वकीलनी-भाग3 : अमीरों को जाल में फंसाती श्यामा

वह घबरा सी गई, ‘‘वकील साहब ही उस समय बुलाते हैं.’’ मैं ने कहा, ‘‘पर यह समय तो अदालत का होता है. वह यहां कैसे रहते हैं?’’मैडम जिस दिन साहब के केस नहीं होते. उसी दिन बुलाते हैं.’’

‘‘यानी वे तुम्हें फोन करते हैं. आमतौर पर क्लाइंट ही फोन करते हैं वकीलों को,’’ मैं ने कड़क आवाज में पूछा. ये आवाज मैं ने अपने ससुर से सीख ली थी.

‘‘जीजी वे मु?ो अच्छे लगते हैं, इसलिए मैं उन की डायरी देखती रहती थी और उस दिन आती थी जिस दिन उन का अदालत में केस न हो,’’ वह सफाई देती बोली.

‘‘अभी तो तुम कह रही थी कि सुयश तुम्हें फोन कर के बुलाते हैं. अब उलटा कह रही हो. यह ?ाठ क्यों बोल रही हो,’’ मैं ने अपनी आवाज कड़क बनाए रखते हुए पूछा.

‘‘जीजी, कभी मैं फोन करती थी तो वे इस समय बुला लेते थे.’’

‘‘ये बुला लेते थे या तुम धमक जाती थी? सच बोलो?’’

‘‘नहीं मैडम मैं सच कह रही हूं. मैं तो वैसे ही रेप की मारी हूं. समाज में मेरी कोई इज्जत नहीं है. मैं भला किस खेत की मूली हूं,’’ वह रोआंसे शक्ल में बोली.

‘‘अच्छा अपना मोबाइल दो,’’ मैं ने उस का मोबाइल देते हुए कहा.

अब वह चौकन्नी हो गई. उसे पता लग गया कि मैं ने कुछ पकड़ा है. क्या, यह मु?ो नहीं मालूम. वह मु?ा से मोबाइल छीनने बढ़ी ही थी कि मैं ने डपट कर कहा, ‘‘चुप बैठ जाओ. साहब की असिस्टैंट और स्टाफ यहीं है. मेरे बुलाते ही आ जाएंगे.’’

अब वह अचानक रोने लगी, ‘‘मैडम साहब से हमें बचा लो. साहब हमें छेड़ते हैं कि हम उन के साथ सोएं वरना केस खराब कर देंगे… मोबाइल में देख लो. उन की रिकौर्डिंग की है.’’

अब मु?ो सम?ा आ गया कि सुयश इन दिनों क्यों परेशान दिखते हैं. यह औरत बहुत चालू है. इस ने रतन सिंह को फंसा दिया और अब सुसश से मुक्त में काम कराना चाहती है. उन्हें ब्लैकमेल कर रही है.

मैं ने श्यामा के फोन को देखा. उस पर पासवर्ड नहीं था. मैं ने देखा कि लास्ट कौल ‘वकील

जानू’ के नाम से दर्ज थी. मैं ने बटन दबा दिया और स्पीकर चालू कर दिया.

‘‘श्यामा यह क्या मखौल कर रही हो. जानती हो, तुम मु?ो ब्लैकमेल कर रही हो. वकील से उल?ाना ठीक नहीं. मैं ने तुम्हें ढील दी, बेचारी सम?ा कर, अब तुम मु?ा पर औडियो के नाम पर तोहमत लगा रही हो. मेरे पत्नी मीनाक्षी को पता चल गया तो बहुत बुरा होगा.’’

सुयश सोच रहे थे कि श्यामा ने बाहर जा कर उसे फोन करा है. मैं ने जोर से कहा, ‘‘सुयश, मैं मीनाक्षी. तुरंत बैडरूम में आओ. आशा और महिमा को भी ले आओ.’’

‘‘तुम्हारे पास श्यामा का फोन वैसे?’’ सुयश चकरा गए. फिर 1 मिनट में तीनों बैडरूम में थे.

मैं जानती थी कि अब मु?ो श्यामा को एक क्षण भी सफाई नहीं देने देनी है. मैं ने डपट कर कहा, ‘‘श्यामा खैरीयत इसी में है कि तुम सबकुछ उगल दो वरना तुम्हारी लाश भी घर से बाहर नहीं जाएगी. जानती हो न सुयश के डैड एसपी रह चुके हैं. उन के  हाथ बहुत लंबे हैं. तुम मेरी आड़ में सुयश के भोलेपन का फायदा उठा रही थी. मैं ही उस से कहती थी कि हमारे देश में रेप विक्टिम को कोई हैल्प नहीं करता. उन्हें समाज भी सपोट नहीं करता, फैमिली भी नहीं. कानून तो करे न्याय उन के साथ. तुम ?ाठे मुकदमे दायर करने में सुयश को पार्टनर बनाना चाहती थी या नहीं?’’

आखिरी बात मेरी अपनी थी, बिना किसी आधार के. पर लगा कि यह तीर सही जगह पर लगा. श्यामा गिर कर रोने लगी, ‘‘हां, मैडम मेरा ही दोष है. मैं ही वकील साहब को इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही थी. मैं तो वीडियो बना रही थी जब इन्होंने रोक लिया और मु?ो कमरे से भगा दिया जब आप ने मु?ो देखा था… मु?ो माफ  कर दो.’’

सुयश मुंह खोले सारा तमाशा देख रहे थे. श्यामा और बहुत कुछ बक रही थी. आशा और महिमा ने भी कई बातें बताईं.

मैं ने उस का सारा बयान उसी के मोबाइल पर रिकौर्ड कर लिया और अपनी 2 सहेलियों को भेज दिया जिन से अकसर फील्ड इंटरव्यू शेयर किया करती थी. श्यामा सम?ा गई थी. दहाड़ें मारमार कर रो रही थी.

‘सुयश तुम इस की फाइल वापस करो. यह लड़की किसी सिंपैथी की हकदार नहीं है.’’

अब पासा पलट चुका था. सुयश के चेहरे पर रौनक वापस आने लगी थी.

अगली रात जब श्यामा का किस्सा निबट गया तो सुयश बोले, ‘‘मीनाक्षी तुम

स्कूल छोड़ दो. मु?ो भरोसा है कि अब डैड की इनकम पर नहीं हम दोनों अपनी इनकम पर जी सकते हैं.’’

मैं अंचभे में सुयश का मुंह देखने लगी,‘‘हां हमारा बोर्ड होगा- ‘सुयश ऐंड मीनाक्षी कंपनी’ सुयश एलएलवी, एडवोकेट ऐंड मीनाक्षी सोशियोलौजिस्ट एडवाइजर स्पैशलिस्ट इन वूमन… हमारा मुकाबला कोई नहीं कर पाएगा. तुम सीनियर एडवाइजर, मैं जूनियर वकील.’’

मैं कुछ कहती, इस से पहले सुयश बोले ‘आईएम सौरी फौर विहेविंग नैस्टिली अर्लियर. यू आर ए जैम.’ तुम्हारे बगैर अधूरे हैं हम दो.

मैं ने कहा, ‘‘हां हम 2 नहीं 3.’’ और फिर पेट पर हौले से हाथ फेरा. सुयश खुशी से चिल्लाए, ‘‘आहवाह, क्या अच्छी खबर है, एक और वकील घर में.’’

