जंजाल – भाग 3 : नैना मानव को झूठे केस में क्यों फंसाना चाहती थी?

उस ने एक सादे पन्ने पर मानव के खिलाफ यौन दुराचार की शिकायत लिख कर अजय को थमा दी. शिकायत में पूरी घटना का विवरण लिखा था. अजय ने पढ़ा लिखा था, ‘‘मैं और मानव अच्छे दोस्त हैं. हम कई बार आउटिंग पर जाते हैं. मानव के साथ मैं बहुत सहज महसूस करती हूं और सुरक्षित भी. आज शाम क्लास के बाद मैं ने मानव के साथ रामनिवास बाग घूमने का कार्यक्रम बनाया. मानव मेरे कमरे में आया तब मैं बाल बना रही थी.अचानक न जाने इसे क्या हुआ और यह मेरे साथ जबरदस्ती करने लगा. मैं ने इसे रोकने की बहुत कोशिश की.

हमारी हाथापाई भी हुई लेकिन इस पर तो जैसे भूत सवार था. तभी अजय सर वहां आ गए. इन्होंने दरवाजा खटखटाया तो मानव घबरा गया और इस ने मु झे छोड़ दिया. आज तो मैं बच गई लेकिन मु झे डर है कि मानव भविष्य में मु झे परेशान कर सकता है. हो सकता है कि अपनी बेइज्जती का बदला ही लेने की कोशिश करे. मु झे सुरक्षा दिलवाने की व्यवस्था करवाई जाए.’’ अजय ने नैना की शिकायत विभाग की विशाखा कमेटी को मेल कर दी.

4 दिन बाद विशाखा कमेटी की बैठक हुई. नैना, मानव और अजय. तीनों को इस बैठक में बुलाया गया. नैना ने जो बात शिकायती पत्र में लिखी थी वही कमेटी के सामने दोहरा दी. अजय ने चश्मदीद गवाह का काम किया. अब तो शक की कोई गुंजाइश ही कहां बची थी.मानव ने लाख सफाई दी. कहा भी कि नैना और उस के बीच रिश्ता दोस्ती से कहीं बढ़ कर है. जो कुछ हो रहा था, वह दोनों की सहमति से ही हो रहा था लेकिन अचानक अजय सर के आने से नैना ने यू टर्न ले लिया और चिल्लाने लगी. मगर उस की दलील किसी ने नहीं सुनी.

कमेटी ने अपने निर्णय में मानव को दोषी करार दिया और उसे निलंबित करने की अनुशंसा कर के अपनी रिपोर्ट विभाग सचिव को भेज दी.विशाखा कमेटी के इस निर्णय को स्वीकार करते हुए सचिव ने मानव को निलंबित कर दिया और उस का मुख्यालय राज्य के अंतिम छोर यानी जैसलमेर कर दिया गया. मानव कसमसा कर रह गया लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी.

उस ने नैना और अजय के खिलाफ अदालत में जाना तय कर लिया.हालांकि कोर्ट और वकीलों से उस का कोई वास्ता नहीं रहा था, लेकिन जब मंजिल तय हो जाए तो फिर रास्ते तलाश करना बड़ी बात नहीं. 1-2 मित्रों से सलाह करने के बाद उस ने एडवोकेट सुहानी से मिलना तय किया. सुहानी एक कम उम्र की नई वकील है और 2 साल पहले ही उस ने अपनी प्रैक्टिस शुरू की है.

अधिक अनुभव तो उसे नहीं है, लेकिन मानव जानता था कि अपनी साख बनाने के लिए वह उस के मुकदमे पर बहुत मेहनत करेगी. मानव सुहानी से मिला और सुहानी ने उस की पूरी बात सुनने के बाद यह मुकदमा अपने हाथ लेना स्वीकार कर लिया.‘‘आप का कहना है कि नैना और आप के बीच का रिश्ता दोस्ती से कहीं ज्यादा है. क्या आप इसे साबित कर सकते हैं.

मसलन नैना की कोई स्वीकारोक्ति जैसे लव लैटर या कोई मेल या फिर व्हाट्सऐप चैट आदि?’’ सुहानी ने मानव से पूछा.‘‘लैटर तो आजकल लिखता ही कौन है. मेल उस ने कभी नहीं किया. हां, व्हाट्सऐप पर कई बार हमारी रोमांटिक चैट होती थी, लेकिन नैना अपने मैसेज डिलीट कर देती थी. मैं ने भी अपने मोबाइल में उस की कोई चैट नहीं रखी क्योंकि यह खुद मेरे लिए भी नुकसानदेह हो सकता था,’’ मानव ने कहा.‘‘यानी आप दोनों को ही एकदूसरे पर भरोसा नहीं था.

यानी प्यार भी नहीं था. भरोसा प्रेम की पहली शर्त होती है मानव,’’ कहते हुए सुहानी मुसकराई तो मानव थोड़ा शर्मिंदा हुआ.‘‘खैर. यह आप का व्यक्तिगत मामला है. फिलहाल तो हमें यह साबित करना है कि आप के खिलाफ लगाया गया नैना का आरोप बेबुनियाद है और उस ने ऐसी शिकायत या तो किसी दबाव में आ कर की है या फिर यह आप को बदनाम करने की कोई साजिश है,’’ सुहानी ने मानव को नौर्मल करने की मंशा से कहा. मानव को लग रहा था मानो सुहानी से मिल कर उस की आधी समस्या तो हल हो ही गई. शेष आधी सुहानी हल कर ही देगी.

सुहानी ने मानव से नैना द्वारा की गई शिकायत से ले कर विशाखा कमेटी के निर्णय और उस के बाद मानव के निलंबन तक के सभी आवश्यक दस्तावेज देखे.‘‘मानव, यह तो अच्छी बात हुई कि कमेटी ने आप के केस को आपराधिक नहीं माना वरना आईपीसी की धारा 354 के अंतर्गत यह मामला पुलिस में जाता और हमारी समस्याएं बढ़ जातीं. आप को जेल भी हो सकती थी और जुरमाना भी लेकिन अब यह केस सर्विस रूल के अंतर्गत आएगा और हम आप के निलंबन के खिलाफ सीधे विभाग के सचिव को अपील करेंगे,’’ सुहानी ने दस्तावेजों का अवलोकन करने केबाद कहा.

‘‘मानव, नैना के खिलाफ हमारे पास कोई ठोस सुबूत नहीं है. क्या तुम्हारे फोन में कौल्स की औटो रिकौर्डिंग होती है? मतलब उस रात की बात करें तो क्या नैना ने तुम्हें ऐसा कुछ फोन पर कहा था जिस का दावा तुम कर रहे हो? मसलन, कमरे में इनवाइट करना या कोई रोमांटिक संकेत आदि. यदि ऐसा कुछ मिले तो शायद हम अपने पक्ष में कुछ साबित कर पाएं,’’

सुहानी ने मानवसे कहा.‘‘उस ने मु झे कमरे में आने के लिए कहा तो था, लेकिन फोन पर नहीं बल्कि व्हाट्सएंप कौल पर. जब भी इस तरह की कोई बात उसे फोन पर करनी होती थी तब वह फोन काट कर व्हाट्सऐप कौल किया करती थी. जहां तक मेरी जानकारी है,

व्हाट्सऐप कौल रिकौर्ड नहीं होती,’’ मानव ने अपनी शंका जाहिर की.सुहानी ने मानव की व्हाट्सऐप कौल्सकी हिस्ट्री देखी. उस में नैना की बहुत सी इनकमिंग कौल्स थीं. उस दिन भी उस ने मानव को कौल किया था. समय भी वही था जो मानव ने बताया था. ‘‘कोई बात नहीं, हम नैना के साथ एक गेम खेलेंगे. तुम उसे कौल लगाओ,’’ सुहानी ने मुसकराते हुए कहा.सुहानी की योजना के अनुसार मानव ने नैना को कौल लगाई. जैसाकि मानव ने कहा था, नैना ने उस का फोन काट दिया और व्हाट्सऐप कौल लगाई.‘‘नैना, तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं निर्दोष हूं.

