जोड़ों के दर्द को न करें नजरअंदाज, हो सकता है गठिया बाय

हम सभी अपने जीवन में कभी न कभी जोड़ों के दर्द से पीडि़त होते हैं. हालांकि सभी जोड़ों के दर्द का मतलब यह नहीं है कि हम आर्थराइटिस से पीडि़त हैं. लेकिन 1 से अधिक जोड़ों में लगातार होने वाले दर्द को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. जोड़ों के दर्द को नजरअंदाज करने से जोड़ों में खराबी आ सकती है और परिणामस्वरूप उनमें विकृति आ सकती है. इसलिए चिकित्सीय सहायता जरूरी है.

इसके अलावा आर्थराइटिस के 200 विभिन्न प्रकार हैं. विभिन्न प्रकार के आर्थराइटिस में गंभीरता के विभिन्न स्तर होते हैं. आर्थराइटिस के विभिन्न प्रकारों में, गठिया बाय भारत में आर्थराइटिस का दूसरा सब से आम प्रकार है. गठिया बाय आर्थराइटिस का गंभीर प्रकार है क्योंकि यह सिर्फ जोड़ों का रोग नहीं है बल्कि यह त्वचा, आंखें, हृदय, फेफड़े और गुर्दे जैसे अन्य महत्वपूर्ण अंगों को भी प्रभावित करता है. गठिया बाय एक ऑटोइम्यून रोग है जिसका अर्थ है कि प्रतिरक्षा प्रणाली में कुछ समस्या है. गठिया बाय में रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली शरीर के स्वस्थ ऊतकों पर हमला करना शुरू कर देती है और दर्द और अन्य लक्षण जैसे सूजन और जकड़न का कारण बनती है. इससे शुरुआत में छोटे जोड़ प्रभावित होते हैं लेकिन बाद में शरीर के अन्य अंग भी प्रभावित हो सकते हैं.

गठिया बाय बहुत तेजी से आगे बढ़ता है और इसलिए शरीर के अन्य भागों में विकृति और जटिलताओं को रोकने के लिए प्रारंभिक अवस्था में गठिया बाय का निदान और उपचार करना आवश्यक है.

यहां कुछ लक्षण दिए गए हैं जो गठिया बाय को पहचानने और अपने डॉक्टर से परामर्श करने में मदद कर सकते हैं.

6 सप्ताह से अधिक समय से जोड़ों का दर्द

6 सप्ताह से अधिक समय से जोड़ों का दर्द जो आराम करने से कम नहीं हो रहा है और दिनों दिन बढ़ रहा है. एक से अधिक जोड़ों में दर्द हाथ, कोहनी और कंधे आदि के जोड़. आपके हाथों की उंगलियों के जोड़ और पैरों के तलवों में सूजन इसकी वजह से मुट्ठी बांधना और वस्तुओं को पकड़ना मुश्किल हो जाता है और लोगों से हाथ मिलाते समय भी दर्द होता है.

सुबह 1 घंटे से अधिक समय तक जोड़ों में अकड़न सुबह के समय जोड़ों में अकड़न होना जिस से बिस्तर से उठना और दैनिक कार्य करना मुश्किल हो जाता है.

परिवार में किसी भी व्यक्ति को गठिया बाय होना गठिया बाय वंशानुगत हो सकता है. यदि आपके किसी निकट संबंधी को गठिया बाय है तो संभावना है कि आपको भी यह हो सकता है.

थकान और हल्का बुखार

आप थकान का अनुभव करते हैं जो आराम करने से भी कम नहीं होता है और हल्का बुखार रहता है.

जोड़ों के दर्द के लिए दर्द निवारक दवा लेने की जरूरत है 

आपको दर्द नाशक दवाएं लेनी पड़ती हैं क्योंकि घरेलू उपचार से दर्द कम नहीं हो रहा है. दर्द नाशक दवाएं केवल लक्षणों में आराम देते हैं. इसमें खुद से दवा लेना उपयोगी नहीं होता है. यह समय है जब आप अपने डॉक्टर से परामर्श लें. डॉक्टर इसका सही निदान और उपचार करने में आपकी सहायता करेंगे.

6 सप्ताह से अधिक समय से जोड़ों का दर्द.

6 सप्ताह से अधिक समय से जोड़ों का दर्द जो आराम करने से कम नहीं हो रहा है और दिनों दिन बढ़ रहा है. एक से अधिक जोड़ों में दर्द हाथ, कोहनी और कंधे आदि के जोड़.

आपके हाथों की उंगलियों के जोड़ और पैरों के तलवों में सूजन इसकी वजह से मुट्ठी बांधना और वस्तुओं को पकड़ना मुश्किल हो जाता है और लोगों से हाथ मिलाते समय भी दर्द होता है.

सुबह 1 घंटे से अधिक समय तक जोड़ों में अकड़न सुबह के समय जोड़ों में अकड़न होना जिस से बिस्तर से उठना और दैनिक कार्य करना मुश्किल हो जाता है.

परिवार में किसी भी व्यक्ति को गठिया बाय होना गठिया बाय वंशानुगत हो सकता है. यदि आपके किसी निकट संबंधी को गठिया बाय है तो संभावना है कि आपको भी यह हो सकता है.

थकान और हल्का बुखार

आप थकान का अनुभव करते हैं जो आराम करने से भी कम नहीं होता है और हल्का बुखार रहता है.

जोड़ों के दर्द के लिए दर्द निवारक दवा लेने की जरूरत है

आपको दर्द नाशक दवाएं लेनी पड़ती हैं क्योंकि घरेलू उपचार से दर्द कम नहीं हो रहा है. दर्द नाशक दवाएं केवल लक्षणों में आराम देते हैं. इसमें खुद से दवा लेना उपयोगी नहीं होता है. यह समय है जब आप अपने डॉक्टर से परामर्श लें. डॉक्टर इसका सही निदान और उपचार करने में आपकी सहायता करेंगे.

अपने से कम ना समझें महिलाओ को

अफगानिस्तान के नए शासकों की लड़कियों की पढ़ाई को पूरी तरह बंद कर देने पर किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. अगर ईरान, सऊदी अरब, यूएई, कतर, इराक, लीबिया के बस में होता तो वे बरसों पहले यह कर देते पर इन तेल बेचने वाले देशों को पश्चिमी देशों को खुश रखना था और इसलिए उन्होंने आधाअधूरा इस्लामिक देश बनाए जिन में औरतों को कुछ छूट दी गई.