‘‘कभी नहीं. मैं उसे कभी वकील नहीं बनने दूंगी. न जाने कौन श्यामा या रतन सिंह पल्ले पड़ जाए,’’ वह रात हमारी असली हनीमून की थी.

वकीलनी-भाग2 : अमीरों को जाल में फंसाती श्यामा

‘‘हां, श्यामा तो जिस समय रतन सिंह तुम्हारे खेत पर आया, तब तुम क्या रही थी?’’

मुवक्किला चुप थी. मैं ने थोड़ा सा परदा उठा कर उस स्त्री को देखा जिस को बलात्कार के मुकदमे में मेरे पति अदालत में दिया जाने वाला बयान सिखला रहे थे.

‘‘हां, बोलो, क्या कहोगी?’’

‘‘साहब, उस समय मैं खेत पर नहीं थी.’‘‘नहीं, श्यामा, यह बयान नहीं चलेगा. मुकदमा हारना है क्या? पुलिस में लिखे बयान को भूल जाओ. तुम्हें तो यह कहना है कि उस समय मैं खेत पर थी और तभी रतन सिंह…

‘‘ठीक है, साहब.’’

रात को मैं ने सुयश पति से पूछा, ‘‘क्यों, तुम्हारा यह सुबह वाला बलात्कार का मुकदमा सच्चा है या ?ाठा? किसी को फंसा तो नहीं रहे हो?’’

ये चौंक कर बोले, ‘‘लगता है तुम्हारी इस मुकदमे में काफी रुचि पैदा हो गई है.’’

‘‘नहींनहीं, भला मैं इस में क्यों रुचि लेने लगी? मैं तो यों ही जिज्ञासा शांत कर रही हूं.’’

ये सुन कर यह हंसने लगे. फिर कुछ देर बाद बोले, ‘‘मुकदमा तो एकदम सच्चा है, पर इन

लोगों ने आरंभ में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराते समय अपने बयान बिगाड़ दिए हैं. उन्हें सुधारना तो पड़ेगा ही.’’

‘‘जब इतनी बड़ी गलती हुई है तो तुम कैसे मुकदमा जीतोगे?’’

‘‘अरे, तुम तो वकील और न्यायाधीश की भी बाप हो गईं. यह धंधा तो ऐसा है कि जहां बूंद भर पानी न हो, वहां समुद्र साबित करना पड़ता है.’’

उस समय मेरी सलाह को इन्होंने हवा में उड़ा दिया था.

एक बार मैं ने पूछा था, ‘‘जिंदगीभर ससुरजी के बूते पर जीने का इरादा है? भला इस में हमारी कौन सी शान है? धोती लाना हो तो बाबूजी रुपए देगे. पिक्चर जाना हो तो बाबूजी की इजाजत लो. मैं तो आप की तनख्वाह में जीना चाहती हूं.’’

‘‘लो, तुम तो आते ही घर फोड़ने की बात करने लगीं,’’ इन्होंने बात का पैंतरा बदलत हुए कहा.

‘‘छि:छि:… कितना गलत सोचते हैं आप,’’ मैं रोआंसे स्वर में अपना अगला सु?ाव भी कह गई.

अच्छा जाने दो, पर क्या आप किन्हीं विशिष्ट मामलों के नामी वकील बन कर नहीं कमा सकते? बताइए, आप किन मामलों के विशेषज्ञ बनना पसंद करेंगे.’’

इन्होंने क्रोधित होते मेरे प्रस्ताव की धज्जियां उड़ा दीं, ‘‘बाप रे, वकील मु?ो नहीं तुम्हें होना चाहिए था. देखो, बाकायदा डिगरी मैं ने ली है, तुम ने नहीं. फालतू बहस मत करो. और हां, आगे भी ऐसी ऊलजलूल बातों से दिमाग मत खराब करना.’’

ये सब सुन कर मु?ो चोट तो लगी और सुयश ने मु?ो किसी मुवक्किल को डांटने वाले अंदाज

में फटकार कर मेरा जो अपमान किया, उसे मैं काफी दिन तक नहीं भुला सकी.

मैं ने उसी दिन कान पकड़ कर प्रण कर लिया था कि अब चाहे जो हो इन से कभी जबान नहीं लड़ाऊंगी. पर हां, मेरी जो औलाद होगी उसे वकील कभी नहीं बनाऊंगी.

2- महीनों वर्षों में इन आंखों ने बहुत देखा है. नकली व्यस्तता का भाव जता कर इन का मु?ा से कन्नी काटना, वकालत न चलने पर भी ?ाठा रोब और वकील होने की शेखी बघारना.

मैं तो पते की बात कहती हूं कि यदि बाबूजी न होते तो क्या होगा? ससुरजी के दम पर ही यह गुलछर्रे उड़ा रहे हैं. इन की चेहरे की चमक का राज दरअसल इन के पिता ही हैं.

कुछ दिन बाद मैं ने देखा कि श्यामा फिर आने लगी है. मु?ो लगा कि उस केस की तारीखें पड़ती होंगी, इसलिए आ रही है.

‘यह श्यामा कितनी फीस देनी वाली है?’’ मैं ने एक दिन उत्सुकता से पूछा.

‘‘यही कोई 50 हजार. 20 हजार पेशगी दे गईर् है. तुम क्यों पूछ रही हो?’’

‘‘यों ही, उस के लटकों?ाटकों से लग रहा था कि वह खेलीखाई है और उस का रेप शायद नहीं हुआ होगा,’’ मैं बोली.

सुयश कुछ चौंके, फिर बोले, ‘‘हां मामला रजामंदी का है. इस श्यामा ने रतन सिंह को खुद ही बुलाया था. ये दोनों कई बार मिले और कई बार दोनों में संबंध हुआ होगा, ऐसा मु?ो लगता है. श्यामा ने रतन सिंह के खेत पर आते हुए अपने मोबाइल पर खींचे फोटो दिखाए थे तो उन में यह रेपिस्ट के मूड में नहीं लग रहा था.’’

फिर कुछ रुक कर सुयश ने कहा, ‘‘श्यामा एक कौंस्टेबल की बेटी है जो कि डैडी के साथ कार्य कर चुका है. इसलिए मैं ने उस का केस लिया है. वैसे ही दिखने में पटाका लगती है. मु?ो नहीं लगता कि इस ने कभी खेतों में काम किया होगा. कुछ तो छिपा रही है.’’

कुछ ही महीनों में श्यामा फिर आई. इस बार वह जींसटौप में थी. मु?ो बाहर मिली जब मैं स्कूल जा रही थी. गहरी लिपस्टिक, उन्नत वक्ष, तना बदन. रोमरोम उस का अटै्रक्ट कर रहा था. मु?ो कुछ

संदेह हुआ कि यह सुबहसुबह क्यों आई. पर मैं जल्दी में थी, इसलिए चली गई.

अगले दिन से देखा सुयश कुछ परेशान नजर आ रहे थे. मैं ने कई बार कुरेदा तो बोले, ‘‘नहीं कोई बात नहीं.’’

उन की असिस्टैंटों को टटोला तो पता चला कि साहब श्यामा के साथ 2-2 घंटे बैठे केस की तैयारी करते रहे थे. कई बार उन्हें भी आने नहीं देते थे. श्यामा अकसर कमरा बंद कर देती थी.

