ऐसे करें अपने पैरों की देखभाल

पैर हमारे शरीर का भार दिनभर उठाते हैं. फिर भी जहां हम बाकी अंगों की देखभाल कर उन की खूबसूरती का पूरा ख्याल रखते हैं, वहीं अकसर पैरों की अनदेखी कर देते हैं, जबकि पैरों को विशेष देखरेख की जरूरत होती है.

एक पुरानी कहावत है कि किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान करने का और यह जानने का कि वह कितना सभ्य है, सब से अच्छा तरीका है उस के पैरों और जूतों का मुआयना करना. इसलिए अपने चेहरे की सुंदरता के साथ-साथ पैरों की सफाई और सुंदरता का भी खास ध्यान रखें और समयसमय पर उन की सफाई, स्क्रबिंग और मास्चराइजिंग करती रहें.

पैरों की सफाई के लिए घोल

एक टब में गुनगुना पानी लें. उसमें 1 कप नीबू का रस, थोड़ा सा इलायची पाउडर, 2 चम्मच औलिव आयल, आधा कप दूध मिला लें. अब इस घोल में 10-15 मिनट के लिए पांव डाल कर बैठ जाएं. फिर किसी माइल्ड सोप से पांव धो लें और कोई अच्छी सी फुट क्रीम लगा लें. चाहें तो फुट लोशन भी लगा सकती हैं.

फुट लोशन कैसे बनाएं

एक गहरे रंग की बोतल लें. उसमें 1 चम्मच बादाम का तेल, 1 चम्मच औलिव आयल, 1 चम्मच व्हीटजर्म आयल, 12 बूंदें यूकेलिप्टस एसेंशियल आयल मिला लें. इसे अच्छी तरह हिलाएं और किसी ठंडी व छायादार जगह पर रख दें. पैरों को साफ करने के बाद उन्हें अच्छी तरह सुखा कर यह लोशन लगाएं.

पैरों की मसाज

दिन भर की थकान के बाद पैरों की मसाज बेहद आवश्यक है. इसके लिए हाथ में 2 चम्मच चीनी लें, फिर उस में 1 चम्मच औलिव आयल या बेबी आयल मिला लें. दोनों हाथों से इस मिश्रण को अच्छी तरह मिला लें फिर इस से लगभग 2 मिनट तक पैरों की मसाज करें.

यदि पैर ज्यादा रूखे हैं तो लंबे समय तक मसाज करें. अब पैरों को गरम पानी से धो लें. आप स्वयं अपने पैरों में फर्क महसूस करेंगी. ये काफी दिनों तक नरम व मुलायम बने रहेंगे. इस से आप हाथों की मसाज भी कर सकती हैं.

देश में महंगी होती शिक्षा

दिल्ली विश्वविद्यालय के अच्छे पर सस्ते कालेजों में एडमीशन पाना अब और टेढ़ा हो गया है क्योंकि केंद्र सरकार ने 12वीं की परीक्षा लेने वाले बोर्डों को नकार कर एक और परीक्षा कराई. कौमन यूनिवर्सिटी एंट्रैस टैस्ट और इस के आधार पर दिल्ली विश्वविद्यालय और बहुत से दूसरे विश्वविद्यालयों के कालेजों में एडमीशन मिला. इस का कोई खास फायदा हुआ होगा यह कहीं से नजर नहीं आ रहा.

दिल्ली विश्वविद्यालय में 12वीं परीक्षा में बैठे सीबीएसई की परीक्षा के अंकों के आधार पर पिछले साल 2021, 59,199 युवाओं को एडमिशन मिला था तो इस बार 51,797 को. पिछले साल 2021 में बिहार पहले 5 बोटों में शामिल नहीं था पर इस बार 1450 स्टूडेंट के रहे जिन्होंने 12वीं बिहार बोर्ड से की और फिर क्यूइटी का एक्जाम दिया. केरल और हरियाणा के स्टूडेंट्स इस बार पहले 5 में से गायब हो गए.

एक और बदलाव हुआ कि अब आट्र्स, खासतौर पर पौलिटिकल साइंस पर ज्यादा जोर जा रहा है बजाए फिजिक्स, कैमिस्ट्री, बायोलौजी जैसी प्योर साइंसेस की ओर यह थोड़ा खतरनाक है कि देश का युवा अब तार्किक न बन कर मार्को में बहने वाला बनता जा रहा है.

क्यूयूइटी परीक्षा को लाया इसलिए गया था कि यह समझा जाता था कि बिहार जैसे बोर्डों में बेहद धांधली होती है और जम कर नकल से नंबर आते हैं. पर क्यूयूइटी की परीक्षा अपनेआप में कोई मैजिक खजाना नहीं है जो टेलेंट व भाषा के ज्ञान को जांच सके. औवजैक्टिव टाइप सवाल एकदम तुक्कों पर ज्यादा निर्भर करते हैं.

क्यूयूइटी की परीक्षा का सब से बड़ा लाभ कोचिंग इंडस्ट्री को हुआ जिन्हे पहले केवल साइंस स्टूडेंट्स को मिला करते थे तो नीट की परीक्षा मेडिकल कालेजों के लिए देते थे और जेइई की परीक्षा इंजीनियरिंग कालेजों के लिए. अब आर्ट्स कालेजों के लाखों बच्चे कोचिंग इंडस्ट्री के नए कस्टमर बन गए हैं.

देश में शिक्षा लगातार मंहगी होती जा रही है. न्यू एजूकेशन पौलिसी के नाम पर जो डौक्यूमैंट सरकार ने जारी किया है उस में सिवाए नारों और वादों के कुछ नहीं है ओर बारबार पुरातन संस्कृति, इतिहास, परंपराओं का नाम ले कर पूरी युवा कौम को पाखंड के गड्ढ़े में धकेलने की साजिश की गई है. शिक्षा को एक पूरे देश में एक डंडे से हांकने की खातिर इस पर केंद्र सरकार ने कब्जा कर लिया है. देश में विविधता गायब होने लगी है. लाभ बड़े शहरों को होने लगा है, ऊंची जातियों की लेयर को होने लगा है.

