सास: यह रिश्ता है कुछ खास

अंकुश की मां अपनी बहू दीपा के व्यवहार से बहुत दुखी रहती थीं. दीपा उन्हें पोते से मिलने नहीं देती थी. पहले अलग घर लिया और अब एक शहर में रहने के बावजूद बच्चे को उन से दूर रखती. अंकुश ने जब मां का पक्ष ले कर बीवी से जिरह की तो उस ने हर महीने एक बार दादी को पोते से मिलने की अनुमति दी. इस के अलावा न कोई फोन पर बातचीत और न गिफ्ट का आदानप्रदान.

अगर सास बिना बताए बच्चे से मिलने आ जाती तो वह मुंह बना लेती. दीपा का यह रवैया अंकुश की मां को बहुत तकलीफ देता. इधर अंकित के मन में भी दादी के लिए प्यार और लगाव कम होता जा रहा था. वह महीने में 1-2 बार भी दादी से मिलने से कतराने लगा था.

समय के साथ अंकुश की मां ने इसी तरह जीना सीख लिया था. मगर एक दिन परिस्थितियां बदल गईं. उस दिन दीपा की तबीयत खराब हो गई थी. मेड भी छुट्टियों पर थी. दीपा ने अपनी बहन को फोन किया तो उस ने ऐग्जाम की वजह से हैल्प के लिए आने को इनकार कर दिया. दीपा की मां के पैरों में भी चोट लगी थी इसलिए वह नहीं आ सकीं.

दीपा ने अंकुश को अपनी समस्या बताई तो अंकुश ने सु  झाव दिया, ‘‘अंकित को मां के पास छोड़ देता हूं ताकि वे उस के खानेपीने का खयाल रख सकें. खुद भी वहीं खा कर तुम्हारे लिए खाना लेता आऊंगा.’’

दीपा को थोड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई. उसे लग रहा था कि सास हैल्प करने से मना कर देंगी. मगर अंकुश को विश्वास था कि मां सब संभाल लेंगी. ऐसा ही हुआ. सास ने न सिर्फ अंकित और अंकुश को संभाला बल्कि दोपहर में समय मिलने पर आ कर दीपा का घर भी साफ कर दिया. दीपा को फल काट कर खिलाए और सिर पर प्यार से हाथ फेरती हुई बोलीं, ‘‘तु  झे जब भी जरूरत हो मु  झे याद कर लेना.’’

दीपा की आंखें भर आईं. प्यार से उन का हाथ थामते हुई बोली, ‘‘आप के जैसी प्यारी मां के साथ मैं ने ज्यादती की. आप को अंकित से दूर रखा जबकि आप से ज्यादा प्यार उसे कौन कर सकता है? अपनों के साथ की अहमियत तकलीफ में ही पता चलती है.’’

इस घटना के बाद दीपा बिलकुल बदल गई. उसे सम  झ में आ चुका था कि सास कितने काम की हैं. साथ न रहते हुए भी उन्होंने उसे सहारा दिया था और इसलिए अब दीपा ने अंकित को दादी से मिलने पर लगी रोक हटा ली. वह खुद कोशिश करती कि अंकुश दादी से बातें करे और उन का प्यार महसूस करे. वह सम  झ चुकी थी कि दादी का प्यार हमेशा उस का साथ देगा.

सास की असलियत समझें

अकसर बहुएं सास की अहमियत नहीं सम  झ पातीं और उन्हें घर और बच्चों से दूर करने का प्रयास करने लगती हैं. मगर समय के साथ जब उन्हें अपनी गलतियों का एहसास होता है तो वे अपने किए पर बहुत पछताती हैं.

एक और घटना पर गौर करें

राजदेव ने मु  झे फोन किया और बोला, ‘‘मेरे बेटे राहुल की शादी हो रही है और पता है, सब से अच्छा क्या है?’’

‘‘क्या?’’ मैं ने उत्सुकतावश पूछा.

‘‘लड़की का उस की मां के साथ अच्छा रिश्ता नहीं है.’’

उस का जवाब सुन कर मैं चौंक उठी, ‘‘मगर आप इस के लिए खुश क्यों हैं?’’

‘‘क्योंकि वह लड़की हमारे परिवार का हिस्सा बनना चाहती है. मां से अच्छे रिश्ते न होने का मतलब है वह छुट्टियों में अपनी मां के पास जाने की जिद नहीं करेगी,’’ राजदेव ने हंसते हुए बताया.

मैं सोच में पड़ गई और धीरे से बोली, ‘‘शायद आप सही ही कह रहे हो. लड़की अकसर मायके जाने की जिद करती है ताकि अपना सुखदुख मां के साथ बांट सके. कुछ समय उन की ममताभरी हाथों का खाना खा सके. अकसर मां ही सास से अलग होने की सलाह देती है और मां के भरोसे ही बहुएं अपनी सास की अवहेलना करनी शुरू कर देती हैं क्योंकि परेशानी के समय उन्हें मां का सहारा होता है.

‘‘मेरी बहू ने भी तो ऐसा ही कुछ किया और मु  झे मेरे बेटे और पोते से भी दूर कर दिया. उस ने तो अपनी मां के घर के पास किराए का घर ले लिया और मु  झे मेरे पति के साथ पुश्तैनी घर में अकेला छोड़ दिया. पर जब लड़की का अपनी मां से रिश्ता ही सही नहीं तो वह वहां जाएगी क्यों?’’

‘‘जी हां, हेमाजी, आप के साथ जो हुआ उसे याद कर ही मु  झे इस लड़की के साथ बेटे का रिश्ता जोड़ना अच्छा लग रहा है,’’ राजदेव ने बताया.

जीवन आसान बन जाता है

सच है, जब एक लड़की दुलहन बन कर नए घर में आती है तो उसे अपनी मां का बहुत सहारा होता है. वह मां को हर बात बता कर उन की सलाह लेती रहती है. मगर एक बहू को इस बात का एहसास होना चाहिए कि मां के साथसाथ सास का सपोर्ट भी उसे काफी फायदा पहुंचा सकता है. यदि वह अपनी मां का खयाल रखती है तो अपने पति की मां का सम्मान करना भी उसी का कर्तव्य है.

वैसे भी याद रखें कि शादी के बाद एक लड़की बीवी के साथसाथ एक बहू भी बनती है. ऐसे में पति का प्यार पाने के साथसाथ सास ससुर के साथ भी बहू का रिश्ता अच्छा होना चाहिए. आप सास से   झगड़े कर के पति के साथ सुखी नहीं रह सकतीं. थोड़ा कंप्रोमाइज कर यदि आप सास के साथ भी सही तालमेल बैठाने में कामयाब हो जाती हैं तो फिर आप का जीवन काफी आसान हो जाएगा. सास आप के बहुत काम आती है. भले ही वह घर में साथ न रहती हो फिर भी यदि वह उसी शहर में आसपास है तो आप को बहुत तरह से आराम मिल सकता है. खासकर बच्चे को संभालने और बेहतर व्यक्तित्व देने में में सास बहुत मदद करती हैं.

यूरोपीय देश चेक रिपब्लिक में साल 2007 में बच्चों के बरताव और बड़े होने पर किरदार के बीच रिश्ता तलाशने का रिसर्च हुआ. मनोवैज्ञानिकों ने इस के लिए 12 से 30 महीने के बच्चों पर रिसर्च की. इन्हीं बच्चों को 40 बरस की उम्र में फिर से परखा गया. इन सभी की शख्सियत के बहुत से पहलू सामने आए. जो लोग बचपन में ज्यादा सक्रिय और बोलने वाले थे बड़े होने पर वे आत्मविश्वास से लबरेज पाए गए. यानी बच्चे को बचपन में जैसा माहौल मिलता है उस का बहुत गहरा असर बड़े होने के बाद भी उस के पूरे व्यक्तित्व पर पड़ता है. यही वजह है कि अगर बचपन में बच्चे को एकल परिवार में अकेलेपन से गुजरना पड़े तो बड़े हो कर वह स्वार्थी और अक्खड़ इंसान बनेगा. लेकिन बचपन में दादादादी का प्यार, दुलार और संस्कार मिलें तो वह खुशमिजाज और संतुलित व्यक्तित्व का स्वामी बनेगा.

सास की सलाह मानें

सास आप के साथ हैं तो संभव है कि थोड़ाबहुत आपसी कलह चलता रहे. मगर यदि वे उसी शहर में कुछ दूर रहती हैं तो दूरी आप दोनों के बीच की यह कलह को कम करने में मददगार साबित होगी. मगर इस दूरी की वजह से दादीपोते के बीच दूरी न आने दें. आप का अपनी सास से मेल न जमता हो तो भी इस का खामियाजा बच्चे को न भुगतने दें. बच्चे के जन्म के बाद के कुछ सालों में आप को अपनी सास के सपोर्ट की जरूरत काफी रहती है.

इसलिए सास को कभी बच्चे को ले कर जलीकटी न सुनाएं. वह बच्चे को ले कर कुछ सलाह देती हैं तो उन की बात पर गौर करें और उन की सलाह को अमल में लाएं. आखिर उन्हें बच्चे को पालने का अनुभव आप से ज्यादा है.

सुरक्षा को ले कर निश्चिंतता

आजकल हर दूसरी महिला जौब कर रही है. ऐसे में उसे सुबहसुबह औफिस के लिए निकल जाना होता है और शाम तक लौट कर आना होता है. बच्चा थोड़ा बड़ा है तो उस का आधा समय स्कूल में बीत जाता है पर स्कूल से लौट कर या तो बच्चे को खाली घर में अकेले रहना होता है या किसी मेड के भरोसे समय बिताना होता है. ये दोनों ही औप्शन उतने सुरक्षित नहीं.

यही वजह है कि औफिस में रहते हुए भी महिला का मन घर में बच्चे के पास बना रहता है और वह उस की चिंता में परेशान रहती है. इस से उस के काम पर भी असर पड़ता है. इस के विपरीत यदि बच्चा अपने दादा या दादी के पास रहे तो महिला बेफिक्र अपना काम कर सकती है. दादी के पास बच्चा पूरी तरह सुरक्षित रहता है और उस का मन भी लगा रहता है. दादी थोड़ी पढ़ीलिखी है तो वे उसे खाली समय में पढ़ा भी सकती हैं.

औफिस से जल्दी लौटने की अनिवार्यता नहीं

कामकाजी महिलाओं का आधा ध्यान अपने बच्चों पर ही रहता है. वह औफिस से जल्दी से जल्दी निकल कर अपने बच्चे के पास जाना चाहती हैं क्योंकि उन्हें चिंता लगी रहती है कि वह क्या कर रहा होगा, कुछ खाया होगा या नहीं. मगर यदि उस ने बच्चे को सास के पास छोड़ा है तो फिर उसे जल्दी भागने की टैंशन नहीं रहती. उस के लिए जरूरी काम से कुछ दिनों के लिए बाहर जाना भी संभव हो जाता है.