‘‘हमें श्यामा ने कहा कि इस मामले में रतन सिंह ने कई जासूस छोड़ रखे हैं. न जाने कौन क्लाइंट की शक्ल में आ कर हमारी बात सुन ले. मैडम, आप जानती हैं न कि नौकर के बाहर के कमरे में ही क्लाइंट बैठते हैं और हमें भी पता नहीं होता कि कौन कहां से क्यों आया जब तक उन की फाइल तैयार न हो.’’

मुझे कुछ खटका लगा. कहीं कुछ चक्कर है. 2 दिन बाद श्यामा तब दिखाई दी जब वह बाहर जा रही थी और मैं स्कूल से आ रही थी. आज उस ने गांव की लड़कियों वाले कपड़े पहने हुए थे. चुन्नी सिर पर थी. बाल बिखरे हुए. मैं ने उसे रोक कर पूछा, ‘‘तुम श्यामा हो न? तुम्हारा रेप का केस है न?’’

वह कुछ सकपकाई, फिर पूछने लगी, ‘‘आप कौन?’’

‘‘मैं मिसेज सुयश की पत्नी वकीलनी. आओ तुम से बात करनी है. कमरे में चलो.’’

‘‘नहीं मैडम फिर किसी दिन आऊंगी. आज जल्दी में हूं’’

मैं ने जोर दिखाते हुए कहा, ‘‘नहीं आज ही. जो काम करना या जहां जाना है वह छोड़ दो. फोन कर दो कि तुम नहीं आ सकती.’’

मेरे तेवर देख कर शायद वह डर गई. मैं उस जैसा गांव की औरतों के बारे में बहुत कुछ

 

पढ़ चुकी थी और जानती थी कि ये किस व्यवहार से काबू में रहती हैं. वह चुपचाप मेरे पीछे चली आई.

इधरउधर, उस के घरगांव की बातों के बाद में मुद्दे पर आई, ‘‘तुम वकील साहब के यहां कई बार आई हो न?’’ ‘हां,’’ उस ने कहा.

‘‘तुम तभी क्यों आती हो जब मेरा स्कूल का समय होता है?’’ मैं ने तमक कर पूछा.

 

वकीलनी-भाग1 : अमीरों को जाल में फंसाती श्यामा

मैंबेहद गुस्से में उस दिन को कोस रही हूं जिस दिन मेरा प्रेम एक वकील से हुआ. मैं एमए कर रही थी. सोशियोलौजी में और सुयश वकालत पढ़ कर आ चुका था. मैट्रीमोनियल साइट से हमारी शादी हुई. मैं उस

से मिली और वह बेहद सुल?ा इंसान लगा तो 15-20 बार कौफी पर उस के पैसे खर्च करा कर मैं ने हां कर दी. कई दोस्तों ने पता किया और तारीफों के पुल बांधे. सुयश ने सब को पार्टियों में भी खूब खिलायापिलाया और सगाई हुई थी.

 

अपने मांबाप से ले कर उन तमाम रिश्तेदारों पर मु?ो बेहद गुस्सा आ रहा था कि मैं ने इंजीनियर, डाक्टर, प्रोफैसर या किसी व्यापारी को नहीं ढूंढा. लेदे कर मेरे लिए ये वकील ही मिले, जिन के पेशे को गांधीजी जैसे संत भी भला नहीं सम?ाते थे.

 

वकालत का पेशा भी क्या पेशा? यों सम?िए कि यह चोरउचक्कों और बदमाशों की पैरवी की एक कला है जिस से घर तो भर जाता है, पर घर वालों के लिए यह मुसीबत ही है. सुबहसुबह कितने ही भले बनने का प्रण कर लो, फिर भी उठते ही ?ाठ का सामना करना पड़ता है अथवा बोलना पड़ता है. ?ाठ ही खाना, ?ाठ ही पहननाओढ़ना. सच मानिए वकील की पूरी दिनचर्या ही ?ाठ होती है.

 

उस जमाने की बात जाने दीजिए जब वकीलों की जमात ने इस देश को आजाद कराने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. उस समय नैतिकता मरी नहीं थी. आज तो गलीगली एडवोकेट का बोर्ड टांगने वाले इस पेशे के लोगों को ‘बार’ यानी कचहरी में वकीलों के उठनेबैठने के लिए विशेष रूप से बने कक्ष में बैठेबैठे मक्खियां मारते अथवा ताश के खेल में समय गुजारते देखा जा सकता है. आज समस्या आ खड़ी है कि इन का धंधा कैसे चले.

 

कुछ गिनेचुने बड़ेबड़े वकीलों की बात जाने दीजिए. जिन की दुकानदारी जम गई है और जिन्होंने बैंकों में बड़ीबड़ी रकमें जमा कर लेने के साथ कोठियां भी खड़ी कर ली हैं, पर क्या आप जानते हैं कि अधिकतर वकीलों को किन मुसीबतों का सामना करना पड़ता है? न्यायालय में धर्म की दुहाई देते हुए गीता, कुरानशरीफ या गंगाजल की कसमें खाई जाती हैं. पर हाय, चोरीछिपे मुकदमे के फैसले से ले कर सम?ौता कराने तक जो बंदरबांट वकील के मुंशी से ले कर ऊपर तक मची है वह क्या इस पेशे पर लानत भेजने को काफी नहीं है.

मु?ो इस बात का मलाल है कि इस गलत धंधे में सुयश मेरी शादी होने से पहले ही फंस गए अन्यथा मैं उन्हें अदालत की ओर मुंह कर के सोने भी न देती. मेरी नौकरी भी लग गई थी पर बहुत अच्छी नहीं. एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने की थी.

सचाई यह है कि सुयश अपने स्वनामधन्य चाचाजी की प्रेरणा से हायर सैकंडरी के बाद एकदम कानून के क्षेत्र में कूद पड़े थे. वैसे उन्हें अपने पिता की संपत्ति तो घर बैठे स्वाहा करनी ही थी, किंतु खुद को निठल्ले न कहलाने के लिए वकालत की डिगरी प्राप्त कर ली थी. शायद शादी जल्दी करने का चक्कर भी इस के पीछे रहा हो.

ससुर जानेमाने एसपी रह चुके थे. अपने इकलौते पुत्र के लिए काफी संपत्ति तो इकट्ठी कर ही ली थी, लगे हाथ सुयश के एक सीनियर की फाइलें ढोते हुए उस के हाथ पीले करने की धुन में वे मेरे प्रोफैसर पिता से मेरा हाथ मांग बैठे थे.

फौजी जवान की तरह सुंदर, स्वस्थ, पढ़ालिखा नवयुवक और प्रतिष्ठित पर्सनैलिटी देखते ही मेरी बूआ की लार ऐसी टपकी कि उन्होंने पिताजी पर जादू सा कर दिया और मैं सुयश के पल्ले बांध दी गई.

मेरे अपने पिताजी के घर बड़े कानूनकायदे थे, हालांकि उन्होंने मु?ो एमए करा दिया था, पर मैं अपनी अम्मां के तेवरों के आगे कभी भी अपनी जबान न खोल सकी थी. सोशियोलौजी करते हुए भी मैं दब्बू की दब्बू रही थी.