तुम ने खुद ही मु झे कमरे में बुलाया और खुद ही मेरे खिलाफ शिकायत भी कर दी. तुम मेरे साथ ऐसा क्यों कर रही हो?’’ मानवने कहा.‘‘तुम मेरे मामले में निर्दोष हो सकते हो लेकिन मेरी बहन के मामले में नहीं. याद करो,3 साल पहले तुमने मेरी बहन से सिर्फ इसलिए सगाई करने से इनकार कर दिया था क्योंकि तुम्हारी सरकारी नौकरी लग गई थी और शादी के बाजार में तुम्हारी कीमत बढ़ गई थी,’’ नैना ने कड़वाहट से कहा. स्पीकर पर रखे फोन पर सुहानी यह सारी बात सुन रही थी. नैना का जवाब सुन कर उस ने आश्चर्य से मानव की तरफ देखा. खुद मानव भी असमंजस में था कि नैना आखिर किस घटना का जिक्र कर रही है.

GHKKPM: सई-विराट को कमरे में एक साथ देख, पाखी को लगा बड़ा झटका

गुम है किसी के प्यार में, शो इन दिनों हिट चल रहा है, टीआरपी की रेस में ये शो दूसरे नंबर पर है. ऐसे मेकर्स शो को नंबर वन की लिस्ट में लाने की पूरी कोशिश कर रहे है नील भट्ट, आयशा सिंह और ऐश्वर्या शर्मा स्टार्स ने शो को हिट करने में ज़रा भी कसर नहीं छोड़ी है.शो में अब नए मोड़ आ रहे है जो लोगों को काफी एंटरटेन कर रहे है.

आपको बता दें, कि शो का प्रोमो रीलिज़ हुआ था जिसमें दिखाया गया कि सई और विराट एक ही कमरे मे साथ होते है वही, दोनो को साथ कमरे में पाखी देख लेती है और ये सब देख उसे बड़ा झटका लगता है. मानों पाखी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई है।

 

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“गुम है किसी के प्यार मे” के प्रोमो वीडियो में दिखाया गया है कि रात 12 बजे भी विराट और विनायक घर नहीं आते है, जिससे पाखी चिंता करने लग जाती है। इससे पाखी की तबीयत खराब हो जाती है। वह सोचती है कि सई को दोनों के बारें में ज़रुर पता होगा, जिससे वह भागकर सई के घर चली जाती है. जहां पाखी को विनायक मिलता है जो बताता है कि वह काफी देर से यही है. पाखी उससे पूछती है कि वह और विराट कल रात से घर क्यो नहीं आए.

 

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बता दें, ये किस्सा यही खत्म नहीं होता है आगे पाखी, सई के कमरे में जाकर देखती है तो वहां सई विराट के कंधे पर सिर रखकर सो रही होती है। यह सब देख पाखी को धक्का लगता है और वह कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाती है।

प्रोमो वीडियो पर फैंस के कमेंट्स

प्रोमो वीडियो को देख यूज़र ने कई तरह के कमेंट्स किए ,जिसमें एक यूजर ने लिखा है कि “इस सीरियल में यही चलता रहेगा कि एक बार शायद पति बाद में उसका पति” वही किसी दूसरे यूज़र ने लिखा है कि ये “गुम है किसी के प्यार में वाले सई और विराट के नाम पर सीरियल फेक प्रोमो बनाते है और बाद में देवर भाभी का प्यार दिखाते है” तीसरा कमेंट् सोनिया नाम की यूज़र ने लिखा है कि “जो आप बोते हो वही काचते हो अब इस बेशर्म महिला को पता लगेगा कि जब पति-पत्नी के बीच कोई तीसरा आता है तो कैसा लगता है”

Winter Special: सर्दी-खांसी में फायदेमंद देसी काढ़ा

सर्दी-खांसी हो जाए तो पूरा शरीर जकड़ सा जाता है. दवा लेने से फायदा तो तुरंत हो जाता है लेकिन इन दवाओं के कई साइड इफेक्ट भी होते हैं. वैसे भी हर बार दवा लेना सही नहीं है. बेहतर यही होगा कि सर्दी-खांसी के लिए घरेलू उपाय आजमाए जाएं. इनका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है और सर्दी जड़ से दूर हो जाती है.

काढ़ा बनाने के लिए आवश्यक सामग्री

साफ पानी

काली तुलसी की पत्ती

लौंग

काली मिर्च

छोटी इलायची

अदरक

गुड़

चायपत्ती

विधि:

पानी गर्म होने के लिए रख दें. जब पानी उबलने लगे तब उसमें पीसी हुई लौंग, काली मिर्च, इलायची, अदरक, और स्वादानुसार गुड़ ड़ाल दें. थोड़ी देर बाद तुलसी की पत्तियां इसमें डाल दें. उसके बाद चायपत्ती. जब पानी आधा रह जाए तो गैस बंद कर दीजिए. पानी को छान लें.

इसे गर्म पीना ही फायदेमंद रहेगा. कुछ ही दिनों में इसके सेवन से सर्दी-खांसी दूर हो जाएगी.

डायपर का है जमाना

आज के बदलते दौर ने बच्चे के पालनपोषण को आसान बना दिया है. आज मातापिता छोटे बच्चे को ले कर कहीं बाहर जाने से नहीं कतराते. परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, डायपर्स के प्रयोग से बच्चे को भी आराम मिलने लगा है. लेकिन इस के इस्तेमाल में थोड़ी सावधानी बरती जाए तो और भी आसानी हो जाती है अन्यथा कई बार लेने के देने भी पड़ सकते हैं. इस बारे में मुंबई की श्री गुरु मैटरनिटी एंड चिल्ड्रंस नर्सिंगहोम की बाल रोग विशेषज्ञा डा. सविता एस नाइक कहती हैं कि डायपर्स फायदेमंद होता है, पर इसे उचित रूप से इस्तेमाल करना जरूरी है. डायपर्स में नमी सोखने की शक्ति होती है, जो कपड़ों में कम होती है. इसलिए अगर इसे बच्चे को एक बार पहना दिया जाए तो 2 या 3 बार पेशाब करने के बाद ही डायपर बदला जाता है. अगर उस ने मलत्याग किया हो तो इसे तुरंत बदलना जरूरी होता है, क्योंकि बच्चे की कोमल त्वचा को इस से नुकसान हो सकता है. गीले डायपर से बच्चे को कई प्रकार की त्वचा की बीमारियां हो जाती हैं. पेशाब में यूरिया, ऐसिड, अमोनिया आदि होते हैं, जो त्वचा में खुजली पैदा करते हैं. इस से बच्चों की त्वचा लाल हो जाती है.