क्यूयूइटी ने इसे सस्ता बनाने के लिए कुछ नहीं किया. उल्टे ऊंची, अच्छी संस्थाओं में केवल वे आए जिन के मांबाप 12वीं व क्यूयूइटी की कोचिंग पर मोटा पैसा खर्च कर सकें. यह इंतजाम किया गया है. अगर देशभर में इस पर चुप्पी है तो इसलिए कि कोचिंग इंडस्ट्री के पैर गहरे तक जम गए हैं और सरकारें खुद कोचिंग आस्सिटैंस चुनावी वायदों में जोडऩे लगी हैं.

12वीं के बोर्ड ही उच्च शिक्षा संस्थानों के एडमीशन के लिए अकेले मापदंड होने चाहिए. राज्य सरकारों को कहा जा सकता है कि वे बोर्ड परीक्षा ऐसी बनाएं कि बिना कोचिंग के काम चल सके. आज के युवा को मौर्टक्ट की औवजैक्टिव टैस्ट नहीं दिया जाए  बल्कि उन की समझ, भाषा पर पकड़, तर्क की शक्ति को परखा जाए. आज जो हो रहा है वह शिक्षा के नाम पर रेवड़ी बांटना है जो फिर अपनों को दी जा रही है.

ओट 2 हाथों की: जब रिया की जिंदगी में नकुल ने भरे रंग

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न हों आंटी सिंड्रोम का शिकार

चर्चित कोरियोग्राफर फराह खान को एक रिऐलिटी शो के दौरान एक बच्चे ने आंटी कहा तो उन का तुरंत कहना था कि प्लीज, डोंट कौल मी आंटी. माना कि मैं 3 बच्चों की मां हूं, मगर मेरी उम्र इतनी भी अधिक नहीं है कि तुम लोग मुझे आंटी कहो. मुझे दीदी कहो तो ज्यादा अच्छा है अगर 3 बच्चों की मां दीदी कहलाना पसंद करे और वह भी बच्चों से तो इसे क्या कहेंगे? बढ़ती उम्र को ले कर इस तरह का फुतूर सैलिब्रिटीज में ही नहीं आम महिलाओं में भी देखने को मिलता है. दरअसल, यह एक मनोरोग है, जिसे ‘आंटी सिंड्रोम’ कहा जाता है.

उम्र को रिवर्स गियर में डालना असंभव

मुट्ठी में ली गई रेत की तरह हमारी उम्र आहिस्ताआहिस्ता खिसकती जाती है. ऐसा कोई भी उपाय नहीं, जिस से उम्र को रिवर्स गियर में डाला जा सके. यह जिंदगी का फलसफा है, जो बदला नहीं जा सकता. बावजूद इस के उम्र गुजरने का फोबिया महिलाओं को डराता है. इस फोबिया के चलते आंटी सिंड्रोम की गिरफ्त में आने से बचने का प्रयास करना जरूरी है. यह सच है कि बढ़ती उम्र को रोकना हमारे हाथ में नहीं, मगर अपनी पर्सनैलिटी को निरंतर बेहतर बनाते हुए जिंदगी को खूबसूरत आयाम देना हमारे हाथ में है. लोग आप को आंटी कह रहे हैं, तो उन पर खीजने के बजाय उन का शुक्रिया अदा करें, क्योंकि उन के माध्यम से आप को पता तो चला कि आप आंटी लग रही हैं. अब आप गंभीरता से खुद पर ध्यान देना शुरू कर दें. आंटी उन्हीं महिलाओं को कहा जाताहै, जो फिट ऐंड फाइन नजर आना तो चाहती हैं, लेकिन इस के लिए प्रयास नहीं करतीं. आप की चाहत और क्रिया के बीच फासला जितना बढ़ेगा, स्ट्रैस लैवल उतना ही हाई होगा और डैवलप होगा यह मनोरोग.

फिटनैस क्रेजी बनें

50 पार करने के बाद भी कुछ महिलाएं फिट ऐंड फाइन दिखती हैं. उन्हें देख कर हर किसी को रश्क होता है. एक शोध से यह तथ्य सामने आया है कि सुंदरता का आधार स्त्रीत्व होता है. उम्र भले बढ़ जाए, स्त्रीत्व सौंदर्य को सदा जवान रखता है. आप सहज, सरस और फिटनैस क्रेजी रह कर इस सौंदर्य में इजाफा कर सकती हैं. चेहरा खूबसूरत होने के बाद भी आप का आकर्षक दिखना अनिवार्य नहीं है. नैननक्श सही हैं, लेकिन चेहरे पर सख्ती है तो स्त्रीत्व की कोमलता पर ग्रहण लग जाता है. बौडी लैंग्वेज और फिटनैस क्रेजी रहने की आवश्यकता पर ध्यान देने के साथसाथ यह भी जरूरी है कि आप का पहनावा आप की उम्र और आप के मेकअप के अनुरूप हो. अपनी उम्र को काफी कम कर के बताना, पहनावे और स्टाइल में अपनी उम्र से कम उम्र के फैशन को तवज्जो देना नकारात्मक परिणाम देता है.

सनक न बने सुंदर दिखने की चाहत

तेजी से बढ़ते ब्यूटी व्यवसाय और मीडिया इंडस्ट्री द्वारा आम आवाम तक तेजी से पहुंचाई जा रही ग्लैमर वर्ल्ड की दास्तान के चलते महिलाओं में सौंदर्य के प्रति ललक बढ़ी है. लोग छोटेबड़े परदे के स्टार्स से अपनी तुलना करते हैं. फिट और फाइन दिखने (बनने का नहीं) का जनून उन पर हावी है. सुंदर दिखने की चाहत को बलवती बनाएं. उसे पूरी करने का प्रयास करें. मगर इसे जनून न बनने दें. पर्सनैलिटी ग्रूमिंग की ललक ठीक है, किंतु प्राकृतिक सचाई को झुठलाने की सनक ठीक नहीं है. सचाई से भागने का परिणाम यह होगा कि आप को उम्र छिपाने की आदत पड़ जाएगी. जैसे ही लोग आंटी कहना शुरू करेंगे, मनोरोग आप के अंदर घर करने लगेगा.