मु?ो सुयश से मिलने को कहा गया, भाई रेस्तरां में छोड़ गया. वैसे वकीलों की नैतिकता में मु?ो जरा भी विश्वास नहीं है. आजकल इस धंधे वाले गलीगली में मारेमारे फिर रहे हैं. यह जमाना वैसे भी स्पर्धा का है. फिर वकालत जैसे पेशे में तो वकील को दिनरात यही खयाल करना पड़ता है कि मुवक्किल टूट कर दूसरे वकील के पास न चला जाए या प्रतिपक्षी का वकील अपने पक्ष में फैसला न करा ले. ऐसे में वह घर का खयाल कब रखेगा?

फिर आमदनी का भी कोई ठिकाना नहीं. यदि किसी दिन वकील साहब मेरे गले में सोने का हार पहना भी देंगे तो क्या? हमेशा यही डर लगा रहेगा कि न जाने कब फाकों के दिनों में मांग बैठें, ‘‘प्रिये, बुरा न मानो. कमबख्त समय बहुत बुरा है. लाओ, फिलहाल दूसरी बार का सिलसिला टाल दें और 2-4 साल निकाल लें. उस समय की हालत क्या होगी, आप क्या जानें?’’

मेरी बूआ बड़ी तेज हैं. मु?ो फंसाने को उन्होंने ही मैट्रीमोनियल साइट पर मेरा प्रोफाइल

डाला था और वही पिताजी की जगह मेरी गार्जियन बनी हुई थीं. उन्होंने सुयश के फोटो मेरे व्हाट्सऐप पर फौरवर्ड कर दिए. जैसे गुडि़या खिलौना देख बहल जाएगी. उन का खयाल था कि मैं होने वाले जीवनसाथी के धंधे के बारे में ज्यादा सोचविचार न कर के उन की सुंदर सूरत पर मर मिटूंगी. एक लड़की को यही सब तो चाहिए. सजीला, बांका, नौजवान. मेरी बूआ ने अपनी भतीजी को चारों खाने चित करने को यह ब्रह्मास्त्र खूब फेंका था.

मैं निरी बुद्धू तो थी नहीं, स्कूलकालेज में सर्वश्रेष्ठ वक्ता और विवादक के ढेर सारे पुरस्कार जीते थे. मेरी तार्किक शक्ति का सभी लोहा मानते थे, पर एक तो मैं ने इन उल?ानों के बारे में कभी सोचा भी नहीं था और दूसरे मां का रूख देख कर जबान पर ताले पड़ गए.

सुयश कुमार यानी वकील साहब ही अब मेरे भविष्य हैं. वर्तमान और अत: इन भविष्य प्रसाद से सम?ौते में ही भलाई थी वरना कुछ

और कर बैठती तो मेरे पीछे जाति, समाज में पिताजी की इज्जत खूब उछाली जाती. मैं ने कई सहेलियों को रोज बौयफ्रैंड बदलते देखा था. दरअसल, मेरा विद्रोह कोई भगतसिंह या सुभाषचंद्र बोस की बिरादरी में बैठने का तो

था नहीं. अच्छाखासा लड़का ढूंढ़ा जा रहा था.

सो मैं नानुकर कर के अपने को दकियानूसी होने का सुबूत कैसे देती? इसलिए चुप लगा गई

और एक  अच्छी लड़की की तरह विवाह की बलिदेवी पर निछावर हो गई.

मांबाप, बूआ से बहस करना व्यर्थ सम?ा मैं सपने लेने लगी कि पति को ही तैयार कर लूंगी कि जिंदगी के मिशन में कोरे वकील बनने का कोई मजा नहीं. आप का लक्ष्य तो जज बनना चाहिए.

 

मु?ो पूरा विश्वास था कि मैं जब छात्र जीवन में भाषण प्रतियोगिता के निर्णायकों को अपने तर्कों से प्रभावित कर ?ाका लेती थी तो क्या सुयश को उन के ही तेजस्वी भविष्य के लिए तैयार न कर पाऊंगी. इसलिए मैं सखीसहेलियों के मजाकों की परवा किए बगैर पूरे आत्मविश्वास के साथ गृहस्थाश्रम मै घुसी थी.

 

सचमुच सुयश ने मु?ो मोह भी लिया था. उन की लुभावनी सूरत व रसभरी (मीठी) बातों में वे सब गुण मिले जो एक अच्छे पति में होने चाहिए.

मगर विवाह के बाद कन्या होने तक घरगृहस्थी के सारे भाव मालूम हो गए. संयुक्त परिवार होने के कारण ससुरजी के बूते पर ही घर की गाड़ी चल रही है. सुयश की वकालत तो बस समय काटने का एक जरीया मात्र है. ससुरजी के बनवाए आलीशान ड्राइंगरूम के आधे हिस्से में सुयश का दफ्तर है जिस में उन की एक क्लर्क आया, टाइप करने वाली क्लर्क महिला और कानून की पुस्तकों की अलमारियों ने डेरा जमा रखा है. क्लाइंट्स के लिए कुरसियां लगी हैं और एक कोने में छोटा सा बोर्ड लगा है- ‘यहां मोबाइल साइलंट पर रखें, बीड़ी पीना मना है,’ इन के घर की बहू और सुयश की पत्नी बनने के बाद इन की अदालत की प्रैक्टिस का जायजा प्रथम बार कुछ ऐसे ही तो लिया था.

छुटकारा – भाग 2 : नीरज को क्या पता था

अगले हफ्ते संगीता का जन्मदिन भी आने वाला था. पिछली बार नीरज ने उसे लैदर का कोट दिलवाया था. इस बार उस ने अपनी प्रेमिका को नया मोबाइल दिलाने का वादा काफी पहले कर लिया था. करीब 30-35 हजार का यह खर्चा भी उसे उठाना था.अनुराधा की पगार के कारण उसे ऐसे फालतू खर्चों के लिए कभी बैंक में जमापूंजी में से कुछ भी कभी नहीं निकलवाना पड़ता था.

उस के अकाउंट में वैसे भी ज्यादा रुपए पिछले डेढ़दो सालों से बच नहीं रहे थे क्योंकि संगीता के ऊपर अपना बढि़या प्रभाव जमाए रखने के लिए उस ने काफी अनापशनाप खर्चा किया था.अनुराधा की पगार सिर्फ 1 महीने के लिए उसे उपलब्ध नहीं हुईर् थी और इतने कम समय में ही इन 2 खर्चों को ले कर उस का दिमाग भन्ना उठा था.संगीता से तो उस ने कुछ नहीं कहा, पर अनुराधा से वह कम खर्चा करने की जिद पकड़ कर खूब उल झा.‘‘आप तो हमेशा डंके की चोट पर कहा करते थे कि सिर्फ अपनी पगार के बलबूते पर आप सारा खर्चा आराम से उठा सकते हो.

मैं ने नौकरी करने से जुड़ी परेशानियां भी  झेलीं और कभी आप के मुंह से धन्यवाद तो सुना ही नहीं, बल्कि अपमानित जरूर हुई. अब मैं ने नौकरी छोड़ दी है और रोहित व मेरे सारे खर्चे आप को उठाने ही होंगे,’’ अनुराधा ने सख्त लहजे में अपनी बात कह कर खामोशी अख्तियार कर ली.नीरज खूब चीखताचिल्लाता रहा, पर उस ने उस के साथ बहस और  झगड़ा कतई नहीं किया. हार कर नीरज ने उसे रुपए दिए जरूर, पर ऐसा कर के उस ने अपनी सुखशांति गंवा दी.