अगर आप की सास साथ नहीं रहती है तो भी आप बच्चे का उस से प्यार बढ़ा सकती हैं. छोटी छोटी कोशिशों से आप उन्हें एकदूसरे के करीब आने में मदद कर सकती हैं. इस के लिए आप कुछ बातों का खयाल रखें:

द्य हर संडे आप बच्चे की बात वीडियो कौल पर अपनी दादी से कराएं. जब बच्चा दादी से बात कर रहा हो तो जरूरी नहीं कि आप वहां बैठ कर बच्चे को निर्देश देती रहें. आप अपने काम में व्यस्त हो जाएं फिर देखें बच्चा कैसे खुल कर दादी से बातें करता है.

द्य पोतेपोतियों की फरमाइशें पूरी करने में दादी को एक अलग ही आनंद आता है. इस बात की चिंता कतई न करें कि उन के रुपए खर्च होंगे या फिर बुढ़ापे में उन्हें बाजार जाना पडेगा. उलटा ऐसा कर के दादी की तबियत और चंगी हो जाएगी.

अमेरिकन बहू- भाग 4: समाज को भाने लगी विदेशी मीरा

भारतीयता के रंग में पूरी तरह रंग जाने की मीरा की व्याकुलता का

नतीजा था या सुजाता के निश्चिय का, यह कहना तो मुश्किल है. पर पहली बार बात होने से ले कर शादी तक के 3 महीनों में ही सुजाता ने क्या कुछ नहीं सिखा दिया मीरा को. उस का ‘नैमस्टे’ का उच्चारण देखतेदेखते ‘नमस्ते’ में बदल गया. उस से भी एक कदम आगे बढ़ कर बड़ों के पांव छू कर आशीर्वाद लेना उसे आ गया.

उसे पालथी मार कर फर्श पर बैठने में

कोई कष्ट नहीं होता था. पर घर के किन कमरों में जूते पहन कर आ सकते थे और किन में नहीं, यह बारीकियां भी वह जान गई थी. बड़ों को संबोधित करने में नाम के आगे ‘जी’ जोड़ना

उसे आ गया. केवल अंकल या आंटी नाम की लाठी से सारे चाचा, मामा, मौसा और बुआ, मौसी, चाची आदि को हांकने के बजाए उन उल?ा रिश्तेदारियों के अनोखे नामों को भी यह सम?ा गई.

लोकप्रिय हिंदी गाने भी उस ने सीख लिए और उसी के साथ यह भी सम?ा गई कि ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए…’ वाला गीत.

साड़ी को उस ने जितना खूबसूरत परिधान सम?ा था उतना ही टेढ़ा काम उसे पहनना और संभालना होगा, इस का उसे लेशमात्र भी अंदाजा नहीं था. उस की हार्दिक इच्छा थी कि कम से कम शादी के दिनों में भारत में यह भारतीय कपड़े ही पहने पर डर लगता था तो साड़ी से.

सुजाता ने उसे आश्वस्त कर दिया कि विवाह के अवसर पर लहंगाचोली पहन कर और अन्य दिन शानदार कशीदाकारी वाले सलवारसूट की मदद से वह अपना शौक पूरा कर सकेगी. एकाध बार वह स्वयं साड़ी उसे पहना देगी.

 

अब इस से अधिक विस्तार में जाना तो यहां संभव नहीं होगा. इतना कहना काफी

होगा कि जिस दिन एयरपोर्ट से होटल पहुंचने पर चूड़ीदार कमीज में सजी हुई सुजाता का उन्होंने अपने चरणों में ?ाकने के बाद अपने अंक में भर कर स्वागत किया उस को देख कर सारे चुहल करने वाले उपस्थित रिश्तेदारों के मुंह आश्चर्य और प्रशंसा से खुले के खुले रह गए.

उसे होटल में ठहराने का और विवाह की रस्म होने के बाद ही अपने घर लाने के निर्णय

ने बहुतों का मुंह बंद कर दिया था. मीरा के छोटे से छोटे हावभाव में वे सब उस के विदेशीपनकी सनद ढूंढ़ रहे थे पर वाह री सुजाता की ट्रैनिंग कि सभी चकित थे. राहुल की रिश्ते की बहनें तो बस मीरा पर इंप्रैस हुई जा रही थीं. और सुजाता की आंखों में इतना गर्व भरा हुआ था जैसे चुनौती दे कर सब से पूछ रही हो कि ला सकते हो मेरे राहुल के लिए इस से बेहतर भारतीय बहू?

फिर शादी भी हुई और वैसे ही धूमधड़ाके से हुई जैसी करने की सुजाता ने ठानी थी, जो मीरा के सपनों में थी. इवैंट मैनेजमैंट वालों

को सौंप देने और इकलौते बेटे की शादी के

जोश से भरपूर कुमार दंपति को दिल खोल कर खर्च करने का मन बना लेने के बाद कमी ही किस चीज की थी कि  वह एक यादगार शादी न बन जाए.

पर असल में वह शादी यादगार बनी तो

एक ऐसी अनहोनी घटना के बाद जो शादी के अगले दिन घटी. अगले दिन कोई औपचारिक मेहमान नहीं थे. केवल अपने शहर के निकट संबंधियों और बाहर से आए हुए संबंधियों की घरेलू महफिल में मुंहदिखाई की रस्म आयोजित की गई.

बहू को उस दिन सुजाता ने अपने हाथों से साड़ी पहनाई. मीरा इस बात को ले कर बहुत चिंतित थी कि क्या साड़ी अपनी जगह पर टिकी रह सकेगी, पर सुजाता ने ढेरों पिनों और क्लिपों की सहायता से साड़ी को बांधा.

मीरा को दिलासा इस बात से भी मिली कि आज उसे चलनाफिरना नहीं था, केवल बैठे रहना था. ऐक्सरसाइज की अभ्यस्त मीरा को उस में कोईर् परेशानी नहीं थी. सारे रिश्तेदारों से उस ने पिछली संध्या को काफी अपनेपन और बेतकल्लुफी से बातचीत की थी पर इस समय उस की साड़ी का पल्लू हलका सा उस के माथे पर खींच कर छोटे से घूंघट का आभास दे दिया गया था.

 

उसे सम?ा दिया गया था कि वे सारे

रिश्तेदार जो कल शाम उस से आराम

से बातें कर चुके थे और बड़े शौक से उस के और राहुल के साथ फोटो खिंचवा चुके थे एक बार फिर औपचारिक ढंग से उस से रूबरू होंगे और उसे अपनी तरफ से आशीर्वाद और भेंट देंगे. इस के साथ ही वह भी बड़ों को पैर छू कर  प्रणाम करेगी.

रस्म का प्रारंभ कुमार साहब की चाचीजी से हुआ जो परिवार की सब से वयोवृद्ध सदस्या थीं. फिर आए अन्य 2 और वृद्ध रिश्तेदार जिन का परिचय बहू को दिया गया. अमेरिकन बहू ने बेहद शालीनता से उन सब को अपना सुंदर मुखड़ा पलकें ?ाकाए हुए ही दिखाया और सब की भेंट खुशीखुशी स्वीकार की.

सब से आखिर में जब कुमार साहब और सुजाता ने प्यार से उसे स्नेह और ममताभरी निगाहों से देखा तो वह बहुत भावुक हो उठी. अपनी भेंट वाला गहनों का सैट खोल कर सुजाता ने मीरा के सामने किया तो भावातिरेक से उस की आंखें गीली हो गईं. इस के बाद कुमार साहब ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘वी हैव चूजेन इट बिकोज द ऐमराल्ड पर्फेक्टली मैचेज द कलर औफ योर आईज.’’ (हम ने इसलिए इसे तुम्हारे लिए चुना है क्योंकि इस के पन्नों का रंग बिलकुल तुम्हारी आंखों जैसा हैं.)

अब तो मीरा बिलकुल ही अपनी सुधबुध खो बैठी. सुजाता के सिखाए हुए सारे पाठ वह भूल गई. भारतीय दुलहन की संस्कार प्रदत्त सीमाएं एक हद तक ही तो वह भोली अमेरिकन बहू ग्रहण कर पाई थी. एक ?ाटके के साथ वह उठी, ससुरजी को अपने आगोश में बांधते हुए, भावविभोर हो कर उस ने कहा, ‘‘ओह डैडी, आई लव यू…’’ और कुमार साहब के शर्म से लाल होते गाल पर झट से एक चुंबन जड़ दिया.

परिवार के निकट संबंधियों की उस बैठक को अचानक जैसे सांप सूंघ गया. सारे लोग हक्केबक्के रह गए. कुमार साहब के गाल

लाल हो कर अपनी अमेरिकन बहू के गालों के रंग से प्रतिस्पर्धा करने लगे. सुजाता के मुंह से एक लंबी सी हाय निकल गई. क्षण भर तक सन्नाटा सा छाया रहा. फिर उस सन्नाटे को तोड़ती हुई काकी दादी की पोपली आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘बहू सुजाता, अरे तुम ने शेर को सब तो सिखाया बस पेड़ पर चढ़ना नहीं सिखाया. चलो धीरेधीरे वह भी सीख जाएगी हमारी अमेरिकन बहू.’’

इस के बाद राहुल की चचेरी बहन हंसी दबातेदबाते दुपट्टे से अपना मुंह बंद कर के वहां से भागी. इस के बाद सारे लोगों ने धीरेधीरे हंसना शुरू किया. फिर तो कई लोग हंसतेहंसते लोटपोट हो गए.

अमेरिकन बहू कुछ देर तक तो बिलकुल स्तब्ध रही, उसे कुछ सम?ा में ही नहीं आया कि आखिर हुआ क्या था. फिर माथे पर आगे सरक आए घूंघट को थोड़ा पीछे सरकाती हुई वह भी सब के हंसने में खुले दिल से शामिल हो गई.

संकल्प: शादी के बाद कैसे बदली कविता की जिंदगी

मेरीसहेली कविता की शादी की पहली सालगिरह की पार्टी में जाने के लिए रवि का देर से घर पहुंचना मेरा मूड बहुत खराब कर गया था.

घर में कदम रखते ही उन्होंने सफाई देनी शुरू कर दी, ‘‘बौस ने अचानक मीटिंग बुला ली थी और उस गुस्सैल से जल्दी जाने की रिक्वैस्ट करने का मेरा दिल नहीं किया. आईएम सौरी डार्लिंग.’’

‘‘मैं कुछ कह रही हूं क्या जो माफी मांग रहे हो?’’ मैं नाराजगी भरे अंदाज में उठ कर रसोई की तरफ चल दी.

उन्होंने सामने आ कर मु?ो रोका और मनाने वाले लहजे में बोले, ‘‘अब गुस्सा थूक कर मुसकरा भी दो, स्वीटहार्ट. मैं फटाफट तैयार होता हूं और हम 15 मिनट में निकल चलेंगे.’’

‘‘मु?ो इतनी देर से पार्टी में नहीं जाना है.’’