बदलाव को स्वीकारें

जो महिलाएं जीवन में तिरस्कार झेली होती हैं और जो महिलाएं हीनभावना की शिकार होती हैं, उम्र बढ़ने का तनाव उन में अधिक होता है. उन में आत्मविश्वास की कमी होती है. ऐसे में खुद को ले कर आश्वस्त रहना संभव नहीं हो पाता. सेहत और सौंदर्य के लिए बदलाव को सहजता से स्वीकारें. खूबसूरती आप के ऐटीट्यूड में होती है, आप की उम्र से इस का कोई खास लेनादेना नहीं होता. पर्सनैलिटी वाइब्रेंट है, ऐटीट्यूड लचीला है, तो आप उम्रदराज हो कर भी आकर्षक साबित हो सकती हैं. उम्र निकल जाने के कारण पहले जैसी न दिख पाने का मलाल मन में रखेंगी तो स्वाभाविक सौंदर्य भी खत्म हो जाएगा. केश कलर करने, महंगे सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल करने और स्पैशल स्किन ट्रीटमैंट लेने से भी बात नहीं बनेगी. निश्चय करें कि सौंदर्य आप के तन से नहीं मन से फूटना चाहिए. चेहरे को सहज, शांत रखें और उसे मुसकान दें. खुद को बेशर्त और शिद्दत से प्यार करें. दूसरों से अपनी तुलना करना बंद करें. पार्लर, जिम जाएं पर अपनी ग्रूमिंग की उपेक्षा न करें. -डा. विकास मानव

Bigg Boss 16: Sumbul ने जोड़े सलमान के सामने हाथ, घर जाने की मांगी भीख!

कलर्स का रियलिटी शो ‘बिग बॉस 16’ (Bigg Boss 16) में आए दिन लड़ाइयां होती रहती हैं. वहीं बीते कुछ दिनों से घर का माहौल बिगड़ गया है, जिसके चलते लड़ाइयां हाथापाई तक जा पहुंची है. दरअसल, हाल ही में हुई एमसी स्टैन और शालीन भनौट के बीच हुई लड़ाई ने कई रिश्तों पर सवाल खड़ा कर दिया है. आइए आपको बताते हैं पूरी खबर…

सुंबुल पर लगा ऑब्सेस्ड का टैग

 

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शो की शुरुआत से ही टीना और शालीन की दोस्ती फैंस को खटकी है तो वहीं सुंबुल को नाम इस रिश्ते में हर बार सामने आया है. इसी बीच हाल ही में हुई एक लड़ाई ने सुंबुल का एक बार फिर कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है, जिसके चलते अब सलमान खान ने भी रिश्ते पर सवाल उठा दिया है. दरअसल, बीते एपिसोड में शालीन और एमसी स्टैन के बीच हुई लड़ाई में सुम्बुल का रिएक्शन देखकर फैंस हैरान हो गए हैं. इसी के चलते सोशलमीडिया पर जहां उनका मजाक उड़ रहा है तो वहीं हाल ही के रिलीज किए गए प्रोमो में सलमान ने सुंबुल को फटकारते हुए शालीन के लिए ऑब्सेस्ड होने की बात कही है. वहीं टीना इस बात पर जहां हामी भरती दिख रही हैं तो वहीं सलमान का कहते दिख रहे हैं कि शालीन को भी सुंबुल के बारे में ये बात पता है.

रोने लगीं सुंबुल

सलमान के वीकेंड के वार में सुंबुल को ऑब्सेस्ड कहने पर वह रोती हुई नजर आ रही हैं. इसी के साथ वह घर जाने की बात कहती दिख रही हैं. वहीं सलमान उन्हें घर जाने की बात कहते दिख रहे हैं. वहीं दूसरे प्रोमो में एमसी स्टैन और शिव की शालीन से हुई हाथापाई में सलमान सभी को फटकार लगाते दिख रहे हैं. प्रोमो देखकर जहां सुबुंल के फैंस उदास हैं तो वहीं अपकमिंग एपिसोड के लिए बेताब दिख रहे हैं.


बता दें, बीते दिन शालीन के साथ एमसी स्टैन और शिव ठाकरे की बहस और हाथपाई ने सोशलमीडिया पर दो गुट बना दए हैं. जहां सेलेब्स शालीन के सपोर्ट में दिख रहे हैं तो वहीं फैंस एमसी स्टैन और शिव के सपोर्ट में खड़े हो गए हैं.

18 सालों के संघर्ष के बाद Bollywood में पंकज त्रिपाठी को मिली पहचान, पढ़ें इंटरव्यू

पिछले 18 वर्षों से बौलीवुड में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करते आए अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने ‘निल बटे सन्नाटा’, ‘अनारकली आफ आरा’,‘न्यूटन’,‘फुकरे रिटर्न’,‘स्त्री’,‘गुंजन सक्सेना’ जैसी फिल्मों के साथ ही ओटीटी प्लेटफार्म पर ‘मिर्जापुर’ व ‘क्रिमिनल जस्टिस’ जैसी वेब सीरीज में अपने दमदार अभिनय की बदौलत बौलीवुड में अपनी एक अलग पहचान बना ली है. दर्शक उन्हें अंतरराष्ट्रीय फिल्म ‘‘मैंगो ड्रीम्स’’ के अलावा रजनीकांत के साथ तमिल फिल्म ‘‘काला’’ में भी देख चुके हैं.

प्रस्तुत है पंकज त्रिपाठी से हुई एक्सक्लूसिब बातचीत के खास अंश. .

आपने ‘नेशनल स्कूल आफ ड्रामा’ से अभिनय की ट्रेनिंग हासिल करने के बाद 16 अक्टूबर 2004 में बौलीवुड में कदम रखा था. मगर ‘‘नेशनल स्कूल आफ ड्रामा’ में ‘मैथड एक्टिंग’ सिखायी जाती है,जो कि बॉलीवुड में काम नही आती?