पहली बार संगीता को कीमती तोहफा देना भी नीरज को खला. वह अपनी प्रेमिका से सीधेसीधे तो कुछ कह नहीं सका, पर आर्थिक कठिनाइयां उस का मूड खराब रखने लगीं.वह संगीता के सामने अपनी परेशानियों का रोना रोता. उन के बीच रोमांटिक वार्त्तालाप के बजाय बढ़ती महंगाई को ले कर चर्चा ज्यादा होने लगी. अनुराधा की हर मांग और रुपए खर्च करने का हर मौका नीरज का गुस्सा भड़का देता.‘‘सब ठीक चल सकता है, नीरज. मेरी सम झ से तुम जरूरत से ज्यादा परेशान रहने लगे हो. हर वक्त खर्चों का रोना रो कर तुम अपना और मेरा मूड खराब करना बंद करो, यार,

’’ सब्र का घड़ा भर जाने के कारण एक रात संगीता ने चिढ़ कर ये शब्द नीरज को सुना ही दिए.‘‘मेरी परेशानियों को न मेरी पत्नी सम झ रही है, न तुम,’’ नीरज ने फौरन नाराजगी प्रकट करी.‘‘तुम्हारी पत्नीका मु झे पता नहीं, पर मेरे जन्मदिन पर तुम मु झे मोबाइल मत दिलाना. उस खर्चे को बचा कर तुम्हारे चेहरे पर मुसकान लौट आए तो सौदा बुरा नहीं होगा.’’नीरज को लगा कि संगीता ने उस पर कटाक्ष किया है. उस ने चिड़ कर जवाब दिया, ‘‘मैं ने सचमुच ही गिफ्ट नहीं दिया, तो तुम्हारी मुसकान जरूर गायब हो जाएगी, मैडम.’’‘‘सुनो, नीरज,’’ संगीता ऊंची आवाज में बोली,

‘‘मैं तुम्हारे रुपए ऐंठने को तुम्हारे साथ नहीं जुड़ी हुई हूं. हमारे बीच प्रेम का संबंध न होता, तो तुम से सौ गुणा बड़ा धन्ना सेठ मैं बड़ी आसानी से फांस कर दिखा देती.’’

‘‘आईएम सौरी, डियर,’’ उस की नाराजगी व गुस्से से घबरा कर नीरज ने माफी मांगना ही बेहतर सम झा. यह बात जुदा है कि संगीता का मूड फिर उखड़ा ही रहा. नीरज ने उसे आगोश में भर का प्यार करने का प्रयास किया भी, पर उसे मजा नहीं आ रहा था.नीरज जब विदा ले कर उस के फ्लैट से निकला, तो पहली बार वह बड़बड़ा उठा था,

‘‘इन औरतों की कौम ही साली स्वार्थी होती है. इन का हंसनामुसकराना. इन का प्यार, इन की अदाएं, इन का सबकुछ रुपए से जुड़ा हुआ है.’’अनुराधा जिस दिन रोहित को ले कर अपने मामा के घर चली गई, उस के 2 दिन बाद संगीता का जन्मदिन आना था. नीरज ने शादी से सिर्फ 1 दिन पहले पहुंचने का फैसला किया था.‘‘मेरी अनुपस्थिति का गलत फायदा मत उठाना. मेरी कई सहेलियां मु झे तुम्हारी रिपोर्टदेती हैं,’’ अनुराधा ने चलते समय हलकी मुसकराहट के पीछे छिपा कर यह चेतावनी नीरज को दे डाली.‘‘मेरा मन जो कहेगा, मैं करूंगा,’’ नीरज चिड़ उठा.‘‘ऐसी बात है,

तो ठीक है मेरा मन मायके से कभी इस घर में लौटने का न हुआ, तो मेरा वह फैसला तुम भी स्वीकार कर लेना, पतिदेव.’’नीरज ने उस के स्वर की सख्ती को पहचान कर उस से आगे उल झने का इरादा त्याग दिया. गलत काम करने वाले के पास वैसे भी आंखों में आंखें डाल कर बोलने की हिम्मत नहीं होती है.

अनुराधा की अनुपस्थिति में नीरज ने रोज संगीता के फ्लैट पर जाने का कार्यक्रम बना लिया. अगले ही दिन उस ने संगीता को मोबाइल खरीदवा दिया, तो उस का मूड खुशी से खिल उठा. फिर संगीता ने अचानक 3 दिनों के लिए मनाली चलने की अपनी इच्छा उस के सामने जाहिर कर नीरज का दिल ही बैठा दिया.‘‘नहीं, यार, अभी और खर्चा करने की हिम्मत नहीं बची है,

’’ नीरज ने फौरन मनाली चलने से इनकार कर दिया था.‘‘क्रैडिट कार्ड्स हैं तो तुम्हारे पास. कुछ रुपए मैं ले चलूंगी साथ. प्लीज हां कहो न,’’ संगीता ने उस के गले में बांहें डाल कर प्यार से अनुरोध किया.‘‘मनाली चलना है तो इस ट्रिप का सारा खर्च इस बार तुम उठाओ.

मैं तुम्हें बाद में रुपए लौटा दूंगा.’’‘‘स्वीटहार्ट, क्रैडिट कार्ड…’’‘‘क्रैडिट कार्ड इमरजैंसी के लिए रखता हूं मैं. एक बार कार्ड के कर्जे में उल झा, तो निकलना मुश्किल हो जाएगा. अनुराधा की नौकरी भी अब नहीं रही.’’‘‘अब उस की नौकरी छोड़ देने का रोना मत शुरू करो, प्लीज,’’ संगीता ने बड़े नाटकीय अंदाज में हाथ जोड़ दिए.‘‘तब तुम भी मनाली जाने की जिद छोड़ दो.’’

‘‘ठीक है, अब यहीं मरेंगे दिल्ली कीगरमी में.’’‘‘यह तो हुआ नहीं कि मनाली का ट्रिप तुम फाइनैंस करने को राजी हो जाती. अरे, क्या एक बार का खर्च तुम नहीं कर सकती हो?’’‘‘कर सकती हूं, पर प्रेमिका की दौलत पर ट्रिप का आनंद उठाना क्या तुम्हारे जमीर को स्वीकार होगा?’’‘‘तुम ने यह सवाल पूछ लिया है, तो अब बिलकुल स्वीकार नहीं होगा क्योंकि तुम्हारी सोच अब मेरी सम झ में आ गई है.’’‘‘क्या सोच है मेरी?’’ संगीता के माथे में बल पड़ गए.‘‘यही कि हमारी मौजमस्ती तभी संभव है जब मेरा पर्र्स नोटों से भरा रहे.’’‘‘ऐसी बात मुंह से निकाल कर तुम मेरा अपमान कर रहे हो, नीरज. तुम मेरे चरित्र को घटिया बता रहे हो.’’‘‘अब छोड़ो भी इस बहस को और ्रचलो कोई फिल्म देख कर आते हैं,’’ परेशान नीरज ने वार्त्तालाप का विषय बदलने कीकोशिश करी.‘‘सौरी, मैं तुम्हारा 5-6 सौ का खर्चा भी नहीं कराऊंगी. वैसे भी मेरा सिर अचानक दर्द से फटने लगा है.’’‘‘तुम्हारे सिरदर्द के पीछे मनाली न जाने का मेरा फैसला है, यह बात मैं खूब सम झ रहा हूं.’’

