इमोशनल अफेयर

आज के तनाव भरे माहौल में लोग सुकून के पल तलाशते हैं. खासकर विवाहित पुरुष चाहते हैं कि घर पहुंच कर पत्नी उन की बातों को सुने व समझे, लेकिन घर के कामों व औफिस के बीच उलझी पत्नी, जब ऐसा नहीं कर पाती तो पति वह सुख बाहर तलाशने लगता है. अधिकतर देखा गया है कि कुछ विवाहित लोग अपने साथी को भावनात्मक लगाव प्रदान नहीं कर पाते या अपनी व्यस्तता के कारण अपने साथी को जरूरी समय नहीं दे पाते. ऐसे में उन के साथी का ध्यान अपने दोस्तों या सहकर्मियों की तरफ जाता है और वह अपना अधिक समय उन के साथ बिताने लगता है.

अगर इन दोस्तों या सहकर्मियों के बीच उसे ऐसा व्यक्ति मिल जाए, जो उस के रोते मन को भरने में सफल रहे तो उस व्यक्ति से रिश्ता बनने में ज्यादा समय नहीं लगता, क्योंकि आजकल अधिकतर लोग अकेलेपनके दौर से गुजर रहे हैं.

इस बारे में बालाजी ऐक्शन मैडिकल इंस्टिट्यूट की मनोवैज्ञानिक शिल्पी का कहना है, ‘‘आजकल समय की कमी के कारण अपने साथी से इमोशनल सपोर्ट न मिल पाना एक आम बात है. उसे जहां इमोशनल सपोर्ट मिलता है, वह उस तरफ आकर्षित होता चला जाता है. आजकल शारीरिक जरूरतें और सुंदरता प्राथमिकता नहीं हैं, क्योंकि हर रोज इंसान की जरूरतें बदल रही हैं. आज सब को अपने स्तर का साथी चाहिए, जिस के साथ वह अपने विचारों का आदानप्रदान कर सके.

‘‘यह मानव स्वभाव है कि खाना, पीना, सैक्स, सेफ्टी मिले तो हम सेफ महसूस करते हैं. समझसमझ की बात है आजकल लोगों का नजरिया बदल रहा है. युवावस्था में बच्चों को ऐक्सपोजर मिल रहा है और फिर कहते हैं न ‘दिल तो बच्चा है जी’ वह कभी भी किसी पर भी आ सकता है.’’

शिल्पी कहती हैं, ‘‘अगर आप के स्तर का साथी आप को नहीं मिला है, तो इस का मतलब यह नहीं कि आप उसे छोड़ दें या दूसरी तरफ मुड़ जाएं. आप को जरूरत है समझदारी दिखाने की. आप समझदारी दिखा कर रिश्ते को संभाल भी सकते हैं. जहां तक हो सके रिश्ते को संभालने की कोशिश करें.

‘‘किसी से इमोशनल रिश्ता जोड़ने से पहले सोचिए, समझिए. क्या वास्तव में इमोशनल रिश्ता है या सिर्फ टाइम स्पैंड करने के लिए एक साथी की जरूरत है. यह भी सोचिए कि यह इमोशनल रिश्ता कितने समय तक चलेगा. अगर आप किसी के साथ खुश रहते हैं, तो आप में हैप्पी हारमोंस आते हैं जो आप के जीवन में त्वरित बदलाव लाते हैं.‘‘

भावनात्मक लगाव निंदनीय नहीं है

कुछ लोग इमोशनल अफेयर्स में कोई बुराई नहीं मानते, क्योंकि उन्हें ऐसा महसूस होता है कि यह सिर्फ एक भावनात्मक जुड़ाव है. इसलिए इस का वैवाहिक जीवन पर कोई असर नहीं पड़ेगा. भावनाएं हमारे व्यक्तित्व का अभिन्न अंग हैं. दिमाग के 2 मुख्य हिस्से होते हैं. एक तार्किक होता है, जो चीजों को तर्क के हिसाब से देखता है और दूसरा भावनात्मक, जिस का तर्क से दूरदूर तक कोई रिश्ता नहीं है. जब भी किसी से कोई नया रिश्ता जुड़ता है, तो वह भावनात्मक रूप से ही जुड़ता है.