-आपने एकदम सही फरमाया. बीच के कुछ दशकों में काम नही आती थी.  मगर अब काम आने लगी है. ओम पुरी, इरफान खान,नसिरूद्दीन शाह,अनुपम खेर,मुकेश तिवारी,यशपाल राणा,आशुतोष राणा,सीमा विश्वास, रोहिणी हट्टंगड़ी,राज बब्बर व हमारे आने के बाद ‘नेशनल स्कूल आफ ड्रामा’ से ट्रेनिंग लेकर आने वालों की बॉलीवुड में कद्र होने लगी.  इतना ही नही ‘ओटीटी’ प्लेटफार्म के आने के बाद ‘नेशनल स्कूल आफ ड्ामा’ की ‘मैथड एक्टिंग’ ज्यादा काम आने लगी है. यह सभी कलाकार सिनेमाई अभिनय से थोड़ा अलग अभिनय करते थे. अस्सी के दशक में सिनेमा में अलग तरह का अभिनय होता था. अब पैरलल सिनेमा व मेन सिनेमा का विभाजन नही रहा. जो पैरलल है,वह भी मेन स्ट्रीम हो जाती है और जो मेन स्ट्ीम होती है,वह पैरलल हो जाती है. क्योंकि अब सब कुछ बाक्स आफिस की कमायी पर निर्भर करता है. जो ज्यादा कमाई करे,वह मेन स्ट्ीम सिनेमा गिना जाता है. एन एस डी में जिस तरह का अभिनय सिखाया जाता है,उसमें लॉजिक,तर्क,नीड्स,अर्जेंसी, करेक्टराइजेशन,एक्टर प्रिपेअर्स, करेक्टर प्रिपेअरर्स, कंटेंट, टेक्स्ट,सब टेक्स्ट सहित बहुत सारी चीजें सिखायी जाती हैं,जिसका हिंदी सिनेमा में बीच के काल खंड में या कमर्शियल सिनेमा में बहुत जरुरत नही है. न अभिनेता उतनी गहराई में जाते हैं और न ही निर्देशक चाहते हैं कि कलाकार उतनी गहराई में उतरे. लेकिन अब सिनेमा बदला है. दर्शक भी दुनिया भर का सिनेमा देख रहा है. इसलिए अब अभिनय के स्तर में भी बदलव देखा जा रहा है. अब एनएसडी का मैथड एक्टिंग का तरीका कारगर है.

बालीवुड से जुड़ना कैसे हुआ?

-मैं दिल्ली में ही रह रहा था,तभी मुझे घर बैठे ही फिल्म ‘‘रन’’ में छोटा सा किरदार निभाने का अवसर मिल गया था. फिर अक्टूबर 2004 में मंुबई आया. और स्ट्गल का दौर चला. स्ट्गल के दौरान कुछ विज्ञापन फिल्में की. इक्का दुक्का फिल्म व सीरियल करता रहा. पर फिल्म‘‘गैंग ऑफ वासेपुर’’में सुल्तान के किरदार ने मुझे बतौर अभिनेता एक पहचान दिलायी. उसके बाद‘‘फुकरे,‘सिंघम रिटर्न’,‘स्त्री’,‘लुकाछिपी’,‘गंुजनसक्सेना’ सहित कई फिल्में आयी. अब अर्थपूर्ण फिल्मों के साथ साथ व्यावसायिक फिल्में भी कर रहा हूं. मैं वेब सीरीज भी कर रहा हूं. यानी कि काफी व्यस्त हूं.

आपने संघर्ष के दिनों में ज्यादातर हिंसक या गैंगस्टर के ही किरदार निभाए?

-जी नही. . इतने अधिक हिंसक किरदार नहीं निभाए. दूसरी बात मंैने पहले ही कहा कि मेरी कोई योजना नही थी. मेरे पास जो किरदार आए,मैं करता गया. ‘गैंग्स आफ वासेपुर’ में

नगेटिब किरदार था. वह काफी लोकप्रिय हुआ. लेकिन आप ध्यान से देंखेगे तो ‘गैंग्स आफ वासेपुर’ के अलावा वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ में ही नगेटिब किरदार किया है. ‘मिर्जापुर’ के कालीन भईया साफ्ट स्पोकेन हैं. ‘गुड़गांव’ में नगेटिब था. पारंपरिक विलेन नही लगते. इसके अलावा दो तीन छोटी फिल्मों में किए होंगे. उसके बाद आप ‘मसान’, ‘निल बटे सन्नाटा’,‘गंुजन सक्सेना’या ‘क्रिमिनल जस्टिस’ में माधव मिश्रा यह सब पॉजीटिब किरदार ही हैं. मेरे गैंगस्टर वाले किरदार इस कदर लोकप्रिय हुए कि लोगो को अनुभूति होती है कि मंैने गैंगस्टार या नगेटिब किरदार ज्यादा निभाए.

लेकिन आपने ‘निल बटे सन्नाटा’जैसी फिल्मों में सकारात्मक किरदार निभाने के ेबाद ‘गुड़गांव’ में पुनः गैंगस्टर का किरदार निभा लिया?

-इसकी एकमात्र वजह यह थी कि इसकी कहानी बहुत अच्छी थी. किसान किस तरह बिल्डर बनता है और उसकी अपनी क्या स्थिति होती है. जब इंसान अकूट संपत्ति कमा ले,तो फिर उसके लिए सही गलत में कोई फर्क नहीं रह जाता. इसका असर किस तरह से व्यक्ति पर पड़ता है. वह अपनी ही दुनिया में रहने लगता है. एक ग्रंथि का शिकार होकर इंट्ोवर्ट हो जाता है. वह कहानी मुझे बहुत पसंद आयी थी. वह किरदार गैंगस्टर से कहीं ज्यादा एक डार्क फिल्म थी.

फिल्म के निर्देशक श्ंाकर रमण ने जिस तरह से मुझे कहानी सुनायी, उससे मैं बहुत प्रभावित हो गया. इसके अलावा इसके निर्माता भी ‘निल बटे सन्नाटा’ वाले अजय राय ही हैं. तो उनकी बात भी रख ली.

किसी भी किरदार की तैयारी कहां से शुरू होती है?

-आप शायद यकीन न करें,मगर जब हम शौचालय में जाते हैं,तब भी हमारे साथ व हमारे दिमाग में किरदार चलता रहता है. वैसे भी किरदारों की हिस्ट्ी बहुत रोचक चीज है,जो कि दिखता नही है. जैसे कि यह इमारत जिस नींव पर टिकी है,वह नींव दिखती नही है. किरदारों की हिस्ट्ी सोचना मुझे कलाकार के तौर पर मजा देता है. तो में बाथरूम में बैठकर किरदारों की हिस्ट्ी बनाते रहता हूं. उस वक्त यह तय नहीं करता कि किस तरह परफार्म करुंगा. मसलन-यह सोचता हूं कि कालीन भैया,कालीन भैया कैसे बने होंगें? उनके बचपन,स्कूल की पढ़ाई,उनके दोस्त,क्या इतिहास रहा, उस पर जाता हूं. यह रोचक काम होता है. कलाकार के तौर पर मजा आता है. इनमें से कुछ चीजें पटकथा में भी होती हैं. संवाद में भी एक आध जगह आ जाती हैं. इसके अलावा हम निर्देशक से भी बात करते हैं.  कमर्शियल सिनेमा में भी जब कलाकार पूछता है,तो लेखक सोचकर जवाब देता है. मेरा मानना है कि लेखक लिखते समय किरदार की हिस्ट्री के बारे में सोचता होगा. कोई किरदार इस तरह से व्यवहार कर रहा है,तो क्यों कर रहा है? इसकी वजहों पर लेखक भी सोचते ही हैं,लिखते समय.

