पछतावा-भाग 3: क्यूं परेशान थी सुधा

उधर से समीर ने क्या कहा, यह तो तन्वी सुन नहीं पाई. इस पर सुधा ने कहा. “आज घर पर आने के बाद पूछना उस से कि कौन था वह? जरा जोरदार आवाज में चिल्ला कर झगड़ा करना, अक्ल ठिकाने आ जाएगी उस की. चार लोग सुनेंगे तो उस का मजाक भी बनेगा. अच्छा, मैं फ़ोन रखती हूं. टाइम मिलने पर कौल करूंगी. बाय जानू.” और सुधा ने फ़ोन रख दिया. और तन्वी की तरफ देख कर बोली, “अब मजा आएगा. समीर घर जा कर काव्या से झगड़ा करेगा, गलियां देगा. और आसपास के लोग सुनेंगे. बड़ा मजा आएगा. सारी होशियारी धरी रह जाएगी उस की. बहुत सजसंवर कर घूमती है, अब पता चलेगा उस को.”

तन्वी ने सुधा से कहा, “दीदी, आप ने समीर से झूठ क्यों कहा, हम तो मार्केट गए ही नहीं. हम तो घर पर ही थे. आप ने ऐसा क्यों कहा?”

“तू नहीं समझेगी,” सुधा ने कहा, “उन दोनों के बीच झगड़े होते रहना चाहिए. तभी तो समीर मेरी मुट्ठी में रहेगा. झगडे होने से उन के बीच दूरियां बढ़ेंगी. जितना वे एकदूसरे से दूर होंगे, समीर उतना मेरे करीब होगा. उस की वाइफ, एक तो वह पढ़ीलिखी है, सुंदर भी है और मैं दिखने में साधारण हूं. इसलिए समीर को काव्या के खिलाफ भड़काती रहती हूं ताकि उन के बीच मनमुटाव चलता रहे. इस का मैं फायदा उठाती हूं. जो कहती हूं, समीर मानता है.”

“इस का मतलब, तुम काव्या से जलती हो. किसी की गृहस्थी क्यों बरबाद कर रही हो? समीर तो वैसे भी तुम्हारे जाल में फंसा हुआ है, जो थोड़ाबहुत रिश्ता उन दोनों के बीच बचा हुआ है, उसे भी क्यों ख़त्म कर देना चाहती हो? सच तो यह है, दीदी, तुम काव्य से जलती हो. तुम उस की बराबरी करने की कोशिश करती हो. इसलिए जैसे वह कपडे पहनती है, जिस रंग के पहनती है, उसी रंग और डिजाइन के कपड़े खरीदती हो, चाहे वो तुम पर फबे या न. चूंकि काव्या ने पहने है, इसलिए तुम्हें भी पहनना होता है. हर चीज में तुम उस की बराबरी करने की कोशिश करती हो यह दिखाने के लिए कि तुम उस से कम नहीं हो. लेकिन इस से सचाई बदल नहीं जाएगी और न ही तुम उस के जैसी बन पाओगी क्योंकि कुछ गुण व्यक्ति के जन्मजात होते है,” तन्वी ने कहा.

सुधा को तन्वी की बातें सुन कर गुस्सा आ गया. वह चिढ़ती हुई बोली, “तू मेरी बहन है कि उस की. तरफदारी तो ऐसे कर रही है जैसे उसे बरसों से जानती हो.”

“इस पर तन्वी बोली, “मैं तो सिर्फ सचाई बता रही हूं आप को. इस में बुरा मानने की क्या बात है. दीदी, एक बात मैं आप से और कहना चाहती थी. अपने बच्चों को लड़ाईझगड़ा करने के लिए बढ़ावा देना अच्छी बात नहीं है. अभी स्कूल में हैं, कालेज में जाएंगे. यह सब चलता रहा तो पिंटू गुंडागर्दी करने लगेगा. रोज इसी तरह शिकायतें आएंगी. उस वक्त क्या करोगी जब किसी दिन उस को जेल जाना पड़ जाएगा. बेहतरी इसी में है कि उसे अभी रोका जाए.”

“इतना सुनते ही सुधा गुस्से से बोली, “यह मेरे घर का मामला है, तू इस में अपनी टांग मत अड़ा. मैंतेरे से बड़ी हूं और मुझे अच्छे से पता है कि मुझे क्या करना है. तुझे सलाह देने की जरूरत नहीं है.”

तन्वी ने भी गुस्से से कहा, “दीदी, आप अभी समझ नहीं रही हो कि आप क्या कर रही हो. बच्चों को गलत शिक्षा दे रही हो. निशा को पराए आदमी को कैसे चिकनीचुपड़ी बातें कर के अपने जाल में फंसाना सिखा रही हो. सुबह से ले कर आधी रात तक सामने वाले फ्लैट की गतिविधियों पर नजर रखती हो. कुछ चलपहल दिखाई न दे तो तुरंत निशा और पिंटू को देखने भेजती हो. घर पर कोई है या ताला लगा है? उस दिन तुम ने यही देखने के लिए पिंटू को भेजा था. और आ कर उस ने इशारे से वही कहा था. मुझे बेवकूफ मत समझना, दीदी.”

“मैं तुम्हें बहुत अच्छे से जानती हूं और तुम्हारे हथकंडे भी पहचानती हूं,” तन्वी ने अपनी बात जारी रखते हुए आगे कहा, “छोटीमोटी ताकझांक करना, बातों को मिर्चमसाला लगा कर बताना तो औरतों की आदत होती है. तुम जो कर कर रही हो, वह एक अपराध है. और उस में तुम ने अपने बच्चों को भी शामिल कर रखा है. यह किसी की सुरक्षा का भी सवाल है. आखिर, तुम्हें उस फ्लैट में इतनी दिलचस्पी क्यों है? क्या जानना चाहती हो? या किसी और व्यक्ति ने तुम से निगरानी रखने के लिए कहा है जिस को तुम सब इन्फौर्मेशन देती हो. अगर किसी को पता चल गया कि तुम चौबीस घंटे निगरानी कर रही हो, तो तुम किसी मुसीबत में फंस सकती हो. तुम्हारे खिलाफ थाने में रिपोर्ट लिखाई जा सकती है. यह काफी गंभीर मामला है जिसे तुम मजाक समझ रही हो. दिनभर पता नहीं क्याक्या प्लानिंग, प्लौटिंग करती हो. एक षड्यंत्रकारी दिमाग है तुम्हारा.

“इतना ही नहीं, तुम्हारे बौयफ्रैंड यानी तुम्हारे प्रेमियों के बारे में भी तुम्हारे बच्चों को सब पता है. निशा 16 साल की है और तुम्हारा पाठक अंकल के साथ, समीर के साथ दसबारह साल से चक्कर चल रहा है. इस का मतलब निशा 6 या 7 साल की होगी और पिंटू 5 साल का. 5 और 6 साल के बच्चे कितने अबोध होते है. मातापिता की उंगली पकड़ कर चलते हैं. इतनी छोटी उम्र के बच्चों को पता है कि उन की मां के 2 बौयफ्रैंड हैं. शर्म नहीं आती, दीदी तुम को ये सब करते हुए.

“तुम्हारे स्कूल के बौयफ्रैंड अलग थे. 8वीं, 9वीं क्लास से तुम्हारे अफेयर शुरू हो गए थे. कालेज में अलग बौयफ्रैंड बनाए. इसी कारण तुम 2 बार फेल भी हुईं. पापा ने जैसेतैसे तुम को ग्रेजुएशन करवाया, ताकि शादी के लिए आए रिश्तों को बता सकें कि तुम ग्रेजुएट हो. शादी के समय मम्मीपापा ने कितना समझाया था कि नया जीवन शुरू करने जा रही हो, अब किसी पराए आदमी से अफेयर मत करना. शादी के पहले किए गए अफेयर को नादानी या भूल समझ कर माफ़ किया जा सकता है लेकिन शादी के बाद के अफेयर भूल नहीं कहलाते. और तुम ने तो अपने ऐशोआराम के लिए अफेयर किए हैं. और महंगे गिफ्ट के लिए तुम इतना नीचे गिर गईं कि समीर और पाठक अंकल के साथ तुम्हारे शारीरिक संबंध भी हैं. और तुम्हारे बच्चे सब जानते हैं. कितनी शर्म की बात है. मम्मीपापा को पता चलेगा तो उन पर क्या बीतेगी, कभी सोचा है तुम ने?

“तुम जब हमारे यहां आती थीं, तुम्हारे बच्चे कितना शोऔफ करते थे. आयुष और पूर्वी ने मुझ से कहा भी था कि   मम्मी, पिंटू और निशा दीदी बहुत शोऔफ करते हैं. कुछ भी सामान छूने नहीं देते. और कहते हैं, ‘हाथ मत लगाओ. बहुत महंगा है, फालतू की बातें करते हैं.’ भैयाभाभी ने भी शिकायत की थी कि   सुधा ने अपने बच्चों को तमीज नहीं सिखाई है. बड़ों से कैसे बात की जाती है, इस का उन को जरा भी तरीका नहीं है. अपने से बड़े लोगों का मजाक बनाते हैं वे. यह सब सही नहीं है. और तुम खुद भी तो शान बघारती रहती थीं. उन सब के पीछे का राज अब पता चला है. तुम्हारे महंगे कपड़े, जूते जीजाजी ने नहीं, तुम्हारे प्रेमी ने दिए हैं. दूसरों के दिए हुए सामान पर तुम और तुम्हारे बच्चे इतराते फिरते हैं.”

सुधा तन्वी की कड़वी बातें सुन कर एकाएक गुस्से में आ गई और चिल्ला कर बोली, “तू मुझ से जलती है, मेरे बच्चों से जलती है. इसीलिए अपने मन की भड़ास निकाल रही है. तुम नहीं ले सकतीं महंगा सामान, इसीलिए यह सब बोल रही हो. तेरे पति की इतनी इनकम नहीं है न.”   तन्वी ने कहा, “चिल्लाओ मत, दीदी. चिल्लाने से सचाई बदल नहीं जाएगी. तुम इन सामान के लिए किस हद तक गिरी हो, मुझे मालूम है. रही मेरी बात, तो मैं ने अपनी चादर से बाहर कभी पैर नहीं निकाले. जैसे मेरे पति ने मुझे रखा, मैं रही. जो खिलाया वह खाया. जो पहनाया वह पहना. तुम्हारे जैसे कीमती चीजों के लिए न तो कभी कोई अफेयर किया और न किसी से शारीरिक संबंध रखे.