किसी भी व्यक्ति के साथ भावनात्मक लगाव पहले से ही निर्धारित नहीं होता, न ही इस का कोई अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोई कब, कहां, किस के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ जाए और यह  लगाव इतना गहरा हो जाए कि व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित महसूस करने लगे.

भावनात्मक लगाव ही व्यक्ति का मनोबल बढ़ाता है. उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं, जिस से व्यक्ति के जीवन में उत्साह बना रहता है और यही उत्साह सुकून दिलाता है. ऐसे रिश्ते को गलत नजरिए से न देखते हुए एक भावनात्मक रिश्ते की शुरुआत कह सकते हैं, जिस में एक ऐसा दोस्त जिस के साथ वह अपने सुखदुख बांट सके, जो उस की परेशानियों में उस का भरपूर साथ दे. कदमकदम पर अच्छेबुरे का ज्ञान कराए.

अपने जीवन में उपेक्षा झेल रहे व्यक्ति का बाहर किसी दोस्त के साथ एक स्वस्थ संबंध बनाना गलत नहीं है. अगर उस नए संबंध के कारण वह खुशी के चार पल बिता ले, तो इस में कुछ बुराई नहीं है.

भावनात्मक जुड़ाव में असुरक्षा

किसी भी व्यक्ति का अकेला होना भावनात्मक असुरक्षा का सब से बड़ा लक्षण होता है. जब कोई अपनों के बीच रहते हुए भी अकेलापन महसूस करे, तो उस में असुरक्षा की भावना पनपने लगती है. इस के कई कारण हैं

– कई बार व्यक्ति बिना वजह ही छोटीछोटी बातों पर गुस्सा हो जाता है या चिड़चिड़ा हो जाता है, जिस से भावनात्मक रिश्ते प्रभावित होते हैं.

– भावनात्मक असुरक्षा में व्यक्ति केयरलैस हो जाता है और अपने साथी की कोई परवा नहीं करता.

– उपेक्षा झेल रहा साथी तनाव के दौर से गुजरता है. उस का किसी काम में मन नहीं लगता.

– कई बार ऐसा होता है कि उन के संबंधों में दरार आ जाती है, जब एक साथी सही तरीके से प्रतिक्रिया नहीं करता तो दूसरा साथी भावनात्मक रूप से परेशान हो जाता है.

– कुछ लोग जब भावनात्मक रूप से किसी अन्य व्यक्ति से जुड़ जाते हैं, तब उन्हें कुछ खोने या अपने साथी से दूर होने का डर सताता है.

गहरे होते हैं भावनात्मक धोखे

भावनात्मक धोखे सैक्सुअल धोखे से कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं, क्योंकि इस में व्यक्ति पूरी तरह से दिल से जुड़ा होता है. जब यह टूटता है, तो व्यक्ति अवसाद की स्थिति में पहुंच जाता है.

भावनात्मक शोषण से बचने के लिए जरूरी है मानसिक, भावनात्मक और व्यावहारिक तैयारी से स्वयं को मजबूत बनाया जाए.

भटकते मन को दिशा मिल गई- भाग 3

‘‘और हां पापा बेफिक्र रहिए, मैं कभी कोई ऐसा काम नहीं करूंगी, जिस से आप की प्रतिष्ठा पर आंच आए. जौय हमेशा से मेरा सब से अच्छा दोस्त रहा है और भविष्य में भी रहेगा. उस के साथ दोस्ती के अलावा मेरा और कोई रिश्ता नहीं. मैं आप को भरोसा दिलाती हूं, इस रिश्ते में कभी किसी भी हालत में कोई और ऐंगल नहीं आने वाला,’’ यह कहते हुए वह वहां से चली गई.

बहू के मुंह से दोटूक बातें सुन कर यश के पिता का खून खौल गया. वह उसे सुनासुना कर पत्नी के सामने खूब चिल्लाए, समाज में घोर बदनामी का डर दिखाया, लेकिन चारुल अपने फैसले से टस से मस नहीं हुई. उस ने ससुर से स्पष्ट कह दिया, ‘‘अब मेरा काम ही मेरी पूजा है. आप मु?ो किसी भी हालत में अमेरिका जाने से नहीं रोक सकते.’’

सास तो शुरू से बहू के बाहर जा कर काम करने के सख्त खिलाफ थीं. इसलिए उन्होंने भी बहू के पराए मर्द के साथ विदेश जाने की बात पर खूब जहर उगला.