अफगानिस्तान के पास न अब तेल है, न वह रूस या चीन की सेना के लिए जरूरी है और इसलिए वह पूरा इस्लामिक देश बन गया है और इसलाम या किसी भी धर्म की पहली शर्त यही रहती है कि औरतें पढ़ें नहीं. सिर्फ बच्चे पैदा करें और धर्म की सेवा करें. ईसाई संसार में सदियों यही होता रहा पर वहां ङ्क्षप्रङ्क्षटग प्रेस आने के बाद नई सोच की लहर आई जिस से तकनीक बड़ी, रहने का ढंग सुधरा और साथ में औरतों को आजादी मिली. अफगानिस्तान को कुछ नहीं चाहिए. वे अपनी भेड़ों, पहाड़ों में होने वाली फसलें, इबादत और खूनखराबे में खुश हैं्र्र. तालिबानी लड़ाकू वहां न पढऩालिखना जानते हैं न कुछ बनाना. वे बस मारना जानते है. किसी तरह उन्होंने आधुनिक हथियारों को चलाना जरूर सीख लिया है. जितना पैट्रोल बंदूकें, तोपों, गाडिय़ां, टैंक, बारूद उन्हें चाहिए होता है वह उन्हें खेतों से निकली मादक दवाओं को और कालीन आदि बेंच कर मिल जाता है, वे आज कच्ची सडक़ों, कच्चे मकानों, हाथ के बुने कपड़ों में खुश हैं तो पश्चिमी देश हो या चीन, पाकिस्तान, रूस उन को किसी भी तरह समझाबुझा नहीं सकते.

यह नहीं भूलना चाहिए आज वहां जो औरतों के साथ हो रहा है उस के पीछे औरतों का ही हाथ है. मांए अपने लडक़ों को मरनेमारने के लिए पहले दिन से तैयार कर देती हैं. लडक़ों की मौत को अल्लाह की मर्जी मान लेती हैं. उन के कई बच्चे होते है, 2-4 मारे जाते हैं तो गम क्या. वे अपनी लड़कियों को खुद धर्म की कट्टरता के हमले करती हैं, उन की आजादी छीनती हैं, उन के बाहर निकलते पैरों को तोड़ डालती हैं. वे तालिबानियों लड़ाकों का सब से बड़ा सहारा है.

अफगान औरतों के सहारे अफगानिस्तान की इकौनोमी चलती है. वे कालीन बुनती है. फसल को संभालती है, जानवरों को पालती हैं. वे गुलाम है पर उन की और दूसरी औरते को गुलाम बनाए रखती हैं. लड़कियों को स्कूल न भेजने के फैसले के पीछे औरतें ही ज्यादा हैं. वे इस फैसले का विरोध करतीं तो मजाल है तालिबानी मर्द कुछ कर पाते. औरतों को सरेआम मारने पर बहुत औरतें तालियां बजाती है, वे ही उन औरतों की शिकायत करती हैं जिन्होंने गला घोंट राज का जरा सा भी विरोध करना चाहा. हर प्रौढ़, बूढ़ी औरत हर जवान औरत को समय से पहले ही बांध कर बूढ़ा कर देना चाहती है.

भारत में यही कोशिश रातदिन हो रही है, लड़कियां क्या पहनें, क्या खाएं. कहां घूमें, किसे दोस्त बनाएं, किस तरह आदी करें, किस तरह की बीवी बन कर रहे यह सब औरतें ही तय करती हैं, वे औरतें जो रातदिन धर्म की माला जपती है, हिंदू राष्ट्र के नाम पर वोट देती हैं. इस का आखिरी पढ़ाव अफगानिस्तान ही है, यह वे न भूलें.

ङ्क्षहदू राष्ट्र का मतलब मुसलिम मुक्त देश नहीं है, पंडा युक्त देश है जहां औरत को जब चाहे भगा लिया जाए, जब चाहे उस के नाककान काट लिए जाए. जब चाहो उस पर गंदे आरोप लगा दो, जब चाहो रेप कर दो, जब चाहे टुकड़ेटुकड़े कर दो, जब चाहो उसे खुद जमीन में धसने को मजबूर कर दो. तालिबानी सिर्फ काले रंग में नहीं होते. वे भगवा और सफेद में भी होते है.

फेयरनेस क्रीम के इस्तेमाल से पहले जान लें ये 5 बातें

कहा जाता है कि सुंदरता देखने वाले की आंखों में देखी जाती है, लेकिन सुंदरता आमतौर पर स्किन के रंग के संदर्भ में मापी जाती है और यह हमेशा देखा जाता है कि फेयर स्किन टोन को सुंदर का खिताब दिया जाता है. फेयर स्किन टोन के बिना, किसी को समाज में सम्मानजनक नहीं माना जाता है. ब्लैक स्किन टोन अभी भी समाज में अपनी जगह बनाने के लिए लड़ रहा है. भारतीय बाजार को ब्यूटी उत्पादों और विशेष रूप से फेयरनेस सोल्यूशन के लिए सबसे अच्छे और सबसे बड़े बाजारों में से एक माना जाता है लेकिन क्या आपको पता है कि इन क्रीम्स के इस्तेमाल से आपको कई तरह की एलर्जी भी हो सकती हैं…

1 खुजली की प्रौब्लम है आम

ब्यूटी क्रीम लगाने के सबसे सामान्य लक्षणों में से एक खुजली है. यह आम तौर पर ब्यूटी क्रीम के इस्तेमाल के बाद कुछ मिनटों में होता है. खुजली से स्किन लाल हो जाती है और इससे चकत्ते भी पड़ सकते हैं.

2 एलर्जी का रहता है खतरा

ब्यूटी क्रीम कई रसायनों और स्टेरौयड से बने होते हैं जिनके परिणामस्वरूप एलर्जी हो सकती है. अधिकांश स्किन एक ब्यूटी क्रीम के रासायनिक एजेंटों को सहन नहीं कर सकती है. इसके कारण लालिमा, स्किन में जलन, जलन, चकत्ते और बहुत सी समस्याएं होती हैं.

3 मुंहासे की प्रौब्लम है गंभीर

ब्यूटी क्रीम मुहांसों की गंभीर समस्या का कारण बनते हैं क्योंकि यह स्किन के छिद्रों को बाधित करता है. जिन ब्यूटी उत्पादों में तैलीय पदार्थ या लैनोलिन होता है, वे मुंहासे का कारण बनते हैं.

4 ड्राई स्किन पर हो सकता है ये नुकसान

स्किन के प्रकार को जानना बहुत ज़रूरी है क्योंकि ब्यूटी क्रीम को बिना जाने स्किन को ड्राई स्किन और झाइयों को जन्म दे सकता है.