‘‘प्लीज, अब मूड ठीक कर भी लो, यार. मैं औफिस में चल रही घटिया पौलीटिक्स के कारण वैसे ही परेशान चल रहा हूं और अगर ऊपर से घर में भी टैंशन बनी रहेगी, तो मैं पक्का बीमार पड़ जाऊंगा.’’

यह बात ठीक है कि आजकल उन के अपने बौस से संबंध ठीक नहीं चल रहे हैं और इस कारण नौकरी बदलने की नौबत तक आ सकती है. उन की परेशानी न बढ़ाने की खातिर मैं ने बात को लंबा नहीं खींचा और बोली, ‘‘औफिस की चिंता करने के साथसाथ कभीकभी मेरी खुशियों का भी खयाल रखा करो.’’

‘‘मैं रखता हूं, पर…’’

‘‘अब ?ाठेसच्चे बहाने बना कर समय बरबाद करने के बजाय जल्दी से तैयार हो जाओ,’’ अपने गुस्से को भुलाकर मैं मुसकराई, तो उन्होंने प्रसन्नता दर्शाते हुए मेरा माथा चूम लिया.

कुछ देर बाद बैंकेट हौल में कदम रखते ही मैं सारे गिलेशिकवे भूल कर पार्टी का मजा लेने लगी. कोविड के बाद यह पहली बड़ी पार्टी थी जिस में हम लोग शामिल हुए थे और मैं उस के पलपल को जी लेना चाहती थी. जो जानकार थे, उन से हंसीखुशी के साथ मिली. बड़े उत्साह से अपनी मनपसंद चीजें खाने की इच्छा जाहिर कर मैं ने उन से खूब भागदौड़ कराई.

उन्हें डांस करना ढंग से नहीं आता, इस बात की फिक्र किए बिना मैं हाथ पकड़ कर उन्हें जबरदस्ती डांस फ्लोर तक खींच ले गई.

‘‘यार, उलटासीधा डांस करा कर मेरा जलूस मत निकलवाया करो,’’ व्यायाम करने के अंदाज में डांस करते हुए उन की आवाज में खीज के भाव साफ ?ालक रहे थे.

‘‘शादी होने से पहले मेरी खुशी की खातिर तुम डांस कर लेते थे, तो अब क्यों एतराज करते हो, जनाब?’’ मस्ती से नांचते हुए मैं ने मुसकरा कर पूछा.

‘‘तब मैं तुम्हें नाराज करने की रिस्क नहीं ले सकता था.’’

‘‘और अब मु?ो खुश रखने को किसी तरह की कोशिश करना तुम्हें बो?ा सा लगता है. अब घर की मुरगी दाल बराबर हो गई है,’’ दिल पर चोट लगने का अभिनय करते हुए मैं ने आंखें तरेरी, तो वे खिलखिला कर हंस पड़े थे.

‘‘तुम गुस्से में भी बहुत प्यारी लगती हो.’’

‘‘यू मीन ब्यूटीफुल,’’ मैं ने बड़ी अदा से पूछा.

‘‘यैस, वैरी ब्यूटीफुल.’’

‘‘थैंक्यू,’’ मैं ने भीड़ की फिक्र किए बिना एक प्यार भरा चुंबन उन के गाल पर ?ाटके से अंकित किया तो वे बुरी तरह से शरमा गए.

‘‘यह क्या करती हो. सब देख रहे हैं, यार.’’

‘‘तो क्या हुआ.’’

‘‘यार, कुछ काम अकेले में करने होते हैं.’’

‘‘ओके, पर ‘आईलवयू’ तो यहां कह सकती हूं न.’’

‘‘यैस, श्योर.’’

‘‘आई लव यू, माई डार्लिंग,’’ इस बार मैं ने उन का हाथ होंठों तक लेजा कर चूमा तो उन का चेहरा फूल सा खिल उठा.

‘‘पगली,’’ प्यार भरे अंदाज में उन के मुंह से निकले इस एक शब्द ने मेरे रोमरोम में मस्ती भर दी थी.

मैं आज अपनी शादीशुदा जिंदगी में बहुत खुश और सुखी हूं, पर शादी के बाद गुजरे पहले साल में हम दोनों की नासम?ा के कारण हमारी विवाहित जिंदगी में बहुत कुछ गलत घटा था.

वे बहुत जल्दी तरक्की करना चाहते हैं, यह तो मैं शादी होने से पहले भी सम?ाती थी, पर शादी होने के बाद मु?ो उन का अपने कैरियर के प्रति बहुत ज्यादा सीरियस होना खलने लगा था. औफिस की जिम्मेवारियों में उल?ा कर उन का आएदिन देर से घर आना तो मु?ो बिलकुल हजम नहीं होता था.

शादी के बाद और भी बहुत कुछ बदल गया था. पहले मु?ो अपनी बात मनवाने में कभी दिक्कत नहीं होती थी, पर प्रेमी से पति बनते ही वे अडि़यल इंसान में बदल गए थे. अपने मातापिता के कहने में आ कर वो मेरी मरजी के खिलाफ कुछ करते तो हमारे बीच ?ागड़ा जरूर होता.

हमारे बीच बढ़ती अनबन की खबर मेरे मायके वालों को हुई, तो वे सभी अपनीअपनी सम?ा के अनुसार मु?ो समस्याओं का हल सम?ाते. मेरे मम्मीपापा के उन्हें सम?ाने से बात ज्यादा बिगड़ती गई क्योंकि रवि को उन का हमारी जिंदगी में दखल देना बिलकुल पसंद नहीं आता.

दिलों के बीच दूरियां बढ़ने से हमारी जिंदगी में से रोमांस मरता जा रहा था. सैक्स संबंध अधिकतर मशीनी से हो गए. मैं खुद को कभीकभी इतना ज्यादा फंसा हुआ महसूस करती कि विवाहित जिंदगी बहुत बड़ा बो?ा लगने लगती.

शादी को ले कर जो रंगीन सपने देखे थे, उन का टूटना मेरे मन को बहुत अखरता. उन के व्यवहार और नजरिए में आए परिवर्तन को ले कर मेरी शिकायतें रोजरोज बढ़ती जाती थीं. जब ?ागड़ा करने की ताकत अपने अंदर महसूस नहीं करती, तो मैं लंबे समय के लिए उन से बोलचाल बंद कर देती.

करीब 2 महीने पहले आई हमारी शादी की पहली वर्षगांठ पर मैं उन से खफा हो कर अपने मायके में रहने आई हुई थी. अपनी नाराजगी दिखाते हुए वे उस दिन जब शाम को मु?ा से मिलने आए, तो उन का भी चेहरा तना हुआ था.

मम्मीपापा ने जोर डाल कर हम दोनों को बाहर घूमने भेज दिया. इत्तेफाक से हम उसी पार्क में घूमने पहुंचे जहां करीब डेढ़ साल पहले उन्होंने शादी करने का प्रस्ताव मेरे सामने रखा था.

पार्क में कदम रखते ही उस खास दिन की सुखद यादें मेरे परेशान मन में एकदम से ताजा हो उठी थीं.

रवि एक घुटना जमीन पर टिकाते हुए मेरे सामने बैठे और बड़े रोमांटिक अंदाज में मेरा हाथ चूम कर मु?ा से पूछा था, ‘‘मेरी जिंदगी में अपार खुशियां भरने के लिए क्या तुम मेरे संग 7 फेरे लेने को तैयार हो, नीरू.’’

मु?ो उन की आंखों में अपने लिए बहुत गहरा प्यार नजर आया था. मैं ने भावविभोर हो कर ‘‘हां’’ कहा तो वो खुशी से फूले नहीं समाए थे.

उसी दिन अपने प्यार को साक्षी बना कर हम ने एकदूसरे से वादा किया था कि अपने विवाहित जीवन में अपनी खुशियों को हमेशा बरकरार रखेंगे.

मैं प्रपोज करने वाले दिन की यादों के संसार से तब उबरी जब रवि ने भावुक हो कर मु?ा से पूछा, ‘‘हमारी जिंदगी में सब कुछ इतना गलत क्यों हो रहा है, नीरू? मैं तुम्हें अब भी बहुत प्यार करता हूं, पर फिर भी हम एकदूसरे से इतनी दूर क्यों होते जा रहे हैं?’’

उन की आंखों में छलक आए आंसूओं को देख कर मु?ो तेज ?ाटका लगा था. मैं ने उन के सवाल का जवाब देने की कोशिश कई बार करी, पर मेरे मुंह से एक शब्द नहीं निकला.

अचानक ही मेरा अपने ऊपर से नियंत्रण टूट गया और मेरी आंखों से भी आंसू बह निकले. उन्होंने बांहें फैलाईं तो उन की छाती से लग कर मैं जोर से रो पड़ी थी.

उन के आंसू पोंछते हुए मैं ने उस शाम मन ही मन यह महत्त्वपूर्ण संकल्प किया कि रविके प्रति बहुत तीव्रता और ताकत से उठ रहे खुशी और प्यार के एहसास को भविष्य में कभी मरने नहीं दूंगी. जो हमारे विवाहित जीवन की खुशियों को तबाह कर रहे थे, मैं भविष्य में उन हालतों की गुलाम बन कर जीने के लिए बिलकुल तैयार नहीं थी.

मेरे इसी संकल्प ने मेरी जिंदगी, मेरे नजरिए और व्यवहार को पूरी तरह से बदल डाला है. किसी भी कीमत पर रवि के साथ अपने संबंध अच्छे रख कर अपने विवाहित जीवन की खुशियों को बनाए रखना अब मेरे लिए बेहद महत्त्वपूर्ण हो गया है.

अब मु?ो उन की किसी बात या काम पर गुस्सा आता है, तो उसे दिखाने से मैं

कतई संकोच नहीं करती, पर वे मु?ो मेरे आगेपीछे घूमते हुए मनाएं, ऐसी अपेक्षा अब मैं नहीं रखती. जिस इच्छा के कारण मन चोट खा कर बारबार दुखे और घर में टैंशन जन्मे, उसे मन में पालने से क्या फायदा.

उलटा अब वे अगर मु?ा से किसी कारण नाराज हो जाते हैं, तो जल्दी से जल्दी उचित अवसर ढूढ़ कर मैं उन्हें मनाने से नहीं चूकती. मु?ो उन की नाराजगी की फिक्र नहीं, अपने हावभाव से ऐसा दर्शा कर उन के अहम को ठेस पहुंचाने की नासम?ा अब मैं नहीं दिखाती.

शिकायतें, नाराजगी और रुठनामनाना तो खैर हमारी जिंदगी में हमेशा चलता ही रहेगा, पर इन सब के कारण अब मैं हमारी खुशियों को ग्रहण नहीं लगने देती हूं. रवि के साथ बिताए पलों से निकल रहे हर खट्टेमीठे अनुभव का भरपूर आनंद लेने से मु?ो मेरी कोई अधूरी रह गई कामना या टूटी उम्मीद अब नहीं रोक पाती हैं.