जो सासससुर कभी चारुल की बड़ाई करते नहीं अघाते थे, उन्होंने ही उसे आज बेटे की मौत के बाद बिना किसी दोष के कटघरे में खड़ा करने में 1 मिनट नहीं लगाया, यह सोचसोच कर चारुल का हृदय छलनी हो गया.

उस रात चारुल बेहद बेचैन रही. रातभर उसे यश के सपने आते रहे. सपने में पति को अपने इर्दगिर्द देखने के बाद नींद खुलने पर वास्तविकता का एहसास बेहद पीड़ादायी था.

भोर हो आई थी कि तभी अचानक चारुल की आंख खुली. जेहन में अभीअभी देखा गया सपना तरोताजा था.  चारुल ने सपने में मृत पति को अपनी मृत्यु से पहले उसे कहे गए अल्फाज दोहराते हुए देखा ‘‘चारुल, मेरे जाने के बाद अपने ढंग से खुशीखुशी जीना. किसी के भी दवाब में मत आना.  तुम्हें सुकून से जिंदगी बिताते देखना मेरी जिंदगी की आखिरी तमन्ना है. तुम्हें सुखी देखूंगा तो मेरी रूह को बहुत सुकून मिलेगा.’’

भटकते मन को दिशा मिल गई थी. सुबहसवेरे उठ कर उसने हमेशा की तरह सासससुर के पैर छूए और उन्हें चाय नाश्ता दे औफिस आ गई.

उस दिन के बाद सासससुर ने उस से बात करना बंद कर दिया था. वह उन के कमरे में जाती तो वे दोनों मुंह फेर लेते, लेकिन वह हमेशा की तरह उन की सेवा करती रही. उन का खानपान, दवाई, देखभाल पहले की तरह ही करती रही.

अब उस का मन शांत था. जब भी तनिक सी बेचैनी फील करती, आंखें मूंद लेती और यश की बातें याद करती कि उसे अब वही करना है जो उसे खुशी दे. परेशानी के इस आलम में उस की स्कूल के जमाने की कुछ सहेलियों ने उस का बहुत साथ दिया. जब भी वह मायूस होती वे उसे हौसला बंधातीं कि अब उस का फोकस बस उस की अपनी खुशी होनी चाहिए. उस ने पिछले कुछ बरस उस घर के प्रति पूरी शिद्दत से अपनी ड्यूटी निभाई है. दिनरात पति की बीमारी, घर के डूबते व्यापार को उठाने और वृद्ध सासससुर के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाने में अपनेआप को जीवट से ?ांका है.

इतने बरसों से यश की बीमारी के चलते कोई सोशल फंक्शन या शादीब्याह अटेंड नहीं किया. अब उसे चैन की सांस लेने का पूरापूरा हक है.

इसलिए सासससुर के प्रतिरोध के बावजूद भी वह किसी भी प्रकार की अपराध भावना के बिना अमेरिका यात्रा पर आ गई. टीवी मद्धम आवाज में चालू था कि तभी दरवाजे पर खटखट की आवाज हुई. वह अतीत के गलियारों से वर्तमान में लौट आई.

अलसाते हुए क्विल्ट से बाहर निकल कर उस ने दरवाजा खोला. सामने जौय खड़ा था.

‘‘चारुल, यार मैं तो पार्क से लौट कर पूरे

2 घंटे गहरी नींद में सोया. चलो अब थोड़ा न्यूयौर्क की नाइट लाइफ ऐक्सप्लोर करते हैं. यहां आ कर किसी बार में नहीं गए तो क्या देखा यार?’’

‘‘जौय प्लीज, तुम अकेले ही चले जाओ, बार जाने की मेरी कतई इच्छा नहीं. तुम्हें तो पता है, मैं अपने ड्रिंक्स बिलकुल एंजौय नहीं करती. तो मैं वहां जा कर तुम्हारी शक्ल देखने के अलावा आखिर करूंगी क्या?’’

‘‘अरे, मैं अकेला कहीं नहीं जाने वाला. चलो मैं ठीक आधे घंटे में आता हूं. तुम तैयार हो जाओ.’’

‘‘ओह जौय प्लीज, मेरी बात मानो.’’

‘‘नहीं, तुम्हें आज मेरे साथ चलना ही होगा. चिल करना यार थोड़ा. यह पूरा वीक इतना हेक्टिक गया है, थोड़ा रिलैक्स करना तो बनता है न, मैं ने एक बहुत डीसेंट बार चुना है. तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा.’’