5 स्किन का पतला होना

एक ब्यूटी क्रीम में मौजूद हानिकारक रसायन और स्टेरौयड स्किन को पतला बना देते हैं. पतली स्किन बहुत खतरनाक है क्योंकि यूवी किरणें सीधे स्किन में प्रवेश कर सकती हैं और इससे सनबर्न, पैच आदि हो सकते हैं.

ब्यूटी क्रीम में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स और स्टेरौयड का ज्यादा इस्तेमाल स्किन के लिए बहुत हानिकारक और खतरनाक है. स्किन को होने वाले नुकसान का स्थायी प्रभाव हो सकता है. ब्यूटी क्रीम का इस्तेमाल करने के बजाय, किसी को मूल स्किन टोन की सराहना करनी शुरू कर देनी चाहिए जो स्किन को चमकदार और खूबसूरत बनाने के लिए नेचुरल उपचार का इस्तेमाल करना चाहिए.

डौ. रोहित बत्रा, स्किन विशेषज्ञ, सर गंगा राम अस्पताल से बातचीत पर आधारित.

जब बीवी कमाए, पति उड़ाए

आमतौर पर पुरुषों का कार्यक्षेत्र घर की चारदीवारी के बाहर होता है और घरगृहस्थी की जिम्मेदारी महिलाएं ही संभालती हैं. लेकिन अब इस का उलटा भी हो रहा है. पत्नी नौकरी करती है और पति बेरोजगार हो कर घर के काम करता है. कुछ आलसी किस्म के पति आर्थिक दृष्टि से पत्नी की कमाई पर निर्भर रहते हैं ‘खुदा दे खाने को तो कौन जाए कमाने को’ के सिद्धांत पर चलने वाले पति ताउम्र निठल्ले पड़े रहते हैं. वे घरेलू कामकाज और बच्चों की देखभाल तो कर सकते हैं, पर कोई कामधंधा नहीं.

ऐसे पतियों को और उन की पत्नियों को सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि घर पर रहने वाले पतियों को होती है दिल की बीमारियां, जो उन्हें असमय ही मौत के मुंह में धकेल देती हैं.

घर पर रह कर बच्चों की देखभाल करने वाले पतियों को दिल की बीमारियां होने की संभावना बढ़ जाती है. यह बात अमेरिका में किए गए एक अध्ययन के बाद सामने आई है. घर में रह कर बच्चों की जिम्मेदारी संभालने वाले पतियों को दिल की बीमारी होने और उन की जल्दी मौत होने की संभावना बढ़ जाती है.

यह बात कार्य से संबंधित तनाव और कोरोनरी बीमारी के बारे में किए गए एक अध्ययन के दौरान भी सामने आई थी. घर पर रहने वाले पतियों के स्वास्थ्य को इस तरह का खतरा इसलिए होता है क्योंकि उन्हें अपने परिजनों, मित्रों और साथियों का समर्थन या सहयोग नहीं मिलता है, जबकि घर के लिए काम छोड़ने वाली अकेली कमाऊ महिलाओं को हर तरह से वाहवाही मिलती है.

हमेशा तनाव में रहना

फिर पुरुषों पर यह भी सिद्ध करना होता है कि वे महिला से बेहर काम कर सकते हैं, इसलिए भी वे सदैव तनाव में रहते हैं. एक अध्ययन लगातार 10 वर्ष तक 18 वर्ष से ले कर 77 साल तक के 2,682 पतियों पर किया गया. इस अध्ययन से यह भी पता चला कि घर पर ही रहने वाले पति अपने अन्य हमउम्र लोगों की अपेक्षा 10 वर्ष पहले मर जाते हैं. अध्ययनकर्ताओं ने इन पतियों की उम्र, रक्तचाप कोलैस्ट्रौल, वजन, मधुमेह और धूम्रपान करने की आदत को जब आधार बनाया, तब भी इस अध्ययन के परिणाम सही निकले.

कम आय प्राप्त करने वाले या पढ़ाई बीच में ही छोड़ने को मजबूर होने वाले पुरुषों को भी दिल की बीमारी होने और समय से पूर्व का ग्रास बन जाने की संभावना अधिक होती है. अच्छी आय प्राप्त करने वाले पुरुषों जैसे डाक्टरों, वकीलों, इंजीनियरों, आर्किटैक्ट और शिक्षकों को दिल की बीमारी होने का खतरा तो होता है, पर अधिक नहीं.

आसान नहीं तलाक लेना

पत्नियों को यह याद रखना चाहिए कि वे निठल्ले पति से तलाक नहीं ले सकती क्योंकि भारतीय अदालतें हिंदू औरतों को पति सेवक आज भी मानती हैं और उन के लिए पति तो जन्मों का साथी होता है चाहे कोढ़ी हो, वेश्यागासी हो. निठल्ले पति का आवरण भी पत्नी के लिए अच्छा रहता है क्योंकि न से तो वह है और दूसरे हाथ मारते हुए डरते हैं. यही सामाजिक परंपराएं कई निठल्ले पतियों को उग्र बना देती हैं. वे मारपीट का सहारा भी लेने लगते हैं.

निठल्ले पतियों की मौत जल्दी भी इसलिए होती है कि न पत्नी, न बच्चे ऐसे जने की देखभाल ढंग से करते हैं. जरूरत पड़ने पर उन्हें इग्नोर किया जाता है. हां एक बार मद्रास उच्च न्यायालय ने हिम्मत दिखा कर बेरोजगार पति को कमाऊ पत्नी से गुजाराभत्ता दिलाने से इनकार कर दिया था जो पत्नी से अलग रहता था. ऐसे पति छोटी बीमारी भी कई बार नहीं बता पाते.

Holi 2023: हां सीखा मैं ने जीना- भाग 2

नवनी ने जब पिकनिक की बात पति दिव्य और बेटी सौम्या को बताई तो दोनों ने मुंह बिचका दिए.

“पिकनिक और वह भी उन गंवारू औरतों के साथ? मौम प्लीज… अपने बोरिंग प्रोग्राम्स से मुझे तो कम से कम दूर ही रखा करो… वैसे भी मैं फ्रैंड्स के साथ मूवी देखने जा रही हूं… प्लीज… सौरी…” सौम्या ने अपना फैसला सुना दिया.

