मुझे माफ कर दो- भाग 2

मगर उस दिन रश्मि को उस पर संदेह हो गया. उस ने टीचर से उस की शिकायत

कर दी और फिर टीचर ने उस के बैग की तलाशी ली, तो कवर में छिपाए रुपए चमक उठे. उस दिन उस की बहुत बेइज्जती हुई क्योंकि मैडम ने उस की पीठ पर एक कागज में बड़ेबड़े अक्षरों से लिख कर ‘मैं चोर हूं’ टांग दिया. उस दिन वह बहुत जलील हुई और सिसकसिसक कर खूब रोई थी. उस दिन उस ने मन ही मन निश्चय किया कि अब कभी ऐसा नहीं करेगी, परंतु घर आतेआते उस की सोच बदल चुकी थी. घर में उस ने मां से बताया कि रश्मि ने उसे ?ाठमूठ फंसाया. पहले तो उन्होंने रश्मि को खूब खरीखोटी कहा और फिर से मंदिर में ले जा कर कान पकड़ कर पुजारी के सामने माफी मांगने को कहा और उन्हें दक्षिणा में रुपए दिलवा कर बोली, ‘‘भगवान उस की गलती को माफ कर दें.’’

अब तो उस का हौसला पहले से अधिक बढ़ गया था. पाप के प्रायश्चित्त का बड़ा ही सरल सा तरीका था. उस ने रोधो कर दूसरे स्कूल में ऐडमिशन ले लिया था और अपनी चोरी के काम से लोगों को शिकार बनाती रही.

कुछ दिनों तक सजल उस से नाराज रहे. उसे डांटतेफटकारते, ताने देते और आंखें तरेरते. फिर धीरेधीरे नौर्मल हो गए.

दूसरों का सामान उठाना नीरा की आदत में शुमार हो गया था. वह जहां भी जाती मौका मिलते ही चुपचाप कुछ भी उठा कर अपने पर्स के हवाले कर लेती.

नीरा को अपने गलत काम का एहसास था, पर वह इतना

ही जानती थी कि वह पाप कर रही है इसलिए इस के निवारण के लिए व्रत, उपवास, कीर्तन, सुंदरकांड का पाठ आदि कर के अपने पाप और अपराध के लिए क्षमायाचना कर के पापमोचन कर लेती थी.

नीरा ने धार्मिक गुरुओं के प्रवचनों और धार्मिक पुस्तकों में पढ़ा और सुना

था कि किस सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने से व्यक्ति के सारे पाप धुल हो जाते हैं. इसी कारण उस के घर मे धार्मिक आयोजन जैसे

कथा, कीर्तन, सुंदरकांड जबतब आयोजित होते ही रहते थे.

किसी शौप से सेल्समैन की निगाह बचा कर नीरा कई बार साड़ी जैसी चीज भी अपने बैग में रख कर ले आई थी. कौस्मैटिक तो वह अधिकतर चुरा कर ही ले आया करती. दूसरों की ड्रैसिंगटेबल से छोटी सी आइटम उठाने में उसे जरा भी देर नहीं लगती. होटल से चम्मच, नैपकिन और टौवेल चुराना तो वह जैसे अपना अधिकार ही सम?ाती थी.

एक दिन होटल के चम्मच देखते ही सजल पहचान कर उन पर चिल्ला पड़े, ‘‘तुम्हारी चोरी की आदत नहीं छूटेगी. किसी दिन खुद भी मुसीबत में फंसेगी और मु?ो भी फंसाएंगी. खबरदार आइंदा मैं ने घर में इस तरह की चोरी की कोई चीज देखी तो बहुत बुरा परिणाम तुम्हें भुगतना पड़ेगा.’’

जल्दीजल्दी पति का ट्रांसफर नीरा के लिए सोने में सुहागा जैसा ही था. उस के द्वारा आयोजित धार्मिक आयोजनों के कारण वह सब की निगाहों में सीधीसादी पूजापाठ करने वाली धार्मिक महिला ही सम?ा जाती थी. वैसे तो वह पढ़ीलिखी फैशनेबल स्मार्ट महिला थी. किसी तरह का कोई भी अभाव नहीं था. पति अफसर थे और वह स्वयं भी खुशमिजाज और मिलनसार महिला थी. मंदिर जाना, घंटों पूजापाठ करना, माला जपना आदि के कारण उस के कंधों पर धार्मिक आवरण पड़ा हुआ था.

नीरा के धार्मिक चोले के कारण उस के कुकृत्य पर धर्म का परदा पड़ा हुआ था. शादी का उत्सव जैसे आयोजनों में वह जाने के लिए बहुत उत्सुक रहा करती थी क्योंकि वहां भीड़भाड़ में अपने मकसद में वह आसानी से कामयाब हो जाती थी. वह अपनी जेठानी के माइके में उस के भाई की शादी में गई हुई थी. वहां पर बाथरूम में किसी की सोने की चेन रखी हुई मिली. इतनी आसानी से इतनी भारी चेन पा कर उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. लेकिन मन ही मन घबरा भी रही थी.

चेन खो जाने पर घर में खूब हंगामा मचा, सब के साथ यहांवहां वह भी तलाशने का दिखावा करने का नाटक करती रही थी. फिर वह मौका देख कर वहां से निकल पड़ी थी.

जब नीरा घर पहुंची तो घबराहट के मारे पसीनापसीना हो रही थी. घर के अंदर घुसते ही पहले अपना पर्स अलमारी के अंदर रखा, फिर जल्दीजल्दी अपने पूजाघर में भगवान के सामने हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई.

सजल ने नीरा के घबराए चेहरे को देख कर पूछा, ‘‘इतनी नर्वस क्यों दिखाई पड़ रही हो? कुछ गड़बड़ कर के आई हो क्या.’’

‘‘आप तो हर समय मेरे पीछे ही पड़े रहते हैं,’’ कह नीरा ने फ्रिज से पानी की बोतल निकाली और एक सांस में पूरी खाली कर दी.

नीरा मन ही मन भगवान को मना रही थी कि हे भगवान मु?ो माफ कर देना. वह 101 का प्रसाद मंदिर में चढ़ाएगी. फिर भी उस के मन को तसल्ली नहीं हो पा रही थी. आखिर इतना लंबा हाथ जो मारा था. मन ही मन निश्चय किया कि इस संडे को पंडितजी को बुला कर ग्रहशांति की पूजा करवा देगी.

सजल ने नीरा को पूजा की तैयारी करते देखा, तो नाराज हो कर बोले, ‘‘एक दिन छुट्टी का होता है, तो यह तुम्हारा कोई न कोई पूजापाठ का स्वांग शुरू हो जाता है. मैं तो तंग हो गया हूं, तुम्हारी इस फालतू की ढोंगबाजी से. घर मे चैन से बैठना मुश्किल कर दिया है

तुम ने.’’

नीरा पति को भला अपनी करतूत कैसे बता सकती थी. वह कैसे कहती कि इस बार उस ने बहुत बड़ा हाथ मारा है इसलिए पंडितजी को दक्षिणा भी बड़ी देनी होगी. वह मन ही मन विजयी मुद्रा में अपने पापमोचन के लिए शांति पाठ की तैयारियों में जुट गई थी.

सजल पत्नी की इस हेराफेरी और चोरी की आदत से अनजान था क्योंकि वे पिछली घटना को भूल चुके थे.

सजल के ट्रांसफर के और्डर आने वाले थे, यह बात वे पत्नी को बता चुके थे. उन्हें बुलंदशहर पसंद नहीं था, इसलिए वे ट्रांसफर रुकवाने की कोशिश में लगे थे, जबकि नीरा

पति से जल्दी से जल्दी नई जगह जौइन करने के लिए कहती.