‘‘उफ तुम नहीं मानोगे.’’

आधे घंटे बाद जौय और चारुल न्यूयौर्क के एक हैपिनिंग बार में थे. मद्धम रंगीन रौशनी और मधुर संगीत के बीच हाथों में हाथ थामे महिला और पुरुष डांस फ्लोर पर ?ाम रहे थे.’’

वहां मौजूद लोगों में से एक लड़की डांस फ्लोर पर डांस करने लगी. नशे में मदमस्त उस ने थोड़ी देर तो डांस किया और फिर अपनी पहनी हुए जैकेट उतार कर जमीन पर फेंक दी. समां नशीला हो चुका था. लड़की को देख कर चारों ओर से कैट काल्स उठ रही थीं. इस माहौल में चारुल अकेली जौय के साथ कुछ असहज महसूस करने लगी थी कि तभी उस ने जौय से कहा, ‘‘जौय, चलो, रात के 2 बजने आए, होटल चलते हैं.’’

‘‘बैठो न यार, अभी तो रीयल पार्टी शुरू हुई है, चारुल,’’ यह कहते हुए उस ने उस के हाथों पर अपने हाथ रख दिए. उसे लगा था, बीतते हुए लम्हों के साथ उस के हाथों का दवाब उस के हाथों पर बढ़ता ही जा रहा था.

तभी चारुल एक ?ाटके से उठी और खिन्न मन से क्लब से बाहर आ गई. जौय उसे रोकतेरोकते उस के पीछे आया, लेकिन वह अगले ही क्षण एक कैब में बैठ कर होटल के लिए रवाना हो गई.

आज क्लब में जो कुछ हुआ, उस से चारुल अच्छा फील नहीं कर रही थी. उस के हाथों पर अपना हाथ रख जिन गहरी, भेदती, सीने में उतरती आंखों से जौय ने उसे देखा, वह उसे कतई अच्छा नहीं लगा. उस की छटी इंद्रिय कह रही थी, जौय उसे गलत वे में मूक आमंत्रण दे रहा था.

कपड़े बदल वह बिस्तर पर आ गई, लेकिन आज नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. अंतर्मन में जौय की शख्सियत के आज के रूप को ले कर गहन चिंतन जारी था. इस मुद्दे पर बेहद गंभीरता से सोच वह अपने लैपटौप पर एक ईमेल टाइप करने लगी.

उस ने अपने मातहत एक विश्वासपात्र कर्मचारी मोहा की अगले ही दिन की न्यूयौर्क की टिकट बनवाई और उसे भेज दी. साथ ही उसे इन्फौर्म कर दिया कि अब से वह उस की पर्सनल सैक्रेटरी रहेगी. शहर के बाहर हर टूर पर उस के साथ रहेगी. इस मेल की कौपी उस ने जौय को भेज दी.

उस की असहजता गायब हो चुकी थी. मन ही मन उस ने सोचा, ‘किसी को यह हक नहीं कि मेरी खुशियों में रोड़े अटकाए.’

उस ने एक लंबी सांस ली और सुकून से आंखें मूंद लीं.

अंतर्द्वंद्व: आखिर क्यूं सीमा एक पिंजरे में कैद थी- भाग 2

‘‘खूबसूरत और प्रतिभाशाली बीवी की प्रशंसा हर शौहर को करनी चाहिए,’’ सतीशजी ने मुसकराते हुए कहा तो किसी पराए मर्द की ऐसी बातें सुन कर सीमा सकुचा गई.

सतीशजी के यह कहने के बाद रमेशजी एक नजर सीमा पर डाली. सतीश सही कह रहे थे. सीमा वास्तव में खूबसूरत थी. उजला रंग, तीखे नैननक्श और सांचे में ढला हुआ बदन, वह ढलती उम्र में भी बहुत खूबसूरत लग रही थी. मगर कुछ सामाजिक दायरों का लिहाज होने के कारण वे उस समय उस की प्रशंसा तो नहीं कर सके पर वे मन ही मन सीमा की खूबसूरती के कायल जरूर हो गए. सतीशजी के बारबार कहने पर सीमा ने अपनी बनाई हुई कुछ पेंटिंग्स रमेशजी को दिखाईं.