हर कलाकार दावा करता है कि वह हर किरदार में अपनी निजी जिंदगी का कुछ न कुछ अवश्य पिरोता है. आप भी ऐसा कुछ करते हैं?

-जी हॉ! हम भी ऐसा करते हैं. यह सब हमारी अपनी कल्पनाशक्ति व अनुभव की शक्ति के आधार पर ही होता है. इनके चलते हमारे अभिनय में हमारे जीवन का कोई न कोई हिस्सा आ ही जाएगा. मान लीजिए शादी का दृश्य फिल्माया जा रहा है. अब हमने निजी जीवन में कई शादियां अटैंड की हैं. तो हमें माहौल पता है कि फूफा या मौसा ऐसा करते थे. तो यह अनुभव कलाकार के तौर पर हम रोकना चाहें,तो भी अभिनय में कहीं न कहीं आ ही जाएगा. जिंदगी का अनुभव रोचक होगा ही होगा.

फिल्म ‘न्यूटन’ के किरदार को निभाते समय तो निजी जिंदगी का अनुभव नहीं रहा होगा?

-जी हॉ! उस किरदार में मेरे निजी जीवन का कोई अनुभव नहीं था. मगर मेरे फूफा जी,जो कि नेवी में अफसर हैं, उन दिनों यहीं नजदीक में ही ‘आई एन एस हमला’ में थे. तो मैं उनके पास चला गया था और उनसे ंलबी चैड़ी बातें की थी. लेफ्टीनेंट कमांडेट और उनकी हैरायकी,सब सुना. मैं उनकी कैंटीन में भी जाता था,तो बहुत कुछ देखता था. तो ‘न्यूटन’ के वक्त मैंने कल्पना की कि मेरा किरदार आज न्यूटन से मिल रहा है,पर आज शाम के बाद दोबारा कभी नही मिलेगा. पहले पटकथा में था कि मेरे किरदार को न्यूटन के ेप्रति बड़ी खुन्नस है. कुंठा है. मैने निर्देशक से कहा कि काहे को एरोगेंट या कुंठा? उसे तो पता है कि आज शाम को वोटिंग खत्म होने तक ही इस आदमी को झेलना है,फिर तो मिलना नही है.  तो फिर सिनीकलकाहे को? मेरा किरदार आत्मा सिंह समझ गया कि न्यूटन जिद्दी है,तो उसने तय किया कि इसका मजा लो,इसे खिलाओ. मैने निर्देशक अमित मसुरकर से कहा कि मैं तो ऐसा सोच रहा हूं. उन्होने कहा कि ठीक है,कुछ करो, देखते हैं. आप जो कह रहे हैं,वह दृश्य में किस तरह नजर आता है,वह देखने पर अंतिम निर्णय करते हैं. मैं अपने हिसाब से एक दृश्य में अभिनय करता हूं. आत्मा सिंह, न्यूटन को देखता रहता है. न्यूटन  हाथ से इशारा करता है,तो आत्मा सिंह भी हाथ दिखाता है. तो आत्मा सिंह व न्यूटन के बीच दिनभर चूहे बिल्ली का खेल चलता रहता है. नक्सली इलाका है,इसलिए तनाव भी है. तो कलाकार के जीवन के अनुभव और कल्पनाशक्ति न चाहते हुए भी किरदारों में आ ही जाता है.

‘मिर्जापुर’ के कालीन भैया की प्रेरणा कहां से ली थी?

-मैं एक आध बार पूर्वांचल के बाहुबलियों से मिला था,उनसे मिला भी था. उन्हे देखकर मेरी समझ में आया कि इन्हे दक्षिण भारत जाने वाली किसी ट्ेन में बैठा दिया जाए,तो कोई भी इंसान इनसे डरेगा नही. बल्कि कहेगा कि ,‘जरा सरकिए. मुझे भी बैठना है. ’क्योंकि हर बाहुबली के बारे में लोगो के दिमाग में मीडिया के माध्यम से एक ईमेज है,इसलिए लोग उनसे डरते हैं. अन्यथा वह भी एक इंसान ही है. इसलिए मेरे दिमाग में आया कि बाहुबली कालीन भैया को मैं थोड़ा साफ्ट स्पोकेन व अपप्रिडिक्टेबल बनाता हूं. उनकी नाराजगी या खुशी जल्दी समझ में  न आए.  कालीन भैया हंसकर अपनी खुशी या गुस्सा होकर अपना गुस्सा व्यक्त नहीं करते हैं.

आपने अब तक कई किरदार निभाए. क्या किसी किरदार ने आपकी निजी जिंदगी पर असर किया?

-फिल्म ‘गुड़गांव’ के किरदार ने थोड़ा सा असर किया था. बहुत ही कॉम्पलेक्स किरदार था. इस फिल्म को करते हुए और उसके बाद भी पंद्रह दिनों तक मैं परेशान रहा था.

ऐसे में परेशानी से मुक्त होने के लिए क्या करते हैं?

-कुछ खास नही. घूमना शुरू कर देते हैं. कुछ दिन अलग माहौल में रहते हैं. अथवा दूसरी फिल्म के किरदार की तरफ दिमाग को मोड़ते हैं. जब हम पत्नी व बेटी के साथ घूमने जाते हैं,तो पारिवारिक माहौल में रहते ही दिमाग पूरी तरह से पिछले किरदार से मुक्त हो जाता है. यानी कि उस किरदार का बोझ धीरे धीरे उतर जाता है. इसके अलावा जब नई फिल्म की पटकथा को पढ़ना व उस पर सोचना शुरू करते ेहैं,तब भी पिछला किरदार धीरे धीरे गायब हो जाता है.

बीच में आप फेशबुक पर किस्सा गोई के कुछ किस्से शुरू किए थे. फिर बंद क्यों कर दिया?