एक दिन शाम को 6 बजे थे. सजल अपने ड्राइंगरूम में बैठ कर न्यूज की हैडलाइन देख रहे थे. तभी उन की कौलबैल बज उठी. उन्होंने दरवाजा खोला तो स्मार्ट से सज्जन व्यक्ति दरवाजे पर खड़े थे.

‘‘क्या यह नीराजी का घर है?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘हां… हां…’’ आप बैठिए, मैं उन्हें अभी अंदर से बुलाता हूं.

‘‘क्षमा कीजिएगा… आप…’’

‘‘मैं सजल, नीरा का पति.’’

‘‘ओके.’’

मार्केट मे डूबे गौतम अदानी

अमेरिका की ङ्क्षहडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट के बाद जिस तरह से दुनिया भर के इनवैस्टरों ने अदानी गु्रप की कंपनियों में लगाया पैसा खींचा है, उस से साफ है कि इस रिपोर्ट में दम तो बहुत है चाहे गौतम अदानी कितनी ही कोर्ट केसों की धमकियां देते रहें. अदानी के नए 20000 करोड़ रुपए के शेयर बेचने की पेशकश भी पहले दिन औंधे मुंह गिरी क्योंकि जब शेयर 3,117 से 3,276 रुपए प्रति 100 रुपए के शेयर के भाव से बेचा जा रहा था, बाजार में वह 2,762 का रुपए था.

एक उद्योग के जीनेमरने से देश को कोई लंबाचौड़ा फर्क नहीं पडऩा चाहिए पर दिक्कत यह है कि अदानी समूह में आम जनता का पैसा लाइफ इंश्योरेंस कौपेरिशन, स्टेट बैंक औफ इंडिया आदि का भी लगा है. म्यूचुअल फंडों ने भी बहुत पैसा लगा रखा है. पैसा कर्ज पर देने वाले आमतौर पर शेयरों के बाजार भाव से गिरवी रख कर पैसा देते हैं और अदानी समूह में लगभग 1 लाख करोड़ (1,00,000,000,0000) लगा है.

आम लोगों ने अपनी गाड़ी कमाई 26 बैंकों या म्यूचअल फंडों में लगाई हुई है और कोर्ट उस से बुढ़ापा काटना चाहता था. कोई बेटी की शादी के सपने देख रहा था, कोई बच्चों की पढ़ाई का खर्च जमा कर रहा था तो किसी को अचानक आई बीमारी का डर था. अदानी गु्रप के शेयरों का भाव जब बढ़ता चला गया तो हजारों ने उस से पैसा बनाया और समय रहते शेयर बेच कर मकान, महल बना लिए.हीरों के जेवर खरीद लिए. उन्हें आज फर्क नहीं पड़ता कि अदानी का क्या होगा.

अमीरों में से कुछ को हानि भी होगी पर यह उस लाभ में से होगी जो उन्होंने अदानी जैसी कंपनियों से ही कमाया था. असली नुकसान तो आम लोगों को होगा जिन्होंने मेहनत से 10-20 हजार या 2-4 लाख जमा किए थे. दूसरा नुकसान उन बीसियों प्रोजेक्टों को होगा जो नरेंद्र मोदी सरकार ने गौतम अदानी को बुलाबुला कर 2014 के चुनावों में पैसा, हवाई जहाज मुहैय्या कराने के बदले में सौंपे थे. कितने ही हवाई अड्डे, पोर्ट, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट खतरे में आ जाएंगे.

ङ्क्षहडन वर्ग रिपोर्ट ने अभी अदानी समूह के सतही तौर पर हुआ है. अब दुनिया भर के अखबारों के फाइनैंशियल एक्सपर्ट खोजबीन करने में लग गए है क्योंकि अदानी ने कितने ही देशों में पैर फैलाए थे जहां भारत सरकार के न तो ङ्क्षहदू एजेंडे का कोई मतलब है न इडी का डर है, ङ्क्षहडन वर्ग ने यह खासतौर पर बताया है कि भारत में तो अदानी की पोल खोलने वाले एंजौय गु्रप ठाकुरता और गुजरात के एक यूट्यूब के अदालतों में घसीट कर जेलों की धमकी दी थी.

विदेशी जर्नलिस्ट आडिटर शाह ढंढारिया जैसे नहीं होते जिन के पास कुल 11 लोग काम करते हों, 32000 रुपए का किराया देते हों और अदानी टोटल गैस को क्लीन चिट दे देते हों जिस कंपनी की मार्केट वेल्यू 42,75,56,70,00,000 में हो. ये रुपए इस रिपोर्ट के बाद खतरे में है. इस रकम का मतलब है कि या तो सरकारी बैंकों का या आम जनता की बचत का पैसा कहीं लगा है. यह डूबा तो कहांकहां कौन डूबोए पता नहीं पर जो पानी में से पहले से ही मोदी निकाल कर ले आए हैं उन्हें ङ्क्षचता करने की जरूरत नहीं. जिन का पैसा डूबा है, उन्हें वैसे ज्यादा ङ्क्षचता करने की जरूरत नहीं. देश भर में मंदिर बन रहे हैं जहां से पैसों की बरसात होगी. काला धन वापिस आएगा ही.

मुसलमानों की हेकड़ी ठीक कर दी जाएगी. फिर गम क्या है. लक्ष्मी तो चलायमान होती है. धर्म, जाति, दानदक्षिणा, सेवा, रीतिरिवाज, तीर्थयात्राएं चारधाम, धाॢमक कैरीडोर हैं न, वे सब कल्याण करेंगे और अदानी से आई आंधी को शांत करेंगे.

छोटी अनु की किडनैपिंग से टूट जाएंगे अनुपमा-अनुज, माया का पति संपत करेगा मदद

अनुपमा टीवी सीरियल में उथल-पुथल मची हुई है. अब हम देखेंगे कि अनुज (गौरव खन्ना) और अनुपमा (रूपाली गांगुली) की दुनिया उलटी हो जाएगी क्योंकि छोटी अनु का अपहरण हो जाता है. हम देखते हैं कि माया (छवि पांडे) छोटी बच्ची को लेकर घर से चली जाएगी. कल रात के एपिसोड में हमने देखा कि अनुपमा और अनुज, अनु के साथ घर वापस जाने का फैसला करते हैं क्योंकि उन्होंने पूरा दिन साथ बिताया है. वे साथ में कई मजेदार चीजें करते हैं जिसने अनुपमा के जन्मदिन को खास बना दिया है.

 

अनुपमा के लिए बर्थडे सरप्राइज

अंकुश , डिंपी और बरखा उन्हें एक छोटी सी पार्टी देकर सरप्राइज देते हैं और अनुपमा से बर्थडे को खास बनाते हैं. अनुपमा अपने परिवार के साथ अपने जन्मदिन का आखिरी समय एन्जॉय करती है जबकि माया (छवि पांडे) चुप रहती है जिससे अनुज और अनुपमा दोनों अंदर ही अंदर घबरा रहे हैं. माया मुस्कुराते हुए अनु के पास आती है और अनुपमा के सामने उसके माथे पर किस करती है. माया सच्चाई बताती है कि वह अगली सुबह घर ने निकल जाएगी क्योंकि उसे हाल की फ्लाइट की टिकट नहीं मिली है. अनुपमा और अनुज अनिच्छा से उसके रुकने के लिए सहमत हो जाते हैं. माया चालाकी से मुस्कुराती है क्योंकि उसने एक प्लान बनाया है.