“तुम भी न यार, उड़ते तीर लेती फिरती हो… पता नहीं कहां से यह समाजसेवा का भूत सवार हुआ है… अरे भई, सप्ताह का एकमात्र दिन जब मुझे घोड़े बेच कर सोने को मिलता है… वह भी मैं तुम्हारे सिरफिरे कार्यक्रम की भेंट चढ़ा दूं… इतना बेवकूफ मैं बेशक दिखता हूं लेकिन हूं नहीं…” दिव्य ने भी उसे टका सा जवाब दे कर हमेशा की तरह जमीन दिखा दी. लेकिन आज नवनी निराश नहीं हुई. कुंतल का मुसकराता हुआ चेहरा उसे प्रोत्साहित कर रहा था. वह तैयारी में जुट गई.

महीने के लास्ट संडे को शहर के शोरशराबे से दूर एक फौर्महाउस में पिकनिक पर जाना निश्चित किया गया. संस्था से जुडी महिलाओं के लिए एक बड़ी बस किराए पर ली गई. नवनी और कुंतल ने कुंतल की गाड़ी से जाना निश्चित किया.

संडे को जब सब पिकनिक जाने के लिए औफिस के कंपाउंड में जमा हुए तो नवनी देखती ही रह गई. संस्था की यूनिफार्म से बिलकुल अलग, विभिन्न तरह के रंगों में सजी महिलाएं काफी खूबसूरत लग रही थीं. कुछ खुद के ओढ़े हुए और कुछ परिवारसमाज के बांधे हुए बंधनों से आजाद पहली बार यों बेफिक्री से सिर्फ खुद के लिए जीने के एहसास मात्र से सब के चेहरे खिले हुए थे. सब को टटोलती हुई उस की आंखें सीधे जा कर कुंतल पर टिक गईं. आसमानी रंग की टीशर्ट और काली जींस में वह काफी कूल दिख रहा था. नवनी कुंतल की तरफ बढ़ गई.

“आइए नवनीजी, आप ही का इंतजार हो रहा था. आप के परिवार वाले दिखाई नहीं दे रहे… कहां हैं? मिलवाइए न…” कुंतल ने अपनी चिरपरिचित मुसकान बिखेरी.

“जी वे लोग नहीं आए… लेकिन मैं हूं न… सब की कमी पूरी कर दूंगी… लेकिन दिखाई तो आप भी अकेले दे रहे हैं… मैडम कहां हैं?” नवनी ने प्रश्न के जवाब में प्रश्न उछाल दिया.

“परिवार से दूर हूं इसलिए तो यहां परिवार तलाश रहा हूं,” कुंतल ने भी नहले पर दहला मारा और दोनों खिलखिला दिए. गाड़ियां गंतव्य की ओर चल दीं. नवनी और कुंतल गाड़ी की पिछली सीट पर बैठे थे. रास्तेभर दोनों ग्रामीण क्षेत्रों के विकास से जुड़े मुद्दों और सरकारी लाभ से वंचितों की दशादुर्दशा पर गंभीर बातचीत में लगे रहे. तभी अचानक एक ब्लाइंड मोड़ पर गाड़ी घूम गई. लापरवाही से बैठी नवनी लुढ़क कर कुंतल के सीने से जा लगी.

“जरा संभाल कर गाड़ी चलाओ यार, मैडम को लग जाती तो?” कुंतल अपने ड्राइवर पर नाराज हुआ.

“कोई बात नहीं… उस ने भी कहां जानबूझ कर ऐसा किया है… हो जाता है कभीकभी…” नवनी ने उसे शांत रहने का इशारा किया. ड्राइवर ने आगे चलती बस के रुकते ही गाड़ी रोक दी.

“ओसम, नेवर सीन बीफोर…” कुंतल ने गाड़ी से बाहर निकलते ही मौसम को देख कर अपनी प्रतिक्रिया दी. नवनी सिर्फ मुसकरा दी. बारिश तो नहीं हुई लेकिन आसमान में अच्छेखासे काले बादलों की आवाजाही थी. ठंडीठंडी हवा शरीर को सिहरा कर अपने होने का एहसास दिला रही थी. महिलाओं ने शुरुआती संकोच के बाद इतनी मस्ती करनी शुरू की कि सारा वातावरण उन्मुक्त खिलखिलाहटों से गूंज उठा. तरहतरह के आंचलिक खेलों और गीतसंगीत ने समां बांध दिया. उस के बाद लंच के लिए जब सब ने अपनीअपनी पोटलियां खोलीं तो छप्पन भोग का नजारा साकार हो उठा. सब ने ठेठ देसी व्यंजनों का जीभर कर लुत्फ उठाया. कुंतल तो कितनी ही देर तक नवनी को मोहक नजरों से ताड़ता हुआ अपनी उंगलियां चाटता रहा. वह आंखों ही आंखों में उसे इस सफल आयोजन के लिए बधाई दे रहा था.

वापसी में थकी हुई नवनी कुंतल के कंधे पर लुढ़क गई. उस के बालों की लापरवाह लटें कुंतल के चेहरे से अठखेलियां करने लगी. तभी एक ढीठ लट कुंतल के नाक में सरसराई. कुंतल जोर से छींक पङा. नवनी ने हड़बड़ा कर आंखें खोलीं और “सौरी” कहते हुए अपनेआप को दुरुस्त किया. ऐसी परिस्थिति में भी कुंतल को मसखरी ही सूझ रही थी.

नवनी ने पिकनिक पर कुंतल की विभिन्न मुद्राओं को चुपकेचुपके अपने कैमरे में कैद कर लिया था. उस ने कुछ पिक्स छांट कर उसे व्हाट्सऐप पर भेजे.

“इन में से किसी को डीपी पर लगाइए न,” एक मनुहार भरा टैक्स्ट भी लिखा.

“वह भी आप ही सिलैक्ट कर दीजिए,” कुंतल चुहल का कोई मौका नहीं छोड़ता था.

“तो फिर इसे लगाइए,” नवनी ने भी मजाक को आगे बढ़ाते हुए खुद की एक पिक भेज कर कहा.

“कभी मौका मिला तो आप की यह इच्छा भी अवश्य पूरी करेंगे,” कुंतल ने आंख दबाती हुई इमोजी के साथ टैक्स्ट भेजा तो नवनी ने चैट बंद करने में ही भलाई समझी.

दिन बीत रहे थे. नवनी अपनी संस्था में बने उत्पाद सब से पहले क्वालिटी चैक करने के लिए कुंतल को टैस्ट करवाती थी. उस के पास करने के बाद ही वह मार्केट में बिक्री के लिए जाते थे. नतीजन, उत्पादों की गुणवत्ता में निरंतर सुधार होने लगा और इस के साथ ही संस्था को मिलने वाले और्डर्स में भी बढ़ोत्तरी हो रही थी. सरकारी अनुदान और अन्य सोर्स से मिलने वाली सहायता राशि में भी कुंतल उस की भरपूर मदद करता था.