जांच करती रहें

इसलिए जब भी बच्चा डायपर पहने हो तो मां को पीछे हाथ लगा कर जांच करते रहना चाहिए. कुछ बच्चे एक बार में अधिक पेशाब करते हैं. अगर उस ने 2-3 घंटों के बाद पेशाब किया हो तो डायपर जल्दी गीला हो जाता है. तब डायपर जल्दी बदलना जरूरी हो जाता है. अगर रात में उसे डायपर पहना कर सुलाया हो तो हर 2 घंटों बाद जांच करनी चाहिए कि डायपर कितना गीला है. डायपर की ऊपरी परत हमेशा सूखी रहनी चाहिए. गीला होने पर ही यह त्वचा के संपर्क में आती है और शिशु की वहां की त्वचा लाल हो जाती है. उस के बाद खुजली, सूजन या फिर त्वचा लाल हो जाती है. इसे डायपर डर्मेटिक्स कहते हैं. हलका लाल होने पर इमोजिएंट क्रीम लगाने से त्वचा मुलायम हो जाती है और लाली भी कम हो जाती है.

समयसमय पर बदलती रहें

गीले डायपर को अधिक देर तक पहनाए रखने से फंगल इन्फेक्शन भी हो सकता है. इस संक्रमण के अधिक दिनों तक रहने पर बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए. रेगुलर टेल्कम पाउडर से ऐसे संक्रमण पर कोई फायदा नहीं होता. डायपर पाउडर, जो अलग होता है, उस में कौर्न स्टार्च होता है. उस की सोखने की क्षमता अधिक होती है. अगर डायपर पहनाने से पहले इस पाउडर को बुरक दिया जाए तो त्वचा सूखी और नरम रहती है. एंटीफंगल पाउडर भी आप लगा सकती हैं. इस से फंगल इन्फेक्शन कम हो सकता है.

कई औप्शन उपलब्ध

डायपर्स कई तरह के होते हैं. वही डायपर्स चुनें, जो पतले और नरम हों, जिन्हें पहनने में बच्चे को आराम मिले. अगर प्लास्टिक पैंट में कौटनपैड डालते हैं तो वह पतला होता है, जिसे बारबार बदलना पड़ता है. बाजार में मिलने वाले डायपर्स मोटे होते हैं और उन में नमी सोखने की क्षमता अधिक होती है. आप वही डायपर चुनें, जो आप के बजट की सीमा में हो. डा. सविता कहती हैं कि 2 साल के बाद बच्चे को पेशाब और पौटी की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए, जिसे टायलेट ट्रेनिंग कहा जाता है. कई बार 1 साल में ही बच्चा इसे सीख जाता है. लेकिन जिन बच्चों को रात में बिस्तर गीला करने की आदत होती है, वहां डायपर्स का इस्तेमाल करना जरूरी हो जाता है. अगर बच्चे को लूज मोशन हों तो डायपर्स न पहनाएं, क्योंकि लूज मोशन में उस के मल में अधिक मात्रा में ऐसिड होता है. ऐसे में फंगल इन्फेक्शन हो जाता है. उस समय बच्चे को खुला छोड़ना या कौटन पैंटीज पहनाना सही होता है. कई बार अधिक संक्रमण होने से त्वचा पक जाती है. तब एंटीबायोटिक्स का सहारा भी लेना पड़ता है. मातापिता की लापरवाही से बच्चे की बीमारी काफी सीरियस भी हो जाती है. इसलिए जब भी बच्चे को डायपर पहनाएं, पूरा ध्यान रखें कि उस से आराम हो, तकलीफ न हो. आप अपनी सुविधा देखें पर बच्चे के आराम का भी ध्यान रखें, क्योंकि अगर उसे परेशानी होगी तो वह कह नहीं पाएगा और रोएगा, जिस से आप की परेशानी और भी बढ़ सकती है.

एकल परिवार में जब एक हो जाए बीमार, तो क्या करें?

आधुनिकीकरण ने परिवार नामक इकाई का ढांचा बदल दिया है. अब पहले की तरह संयुक्त परिवार नहीं होते. लोगों ने वैस्टर्न कल्चर के तहत एकल परिवार में रहना शुरू कर दिया है. लेकिन परिवार के इस ढांचे के कुछ फायदे हैं, तो कुछ नुकसान भी. खासतौर पर जब ऐसे परिवार में कोई गंभीर बीमारी से पीडि़त हो जाए.

इस बाबत एशियन इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस के नेफरोलौजिस्ट डाक्टर जितेंद्र कहते हैं कि न्यूक्लियर फैमिली का ट्रैंड तो भारत में आ गया, लेकिन इस टै्रंड को अपनाने वालों को यह नहीं पता कि वैस्टर्न कंट्रीज में न्यूक्लियर फैमिली में रहने वाले वृद्ध और बच्चों की जिम्मेदारी वहां की सरकार की होती है. वही उन्हें हर तरह की सुरक्षा और सुविधा मुहैया कराती है. यहां तक कि वहां पर ऐसे संसाधन हैं कि वृद्ध हो, युवा या फिर बच्चा किसी को भी विपरीत परिस्थितियों से निबटने में ज्यादा परेशानी नहीं होती.

डा. जितेंद्र आगे कहते हैं कि उन देशें में जब भी कोई बीमार पड़ता है और अगर उसे तत्काल चिकित्सा की जरूरत पड़ जाती है तब उसे ऐंबुलैंस के आने का इंतजार नहीं करना पड़ता, बल्कि ऐसे समय के लिए विशेष वाहन होते हैं जो बिना रुकावट सड़कों पर सरपट दौड़ सकते हैं और इन से मरीज को अस्पताल तक आसानी से पहुंचाया जा सकता है. लेकिन भारत में ट्रैफिक की हालत इतनी खराब है कि ऐंबुलैंस को ही मरीज तक पहुंचने में वक्त लग जाता है.

एकल परिवार में हर किसी को बीमारी से उबरने और उस से जुड़े सभी जरूरी काम स्वयं करने की आदत डालनी चाहिए. बीमारी के समय भी इस तरह आत्मनिर्भरता को कायम रखा जा सकता है: बीमारी के लक्षण को गंभीरता से लें: रोज की अपेक्षा कमजोरी महसूस कर रहे हों या फिर हलका सा भी बुखार हो तो उस के प्रति लापरवाही अच्छी नहीं. हो सकता है जिसे आप मामूली बुखार या कमजोरी समझ रहे हों वह किसी बड़ी बीमारी का संकेत हो. अपने फैमिली डाक्टर से इस बारे में चर्चा जरूर करें. फैमिली डाक्टर के पास जाने में अधिक समय न लगाएं. इस बात का इंतजार न करें कि घर का कोई दूसरा सदस्य आप को डाक्टर के पास ले जाएगा.