छोटी अनु हुई अनुज-अनुपमा से दूर 

अगली सुबह अनुपमा उठेगी और अनु को जगाने के लिए उसके कमरे में आएगी. लेकिन उस कमरे में आते ही अनुपमा को बड़ा झटका लगेगा. अनुपमा जोर से चिल्लाती है जिससे अनुज कमरे से भागकर आता है. वह दीवार की ओर इशारा करती है और अनुज से कहती है कि माया, अनु को अपने साथ ले गई और वे अपनी बेटी से कभी नहीं मिल पाएंगे. अनुज, माया की सेल्फी के साथ दीवार पर चिपका अलविदा नोट देखता है. अनुपमा और अनुज दोनों असहाय महसूस करते हैं क्योंकि उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई है, उनकी बच्ची चली गई है.

संपत करेगा मदद

आने वाले दिनों में हम देखेंगे कि माया का पति संपत अब फ्रेम में आएगा. वो ही है जो छोटी अनु को खोजने में अनुपमा और अनुज की मदद करता है. क्योंकि माया तो लंदन जा चुकी है. ऐसे में देखते हैं कि अनुपमा और अनुज विदेश जाकर अपनी बेटी को कैसे वापस लाते हैं.

सिलेंडर फटने से ‘गुम है किसी के प्यार में’ के सेट पर लगी आग, क्रू के बीच मचा हड़कंप

टीवी के फेमस शो ‘गुम है किसी के प्यार में (Ghum Hai Kisikey Pyaar Mein)’ को लेकर एक बड़ी खबर सामने आ रही है.  मुंबई के गोरेगांव में स्थित ‘गुम है किसी के प्यार में’ के सेट पर एक बड़ा हादसा हो गया है. दरअसल इस शो के सेट पर सिलेंडर फटने से आग लग गई है। यह घटना शाम के करीब 4 बजे की है, आग इतनी भीषण थी आसपास मौजूद सेट भी इसकी चपेट में आ गए. इस त्रासदी में ‘तेरी मेरी दूरियां’ और ‘अजूनी’ जैसे सीरियलों के सेट भी प्रभावित हुए हैं. रिपोर्ट्स की मानें तो हादसे के वक्त सेट पर करीब 2000 से ज्यादा लोग मौजूद थे.

 

 

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लापरवाही के कारण हुआ बड़ा हादसा

रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि लापरवाही के कारण ‘गुम है किसी के प्यार में (Ghum Hai Kisikey Pyaar Mein)’ के सेट पर यह भीषण आग लगी है. ऑल इंडियन सिने वर्कर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश श्यामलाल गुप्ता ने बताया कि सेट पर आग बुझाने के कोई भी सेफ्टी उपकरण मौजूद नहीं, जिसके कारण यह आग इतनी तेजी से फैली और दूसरे सेट पर भी पहुंच गई. हालांकि गनीमत ये रही कि इस घटना में अभी तक किसी के घायल होने की खबर सामने नहीं आई है। सूत्रों की मानें तो वक्त रहते फायर ब्रिगेड की टीम घटनास्थल पर पहुंच गई थीं, जहां उन्होंने मौके पर बचाव कार्य शूरू कर दिया.

 

चैनल और प्रोड्यूसर पर करूंगा एफआईआर- सुरेश श्यामलाल गुप्ता

ऑल इंडियन सिने वर्कर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश श्यामलाल गुप्ता ने ‘गुम है किसी के प्यार में’ के प्रोड्यूसर, चैनल और प्रोडक्शन हाउस पर एफआईआर दर्ज करने की बात कही है.  इसके साथ ही उन्होंने कहा कि गोरेगांव फिल्म सिटी के मैनेजिंग डायरेक्टर पर भी कार्रवाई की जाएगी। बता दें कि आयशा सिंह, नील भट्ट और ऐश्वर्या शर्मा स्टारर शो घर-घर में फेमस है और टीआरपी की लिस्ट में भी यह शो हमेशा टॉप पर रहता है.

तूफान की वह रात- भाग 3

वह तो अपने वेतन के 20,000 रुपयों को एकसाथ घर भेजने पर उतारू था. उन्होंने उसे समझाया कि अब तो उसे यहीं रहना है. इसलिए जरूरी सामान और कपड़े खरीद लो. और इस प्रकार उसे जूतेकपड़े आदि के साथ ब्रशमंजन से ले कर शेविंगकिट्स तक की खरीदारी कराई, जिस में उस के 8,000 रुपए निकल गए थे.

वह उस से हंस कर बोले, “यह मुंबई पैसों की नगरी है. यहां सारा खेल पैसों का ही है. अभी अपने पास 2,000 रुपए रखो और बाकी 10,000 रुपए घर भेज दो.”

शर्माजी के एकाउंट की मारफत वह मां के पास 10,000 रुपए भिजवा कर निश्चिंत हो पाया था. लगे हाथ उन्होंने उस का वहीं उसी बैंक में एकाउंट भी खुलवा दिया था.

नवंबर में वह यहां मुंबई आया था. जहाज का यह समुद्री जीवन अजीब था. चारो तरफ समुद्र की ठाठें मारती खारे पानी की लहरें और बजरे का बंद जीवन. दिनभर किसी जहाज में काम करो और फिर शाम को बजरे में बंद हो जाओ. हजारोंलाखों लोगों का जीवन इसी समुद्र के भरोसे चलता है. विशालकाय व्यापारिक जहाजों से ले कर सैकड़ों छोटीबड़ी नौकाएं अपने मछुआरों के संग जाल या महाजाल बिछाए मछली पकड़ती व्यस्त रहती हैं. ऐसे में वह कोई अनोखा तो नहीं, जो यहां रह नहीं पाए. उसे अभी मौजमस्ती की क्या जरूरत. उसे तो अभी अपने परिवार के अभावों के जाल काटना है. यहां खानेपीने की समस्या नहीं. ठेकेदार की तरफ से सभी के लिए यहां निःशुल्क भोजन की भी व्यवस्था है. पंकज शर्मा ने उसे अपना छोटा मोबाइल दे दिया था, जिस से वक्तजरूरत मां या भाईबहन से बात कर लिया करता था.

जिस जहाज पर पंकज शर्मा तैनात थे, उसी पर उस का काम चल रहा था. उस जहाज पर उसे ले कर कुल 24 लोग थे. शाम को वह वापस बजरे पर आ जाते, जहां उन की रिहाइश थी.

बजरा एक सपाट डेक वाली नौका को कहते  हैं, जो सिर्फ पानी की सतह पर तैरती रहती है.  कुछ बजरों में उसे चलाने के लिए इंजन भी लगा रहता है. लेकिन आमतौर पर बिना इंजन वाले इन बजरों को जहाजों द्वारा खींच कर ही इधरउधर लाया या ले जाया जाता है. इस समय ओएनजीसी के औयल रिंग प्लेटफार्म पर कुछ काम चल रहा था. शाम में सभी ‘राजहंस’ नामक इस बजरे पर चले जाते और वहां के लगभग ढाई सौ छोटेबड़े दड़बेनुमा केबिनों में समा जाते. वहीं खानापीना, नहानाधोना वगैरह होता और अगले दिन के लिए सो जाना होता था. यहां से बहुत जरूरी होने पर ही लोग मुंबई समुद्र तट  का रुख करते थे. क्योंकि आनेजाने में ही दिनभर लग जाता था. आमतौर पर महीनेपखवाड़े ही कोई उधर जाता था.