एक तरफ जहां कुंतल के सहयोग और मार्गदर्शन से नवनी की संस्था ने अपना एक खास मुकाम बना लिया था, वहीं दूसरी तरफ औपचारिक ‘हायहैलो’ से शुरू हुई उन की चैटिंग भी धीरेधीरे अंतरंग होने लगी. हालांकि सार्वजनिक रूप से मिलने पर दोनों का आपसी व्यवहार बहुत ही संयमित और व्यावसायिक होता था लेकिन मोबाइल पर उन की छेड़छाड़ लगातार जारी रहती थी. हर बार एक कदम आगे बढ़ जाती नवनी सोचती थी कि बस, अब और नहीं… अब उसे अपने कदम रोक लेने चाहिए लेकिन दिल्लगी तो धीरेधीरे दिल की लगी में बदलती जा रही थी. कमोवेश यही हाल कुंतल का भी था. किसी रोज यदि नवनी का मैसेज न आए तो उसे बेचैनी होने लगती थी. बारबार मोबाइल चैक करता कुंतल आखिर झुंझला कर उसे मैसेज करता तो नवनी अपनेआप पर इतरा उठती. और फिर यों ही एक दिन फोन पर ही प्रेम का इजहार और इकरार भी हो गया.

बेचैनी, बेकरारी और तड़प दोनों से ही सही नहीं जा रही थी. 2 बेताब दिल एकांत में मिलने के बहाने तलाशने लगे. “अगले महीने के लास्ट संडे को दिल्ली में एक सैमिनार है. वैसे तो उस में प्रोजैक्ट औफिसर और ब्लौक अधिकारी लैवल के लोग ही शामिल होंगे लेकिन कुछ एनजीओ संचालकों को भी आमंत्रित किया जाएगा. क्या आप आना चाहेंगी?” एक दिन कुंतल ने नवनी को मैसेज किया.

“आप कहें और हम न आएं… ऐसे तो हालात नहीं…” नवनी ने अपनी आदत के अनुसार गाने की पंक्तियों से उसे रिप्लाई दिया.

“तो ठीक है… 2 दिन का प्रोग्राम है… पूरी तैयारी के साथ आइएगा… और हां, आज के बाद मेरे नाम के साथ यह जी जी… वाला पुछल्ला मत लगाना प्लीज,” कुंतल ने टैक्स्ट के साथ आंखें दबाती इमोजी भेजी.

“वह तो ठीक है लेकिन आयोजक तो मुझे जानते तक नहीं, फिर मुझे वहां क्यों बुलाया जाएगा?” नवनी ने मन में उभरे सवाल को साझा किया.

तुम्हें आम खाने हैं या पेड़ गिनने? इनविटेशन तुम तक पहुंच जाएगा. तुम तो बस मिलने की तैयारी करो,” कुंतल ने उस के सारे सवालों को एक ही जवाब में समेट दिया.

“तो ठीक है साब, वैसे भी हमें तो सिर्फ आप से ही… सौरीसौरी, आम से ही मतलब है.”

“तो क्या यह आम इस बंदे को भी चूसने मिलेंगे?” कुंतल शरारत के मूड में था.

“धत्त, बेशर्म कहीं के…” नवनी लाज से गड़ गई और चैट बंद कर दी लेकिन दिल तो मिलन की कल्पना से ही गुदगुदा उठा था.

क्या है शेफ गरिमा अरोड़ा के जीवन के ‘लो फेज’, पढ़े इंटरव्यू

मुंबई की शेफ गरिमा अरोड़ा ने इस मुकाम पर पहुँचने के लिए काफी संघर्ष किये है. पहले वह एक फार्मा जौर्नलिस्ट थी, लेकिन उन्हें तरह के खाना बनाना पसंद रहा. वह अपनी कुकिंग स्किल्स बढ़ाने के लिए वर्ष 2008 में पेरिस गई. असल में गरिमा के माता-पिता चाहते थे कि वह दुनिया की बेहतरीन डिशेज बनाना सीखें. वहां उन्होंने कई जानी – मानी शेफ के साथ काम किया, जिसमे शेफ गगन आनंद, गॉर्डोन रामसे आदि है. ग्रेजुएशन के बाद करीब एक साल तक शेफ गगन आनंद के रेस्तरां में काम करने के बाद उन्होंने बैंकाक में अपनी रेस्तरां खोली और इंडियन कुइजिन को प्रधानता दी.

उन्हें वर्ष 2018 में मिचेलिन स्टार का ग्रेड मिला, यह एक रेटिंग सिस्टम है, जिसके तहत रेस्तरां की गुणवत्ता की ग्रेडिंग की जाती है. गरिमा को 26 मार्च को एशिया के 50 बेस्ट रेस्तरां की सेरेमनी में यह अवॉर्ड दिया गया. इस पुरस्कार को पाने वाली वह पहली महिला शेफ बनी, जिसे इस अवार्ड से नवाजा गया. गरिमा की मेन्यू में काफी विभिन्नता है, यही वजह है कि लोग उनतक पहुँचते है. यहाँ कस्टमर्स 10-14 कोर्स का टेस्टिंग मेन्यू चुन सकते हैं. डक डोनट और रोटी-अचार के साथ जैकफ्रूट उनके यहां काफी पसंद किया जाता है. भारतीय की गरिमा अरोड़ा का एशिया की सर्वश्रेष्ठ महिला शेफ चुनी जाना उनके लिए गर्व की बात थी. इस समय गरिमा आबुधाबी में सोनी टीवी पर मास्टर शेफ इंडिया में शूटिंग कर रही है. उनसे हुई बातचीत के अंश इस प्रकार है.

पसंद है मुझे वैरायटी

गरिमा कहती है कि टीवी पर मास्टर शेफ इंडिया का मेरा पहला सीजन है, पहली बार मैं टीवी के सामने हूँ. मेरे लिए सब कुछ नया है. बहुत रुचिपूर्ण और मोटिवेट करने वाली ये शो है. टैलेंटेड होम कुक्स को देखने का ये मौका मेरे लिए बहुत अधिक अच्छी है. इसमें भाग लेने वाले सभी शेफ अलग-अलग कम्युनिटी से आये है और कम्युनिटी पकवान को सबके साथ शेयर कर रहे है. सबमे बहुत उत्साह है और मुझे इंडियन खाने में इतनी वैरायटी और प्राइड देखने को मिलेगी, ये पता नहीं था. 15 साल बाद मैं इंडिया में कुछ कर रही हूँ और मेरे लिए ये बहुत अधिक ख़ुशी की बात है.