“हर औरत को अपने पति की सैलरी के हिसाब से ही खर्च करना चाहिए. मैं उन लड़कियों जैसी नहीं हूं जो मायके से मांगमांग कर अपना घर भर लेती हैं. और न ही तुम्हारी तरह इतना नीचे गिर सकती हूं. मेरे साथ अपनी तुलना कभी मत करना क्योंकि मैं, मैं हूं और तुम, तुम जो पैसों के लिए कुछ भी कर सकती हो. तुम जैसी औरतों के कारण पुरुषों को लगता है कि औरतें पैसों की लालची होती हैं. और इसीलिए वे पैसों का दिखावा करते हैं. लेकिन यह सच नहीं है. हर औरत तुम्हारी तरह लालची और स्वार्थी नहीं होती है. पहले अपने गिरेबान में झांको कि तुम क्या हो, फिर मुझ पर इलजाम लगाना.”

“तन्वी, तुम अब अपनी हदें पार कर रही हो,” सुधा बौखलाती हुई बोली.

“हदें तो तुम ने पार की हैं, दीदी. मैं तो सिर्फ सचाई बता रही हूं,” तन्वी ने कहा, “इतना बुरा लग रहा है तो ऐसे काम करती क्यों हो. सुबह से ले कर रात तक मोबाइल से चिपकी रहती हो. न घर पर ध्यान है और न बच्चों पर. बस, पास हो जाते है वो. कम मार्क्स होने के कारण किसी भी अच्छे कालेज में उन को एडमिशन नहीं मिलेगा. एक तो हम ओपन कैटेगिरी में आते है. तुम्हारे बच्चे गूंगेबहरे भी नहीं हैं. उन के हाथपैर भी सहीसलामत हैं. इसलिए विकलांग कोटे में भी एडमिशन नहीं मिलेगा. डोनेशन के आधार पर यदि किसी कालेज में एडमिशन मिल भी गया तो करीब 5 से 6 लाख डोनेशन देना पड़ेगा. फिर एकडेढ़ लाख रुपए उस की फीस रहेगी. तो करीब सातआठ लाख रुपए में सिर्फ एडमिशन होगा. डाक्टर या इंजीनियरिंग का 4 या 5 साल का खर्चा 15 से 20 लाख रुपए होगा. तुम्हारे बच्चे पढ़ाई में एवरेज हैं. वे फेल भी हो सकते है. फिर तुम्हारा पैसा बरबाद हो जाएगा. तुम्हारे बौयफ्रैंड समीर और पाठक अंकल इतने बड़े बेवकूफ तो नहीं होंगे कि तुम्हारे बच्चों पर लाखों खर्च करें. तुम तो उन से ही मांगोगी यह दुहाई देते हुए कि   आप ने एडमिशन करवाया है, तो अब आप को ही देने पड़ेंगे. मेरे पास तो नहीं हैं इतने पैसे. तुम को मुफ्त में खाने की जो आदत है.”

सुधा गुस्से में आगबबूला हो गई. उस ने अपनी कमर पर हाथ रखा और तन्वी पर चिल्लाते हुए बोली, “शट अप, इस के आगे और एक शब्द बोली तो मैं तुम्हारी जबान खींच लूंगी.”

“यू शट अप,” तन्वी बोली, “मुझे चुप करा देने से दुनिया के मुंह पर ताला नहीं लगा सकोगी. उस दिन हमें देख कर तुम्हारी सोसायटी की औरतें कितना खुसुरफुसुर कर रही थीं. क्या शिक्षा दे रही हो तुम अपने बच्चों को. आदमियों को अपनी लच्छेदार बातों से अपने जाल में फंसाना, अपने बौयफ्रैंड के अजबोगरीब नाम रखना, दूसरों के घरों में ताकझांक करना, बड़ों का मजाक बनाना, बदतमीजी से बात करना, लड़ाईझगड़ा करना, घमंड दिखाना और तो और अपने बौयफ्रैंड से क्या चाहिए उस के लिए महंगे सामान की लिस्ट बनाना आदि. एक मां तो अपने बच्चे को गलत राह पर जाने से रोकती है. उस के लिए वह सख्ती भी बरतती है. और तुम, तुम उन को अंधी गलियों और दिशाहीन रास्ते की ओर धकेल रही हो. मां के नाम पर तुम   एक ब्लैक डौट हो.

“मिडिल क्लास परिवारों में कई बार सैक्रिफाइज करने पड़ते हैं. अपनी इच्छाओं का दमन कर के परिवारहित में सोचना पड़ता है. परिवार ही सर्वोपरि माना जाता है. हर औरत कीमती गहने, कपड़े पहनना चाहती है, घूमनाफिरना चाहती है. लेकिन पति की कम इनकम के कारण यह संभव नहीं हो पता है. अगर हर औरत तुम्हारी तरह सोचे और इतने अफेयर करे जिन की गिनती नहीं और तुम्हारी तरह सारी मर्यादाएनिमेशन लांघ जाए तो समाज किधर जाएगा. समाज को न तो तुम्हारे जैसे विचारों की जरूरत है और न ही तुम्हारे जैसे लोगों की. वह कहते हैं न,   एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है.   तुम्हारी जैसी औरते सिर्फ गंदगी ही फैलाने का काम करती हैं.

“अवैध संबंध न पहले कभी स्वीकारे गए थे, न आज स्वीकारे जाते हैं. और न ही आगे स्वीकारे जाएंगे. स्वीकारे जाना भी नहीं चाहिए क्योंकि इस में 2 परिवार टूटते हैं. बच्चों की कस्टडी को ले कर पेरैंट्स कोर्ट तक जाते हैं. उन के अवैध संबंधों का खमियाजा मासूम बच्चों को भुगतना पड़ता है. जिस के कारण वे डिप्रैशन का शिकार होते हैं. ऐसे में वे ड्रग्स का सेवन करने लगते हैं. वे एन्जायटी और फ्रस्ट्रेशन का शिकार होने लगते हैं. तुम जैसी औरतों को तो अपनी मौज़मस्ती से मतलब है. यदि जीजाजी किसी दूसरी औरत के साथ अफेयर कर लें और अपनी पूरी सैलरी उस पर लुटाएं, तुम को और बच्चों को निगलैक्ट करें, तो तुम्हें कैसा लगेगा?”

“सुधा तमतमा कर बोली, “ऐसा कैसे हो सकता है. मैं उन की बैंड बजा दूंगी.”

इस पर तन्वी बोली, “वाह दीदी, तुम को सुन कर इतना गुस्सा आ रहा है और दूसरे के पतियों को अपने स्वार्थ के लिए अपने जाल में फांस कर रखा है. उस के लिए क्या कहोगी. तुम्हारी यह जो ऐयाशी चालू है, क्या यह सही है?”

“ऐयाशी किस को कह रही है?” सुधा चिढ़ती हुई बोली.

“नहीं तो यह तुम्हारा धरमकरम कहा जाएगा क्या?” तन्वी भी गुस्से से बोली, “और अब यह नया नाटक क्या चालू किया है. सुबह से प्रवचन चालू कर देती हो टीवी पर. फिर दोतीन घंटे फुल वौल्यूम पर भजनकीर्तन चालू कर देती हो. हर आधे घंटे में तुम बालकनी में जाजा कर घंटी बजाती हो रात के सोने तक. पूजा भी सुबहशाम ही लोग करते हैं वह भी अपने भगवान के सामने, न कि बाहर बालकनी में घंटी बजाबजा कर? किस को नीचा दिखा रही हो. लोगों को नीचा दिखाने की तुम्हारी पुरानी आदत है. 2 महीने पहले तक तो तुम्हारा पूजापाठ से कोई लेनादेना नहीं था. अचानक तुम्हारे भीतर ईश्वर की इतनी गहरी भक्ति कैसे जाग गई. 2 महीने पहले, जब बूआजी के यहां हम मिले थे उन के यहां नए घर की वास्तुपूजा में, तुम को जरा भी रुचि नहीं थी पूजा में. पूरे समय फ़ोन पर चिपकी थीं. कितनी बार तुम को बुलाने के लिए बच्चों को भेजा था, तब आई थीं. और हम लोगों से कहा था कि ‘मुझे पूजापाठ में कोई इंट्रैस्ट नहीं है.  इसलिए, अपनी भक्ति का यह ढोंग बंद करो. अगर सही माने में तुम ने प्रवचन सुने होते तो आज तुम्हारी गाड़ी पटरी से न उतरी होती.”

“यह दिखावा, यह पाखंड किस के लिए, जबकि सब जानते हैं कि असलियत क्या है,” तन्वी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “इतनी ही शुद्ध हदय की यदि तुम होतीं, तो छलकपट, प्रपंच, षड़यंत्र, लालच और स्वार्थ की पुड़िया न होतीं. झूठी बातें कह कर पतिपत्नी के बीच झगड़े न करतीं. यही सब यदि तुम्हारे साथ हो, तुम्हें कैसा लगेगा. आज निशा 16 साल की है. और 6-7  साल बाद तुम उस की शादी करोगी. यदि ससुराल ख़राब मिल गई, सास व ननद ने निशा के खिलाफ अपने बेटे के कान भरने शुरू कर दिए, ननद ने झूठ बोलबोल कर उन दोनों के बीच झगड़े कराए तो तुम्हारी लड़की की जिंदगी नरक बन जाएगी. और तुम्हारा दामाद चरित्रहीन निकला तो उस की जिंदगी तो बरबाद हो गई. मैं ठीक कह रही हूं न, दीदी.”

अभी तक सुधा, जो तन्वी की बातें सुन रही थी, चीखती हुई बोली, “तू मेरी बहन है कि दुश्मन, कब से अनापशनाप बके जा रही है. मैं कुछ बोल नहीं रही हूं, इस का मतलब यह नहीं कि जो मरजी आए, वह बोलती रहे.”