विगत दिनों का वह मनहूस दिन उस के सामने दृश्यमान सा खड़ा था, जब वह पंकज शर्मा के साथ बजरे पर शाम को वापस लौटा था. समुद्र किसी कुपित बाघ की भांति दहाड़ रहा था. पंकज शर्मा पिछले 18 साल से यहां इसी समुद्री तल पर काम करते आए थे. उन्होंने समुद्र के विविध रंग बदलते तेवरों को देखा ही नहीं, झेला भी था. “अरे, कुछ नहीं,” वह बेफिक्री से बोले थे, “तूफान आतेजाते रहते हैं. मनुष्य को अपना काम करते रहना चाहिए.”

“फिर भी सर, इस बार खतरा कुछ ज्यादा ही दिख रहा है,” उन का सहायक मनीश पाटिल सशंकित शब्दों में बोला, “चारों तरफ से वार्निंग की खबरें आ रही हैं. सभी छोटेबड़े जहाज किनारों की ओर चले गए हैं. हमें रिस्क नहीं लेना चाहिए.”

“अब जो होगा, कल ही होगा न,” वह निश्चिंत भाव से बोले, “अब आराम से खाना खाओ और सो जाओ. कल सुबह देखा जाएगा.”

“एक कोरोना से कम तबाह थे क्या, जो ये तूफान आया है,” शिवजी वानखेड़े बोला, “पूरे मुंबई में लौकडाउन लगा है. और यहां ये हाल है कि क्या होगा, क्या पता…”

“इसलिए तो मैं कहता हूं कि हम सुरक्षित जगह में आइसोलेटेड हैं, क्वारंटीन हैं.”

“आप भी सर, गंभीर बातों को हंसी में उड़ा देते हैं,” मनीश पाटिल के यह बोलने पर वह हंसते हुए बोले, “सोच लो, आज से हजार साल पहले जब वास्को-डि-गामा समुद्री मार्ग से आया होगा तो क्या हाल होगा… अभी तो ढेर सारी सुविधाएं हैं, सुरक्षा के इंतजाम भी हैं. अरे, हम जहाजियों का जीवन ही खतरों से खेलने के लिए बना है.”

खैर, रात 9 बजे तक सभी खापी कर अपनेअपने केबिनों में सोने चले गए. वह यों ही डेक पर टहलने जाने का विचार कर ही रहा था, मगर हवा काफी तेज थी. समुद्री लहरें जैसे हर किसी को लपकने के लिए आसमान चूमना चाह रही थीं. वह अपने केबिन में जा कर लेटा रहा. बजरा और दिनों की अपेक्षा आज कुछ ज्यादा ही हिचकोले खा रहा था. चूंकि समुद्री जीवन जीने के अभ्यस्त लोग इसे देखने के आदी हैं, उन्हें बजरे के हिलनेडुलने से विशेष फर्क नहीं पड़ना था.

अचानक तीखी आवाज से बजते सायरन को सुन कर वह चौंक पड़ा. सभी को लाइफ जैकेट पहनने और तैयार रहने को कहा जा रहा था. फोन, पर्स आदि जरूरी सामान के साथ वह लाइफ जैकेट पहने औफिस की ओर आया. वहां वरिष्ठ अधिकारियों के साथ पंकज शर्मा भी गंभीर मुद्रा में लाइफ जैकेट पहने खड़े थे. वे बोले, “सचमुच हम ने तूफान की गंभीरता समझने में भूल की. मगर अब तो बचाव का रास्ता ढूंढ़ना ही एकमात्र उपाय है. बजरे के लंगर टूटते जा रहे हैं. 8 में से 3 टूट चुके हैं और अन्य भी कमजोर पड़ रहे हैं. हमें डर है कि लंगर से मुक्त होते ही यह अनियंत्रित बजरा हिलतेडुलते, तूफान की लहरों के साथ बहते औयल रिंग के प्लेटफार्म से न जा टकराए. प्लेटफार्म पर तेल और गैस की पाइपलाइनें हैं, जो टकराने पर फट कर विस्फोट कर सकती हैं. ऐसे में बचने की सारी संभावना खत्म हो जाएगी.

वे सभी लोग नौसेना अधिकारियों, तटरक्षकों, अपनेअपने मुख्यालयों में हाहाकार भरा त्राहिमाम संदेश फोन से, रेडियो द्वारा और व्हाट्सएप से भी भेज रहे थे. उधर तूफान क्षणप्रतिक्षण विकराल हुआ जाता था. कमजोर पड़ते लंगरों के टूटने के साथ बजरे का हिलनाडुलना बेतरह बढ़ता जाता था. और अंततः वही हुआ, जिस की आशंका थी.  लंगरविहीन बजरा अनियंत्रित हो औयल रिंग के प्लेटफार्म की तरफ बढ़ने लगा, जिसे देख सभी का कलेजा मुंह को आने लगा था.

औयल रिंग प्लेटफार्म के पास क्रूर लहरों ने बजरे को पटक सा दिया था. उस से बजरा जोर से टकराया जरूर, मगर कोई विस्फोट नहीं हुआ. लेकिन इस टक्कर से बजरे की पेंदी में एक छेद हो गया था, जिस से उस में पानी भरना आरंभ हो गया था. मतलब, एक मुसीबत से बचे, तो दूसरी मुसीबत में घिर गए थे. रबर के राफ्ट निकाले जाने लगे. उन्हें तैयार कर नीचे समुद्र में डाल दिया गया. मगर थोड़ी ही देर बाद देखा कि राफ्ट किसी नुकीली चीज से पंक्चर हो गया था और उस में बैठे लोग समुद्री लहरों के बीच लापता हो चुके हैं.

“घबराना नहीं राजन, हिम्मत रखना,” पंकज शर्मा जैसे उस के बहाने खुद को दिलासा दे रहे थे, हौसला बढ़ा रहे थे. कह रहे थे, “नौसेना का जहाज अब पहुंचने ही वाला है. अब हम सभी बच जाएंगे.”

सचमुच नौसेना का जहाज ज्यादा दूर नहीं, दोचार मील के अंदर ही रहा होगा. मगर भयंकर तूफान और गहन अंधकार के बीच कम विजिबिलिटी की वजह से कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. वहां से लगातार संदेश आ रहे थे, ‘थोड़ा इंतजार करो, क्योंकि खराब विजिबिलिटी की वजह से नजदीक आने पर नेवी शिप की बजरे से टक्कर हो सकती है.’

और इसी इंतजार के बीच बजरा पानी में तेजी से धंसता चला जा रहा था. लगभग आधे से अधिक बजरे के पानी में समाने पर ही सभी एकएक कर कूदने लगे. जो तैरना नहीं जानते थे, वे कूदने में ज्यादा  झिझक रहे थे. हालांकि उन्हें यहां आने पर लाइफ जैकेट पहन कर तैरने का प्रशिक्षण दिया गया था. कुछ कूदे भी. मगर जो भयवश नहीं कूद पाए, उन्होंने बजरे के साथ ही जल समाधि ले ली.

तैराकी में उस की सदैव रुचि रही थी. गांव के समीप बहने वाली बूढ़ी गंडक हो अथवा मामा के गांव के किनारे बहने वाली बागमती, वह नहाने के बहाने काफी देर तक तैराकी करता, करतब दिखाता रहता था. यहां तक कि बाढ़ के दिनों में भी उसे कभी डर नहीं लगा. मगर नदी में तैरना एक बात है और अनंत समुद्र में तूफान का मुकाबला करना बिलकुल दूसरी बात है. वह भी आधी रात के इस गहन अंधेरे में, जब एक हाथ को दूसरा हाथ नहीं सूझ रहा हो, तैरना असंभव को संभव बनाने जैसा है. समुद्र के  नमकीन, खारे पानी से आंखों में जलन हो रही थी. तूफानी लहरें शरीर को कभी हवा में उछालती, तो कभी गहरे पानी में खींच ले जाती थी.