‘‘कमाल है. आप के हाथों में तो जादू है. काफी खूबसूरत पेंटिग्स हैं. शायद मेरी वाली से भी अधिक. आप को तो फिर से पेंटिंग्स बनाना शुरू कर देना चाहिए.’’

‘‘यही तो मैं कहता हूं,’’ सतीश ने रमेशजी की बात का समर्थन करते हुए कहा.

 

हालांकि सीमा बहुत शर्मीले स्वभाव

की थी परंतु रमेशजी के खुले

और मिलनसार व्यक्तित्व को देख कर उस की ?ि?ाक थोड़ी कम हो गई थी. इस पर रमेशजी और अपने पति सतीश से मिली प्रशंसा ने उस का मनोबल भी बढ़ा दिया और उस ने मन ही मन सोचा कि मु?ो फिर से अपनी कला को प्रज्ज्वलित करना चाहिए.

वह बोली, ‘‘आप ठीक कहते हैं मु?ो फिर से पेंटिंग्स बनाना शुरू कर देना चाहिए. वैसे भी इन दिनों पारिवारिक जिम्मेदारियां कम होने के कारण अकेलापन भी अधिक महसूस होता है. पेंटिंग्स बनाने से थोड़ा वक्त भी कट जाएगा.’’

और एक दिन सीमा ने फिर से पेंटिंग्स बनाने का मन बना कर ब्रश, रंगों और कैनवस की दुनिया में प्रवेश किया.

जब पेंटिंग्स तैयार हो गईं तो वह स्वयं हैरान थी कि  उस की कला अभी तक मरी नहीं थी क्योंकि पेंटिंग्स बहुत खूबसूरत बनी थीं. सतीश को पेंटिंग्स दिखाती हुई सीमा ने कहा, ‘‘रमेश बाबू की प्रेरणा से ही मैं अपनी इस कला को पुनर्जीवित कर पाई हूं. इसलिए इन पेंटिंग्स की तारीफ पाने के असली हकदार तो वही हैं.’’

सतीशजी भी सीमा की कला की दाद दिए बिना नहीं रह सके और इसी खुशी में उन्होंने तुरंत रमेशजी को फोन मिलाया.

‘‘सर आप के प्रोत्साहन से मेरी पत्नी ने फिर से पेंटिंग्स बनाना शुरू कर दिया है और बहुत ही सुंदर पेंटिंग्स बनाई हैं. आप ही उस की प्रेरणा के स्रोत हैं. यह सब आप के प्रोत्साहन से ही संभव हुआ है. आज सीमा बहुत खुश है. वह आप को धन्यवाद देना चाहती है. लीजिए सीमा आप से बात करेगी,’’ कह कर उन्होंने फोन सीमा को पकड़ा दिया.

चूंकि सीमा संकोची स्वभाव की थी. अत: उस ने इशारे से बात करने के लिए मना किया परंतु सतीश के पुन: आग्रह करने पर उस ने फोन हाथ में लिया और धीरे से कहा, ‘‘आप ने मु?ो फिर से पेंटिंग्स करने के लिए प्रोत्साहित किया उस के लिए मैं आभारी हूं.’’

‘‘इस में आभार कैसा. मैं नहीं कहता तो कोई और कहता क्योंकि आप में योग्यता है और वह एक न एक दिन तो बाहर आनी ही थी.’’

अब तो सीमा की दबी कला ने फिर से जोर मारना शुरू कर दिया और वह तन्मयता से अपनी इस कला को उभारने में जुट गई. शीघ्र ही उस ने 10-12 सुंदर पेंटिंग्स और बना लीं.

 

दोपहर का वक्त था. सीमा खाना खा कर आराम

करने ही जा रही थी कि तभी फोन की घंटी बजी.

‘‘हैलो सीमाजी, मैं रमेश बोल रहा हूं,’’ सीमा के हेलो बोलते ही उधर से आवाज आई.

‘‘नमस्ते सर,’’ इस तरह अचानक रमेशजी का फोन आया देख सीमा हैरान थी. हालांकि रमेशजी जब घर आए थे तो सतीश ने उन्हें सीमा का नंबर दिया था परंतु वे इस तरह उसे फोन करेंगे उस ने नहीं सोचा था.