सही सपोर्ट सिस्टम

गरिमा आगे कहती है कि शेफ में पुरुष और महिला में कोई अंतर नहीं होता, दोनों की चुनौतियाँ एक जैसी ही होती है. महिला शेफ के चेलेंज पुरुष शेफ से नहीं होती, उनके आसपास के लोगों से आते है. असल में सबकी स्किल और ड्रीम्स अलग होती है. सबके गोल्स भी पता होते है. समस्या तब आती है, जब आपके परिवार वाले आपको सपोर्ट नहीं करते. हमेशा मैंने देखा है कि औरतों को उनके आसपास के लोग रोकते है, उनकी एबिलिटी कभी उन्हें आगे बढ़ने से नहीं रोकती. मेरे लिए लकी ये है कि मेरे माता-पिता, पति, भाई सभी ने मेरा साथ दिया है. मैंने जो भी अचीव किया है, वह महिला या पुरुष होने से नहीं मेरे सपोर्ट सिस्टम की वजह से है. कोविड का समय था कठिन कठिन समय के बारें में गरिमा का कहना है कि एक उद्यमी के जीवन में बहुत सारी बाधाएं या समस्याएं आती है, लेकिन एक शेफ की जीवन में इतनी कठिन परिस्थियाँ नहीं आती है.

मेरे लिए कोविड के दो साल बहुत मुश्किल भरे थे. जब पूरा व्यवसाय खुद सम्हालना पड़ा, तब केवल अपने लिए नहीं, बल्कि 40 एम्प्लोयी का भी ध्यान रखना पड़ा. उनके वित्तीय समस्या को देखना पड़ा. तब उनकी समस्या मेरी समस्या हो गई. उन डेढ़ सालों तक मैं बैंकाक में अकेली थी, मेरे पति साथ में नहीं थे, मेरे पेरेंट्स मुझे देख नहीं पा रहे थे. उन डेढ़ साल तक मेरी और बाकी सभी की उत्तरदायित्व को लेना कठिन समय था, लेकिन उससे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला. हर एक ‘लो मोमेंट’ एक पाठ जरुर पढ़ाती है, क्योंकि वही आपको एक शेप में लाती है, सुदृढ़ बनाती है और वही आपके चरित्र का निर्माण भी करती है.

बेकाबू: बिग बॉस 16 के बाद शालीन भनोट के हाथ लगा बड़ा प्रोजेक्ट, देखें प्रोमो

‘बिग बॉस 16’ के जरिए सुर्खियां बटोरने वाले एक्टर शालीन भनोट और एक्ट्रेस ईशा सिंह जल्द ही कलर्स टीवी के सीरियल ‘बेकाबू’ में नजर आने वाले हैं. शो सुपरनैचुरल शक्तियों पर आधारित है. इसमें जहां शालीन भनोट (Shalin Bhanot) राक्षस के रोल में दिखाई देंगे तो वहीं ईशा सिंह परी की भूमिका अदा करती नजर आएंगी. खास बात तो यह है कि ‘बेकाबू‘ (Beqaboo) से जुड़ा प्रोमो वीडियो भी रिलीज हो चुका है, जिसे देख फैंस की एक्साइटमेंट सातवें आसमान पर पहुंच गई है. इस प्रोमो वीडियो को देखकर फैंस ने न केवल जमकर प्यार लुटाया, बल्कि शो के शुरू होने का बेसब्री से इंतजार करते नजर आए.

शालीन भनोट और एक्ट्रेस ईशा सिंह का ‘बेकाबू’ राक्षस और परी की प्रेम कहानी है. प्रोमो वीडियो के मुताबिक, राक्षस लोक को रोकने और उसका प्रभाव धरती से खत्म करने के लिए धरती पर एक परी उतरेगी। जो किसी और से नहीं बल्कि शालीन भनोट के किरदार से टक्कर लेती नजर आएगी. प्रोमो वीडियो में दिखाया गया कि जब इनकी शक्तियां आपस में टकराएंगी तो पूरी कायनात ‘बेकाबू’ हो जाएगी.

 

 

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बेकाबूका प्रोमो देख फैंस ने दिया रिएक्शन

‘बेकाबू’ का प्रोमो वीडियो देखने के बाद फैंस भी जमकर तारीफें कर रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “वीएफएक्स काफी अच्छा है, इससे यह बिल्कुल असली लग रहा है. यह एक शानदार शो होने वाला है.” वहीं दूसरे यूजर ने चुटकी लेते हुए लिखा, “बिग बॉस 16′ के बाकी कंटेस्टेंट्स केवल बाइट दे रहे हैं. यहां शालीन का पूरा एक सीरियल आ चुका है.” एक यूजर ने शालीन की तारीफ करते हुए लिखा, “यह इस रोल को धमाकेदार बनाने वाला है. क्योंकि इसमें शालीन को पॉजिटिव और नेगेटिव, दोनों ही किरदार निभाने पड़ेंगे. शालीन की फिटनेस इस रोल पर काफी सूट होगी.”

शिवांगी जोशी और जैन इमाम करेंगे कैमियो

‘बेकाबू’ को लेकर खबर आ रही है कि शो में शिवांगी जोशी और जैन इमाम भी एंट्री करेंगे. हालांकि इसमें उनका कैमियो होगा. लेकिन इस बात की अभी तक पुष्टि नहीं हो पाई है.

परियों और राक्षसों की दुनिया

रिपोर्ट के अनुसार, यह शो परियों और राक्षसों की दो अलग-अलग दुनिया के इर्द-गिर्द घूमता है. शो में परी की भूमिका निभाने को लेकर अपनी उत्तेजना व्यक्त करते हुए, ‘एक था राजा एक थी रानी’ की अभिनेत्री ईशा सिंह ने साझा किया, मैं परी की भूमिका निभाने को लेकर रोमांचित हूं. यह एक ड्रीम रोल है, जो चैनल में मेरी घर वापसी का प्रतीक है, जिसने टेलीविजन पर फैंटेसी जेनरे को अग्रणी बनाया है.