मगर मनुष्य की जिजीविषा भी तो बड़ी है. वह इसी की बदौलत प्रकृति से, समय और समाज से संघर्ष करता है. हार होती है. मगर कभीकभी वह जीत भी जाता है. और जो जीतता है, वो इतिहास रचता है. यथार्थ तो यही है कि वह इतिहास रचने के लिए संघर्ष नहीं करता, बल्कि खुद को बचाने के लिए संघर्ष करता है. आने वाला समय उसे विजेता घोषित कर देता है.

यह सब तो बाद की बात है, अभी तो वह खुद को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, ताकि वह भविष्य में अपनी मां को, अपने छोटे भाईबहन को पालपोस सके, उन्हें सही शिक्षा दिलवा सके. यही तो उस के जीवन का मकसद है. उसे और क्या चाहिए?

उस के इर्दगिर्द अनेक लोग तैर रहे हैं, डूब या उतरा रहे  हैं. लाइफ जैकेट उन्हें डूबने नहीं दे रहा. उन के लाइफ जैकेट में लगी बत्ती जल रही है, जिस से उन के अस्तित्व का पता चल रहा है. जो तैरना नहीं जानते, वे जोरजोर से हाथपैर चलाते हुए खुद को थकाए दे रहे हैं. उन के भय और लाचारगी की कोई सीमा नहीं थी. और तो और यहां सभी को अपनी जान के लाले पड़े थे. इस अथाह समुद्र में मौत से लड़ते लोगों को कोई पहचान कर भी क्या कर पाता.

इसी तरह तैरते चारेक घंटे के बाद नौसेना का जहाज दिखा तो जैसे आशा की किरण फूटी. पूर्व दिशा में भी लालिमा दिखने लगी थी. सूर्योदय होने को था. सभी उस जहाज की दिशा की ओर तैरने लगे.

मगर, यह क्या…? देखते ही देखते आसमान कालेकाले बादलों से भर गया था और उसी के साथ पुनः अंधकार छा गया था. मूसलाधार वर्षा होने लगी थी. आशा की जो एक धूमिल किरण थी, वह भी धुंधली पड़ने लगी थी. समुद्री लहरें पुनः काल के समान अट्टहास करते सभी को कभी आकाश की ओर उछालती, तो कभी गरदन दबा खारे पानी के भीतर खींच ले जाती थी.

प्रकृति के इस रौद्र खेल को खेलने को वे अभिशप्त से थे. समय का ध्यान कहां था? कौन समय का ध्यान रख पाया है?

अचानक आकाश में बादल छंटे, ऊपर सूर्य मुसकराया तो सब ने देखा कि ठीक बगल में नौसेना का जहाज खड़ा है. जहाज में बैठे नौसैनिक चिल्लाते हुए निर्देश दे रहे थे. वे हर संभावित व्यक्ति की तरफ रोप लैडर (रस्सी की सीढ़ियां) फेंक उसे पकड़ने के लिए इशारे कर रहे थे. कोई जैसे ही उसे पकड़ता, वह उसे खींच जहाज के अंदर कर लेते. न जाने कहां से अचानक उस में इतनी ताकत आ गई थी कि अंततः उस ने एक रोप लैडर को पकड़ लिया था.

अब वह नौसेना के जहाज में था. उस का रोआंरोआं  अभी तक कांप रहा था. भय और आशंकाएं जैसे पीछा नहीं छोड़ रही थीं.  नौसैनिक वहीं डेक पर उसे लिटा उस का प्राथमिक उपचार कर रहे थे. लेकिन उस की चेतना उसी तरह ऊपरनीचे हो रही थी, जैसे कि वह लहरों के द्वारा ऊपरनीचे उछाला जा रहा हो. डेक पर सैकड़ों लोग पड़े थे. उन में कौन जिंदा है और कौन मर गया, कहना मुश्किल था. फिर भी नौसैनिक भागदौड़ करते मेडिकल ट्रीटमेंट दे रहे थे. उन का एक दूसरा दल अभी भी समुद्र में निगाहें टिकाए देख रहा था कि  शायद कहीं कोई भूलाभटका दिख जाए. इसलिए नेवी शिप से बंधे रोप लैडर अभी तक पानी में तैर रहे थे.

अगले दिन वह चैतन्य हुआ, तो खुद को आर्मी अस्पताल में पाया. बजरे में फंसे अनेक लोग उस वार्ड में भरती थे.

“यह सौभाग्य की बात है कि आप ठीक हैं,” एक डाक्टर कह रहा था, “आप मेरे सामने थोड़ा चलनेफिरने का प्रयास करें.”

वह उठा और कुछ कदम चल कर वापस अपने बेड पर आ गया.

दोपहर को उसे भोजन कराने के बाद एक नौसैनिक अधिकारी उस के पास आया और बोला, “मुझे आप का सहयोग चाहिए. आशा है, आप ‘ना’ नहीं करेंगे.”

जिन लोगों की वजह से वह जिंदा है, उन का सहयोग कर खुशी ही मिलेगी. मगर अभी तो वह खुद अशक्त है. वह किसी की क्या मदद कर सकता है.

“बस कुछ नहीं. कुछ लोगों की शिनाख्त करनी है,” नौसैनिक अधिकारी कह रहा था, “डेड बौडी विकृत सी हो गई हैं. आप उन्हें पहचान सकें तो बेहतर है, ताकि उन के घर खबर भिजवाई जा सके.”

“ओह, तो यह काम है,” उस ने विचार किया “अब जब वह बच गया है, तो बचाने वाले का सहयोग करना उस का फर्ज बनता है.”

आर्मी अस्पताल के बाहर खुले में अनेक शव सफेद चादरों में लिपटे पड़े थे. उन्हें देखना यंत्रणादायक था. मगर एक शव के पास आते ही वह चित्कार भर कर रो पड़ा. वह पंकज शर्मा का शव था. वह वहां से दौड़ कर भागा और खुले में लोट गया. उस के पीछे जब वह सैन्य अधिकारी आया, तो उस ने उस से फोन मांग कर पहले शिपिंग कंपनी में फोन कर उन्हें इस की जानकारी दी. फिर गांव में आलोक को फोन कर जानकारी देने लगा था.

और इस के बाद तो जैसे गांव से फोन पर फोन आने लगे थे. पंकज शर्मा के भैया नारायण चाह रहे थे कि पंकज का शव गांव आए और वहीं उस की अंत्येष्टि हो. शीघ्र ही शिपिंग कंपनी का मैनेजर भी आ गया और उस से जानकारी लेने लगा था. अब वह उन के शव को उन के गांव भिजवाने की तैयारी में लग गया था.

“उन के शव के साथ तुम जाओगे,” मैनेजर उस से कह रहा था, “अभी तुम्हें भी आराम की जरूरत है. और यह तुम्हें अपने घर पर ही मिल सकता  है. एकाध माह वहीं घर पर अपने लोगों के बीच रहोगे तो इस त्रासदी को भूलने में तुम को सुविधा रहेगी. इस के बाद तुम सुविधानुसार आ जाना.”

अचानक उसे लगा कि पंकज शर्मा उस के पास खड़े कह रहे हैं, “देखा, मैं ने कहा था ना कि हम बच जाएंगे. देखो, हम बच कर वापस गांव आ गए हैं.”

अचानक फिर उस के सामने एक और दृश्य उभरा. सफेद चादरों में लिपटे कुछ शव उस की ओर देख रहे थे. उन्हीं के बीच जा कर पंकज शर्मा पुनः लेट गए थे. वह चीख मार कर उठा. बगल में लेटा हुआ उस का भाई सकते में था और पूछ रहा था, “क्या हुआ भैया, कोई खराब सपना देखा क्या?”