रमेशजी बोले, ‘‘सीमाजी, हमारे शहर में एक कला प्रदर्शनी लग रही है. मैं चाहता हूं कि आप की पेंटिंग्स भी उस प्रदर्शनी में लगाई जाएं. मेरे खयाल से काफी अच्छा रिस्पौंस आएगा.’’

रमेश बाबू की बात सुन कर सीमा घबरा गई और बोली, ‘‘नहींनहीं मैं अभी उस प्रदर्शनी में पेंटिंग्स नहीं लगा सकती. अभी मेरी कला इतनी उत्कृष्ट नहीं हुई है कि मैं उस की प्रदर्शनी करूं.’’

सीमा की बात सुन कर रमेश बोले, ‘‘हीरे की कदर स्वयं हीरा नहीं जानता. मेरे कहने से तुम उस प्रदर्शनी में हिसा लो. यह प्रदर्शनी तुम्हारी कला के लिए एक नए आयाम खोल देगी. तुम एक अच्छी कलाकार तो हो परंतु तुम्हारे अंदर आत्मविश्वास की कमी है. इस प्रदर्शनी में अपने चित्रों का प्रदर्शन कर के तुम अपना आत्मविश्वास बढ़ा सकती हो. यह तुम्हारे लिए बहुत अच्छा मौका है.’’

‘‘मगर इतनी पेंटिंग्स को प्रदर्शनीस्थल तक पहुंचाना भी बहुत कठिन कार्य है. मेरे पति बहुत व्यस्त रहते हैं. शायद वे इस काम के लिए समय नहीं निकाल पाएं,’’ सीमा ने प्रदर्शनी में न जाने का एक और सटीक बहाना सोचा.

‘‘आप उस बात की चिंता मत करो. मैं अपनी पेंटिंग्स भी उस प्रदर्शनी में लगा रहा हूं. मैं अपनी पेंटिंग्स के साथ आप की पेंटिंग्स भी ले जाऊंगा और यदि आप जाना चाहेंती तो आप को भी अपने साथ ले जाऊंगा. मेरे खयाल से आप को प्रदर्शनी में हिस्सा जरूर लेना चाहिए.’’

अब सीमा के पास कोई बहाना नहीं बचा था. प्रदर्शनी का दिन आ पहुंचा. सीमा और रमेश बाबू अपनीअपनी पेंटिंग्स समेत प्रदर्शनीस्थल पर पहुंच गए और जैसाकि अपेक्षित था सीमा की पेंटिंग्स को बहुत अच्छा रिस्पौंस मिला.

यह देख कर सीमा फूली न समाई और घर आ कर सतीश से बोली, ‘‘यदि रमेशजी आग्रह न करते तो मैं कभी इस प्रदर्शनी में नहीं जाती. उन के कारण ही आज मु?ो इतनी प्रसिद्धि हासिल हुई है.’’

सतीशजी तो पहले ही रमेशजी के कायल थे. इस घटना के बाद और हो गए और इस के बाद रमेशजी, सतीश और सीमा के मिलनेजुलने का सिलसिला चल निकला.

दिखावा: अम्मा से आखिर क्यूं परेशान थे सब- भाग 1

दादीकी चिता में चाचा ने आग दी. ताऊ अपने 2 बच्चों के साथ अमेरिका जा कर बस गए थे. चिता धूधू कर जल उठी. गंगा के किनारे की तेज हवा ने आग में घी का काम किया. चिता की प्रचंड अग्नि ने सर्दी के उस मौसम में भी पास खड़े लोगों को काफी गरमाहट का अनुभव करा दिया.

करीब 50-60 लोगों की भीड़ में मैं भी शामिल था. मैं ने बड़े ही कुतूहल से दादी के अस्पताल जाने से ले कर उन के इलाज और उन के मरने तक की घटनाओं के अलावा उन्हें श्मशान घाट तक ले जाने में बरती गई तमाम पुरातनवादी रूढि़यों को देखा था, उन्हें सम?ाने का प्रयास किया था, पर मेरी सम?ा में यह नहीं आया था कि नियमों का पालन क्यों आवश्यक था या इन के न मानने से क्या नुकसान हो जाने वाला था? मैं ने पहली बार इस तरह की मौत को नजदीकी से देखा था.

अम्मांजी के 3 दामादों में मैं सब से छोटा दामाद हूं. अम्मांजी की शवयात्रा में शामिल होना मेरे लिए इस तरह का पहला अनुभव था.