मोनालिसा का होगा अलग लुक 

दूसरी ओर कई भोजपुरी, हिंदी, बांग्ला, ओडिया, तमिल, कन्नड़ और तेलुगू भाषा की फिल्मों में काम करने वाली मोनालिसा ने कहा कि वह एक नई शैली को खोजने और एक नकारात्मक किरदार निभाने में खुश हैं. मुझे पूरी तरह से अलग लुक में देखा जाएगा और मैं यह जानने के लिए इंतजार नहीं कर सकती कि दर्शक इसके बारे में क्या सोचते हैं.

 

अनुज की गलती की सजा भुगतेगा परिवार! बढ़ेगी अनुपमा की मुश्किलें

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना का ‘अनुपमा’ इन दिनों काफी सुर्खियों में बना हुआ है. शो ने टीआरपी लिस्ट में तो नंबर वन पर जगह बनाई ही है, साथ ही यह दर्शकों के दिलों में भी बखूबी बस चुका है. ‘अनुपमा‘ (Anupama) में आने वाले ट्विस्ट और टर्न्स से न केवल टीआरपी रेटिंग पर असर पड़ता है, बल्कि दर्शकों पर भी इसका काफी असर पड़ता है. बीते दिन ‘अनुपमा’ में दिखाया गया कि अनुज, छोटी और माया के साथ पिकनिक पर एंजॉय करता है. वहीं शाह हाउस में सबके साथ होकर भी अनुपमा का दिल उन दोनों में ही लगा रहता है. वह अनुज से बात भी करती है, लेकिन छोटी गेम के चक्कर में उसे बात नहीं करने देती और यह बात अनुपमा को पसंद नहीं आती. लेकिन गौरव खन्ना (Gaurav Khanna) के ‘अनुपमा’ में आने वाले ट्विस्ट यहीं पर खत्म नहीं होते हैं.

 

कपाड़िया हाउस में एक महीने और डेरा डालेगी माया

‘अनुपमा’ में माया अनुज को इमोशनल ब्लैकमेल करती है. वह उससे कपाड़िया हाउस में एक महीना और रहने की गुजारिश करती है. माया अनुज से कहती है कि यह एक महीना किसी का भी आखिरी हो सकता है, इसलिए मैं तुमसे यह मोहलत मांग रही हूं. माया की बातें सुनने के बाद अनुज भी उसे वहां एक महीने और रहने की इजाजत दे देता है.

 

अनुज करेगा बड़ी गलती

आज के एपिसोड में अनुपमा शाह हाउस में तो माया पिकनिक पर मनवा लागे गाने पर डांस करती है. अनुपमा डांस करते हुए अनुज को याद करती है तो अनुज माया में अनुपमा को देखता है. दोनों का ही डांस देखकर सभी लोग तालिया बजाते हैं।उधर माया मौका मिलते ही अनुज के पास पहुंच जाती है. वो अनुज से डांस के बारे में पूछती है तो अनुज उसकी तारीफ करता है. माया कहती है कि आज वो बहुत खुश है क्योंकि उसने बहुत सारा समय अपनी बेटी के साथ बिताया लेकिन अब 15 दिन खत्म होने वाले हैं और मैं नहीं चाहती हूं कि उसे किसी एक को चुनना पड़े। माया अनुज से 1 महीने का और समय मांगती है। वो अनुज पर बहुत दबाव बनाती है और अनुज हां कर देता है.

अनुपमा के खिलाफ अनुज के कान भरेगी माया

रुपाली गांगुली (Rupali Ganguly) के ‘अनुपमा’ में दिखाया जाएगा कि माया अनुपमा के खिलाफ अनुज के कान भरने की कोशिश करेगी. वह कहेगी कि अनुपमा को भी यहां होना चाहिए था, लेकिन उसके भी तीन बच्चे हैं. अनुज पहले तो अनुपमा की माया के सामने तारीफ करेगा, लेकिन बाद में बोल पड़ेगा कि मैंने अनुपमा की स्थिति देखकर उससे शादी की थी. पहले केवल मैं था, लेकिन अब मेरे साथ मेरी बेटी भी है. अनुज के मन की भड़ास देखकर माया मन ही मन खुश हो जाएगी. वहीं जब अनुपमा अनुज के पास फोन करेगी तो माया फोन काटकर उसे छुपा देगी.

 

वनराज कहेगा अनुपमा से गलत बात

माया अनुज के सामने अनुपमा को बेचारी कहती है लेकिन अनुज कहता है कि वो मेरे कहने पर नहीं आई है, क्योंकि वो बहुत अच्छी है, वो किसी को भी न नहीं कहती है और लोग इसी बात का फायदा उठाते हैं. तभी अनुपमा अनुज को फोन करती है लेकिन माया काट लेती है , जो जानबूझकर अनुपमा का फोन नहीं उठाती है. अनुपमा को परेशान देखकर वनराज उसके पास पहुंच जाता है और अनुपमा को थैंक्यू बोलता है. वो कहता है कि बहुत दिनों बाद बच्चों को हंसते हुए देखा है…बरसो बाद गुजरा हुआ पल लौट कर आ गया.

 

बच्चे गोद लेने की प्रक्रिया

जब बच्चे न हो रहे हों तो आसपास के लोग कहने लगते है कि किसी को गोद ले लो. गोद लेने की सलाह देेने वाले नहीं जानते कि यह प्रोसीजर बहुत पेचीदा और सरकारी उलजुलूल नियमों वाला है जिस में आमतौर पर गोद लेने वाले मांबाप थक जाते हैं. कुछ ही महीनों, सालों की मेहनत के बाद एक बच्चा पाते हैं और उस में भी चुनने की गुंजाइश नहीं होती क्योंकि कानून समझता है, जो सही भी है, कि छोटे बच्चे कोई खिलौने नहीं है कि उन्हें पसंद किया जाए.

इस से ज्यादा मुश्किल गोद हुए बच्चे की होती है. वह नए घर में कैसे फिट बैठता है, यह पता करना असंभव सा है. अमेरिका की अनुप्रिया पांडेय ने कुछ बच्चों से बात की जिन्हें बचपन में भारत से गोद लिया गया था और वे अमेरिका में गोरोंकालों के बीच बड़े हुए. इन में से एक है लीला ब्लैक अब 41 साल की है. 1982 में उसे अकेली अमेरिकी नर्स ने एडोप्ट किया था. लीला ने अपना बचपन एक कौन पिताक्ट में गुजारा पर उसे खुशी थी कि जिस तरह उस की 2 माह की उम्र में हालत थी, वह बचती ही नहीं. अब अमेरिकी प्यार भी मिला, सुखसुविधाएं और हीयङ्क्षरग लौस व सेरीब्रल प्लासी रोग का ट्रीटमैंट भी.