“हां रे, बहुत खराब सपना था.”

सुदूर पूर्व में सूर्योदय हो रहा था. अंदर से मां आ रही थी. वह मां से लिपट कर

बच्चों के लिए बनाएं ग्लूटन फ्री चोको चिप कस्टर्ड कुकीज और जैली मूज, सलाद

हम कुछ टेस्टी और अलग ट्राय करें तो ऐसे में रेडी है चोको चिप कस्टर्ड कुकीज जिसे हम घर पर असान तरीकों से बना सकते है. तो रेडी है कुछ ग्लूटन फ्री चोको चिप कस्टर्ड कुकीज और जैली मूज, सलाद के साथ बनाएं और खाएं भी. 

सामग्री

3 बड़े चम्मच वेकफील्ड वनीला या बटरस्कौच कस्टर्ड पाउडर

1/2 कप ज्वार का आटा

1 बड़ा चम्मच वेकफील्ड कोको पाउडर

–  1/4 छोटा चम्मच वेकफील्ड बेकिंग पाउडर

3 बड़े चम्मच सौफ्ट बटर

2 बड़े चम्मच ब्राउन शुगर

1/2 बड़ा चम्मच शुगर

– कुछ बूंदें वेनिला एसेंस

2-3 बड़े चम्मच चोको चिप्स

– नमक चुटकीभर.

विधि

दोनों शक्कर और बटर मिला कर अच्छे से फेंट लें. उसके बाद मिश्रण में कस्टर्ड पाउडरज्वार का आटानमकबेकिंग पाउडर और कोको पाउडर अच्छे से मिक्स करके उसे हलका गूंथ लें. जब मिश्रण डो के रूप में तैयार हो तो उसमें चोको चिप्स भी मिला लें. मनपसंद कुकीज का आकार दें और पहले से गर्म ओवन में 150 डिग्री सेल्सियस पर 15-20 मिनट के लिए बेक करें. ठंडा करके एयर टाइट कंटेनर में स्टोर करें.

2- जैली मूज

सामग्री

1 पैकेट वेकफील्ड रास्पबेरी जैली मिक्स

2 बड़े चम्मच क्रीम

– पुदीने की पत्तियां सजाने के लिए

– फ्रैश रास्पबेरी सजाने के लिए.

विधि

पैक की सामग्री और प्रीमिक्स सैशे की सामग्री को 1 बाउल में निकाल लें. अब 500 मिलीलिटर पानी को उबाल कर इस मिश्रण में मिलाएं और अच्छी तरह मिक्स करके कुछ देर ठंडा होने दें. अब मिश्रण को मोल्ड या जैली कप में डाल कर सेट होने दें. जैली रूम टैंपरेचर पर लगभग 45 मिनट में सेट हो जाएगी. फ्रैश रास्पबेरी और पुदीने की पत्तियों से सजा कर सर्व करें.

3- जैली सलाद

सामग्री

1 वेकफील्ड मैंगो जैली पैक

1 बड़ा चम्मच नीबू का रस

1/2 कप खीरा बारीक कटा

1/2 कप गाजर कद्दूकस की हुई

1/2 बड़े चम्मच शिमला-मिर्च बारीक कटी

1 कप बारीक कटा

1 बड़ा चम्मच आम के टुकड़े

– कुछ सलाद के पत्ते परोसने के लिए

– नमक और कालीमिर्च चुटकी भर.

विधि

एक बाउल में खीरागाजरसेबआम और शिमला-मिर्च को एक साथ मिला लें. नमककालीमिर्च और नींबू का रस डाल कर एक तरफ रख दें. पैक पर दिए निर्देशों के अनुसार 1.5 कप पानी के साथ जैली तैयार करेंजिससे थिक जैली बन कर तैयार हो. जैली को थोड़ा ठंडा कर लें और उसे सलाद के बाउल में डाल कर मिक्स करें. उसके बाद सिलिकौन मौल्ड में डाल कर मिश्रण को सेट होने दें. आपका जैली सलाद तैयार है इसे अनमौल्ड कर सलाद के पत्तों के साथ सर्व करें.

मैंने सुना है कि पेन किलर्स किडनियों को नुकसान पहुंचाती है, क्या यह सही है?

सवाल

मैं सेल्स गर्ल हूं. ड्यूटी के कारण मुझे रोजाना कई घंटों तक खड़े रहना होता है. पैरों में दर्द के कारण अकसर मैं पेन किलर्स ले लेती हूं. मैं ने सुना है कि पेन किलर्स किडनियों को नुकसान पहुंचाती है. क्या यह सही है?

जवाब 

यह सही है कि बिना सोचे समझे पेन किलर्स का इस्तेमाल किडनियों से संबंधित समस्याओं का कारण बन सकता है. अमेरिका के नैशनल सैंटर फौर बायोटैक्नोलौजी इनफौर्मेशन के अनुसार लगातार पेन किलर्स की हाई डोज लेना पूरे विश्व में एक्यूट किडनी फेल्योर की सब से प्रमुख कारण है. ब्रूफेन नामक पेन किलर को 10-15 दिन भी ले लें तो किडनी खराब हो सकती है. इसलिए दर्द के उपचार के लिए इस्तेमाल होने वाले ऐनालजेसिक्सो (पेनकिलर) का सेवन बिना डाक्टर की सलाह के न करें. पैरों का दर्द दूर करने के लिए पेन किलर्स के बजाय दूसरे नुसखे आजमाएं.

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मेरी माताजी की उम्र 62 वर्ष है. उन की किडनियां फेल हो गई हैं. हम डायलिसिस से परेशान आ चुके हैं. क्या इस उम्र में उन का किडनी ट्रांसप्लांट संभव है?

अधिकतर लोग किडनी ट्रांसप्लांट करा सकते हैं. इस से कोई अंतर नहीं पड़ता कि मरीज की उम्र क्या है. यह प्रक्रिया उन सब के लिए उपयुक्त है जिन्हें ऐनेस्थीसिया दिया जा सकता है और कोई ऐसी बीमारी नहीं हो जो औपरेशन के पश्चात बढ़ जाए जैसे कैंसर आदि. हर वह व्यक्ति किडनी ट्रांसप्लांट करा सकता है जिस के शरीर में सर्जरी के प्रभावों को सहने की क्षमता हो. किडनी ट्रांसप्लांट की सफलता की दर दूसरे ट्रांसप्लांट से तुलनात्मक रूप से अच्छी होती है. जिन्हें गंभीर हृदयरोगकैंसर या एड्स है उन के लिए प्रत्यारोपण सुरक्षित और प्रभावकारी नहीं है.

क्यों जरूरी है मैडिक्लेम पौलिसी

आजकल विभिन्न बीमारियों के मामले बढ़ते जा रहे हैं. ऐसीऐसी बीमारियां जिन का पहले नाम भी नहीं सुना था हो रही हैं. कोरोना महामारी ने लोगों के शरीर में कई दूसरी व्याधियों को बढ़ा दिया है. ब्लैक फंगस, व्हाइट फंगस, ब्लड क्लौटिंग जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं जिन के इलाज में लाखों रुपयों का खर्च है. बढ़ती महंगाई के कारण आम आदमी के लिए अस्पताल का खर्च उठाना लगभग नामुमकिन सा हो गया है.

जैसेजैसे हैल्थ सैक्टर में टैक्नोलौजी बढ़ रही है वैसेवैसे बीमारियों पर होने वाले खर्चे भी बढ़ रहे हैं. पहले डाक्टर चैक कर के, नाड़ी देख कर या छोटामोटा टैस्ट करवा कर रोगी का इलाज कर देते थे, मगर अब बुखार भी आ जाए तो तमाम तरह के ब्लडयूरिन टैस्ट लिख देते हैं. गंभीर बीमारियों में तो टैस्ट, ऐक्सरे, एमआरआई, थेरैपी जैसी महंगी चीजों से बीमार और तीमारदार को जू?ाना पड़ता है.