डाक्टर से बात करने में न हिचकें: अपने डाक्टर से खुल कर बात करें. आप क्या महसूस कर रहे हैं और आप को क्या तकलीफ है, इस के बारे में अपने डाक्टर को जरूर बताएं. फिर डाक्टर जो भी पूछे उस का सोचसमझ कर जवाब दें. बढ़ाचढ़ा कर भी कुछ न बताएं क्योंकि डाक्टर इस से भ्रमित हो जाता है. मरीज इस बात का ध्यान रखे कि वह अब आधुनिक समय में जी रहा है, जहां हर बीमारी का इलाज है. फिर चाहे वह कैंसर हो, टयूबरक्लोसिस हो या फिर जौंडिस. बीमारी पर खुल कर बात करने में डरने की क्या जरूरत?

प्रैस्क्रिप्शन को सहेज कर रखें: डाक्टर जो प्रैस्क्रिप्शन लिख कर दें उसे हमेशा संभाल कर रखें. हो सकता है कोई शारीरिक समस्या आप को बारबार रिपीट हो रही हो. इस परिस्थिति में आप डाक्टर को पुराना प्रैस्क्रिप्शन दिखा कर याद दिला सकते हैं कि पिछली बार भी आप को यही समस्या हुई थी. बारबार होने वाली बीमारी गंभीर रूप भी ले सकती है. यदि आप के डाक्टर को यह पता चल जाएगा तो वह इस की रोकथाम के लिए पहले ही आप को सतर्क कर देगा. सही डाक्टर चुनें: अकसर देखा गया है कि लोगों को तकलीफ शरीर के किसी भी हिस्से में क्यों न हो, लेकिन वे जाते जनरल फिजिशियन के पास ही हैं. जबकि जनरल फिजिशियन आप को सिर्फ राय दे सकता है. यदि आप को दांतों की तकलीफ है तो डैंटिस्ट के पास जाएं. हो सकता है कि आप को दांतों से जुड़ी कोई गंभीर बीमारी हो.

बीमारी टालें नहीं: अकसर लोग बीमारी के सिमटम्स नजरअंदाज कर देते हैं. मसलन, शरीर के किसी अंग में गांठ होना, बलगम में खून आना या फिर कहीं पस पड़ जाना. ये सभी बड़ी बीमारियों के संकेत होते हैं. लेकिन लोग इन्हें महीनों नजरअंदाज करते हैं. वे सोचते हैं कि कुछ समय बाद उन की तकलीफ खुदबखुद खत्म हो जाएगी. लेकिन तकलीफ जब बढ़ती है तब उन्हें डाक्टर की याद आती है. तब तक देर हो चुकी होती है. जिस बीमारी पर पहले लगाम कसी जा सकती थी वह बेलगाम हो जाती है इसलिए तकलीफ छोटी हो या बड़ी डाक्टर से एक बार सलाह जरूर लें. मैडिकल कार्ड अपने साथ रखें: यदि आप को कोई गंभीर बीमारी है, तो आप अपना मैडिकल कार्ड और डायरी अपने पास रखें. डाक्टर जितेंद्र कहते हैं कि किसी को सड़क पर चलतेचलते अचानक चक्कर आ जाए या दौरा पड़ जाए तो राहगीर सब से पहले मरीज की जेब की तलाशी लेते हैं ताकि मरीज से जुड़ी कोई परिचय सामग्री मिल जाए. यदि मैडिकल कार्ड रखा जाए तो किसी को भी पता चल जाएगा कि आप को क्या बीमारी है और बेहोश होने की स्थिति में आप को क्या ट्रीटमैंट दिया जाना चाहिए. यदि इस मैडिकल कार्ड में आप का पता और आप के परिचितों का नंबर होगा तो राहगीरों को उन से संपर्क करने में भी आसानी होगी. इस तरह समय रहते आप का इलाज हो सकेगा और परिचित लोग आप के पास हो सकेंगे.

मैडिकल डायरी भी है जरूरी: गंभीर बीमारी होने पर मरीज को अपने पास एक मैडिकल डायरी भी रखनी चाहिए. इस डायरी में मरीज को अपने सभी जरूरी टैस्ट, दवाएं और खानेपीने का रूटीन लिख लेना चाहिए. डाक्टर जितेंद्र इस डायरी का महत्त्व बताते हुए कहते हैं कि मैडिकल डायरी में मरीज अपने होने वाले टैस्टों की तारीख, दवाओं के खाने का समय और उन के खत्म होने और लाने की तारीख लिख सकता है. कई बार बीमारी की वजह से उसे सब कुछ याद नहीं रहता. इसलिए रोजाना इस डायरी को एक बार पढ़ लेने पर उसे ज्ञात हो जाएगा कि कब उसे क्या करना है.

आधुनिक तकनीकों का हो ज्ञान: वैसे तो आधुनिक युग में प्रचलित तकनीकों का ज्ञान सभी को होना चाहिए. लेकिन यदि किसी, का कोई गंभीर रोग है तो उस के लिए तकनीकों को जानना अनिवार्य हो जाता है. जैसे आजकल स्मार्टफोन का जमाना है, तो स्मार्टफोन मरीज के पास होना चाहिए और उस का इस्तेमाल भी मरीज को आना चाहिए. आजकल स्मार्टफोन में बहुत से एप्स हैं जो काफी मददगार हैं. मसलन, कैब बुकिंग एप्स, डायट अलर्ट एप्स, चैटिंग एप्स और विभिन्न प्रकार के ऐसे एप्स जो मरीज को सुविधा और उसे नई जानकारियां देने में काफी मददगार हैं.

डाक्टर जितेंद्र की मानें तो चैटिंग एप्स ऐसे हैं जो मरीज और डाक्टर के बीच इंटरैक्शन को बाधित नहीं होने देते. यदि मरीज को कोई छोटीमोटी जानकारी लेनी है तो वह डाक्टर से इस के जरीए बात कर सकता है. कई बार मरीज अपने डाक्टर से काफी दूर पर होता है, तो उस के लिए डाक्टर से प्रत्यक्ष रूप से मिल पाना मुमकिन नहीं होता. तब वीडियो कौन्फ्रैंसिंग के द्वारा मरीज अपने डाक्टर से परामर्श ले सकता है.नकद पैसा जरूर रखें: मरीज को घर में हमेशा कुछ नकद पैसा जरूर रखना चाहिए. यदि नकद पैसा रखने में असुरक्षा का एहसास हो तो मरीज अपने नाम से क्रेडिट या डेबिट कार्ड भी रख सकता है.

परिवार वालों का सहयोग भी जरूरी

एकल परिवार हो या संयुक्त परिवार, यदि परिवार में किसी को भी गंभीर बीमारी हो जाए तो मरीज को घर के सदस्यों का मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार का सहयोग चाहिए होता है. खासतौर पर एकल परिवार में मरीज खुद को ज्यादा अकेला महसूस करता है. एशियन इंस्टिट्यूट औफ मैडिकल साइंस में साइकोलौजिस्ट डाक्टर मीनाक्षी मानचंदा कहती हैं कि एकल परिवार में चुनिंदा लोग होते हैं, इसलिए सब की जिम्मेदारियां और काम बंटे होते हैं. घर में किसी के बीमार पड़ने से उन के लिए अतिरिक्त काम बढ़ जाता है. ऐसे में मरीज यदि अपनी छोटीमोटी चीजों का खुद ध्यान रख ले तब भी उस के परिवार के सदस्यों को ही करना होता है.