REVIEW: दोस्ती के जज्बे के साथ फैमिली रिश्तों व मूल्यों की बात करती ‘उंचाई’

रेटिंगः तीन स्टार

निर्माताः राजश्री प्रोडक्शन और महावीर जैन

निर्देशकः सूरज बड़जात्या

पटकथा लेखकः अभिषेक दीक्षित

कलाकारःअमिताभ बच्चन, सारिका,  अनुपम खेर, नीना गुप्ता, डैनी, बोमन ईरानी, परिणीति चोपड़ा व अन्य.

अवधिः दो घंटे उन्चास मिनट

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ था और उसी दिन स्व. ताराचंद बड़जात्या ने ‘‘राजश्री प्रोडक्शन’’ की शुरूआत की थी. उनका मकसद हर इंसान तक पारिवारिक मूल्यों , रिश्तों और दोस्ती की महत्ता को पहुंचाना ही रहा. पिछले 75 वर्षों के दौरान ‘राजश्री प्रोडक्शन’ ने साठ फिल्मों का निर्माण किया. इन 75 वर्ष से ‘राजश्री प्रोडक्शन’ने कभी भी अपने मूल मकसद से नही भटका. 21 सितंबर 1992 को स्व. ताराचंद बड़जात्या के देहांत के बाद इसकी बागडोर स्व. राज कुमार बड़जात्या ने  अपने भाईयों कमल कुमार बड़जात्या व अजीत कुमार बड़जात्या के साथ मिलकर इसकी बागडोर को संभाला. 21 फरवरी 2019 को राजकुमार बड़जात्या का भी निधन हो गया. इन दिनों स्व. राज कुमार बड़जात्या के बेटे सूरज बड़जात्या ‘राजश्री प्रोडक्शन’ की परंपरा को आगे ले जाते हुए फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं. ‘राजश्री प्रोडक्शन’ के बैनर तले बतौर निर्देशक सूरज बड़जात्या फिल्म ‘उंचाई’ लेकर आए हैं. फिल्म ‘उंचाई’ तीन दोस्तों के रिश्तों व रोड ट्पि की कहानी है. जिसमें सूरज बड़जात्या ने पारिवारिक रिश्तो से भी बड़ा रिश्ता दोस्ती का बताते हुए यह भी कहने का प्रयास किया हे कि परिवर्तन स्थिर नही है ओैर जीवन एकतरफा सड़क नहीं. फिल्म में उन्होने समाज में आए बदलाव को भी चित्रित किया है. मगर वह पुरानी पीढ़ी का चित्रण करते समय चूक गए. शायद इसकी मूल वजह यह है कि युवा पटकथा लेखक अभिषेक दीक्षित को उत्तर भारत के बुजुर्गो के साथ रहने का अवसर न मिला हो. दूसरी चूक फिल्म की लंबाई है.

कहानीः

मूलतः यह कहानी चार दोस्तों बेस्ट सेलर लेखक अमित श्रीवास्तव(अमिताभ बच्चन) अपने दो अन्य लंगोटिया यारों,  लेडीज कपडों की दुकान चलाने वाले जावेद (बोमन ईरानी) और हिंदी किताबों की दुकान चला रहे ओम शर्मा (अनुपम खेर) के साथ अपने दोस्त व अवकाश प्राप्त  सरकारी अफसर भूपेन(डैनी) के जन्म दिन पार्टी में जाते हैं, जहां भूपेन उन लोगो से दो माह बाद एवरेस्ट पर जाने की बात करता है. यह चारों 65 साल से अधिक उम्र के हैं, इसलिए बाकी के तीन नही जाना चाहते. पर भूपेन का बचपन नेपाल में बीता है. इसलिए वह वहां और हिमालय की बातें कर तीनों का तैयार कर लेता है. दूसरे दिन सुबह तीनों दोस्तों को भूपेन के देहांत की खबर मिलती है. भूपेन का इन दोस्तों के अलावा इस दुनिया में कोई नही है. क्योंकि भूपेन ने अपने लड़कपन के प्यार के चलते शादी नही की थी. भूपेन के अंतिम संस्कार के बाद अमित श्रीवास्तव को भूपने के घर से एवरेस्ट बेस कैंप जाने की दो माह बाद की चार टिकटें मिलती है. भूपेन की अंतिम इच्छा थी कि उनकी अस्थियों का विसर्जन एवरेस्ट बेस कैंप पर किया जाए. अब यह तीनों अपने दिवंगत दोस्त भूपेन (डैनी डेंग्जोंग्पा) को श्रद्धांजलि देने और उसकी अंतिम इच्छा को पूरी करने के लिए एवरेस्ट के बेस कैंप की ऊंचाई तक पहुंचने के लिए निकल पड़ते हैं. यॅूं तो अब यह सभी दोस्त अपनी बढ़ती उम्र की चुनौतियों के साथ-साथ स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं,  मगर दोस्त की खातिर असंभव को संभव बनाने के लिए निकल पड़ते हैं.  इन सभी दोस्तों की अपनी-अपनी कहानियां भी हैं.  जावेद और उसकी पतिव्रता पत्नी शबाना ( नीना गुप्ता) के बीच एक खूबसूरत रिश्ता है,  उनकी एक शादीशुदा बेटी हीबा कानपुर में रहती है. अमित सोशल मीडिया और युवा पीढ़ी के बीच लोकप्रिय लेखक हैं, मगर उनकी असल जिंदगी में भी कुछ ऐसे राज हैं,  जो उन्होने खुद को सबसे आगे रखने के लिए छिपा रखे हैं. यह तीनों दोस्त अपने दिवंगत दोस्त भूपेन के अस्थि कलश को लेकर दिल्ली से आगरा होते हुए कानपुर जावेद की बेटी हीबा के घर पहुचते हैं. फिर लखनउ में उन्हें अपने साथ सहयात्री के रूप में माला त्रिवदेी (सारिका) को भी जोड़ना पड़ता है. कुछ समय बाद पता चलता है कि भूपेन की लड़कपन की प्यार माला त्रिवेदी थीं. वहां से गोरखपुर ओम शर्मा की पुश्तैनी हवेली होते हुए काठमांडू पहुंचते हैं. वहां ट्रैकिंग मार्गदशक दिव्या (परिणीति चोपड़ा ) के नेतृत्व में एवरेस्ट बेस कैंप की यात्रा शुरू होती है. कई कठिनाइयों के बाद यात्रा पूरी हेाती है. वह अपने दिवंगत दोस्त की अस्थियो को एवरेस्ट बेसकैंप पर विसर्जित करते हैं. एवरेस्ट बेस कैंप की चढ़ाई के दौरान यह तीनों जो कुछ सीखते हैं, उससे उनकी जिंदगी में बदलाव आता है.