तन्वी ने अब चिल्ला कर कहा, “दीदी, तुम कुछ बोल भी नहीं सकतीं गलती जो कर रही हो. अपनी बेटी के लिए तुम से सुना नहीं जा रहा है. और जो समीर और पाठक अंकल की पत्नियों के साथ जो तुम कर रही हो, क्या वह सब उचित है. जो ताने तुम नहीं सुन सकतीं वे दूसरों के लिए क्यों? जो व्यवहार तुम्हें पसंद नहीं, दूसरों के साथ क्यों, जो बेवफाई तुम्हें पसंद नहीं, दूसरों के साथ क्यों? यह वह सचाई है जिसे तुम चाह कर भी झुठला नहीं सकतीं. तुम्हारा डबल स्टैंडर्ड मैं जान चुकी हूं. तुम जानबूझ कर समीर और पाठक अंकल का घर बरबाद कर रही हो. किसी की खुशियां छीन कर, किसी की आंखों में आंसू दे कर अपने लिए जिन खुशियों का महल खड़ा करना चाहती हो, vताश के पत्तों के भांति भरभरा कर गिर जाएंगी. और जो काम जानबूझ कर किए जाते हैं वे गलती नहीं,  गुनाह कहलाते हैं. और गुनाह की सजा मिलती है. घर तोड़ने जैसा पाप जो तुम कर रही हो, इस की सजा तो तुम्हें मिल कर रहेगी. दूसरों की जो तुम खुशियां छीन रही हो, तुम से भी तुम्हारी खुशियां एक दिन छीनी जाएंगी. और उस दिन   पछताने   के अलावा तुम्हारे पास कुछ नहीं रहेगा. याद रखना दीदी, नाटक कितना भी लंबा चले, परदा गिरता जरूर है. तुम जीजाजी, समीर और पाठक अंकल इन तीनों को एकसाथ धोखा दे रही हो.”

इस पर सुधा बोली, “चार किताबें क्या पढ़ लीं, अपने को बहुत होशियार समझने लगी है.”

“शुक्र है कि मुझे किताबों में लिखी शिक्षा और जीवन के नैतिक मूल्य आज भी याद हैं. वही चार किताबें तुम ने भी पढ़ी थीं. लेकिन तुम सबकुछ भूल गईं. इसलिए आज बरबादी के रास्ते पर चल पड़ी हो. एक भ्रम की दुनिया में जी रही हो. तुम सोचती हो कि समीर और पाठक अंकल को अपनी उंगलियों पर नचा रही हो. हो सकता है, वास्तविकता कुछ और ही हो. उन दोनों के लिए तुम एक   टाइमपास भी हो सकती हो. पाठक अंकल तो ठहरे रिटायर आदमी और समीर में लड़कपन है. उस में तो गंभीरता भी कम है. गलत चीजों को कभी भी त्यागा जा सकता है. बुराई के रास्ते से वापस लौटा जा सकता है. देर कभी भी किसी भी चीज के लिए नहीं होती है. लेकिन यह तभी संभव है जब तुम में गलत चीजों को छोड़ने का, बुराई को त्यागने का जज्बा पैदा हो. जब आंख खुले तब सवेरा.”

सुधा झटके से उठी और दनदनाती हुई बच्चों के कमरे में गई. वहां से तन्वी का सारा सामान उठा कर लाई और जमीन पर फेंकते हुए बोली, “मेरे ही घर में खड़े रह कर मुझे बातें सुना रही है. अपना बोरियाबिस्तर बांध और निकल जा मेरे घर से. और अब कभी मेरे घर मत आना. वैसे भी, तेरा आना मुझे खल रहा था. बड़ी आई मुझे सहीगलत बताने वाली. यह जो तेरा भाषण है, अपने बच्चों को सुनाना. उन के काम आएगा. मुझे और मेरे बच्चों को तेरी सलाह की जरूरत नहीं है.”

जमीन पर बिखरे सामान को समेटती हुई तन्वी बोली, “गलत चीजें होते हुए मैं नहीं देख सकती. और न ही गलत चीजों का समर्थन करती हूं. जहां सम्मान न मिले वहां मैं जाती भी नहीं. और ऐसे रिश्तों से जुड़े रहने का कोई फायदा भी नहीं. दिखावे के रिश्ते एक न एक दिन टूट ही जाते हैं बनावटी जो होते हैं. रिश्तों का लिहाज भी एक हद तक ही किया जाना चाहिए. ऐसे रिश्ते निभा कर भी क्या फायदा. सो, उन से दूर रहने में ही अपनी भलाई है. मैं तो खुद ही अपने घर जा रही थी. और यही बताने तुम्हारे पास आई थी.

“आज तुम होश में नहीं हो. आसमान में उड़ रही हो. लेकिन एक दिन जब तुम आसमान से नीचे जमीन पर गिरेगी, जिंदगी की वास्तविकता से जब तुम्हारा सामना होगा, तब तुम्हें पता चलेगा की यथार्थ का धरातल कितना खुरदुरा और सख्त होता है . जो बोया है वही काटोगी. इंसान को अपने कर्मो की सजा इसी दुनिया में भुगतनी पड़ती है. तुम ने लोगों की खुशियां छीनने का जो पाप किया है, उस के लिए तुम्हें माफ़ नहीं जाएगा. इस की सजा तो तुम्हें मिल कर रहेगी. आज के बाद मैं कभी तुम्हारे घर नहीं आऊंगी. आज इस रिश्ते को हमेशा के लिए मैं ख़त्म कर के जा रही हूं. मैं सबकुछ बरदाश्त कर सकती हूं, अपना अपमान बरदाश्त नहीं कर सकती.” यह कह कर तन्वी ने अपना ब्रीफकेस उठाया और सुधा की तरफ देखे बगैर तेजी से बाहर निकल गई.

ट्रेन में बैठी तन्वी सोच रही थी कि जहां आज कदमकदम पर धोखा और फरेब है वहीं पाठक अंकल और समीर जैसे पढ़ेलिखे, उच्च पदों पर कार्यरत लोग सुधा दीदी जैसी औरतों पर अंधा विश्वास कैसे कर सकते हैं. इन दस सालों में वे इतना तो समझ चुके होंगे कि सुधा दीदी कितनी लालची और स्वार्थी औरत है. हो सकता है जीजाजी भी दीदी के साथ मिल कर समीर और पाठक अंकल को बेवकूफ बना रहे हों. पैसा और प्रौपर्टी देख कर अच्छेअच्छों का ईमान डोल जात्ता है. नीयत ख़राब होने में कितनी देर लगती है. आएदिन अखबारों में हम इन्हीं धोखाधड़ी के किस्से पढ़ते हैं. कुछ भी कहा नहीं जा सकता. यह दुनिया है, कुछ भी हो सकता है. इतने सालों से दीदी के अफेयर चल रहे है, जीजाजी को कानोंकान खबर भी नहीं है, ऐसा कैसे हो सकता है. कभी दीदी पर शक भी नहीं हुआ? इतने महंगे मोबाइल, सामान दीदी और बच्चों के पास कहां से आ रहे हैं. जीजाजी गूंगेबहरे बन कर तमाशा क्यों देख रहे हैं. इन की क्या वजह हो सकती है. ऐसे कई सवाल तन्वी के दिमाग में घूम रहे थे जिन के जवाब उसे नहीं मिल पा रहे थे. तभी ट्रेन ने सीटी बजाई और चल पड़ी. धीरेधीरे प्लेटफौर्म छूटने लगा.

तन्वी ने आख़री बार प्लेटफौर्म पर एक सरसरी निगाह डाली, क्योंकि अब इस प्लेटफौर्म से उस का कोई वास्ता नहीं रह गया था. तन्वी ने अपने बैग से मोबाइल निकाला. आयुष और पूर्वी को मैसेज किया कि वह घर आ रही है.

इधर, पाठक अंकल किराना लेने गए थे, सोचा, पान भी लेते चलता हूं. पान की दुकान पर पहुंचे ही थे कि किसी की आवाज उन के कानों से टकराई. उन्होंने देखा, 2 आदमी पान की दुकान पर खड़े बात कर रहे थे. उन की शक्ल पाठक अंकल को जानीपहचानी लग रही थी. उन का नाम याद नहीं आ रहा था. इसी पान की दुकान पर उन दोनों को कई बार उन्होंने देखा था. उन में से एक कह रहा था,  “बहुत घूम रही है आजकल वह अपने आशिक के साथ.”

“किस की बात कर रहे हो, यार?” दूसरे ने पूछा.

“अरे वही, अपनी सोसायटी की अनारकली, पिंटू की मम्मी,” उस ने पान चबाते हुए कहा.

“अरे, क्या बात कर रहे हो, सक्सेनाजी, क्या सच में?”

“हां, मैं सच कह रहा हूं, मिश्राजी. समीर को तो जानते हो न आप. बस, उसी के साथ घूमती फिर रही है. दोचार बार तो मैं ने भी देखा है उस को,” सक्सेनाजी ने कहा.

इस पर मिश्राजी ने कहा, “मेरी मिसेस ने बताया था मेरे को उस के बारे में कि वह अच्छी औरत नहीं है. सोसाइटी में लोग उस के बारे में तरहतरह की बातें करते हैं. पर मैं ने इन बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया.”

जैसे ही पाठक अंकल ने ये बातें सुनीं, उन के तो होश उड़ गए. सुधा का मेरे अलावा किसी और के साथ भी अफेयर है. और उस के साथ घूमफिर भी रही है. इस का मतलब वह मुझे बेवकूफ बना रही है. उन्होंने पान नहीं लिया. और घर की ओर चल पड़े. रास्तेभर वे यही सोच रहे थे कि आखिर उस ने समीर से चक्कर क्यों चलाया. हम दोनों को मूर्ख बना रही है. पैसा मेरा खाती है और गुलछर्रे उस समीर के साथ उड़ा रही है. शायद पैसों के लिए ही उस ने मेरे जैसे वरिष्ठ आदमी से रिश्ता जोड़ा. क्योंकि मैं तो उस से करीब 15 साल बड़ा हूं. समीर को तो मैं बहुत अच्छे से जानता होण. अच्छी कदकाठी है. दिखने में भी स्मार्ट है. यह सब सोचसोच कर उन का दिमाग भिन्नाने लगा.

वे जल्दी से जल्दी घर पहुंच कर सुधा से बात करना चाहते थे. उन्होंने रास्ते में ही उस को मैसेज कर दिया. और कहा कि मैं तुझ से मिलना चाहता हूं. आज शाम को उसी स्थान पर मिलना जहां हम वौकिंग के समय मिलते हैं.

जवाब में सुधा ने लिखा, “कल मिलती हूं आप से. आज मैं जरा बिजी हूं.”

कोई और दिन होता तो पाठक अंकल शायद मान जाते लेकिन समीर का खयाल आते ही उन्होंने कहा, “नहीं, मुझे आज ही मिलना है. मैं तुम्हारा वहीं पर इंतज़ार करूंगा.”

सुधा ने ‘ओके’ लिखा.

पाठक अंकल सोचने लगे हो सकता है, आज फिर समीर के साथ कहीं जाना होगा, इसलिए मुझ से झूठ बोल रही हो. नियत समय पर पाठक अंकल उस जगह पर पहुंच गए. थोड़ी देर में सुधा भी वहां पहुंच गई और पहुंचते ही पाठक अंकल पर बरस पड़ी, बोली, “इतनी भी क्या इमरजैंसी थी कि कल तक के लिए रुक नहीं सकते थे. मैं यदि न आना चाहती, तो आप आने के लिए मुझ पर दबाव क्यों डालते हो?”