मरीज को बीमारी से लड़ने के लिए मानसिक तौर पर कैसे मजबूत बनाया जा सकता है, आइए जानते हैं:

बीमारी कितनी भी गंभीर हो मरीज को इस बात का भरोसा दिलाएं कि उस का अच्छे से अच्छा इलाज कराया जाएगा और वह पूरी तरह ठीक हो जाएगा.

मरीज को ऐसा न बनाएं कि वह आप पर निर्भर रहे. यदि वह डाक्टर के पास खुद जाना चाहे तो उसे अकेले ही जाने दें.

काम में कितने भी व्यस्त हों, लेकिन मरीज का दिन में 2 से 3 बार हालचाल जरूर पूछें. इस से मरीज को लगता है कि उस के अपने भी उस की चिंता कर रहे हैं.

यदि मरीज बीमारी से पूर्व औफिस जाता था तो उस का औफिस जाना बंद न कराएं. डाक्टर से सलाह लें कि मरीज औफिस जा सकता है या नहीं? मरीज को किसी भी छोटेमोटे काम में उलझा कर रखें, जिस से उसे मानसिक तनाव भी न  महसूस करे.

फुटबौल खेलने से मेरे बेटे के टखनों और मांसपेशियों में खिंचाव रहता है?

सवाल-

मेरे बेटे की उम्र 20 साल है. वह कालेज में फुटबाल खेलता है. उसे अकसर टखनों की मांसपेशियों में तनाव और दर्द की समस्या हो जाती है. ऐसा क्यों होता है और इस से बचने के लिए क्या सावधानियां बरती जानी चाहिए?

जवाब-

टखनों में होने वाली समस्याओं को स्पोर्ट्स इंजरी कहा जाता है, क्योंकि इस के 90% मामले खिलाडि़यों में ही देखे जाते हैं. यह समस्या टखनों की हड्डियों में फ्रैक्चर होने या मांसपेशियों, लिगामैंट्स और टेंडन के क्षतिग्रस्त होने से होती है. ऊंची एड़ी के फुटवियर पहनने और ऊंचीनीची सतहों पर चलने से भी यह समस्या हो जाती है. अगर समस्या लगातार बनी हुई है तो किसी और्थोपैडिक सर्जन को दिखाएं. ऐंकल ऐंथ्रोस्कोपी प्रक्रिया ने टखनों से संबंधित समस्याओं के उपचार को काफी आसान और दर्दरहित बना दिया. यह एक मिनिमली इनवेसिव सर्जिकल प्रक्रिया है, जो ऐंथ्रोस्कोप की सहायता से की जाती है.

बहन की शादी सिर पर और स्नेहा की कमर में अचानक दर्द उठ गया जिस से वह परेशान हो गई, क्योंकि एक तो वह दर्द से परेशान थी और दूसरा वह शादी जिस का उसे काफी समय से इंतजार था उसे भी ऐंजौय नहीं कर पा रही थी.

ऐसा सिर्फ स्नेहा के साथ ही नहीं बल्कि आज अधिकांश लोग बौडी पेन से परेशान हैं, क्योंकि वे आज की भागदौड़ भरी लाइफ में खुद की हैल्थ पर ध्यान जो नहीं दे रहे हैं और हलकाफुलका दर्द होने पर उसे इग्नोर कर देते हैं जिस से स्थिति और भयावह हो जाती है. ऐसी स्थिति में तुरंत रिलीफ के लिए जरूरी है हीट थेरैपी का इस्तेमाल करने की और उस के लिए डीप हीट रब पेन रिलीफ बैस्ट है.

1. जानें पेन के कारण:

आज के प्रतिस्पर्धा वाले समय में एकदूसरे से आगे निकलने की दौड़ में हम स्ट्रैस में अधिक रहने लगे हैं जिस से कम सोने के कारण हर समय थकेथके से रहते हैं जो मसल पेन का कारण बनता है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

जब पहनें हाई हील तो, ध्यान रखे ये बातें

आमतौर पर यह देखा गया है कि हाई हील पहनने वाली कई किशोरियों में असहनीय कमर दर्द के कई मामले सामने आते हैं.

ऊंची एडि़यों वाले सैंडलों से हर तीसरी युवती प्रभावित है और इन में से कई युवतियां तो स्थायी रूप से और्थपैडिक समस्याओं का भी शिकार हो जाती हैं. लेकिन दुखद यह कि उन्हें इस का एहसास काफी नुकसान झेलने के बाद होता है. लिहाजा, यह गलत धारणा है कि हाई हील सैंडल आप में आत्मविश्वास जगाते हैं और आप को अधिक आकर्षक बनाते हैं.

जब आप हाई हील पहनती हैं तो आप की कमर और नितंबों पर जबरदस्त दबाव पड़ता है, जो आप की रीढ़ के लिए काफी नुकसानदेह होता है.

ऐसे में कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदुओं की जानकारी जरूरी है:

– जितनी ऊंची एडि़यों के सैंडल पहनेंगी उतना ही आप की कमर पर दबाव ज्यादा पड़ेगा. यह प्रमाणित हो चुका है कि 3 इंच ऊंची एडि़यों से 76%, 2 इंच से 57% और 1 इंच से 22% दबाव आप की एडि़यों की हडिड्यों पर पड़ता है.

– हाई हील के कारण नितंबों, कंधों, कमर और रीढ की अवस्था बिगड़ जाती है.

– यदि आप का वजन अधिक है, तो हाई हील आप का संतुलन भी बिगाड़ सकती है और आप के चोटिल होने की संभावना बढ़ा देती है.

– पैरों के अंगूठों से पहले के हिस्सों में हाई हील के कारण दर्द बढ़ जाता है.

– फीते और पंप स्टाइल ऊंची एड़ी के सैंडल पहनने से एडि़यों के पिछले हिस्से की हड्डी बढ़ सकती है.

– आगे की ओर से बेतरतीब या असहज लगने वाले हाई हील सैंडल पैरों में जकड़न पैदा करते हैं.

– यदि आप लंबे समय तक हाई हील सैंडल पहनती हैं तो इन से शिराओं और पिंडलियों की मांसपेशियों को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचता है.

हाई हील और कमर दर्द के बीच ताल्लुक

लगातार ऊंची एड़ी के सैंडल आप की रीढ़ की बनावट को टेढ़ा कर देते हैं, क्योंकि आप की कमर का निचला हिस्सा दबाव कम करने के लिए हमेशा मुड़ा रहने की चेष्टा करता है. इस से आप के जोड़ों पर तनाव की स्थिति बन जाती है और शरीर के अंगों की बेढंगी अवस्था के कारण दर्द बढ़ सकता है. यदि आप पहले से कमर दर्द से परेशान हैं तो आप के और्थोपैडिक चिकित्सक आप को कभी हाई हील पहनने की सलाह नहीं देंगे.

हालांकि महिलाएं अपनी पसंदीदा फुटवियर का मोह बमुश्किल ही छोड़ पाती हैं, यहां तक कि तकलीफ सहते रहने के बाद भी. लिहाजा, आप हाई हील पहनने के दौरान दर्द और नुकसान को इन उपायों से कम कर सकती हैं:

– ड्राइविंग के दौरान फ्लैट चप्पलें पहनें.