पार्टी वाली इस रंगीन रात का भरपूर फायदा उठाने के लिए हम ने कविता और उस के पति से जल्दी विदा ली और घर लौट आए. रवि की आंखों में नजर आ रहे मौजमस्ती के भाव साफ कह रहे थे कि उस रात मेरे जल्दी सो जाने का कोई चांस नहीं था.

Beauty Tips: गर्मियों में मौइस्चराइजर क्यों है जरूरी

बदलते मौसम के साथ त्वचा में भी कई बदलाव देखने को मिलता है. त्वचा में होने वाले बदलाव को देख कर ही हम कौस्मेटिक का चयन करते हैं. जैसे सर्दीयों में मौइस्चराइजर का  भरपूर इस्तेमाल किया जाता है लेकिन गर्मी के आते ही मौइस्चराइजर का इस्तेमाल कम हो जाता है. दरअसल, गर्मियों में चिपचिपी त्वचा के डर से ज्यादातर महिलाएं में मौइस्चराइजर का इस्तेमाल बंद कर देती हैं. लेकिन क्या गर्मियों में सच में मौइस्चराइजर का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए? जी नहीं, गर्मी हो या सर्दी मौइस्चराइजर का इस्तेमाल आपकी त्वचा के लिए बहुत जरूरी है.

आइए, जानते है गर्मियों में मौइस्चराइजर का इस्तेमाल क्यों जरूरी है:

एक्सपर्ट का कहना है कि, “अधिकतर महिलाओं को लगता हैं की मौइस्चराइजर के इस्तेमाल से त्वचा औयली और चिपचिपी हो जाती है. इसलिए गर्मियों में मौइस्चराइजर का इस्तेमाल करना ही नहीं चाहिए. दरअसल, जब तापमान ज्यादा होता है तो मौइस्चराइजर आपकी त्वचा के लिए उतना ही जरूरी हो जाता है. और यह उन लोगों के लिए विशेष रूप से जरूरी है जो एसी में अधिक समय बिताते हैं.

जब हो कठोर त्वचा

गर्मी की शुरुआत होते ही त्वचा पर इसका असर दिखने लगता है. गर्मी का मौसम अपने साथ स्विमिंग और वाटर स्पोर्ट्स जैसी एक्टिविटी को लेकर आता है, जिसकी वजह से हमारी त्वचा चिलचिलाती धूप, स्विमिंग पूल के पानी में मौजूद क्लोरीन, और समंदर के खारे पानी जैसी चीजों के संपर्क में आने से खराब होने लगती है. खास कर तब जब उनकी सही देखभाल ना की जा रही हो. लेकिन सही रूप से देखभाल की जाए तो आप अपनी त्वचा को हानिकारक तत्वों से बचा सकते हैं.

जब तेज धूप का हो कहर

गर्मी के मौसम में धूप का होना वाजिब है. गर्मी की तेज धूप त्वचा को जलाने वाली होती है जिस से संबर्न, टैनिंग जैसी स्किन प्रौब्लम होने लगती है. ऐसे में संसक्रीन का इस्तेमाल त्वचा को सूरज की हानिकारक किरणों से बचाती है. लेकिन त्वचा की देखभाल के लिए सिर्फ संसक्रीन ही काफी नहीं है, संसक्रीन के बाद त्वचा पर अच्छे से मौइस्चराइजेसन करने से वो कोमल और किसी भी तरह की त्वचा संबंधित दिक्कतों से बच जाती है. आप गर्मी में मौइस्चराइजर बैस्ड संसक्रीन का भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

 कैमिकल से बचने के लिए

गर्मियों आते ही हमारे कई सारे प्लान बनने लगते हैं जैसे कभी वाटर पार्क घूमने जाना, पूल पार्टी करना या बच्चों के साथ स्विमिंग क्लास्स जौइन कर लेना. लेकिन हम ये भूल जाते है की वाटर पूल में क्लोरीन नाम का कैमिकल मिलाया जाता है जो त्वचा के लिए हानिकारक होता है. यदि आप पूल में अधिक समय बिताते हैं तो अपने शरीर को अच्छी तरह क्लीन जरूर करें. त्वचा को क्लीन करने के बाद मौइस्चराइजर का इस्तेमाल जरूरी है. मौइस्चराइजर आपकी त्वचा की गहराई में जा कर त्वचा को पोषण प्रदान करता हैं. त्वचा को सही मात्रा में पोषण मिलना बहुत जरूरी है. यह त्वचा को नुकसान पहुंचने से रोकता है.

गर्मियों में रूखी त्वचा

गर्मियों में अधिकतर महिलाओं को लगता है की गर्मियों में त्वचा ड्राई नहीं होती. लेकिन यह उनकी गलतफहमी है. दरअसल गर्मियों में हमारा ज़्यादातर समय धूप, स्विमिंगपूल, और एयर कंडीशनिंग में बीतता है. यहां तक की हम कुछ ऐसे ब्यूटी प्रौडक्ट का इस्तेमाल करते है, जिस में क्लोरीन ज्यादा होता है. इनकी वजह से हमारी त्वचा शुष्क और बेजान नजर आने लगती है. इन से निबटने के लिए ईमोलिएंट्स, यानी त्वचा को सौम्य और कोमल बनाने वाले प्रौडक्ट का इस्तेमाल करना चाहिए,  जैसे की मौइस्चराइजर, रोजाना मौइस्चराइजर का इस्तेमाल आपकी त्वचा के लिए फायदेमंद होता है. इस में ईमोलिएंट्स गुण पाए जाते है, जो त्वचा को ड्राई होने से बचाते है और त्वचा को निखारते भी है.

त्वचा विशेषज्ञा भी मौइस्चराइजर इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं क्योंकि यह त्वचा पर  एक सुरक्षा परत बना कर जर्म्स और अन्य हानिकारक चीज़ों से बचाता है.

बदलते मौसम के साथ स्किन कैयर है जरूरी

त्वचा को बाहर के मौसम का कोई अंदाजा नहीं होता, इसीलिए त्वचा की खास देखभाल हर मौसम में जरूरी है. देखा जाए तो हम से बहुत से लोग साल भर त्वचा से जुड़ी परेशानियों से जूझते हैं. यानी अगर आपकी त्वचा सर्दियों में ड्राई रहती है तो आपको गर्मियों में भी एक ऐसे मौइस्चराइज़र का इस्तेमाल करना चाहिए, जिसका गाढ़ापन आपकी त्वचा अच्छे से नारिश करे. मौइस्चराइजर लगाते समय एक बात का ध्यान जरूरी दें कि मौइस्चराइजर अल्कोहल-बेस्ड  न हो. अल्कोहल बेस्ड मौइस्चराइजर आपकी त्वचा से अच्छे और ज़रूरी तेलों को हटा कर उसे और भी ज़्यादा नुक्सान पहुंचा सकते हैं.

जब हो ओपन पोर्स की दिक्कत

एक अच्छी हेल्दी स्किन के लिए क्लींजिंग, टोनिंग, और मॉइस्चराइज़िंग बहुत जरूरी है. हालांकि लोगों को ऐसा लगता है कि गर्मियों में होने वाले पसीने की वजह से उनकी त्वचा सूखी नहीं होगी, पर पसीने के वजह से त्वचा के छिद्र खुल जाते हैं. इन्हें वापस बंद करने के लिए आपको टोनर इस्तेमाल करने की जरुरत पड़ेगी, और टोनर के बाद मौइस्चराइज़र का इस्तेमाल करने से आपकी त्वचा खिल खिला उठेगी.

जब त्वचा से निकले अधिक पसीना

गर्मी के मौसम में त्वचा औयली हो सकती है, पर इसका ये मतलब नहीं कि आपकी त्वचा को मौइस्चराइज़र की जरुरत नहीं. दरअसल गर्मीयों के मौसम में ज़्यादा पसीना आने की वजह से त्वचा का मौइस्चर खो जाता है. बढ़ती गर्मी और धूप की वजह से आपकी त्वचा से पानी निकल जाता है. ऐसे में आपको आपकी त्वचा को हाइड्रेटेड रखने के लिए सिर्फ ज़्यादा पानी पीने और पानी की अधिक मात्रा वाले भोजन खाने पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. बल्कि आपको सही मौइस्चराइज़र का इस्तेमाल भी करना चाहिए, जो आपकी त्वचा में मौइस्चर की मात्रा बनाए रखे.

गर्मियों में कैसे करें मौइस्चराइजर का यूज

मौइस्चराइजर हमारी त्वचा के लिए कितना जरूरी है यह तो हम जान चुके है. लेकिन इसके साथ गर्मियों में मौइस्चराइजर का इस्तेमाल कब करना चाहिए यह भी जानना जरूरी हैं.

  • नहाने के बाद मौइस्चराइजर का इस्तेमाल जरूरी करें. यह आपकी बौडी को हाइड्रेट रखती है और त्वचा में नमी बनाए रखती है.
  • आप को यदि ज्यादा पसीना आता है तो तो आप मौइश्चराइजर मास्क और टोनर का इस्तेमाल भी कर सकती है.
  • धूप में निकालने से पहले संसक्रीन के साथ मौइश्चराइजर का भी इस्तेमाल करें.
  • सिर्फ चेहरे को ही मौइस्चराइज न करें.

Women’s Day 2023: घूरना तकलीफ देता है

हमारे देश में सड़क हो या सिनेमाघर, बाजार हो या दफ्तर कुछ नजरें हर वक्त महिलाओं और लड़कियों का पीछा करती हैं. चौकचौराहे पर बैठे लड़के आतीजाती महिलाओं को तब तक घूरते रहते हैं जब तक वे उन की नजरों से ओझल नहीं हो जातीं. सरेराह महिलाओं को एक वस्तु समझ कर जब पुरुष घूरते हैं, फबतियां कसते हैं तो वे इस बात का अंदाजा नहीं लगा पाते कि उन की गंदी नजरों का सामना करने वाली लड़की के दिलोदिमाग पर क्या गुजर रही होगी.

दरअसल, महिलाएं जिसे घूरना कहती हैं पुरुष उसे निहारना कहते हैं. लेकिन पुरुषों का वह निहारना महिलाओं को लगता है जैसे वे बदन पर गड़ी आंखों से बलात्कार कर रहे हों.

हाल ही में प्रदर्शित फिल्म ‘फितूर’ में भी जब आदित्य राय कपूर कैटरीना को देखता है तो वह कहती है, ‘‘घूरना बंद करो.’’

पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ‘वूमन औफ वर्थ कौन्क्लेव’ में पत्रकार रवीश कुमार के साथ ‘हम जिस तरह से देखने के आदी हैं’ विषय पर चर्चा हुई. इस चर्चा में रवीश कुमार ने कहा, ‘‘लड़की देखी जाती है, लड़की देखना सिखाया जाता है. राह चलती लड़की को हजार तरह की निगाहों से गुजरना पड़ता है. किस ने लड़कों को इस तरह देखना सिखाया? कोई घर में बड़े हो रहे लड़कों को क्यों नहीं सिखाता कि लड़कियों को किस तरह देखना है? क्या इस में कहीं पारिवारिक परिवेश जिम्मेदार होता है? क्या परिवारों में लड़कों को लड़कियों के मुकाबले अतिरिक्त छूट मिलती है?’’