लेखन व निर्देशनः

‘‘प्रेम रतन धन पाया’’ के का निर्देशन करने के सात  वर्ष बाद सूरज बड़जात्या ‘उंचाई’ लेकर आ हैं. जिसमें उनके दादा स्व. ताराचंद बड़जात्या के समय से चली आ रही ‘राजश्री प्रोडक्शन’ के पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल्यों की महक बरकरार है. मगर इस बार कहानी व पटकथा कुछ कमजोर हो गयी है. मेरी समझ से इसकी मूल वजह इसके पटकथा लेखक का नई पीढ़ी का होना है. फिल्म में एक दृश्य है, जब अनुपम खेर तीस वर्ष बाद गोरखपुर में अपनी पुश्तैनी हवेली अपने दोस्तों के साथ पहुॅचते हैं, तब जिस तरह की प्रतिक्रिया उनके बड़े भाई देते हैं, वह गले नही उतरती. माना कि समाज में बदलाव आए हैं, मगर अभी भी उत्तर भारत के बुजुर्गो में कुछ तहजीब व पारिवारिक मूल्य बाकी हैं. यूं तो फिल्म में उपदेशात्मक भाषणबाजी नही है, मगर कई दृश्यों में सीख देने का प्रयास जरुर किया गया है. लेखक व निर्देशक की इस सोच की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होने पारिवारिक व सामाजिक मूल्यों का चित्रण करने के साथ ही समाज में आए बदलाव व वर्तमान युवा पीढ़ी की सोच और उनकी समस्यायों को भी उपेक्षित चित्रित किया है. मगर एवरेस्ट बेस कैंप की युवा कैप्टन का तीन बुजुर्गो के साथ कुछ दृश्यों में किया गया व्यवहार कहीं गलत लगता है. क्योकि इस तरह की कठिन चढ़ाई के दौरान कैप्टन का काम होता है हर किसी का हौसला बढ़ाना न कि हौसले को खत्म करना.

फिल्म में माता-पिता हमेशा सही नहीं होते,  बच्चे अक्सर गलत नहीं होते,  विवाह में दूरी की आवश्यकता हो सकती है,  और प्यार अक्सर सांसारिक सुखों के आगे झुक सकता है, जैसे मुद्दे भी मनोरंजक तरीके से उठाए गए हैं. फिल्म यह संदेश भी देती है कि किसी भी काम को कल पर मत छोड़ो,  क्योंकि जीवन में कल कभी नहीं आता.

बतौर निर्देशक सूरज बड़जात्या ने जज्बातर दृश्यों में किरदारों के आंसू बहाकर मैलोड्ामा नही बनाया. निर्देशक के तौर पर सूरज बड़जात्या ने बेहतरीन काम किया है. . काश उन्हे पटकथा का पूरा सहयोग मिला होता. . . . .

फिल्म के कुछ संवाद अच्छे बन पड़े हैं. एक संवाद है-‘‘शास्त्रों में लिखा है हमारे पर्वत,  हमारे वेदों के प्रतीक हैं औरयह तो हिमालय है‘,  ‘भले ही हम हिमालय के दर्शन न कर सके,  पर हम ये न भूलें कि हमारे अंदर भी हिमालय की वह शक्ति है, जिससे हम जीवन की हर ऊंचाई पार कर सकते हैं. ‘

एवरेस्ट बेस कैंप की ट्ैकिंग करना यानी कि चढ़ना आसान नही है. उस दौरान आने वाली परेशानियों का भी जिक्र है. तैयारी का भी जिक्र है. पर विस्तार से नही. बीच रास्ते मे दो पहाड़ियों के बीच के पुल को पार करने के दौरान तेज हवाओंे के साथ बारिश के दृश्य का फिल्मांकन बहुत सुंदर है, पर इस दृश्य को आवश्यकता से ज्यादा लंबा रखा गया है. इसे एडीटिंग टेबल पर कसा जा सकता था. प्री क्लायमेक्स के दृश्य भी काफी लंबे है. कम से कम इस फिल्म को तीस मिनट कम किया जा सकता था. इंटरवल से पहले फिल्म जितनी तेज गति से भागती है, इंटरवल के बाद फिल्म शिथिल पड़ जाती है. कहानी भी गडमड हो जाती है.

‘‘राजश्री प्रोडक्शन’’ की हर फिल्म की सफलता में उस फिल्म के गीत व संगीत का बहुत बड़ा योगदान रहा है. मगर ‘उंचाई ’ का उस हिसाब से खरा नही उतरता. माना कि अमित त्रिवेदी का संगीत हर सिच्युएशन के अनुसार सही है, पर वह बात नही बनी, जो बननी चाहिए थी.

अभिनयः

सूरज बड़जात्या ने फिल्म के किरदारो के अनुरूप बेहतरीन कलाकारों का चयन किया है. पर कैप्टन के किरदार में परिणीति चोपड़ा का चयन गलत रहा. वह अपने अभिनय से कहीं प्रभावित नहीं करती. अमित श्रीवास्तव के किरदार में कई परते हैं. जिसे अमिताभ बच्चन ने अपने अभिनय से जीवंतता प्रदान की है. अमिताभ बच्चन को नजदीकी से जानने वाले मानते है कि उनके निजी जिंदगी के कुछ तथ्य अमित श्रीवास्तव के किरदार मे हैं. मूलतः पारसी बोमन ईरानी ने मुस्लिम इंसान जावेद का किरदार निभाया है. पर कहीं न कहीं उर्दू संवाद बोलते हुए मात खा गए. पारिवारिक फिल्मों व किरदारों के लिए नीना गुप्ता तो अनिवार्य हो गयी हैं. अपने शबीना के किरदार में वह छा जाती हैं. ओम शर्मा के किरदार में अनुपम खेर का अभिनय बेहतरीन हैं, मगर उनके लहजे व मैनेरिज्म में दोहराव नजर आता है. माला त्रिवेदी के किरदार में सारिका ने कमाल का अभिनय किया है. भूपेन के  छोटे किरदार में भी डैनी अपनी छाप छोड़ जाते हैं.

मैंने ज़रा देर में जाना – भाग 1

सुबह से बारिश की झड़ी लगी है. औफ़िस जाते हुए मुझे कार से सत्संग भवन तक छोड़ दो न.” अनुरोध के स्वर में एकता ने अपने पति प्रतीक से यह कहा तो प्रतीक के माथे पर बल पड़ गए.

“सत्संग? तुम कब से सत्संग और प्रवचन के लिए जाने लगीं? जिस एकता को मैं 2 साल से जानता हूं वह तो जिम जाती है, सहेलियों के साथ किटी करती है और मेरे जैसे रूखे पति की प्रेमिका बन कर उस की सारी थकान दूर कर देती है. सत्संग में कब से रुचि लेने लगीं? घर पर बोर होती हो तो मेरे साथ औफ़िस चल कर पुराना काम संभाल सकती हो, मुझे ख़ुशी होगी. इन चक्करों में पड़ना छोड़ दो, यार.” और एकता के गाल को हौले से खींचते हुए प्रतीक मुसकरा दिया. “अब मैं चलता हूं. शाम को मसाला चाय के साथ गोभी के पकौड़े खाऊंगा तुम्हारे हाथ से बने.” अपने होंठों को गोल कर हवा में चुंबन उछालता प्रतीक फुरती से दरवाज़ा खोल बाहर निकल गया.

एकता ने मैसेज कर अपनी सहेली रूपाली को बता दिया कि वह आज सत्संग में नहीं आएगी. बुझे मन से कपड़े बदल कर बैड पर बैठे हुए वह एक पत्रिका के पन्ने उलटने लगी और साथ ही अपने पिछले दिनों को भी.