-एकमात्र वजह मेरी अति व्यस्तता है. इसके अलावा वीडियो फार्मेट में मेरे इतने इंटरव्यू आ रहे हैं. मेरी अपनी खुद की कहानियां वीडियो फार्मेट में आती हैं. मैने कुछ प्रशंसकों के कहने पर लॉकडाउन एक में ‘किस्सागोई ’ किया था. लोगो ने कहा था कि,‘ हम महामारी की वजह से घरांे में कैद हैं. आप कुछ किस्से सुनाइए. इससे हमारा मनोरंजन होगा और इस मुश्किल वक्त में हौसला मिलेगा. ’ऐसे में बतौर अभिनेता  हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि हम समाज का मनोबल बढ़ाने के लिए कुछ योगदान दें. तो मैंने सोचा कि अपने जीवन से जुड़े कुछ किस्से सुनाऊं,जो कि मनोरंजन के साथ-साथ कुछ प्रेरणादायक भी हों. इन कहानियों में एक संदेश छिपा है. मैं इसी तरह के किस्से सुनाने लगा था. इसलिए मैने छह सात सीरीज चलायी थी. अप्रत्याशित सफलता मिली थी.  मेरे फेश बुक पेज पर एक कहानी को दो करोड़ लोगोंे ने देखा था. पर कुछ माह बाद फिर से सुनाउंगा.

आपको नही लगता कि इंटरनेट के मकड़जाल में युवा पीढ़ी फंसकर रह गयी है?

-जी हॉ!फिलहाल युवा पीढी की समस्या यह है कि युवा पीढ़ी को इंटरनेट ने एक अंधेरे कंुएं में कैद कर लिया है और इंटरनेट कहता है कि सिर्फ वही देेखो,जो हम दिखा रहे हैं. इंटरनेट कहता है कि जो कुछ सीखना है,यहीं से सीखो. यह गलत है.  यदि आप वास्तव में कुछ सीखना चाहते हैं,तो लोगों से मिलना पड़ेगा. आप आसमान में देखोगे,तो सुंदर बादल व उड़ते पंछी भी काफी कुछ सिखाते हैं. बादल में कई तरह की आकृतियां हैं. किताबें पढ़ें. लोगों की पढ़ने की आदत ही खत्म हो गयी है. गलत है. हर इंसान को खासकर युवा पीढ़ी को ज्यादा से ज्यादा किताबें पढ़नी चाहिए.

बीच बीच में आप अपने गांव जाकर किसानी करने लगते हैं. इसके पीछे की सोच क्या है?

-मैं गांव से बहुत जुड़ा हुआ हूं. मेरे माता पिता गांव में ही रहते हैं. मंुबई की जीवन की आपाधापी से कुछ समय निकालकर गांव में समय बिताना सुखद अहसास देता है. फिल्मनगरी की दुनिया तो बनावटी है. गांव में जितने दिन रहता हूं,चप्पल नहीं पहनता हूं. मिट्टी पर नंगे पांच चलता हूं. मंुबई में मिट्टी से हमारा जुड़ाव ही नहीं होता. मुझे खेती, किसानी,खलिहानी बहुत अच्छा लगता है. इसलिए मैं हर तीन माह में कुछसमय के लिए गांव चला जाता हूं. दूसरी बात गांव जाने का मतलब जमीन व जड़ों से जुड़ना होता है. यही वजह है कि मेरा अभिनय अलग नजर आता है. मेरे अभिनय में रिलेटीविटी नजर आती है. देखिए,यदि आपका किसी चीज से या धरती से जुड़ाव नहीं रहेगा ,तब तो रिलेटीविटी का तार टूट जाएगा. मैं हर चीज से जुड़े रीने का प्रयास करता हूं. मुझे झुणका भाकर खाए हुए काफी दिन हो गए. पुणे के पास कैलाश प्रेम होटल है. बहुत अच्छा झुणका भाकर मिलता है. महाराष्ट्यिन भोजन बहुत अच्छा मिलता है.  कल ही हम पति पत्नी आपस में बात कर रहे थे कि एक दिन पुणे झुणका भाकर खाने के लिए चलते हैं. उसके मालिक से हमने बात भी की. मैं वाई से हलदी मंगाता हूं. तलेगांव से बाजरा व मक्का मंगाता हूं. नार्थ इस्ट से मिर्ची आयी है. कच्छ से कॉटन का कपड़ा मंगाता हूं.

2022 में बॉलीवुड फिल्में असफल हो रही हैं और दक्षिण की फिल्में सफल हो रही हैं. इसकी क्या वजह नजर आती है?

-मेरी समझ से लेखन की कमी हो सकती है. वैसे दक्षिण की भी सिर्फ तीन फिल्में ही सफल हुई है. हिंदी की भी दो तीन सफल रही हैं.

बढ़ती जीएसटी और महंगाई

नरेंद्र मोदी सरकार बढ़ते जीएसटी कलेक्शन पर बहुत खुश हो रही है. 2017 में जीएसटी लागू होने के कई सालों तक मासिक कलेक्शन 1 लाख करोड़ के आसपास रही थी पर इस जूनजुलाई से उस में उछाल आया है और 1.72 लाख करोड़ हो गई है. 1.72 लाख करोड़ मिलने होते हैं यह भूल जाइए, यह याद रखिए कि जीएसटी अगर ज्यादा है तो मतलब है कि सरकार जनता से ज्यादा टैक्स वसूल कर रही है. अगर साल भर में टैक्स 25-35 बढ़ता है और लोगों की आमदनी 2-3′ भी नहीं बढ़ती तो मतलब है कि हर घरवाली अपने खर्च काट रही है.

निर्मणा सीतारमन ने नरेंद्र मोदी की तर्ज पर एक आम गृहिणी की तरह अपना वीडियो एक सब्जी की दुकान पर सब्जी खरीदते हुए खिंचवाया. और इसे भाजपा आईटी सेल वायरल किया कि देखो वित्त मंत्री भी आम औरत की तरह हैं. पर यह नहीं समझाया गया कि सब्जी पर भी भारी टैक्स लगा हुआ या चाहे वह उस मिडिल एज्ड दुकानदार महिला ने चार्ज वहीं किया हो.