पाठक अंकल ने बिना कुछ इस का जवाब दिए सुधा से पूछा, “यह समीर कौन है और इस के साथ तुम्हारा अफेयर कब से चल रहा है?”

पाठक अंकल का यों अचानक समीर के बारे में पूछने से सुधा सकपका गई. उस से कुछ बोलते न बना. वह सोचने लगी, इन को समीर के बारे में कैसे पता चला. फिर भी हकलाती हुई बोली, “कौन समीर? मैं उसे नहीं जानती.”

पाठक अंकल बोले, “उसे नहीं जानतीं या बताना नहीं चाहती हो? लेकिन मुझे सब पता चल गया है.”

इस पर चिढ़ती हुई सुधा ने कहा, “पता नहीं किस ने तुम्हारे कान मेरे खिलाफ भर दिए हैं जो आप ऊलजलूल बातें कर रहे हैं.”

अब पाठक अंकल को गुस्सा आ गया, चिल्लाते हुए बोले, “झूठ बोलते तुम को शर्म नहीं आती है. अपने से छोटी उम्र के लड़के के साथ मटरगश्ती करती फिर रही हो. और मुझे बेवकूफ बना रही हो.”

इतना सुनते ही सुधा को भी गुस्सा आ गया. उस ने भी ऊंची आवाज में कहा, “चिल्लाओ मत, अंकल. मैं तुम्हारी पत्नी नहीं हूं जो चुपचाप सबकुछ सुन लूंगी. अपनी पत्नी को तुम ने जूते की नोक पर रखा होगा. मैं तुम से दबने वाली नहीं हूं. ये तेवर अपनी पत्नी को दिखाना, मुझे नहीं. वह झेलती होगी तुम्हें और तुम्हारी ज्यादतियों को. अगली बार मुझ से ऊंची आवाज में बात करने की कोशिश भी मत करना. हां, है मेरा समीर के साथ अफेयर. इस से तुम्हें क्या? मेरी अपनी जिंदगी है और मैं अपने हिसाब से जीती हूं. किसी और की मरजी से नहीं.”

थी सुधा का यह रूप देख कर पाठक अंकल हैरान रह गए. उस के तो तेवर ही बदल गए थे. एक तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी. पाठक अंकल सोच में पड़ गए. सुधा के मन में जो आ रहा था, बोले जा रही थी. उस को बीच में ही रोकते हुए पाठक अंकल बोले, “तुम ने मेरे साथ प्यार का झूठा नाटक किया. तुम्हारा मेरे लिए प्यार एक सौदेबाजी था. हर महीने मुझ से कहती हो, मुझे शौपिंग कराओ. और लंबीचौड़ी लिस्ट थमा देती हो. मुझे तो तुम जैसी लालची और मतलबी औरत के जाल में फंसना ही नहीं था.

इस पर सुधा बोली, “आप कौन से दूध के धुले हुए हो. अपनी औरत को धोखा दे रहे हो. मैं तुम्हारी पत्नी को सब बता दूंगी. तुम्हारी पोल खोल कर रख दूंगी.”

इस के जवाब में पाठक अंकल बोले, “तुम क्या मेरी पोल खोलोगी, तुम्हारी सारी सचाई मेरे सामने आ गई है. तुम बहुत ही चालक औरत हो. मुझे ही तुम ने अपने घर बुलाया. तुम मेरे साथ शारीरिक संबंध रखना चाहती थी. संबंध हम दोनों की मरजी से बने हैं, इसलिए जितना दोषी मैं हूं, उतनी ही दोषी तुम भी हो. तुम्हारी उम्र इतनी छोटी भी नहीं है कि तुम्हें किसी ने बहलाफुसला लिया हो. तुम्हारी इस में पूरी रजामंदी शामिल थी. क्याक्या नहीं मांगा तुम ने. तुम्हारे और बच्चों के लिए लैपटौप, स्मार्टफ़ोन, हैंडीकैम, टेबलेट और यहां तक कि किचन के लिए ओवन, राइस कुकर, ग्राइंडर, कुकिंग रेंज, घर के लिए फर्नीचर, कर्टेन और जिस सोफे पर तुम पसरपसर कर बैठती हो उस की कीमत एक लाख रुपए है. कपडेजूते तो हर महीने तुम्हें और तुम्हारे बच्चों के लिए देता हूं. यही नहीं, कितनी बार झूठे बहाने बना कर मुझ से अपने अकाउंट में हजारों रुपये डलवाए हैं. तुम्हारे साथ रखे संबंधों की कीमत आज तक चूका रहा हूं मैं. और तुम मेरी पोल खोलने चली हो.  गलती मेरी ही है, मुझे तुम जैसी शातिर और मक्कार औरत के झांसे में आना ही न था. मैं अपनी राह से भटक गया था. लेकिन अब मैं अपनी भूल सुधारूंगा. रही मेरी पत्नी की बात, तो कहां वह और कहां तुम. उस के साथ तुम बराबरी नहीं कर सकतीं. और अपनी गंदी जबान से उस का नाम भी न लेना. वह तुम्हारी तरह नहीं है. जो औरत अपने पति को धोखा दे सकती है, वह किसी के भी प्रति वफादार नहीं हो सकती. चरित्र के साथसाथ तुम्हारी जबान भी गंदी है. आज इसी समय मैं तुम्हारे साथ अपना संबंध ख़त्म करता हूं. आज से मैं तुम्हारे लिए और तुम मेरे लिए अजनबी हो. मुझ से फिर कभी भी संपर्क करने की कोशिश मत करना.

Women’s Day 2023: मां का घर- क्या अपने अकेलेपन को बांटना चाहती थीं मां

विश्व प्रसिद्ध डिज़ाइनर रॉकी स्टार क्या कहते है फैशन मिस्टेक पर, जाने यहाँ

फैशन की दुनिया हमेशा ही आबाद रहती है. जगह हो या कोई अवसर, फैशन और स्टाइल हमेशा अपने रंगों से सबको सरोबार कर देती है. सही फैशन, जिंदगी के माइने बदल सकती है, ऐसे में डिज़ाइनर भी हमेशा कुछ नया कर लोगों को आकर्षित करते रहते है. मुंबई की रॉकी स्टार ऐसे ही एक डिज़ाइनर है, उन्होंने हमेशा कुछ अलग ट्रेडिशन और फैब्रिक को लेकर काम किया है. उनके डिजाईन में रॉयल, गोथिक और कंटेम्पररी सभी को शामिल किया है, जिसे सेलेब्रिटी से लेकर साधारण इंसान सभी पहनने के लिए उत्सुक रहते है. उनकी कंटेम्पररी डिजाईन में इंडियन क्राफ्ट और एम्ब्रायडरी की प्रधानता होती है, जो देखने में सुंदर और एलीगेंट होते है. डिज़ाइनर रॉकी मिलान फैशन वीक में अपने कपड़ों की शो केस करने वाले है, जिसमे फैशन से जुडी कुछ खास बातों का उल्लेख किया है, आइये जानते है.

 

 

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फैशन ट्रेंड

फैशन में बदलाव हर बार कुछ न कुछ आता रहता है और ये पुराने ड्रेस से अधिकतर प्रेरित हुई होती है. आज के फैशन में पुराने ट्रेंड को डालकर बनाने से ड्रेस की लुक अलग और ग्लैमरस हो जाती है. इस बार फंकी और प्लेफुल स्टाइल की वापसी का संकेत है. वर्ष 1960 और 1970 के दशक के आइकॉनिक लुक की याद दिलाते हुए इस बार मिनी ड्रेसेज़ और अल्ट्रा-शॉर्ट स्कर्ट्स की वापसी हो रही है. लेसी और क्रोशेट फेब्रिक्स, रेट्रो लुक को फेमिनिन टच देती है. इसके अलावा इस बार आर्म वार्मर्स एक एक्सेसरीज की तरह प्रयोग में है, जो किसी भी ऑउटफिट को कोज़ी लुक देती है.

मिली प्रेरणा

रॉकी अपनी प्रेरणा के बारें में कहते है कि कपड़े बनाने में मेरी दिलचस्पी कम उम्र से ही शुरू हो चुकी थी, और मैं हमेशा नई ट्रेंड और स्टाइल के लिए तैयार रहता था. वास्तुकला में खासकर ‘बारोक’ एक वास्तुशिल्पीय शैली, मेरे लिए खास इंस्पिरेशन की वजह बनी. उसमे मैं बिल्डिंग के आकार, रंग और पैटर्न को अपने डिजाईन में सम्मिलित करता था. इन दो चीजों ने मुझे फैशन इंडस्ट्री में कैरियर बनाने के लिए प्रेरित किया. मैं लगातार कुछ नई चीजों की खोज में रहता हूँ, ताकि उसे मैं अपनी डिजाईन में जगह देकर कुछ नया क्रिएट कर सकूँ.

 

 

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फैशन वीक देती है मौका

डिज़ाइनर रॉकी एस आगे कहते है कि मिलान फैशन वीक में मेरे कलेक्शन को प्रदर्शित करने के लिए आमंत्रित किया जाना मेरे लिए एक बहुत बड़ा सम्मान है. मैं ऐसे प्रतिष्ठित मंच पर कलेक्शन को पेश करने के अवसर के लिए उत्साहित, गौरवान्वित और आभारी हूँ. मेरे ऊपर एक प्रभावशाली और यादगार शो को प्रस्तुत करने की एक बड़ी प्रेशर है. उम्मीद है मैं दर्शकों के लिए एक मिसाल बन सकूँगा. मैंने चुनौती को स्वीकार किया है और आगे कदम बढाया है. उम्मीद है मैं इस पर कायम रहकर एक अच्छी कलेक्शन पेश करने में समर्थ रहूँगा, जिसमे वे मेरी विजन और क्राफ्टमेनशिप को देख पायेंगे.

नई कलेक्शन की होगी प्रस्तुति

डिज़ाइनर आगे कहते है कि हमारा नया कलेक्शन ‘मिड नाईट ब्लूम’ यानि रात में खिलने वाला जादुई फूल (nocturnal blossoms) से प्रेरित है. यह कलेक्शन अज्ञात, अस्थाई और वाइल्ड है. मेरी टीम और मैंने फूलों की भव्यता और उसकी मनमोहिनी रूप को फेब्रिक पर उतारने की कोशिश की है. हर पीस में हेंडीक्राफ्ट की डिटेलिंग को दिखाने की कोशिश की गई है. इसके लिए रिफाइंड वेलवेट, डेलिकेट ट्युल फैब्रिक, ऑर्गेनिक और मसलिन के प्रयोग किये गए है. इसमें कलर पैलेट भी नेचर से प्रभावित रंग है, जिसमे डीप रेड और ब्राइट पिंक्स की प्रधानता है.