– किसी मीटिंग में बैठने के दौरान आप अपने सैंडल ढीले कर सकती हैं और अपने पैरों को फर्श पर रख सकती हैं.

– 20-30 मिनट के अंतराल पर बे्रक लें और अपने सैंडल निकाल दें.

– जब लगे कि आप के सैंडल खराब हो रहे हैं तो अत्यधिक लगाव होने के बावजूद उन्हें तत्काल बदल लें.

– सब से जरूरी बात यह कि सैंडलों का चयन स्टाइल या उन की मोटाई से न करें, बल्कि उन्हें पहन कर आराम महसूस करने के आधार पर करें. सैंडलों से मिलने वाले आराम से कभी समझौता न करें.

– हाई हील पहन कर कभी दौड़ लगाने की कोशिश न करें.

अपने शरीर की आवाज सुनें

हमेशा अपने शरीर की आवाज सुनें कि वह क्या चाहता है और कभी बहुत ज्यादा आश्वस्त न रहें कि इस से आप को कोई नुकसान नहीं होगा. जिस दिन से हाई हील पहनने से आप का दर्द बढ़ने लगे, आप को अन्य प्रकार के जूते पहनने पर विचार करना चाहिए.

जंजाल – भाग 2 : नैना मानव को झूठे केस में क्यों फंसाना चाहती थी?

सबकुछ इसी तरह हौलेहौले चल रहा था कि कल अचानक औफिस में हलचल मच गई. सचिवालय से आई एक मेल ने स्टाफ को पंख लगा दिए. जिस ने भी इसे पढ़ा वह उड़ाउड़ा जा रहा था. दरअसल, विभाग की तरफ से अगले सप्ताह जयपुर में 5 दिन का एक ट्रेनिंग कार्यक्रम संचालित होने वाला है जिस में हरेक संभाग से3 से 4 कर्मचारियों को भाग लेने का प्रस्ताव है. स्वयं के अतिरिक्त 3 अन्य कर्मचारियों के नाम अजय को प्रस्तावित करने हैं.

अब चूंकि सारा कार्यक्रम सरकारी खर्चे पर हो रहा है तो कोई क्यों नहीं जाना चाहेगा. आम के आम और गुठलियों के दाम. 5 दिन शाही खानापीना और स्टार होटल में रहना. बचे हुए समय में जयपुर घूमना. भला ऐसे स्वर्णिम अवसर को कौन नहीं लपकना चाहेगा.मानव के लिए मंत्रीजी के यहां से फोन आ गया था, इसलिए एक नाम तो तए हो ही गया. नैना ने अपने नये होने का हवाला देते हुए काम सीखने की इच्छा जाहिर की और इमोशनल ब्लैकमेल करते हुए लिस्ट में अपना नाम जुड़वा लिया.

नैना का नाम जोड़ने में खुद अजय का भी स्वार्थ था. इस बहाने वह नैना और मानव के बीच की कैमिस्ट्री नजदीक से सम झ पाएगा. चौथे नाम के लिए अजय ने अपने चमचे मयंक का नाम चुना और लिस्ट सचिवालय मेल कर दी.चूंकि अजमेर से जयपुर की दूरी अधिक नहीं है. इसलिए चारों ने एकसाथ अजय की कार से जाना तय किया. अजय गाड़ी चला रहा था और मयंक उस के साथ आगे बैठा था. पीछे की सीट पर मानव और नैना बैठे थे. गाड़ी तेज रफ्तार से चल रही थी.

अजय का ध्यान बीचबीच में शीशे की तरफ जा रहा था जहां से वह मानव और नैना के मचलते हुए हाथ साफसाफ देख पा रहा था. उन की हरकतें उसे बेचैन कर रही थीं. उस का मन तो कर रहा था कि दोनों को वहीं हाई वे पर ही उतार दे, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकता था क्योंकि नौकरी तो उस की भी अभी बहुत बाकी थी और वह नदी में रह कर मगरमच्छ से बैर मोल लेना तो अफोर्ड नहीं कर सकता था. सभी कर्मचारियों के रुकने की व्यवस्था आरटीडीसी के होटल तीज में की गई थी और ट्विन शेयरिंग के आधार पर कमरे दिए गए थे.

प्रशिक्षणार्थियों में महिलाओं की संख्या अपेक्षाकृत कम थी और विषम भी.संयोग से नैना को जो कमरा अलौट हुआ उस में कोई अन्य महिला नहीं थी. वे चारों सुबह लगभग 9 बजे जयपुर पहुंचे. चैकइन करने के बाद नाश्ता और फिर 10 बजे से 1 बजे तक प्रशिक्षण. 1 बजे से 2 बजे तक लंच और फिर5 बजे तक क्लास. इस बीच 11 और 4 बजे चाय की भी व्यवस्था थी. शेष 4 दिन भी यही व्यवस्था रिपीट होनी थी.शाम को 5 बजे के बाद मानव और नैना गुलाबी नगरी घूमने निकल गए. मानव उसे राजमंदिर सिनेमा में फिल्म दिखाने ले गयाऔर उस के बाद उसे स्पैशल तिवाड़ी की चाट खिलाई.

रात 10 बजे दोनों खिलखिलाते हुएट्रेनिंग सैंटर आए. हालांकि लोगों की निगाहों से बचने के लिए वे दोनों आगेपीछे अंदर घुसे थे लेकिन अजय ने उन्हें एकसाथ कैब से उतरते देख लिया था. मानव की हठधर्मी पर उस का खून उबल रहा था, लेकिन क्या करता. इस तरह एकसाथ घूमने से कुछ भी साबित नहीं होता. वह खुद भी तो जोधपुर वाली रिया मैडम के साथ शाम को कौफी पीने जीटी गया ही था.अगले 3 दिन फिर यही हुआ. कभी कनक गार्डन तो कभी हवामहल. कभी मोती डूंगरी तो कभी अजमेरी गेट. दोनों साथसाथ घूम रहे थे. आज ट्रेनिंग का अंतिम दिन था.

क्लास के बाद मानव और नैना शहर घूमने निकल गए. अजय भी मयंक के साथ छोटी चौपड़ की तरफ निकल गया. छोटी चौपड़ के बाद वे लोग जौहरी बाजार की तरफ आ गए. अजय अपनी पत्नी के लिए साड़ी पसंद करने लगा. खानेपीने के बाद जबवे लोग वापस ट्रेनिंग सैंटर पहुंचेतो नैना के कमरे की लाइट जली हुई थी.‘‘आज ये दोनों जल्दी वापस आ गए लगते हैं,’’

अजय ने कहा.‘‘कौन जाने, गए ही नहीं हों. जब मनोरंजन का साधन घर में ही मौजूद हो तो फिर बाहर क्यों जाना?’’ मयंक ने बाईं आंख दबा कर चुटकी लेते हुए कहा तो अजय की छठी इंद्री जाग उठी. वह नैना के कमरे की तरफ चल दिया. वह यह जानने के लिए जिज्ञासु हो उठा कि बंद कमरे में मानव है या नहीं और यदि है तो उन के बीच क्या चल रहा है. बिना अधिक विचार किए उस ने दरवाजा नोक कर दिया. कुछ पल की खामोशी के बाद अंदर हलचल हुई.