सब्जी आज दूर गांवों से आती है और ट्रक पर लद कर आती है. इस ट्रक पर जीएसटी, डीजल पर केंद्र सरकार का टैक्स है. सब्जी जिस खेत में उगाई जाती है उस पर चाहे लगान न हो पर जिस पंप से पानी दिया जाता है उस पर टैक्स है, जिस बोरी में सब्जी भरी गई, उस पर टैक्स है, जिस केब्रिज पर बोली गई उस पर टैक्स है.

उस एज्ड दुकानदार ने जिन इस्तेमाल किए लकड़ी के तख्तों पर अपनी दुकान लगाई, उन पर टैक्स है, जीवनी उस ने चलाई उस पर टैक्स है, जिस थैली, चाहे कागज की हो या पौलीथीन की हो, उस पर टैक्स है. निर्मला सीतारमन 100-200 रुपए की जो सब्जी खरीदी थी उस पर कितना है या इस का अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है.

बढ़ता जीएसटी देश के बढ़ते उत्पादन को नहीं जानता यह महंगार्ई को भी बताता है. पिछले एक साल से हर चीज का दाम बढ़ रहा है. दाम बढ़ेंगे तो टैक्स भी बढ़ेगा. हर घर वेसे ही बढ़ती कीमत से परेशान है पर वह इस के लिए जिम्मा दुकानदार या बनाने वाले को ठहराता है जबकि कच्चे माल से दुकान तक बढ़ी कीमत वाले मौल पर कितना ज्यादा जीएसटी देना पड़ा. यह नहीं सोचता.

वह इसलिए नहीं सोचता क्योंकि उसे पट्टी पढ़ा दी गई है कि उस के आकाओं ने उसे राममंदिर दिला दिया, चारधाम का रास्ता साफ कर दिया, महाकाल के मंदिर को ठीक कर दिया तो सभी भला करेगा. वह मंदिरों को अपनी झोली खुदबखुद खाली कर के देता है और सरकार उस की झोली से बंदूक के बल पर छीन लेती है.

अमीरी का डर: खाई अंतर्मन की

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घर से भागना नहीं है समाधान

वे कौन से हालात हैं जो लड़की को घर छोड़ने को मजबूर कर देते हैं. आमतौर पर सारा दोष लड़की पर मढ़ दिया जाता है, जबकि ऐसे अनेक कारण होते हैं, जो लड़की को खुद के साथ इतना बड़ा अन्याय करने पर मजबूर कर देते हैं. जिन लड़कियों में हालात का सामना करने का साहस नहीं होता वे आत्महत्या तक कर लेती हैं. मगर जो जीना चाहती हैं, स्वतंत्र हो कर कुछ करना चाहती हैं वे ही हालात से बचने का उपाय घर से भागने को समझती हैं. यह उन की मजबूरी है. इस का एक कारण आज का बदलता परिवेश है. आज होता यह है कि पहले मातापिता लड़कियों को आजादी तो दे देते हैं, लेकिन जब लड़की परिवेश के साथ खुद को बदलने लगती है, तो यह उन्हें यानी मातापिता को रास नहीं आता है.

कुछ ऊंचनीच होने पर मध्यवर्गीय लड़कियों को समझाने की जगह उन्हें मारापीटा जाता है. तरहतरह के ताने दिए जाते हैं, जिस से लड़की की कोमल भावनाएं आहत होती हैं और वह विद्रोही बन जाती है. घर के आए दिन के प्रताड़ना भरे माहौल से त्रस्त हो कर वह घर से भागने जैसा कदम उठाने को मजबूर हो जाती है. यह जरूरी नहीं है कि लड़की यह कदम किसी के साथ गलत संबंध स्थापित करने के लिए उठाती है. दरअसल, जब घरेलू माहौल से मानसिक रूप से उसे बहुत परेशानी होने लगती है तो उस समय उसे कोई और रास्ता नजर नहीं आता. तब बाहरी परिवेश उसे आकर्षित करता है. मातापिता का उस के साथ किया जाने वाला उपेक्षित व्यवहार बाहरी माहौल के आगोश में खुद को छिपाने के लिए उसे बाध्य कर देता है.

आज लड़केलड़कियों को समान दर्जा दिया जा रहा है. उन में आपस में मित्रता आम बात है. मगर पाखंडों में डूबे मध्यवर्गीय परिवारों में लड़कियों का लड़कों से दोस्ती करने को शक की निगाह से देखा जाता है. यदि कोई लड़की किसी लड़के से बात करती है, तो उस पर संदेह किया जाता है. जब घर वालों के व्यंग्यबाण लड़की की भावनाओं को आहत करते हैं तो उस के अंदर विद्रोह की भावना जागती है, क्योंकि वह सोचती है कि जब वह गलत नहीं है तब भी उसे संदेह की नजरों से देखा जा रहा है, तो क्यों न अपने व्यक्तित्व को लोग और समाज जैसा सोचते हैं वैसा ही बना लिया जाए? जब बात सीमा से परे या सहनशक्ति से बाहर हो जाती है तो यह विद्रोह की भावना विस्फोट का रूप इख्तियार कर लेती है. लेकिन ऐसे हालात में भी घर वालों का सहयोगात्मक रवैया उस के बाहर बढ़ते कदमों को रोक सकता है, मगर अकसर मातापिता का उपेक्षापूर्ण रवैया ही इस के लिए सब से ज्यादा जिम्मेदार रहता है.

मातापिता की बड़ी भूल

ज्यादातर मातापिता सहयोग की भावना की जगह गुस्से से काम लेते हैं. दरअसल, युवावस्था एक ऐसी अवस्था होती है, जब बच्चों को सब कुछ नयानया लगता है. उन के मन में सब को जानने और समझने की जिज्ञासा रहती है. यदि उन्हें सही ढंग से समझाया जाए तो वे ऐसे कदम न उठाएं, क्योंकि यह उम्र का ऐसा पड़ाव होता है, जहां वह किसी के रोके नहीं रुकता. युवा बच्चे के मन की हर बात, हर इच्छा उस पर जनून बन कर सवार होती है, जिसे सिर्फ और सिर्फ मातापिता की सहानुभूति और प्रेमपूर्ण व्यवहार ही शिथिल कर सकता है. यदि मातापिता यह सोचते हैं कि बच्चे उन की डांट, मार या उपेक्षापूर्ण रवैए से सुधर जाएंगे तो यह उन की सब से बड़ी भूल होती है.