 

 

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अंतर देशी और विदेशी फैशन का

रॉकी का कहना है कि भारत और विदेशों में फैशन के बीच मुख्य अंतर कल्चरल इन्फ्लुएंस का है. भारतीय फैशन पारंपरिक परिधानों से काफी प्रभावित है, जबकि विदेशों में फैशन अधिक समकालीन और आधुनिक है. मार्केटिंग स्ट्रेटिजी भी अलग-अलग हैं, भारत में ईवेंट और शो का प्रयोग मार्केटिंग के लिए किया जाता है, जबकि विदेशों में डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म काफी पोपुलर है. भारतीय फैशन में प्रयोग की जाने वाली सामग्री जटिल और हेंडीक्राफ्ट होती है, जबकि विदेशों में उच्च गुणवत्ता वाले फेब्रिक के साथ-साथ नई तकनीकों का प्रयोग किया जाता है. दोनों फैशन में ही अनूठी विशेषताएं और प्रभावशाली होने के प्रमाण हैं, जो उन्हें अपने तरीके से सुंदर बनाते हैं.

फैशन मिस्टेक्स

फैशन का कोई दायरा नहीं होता, ये व्यक्ति विशेष के शारीरिक बनावट और हाव-भाव पर निर्भर करता है. रॉकी कहते है कि मैं उसे फैशन मिस्टेक मानता हूँ, जिस व्यक्ति ने अपनी पर्सनल स्टाइल और बॉडी टाइप को बिना ध्यान दिए लेटेस्ट ट्रेंड को फोलो किया है. कपडे ऐसे पहने जो आपके व्यक्तित्व और शारीरिक काया को निखारे. आँख बंद कर कभी किसी स्टाइल को फोलो न करें. इसके अलावा ख़राब फिटिंग वाले कपडे, किस अवसर को बिना ध्यान दिए और बेसिक हायजिन को नजरअंदाज करना ही फैशन मिस्टेक है. ये हमेशा याद रखे कि फैशन मजेदार और एक्सप्रेसिव होना चाहिए, साथ ही फंक्शनल और आरामदायक होने की भी जरुरत है.

जिम्मेदारी है सस्टेनेबल फैशन का

मैं जितना संभव हो सस्टेनेबल फैशन की प्रैक्टिस करने की कोशिश करता हूँ. मसलन आर्गेनिक फैब्रिक का प्रयोग करना, वेस्ट प्रोडक्ट को कम करना, श्रम का नैतिकता से प्रयोग करना आदि. इसे करना आसान नहीं, पर एक छोटी सी कदम ही सस्टेनेबलिटी की ओर बढ़ाना, अपने आप में एक बड़ी बात होती है. मैने अपने सभी कंज्यूमर्स से भी कहना चाहता हूँ कि कपड़ों की खरीदारी करते वक्त पोशाक का चयन उत्तरदायित्व के साथ करें,

Holi 2023: सिड-कियारा से लेकर रणबीर-आलिया तक, शादी के बाद पहली होली मनाएंगे ये 5 कपल

देशभर में होली 8 मार्च को धूमधाम से मनाई जाने वाली है, जिसकी तैयारियां भी शुरू हो चुकी हैं. होली का यह त्यौहार फिल्म इंडस्ट्री में भी काफी धमाकेदार तरह से मनाया जाता है. खास बात यह है कि इस साल मनोरंजन की दुनिया में कई सेलेब्स शादी के बाद पहली बार अपने पार्टनर के साथ होली मनाते हुए दिखाई देंगे. आज हम आपको ऐसे ही सेलिब्रिटी इसके बारे में बताने वाले हैं, जिनकी यह पहली होली होने वाली है.

1- आलिया भट्ट और रणबीर कपूर

आलिया और रणबीर कपूर ने 14 अप्रैल 2022 को शादी की थी. आलिया की शादी का इंतजार फैंस से लेकर उनके बॉलीवुड के फ्रेंड्स तक को था. यह जोड़ी एक दूसरे को पिछले 5 सालों से डेट कर रही थी, जिसके बाद एक प्राइवेट सेरेमनी में दोनों ने शादी कर ली और यह कपल इस साल अपनी पहली होली मनाने के लिए बिल्कुल तैयार हैं. हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि ये कपल पहली होली अपनी बेटी राहा कपूर के साथ सेलिब्रेट करेगा.

 

 

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2- आथिया शेट्टी और केएल राहुल

सुनील शेट्टी की बेटी और अभिनेत्री आथिया शेट्टी ने जनवरी महीने में मशहूर क्रिकेटर केएल राहुल से शादी की है. आथिया की शादी काफी प्राइवेट थी, जिसकी कई तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी हैं. आथिया और केएल राहुल एक दूसरे को सालों से डेट कर रहे थे. ये कपल भी अब एक साथ होली सेलिब्रेट करने के लिए बेहद उत्साहित हैं और फैंस भी उनकी तस्वीरों का इंतजार कर रहे हैं.

 

 

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3- कियारा आडवाणी और सिद्धार्थ मल्होत्रा

कियारा और सिद्धार्थ मल्होत्रा ने हाल ही में राजस्थान के जैसलमेर में रॉयल वेडिंग की, जिसके बाद दिल्ली से लेकर मुंबई में उनका ग्रैंड रिसेप्शन भी हुआ है. यह कपल भी एक-दूसरे से फिल्म के सेट पर मिला था और वहीं से प्यार का सिलसिला शुरू हो गया. इस जोड़े को होली सेलिब्रेट करना काफी पसंद है. पहले भी दोनों की साथ में कई तस्वीरें वायरल हो चुकी है और शादी के बाद पहली बार ये कपल आपको एक साथ होली मनाते हुए दिखाई देगा.

 

 

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4- ऋचा चड्ढा और अली फज़ल

बॉलीवुड की बिंदास गर्ल ऋचा चड्ढा ने अपने लॉन्ग टाइम बॉयफ्रेंड अली फज़ल से पिछले साल शादी की थी. ऋचा ने अपनी शादी का ग्रैंड रिसेप्शन मुंबई लखनऊ और दिल्ली में भी आयोजित किया था. हालांकि, अभिनेत्री का दावा है कि उन्होंने अली से ढाई साल पहले ही कोर्ट मैरिज कर ली थी. लेकिन, वो इस बात का खुलासा नहीं करना चाहती थी. वहीं, ये कपल भी अपनी शादी के अलाउंसमेंट के बाद पहली बार होली एक साथ मनाएगा.

 

 

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5- हंसिका मोटवानी और सोहेल कथूरिया

‘शाका लाका बूम बूम’ में संजना का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री हंसिका मोटवानी ने भी अपने बिजनेसमैन बॉयफ्रेंड सोहेल कथूरिया से 4 दिसंबर को जयपुर में शादी की थी. हंसिका की शादी एक बेहद ग्रैंड वेडिंग थी, जिसपर एक वेब सीरीज़ भी जल्द अमेज़न प्राइम पर स्ट्रीम होने वाली है। इसमें आपको कपल की रॉयल वेडिंग की कुछ झलकियां दिखाई देंगी . हालांकि, ये कपल भी मार्च में पहली बार साथ में होली सेलिब्रेट करने के लिए बिलकुल तैयार है.

 

 

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भटकते मन को दिशा मिल गई- भाग 2

शहनाई बजी और चारुल अपने पिया की मनभावन दुलहन बन कर पायल छनकाती ससुराल आ गई.

यश के पिता वृद्ध हो चले थे. बढ़ती उम्र के कारण फैक्टरी का काम अच्छी तरह से न संभाल पाते. इसलिए यश ने पिता के जमेजमाए बिजनैस में हाथ आजमाने का निर्णय लिया.

चारुल ने एक प्रतिष्ठित एमएनसी जौइन कर ली.

विवाह के बाद के शुरुआती दिन मानो मदहोश भरी खुमारी में बीते.

चारुल एक सहृदय, साफ दिल की मृदु स्वाभाव की लड़की थी. वक्त के साथ वह ससुराल के तौरतरीके सीखती गई. अपनी नरमदिली और मीठे व्यवहार से उस ने धीरेधीरे ससुराल के सभी सदस्यों के मन में जगह बना ली.

किसी के मन में कोई खलिश न थी. उन के विवाह की पहली वर्षगांठ बेहद धूमधाम से मनी. शानदार पार्टी आयोजित की गई. इस आयोजन के कुछ ही दिन बीते थे कि यश की तबीयत अचानक गिरने लगी. उसे निरंतर थकान, पैरों में सूजन, उबकाई, सीने में दर्द और भारीपन की शिकायत रहने लगी.

डाक्टरों ने सभी टेस्ट करवाए जिस से पता चला कि उस की किडनी फेल होने की कगार पर है. 1 वर्ष की अवधि में उस का किडनी फंक्शन 30% तक रह गया.

उसे अब सप्ताह में एक बार डायलिसिस की आवश्यकता पड़ने लगी. इस बीमारी की वजह से वह अपनेआप को फैक्टरी का कामकाज सुचारु रूप से संभाल पाने में असमर्थ पाने लगा. उस के पिता भी कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे.

 

कुछ ही दिनों में फैक्टरी के कर्मचारियों के भरोसे चलने पर व्यापार में गिरावट आने लगी. इसलिए यश और चारुल ने मिलजुल कर निर्णय लिया कि चारुल को नौकरी छोड़ कर फैक्टरी से जुड़ जाना चाहिए, जिस से घर का व्यापार सही ढंग से चलता रहे.

चारुल ने कुछ ही दिनों में फैक्टरी जौइन कर ली और धीरेधीरे फैक्टरी का सारा कामकाज अपने कंधों पर ले लिया.

उस के लिए जिंदगी बेहद मुश्किल हो चली थी. यश की दिनरात की तीमारदारी, उसे हर सप्ताह डायलिसिस के लिए ले जाना, फैक्टरी और बाहर का चुनौतीपूर्ण काम, घरगृहस्थी के सौ कामों में उल?ा चारुल दिनभर चकरघिन्नी की तरह नाचती रहती, लेकिन अपनी शिद्दत की सहनशीलता के चलते कभी भी चूं तक न करती. हमेशा चेहरे पर मुसकान लिए सभी कामों को पूरी मेहनत से निबटाती.

बेटे के प्रति उस का समर्पण भाव देख कर सासससुर उस की बड़ाई करते न थकते. हर परिचित के सामने उस की दिल खोल कर प्रशंसा करते.