बड़ी बीमारी इंसान की सारी जमापूंजी चट कर जाती है. ऐसे में परिवार का मैडिक्लेम होना बहुत जरूरी है. मैडिक्लेम पौलिसी मुश्किल समय में तनावमुक्त और आर्थिक रूप से सुरक्षित रहने में मदद करती है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिस में बीमाधारक का इलाज उन अस्पतालों में किया जाता है जो बीमा कंपनी के नैटवर्क के अंतर्गत आते हैं. इस के तहत, बीमा कंपनी क्लेम का एक हिस्सा या पूरी राशि ही अस्पताल को दे देती है और मरीज व उस के परिवार पर अचानक कोई आर्थिक बो?ा नहीं पड़ता है.

सुरक्षित विकल्प

अप्रत्याशित चिकित्सा की जरूरत सामने खड़ी हो जाए तो उस पर होने वाले खर्चों की बड़ी रकम का मुकाबला करने के लिए मैडिक्लेम आज सब से सुरक्षित विकल्प है. जिस व्यक्ति ने अपना मैडिक्लेम करवा रखा है उसे किसी बीमारी या दुर्घटना के कारण अस्पताल में भरती होने पर अपनी जेब से पैसा देने की आवश्यकता नहीं रह जाती है. वह सारा खर्च मैडिक्लेम देने वाली कंपनी उठाती है.

आप की मैडिक्लेम पौलिसी दुर्घटना, गंभीर बीमारी या सर्जरी आदि की स्थिति में हौस्पिटल का खर्च तो उठाती ही है बल्कि हौस्पिटल से डिस्चार्ज के बाद चलने वाली दवाओं और समयसमय पर होने वाले टैस्ट का खर्चा भी उठती हैं. मैडिक्लेम पौलिसी में सभी स्थितियों को कवर किया जाता है. आज मैडिकल इमरजैंसी के मामले में मैडिक्लेम सर्विस एक वरदान है.

मैडिक्लेम के फायदे

मैडिक्लेम पौलिसी एक स्वास्थ्य बीमा योजना है जिस के अनेक फायदे हैं:

– यह स्मूद कैशलैस हौस्पिटलाइजेशन प्रदान करता है.

– यह आप की चिकित्सा आपात स्थिति के दौरान बड़ी वित्तीय सहायता है.

– यह आप को वित्तीय बो?ा में डूबने से बचाता है.

– विभिन्न कंपनियों के पास मस्डिक्लेम पौलिसी औनलाइन खरीदने की सुविधा है जिस से समय और ऊर्जा की बचत होती है.

– यह आयकर अधिनियम 1961 के तहत टैक्स में छूट भी प्रदान करता है.

– सीनियर सिटीजन मैडिक्लेम पौलिसी के तहत सीनियर सिटीजन को अतिरिक्त लाभ दिया जाता है. अस्पताल में भरती होने से पहले और बाद के मैडिकल खर्चों को कुछ शर्तों के साथ मैडिक्लेम पौलिसियों द्वारा कवर किया जाता है.

– नियमित वार्ड या इंटैंसिव केयर यूनिट आईसीयू का लाभ उठाने के लिए जो भी खर्च होता है, मैडिक्लेम पौलिसियों द्वारा कवर किया जाता है.

विभिन्न मैडिक्लेम पौलिसी चिकित्सा खर्चों की स्थिति में भारत में विभिन्न हैल्थ इंश्योरैंस कंपनियां अनेक प्रकार की पौलिसियां देती हैं. इस में इंडिविजुअल मैडिक्लेम पौलिसी, फैमिली फ्लोटर मैडिक्लेम पौलिसी, सीनियर सिटीजन मैडिक्लेम पौलिसी, क्रिटिकल इलनैस मैडिक्लेम पौलिसी, ओवरसीज मैडिक्लेम पौलिसी, लो कास्ट मैडिक्लेम पौलिसी और गु्रप मैडिक्लेम पौलिसी बड़ी तादात में लोग लेते हैं.

फैमिली हैल्थ प्लान

सब से अच्छा है फैमिली हैल्थ प्लान लेना. उदाहरण के लिए अगर एक परिवार में 5 सदस्य हैं और हर व्यक्ति के लिए अलगअलग 1 लाख रुपए का बीमा है तो ऐसे में परिवार का कोई भी एक सदस्य बीमा कंपनी से अपने लिए 1 लाख रुपए से ज्यादा की मदद प्राप्त नहीं कर सकता. पांचों व्यक्तियों के लिए यह अलगअलग पौलिसी की तरह काम करेगी. लेकिन अगर यही 5 लाख का प्लान फैमिली हैल्थ प्लान के रूप में लिया जाए तो फिर कोई भी सदस्य 5 लाख रुपए तक की मदद पा सकता है.

इसी तरह गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर, किडनी फेल्योर, हार्ट अटैक, सर्जरी, लकवा, स्ट्रोक, और्गन ट्रांसप्लांट, बाईपास सर्जरी या इस तरह की अन्य बीमारियों के लिए क्रिटिकल इलनैस मैडिक्लेम पौलिसी बहुत अच्छा कवर देती है.

सीनियर सिटीजन मैडिक्लेम पौलिसी

सीनियर सिटीजन मैडिक्लेम पौलिसी 60 साल की उम्र पार कर चुके बुजुर्ग लोगों के अस्पताल में भरती होने के खर्चों को कवर करने के लिए डिजाइन की गई है. सीनियर सिटीजन हैल्थ इंश्योरैंस पौलिसी सीनियर सिटीजन की हैल्थ जरूरतों को कवर करते हुए कई बातों का खयाल रखती है.

वहीं ग्रुप मैडिक्लेम भारत के अधिकांश उद्योगों के कर्मचारियों को दी जाती है. बड़े क्लब या संघों के सदस्यों का भी ग्रुप मैडिक्लेम किया जाता है. यह कौरपोरेट जगत में ली जाने वाली पौलिसी है. इस में कर्मचारियों के वेतन से प्रीमियम भुगतान के रूप में एक छोटा सा प्रतिशत काटा जाता है.

मैडिक्लेम जरूर करवाएं

मैडिक्लेम आप को मुश्किल समय में तनावमुक्त और आर्थिक रूप से सुरक्षित रहने में मदद करता है. अब मामूली बीमारियों के इलाज में भी लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं. हैल्थ इंश्योरैंस आप की जेब पर पढ़ने वाले भार को कम करने में मदद करता है. लगातार बढ़ते मैडिकल खर्च के इस दौर में मैडिक्लेम पौलिसी जल्द से जल्द ले लेने में ही सम?ादारी है.

केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि मैडिकल इमरजैंसी के मामले में 80 फीसदी केस पैसे की दिक्कत की वजह से बिगड़ जाते हैं. किसी दुर्घटना की स्थिति में न सिर्फ इलाज पर आप को पैसे खर्च करने पड़ते हैं, बल्कि आप की कमाने की क्षमता भी घट जाती है. इस हिसाब से दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति पर दोहरी मार पड़ती है.

यदि आप के पास मैडिक्लेम पौलिसी है तो ऐसे समय में आप की हिम्मत नहीं टूटेगी और आप का इलाज भी बेहतर तरीके से होगा. हैल्थ इंश्योरैंस के लिए नियमित अंतराल पर आप थोड़ाथोड़ा प्रीमियम चुका कर खुद के लिए मैडिकल खर्च की व्यवस्था कर सकते हैं. यह आज के दौर में बहुत जरूरी है.