जरूरी है सहयोगात्मक रवैया

माना कि लड़कियों के घर से भागने की जिम्मेदार वे खुद हैं. पर इस में मातापिता और परिवेश का भी पूरापूरा योगदान रहता है. मातापिता लड़कियों की भावनाओं को समझने का प्रयास नहीं करते. जबकि उन का सहयोगात्मक रवैया बेहद जरूरी होता है. मगर लड़कियों को भी चाहिए कि वे भावावेश या जिद में आ कर कोई निर्णय न लें. बड़ों की बात को विवेकपूर्ण सुन कर ही कोई निर्णय करें, क्योंकि यथार्थ यह भी है कि एक पीढ़ी अंतराल के कारण विचारों में परिवर्तन होता है, जिस से मतभेद स्थापित होते हैं. बड़ों का विरोध करें, मगर उन की उचित बातों को जरूर मानें वरना यही पलायन प्रवृत्ति जारी रही तो आप ही जरा कल्पना कीजिए कि भविष्य में हमारे समाज का स्वरूप क्या होगा?

टैक्स्चर के अनुरूप करें बालों की केयर

आप के बालों का आकारप्रकार न केवल आप की जीवनशैली को प्रदर्शित करता है, बल्कि आप की मनोस्थिति का भी आभास देता है. बालों का प्राकृतिक सौंदर्य बनाए रखने के लिए जरूरी है कि उन की बनावट को ध्यान में रख कर उन की देखभाल की जाए.

कैसे करें टैक्स्चर के अनुरूप बालों की केयर जानते हैं इशिका तनेजा से.

सामान्य बाल और उन की देखभाल

– अगर आप को गरमी के मौसम में 2 दिन बाद और सर्दी के मौसम में 3 दिन बाद बाल धोने की जरूरत महसूस हो, तो समझें आप के बाल सामान्य हैं. जरूरत और समय के अनुसार बालों को वाश करती रहें.

– हफ्ते में 1 बार रात को तिल और बादाम के तेल को मिक्स कर के बालों की मसाज कर सुबह शैंपू से धो लें.

– बालों को ज्यादा टाइट बांध कर न सोएं और धोने के लिए कुनकुने पानी का प्रयोग करें.

– सामान्य बालों को ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती. इन में बादाम, नारियल या आंवले का कोई भी तेल लगा सकती हैं.

औयली बाल और उन की देखभाल

अगर बाल धोने के बाद गरमी के मौसम में अगले दिन और सर्दियों के 2 दिन में ही चिपचिपे लगें और उन्हें दोबारा धोने की जरूरत महसूस हो, तो समझ जाएं कि बाल तैलीय हैं.

– शैंपू करने से सिर की त्वचा एवं बालों से तेल की सफाई हो जाती है, रूसी, धूल इत्यादि दूर हो जाती है. इसलिए बालों को सप्ताह में कम से कम 1 बार शैंपू से धो लेना चाहिए. शैंपू से बालों का पीएच लैवल बना रहता है.

– बाल फूलेफूले व खिले हुए रहें इस के लिए नीबू का प्रयोग कंडीशनर की तरह करें. 1 मग पानी में 1/2 नीबू डालें. बालों को वाश करने के बाद इस पानी से लास्ट रिंस करें.

– औयली बाल बिना तेल लगाए ही तेल लगे बालों जैसे दिखते हैं, क्योंकि इस तरह के बाल पहले से ही नमीयुक्त होते हैं. इन बालों को अच्छी तरह साफ करने की जरूरत होती है, क्योंकि ये जल्दी गंदे हो जाते हैं. इन में जैतून या तिल के तेल का प्रयोग कर सकती हैं.

– यदि बाल अत्यधिक तैलीय होने के कारण सिर में रूसी हो गई है, तो 1/2 कप पानी में 1 चम्मच त्रिफला डाल कर कुछ देर उबाल कर ठंडा होने दें. फिर छान लें. अब इस में 1 चम्मच सिरका मिला कर रात में बालों में लगाएं और फिर मसाज करें. सुबह बालों को शैंपू से धो लें.

– ठंड में बालों में रूसी होने लगती है, इसलिए मौइश्चराइजिंग यानी जिस में बादाम, औलिव औयल और शहद जैसी चीजें हों का इस्तेमाल करें.

– डैंड्रफ को हलके में न लें. वरना यह बालों तक न्यूट्रिशन नहीं पहुंचने देगा. इस के लिए नीम के कैप्सूल खा सकती हैं या उन्हीं कैप्सूलों को काट कर बालों में लगा सकती हैं. ऐक्सपर्ट की सलाह लेना बेहतर होगा.

ड्राई बाल और उन की देखभाल

शैंपू और कंडीशनर करने के बावजूद यदि बाल रूखेसूखे और सख्त दिखाई दें, तो समझ जाएं कि बालों का टैक्स्चर शुष्क है.

– बाल धोने से पहले औलिव और कैस्टर औयल को मिक्स कर के सिर की मालिश करें.

– घरेलू कंडीशनर के तौर पर अंडे में नीबू और औलिव औयल की कुछ बूंदें मिला कर बालों में लेप की तरह 1/2 घंटा लगाए रखें. फिर किसी कंडीशनरयुक्त शैंपू से सिर धो लें ताकि अंडे की गंध चली जाए.

– रूखे बालों के लिए ऐसे तेल का चुनाव करें, जो उन्हें अंदरूनी तौर पर नमी प्रदान करे. इस के लिए नारियल, जैतून या सरसों का तेल बालों में लगा सकती हैं. बालों के अंदर तक तेल पहुंचाने के लिए बालों की तेल से मालिश करने के बाद गरम तौलिए की भाप लें. इस से तेल बालों की जड़ों तक आसानी से पहुंच जाएगा. यह बालों को अंदरूनी पोषण देने का काम करता है.

– ठंड के दिनों में अर्निका ट्री औयल इस्तेमाल करें. यह वाटर बेस्ड होता है. पानी जैसा पतला होने के कारण स्कैल्प इसे तुरंत अजौर्ब कर लेती है. इस से हेयरफाल

नहीं होगा और न ही स्कैल्प ड्राई होगी.

– इशिका तनेजा, ऐग्जीक्यूटिव डाइरैक्टर, एल्प्स कौस्मैटिक क्लीनिक

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