शायद खिड़की का पल्ला भी थोड़ा सा खुला था और उस में से किसी ने बाहर  झांका भी था. चुप्पी के बाद अचानक भीतर से अजय को कुछ आवाजें भी सुनाई दीं.‘‘यह क्या कर रहे हो, छोड़ो मु झे,’’ नैना गुस्से में कह रही थी.‘‘नैना… क्या हुआ नैना. कौन है तुम्हारे साथ?’’

कहते हुए अजय जोरजोर से दरवाजा पीटने लगा. तभी दरवाजा खुला और मानव फुफकारता हुआ बाहर लपका.‘‘क्या हुआ? क्या किया मानव ने,’’ अजय ने पूछा. हालांकि उसे यह भी दोनों की कोई चाल ही लग रही थी, लेकिन फिर भी वह अनभिज्ञ बना रहा. नैना सिसक रही थी.‘‘हुआ तो कुछ नहीं लेकिन हो बहुत कुछ जाता. मैं तो इसे अपना अच्छा दोस्त सम झ रही थी लेकिन यह तो,’’

नैना ने शेष शब्द आंसुओं के हवाले कर दिए.‘‘तुम फिक्र मत करो. मानव के खिलाफ अपने विभाग की विशाखा कमेटी में शिकायत दर्ज करवाओ. मैं तुम्हारे पक्ष में गवाही दूंगा,’’ कहते हुए अजय ने उसे सांत्वना दी.‘‘रहने दीजिए सर, होनाजाना तो कुछ है नहीं बेकार ही मेरी बदनामी हो जाएगी,’’  नैना ने अपनेआप को संयय करते हुए कहा.‘‘अरे, यह क्या बात हुई भला.

महिलाएं शिकायत नहीं करतीं तभी तो पुरुषों के हौसले बढ़ते हैं. फिर महिलाएं ही सरकार से शिकायत भी करती हैं कि सरकार कुछ करती नहीं. सरकार को क्या सपने आते हैं कि फलांफलां के साथ कहीं कुछ गलत हुआ है. तुम शिकायत करो बल्कि अभी इसी वक्त मु झे लिख कर दो, मैं मानव के खिलाफ कार्यवाही करता हूं,’’ अजय ने नैना को शिकायत करने के लिए राजी किया. क्या करती नैना. इस समय उसे अपनी इज्जत बचानी प्राथमिकता लग रही थी.चूंकि अजय के सामने यह सारी घटना घटित हुई थी, इसलिए इसे  झुठलाया भी नहीं जा सकता था. बात नैना की इज्जत पर बन आई थी. यदि अजय की बात नहीं मानती तो सीधेसीधे दोषी करार दे दी जाती. खुद की इज्जत बचाने की खातिर उसे अजय की बात माननी ही पड़ी.

जंजाल – भाग 1 : नैना मानव को झूठे केस में क्यों फंसाना चाहती थी?

अजय को मानव फूटी आंख नहीं सुहाता. आज से नहीं तभी से जब से उस ने उस के औफिस में जौइन किया था. 5 साल पहले उस की पोस्टिंग पास के कसबे में हुई थी, लेकिन मंत्रीजी की सिफारिश लगवा कर उस ने यहां मुख्यालय में बदली करवा ली थी. मंत्रीजी के नाम का नशा आज भी उस के सिर चढ़ कर बोलता है. तभी तो औफिस में अपनी मरजी चलाता है. देर से आना और जल्दी चले जाना उस की आदत बन चुकी है. लंच तो उस का 1 घंटे का होता ही है उस के अलावा चाय के बहाने भी घंटों अपनी सीट से गायब रहता है. कभी डांटफटकार दो तो तुरंत मंत्रीजी के पीए का शिकायती फोन आ जाता है और अजय की क्लास लग जाती है.

मानव अपनी कौलर ऊंची किए मस्ती मारता रहता है और मजबूरन उस की सीट का पैंडिंग काम अजय को किसी अन्य कर्मचारी से करवाना पड़ता है और ऐसा करने से स्वाभाविक रूप से शेष कर्मचारियों में असंतोष फैलता है.कंट्रोलिंग औफिसर होने के नाते सभी कर्मचारियों को समान रखना अजय की ड्यूटी भी है और विवशता भी लेकिन मानव को कार्यालय शिष्टाचार से कोई फर्क नहीं पड़ता. उसे तो अपनी मनमानी करनी होती है और वह मंत्रीजी के दम पर ऐसा करता भी है.

यहां तक तो फिर भी सहन किया जा रहा था, लेकिन जब से नैना इस औफिस में आई है तब से मानव के लिए औफिस कंपनी गार्डन की तरह हो गया है. जितनी देर औफिस में रहता है, उसी के इर्दगिर्द मंडराता रहता है. कभी चायकौफी और लस्सी के दौर तो कभी मिठाईनमकीन और केकपेस्ट्री की दावत. स्टाफरूम को पिकनिक स्पौट बना कर रख दिया है उस ने. सामने तो कोई कुछ नहीं कहता लेकिन पीठ पीछे सभी उन दोनों को ले कर तरहतरह की अनर्गल बातें करते हैं.अजय भी अंधाबहरा नहीं है,

सब सुनता और देखता है. मन तो करता है कि अनुशासनभंग करने के नाम पर मानव को तगड़ी सजा दे लेकिन न तो उस के पास कोई पुख्ता सुबूत हैं और न ही नैना ने कभी उस की शिकायत की. ऐसे में किसी के चरित्र को निशाना बनाना खुद उसे ही भारी पड़ सकता है, इसलिए वह केवल कुढ़ कर रह जाता है.‘‘नैना, तुम अभी नई हो. अत: जितना सीख सकती हो सीख लो.

आगे तुम्हें बहुत काम आएगा. बेकार इधरउधर की बातों में समय बरबाद करना तुम्हारे भविष्य के लिए ठीक नहीं,’’ कह कर अजय नैना को इशारों ही इशारों मेंमानव से दूर रहने की सलाह देता था, लेकिननैना भी जैसे मानव के रंग में रंगी जा रही थी. वैसे भी सरकारी दफ्तरों में काम करना किसे सुहाता है. अधिकतर लोग अपनी हाजिरी पक्की करने की जुगाड़ में ही रहते हैं. नैना भी उसी राह चल रही थी.नैना और मानव का फ्लर्ट पूरे परवान पर था. नोक झोंक और छेड़छाड़ से ले कर रूठना और मनाना तक. कभी चोरीछिपे तो कभी खुलेआम हो रहा था.

‘कोई क्या कहेगा’ जैसी बंदिश तो आज की पीढ़ी मानती ही कहां है. औफिस में सब इस रासलीला को देख कर अपनी आंखें सेंक रहे थे. केवल अजय ही था जो ये सब अपनी आंखों के नीचे होते देख कर सहन नहीं कर पा रहा था.‘‘मानव और तुम्हें ले कर स्टाफ में तरहतरह की बातें हो रही हैं. मैं तुम्हें चेतावनी दे रहा हूं कि औफिस का डेकोरम बना कर रखो. मु झे यहां कोई तमाशा नहीं चाहिए जो करना है, औफिसके बाद करो,’’ कहते हुए एक दिन अजय ने नैना को चेताया.‘‘क्या करूं सर, मैं तो नई हूं और जूनियर भी. मु झे तो सब की सुननी पड़ती है. चाहे मानव हो या आप,’’ नैना ने मासूमियत से जवाब दिया.अजय हालांकि उस के सब इशारे और तंज सम झ रहा था, लेकिन फिलहाल उस के पास कोई पुख्ता सुबूत नहीं था, इसलिए वह भी कुछ न कर पाने के लिए मजबूर था.