 

स्तन कैंसर: निदान संभव है

भारत में 40 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं में स्तन कैंसर सबसे अधिक प्रचलित कैंसर है. ऐसे मामले विश्व स्तर पर हर साल लगभग 2% की दर से बढ़ रहे हैं. यह महिलाओं में कैंसर संबंधित मौतों का सबसे आम कारण भी है.

आज हमारे पास स्तन कैंसर से होने वाली मौतों को कम करने का मौका है. स्तन कैंसर को जल्दी पकड़ा जा सकता है ओर हारमोन थेरेपी, इम्यूनो थेरेपी और टारगेटेड थेरेपी जैसी नई विकसित के जरीए पहले की तुलना में अधिक विश्वास के साथ इसका इलाज किया जा सकता है.

सेल्फ एग्जामिनेशन

यदि प्रारंभिक चरण में कैंसर का पता लग जाता है तो उपचार अधिक प्रभावी ढंग से हो सकता है. इस अवस्था में कैंसर छोटा और स्तन तक सीमित होता है.

शुरुआत में एक छोटी गांठ की उपस्थिति या स्तन के आकार में बदलाव के अलावा कोई कथित लक्षण नहीं होता है, जिसे रोगियों द्वारा आसानी से अनदेखा किया जा सकता है. यही वह समय है जब स्क्रीनिंग जरूरी है. स्क्रीनिंग टेस्ट से स्तन कैंसर के बारे में जल्दी पता लगाने में मदद मिलती है. ऐसे में जब कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते तब भी स्क्रीनिंग के द्वारा हमें इस बीमारी का पता चल सकता है. स्क्रीनिंग के लिए नियमित रूप से डाक्टर के पास जाना चाहिए ताकि रोगी महिला के स्तन की पूरी तरह से जांच कर सकें. डाक्टर अकसर इस के जरीए ब्रेस्ट में छोटीछोटी गांठ या बदलाव का पता लगा लेते हैं. वे महिलाओं को सेल्फ एग्जामिनेशन करना भी सिखा सकते हैं ताकि महिलाएं खुद भी इन परिवर्तनों को पकड़ सकें.

हालांकि मैमोग्राफी स्तन कैंसर की जांच का मुख्य आधार है. यह एक एक्स-रे एग्जामिनेशन है और गांठ दिखने से पहले ही स्तनों में संदिग्ध कैंसर से जुड़े परिवर्तनों का पता लगाने में मदद करता है.

पहला मैमोग्राम कराने और इसके बाद भी कितनी बार मैमोग्राम कराना है. यह इस पर निर्भर करता है कि उस महिला को ब्रेस्ट कैंसर होने का रिसक कितना है. जिन महिलाओं के रक्त संबंधी स्तन कैंसर या ओवेरियन कैंसर से पीडि़त हैं और जिनको पहले भी स्तनों से जुड़ी कुछ असामान्यताओं जैसे स्तनों में गांठ, दर्द या डिस्चार्ज आदि का सामना करना पड़ा है उन्हें जोखिम ज्यादा रहता है. ऐसी महिलाओं को 30 साल की उम्र के बाद हर साल मैमोग्राफ कराना चाहिए. दूसरों को 40 साल की उम्र के बाद हर साल या हर 2 साल में जांच करवानी चाहिए.

टेस्टिंग

अगर मैमोग्राम में कैंसर का कोई संदिग लक्षण दिखता है तो पक्के तौर पर कैंसर है या नहीं इसका पता लगाने के लिए बायोप्सी की जाती है. इस प्रक्रिया में संदिग्ध क्षेत्र से स्तन ऊतक के छोटे हिस्से को निकाल लिया जाता है और कैंसर सेल्स का पता लगाने के लिए प्रयोगशाला में विश्लेषण किया जाता है.

उच्च जोखिम वाल महिलाओं के लिए, बीआरसीए म्युटेशन जैसी जेनेटिक असामान्यताओं का पता लगाने के लिए जेनेटिक टेस्टिंग की भी सिफारिश की जाती है. ‘बीआरसीए’ दरअसल ब्रेस्ट कैंसर जीन का संक्षिप्त नाम है. क्चक्त्रष्ट्न१ और क्चक्त्रष्ट्न२ दो अलगअलग जीन हैं तो किसी व्यक्ति के स्तन कैंसर के विकास की संभावनाओं को प्रभावित करते हैं. जिन महिलाओं में ये असामान्यताएं होती हैं उन सभी को स्तन कैंसर हो ऐसा जरूरी नहीं, मगर उनमें से 50% को यह जिंदगी में कभी न कभी जरूर होता है.

वीआरसीए जीन असामान्यता वाली महिलाओं को अतिरिक्त सतर्क रहना चाहिए और नियमित रूप से वार्षिक मैमोग्राम कराने से चूकता नहीं चाहिए. जो महिलाएं नियमित रूप से जांच नहीं कराती हैं उनके लिए यह संभावना बढ़ जाती है कि उनके स्तन कैंसर का पता लेटर स्टेज या एडवांस स्टेज पर लगेगा. इस स्तर पर कैंसर संभावित रूप से स्तन या शरीर के कुछ दूसरे हिस्सों में फैल सकता है. ऐसे में इलाज एक चुनौती बन जाती है, लेकिन जब डाइग्रोसिस शुरुआती स्टेज में हो जाती है तब इलाज के कई तरह के विकल्प मौजूद होते हैं जो कैंसर का सफलतापूर्वक कर पाते हैं और इसके फिर से होने की संभावना पर भी रोक लगाते हैं.

आपके लिए कौन सा इलाज अच्छा

होगा यह प्रत्येक कैंसर की प्रोटीन असामान्यताओं पर निर्भर करता है, जिसका पता कुछ खास जांच द्वारा लगाया जाता है. एडवांस्ड थैरेपीज जिसे इम्मुनोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और हारमोनल थेरेपी इन विशेष अब्नोर्मिलिटीज पर काम करती है और बेहतर परिणाम देती हैं.

कुछ रोगियों के लिए ये उपचार पारंपरिक कीमोथेरेपी की जगह भी ले सकते हैं. कुछ उपचार जो कैंसर दोबारा होने से रोकते हैं उन्हें गोलियों के रूप में मौखिक रूप से भी लिया जा सकता है. यह अर्ली स्टेज के स्तन कैंसर की मरीज को भी एक अच्छी जिंदगी जीने को संभव बनाते हैं.

प्रारंभिक अवस्था में स्तन कैंसर डायग्नोज होने वाली महिलाओं में से 90% से अधिक इलाज के बाद लंबे समय तक रोग मुक्त जिंदगी जी सकती हैं. लेकिन भारत में स्तन कैंसर से पीडि़त महिलाओं की 5 साल तक जीवित रहने की दर महज 42-60% है. ऐसा इसलिए है क्योंकि लगभग आधे रोगियों का पता केवल अंतिम चरण में चलता है.

हम इसे बदल सकते हैं. यदि महिलाएं अपने थर्टीज में स्तन कैंसर की जांच की योजना बनाती हैं और लक्षणों के प्रकट होने की प्रतीक्षा नहीं करती हैं.

स्तन कैंसर का डायग्नोज होना अब मौत की सजा की तरह नहीं होना चहिए क्योंकि हम कैंसर का जल्द पता लगा सकते हैं और हमारे पास इसके सफल उपचार के लिए इफेक्टिव थेरेपीज हैं.

-डा. सुरेश एच. आडवाणी द्वारा एमडी, (एफआईसीपी, एफएनएएमएस, कंसल्टेंट आन्कोलौजिस्ट)

 

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