इस ताड़ने, देखने, घूरने, ताकने को कैसे रोका जा सकता है आदि सवालों के जवाब इस कौन्क्लेव तलाशे गए.

‘हम जिस तरह से देखने आदी हैं’ विषय पर अभिनेत्री शबाना आजमी का कहना था कि इस समस्या की जड़ में पितृसत्तात्मक मानसिकता है, जहां पुरुषों को महिलाओं से बेहतर दिखाया जाता है. एक पुरुष सिर्फ अपनी मां को अच्छी निगाह से यानी सम्मान की नजर से देखता है. लेकिन वह घर से बाहर की महिलाओं को मां, बहन, बेटी की नजर से नहीं देखता.

दरअसल, निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे सुर्खियों में जरूर आए, लेकिन आखिरकार जो मुद्दा उभर कर सामने आया, वह यही है कि महिलाओं को आज भी सुरक्षा की जरूरत है. आज की युवती, आज की महिला पहननेओढ़ने, घूमनेफिरने की आजादी चाहती है. आज भी अगर वह मर्द के द्वारा तय किए गए दायरे में है तो सुरक्षित है और अगर वह शराब, सिगरेट पीए, मिनी स्कर्ट पहन कर सड़क पर निकले तो फौरन उसे लूज कैरेक्टर का दर्जा दे दिया जाता है. कहा जाता है कि वह खुद को औब्जैक्टिफाई कर रही है. उस के लिए कहा जाता है कि वह ऐसा कर के पुरुषों को आकर्षित कर रही है. निर्भया कांड के बाद जो स्लोगन सामने आया वह है ‘शिफ्ट द ब्लेम शिफ्ट द गेन’.

शबाना आजमी ने आगे कहा कि जहां तक फिल्मों में महिलाओं की कामुकता को दिखाने की बात है तो उस के लिए फिल्मों में महिलाओं की कामुकता को दिखाने का तरीका बदलना चाहिए, क्योंकि कामुकता और अश्लीलता के बीच एक महीन रेखा है. कामुकता को जिस तरह दिखाया जाता है, वह कैमरे के घूमने पर निर्भर करता है न कि इस बात पर कि आप किस तरह के कपड़े पहनते हैं या कैसे नृत्य करते हैं.

इसी विषय पर सेफ्टीपिन की सहसंस्थापक कल्पना विश्वनाथ का कहना है, ‘‘हम लोगों ने एक अभियान चलाया था, ‘घूरना तकलीफ देता है’ घूरने और देखने में फर्क होता है. पुरुष घूरने के लिए महिलाओं की पोशाक को दोष देते हैं. हमारे समाज में सारे नियंत्रण महिलाओं पर ही लगाए जाते हैं कि ऐसे कपड़े पहनें, शाम के बाद घर से बाहर न निकलें वगैरह. समाज महिलाओं की आजादी पर पहरा लगा रहा है. हम औरतों की सुरक्षा की बात करते हैं उन के अधिकारों की नहीं. जरूरत है कि समाज में सैक्सुअलिटी पर खुल कर बात की जाए, घर में लड़कों के साथ हर विषय पर खुल कर बात की जाए ताकि वे समझ सकें कि महिलाओं के साथ कैसे पेश आना चाहिए. टकटकी लगाए देखने में सीधा संबंध सैक्सुअल आजादी से है.’’

‘‘जहां तक घूरने की और थाने में रिपोर्ट करने का सवाल है तो इस की रिपोर्ट शायद ही कभी होती है, क्योंकि कोई भी महिला पुलिस के पास जा कर रिपोर्ट करने और फिर अपराध को साबित करने के झंझट में नहीं पड़ना चाहती. जबकि घूरना, टकटकी लगाए देखना कानूनन गलत है. कानून पुरुष व महिला को बराबर अधिकार देता है, लेकिन भारतीय समाज की संस्कृति में असमानता है. आज की महिला एक आजाद इनसान की तरह जीना चाहती है,’’ यह कहना है वकील, शोधकर्ता तथा मानवाधिकार एवं महिला अधिकार कार्यकर्ता वृंदा ग्रोवर का.

इस अवसर पर राजनेता बलिकेश नारायण सिंह देव ने कहा कि समाज को महिलाओं के प्रति अपनी सोच बदलने की जरूरत है. लड़कों को घर से बाहर महिलाओं के साथ कैसे पेश आना चाहिए, यह वे अपने घर के पुरुषों से ही सीखते हैं कि वे कैसे उन की मां, भाभी, बहन के साथ व्यवहार करते हैं. आज जरूरत लड़कों को लड़कियों की तरह पालने की है ताकि वे महिलाओं का सम्मान करना सीख सकें.

घूरना अपमान निहारना सम्मान

‘‘घूरना अपराध है लेकिन देखना सौंदर्य का सम्मान,’’ पिछले दिनों जनता दल के राज्यसभा के सांसद केसी त्यागी ने महिलाओं को ले कर यह विवादित बयान दिया. उन के अनुसार, देश के प्राचीन कवियों ने भी महिलाओं के सौंदर्य का वर्णन किया है और वे संसद भवन में बैठने वाली फिल्म अदाकारा सांसदों को अकसर देखते रहते हैं.

इस के जवाब में बीजेपी महिला मोरचा की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश कार्यकारिणी की सदस्या लज्जारानी गर्ग ने कहा, ‘‘यह बयान त्यागी और उन के दल की मानसिकता को दर्शाता है. देश में प्राचीनकाल से ही महिलाओं को मां के रूप में देखा गया है और मां के शरीर की सुंदरता नहीं बल्कि उस का स्नेह देखा जाता है.’’

जब जनप्रतिनिधि ही इस तरह की टिप्पणी करते हैं तो महिलाओं का सम्मान करने की इन की दावेदारी पर सवालिया निशान लग जाता है.

क्यों घूरते हैं पुरुष महिलाओं को

एक ब्रिटिश रिसर्च के अनुसार, हर इनसान में विपरीत सैक्स को घूरने की फितरत होती है. इनसान चाह कर भी यह आदत छोड़ नहीं पाता, क्योंकि विपरीत सैक्स को निहारने या घूरने में जो आनंद या सुख मिलता है वह वैसा ही होता है जैसा किसी भूखे को भोजन और प्यासे को पानी मिलने के बाद होता है. विपरीत सैक्स पर नजर पड़ते ही शरीर में हारमोनल प्रतिक्रिया होती है और आनंदित होने का एहसास होता है. पुरुषों के अंदर मौजूद टैस्टोस्टेरौन नामक हारमोन उन में महिलाओं के प्रति अट्रैक्शन उत्पन्न करता है, जिस के चलते वे कई बार विपरीत सैक्स की तरफ ज्यादा देखते हैं या कहें घूरते हैं. लेकिन जब पुरुषों की घूरती नजरें जिस्म को भेदने वाली होती हैं तो लड़कियां घबरा जाती हैं. इस से उन के आत्मविश्वास में गिरावट आ सकती हैं, दिमागी सक्रियता में भी कमी हो सकती है.

सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च के अनुसार, महिलाओं को जब लंबे समय तक पुरुषों द्वारा घूरा जाता है तो वे खुद को फिगर के आधार पर मूल्यांकन करना शुरू कर देती हैं. और वे शर्मिंदगी महसूस करने लगती हैं.

हस्तियां भी नहीं छोड़तीं मौका

ऐसा नहीं है कि सिर्फ आम पुरुष ही महिलाओं को घूरते हैं. ऐसा बड़ी हस्तियां भी करती हैं, जिन में किसी देश के राष्ट्रपति, खिलाड़ी भी शामिल होते हैं. हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी इटली में हुए जी-8 के सम्मेलन में लड़कियों को घूरते पाए गए. ऐसी ही कुछ हरकत फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलेस सरकोजी ने भी की. वे जी-8 सम्मेलन में हिस्सा लेने आई ब्राजील की महिला डैलिगेट को घूरते नजर आए. इसी तरह तिरछी नजर से अमेरिकी चीयर गर्ल पर नजरें गड़ाने वालों में जानेमाने फुटबौलर डैविड बेकहम भी हैं.

जिंदगी का कितना वक्त घूरने में बरबाद

ब्रिटिश संस्था कोडक लैंस विजल द्वारा 18 से 50 की उम्र के 3 हजार लोगों की राय को आधार बना कर किए गए एक शोध के अनुसार, पुरुष अपनी जिंदगी का पूरा 1 साल लड़कियों को घूरने में बरबाद कर देते हैं. शोध के अनुसार, एक पुरुष प्रतिदिन औसतन 1-2 नहीं बल्कि अलगअलग 10 लड़कियों को घूरता है. प्रतिदिन पुरुष 2-4 मिनट नहीं बल्कि औसतन पूरे 43 मिनट लड़कियों या महिलाओं को मुड़मुड़ कर घूरने या आंखें फाड़ कर ताड़ने में खर्च करता है. ब्रिटिश रिसर्च के अनुसार, इस आदत को पुरुष चाह कर भी छोड़ नहीं पाते. जहां तक लड़कियों की बात है तो उन में घूरने की आदत लड़कों के मुकाबले कम होती है. रिसर्च के मुताबिक, लड़कियां या महिलाएं औसतन जिंदगी के पूरे 6 महीने और रोजाना औसतन करीब 20 मिनट घूरने में खर्च करती हैं.

घूरते समय क्या देखते हैं लड़के

अमेरिका की यूनिवर्सिटी औफ नेब्रास्का लिनकोलन के अध्ययनकर्ताओं के अनुसार, आई ट्रैकिंग तकनीक के जरीए जाना गया है कि लड़के लड़कियों को घूरते समय उन के चेहरे के बजाय उन की बौडी और उन की फिगर को ज्यादा देर तक देखते हैं. इस स्टडी के मुताबिक मर्द ज्यादातर उन महिलाओं को घूरने में अपना अधिकांश वक्त बिताते हैं जिन की कमर औसतन पतली हो या उन की ब्रैस्ट का साइज बड़ा हो. आप को जान कर हैरानी होगी कि महिलाएं भी दूसरी महिलाओं को पुरुषों वाली नजर से घूरती हैं यानी वे भी चेहरे के बजाय ब्रैस्ट व कमर के आसपास के हिस्से को घूरने में ज्यादा समय देती हैं.