कतरा-कतरा जीने दो – भाग 3

रागिनी ने अम्मा का हाथ पकड़ कर कहा, ‘हां अम्मा, हम जानते हैं. तुम चिंता न करो. तुम लोग जो कहोगे, हम वही करेंगे.’

अगले महीने सुगंधा दीदी की शादी थी. रागिनी की खुशियों को जैसे पंख लग गए. दिनरात वहां जाने की तैयारी में लग गई. भइयू के साथ जा कर उस ने न केवल  अपने लिए शादी में पहनने के लिए  खूबसूरत सा लंहगा लिया बल्कि अपनी सुगंधा दीदी और नंदा के लिए ढेर सारे गिफ्ट्स भी खरीदे. अम्मा,  बाऊजी सब के लिए कपड़े खरीदते हुए उस का उत्साह देखते ही बन रहा था. आखिर मुंबई जाना था. वहां के हिसाब से पहनावा होना चाहिए. उस ने अच्छे से पार्लर में अपना हेयरकट करवाया.

पहली बार फेशियल,  ब्लीच करवा कर जब वह सामने आई तो उस की सुंदरता किसी फिल्मी हीरोइन से कम नजर नहीं आ रही थी. बातबात पर रागिनी की खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी. पूरे होस्टल में रागिनी के मुंबई जाने का शोर मच गया.  टिकटें भी बन गईं. लेकिन  ऐन शादी के समय डाक्टर ने अम्मा के मोतियाबिंद के औपरेशन का समय दे दिया  और  अम्मा व बाऊजी ने अपनी टिकटें कैंसिल करवा दीं. नतीजा रागिनी चाह कर भी मुंबई सुगंधा दीदी की शादी में नहीं जा पाई. मुझे बहुत दुख हुआ. महीनों की तैयारी पर मिनटों में पानी फिर गया. मुंबई की जगह  रागिनी को अम्मा की देखभाल के लिए  घर जाना पड़ा.

अम्मा की आंखों के औपरेशन के बाद रागिनी जब होस्टल वापस  आई तो  जब भी मुंबई की बात निकलती, वह फूटफूट कर रो पड़ती. मैं ने समझाया, ‘जाने दो रागिनी, अब रोने से क्या फायदा. तुम्हारी अम्मा औपरेशन की डेट नहीं बढ़वा पाई होंगी. उन की  बहन की बेटी की शादी,   जाना तो उन्हें भी था. अफसोस तो  उन्हें भी हुआ होगा और तुम्हारी कजिन बहनों को भी.’

मैं अवाक रह गई जब रोतेरोते रागिनी ने कहा, ‘नहीं, अम्मा को अफसोस होता तो औपरेशन की डेट  बढ़ जाती. अम्मा का तो पता था,  लेकिन मौसी मम्मी और सुगंधा दीदी ने  कैसे इतनी बड़ी   खुशी में मुझे छोड़ दिया. उन्होंने मुझे बुलाने की कोई कोशिश नहीं की. अम्माबाऊजी पर फोन से दबाव नहीं डाला वरना…’ आगे के शब्द उस के आंसुओं में डूब गए.

मेरी गोदी में सिर रख कर वह घंटों सिसकती रही. उस का इस तरह रोना मेरे अंतर्मन को भिगो गया. ‘अम्मा का तो पता था…’ उस के ये शब्द मेरे मन में हलचल मचा रहे थे. क्या इस की अम्मा सचमुच नहीं चाहती थीं मुंबई जाना या उन की आंखों का  औपरेशन  अभी इतना ही जरूरी था. कितने सपने थे  रागिनी  के सुगंधा दीदी की शादी को ले कर. क्या सुगंधा दीदी और मौसी ने इस के अम्माबाऊजी को नहीं समझाया? रागिनी ने कितनी ही बार सुगंधा दीदी से फोन पर उन की  शादी को ले कर  अपने उत्साह को बताया था. रागिनी को तो कम से कम वे लोग बुलवा सकते थे. इस तरह के प्रश्न मुझे बारबार विचलित कर रहे थे, लेकिन मैं ने इस बारे में रागिनी को ज्यादा कुरेदना उचित नहीं समझा. आखिर यह उन लोगों का पारिवारिक मामला है. फिर रागिनी का जितना भलाबुरा उस के अम्माबाऊजी सोच सकते हैं,  उतना मैं नहीं.

वैसे भी, हमारे पास ये सब सोचने का अब वक्त नहीं था. हमारे फाइनल  इम्तिहान नजदीक थे. हम लोग रातदिन पढ़ाई में लगे थे. रागिनी वैसे तो पढ़ाई के प्रति बहुत  गंभीर थी, लेकिन कुछ दिनों से उस का मन पढ़ाई से कुछ उचटा हुआ लगता था. अकसर चुपचाप सामने बालकनी में बैठ कर कुछ सोचती रहती थी. कभी अपनी डायरी में कुछ लिखती, कभी पुराने अलबम निकाल कर घंटो तसवीरें देखा करती.

एक दिन रागिनी सुबह नहाधो कर बहुत सुंदर सी नई ड्रैस पहने मेरी बालकनी में आ कर बैठ गई. मैं ने उसे देखा तो चौंक कर कहा, ‘अरे रागिनी, कहां की तैयारी है? सुबहसुबह  इतनी सुंदर ड्रैस पहन कर कहां जा रही हो?  रागिनी ने मुसकरा कर कहा, ‘भइयू आने वाला है. आज  उस का बर्थडे है न. यहां से बैठ कर उसी की राह देख रही हूं.’

थोड़ी ही देर में होस्टल के मेन  गेट पर एक मोटरसाइकिल लगी और  उस पर बैठे  6 फुट के लंबे, गोरेचिट्टे और  बेहद स्मार्ट लड़के को मैं ने देखा. ‘मेरा भइयू,’  खुशी से रागिनी हाथ में गिफ्ट का पैकेट ले कर दौड़ पड़ी और वे दोनों मेरी नजरों से ओझल हो गए.

शाम तक रागिनी नहीं आई. अगले दिन सुबह हाथों में मिठाई  और कुछ पैकेट्स  लिए वह मेरे रूम में आई. उस ने बताया, ‘कल दिन में हम लोग मौल गए थे. देखो, हम ने यह ड्रैस ली है. शाम में मुझे भइयू ने  स्पैशल बर्थडे पार्टी दी. बहुत मजा आया. ‘रात 10 बजे भइयू की दिल्ली के लिए ट्रेन थी. वह किसी इंटरव्यू के  लिए जा रहा है, तो उस ने मुझे देर शाम बूआ के घर में छोड़ दिया. अभी मैं वहीं से आ रही हूं.’

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