2 बच्चों की एक अमेरिकी गोरे युवक से शादी के बाद लीला ने अपनी जड़ें खोजने की कोशिश की. उस ने भारतीय खाना बनाया, खाया, भारत की सैर 2-3 बार की, होलीदीवाली मनाई, अपने डीएनए टैस्ट से अपने जैसे 3-4 कङ्क्षजस को ढूंढा (न जाने वे चचेरे भाईबहन थे या नहीं पर भारतीय खून उन में है). अमेरिका में हर साल 200 से ज्यादा बच्चे भारत से एडोप्ट किए जाते हैं और उन की एक बिरादरी सी बन गई है. भारत में गोद लिए गए बच्चों के सामने मांबाप से मिलतेजुलते रंग, भाषा, कदकाठी के अलावा जाति का सवाल भी आ खड़ा होता है. कुंडलियों में आज भी विश्वास रखने वाला ङ्क्षहदू समाज यहां किसी भी गोद लिए बच्चो को आसानी से अपने में मिलाता है. पिछले जन्म के कर्मों का फल सोच कर हमेशा भारी रहता है.

अमेरिका यूरोप उदार देश हैं वहां जो भी कहीं से भी आएं. उन्हें खुले मन से स्वीकार किया जाता है पर फिर भी इशूस होते है. नैटफ्लिक्स पर चल रही ‘रौंग साइड औफ ट्रैक’ में एक स्पेनिश परिवार द्वारा नियटनामी लडक़ी को गोद लेना जो बड़ी हो कर विद्रोही हो जाते है, बहुत अच्छी तरह से दिखाया गया है. इस सीरीज में मुख्य पात्र दादा होता है जो इस वियटनामी लडक़ी के चीनी फीचर्स का मजाक उड़ाता है पर जब वह ड्रग टे्रडर्स के चुंगल में फंसने लगती है तो अपनी जान की बाजी लगा कर, पुलिस की आंखों में धूल डाल कर, पोती को बचा कर निकलता है जबकि उस को गोद लेने कभी उस की बेटी उस से तंग आ कर उसे किसी मंहगे होस्टल में भेजना चाह रही थी.

अब जब अकेलों की संख्या बढ़ रहे है. अनाथ कम हो रहे हैं, भारत में गर्भपात की सुविधाएं हैं, गोद लिए जा सकने वाले बच्चे कम मिलेंगे पर जो मिलेंगे उन्हें सही वातावरण मिलेगा, संदेह है. हम मूलत: कट्टरपंथी हैं और गोद लेने में मरने के बाद, मरने की रीतिरिवाजों की फिक्र ज्यादा रहती है, बजाए ङ्क्षजदगी के खालीपन को भरने की.

टेस्टी बाइट्स: पनीर भुर्जी सैंडविच

ब्रेकफास्ट करना बेहद जरूरी है लेकिन यह अक्सर मिस हो जाता है क्योंकि सुबह-सुबह इतना टाइम नहीं मिल पाता. हम आपको बताने जा रहे हैं, झट से तैयार होने वाले हेल्दी टेस्टी पनीर भुर्जी सैंडविच की रेसिपी.

सामग्री

– 200 ग्राम पनीर

– 1/2 कप हरीपीली शिमलामिर्च बारीक कटी

– 2 चम्मच अदरक व हरीमिर्च बारीक कटी

– 1/4 कप प्याज बारीक कटा

– 1/2 कप बीज रहित टमाटर छोटे क्यूब में कटा

-1/2 छोटा चम्मच कालीमिर्च पाउडर

– 1 चम्मच धनियापत्ती बारीक कटी

– 1 बड़ा चम्मच रिफाइंड औयल

– 8 ब्रैड स्लाइस

-50 ग्राम मक्खन

– नमक स्वादानुसार.

विधि

एक नौनस्टिक पैन में तेल गरम कर के प्याज भूनें. इस में अदरकहरीमिर्चटमाटर और शिमलामिर्च डाल कर थोड़ा गलने तक पकाएं. फिर पनीर को हाथों से क्रंबल कर के मिलाएं और नमक भी डाल दें. मध्यम आंच पर 5 मिनट उलटेपलटें. अब इस में कालीमिर्च पाउडर व धनियापत्ती मिला कर मिश्रण ठंडा करें. ब्रैड स्लाइसेज में मक्खन लगा कर पनीर भुर्जी की लेयर लगाएं और सैंडविच तैयार करें. ग्रिल कर के मनपसंद सौस के साथ सर्व करें.

2- बालिनेज रा मैंगो प्रौंस

सामग्री

– 100 ग्राम कच्चे आम के टुकड़े

-3 ग्राम फ्रैश रैड चिली जूलिएन

– 10 ग्राम गाजर कटी

– 4 पत्तियां काफिरलाइम की

-15 ग्राम धनियापत्ती कटी

– 10 ग्राम पात्र जिग्गेरी

– 10 एमएल सेब का सिरका.

सामग्री फ्राई की

– 250 ग्राम मीडियम आकार के प्रौंस

– 20 ग्राम प्याज का जूलिएन

-5 ग्राम अदरक का जूलिएन

– थोड़ा से करी पत्ते

– 10 ग्राम अंकुरित फलियां

– 10 ग्राम हरा प्याज

– 5 ग्राम मूंगफली भुनी

– 10 एमएल लाइट सोया सौस

– 5 एमएल फिश सौस

– 15 ग्राम भीगी गिलास नूडल्स

–  8 ग्राम मद्रास करी पाउडर

-थोड़ी सी पुदीनापत्ती कटी

-20 एमएल औयल

– 2 चम्मच पानी

– नमक स्वादानुसार.

विधि

रा मैंगो स्ला बनाने के लिए सारी सामग्री को अच्छी तरह मिक्स कर के 2 घंटों के लिए एक तरफ रख दें. फिर एक कड़ाही में तेल डाल कर प्याजअदरक और कड़ी पत्ते डाल कर 2 मिनट तक भूनें. फिर इस में प्रौंस और अंकुरित फलियों में 2 चम्मच पानी डाल कर पकने तक चलाएं. फिर मूंगफलीकाजूसोया सौसफिश सौसनमकहरा प्याजनूडल्समद्रास करी पाउडर डाल कर अच्छी तरह मिक्स करें. जब प्रौंस मिक्सचर अच्छी तरह पक जाए तो उसे आंच से उतार कर उस में रा मैंगो स्ला डाल कर 10 सैकंड तक पकाएं फिर धनिया व पुदीनापत्ती से सजा कर सर्व करें.

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