प्रतिदिन 10 मिनट महिलाओं को देखना स्वास्थ्यवर्धक

एक ओर जहां भारत में महिलाओं को घूरने को अपराध की श्रेणी में रखा जाता है, वहीं न्यू इंगलैंड जर्नल औफ मैडिसिन के एक सर्वे के अनुसार प्रतिदिन महिलाओं को 10 मिनट तक देखना पुरुषों के लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा है. सुगठित महिला को मात्र 10 मिनट तक देखने से एक पुरुष उतनी उर्जा खर्च कर देता है जितनी 30 मिनट के ऐरोबिक्स व्यायाम में खर्च होती है. शोध में जिन लोगों ने प्रतिदिन 10 मिनट महिलाओं को देखा उन की टैस्टिंग पल्स रेट कम धीमी पाई गई. उन का रक्तचाप भी अन्य लोगों की तुलना में कम था. डाक्टरों के अनुसार, यौन उत्साह से हृदय के पंपिंग की गति तेज हो जाती है और ब्लड सर्कुलेशन में भी सुधार होता है. है न कमाल की बात. लेकिन भारत में सुंदर कन्या को घूरने का साहस न करें, क्योंकि यहां घूरना अपराध है.

Women’s Day 2023: रोज खाना बनाना, न बनाए कोई बहाना    

आज की जीवनशैली में महिलाएं चाहे घरेलू हो या कामकाजी सभी को चटपट खाना बनाने की इच्छा होती हैं. कोई भी महिला पूरा दिन किचन में गुजरना नहीं चाहती, ऐसे में खाना स्वादिष्ट होने के साथ-साथ आकर्षक भी हो, इसकी जरुरत होती है. ताकि परिवार के सभी सदस्य हंसी-ख़ुशी भोजन करें. हालांकि झटपट खाना बनाने के लिए आजकल बाज़ार में कई प्रकार के ‘रेडी टू ईट’ वाले पौकेट आसानी से मिल जाते हैं पर उसका स्वाद घर के खाने जैसा होने के साथ-साथ हाईजिनिक कितना होगा, इसकी भी चिंता बनी रहती है. इसलिए अपने हाथ से झटपट खाना बना लेना ही आज के सभी परिवारों की मांग है.

महिला दिवस के अवसर पर ख़ास आयोजन के बीच बारबेक्यू नेशन के शेफ अरुण शर्मा कहते हैं कि आज खाना केवल महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी बनाते हैं. इसलिए जल्दी और झटपट खाना बनाने की कला सबको आनी चाहिए. ये सही है कि घर पर बना खाना सबकी सेहत के लिए अच्छा होता है और महिलाएं भी इसे दिल से बनाती हैं इसलिए इसके स्वाद और गुणवत्ता की तुलना किसी से नहीं की जा सकती. ‘स्मार्ट कुकिंग’ के लिए कुछ बातें अवश्य ध्यान में रखने की जरुरत होती है.

  • जो खाना बनानी है, उसकी प्लानिंग पहले से करें,
  • चीजें व्यवस्थित रूप से किचन में रखें ताकि जरूरत के समय आपको वह आसानी से मिले.
  • सब्जियों या नौन वेज को साफ़ कर फ्रिज में पहले दिन रख लें.
  • अगर कुछ चीजों को पहले से रोस्ट या उबालकर रखनी पड़े तो ऐसा कर उसे बंद कंटेनर में रख दें.
  • मसाले जो देनी हैं उसकी पेस्ट पहले से तैयार कर लें.
  • जो भी चीज आपको तड़के में देनी हो उसे काटकर या छीलकर रख लें.
  • हर सामग्री को अलग-अलग कंटेनर में रखें ताकि एक दूसरे की महक न फैले.
  • किसी भी कलरफुल सब्जी जैसे गाजर, हरा बीन्स, गोभी, हरा मटर,टमाटर आदि के रंग को प्रिजर्व करने के लिए उसे गरम पानी में 10 से 12 सेकंड रखकर ब्लांच कर लें इससे वे थोड़े पक भी जाते हैं. आगर जरूरत हो तो टमाटर के छिलके भी उतार कर प्रयोग कर सकती है. इससे रंग के अलावा उसकी पौष्टिकता भी नष्ट नहीं होती.
  • हमेशा अच्छी क्वालिटी के मसालें ही बाज़ार से ख़रीदें.
  • खाना पकाने के लिए नौन स्टिक बर्तनों को जरुरत के अनुसार खरीद कर रख लें ताकि आपको खाना बनाने और साफ़ करने में परेशानी न हो.

इसके अलावा खाना बनाना एक कला है जिसे अलग-अलग ढंग से बनाया जा सकता है, इसके लिए आजकल मैगजीन और औनलाइन कई रेसिपी उपलब्ध है जिसकी मदद से आकर्षक भोजन बनाया जा सकता है.

पहली बार खाना बनाते समय कई बार वह डिश ‘मेस’ हो जाया करती है या उसका स्वाद मन मुताबिक नहीं बन पाता. ऐसे में घबराने की जरुरत नहीं होती. इस बारें में शेफ निहाल आप्टे का कहना है कि ये कोई समस्या नहीं, उसे ठीक भी किया जा सकता है. जैसे कि कई बार भोजन का हल्का जल जाना या नमक का अधिक पड़ जाना होता है, कुछ टिप्स ये है,

  • अगर खाना नीचे से थोड़ी जल जाय, तो उसे तुरंत उस बर्तन से निकाल कर दूसरे बर्तन में पकायें, नहीं तो जलने की महक पूरे खाने में फ़ैल जायेगा.
  • उसे कभी भी खुरचकर न निकालें,
  • नीबू का थोडा रस उसमें मिलाएं.
  • थोड़ी टमाटर का तड़का लगा दें.
  • नमक अधिक होने पर उसकी मात्रा को बढ़ा दें,
  • एक आलू काटकर डाल दें,
  • आटे की एक लोई बनाकर उसमें डालें.

खाना बनाना एक क्रिएटिविटी है, जिससे मानसिक तनाव दूर भागती है. इसलिए इसे बनाने में कभी भी आनाकानी न करें. डिशेज को अधिक से अधिक कलरफुल बनाये, ताकि बच्चे भी उसे खाने से मना न करें.

Anupama: अनुपमा-अनुज का रोमांस देख जलन से लाल होंगी माया, अब चलेगी ये नई चाल

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ ने टीआरपी लिस्ट के साथ-साथ दर्शकों के दिलों में भी बखूबी जगह बना ली है. शो में यूं तो माया का भांडा फूट चुका है, लेकिन माया अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही है। बीते दिन रुपाली गांगुली (Rupali Ganguly) और गौरव खन्ना के ‘अनुपमा (Anupama) में दिखाया गया कि अनुज और अनुपमा माया को वहां से जाने के लिए कहते हैं, लेकिन माया दोनों के सामने गिड़गिड़ाकर एक दिन की मोहलत मांगने लगती है. लेकिन गौरव खन्ना के ‘अनुपमा’ में आने वाले ट्विस्ट और टर्न्स यहीं पर खत्म नहीं होते हैं. शो में दिखाया जाएगा कि बर्थडे पर माया, अनुपमा की जिंदगी में भूचाल मचाएगी.

 

 

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माया को आखिरी चांस देगी अनुपमा

अनुपमा‘ में अनुपमा माया को एक दिन की मोहलत देने के लिए तैयार हो जाती है. वह माया से कहती है कि भरोसा तो तुमने तोड़ दिया है, लेकिन अब वादा मत तोड़ना. एक पत्नी का दिल पत्थर का हो सकता है, लेकिन एक मां का नहीं और तुम मेरी छोटी की जन्म देने वाली मां हो इसलिए तुम्हें एक दिन और देती हूं. लेकिन बता दें कि माया, अनुपमा को जन्मदिन पर झटका देने की तैयारी में है. माया मन ही मन सोचती है कि जन्मदिन पर तुम्हें ऐसा तोहफा दूंगी, जिसे तुम जिंदगी भर नहीं भूल पाओगी.

 

अनुपमा के जन्मदिन पर अनुज को पड़ेगा दिल का दौरा

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ में देखने को मिलेगा कि अनुज को अचानक से बेचैनी होने लगती है और वह अनुपमा से उसे बाहर ले जाने के लिए कहता है. लेकिन बाहर आते ही अनुज, अनुपमा को बर्थडे का सरप्राइज देता है. वहां दोनों क्वालिटी टाइम बिताते हैं. इतना ही नहीं, अनुज अनुपमा को तोहफे में आसमान का एक तारा देता है और उसका नाम अनुपमा रखवा देता है.

मेरी उम्र 30 साल है और मेरे बाल बहुत गिरते हैं. गिरते बालों को दोबारा से कैसे पा सकती हूं?

सवाल 

मेरी उम्र 30 साल है और मेरे बाल बहुत गिरते हैं. गिरते बालों को दोबारा से कैसे पा सकती हूं?

जवाब 

30 के बाद हेयर लौस के कई फैक्टर हैंजिस में मेन फैक्टर आप की डाइट से जुड़ा है. आप डाइट में किन चीजों को शामिल करती हैं इस पर सब से ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. बालों के लिए सब से ज्यादा जरूरी होता है प्रोटीन. अगर आप के शरीर में प्रोटीन की कमी होती है तो इस का असर बालों पर भी देखने को मिलता है. इसलिए अपनी डाइट में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने के लिए डेयरी प्रोडक्ट्स और दालों को शामिल करें. हैल्थी हेयर्स के लिए बादामफूलगोभीमशरूमअंडे से मिलने वाला बायोटिन एक जरूरी विटामिन है. बालों का ?ाड़ने से रोकने के लिए इस विटामिन को डाइट में शामिल करना आप के लिए फायदेमंद हो सकता है. इन चीजों को अपनी डाइट में शामिल कर आप इस विटामिन की कमी को पूरा कर सकती हैं. भुने हुए चनोंमटरराजमाछोले और काजू को डेली डाइट में शामिल कर के आप बालों के लिए भी काफी फायदेमंद आयरन पा सकती हैं.

इसी आयरन की कमी से बालों के ?ाड़ने और बेजान होने की समस्या बढ़ सकती है. विटामिन ए और सी ऐसे विटामिन हैं जो हेयर्स की ग्रोथ और शाइनिंग के लिए बेहद असरदार होते हैंइसलिए आप को विटामिन ए के लिए गाजरशकरकंदकद्दूपालकदूध या दही को डाइट में शामिल करने की जरूरत है. वहीं विटामिन सी के लिए आंवलानीबूअमरूद या स्ट्राबेरी को शामिल करें.

बालों के ?ाड़ने के दूसरे फैक्टर्स में टैंशन भी एक फैक्टर है जिस से आप के बाल टूटने लगते हैंइसलिए टैंशन कम करने के लिए नियमित मैडिटेशन करें. इस उम्र में आप स्टाइलिश हेयरस्टाइल करने के लिए कई प्रयोग करती हैं जो आप के हेयर्स को कमजोर बना सकता है. इसलिए हेयर्स पर ज्यादा ऐक्सपैरिमैंट करने से बचें. यदि आप कुछ अलग कर भी रही हैं तो उस में ऐक्सपर्ट की सलाह जरूर लें.