उन्हीं दिनों कोरोना की पहली और दूसरी लहरें आईं जिस में उस के व्यवसाय को गहरा धक्का पहुंचा. दिन पर दिन व्यापार की स्थिति नाजुक होने लगी. तभी चारुल और यश के कालेज का एक सहपाठी जौय उन के संपर्क में आया, जिस की कोरोना की दोनों लहरों में स्वयं की फैक्टरी बैठ गई थी और वह किसी नए अवसर की तलाश में था.

उस के पास बिलकुल पूंजी नहीं बची थी और बहुत कर्जा चढ़ गया था. जब उस ने चारुल और यश से उन की फैक्टरी की बदहाली सुनी, उस ने उन से फैक्टरी में सा?ोदारी की पेशकश रखी.

उस मुश्किल दौर में दोनों ही पक्षों को डूबते को तिनके की तर्ज पर सहारा चाहिए था. इसलिए चारुल और यश दोनों ने आपसी सहमति से उस के साथ 70-30% की सा?ोदारी कर ली.

जौय एक बेहद मेहनती और व्यवसाय की बारीकियों का जानकार था. कुछ ही दिनों में उस ने फैक्टरी की डगमगाती नैया को सहारा दिया. धीमेधीमे चारुल और उस की मेहनत रंग लाई और उस की स्थिति ठीक होने लगी.

यों ही देखते देखते 5 बरस गुजर गए कि तभी चारुल पर आसमान टूट पड़ा. यश की मृत्यु हो गई. प्राणों से प्यारे जीवनसाथी से जुदा हो कर वह टूट गई. करीब 7-8 माह तक वह पति के जाने के गम में बेसुध रही. उसे न अपना होश था, न घरपरिवार का. इस अवधि में उस ने घर की दहलीज तक नहीं लांघी. सासससुर के कहे अनुसार घर में रही. यों ही देखतेदेखते पति की मौत को पूरा साल गुजर गया.

इस मुश्किल दौर में उस की कुछ करीबी सहेलियों ने उस को बहुत हिम्मत दी. पति की मौत के बाद उसे फिर से अपनी नई जिंदगी शुरू करने का हौसला दिया. इस परीक्षा की घड़ी में जौय ने भी उस का बहुत साथ दिया. यश के न रहने पर भी उस ने अकेले दम पर पूरी नेकनीयती के साथ फैक्टरी संभाली, और फैक्टरी के कुल मुनाफे से बड़ी ईमानदारी से चारुल का 70% हिस्सा उसे देता रहा.

पति की पहली बरसी के बाद उस ने फैक्टरी में सालभर बाद कदम रखा.

शुरूशुरू में वह काम में अपना ध्यान केद्रिंत न कर पाती, लेकिन वक्त के साथ वह अपने काम में रमने लगी. जौय उसे हर कदम पर अपना सहयोग देता. धीमेधीमे दोनों के संयुक्त प्रयासों से फैक्टरी का टर्नओवर आसमान छूने लगा.

अपनी सफलता से उत्साहित वह वक्त के साथ सामान्य होती जा रही थी. अब उस का काम उस की जिंदगी का एकमात्र ध्येय बन कर रह गया था. वह और जौय दिन के आठ 8-10 घंटे साथसाथ गुजारने लगे थे. अनेक बिजनैस मीटिंग्स साथसाथ अटैंड करने लगे थे. अमूमन फैक्टरी के बाहर साथसाथ देखे जाते. बिजनैस में उन के प्रतियोगी व्यापारी उन की इस दिनदूनी रात चौगुनी प्रगति से खार खाने लगे.

दोनों के बीच अच्छी दोस्ती थी, लेकिन उन दोनों की जबरदस्त सफलता के चलते उन की प्रोग्रैस से जलने वाले विरोधी खेमे के कुछ नीच मानसिकता के लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि दोनों में गलत संबंध हैं.

उड़तेउड़ते यह बात चारुल के सासससुर तक पहुंची. दोनों इस बात पर बहुत तिलमिलाए, लेकिन उन्हें इस बदनामी का प्रतिकार करने का कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा था. उन्हें अपनी बहू पर पूरा भरोसा था कि वह इस तरह कि घटिया हरकत कतई नहीं करेगी, लेकिन दुनिया का मुंह तो बंद नहीं किया जा सकता. इसलिए चारुल के ससुरजी ने एक दिन बहू को बुला कर उस से कहा, ‘‘बेटा, तुम अभी यंग हो. हमें तुम पर पूरा भरोसा है कि तुम कभी गलत रास्ते पर नहीं चलोगी. लेकिन बेटा, यह दुनिया बड़ी जालिम है. पति की छांव भी तुम्हारे ऊपर नहीं. इसलिए अब से तुम धीरेधीरे जौय के साथ उठनाबैठना कम कर दो. फैक्टरी के बाहर उस के साथ आनाजाना बिलकुल बंद कर दो. लोग तुम दोनों को ले कर बातें बनाने लगे हैं.’’

‘‘पापाजी, मैं ऐडल्ट हूं और अपना अच्छाबुरा अच्छी तरह से सम?ाती हूं. मैं बस, अपनी अंतरात्मा के प्रति जवाबदेह हूं, बाकी दुनिया क्या कहती है, मु?ो उस से कोई फर्क नहीं पड़ता. हां, मैं दुनिया के डर से उस के साथ घूमनाफिरना बंद कर दूं, यह संभव नहीं. अब अपने व्यापार को अकल्पनीय ऊंचाइयों तक ले जाना ही मेरे जिंदगी की ख्वाहिश है और वह जौय के साथ के बिना बहुत मुश्किल होगा. हम दोनों अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में संभावनाएं ढूंढ़ने एक इंटरनैशनल नेट वर्किंग इवैंट में हिस्सा लेने अगले माह की पहली तारीख को न्यूयौक जा रहे हैं. अगर हमें विदेशी कंपनियों के और्डर मिल गए तो हमारे वारेन्यारे हो जाने हैं.

महिलाओं को कैरियर बनाने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है- गरिमा अरोड़ा, मिसलिन स्टार शैफ

मुंबई के जय हिंद कालेज से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद गरिमा ने फील्ड में भी काम किया, लेकिन इस दौरान उन्हें एहसास हुआ कि वे जो कर रही हैं उस में उन्हें मजा नहीं आ रहा.

कैरियर और पैशन को ले कर गरिमा बताती हैं, ‘‘पत्रकारिता के दौरान मैं ने अपने अंदर छिपे कुकिंग के पैशन को पहचाना. दरअसल, कुकिंग से मेरा परिचय मेरे पापा ने बहुत कम उम्र में ही करा दिया था. फिर मैं ने पैरिस के कलिनरी स्कूल से कुकिंग का कोर्स करने का फैसला किया.’’

इस के बाद गरिमा ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और मिशलिन स्टार हासिल करने वाली भारत की पहिला महिला शैफ बनीं.

शैफ ही बनना था

पैरिस से कोर्स करने के बाद गरिमा ने रैस्टोरैंट्स में काम किया और कुकिंग के साथसाथ इस व्यवसाय की बारीकियों को सीखा. गरिमा कहती हैं, ‘‘मेरे दिमाग में हमेशा यह रहता था कि मुझे शैफ ही बनना है. मुझे कलिनरी की पढ़ाई के दौरान ही यह पता चल चुका था कि कुकिंग बिजनैस में कैरियर बनाना है तो शुरुआत जल्दी करनी होगी. इस के लिए मैं ने काफी रिसर्च भी की.’’

ऐसा नहीं है कि यह यह सब गरिमा के लिए बहुत आसान था. कैरियर की शुरुआत में भी और शैफ बनने के बाद भी चुनौतियां आती रहीं. सब से बड़ी चुनौती को याद करते हुए गरिमा बताती हैं, ‘‘कोविड-19 के समय रैस्टोरैंट को चलाना, स्टाफ को समय से पैसा देना और डाइनिंग में आए नए बदलाव को समझना बेहद मुश्किल था. हमें रेवेन्यू बढ़ाने के नए तरीकों के बारे में जल्दी सोचना था क्योंकि अपनी टीम की जिम्मेदारी भी हमारी ही थी. इस दौर ने हमें यह समझने का मौका दिया कि हम अंदर से मजबूत हैं और चुनौतियों का सामना कर सकते हैं.’’

संघर्ष जैंडर नहीं देखता

गरिमा का कहती हैं, ‘‘पुरुष हो या महिला दोनों के लिए चुनौतियां अलगअलग होती हैं. महिलाओं के जीवन में संघर्ष थोड़ा ज्यादा होता है. उन्हें उन पाबंदियों से भी जूझना पड़ता है जो समाज ने उन के लिए बना दी हैं और जिन मदरहुड और कैरियर के बीच तालमेल बैठाने के लिए उन्हें आज भी कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं. महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए उन के आसपास के लोगों को उन की मदद करनी चाहिए.’’

गा की शुरुआत

हर शैफ का सपना होता है कि उस का अपना बेहतरीन रैस्टोरैंट हो. गरिमा का भी सपना था कि अपनी स्वाद की समझ को एक नई पहचान, एक नया नाम दें. इस तरह शुरू हुआ यानी गरिमा का रैस्टोरैंट.

गरिमा कहती हैं, ‘‘गा का खयाल मुझे अचानक उस समय आया जब मैं थाईलैंड में एक दिन वाक कर रही थी. मुझे थाईलैंड के जायकों में भारतीय खानपान की झलक दिखाई देती थी. फिर जब मुझे रैस्टोरैंट खोलने में मदद करने के लिए इनवैस्टर भी मिल गया तो फिर मैं ने अपने सपने को सच में बदलने का काम शुरू कर दिया.’’

फिटनेस का भी रखें ख्याल

गरिमा अपने पैशन को जीने के साथसाथ अपनी फिटनैस का भी ध्यान रखती हैं. हफ्ते में 5 दिन वर्कआउट करना गरिमा कभी मिस नहीं करतीं. वे हमेशा ऐसे खाने पर प्रयोग करती रहती हैं जो सेहत के लिए अच्छा हो.

गरिमा महिलाओं को संदेश देते हुए कहती हैं, सेहतमंद खानपान शरीर और दिमाग दोनों को मजबूत बनता है और जब ये दोनों मजबूत रहते हैं तो आप की प्रोडक्टिविटी भी बढ़ती है. इसलिए अच्छा बनाएं, अच्छा खाएं और हमेशा फिट रहें.