10 दिसंबर की सुबह नहाते समय दादीजी स्नानगृह में ही गिर गई थीं. काफी खून निकला था. उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया था. डाक्टर का कहना था कि दिमाग की नस फट गईर् है.

मु?ा से जो करते बना, मैं ने किया. मेरी पत्नी तो अपनी दादी की सेवा के लिए रातदिन अस्पताल में ही रही. असल में वे मेरी दादी नहीं, मेरी पत्नी की दादी थी. मेरी पत्नी की मां थी. जल्दी मृत्यु होने के बाद दादी ने उस की देखभाल की थी. मेरी पत्नी के पिता कुछ साल पहले ही गुजरे थे. इसीलिए पूरे घर में मेरी और मेरी पत्नी की दादी से खूब बनती थी.

मेरी 2 बड़ी सालियां चाचा की बेटियां व अम्मांजी की एकमात्र बहू चाची बेटियों के अपने पूरे बच्चों सहित दोपहर को अस्पताल पहुंचती थीं. शाम तक पूरी टीम दादी के पास बैठने के बजाय बाहर मटरगश्ती ज्यादा करती थी. मैं जब भी कभी वहां पहुंचता अपनी चचेरी सालियों को कभी चाय तो कभी कौफी पीते हुए, तो कभी बाहर सड़क पर टहलते हुए पाता था. एक बार पूछा तो कहने लगीं, ‘‘यहां सर्दी काफी है. बच्चों को ठंड न लग जाए, इसलिए धूप का सेवन बेहद जरूरी है.’’

मैं सवाल करता, ‘‘फिर आप लोग बच्चों को यहां क्यों ला रहे हैं? कुछ लोग घर ठहर जाया करें. कुछ रात में आ जाया करें.’’

एक छूटती ही बोली थी, ‘‘मेरे बच्चे मेरे साथ ही आएंगे. मैं उन्हें किसी के भरोसे छोड़ कर क्यों आऊं? रात में बच्चों को यहां सुलाना ठीक नहीं, क्योंकि बच्चों को इन्फैक्शन हो जाता है. घर ही सब से सुरक्षित जगह है. मैं स्वयं इन्फैक्शन के डर से नहीं आना चाहती पर क्या करूं, मां कहती हैं तो आना पड़ता है. नहीं आऊंगी तो लोग क्या कहेंगे (गोया वह रिश्तेदारों के तानों के डर से यहां आ रही थीं) दूसरे दादी भी तो दीप्ति को ही मानती हैं, अब दीप्ति ही उन्हें देखे.’’

मैं इस जवाब से निरुत्तर हो गया था. वे दोनों बहनें व दीप्ति की चाची इस जवाब से प्रसन्न नजरा आ रही थीं. मैं सोचने लगा, ‘शायद मैं ही बेवकूफ हूं जो यहां पड़ा हूं.’

मगर तुरंत दूसरा विचार मन में आ गया, ‘दीदी हैं. सेवा करने में क्या हरज है. सब नालायक सही पर मैं तो नालायक नहीं.’ इन्हीं दादी की वजह से मेरी दीप्ति से शादी हो गई थी. चाचाताऊ तो उस की शादी में इंटरैस्ट ही नहीं ले रहे थे. मेरी शादी पर दादी ने ही बढ़चढ़ कर हम दोनों के प्रेम विवाह पर मुहर लगाई थी. चाचाचाचियां तो दीप्ति को किसी टीचर से बांध देना चाहते थे. मैं दक्षिणी भारतीय था और दादी  ने न जाति पूछी, न मेरे घरवालों के बारे में पूछा. उन्हें दीप्ति पर पूरा भरोसा था.

जब से दादी बूढ़ी होने लगी थीं, दीप्ति ही उन का सारा काम करती थी. काम यह उन का बचपन से करती आई थी पर मेरे साथ एमबीए करने के बाद उसी एनएनसी में काम करने के बाद भी उन के छोटेछोटे काम दीप्ति के हवाले थे. दीप्ति और मैं दोनों अनाथ से थे. मु?ो भी दादी ने वही प्यार दिया जो मु?ो कभी किसी से नहीं मिला इसलिए रातदिन उन की अस्पताल में सेवा करते हुए हम दोनों को खुशी ही हुई, दादी भला बो?ा कैसे हो सकती है? चाचाओंचाचियों की वे जानें.

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