Holi 2023: रंगों की बात रंगों की जुबानी

होली रंगो का त्योहार है ,रंग-गुलाल हमारे जीवन में महत्वर्पूण भूमिका अदा करती है. आदि काल से मानव सभ्यता मे रंगो का महत्वर्पूण भूमिका रहा है. रंगो के इतिहास , कृत्रिम रंगो की जानकारी ,प्राकृतिक रंगो और मिलावटी रंगो के बारे में जानकारी देता , यह आलेख.

( राधा-कृष्णा की गुलाल से यादगार बनने वाली होली समय के साथ अपने बदलते स्वरूपो के साथ मानव-सभ्यता पर अपना असर डालते हुए होली के रंग, आज के समय मे पूरी तरह बदल गया है. जिन रंगो को कपडे, जूट,मशीन या प्लास्टिक रंगने के लिए बनाया गया था , आज उन्ही रंगो से हम अपने अंग रंगते है.)

रंगो का इतिहास

रंगो का इतिहास काफी पुराना है. मानवविकास के पहले चरण से रंगो का खुल कर प्रयोग करता आ रहा है.कई मानव सभ्यता इस बात की गवाही देती नजर आती हैं. रामायण काल मे ंरंगो का उपयोग बखूबी होता था ,तभी तो महारानी कैकयी अपने कक्ष को रंगो से सजवाया करती थी , महाभारत काल मे भी पंडावो का इन्द्रप्रथरंगो के उपस्थिति को बताता है. भारत के कई मध्यकालीन शासक रंगो का जमकर उपयोग करते थे , तभी तो चित्रकला उन शासको के पसंदिदा र्काय में से एक होता था. हडप्पा-मोहनजोदडो की सभ्यता अपने आप मे मानव की सबसे बडी सभ्यता मानी जाती है , इस सभ्यता काल में भी रंगो का उपयोग मानव द्वारा किया जाता था , जैसे कि खोदई से प्राप्त अवशेष बता रहे है .

यह कहना गलत नही होगा कि रंग भारतीय परंपरायो मे आदि काल से ही रचा बसा है.अगर आप सोच रहे है कि रंगो का उपयोग कब से हो रहा है , तो इस सवाल का जवाब देना थोडा मुश्किल जरूर है ,क्योकि प्रमाणिक रूप से रंगो के पहले प्रयोग का कोई जिक्र नही है. हां बस इतना कहा जाता है कि पांच हजार र्वष पूर्व रंग मानव जीवन के अहम अंग बन चुके है. तभी तो वेद , पुराण एवम् उपनिष्दो मे हर जगह रंगो का जिक्र है. आदि काल से आधुनिक काल तक रंगो का उपयोग नित्य हमारे जीवन मे नया जगह बनाने लगा , तभी तो चित्रकारी , छायाकारी, सौदर्य और सजावट को इतना बढावा मिला. पहले भी रंग हमारे जीवन के अहम अंगो मे एक हुआ करते थे और आज भी है. यही वजह है कि इस आधुनिक काल मे भी हमलोग शुभ-अशुभ कार्यो के लिए अलग-अलग रंगो का उपयोग करते है.कृत्रिम रंगदुनिया का पहला कृत्रिम रंग तब बना ,जब प्रोफेसर विलियन पार्किन एनीलीन से मलेरिया की दवा कुनैन बनाने का प्रयास कर रहे थे, परन्तु कुनैन तो नही बना लेकिन पर्पल यानी जामुनी रंग की उत्पति हुई.राँयल कालेज आँफ केमिस्टी में 1856 में र्निमित यह रंग दुनिया का पहला कृत्रिम रंग था. इस के बाद प्रयोगशाला में कृत्रिम रंगबनाने के कार्य मे वैज्ञानिको को कई सफलता मिलते रही और बनता रहा कृत्रिम रंग. कुछ ही बर्षो मे कई प्रकार के कृत्रिम रंग बन कर तैयार हो गए.

प्राकृतिक रंग

प्राचीन काल में ऋषि मुनि के आश्रम में प्राकृतिक रंगो को र्धामिक कार्यो के तैयार किया जाता था, कुदरत के खजाने से चुने हुए पत्तो एवम् फूलो से रंग बनाया जाता था.आज भी प्राकृतिक रंगो का हर जगह उपयोग होता है, क्योकि इसको उपयोग करने वाले जानते है कि यह रंग हमारे लिए नुकसानदायक नही बल्कि फायदेमंद है. गावो के बजार में आज भी इसप्रकार के रंग आराम से मिल जाता है. इन रंगोको आप खुद बना सकते है , तो जानते है कि घर पर रंग कैसे बनाए –

लाल सूखा रंग-

लाल चंदन की लकडी के पाउडर में सूखे लाल गुलाब के फूल को पीश कर सूखा ले, सूखने के बाद आपका लाल सूखा रंग तैयार हो चुका होगा.लाल गीला रंग-चार चम्मच लाल चंदन को 4 लीटर पानी मे डाल कर उबाले और फिर ठंढा करने के लिए 20 लीटर मेडाल कर कुछ पल के लिए छोड दे , उसके बाद जो रंग तैयार होगा वही लाल गीला रंग है.

हरा सूखा रंग-

हरे सूखा रंग के रूप मे हिना पाउडर का उपयोग किया जा सकता है या गुलमोहर के पतो को सूखा कर बारीक पीश कर हरा रंग तैयार किया जा सकता है. हरा गीला रंग – एक लीटर पानी मे दो चम्मच हिना पाउडर अच्छी तरह मिलाकर गीला हरा रंग तैयार किया जाता है.

पलाश का रंग-

100 ग्राम पलाश के सूखे फूलको एक बाल्टी पानी में उबाल कर ठण्ढा कर के बाल्टी भर रंग तैयार किया जा सकता है.पलाश का रंग काफी फायदेमंद होता है.

Women’s Day 2023: नारी- हर दोष की मारी

आज भी स्त्रियों के लिए सामाजिक एवं धार्मिक मान्यताएं जैसे उन्हें निगलने के लिए मुंह बाए खड़ी हैं. कई योजनाएं बनती हैं, लेख लिखे जाते हैं, कहानियां गढ़ी जाती हैं, प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं और सब से खास प्रतिवर्ष महिला दिवस भी मनाया जाता है. किंतु हकीकत यह है कि घर की चारदीवारी में महिलाएं बचपन से ले कर बुढ़ापे तक समाज एवं धर्म की मान्यताओं में बंधी कसमसा कर रह जाती हैं.

कुंआरी लड़की एवं विधवा दोष

कुछ महीने पहले की ही बात है  झुन झुनवाला की 25 वर्षीय बिटिया के विवाह की बात चल रही थी, लड़कालड़की दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर लिया था. लेकिन फिर बात आगे न बढ़ सकी, जब  झुन झुनवाला से पूछा गया कि मिठाई कब खिला रही हैं तो कहने लगीं, ‘‘क्या करें हम तो तैयार बैठे हैं मिठाई खिलाने के लिए पर बिटिया की कुंडली में ही दोष है, कोई रिश्ता बैठता ही नहीं.’’

कैसे दोष? पूछने पर कहने लगीं कि लड़के वालों ने पंडितजी को दिखाई थी बिटिया की कुंडली, कहने लगे कुंडली में ग्रहों की स्थिति बताती है कि बिटिया का विधवा योग है. विवाह के कुछ बरसों पश्चात ही वह विधवा हो जाएगी. तो भला कौन अपने लड़के को हमारी बिटिया से ब्याहेगा? उन के माथे पर चिंता की लकीरें गहरा गई थी.

अनब्याही में मांगलिक दोष

पुणे में रहने वाली स्मिता कहती हैं कि उन का विवाह बड़ी उम्र में हुआ, क्योंकि कुंडली में मांगलिक दोष था. कहा जाता है कि मांगलिक दोष वाली युवती के ग्रह मांगलिक दोष वाले पुरुष से मिलने चाहिए तभी विवाह का सफल होना संभव है अन्यथा या तो दोनों में से एक की मृत्यु हो जाती है या फिर तलाक. कुल मिला कर किसी भी कारण से विवाह असफल ही रहता है. ऐसे में अकसर मांगलिक युवतियां बड़ी उम्र तक कुंआरी रह जाती हैं या फिर इस मंगल दोष को हटाने के लिए पूजा एवं समाधान बताए जाते हैं, उन कार्यों को संपन्न करने पर ही ऐसी युवतियों का विवाह होता है. बढ़ती उम्र तक यदि विवाह न हो तो समाज ताने देने से नहीं चूकता.

तलाकशुदा स्त्री

हैदराबाद में रहने वाली संजना का अपने पति से विवाह के करीब 5 वर्ष बाद 30 की उम्र में ही तलाक हो गया था. उस  समय उन का बेटा था जिसे संजना ने अपने पास ही रखा. तलाक के कुछ वर्षों बाद उन के पति ने तो पुनर्विवाह कर लिया, किंतु संजना अब 50 वर्ष की हैं और एकाकी जीवन जी रही हैं. वैसे तो वे स्वयं आईटी इंडस्ट्री में कार्यरत हैं सो आर्थिक स्थिति अच्छी ही है फिर भी जब उन से पुनर्विवाह के बारे में पूछा गया तो कहने लगीं, ‘‘अब इस उम्र में कौन करेगा मु झ से विवाह और जब जवान थी तब एक बच्चे की मां से कौन करता विवाह? कोई दूसरे के बच्चे की जिम्मेदारी लेता है भला?’’

इस तरह के न जाने कितने मामले देखने को मिल जाएंगे जिन में लड़की में दोष बता कर उसे एकाकी, पाश्चिक या निम्न स्तर की जिंदगी जीने पर मजबूर कर दिया जाता है.

विधवा स्त्री

इसी तरह एक मामला देखने को मिला जिस में एक पढ़ीलिखी, सुंदर, स्मार्ट महिला के पति की कम उम्र में मृत्यु हो गई. क्योंकि पति सरकारी नौकरी में थे, महिला को उन की मृत्यु के पश्चात अच्छी रकम मिली. महिला का एक नवजात बेटा भी था.

किसी कारणवश महिला को ससुराल वालों का सपोर्ट नहीं मिली तो वह मायके में रहने लगी. मायके में भाईभाभी की नजर में वह खटकती. यह देख कर उस के मातापिता ने पढ़ालिखा अच्छा कमाने वाला तलाकशुदा पुरुष देख कर उस का पुनर्विवाह कर दिया. कुछ समय तो ठीकठाक चला, किंतु फिर अकसर महिला के बच्चे को ले कर पतिपत्नी में अनबन रहने लगी. सास की नजर महिला के पहले पति की मृत्यु उपरांत प्राप्त धनराशि पर रहती. अब जब घर में कुछ  झगड़ा होता, बारबार महिला को ताना दिया जाता कि एक तो विधवा वह भी एक बच्चे की मां से विवाह किया. रोजरोज के  झगड़ों एवं तानों से परेशान हो इस महिला ने स्वयं ही अपने दूसरे पति से तलाक ले लिया.