मास्टर शेफ की जज

गरिमा इन दिनों मास्टरशैफ शो के नए सीजन में बतौर जज नजर आ रही हैं. खास बात यह है कि इस शो के प्रतिभागियों को कुकिंग टिप्स देने के साथसाथ गरिमा उन का हौसला भी बढ़ाती हैं. शो की महिला प्रतिभागी गरिमा को अपना रोल मौडल मानती हैं. वे हमेशा प्रतिभागियों को प्रोत्साहित करते हुए कहती हैं, ‘‘हमारे देश के खाने में जितनी विविधता है उतनी किसी देश के खाने में नहीं. आप लोग इस विविधता को अपनी लगन से अंतर्राष्ट्रीय मंच पर जरूर ले जाएं.’’

मिडिल क्लास लड़की का भविष्य पहले से ही तय होता है- झूलन गोस्वामी, क्रिकेटर

झूलन गोस्वामी का जन्म 25 नवंबर, 1982 को पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के चकदाहा शहर में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था. उन के पिता का नाम निशित गोस्वामी और माता का नाम झरना गोस्वामी है. उन का एक भाई भी है जिस का नाम कुनाल गोस्वामी है. झूलन ने 15 साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू किया था. क्रिकेट में शुरुआत करने से पहले वह फुटबाल पसंद करती थीं और खेला करती थीं. झूलन को क्रिकेट में दिलचस्पी तब हुई जब उन्होंने 1992 का क्रिकेट विश्वकप टीवी पर देखा.

इस के बाद 1997 के महिला क्रिकेट विश्वकप का फाइनल मैच जोकि कोलकाता के ईडन गार्डन मैदान पर खेला गया था, उस में झूलन एक बालगर्ल का काम कर रही थी. मैच जीतने के बाद आस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों के विक्ट्री लैप को देखने के बाद उन्होंने इस खेल में और अधिक रुचि लेना शुरू किया और भारत के लिए विश्वकप जीतने का सपना देखने लगीं.

उस समय उन के गृहनगर चकदाहा में क्रिकेट खेलने की कोई सुविधा नहीं थी, इसलिए झूलन को लगभग 3 घंटे लोकल ट्रेन में यात्रा कर के कोलकाता आना पड़ता था. उन के कोच सपन साधु बहुत सख्त थे और समय पर मैदान में न पहुंचने पर वह खिलाड़ी को भगा देते थे. लेट आने पर खिलाड़ी को उस दिन की प्रैक्टिस मिस करनी पड़ती थी. सपन झूलन की लंबाई और कलाई के घुमाव से बहुत इम्प्रैस थे. उन्होंने ही झूलन को गेंदबाज बनने की सलाह दी और आज वे विश्व की प्रसिद्ध महिला गेंदबाज हैं.

आसान नहीं था सपना पूरा करना

चकदाहा ऐक्सप्रैस के लिए अपने सपनों को ट्रैक पर उतारना इतना आसान भी नहीं था. झूलन ने अपने सफर को याद करते हुए कहा भी था, ‘‘छोटे कस्बे के मिडिल क्लास परिवार की लड़की का सफर लगभग तय होता है. लेकिन मुझे अपने क्रिकेटर बनने के सपने को पूरा करना ही था. मेरी दादी ने मेरा साथ दिया तो मेरे अंदर हिम्मत आई.

चकदाहा में क्रिकेट की अच्छी सुविधा न होने के कारण मैं कोलकाता स्टेडियम में जाती थी. ट्रेन के सफर के साथ ताने भी सुनने को मिलते थे. फिर रिकशा से स्टेडियम पहुंचती थी. मुझे यह एहसास था कि मैं ने लड़की हो कर सपना देखा है और यदि इसे पूरा करने में नाकाम रही तो शायद फिर समाज की लड़कियों के लिए धारणा सही हो जाएगी कि लड़की को तो घर के काम ही करने चाहिए.’’

कामयाबी की छलांग

साल 2002 में जब झूलन ने चैन्नई में इंगलैंड के खिलाफ अपना पहला एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेला, उस समय उन की उम्र मात्र 19 वर्ष थी. उन्होंने 2007 में आईसीसी महिला खिलाड़ी का वर्ष का पुरस्कार जीता. 2008 में वह एशिया कप में एकदिवसीय मैचों में 100 विकेट तक पहुंचने वाली चौथी महिला खिलाड़ी बनीं और वर्ष 2011 में उन्होंने सर्वश्रेष्ठ महिला क्रिकेटर के लिए ‘एम.ए. चिदंबरम ट्रौफी’ जीती. झूलन को जनवरी 2016 में आईसीसी महिला ओडीआई गेंदबाजी रैंकिंग में पहले स्थान पर रखा गया था.

झूलन ने अपना अंतिम टी20 मैच 10 जून, 2018 बांग्लादेश के खिलाफ खेल था और इस के बाद अगस्त, 2018 में उन्होंने टी20 क्रिकेट से संन्यास की घोषणा कर दी. कुल मिला कर झूलन गोस्वामी ने 280 मैचों में 350 अंतर्राष्ट्रीय विकेट लिए हैं और 3 अर्धशतकों के साथ 1922 रन बनाए हैं.

अर्जुन पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित झूलन गोस्वामी को लीडिंग इंटरनैशनल विकेट टेकर का सम्मान भी हासिल है. आज वे भारतीय महिला क्रिकेट टीम के मुख्य कोच रमेश पोवार के तहत गेंदबाजी सलाहकार के रूप में नियुक्त हैं. झूलन के जीवन और उन की सफलता की कहानी से प्रेरित एक बायोपिक ‘चकदाहा एक्सप्रेस’ बनी है, जिस में अनुष्का शर्मा ने उन की भूमिका निभाई है. इस बायोपिक का निर्देशन सुशांत दास ने किया है. नैटफ्लिक्स पर यह फिल्म 10 मई 2023 को रिलीज होगी.

बेटियों को फाइनैंशियली इंडिपैंडैंट बनाना जरूरी- शिवजीत भारती, आईएएस

हरियाणा के पंचकूला जिले के एक छोटे से गांव जयसिंहपुरा की रहने वाली 29 वर्षीय शिवजीत भारती के पिता गुरनाम सैनी अखबार बेचने का काम करते हैं. एक दिन उन की खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्हीं समाचारपत्रों की सुर्खियों में उन की अपनी बेटी का नाम रोशन हो रहा था. गांव की इस बेटी का सलैक्शन पहले ही प्रयास में हरियाणा सिविल सर्विस में हुआ था. वर्तमान में वे चंडीगढ़ में डिप्टी सैक्रेटरी उप सचिव कोपरेशन डिपार्टमैंट सहकारिता विभाग में कार्यरत हैं.

शिवजीत की मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं. शिवजीत भारती ने पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ से मैथ्स में ग्रैजुएशन और पोस्ट ग्रैजुएशन किया है. आर्थिक तंगी के कारण वे अच्छी कोचिंग प्राप्त नहीं कर पाईं थीं पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. किताबों, पत्रिकाओं, अखबारों और यूट्यूब वीडियोज का सहारा ले कर सफलता पाई. अतिरिक्त कमाई के लिए वे अपने घर पर ही छात्रों को ट्यूशन भी पढ़ाती थीं. 2 महीने पहले उन्होंने लव मैरिज की है. उन के पति भी सिविल सर्विसेज में हैं. पति मध्य प्रदेश के हैं, मगर अब हरियाणा सिविल सर्विस कंपीट कर के भारती के साथ चंडीगढ़ में ही हैं.

आर्थिक मजबूती जरूरी

यह पूछने पर कि वे किन समस्याओं पर सब से पहले ध्यान देना चाहती हैं? तो शिवजीत बताती हैं, ‘‘मैं हरियाणा में सैक्स रेश्यो के इम्प्रूवमेंट के लिए काम करना चाहेंगी जिस में हरियाणा काफी कमजोर है. दूसरी कोशिश ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ के लिए करना चाहेंगी. सोसाइटी में अपनी जगह बनाने के लिए महिलाओं और लड़कियों का आर्थिक रूप से इंडिपैंडैंट होना काफी जरूरी है.

ऐसी महिलाएं बच्चों को भी एक अलग प्रोस्पैक्टिव दे सकती हैं. महिला घर से भी काम कर सकती है. छोटे बिजनैस कर सकती है. इस से महिला का आत्मविश्वास बढ़ता है और परिवार को भी आर्थिक सहयोग मिलता है.’’अपने संघर्ष के बारे में बताते हुए शिवजीत कहती हैं, ‘‘मेरे पिता न्यूज पपेर बेचने का काम करते थे. मां आंगनबाड़ी में काम करती हैं. 1 बहन और 1 भाई और है. भाई स्पैशल चाइल्ड है. हम फाइनैंशियली स्ट्रौंग नहीं थे, मगर मेरे पेरैंट्स सपोर्टिव थे. जब मैं पढ़ाई के लिए दिल्ली गई तो सोसाइटी में सब बोलते थे कि बेटी को इतनी दूर भेज दिया. तब लोग मेरे पिता को समझते थे कि इस की शादी करा दो. मगर मेरे पेरैंट्स ने उन की बातों पर ध्यान नहीं दिया और तभी आज मैं इस मुकाम पर हूं.’’

आज भी महिलाओं के लिए समाज की स्टीरियोटाइप थिंकिंग से पार पाना कितना मुश्किल है? इस सवाल के जवाब में शिवजीत कहती हैं, ‘‘अगर फैमिली खासकर पेरैंट्स सपोर्टिव हैं, आप का हस्बैंड और बौस की सपोर्ट है और आप के अंदर आत्मविश्वास है तो आप हर बाधा पार कर सकती हैं. यही वजह है कि लाख बाधाओं के बावजूद महिलाओं ने खुद को हमेशा प्रूव किया है. महिलाओं में किसी भी परेशानी या दुख से उबरने और कठिनाइयों से लड़ने की क्षमता बहुत अधिक होती है.’’

मां से मिली प्रेरणा

शिवजीत भारती को हमेशा अपनी मां से प्रेरणा मिली है. वे बताती हैं, ‘‘मेरा भाई स्पैशल चाइल्ड है जबकि मां वर्किंग वूमन थीं. वे घर का काम भी करती थीं और जौब भी. मेरे भाई को भी संभालती थीं. यदि किसी के घर में स्पैशल चाइल्ड होता है तो इंसान और सबकुछ भूल जाता है. जौब भी भूल जाता है और दूसरे बच्चों को भी. मगर मेरी मां ने सबकुछ बहुत अच्छे से संभाला.

संदेश

महिलाओं को संदेश देते हुए भारती कहती हैं, ‘‘वे यह न सोचें कि बेटी हैं तो उन की ऐजुकेशन, जौब या ऐंपावरमैंट औप्शनल है. जितना यह सब बेटे के लिए जरूरी है उतना ही बेटी के लिए भी. फाइनैंशियल इंडिपैंडैंस औप्शनल नहीं है. महिलाएं जब पढ़ेंगी और अपने पैरों पर खड़ी होंगी तभी दुनिया बदलेगी, समाज में समानता आएगी.’’