अब यहां सोचने वाली बात यह है कि वह विधवा हुई उस में उस का क्या दोष? बच्चा भी नाजायज नहीं? उस के पति से संबंध के फलस्वरूप हुआ जबकि दूसरा पति तो तलाकशुदा था, हो सकता है उसी का या उस के परिवार का व्यवहार बुरा रहा हो जिस के चलते उस की पहली पत्नी से उस का तलाक हुआ हो. लेकिन बारबार महिला को विधवा होने का दोष देना कहां तक उचित है?

इस मामले में तो पढ़ीलिखी स्मार्ट महिला थी सो पुनर्विवाह हुआ और न जमने पर उस ने तलाक ले लिया. यदि यहां गांव की, मजबूर, कम पढ़ीलिखी, आर्थिक रूप से कमजोर स्त्री होती तो उस की दुर्दशा होनी तय थी.

सशक्त वीरांगना

इसी तरह का एक और महिला का उदाहरण है जिस में महिला का पति फौज में था और शहीद हो गया. नवविवाहित महिला पढ़ीलिखी है, उस का एक बच्चा भी है. उसे अपने पति के बदले में नौकरी मिल गई सो वह आर्थिक रूप से सशक्त रही. एक बच्चा था जिसे उस ने बड़ी ही लगन और मेहनत से पालपोस कर बड़ा किया.

किंतु समस्या तब आती जब सबकुछ होते हुए भी वह एकाकी जीवन जीती. मन कहीं रमणीय स्थल पर घूमने जाना चाहता है, क्योंकि कम उम्र में पति शहीद हुए, सुखद वैवाहिक जीवन के सपने तो उस ने भी देखे थे, वह भी अच्छे वस्त्र पहन कर अपने पति की बांहों में बांहें डाले किसी फिल्मी अभिनेत्री की तरह घूमनाफिरना चाहती थी, तसवीरें खिंचवाना चाहती थी.

सोशल मीडिया का जमाना है. अपनी तसवीरें वह भी दूसरों के साथ शेयर करना चाहती थी. किंतु पति के न रहने पर वह किस के साथ घूमेफिरे? कैसे खुशियां बटोरे? यदि उम्र ज्यादा होती तो शायद वह इस जीवन को जी चुकी होती, उस के शौक पूरे हुए होते, किंतु बच्चा छोटा होने से वह अकेली तो पड़ ही गई. सो मन मान कर जीने पर मजबूर हो गई. क्योंकि ऐसे में न तो कोई रिश्तेदार और न ही कोई मित्र अपने परिवार में किसी अन्य का दखल पसंद करता है और न ही कोई उस की जिम्मेदारी लेना चाहता है.

परित्यक्त स्त्री

ऐसा ही एक उदाहरण है परित्यक्त स्त्री का जिसे उस के पति ने  झगड़ा कर घर से निकाल दिया. उस की 5 वर्षीय बेटी भी मजबूरन उस के साथ अपने ननिहाल में आ गई. वह महिला अपने मायके में आ कर नौकरी करने लगी. मातापिता ने सोचा आखिर कब तक वह उसे सहारा देंगे? उन की भी तो उम्र बढ़ती जा रही है. सो उन्होंने उस की बेटी को ददिहाल भेज दिया, सोचा कि बेटी के लिए मां की आवश्यकता पड़ेगी तो ससुराल वाले उसे बुला लेंगे. किंतु ऐसा नहीं हुआ, बल्कि उस महिला के मातापिता ने उस का तलाक करवाया और एक ऐसे पुरुष से विवाह कर दिया जिस की पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी और उस के 2 बच्चे व मरणासन्न बूढ़ी मां थी.

यह विवाह तो हो गया, किंतु क्या वह महिला इस विवाह में अपनी बेटी को अपने साथ नहीं रख सकती? जब वह अपने दूसरे पति के बच्चे पालती होगी तो क्या उसे अपनी बेटी याद नहीं आती होगी? क्या उस 5 वर्षीय बच्ची के साथ अन्याय नहीं हुआ?

जबकि महिला के दोनों पति तो अपनी जिंदगी आराम से जीते रहे. इस केस में मु झे महसूस होता है दूसरे विवाह के समय उस महिला को पत्नी का नहीं अपितु परिचारिका का दर्जा दिया गया था वरना उस की बेटी को भी सहर्ष स्वीकार करना चाहिए था. इस से मांबेटी बिछड़ती नहीं.

कुंडली में दोष एवं उपाय

कई बार तो ऐसा भी देखने को मिलता है कि लड़की की कुंडली में दोष बताया जाता है फिर किसी न किसी पूजा, यज्ञ, हवन के माध्यम से उसे दोषमुक्त किया जाता है. तब कहीं जा कर उस के विवाह की बात आगे बढ़ती है.

इसी तरह विधवा महिलाओं के लिए कई मान्यताएं एवं धारणाएं तय कर दी गई हैं जो उन के जीवन को अति निम्न स्तर का, नारकीय एवं पाश्चिक बना देती हैं. किसी भी स्त्री का विधवा होना किसी अभिशाप से कम नहीं है.

वैदिक ज्योतिष कुंडली के अनुसार विवाह, वैवाहिक जीवन एवं विवाह की स्थिति के लिए सप्तम भाव का अध्ययन किया जाता है. इस के अनुसार किसी स्त्रीपुरुष के विवाह के बाद वैवाहिक जीवन में आने वाली स्थितियों का अध्ययन किया जा सकता है. इन भावों के स्वामियों से संबंध बनाना वैवाहिक जीवन के सुखों में कमी करता है.

सप्तम भाव के अध्ययन के अनुसार इस भाव में मंगल एवं पाप ग्रहों की स्थिति कन्या की कुंडली में होने पर विधवा योग बनते हैं.

विभिन्न भावों, कुंडली में चंद्रमा के स्थान व राहू की दशा के अनुसार कन्या का निश्चित रूप से विधवा होना तय है.

कुछ कुंडली दोष कहते हैं कि स्त्री विवाह के उपरांत 7-8 वर्ष के अंदर विधवा हो जाती है. लग्न एवं सप्तम दोनों में पाप ग्रह हो तो स्त्री के विवाह के 7वें वर्ष में पति का देहांत हो जाता है.

इस तरह के अनेक योग व दशा ज्योतिषियों द्वारा समयसमय पर लिखी व कही गई हैं और अब तो यह जानकारी इंटरनैट पर भी उपलब्ध है.

सिर्फ इतना ही नहीं इस तरह की जानकारी के साथ विभिन्न शहरों में रहने वाली महिलाओं के नाम के साथ उन के कुंडली दोष व विधवा होने की स्थिति का जिक्र भी किया गया है ताकि लोग उसे सत्य मान कर स्वीकार करें और कुंडली में भरोसा करें.

इन सब के अलावा इंटरनैट पर मेनका गांधी एवं सोनिया गांधी की कुंडली का जिक्र किया गया है और यह भी बताया गया है कि उन की कुंडलियों के अध्ययन से पता चलता है कि कितनी कम उम्र में उन्हें वैधव्य प्राप्त होगा और वह हुआ भी. साथ ही यह भी लिखा गया है कि यदि शनिमंगल का उपाय कर लिया जाए तो वैधव्य योग टल सकता है.

विधवा स्त्री के लिए विधवा व्रत

शास्त्रों में जिस तरह स्त्री के लिए पविव्रत धर्म है उसी प्रकार विधवा स्त्री के लिए विधवा व्रत का विधान है जिस में विधवा को किस

तरह का जीवन जीना चाहिए इस के लिए मानक तय हैं:

– विधवा स्त्री को पुरुषों के साथ अथवा अपने मायके में ही रहना चाहिए.

– विधवा स्त्री को शृंगार, अलंकरण यहां तक कि सिर धोना भी छोड़ देना चाहिए.

– विधवा स्त्री को सिर्फ एक ही समय भोजन करना चाहिए और एकादशी के दिन अन्न का पूर्ण त्याग करना चाहिए.

– विधवा स्त्री को खट्टामीठा नहीं खाना चाहिए, सिर्फ साधारण खाना खाना चाहिए.

– सार्वजनिक कार्यों, शुभकार्यों, विवाह, गृहप्रवेश आदि में नहीं जाना चाहिए.

– विधवा स्त्री को भगवान शिव की उपासना करनी चाहिए और अपनी संतानकी देखरेख करनी चाहिए और उस के लिए व्रत करने चाहिए.

– विधवा से विवाह करने वाला नर्क में जाता है.

– इस के अलावा यदि कोई स्त्री विधवा नहीं है, किंतु उस का पति परदेस में रहता है तो उसे भी विधवा व्रत का विधान मानना चाहिए.

वीडियो भी उपलब्ध

कुंडली, ज्योतिष, विधवा व्रत आदि पर न सिर्फ लेख उपलब्ध हैं, अपितु ऐसे वीडियो भी मिल जाएंगे जिन में बताया गया है कि विधवा स्त्री को पुनर्विवाह करना चाहिए या नहीं?

विधवा स्त्री के हाथ से कोई शुभ कार्य नहीं करवाया जाता? विधवा स्त्री को सफेद साड़ी क्यों पहनाई जाती है? घर के दोष से भी औरत हो सकती है विधवा.

स्त्री को आशीर्वाद दिया जाता है ‘अखंड सौभाग्यवती भव’’ यानी जब तक वह जीवित रहे उस का सुहाग अखंड रहे. सोचने की बात यह है कि यह आशीर्वाद पुरुष को नहीं दिया जाता, क्योंकि पुरुष तो स्त्री के न रहने पर पुनर्विवाह का हकदार है. यदि उस के 2-3 बच्चे भी हों तो भी कोई न कोई स्त्री उस से विवाह कर ही लेगी. किंतु यदि कोई स्त्री विधवा हो गई तो हमारे समाज और धर्म की मान्यताएं तो जैसे उस के मनुष्य जीवन पर ऐसा कुठाराघात करेंगी कि उस का जीना जैसे नर्क हो.

सोचने की बात यह है कि यदि पुरुष की मृत्यु हो तो उस का दोष स्त्री की कुंडली को. पति की मृत्यु की सजा उस की पत्नी को. क्या यह हमारे समाज के नियमों का दोष नहीं? क्या इस दोष का कोई उपाय नहीं होना चाहिए?

आज जहां हम एक तरफ विज्ञान में नई खोज, आविष्कार, तरक्की की बात करते हैं वहीं दूसरी ओर विधवा, परित्यक्त, अविवाहित स्त्री के जीवन में सुधार की बातें क्यों दबी रह जाती हैं? क्यों ऐसी स्त्रियां घुटनभरा जीवन जीने पर मजबूर होती हैं? सिर्फ मंचों पर कार्यक्रम से कुछ नहीं होने वाला है. आवश्यकता है खुले मन से उन्हें स्वीकारने की. वे जैसी भी हैं, जिस स्थिति में हैं, इंसान वे भी हैं.

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