महिला असफल हो जाए तो लोग उस की क्षमता पर सवाल उठाते हैं- विदिशा बथवाल

विदिशा एक बिजनैस फैमिली से आती हैं और उन्होंने बिजनैस की डिगरी भी हासिल की है. उन की शादी भी एक व्यावसायिक परिवार में ही हुई. यही वजह है कि उन के मन में भी अपना खुद का बिजनैस शुरू करने का जनून जगा.

उन्होंने 2011 में पैपरिका की शुरुआत की जिस का उद्देश्य कोलकाता के लोगों को रैस्टोरैंट स्टाइल फैसी कुक्ड मील्स मुहैया कराना था. एक दशक से भी अधिक समय से यह ब्रैंड कोलकाता का प्रीमियम और पसंदीदा गोरमे डैस्टिनेशन बना हुआ है.

विदिशा बताती हैं, ‘‘मैं हमेशा से एक ऐसा व्यवसाय करना चाहती थी जिसे अपना कह सकूं और जिस से मुझे पहचान मिले. मैं शुरू में लंदन में हेज फंड ऐनालिस्ट के रूप में काम कर रही थी. फिर वह नौकरी छोड़ दी और कोलकाता चली गई. वहीं इस बिजनैस का विचार दिमाग में आया.

कई पुरस्कार जीते

पैपरिका के साथ अपने एक दशक के लंबे सफर के दौरान विदिशा ने कई पुरस्कार भी जीते. मसलन, 2012 में गौरमे के क्षेत्र में ‘अपराजिता पुरस्कार,’ 2018 में ‘गो गेटर वाईएफएलओ कोलकाता गौरमंड’, 2018 में ‘जस्ट डायल पैपरिका टेक अवे’ और 2019 में फिक्की द्वारा संजीव कपूर कुकिंग कंपीटिशन में भी पुरस्कार हासिल किया.

क्या आज भी महिलाओं के लिए समाज की रूढि़वादी सोच से पार पाना मुश्किल है? इस सवाल के जवाब में विदिशा कहती हैं, ‘‘लड़कियों को इसी मानसिकता के साथ बड़ा किया जाता है कि युवा होते ही उन की शादी कर दी जाए और उन के बच्चे हो जाएं. फिर सारी जिंदगी घरपरिवार के कामों में उलझे रहें. अगर कोई महिला अपना बिजनैस शुरू करना चाहे तो उस का अपना ही परिवार, दोस्त, रिश्तेदार और समाज के लोग उसे पीछे खींचते हैं. कभीकभी जब एक महिला अपना बिजनैस शुरू करती है और कोई समस्या आती है तो उस की क्षमता पर सवाल उठता है. लोग कहने लगते हैं कि हमें पता था तुम से नहीं होगा.

शाम के बाद लड़की घर से नहीं निकलेगी भले ही उस का कैटरिंग इवेंट मैनेज करने के लिए शाम में जाना जरूरी हो. इस तरह उस के पैर बांधने की कोशिश की जाती है.’’

एक घटना ने बदली जिंदगी

जिंदगी की कोई घटना जिस ने आप के जीवन की दिशा बदल दी हो? इस सवाल के जवाब में विदिशा कहती हैं, ‘‘अपने कैरियर की शुरुआत में मैं ने कोलकाता में एक बौंबे कंपनी की फ्रैंचाइजी ली थी. हालांकि यह अच्छा नहीं चल रहा था और मुझे भारी मन से उस बिजनैस को बंद करना पड़ा. इस निर्णय ने मेरे विजन को और भी मजबूत बना दिया. मैं ने जो भी निवेश कर के बौंबे फ्रैंचाइजी शुरू की थी वह मैं नहीं चाहती थी कि यह बरबाद हो जाए. इसलिए मैं ने उसी से अपना कैटरिंग क्लाउड किचन शुरू किया और फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा.’’

इस फील्ड में कितना कंपीटिशन है? इस के जवाब में वे कहती हैं, ‘‘12 साल पहले जब मैं ने काम शुरू किया था तब से अब तक प्रतिस्पर्धा  काफी बढ़ गई है. बहुत सारे कम उम्र के लड़के हों या लड़कियां इस बिजनैस में आ रहे हैं.  वे प्रौपर ट्रेनिंग ले रहे हैं और प्रोफैशनल शेफ बन रहे हैं. इस से प्रतिस्पर्धा बढ़ती है क्योंकि वे बिजनैस के सभी गुर सीख रहे हैं और अपने स्वयं के कैफे, रेस्तरां खोल रहे हैं जो एक तरह से बहुत अच्छा है.’’

विदिशा कहती हैं, ‘‘हम ने दुबई, संयुक्त अरब अमीरात में इस नाम के साथ कैटरिंग शुरू की. दुबई ने हम पर ढेर सारा प्यार बरसाया और हमारे ब्रैंड का खुले हाथों से स्वागत किया. हम अपनी कैटरिंग पेरुवियन कोरियन और मैक्सिकन तक फैला रहे हैं. मैं रचनात्मकता और जनून में दृढ़ विश्वास रखती हूं और मैं इस बात पर जोर देती हूं कि व्यक्ति को हमेशा ऊंचा लक्ष्य रखना चाहिए. मेरा लक्ष्य भविष्य में रैस्टोरैंट खोलने का है.

21 साल बाद मिसेज वर्ल्ड का ताज भारत लाना गर्व भरा पल था- सरगम कौशल, मिसेज वर्ल्ड 2022

मिसेज वर्ल्ड का खिताब 21 साल बाद फिर एक बार भारत के नाम हुआ. 2022 में यह खिताब सरगम कौशल ने जीता, जो एक मौडल हैं, मगर मौडलिंग की दुनिया में कदम रखने से पहले वे विशाखापट्टनम में अध्यापन का कार्य कर रही थीं. मिसेज वर्ल्ड का खिताब इस से पहले वर्ष 2001 में डा. अदिति गोवित्रीकर ने जीता था.

सरगम का जन्म 17 सितंबर, 1990 को हुआ था. जम्मू कश्मीर की रहने वाली सरगम कौशल अभी 32 वर्ष की हैं. 2018 में उन की शादी आदित्य मनोहर शर्मा से हुई जो भारतीय नौसेना में लैफ्टिनैंट कमांडर हैं. सरगम अपनी कामयाबी का क्रैडिट अपने पिता और पति को देती हैं, जो उन के हर कदम और फैसले में साथ खड़े रहते हैं.

सरगम के पिता जी.एस. कौशल बैंक औफ इंडिया में चीफ मैनेजर के पद से रिटायर हुए हैं और माता रीमा खजुरिया गृहिणी हैं. सरगम का एक छोटा भाई मंथन कौशल है.

लड़कियां हर क्षेत्र में आगे

सरगम को मिसेज वर्ल्ड का ताज मिलने के बाद जब लोग उन के मातापिता को बधाई देने पहुंचे तो बेटी की इस सफलता पर खुशी व्यक्त करते हुए उन की मां ने कहा, ‘‘आज हम सरगम के नाम से पहचाने जा रहे हैं. हमारी बेटी ने अपनी इच्छाशक्ति और मेहनत से इस मुकाम को हासिल किया है और इस में उस के पति आदित्य का बड़ा योगदान है. यह न सिर्फ जम्मू कश्मीर वरन पूरे देश के लिए गर्व की बात है. वर्तमान समय में लड़केलड़कियां बराबर हैं. आज लड़कियां हर क्षेत्र में आगे हैं.

मैं लोगों से कहना चाहूंगी कि जब भी मौका मिले लड़कियों के लिए कुछ न कुछ जरूर करें. उन्होंने प्रेरित करें और उन का सहारा बनें. बेटियां परिवार के साथ देश का नाम भी रोशन करती हैं, यह सरगम ने सच कर दिखाया है.’’

भारतीयों के लिए गर्व का क्षण

शादी के बाद सरगम जब मुंबई आईं तब उन्हें मौडलिंग का चस्का चढ़ा. उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया और जल्द ही वे इंडस्ट्री में स्थापित हो गईं. उन के ससुराल वालों ने भी उन का पूरा साथ दिया. जब उन्होंने मिसेज वर्ल्ड प्रतियोगिता में भाग लेने का फैसला किया तो घर वालों ने उन का हौसला बढ़ाया. एक कठिन प्रतियोगिता जो कई राउंड में समाप्त हुई और जब स्टेज पर ‘मिसेज वर्ल्ड’ का नाम अनाउंस हुआ, तो अपना नाम सुन कर सरगम कौशल हैरान रह गईं. खिताब लेते वक्त उन की आंखों में आंसू थे. इमोशनल मोमैंट की झलक शेयर करते हुए  इंस्टाग्राम अकाउंट पर सरगम ने कैप्शन में लिखा, ‘‘लंबा इंतजार खत्म हुआ,

21 साल बाद हमारे पास ताज वापस आया है.’’उन की इस जीत से भारत का सिर फक्र से ऊंचा हुआ. भारतीयों के लिए वह गर्व का क्षण था. मिसेज वर्ल्ड दुनिया का पहला ऐसा ब्यूटी पेजैंट है, जिसे शादीशुदा महिलाओं के लिए बनाया गया है. इस की शुरुआत 1984 में हुई थी. पहले इस का नाम ‘मिसेज अमेरिका’ था, जिसे बाद में ‘मिसेज वूमन औफ द वर्ल्ड’ कर दिया गया. मगर 1988 में एक बार फिर इस का नाम बदला और इस आयोजन को ‘मिसेज वर्ल्ड’ का नाम दिया गया. पहला मिसेज वर्ल्ड खिताब जीतने वाली महिला श्रीलंका की रोजी सेनानायाके थीं.

पिछले दिनों सरगम अपने शहर जम्मू पहुंचीं जहां लोगों ने उन का जोरदार स्वागत किया. सरगम ने जम्मू के एक कार्यक्रम में अपनी खुशी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘लोगों के प्यार और मातापिता के आशीर्वाद से मुझे यह खिताब मिला. मैं महिलाओं से यही कहना चाहती हूं कि अपने लिए हमेशा प्लान बी भी तैयार रखें. मैं यदि मौडलिंग के क्षेत्र में नाम नहीं बना पाती तो मेरा प्लान बी टीचर बनना था. यदि एक रास्ता बंद होता दिखे तो बिना समय बरबाद किए दूसरा रास्ता ढूंढ़ने में ही समझदारी है.’’

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