दो वर्ष पूर्व प्रतीक को पति के रूप में पा कर जैसे उस का कोई स्वप्न साकार हो गया था. प्रतीक गुरुग्राम की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर था और एकता वहां रिसैप्शनिस्ट. प्रतीक दिखने में साधारण लेकिन अपने भीतर असीम प्रतिभा व अनेक गुण समेटे था. एकता गौर वर्ण की नीली आंखों वाली आकर्षक युवती थी. जब कंपनी की ओर से एकता को प्रतीक की पीए बनाया गया तो दोनों को पहली नज़र में इश्क़ सा कुछ लगा. एकदूसरे को जानने के बाद वे और क़रीब आ गए. बाद में दोनों के परिवारों की सहमति से विवाह हो गया.

प्रतीक जैसे सुलझे व्यक्ति को पा कर एकता का जीवन सार्थक हो गया था. एक निम्नमध्यवर्गीय परिवार में पलीबढ़ी एकता के पिता की पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मीनगर में परचून की दुकान थी. परिवार में एकता के अतिरिक्त माता, पिता और एक भाई व भाभी थे. ग्रेजुएशन के बाद एकता ने औफ़िस मैनेजमैंट में डिप्लोमा कर गुरुग्राम की कंपनी में काम करना शुरू किया था. प्रतीक एक मध्यवर्गीय परिवार से जुड़ा था, जिस में एक भाई प्रतीक से बड़ा और एक छोटा था. बहन इकलौती व उम्र में सब से बड़ी थी. प्रतीक का बड़ा भाई शेयर बेचने वाली एक छोटी सी कंपनी में अकाउंटैंट था और छोटा बैंक अधिकारी था. मातापिता अब इस दुनिया में नहीं थे. विवाह से पहले प्रतीक दिल्ली के पटेल नगर में बने अपने पुश्तैनी घर में रहता था. बाद में गुरुग्राम में 2 कमरे का मकान किराए पर ले कर रहने लगा था. विवाह के बाद स्वयं को एक संपन्न पति की पत्नी के रूप में पा कर एकता जितनी प्रसन्न थी उतनी ही वह प्रतीक के इस गुण के कारण कि वह संबंधों के बीच अपने पद व रुपएपैसों को कभी भी नहीं आने देता था. निर्धन हो या धनी, सभी का वह समान रूप से सम्मान करता था.

 

एकता का सोचना था कि प्रतीक विवाह के बाद उसे नौकरी पर जाने के लिए मना कर देगा, क्योंकि मैनेजर की पत्नी का उस के अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ काम करना शायद प्रतीक को अच्छा नहीं लगेगा, लेकिन प्रतीक ने ऐसा नहीं किया. दफ़्तर में एकता के प्रति उस का व्यवहार पूर्ववत था.

विवाह के एक वर्ष बाद जीवन में नए मेहमान के आने की आहट हुई. अभी प्रैग्नैंसी को 3 माह ही हुए थे कि एकता का ब्लडप्रैशर हाई रहने लगा. अपने स्वास्थ्य को देखते हुए एकता ने नौकरी छोड़ दी. घर पर काम करने के लिए फुलटाइम मेड थी, इसलिए उस का अधिकतर समय फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप पर बीतने लगा. प्रतीक उस की तबीयत में ख़ास सुधार न दिखने पर डाक्टर से संपर्क करने के लिए ज़ोर डालता रहा, लेकिन एकता किसी व्हाट्सऐप ग्रुप में बताए देसी नुस्ख़े आजमाती रही. जब उस की तबीयत दिनबदिन बिगड़ने लगी तो प्रतीक अस्पताल ले गया.  डाक्टर की देखरेख में स्वास्थ्य कुछ सुधरा लेकिन समय से पहले डिलीवरी हो गई और बच्चे की जान चली गई. प्रतीक उसे अकेलेपन से जूझते देख वापस काम पर चलने को कहता था, लेकिन एकता तैयार न हुई.

पड़ोस में रहने वाली रूपाली ने उसे सोसायटी की महिलाओं के ग्रुप में शामिल कर लिया. वे सभी पढ़ीलिखी थीं. एकदूसरे का बर्थडे मनाने, किटी आयोजित करने और घूमनेफिरने के अलावा वे शंभूनाथ नामक पंडितजी के सत्संग में भी सम्मिलित हुआ करती थीं. पुराणों की कथा सुनाते हुए शंभूनाथजी मानसिक शांति की खोज के मार्ग बताते थे. सब से सुविधाजनक रास्ता उन के अनुसार विभिन्न अवसरों पर सुपात्र को दान देने का था. दान देने के इतने लाभ वे गिनवा देते थे कि एकता की तरह अन्य श्रोताओं को भी लगने लगा था कि थोड़ेबहुत रुपएपैसे शंभूनाथजी को दे देने से जीवन सफल हो जाएगा.

एक दिन प्रवचन सुनाते हुए शंभूनाथजी ने अनजाने में होने वाले पापों के दुष्परिणाम की बात की. सुन कर एकता सोच में पड़ गई. अंत में उस ने निष्कर्ष निकाला कि उस के नवजात की मृत्यु का कारण संभवतया उस से अज्ञानतावश हुआ कोई पाप होगा. पं. शंभूनाथ की कुछ अन्य बातों ने भी उस पर जादू सा असर किया और उन के द्वारा दिखाए मार्ग पर चलना उसे सही लगने लगा. आज प्रतीक का शुष्क प्रश्न कि वह कब से सत्संग में जाने लगी, उसे अरुचिकर लग रहा था. सोच रही थी कि प्रतीक तो उस की प्रत्येक बात का समर्थन करता है, आज न जाने क्यों सत्संग जाने की बात पर वह अन्यमनस्क हो उठा. शाम को प्रतीक के लौटने तक वह इसी उधेड़बुन में रही.

रात का खाना खा कर बिस्तर पर लेटे हुए दोनों विचारमग्न थे कि प्रतीक बोल उठा, “अलमारी में पुराने कपड़ों का ढेर लग गया है. सोच रहा हूं मेड को दे देंगे.”

“हां, बहुत से कपड़े खरीद तो लिए हैं मैं ने, लेकिन पहनने का मौका नहीं मिला. नएनए पहन लेती हूं हर जगह. कल ही दे दूंगी. अच्छा सुनो, इस बात से याद आया कि कुछ पैसे चाहिए मुझे. कल सत्संग भवन में हमारे ग्रुप की ओर से दान दिया जाएगा.”

GHKKPM: जेल से भागेगी सई, विराट के कारण परेशान होगी पाखी!

सीरियल गुम हैं किसी के प्यार की (Ghum Hain Kisi Kay Pyar Mein) कहानी में इन दिनों विराट और सई के बीच बेटी सवि के लिए लड़ाई देखने को मिल रही है. वहीं इसका असर अब पाखी पर भी पड़ने लगा है. क्योंकि अब वह विराट के कारण परेशान हो गई है. लेकिन अपकमिंग एपिसोड में जहां सई और विराट की लड़ाई बढ़ेगी तो वहीं पाखी के दिल में जलन भी बढ़ने वाली है. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आगे…

विराट को आया गुस्सा

अब तक आपने देखा कि विराट एक सपना देखता है, जिसमें सई, सवि को लेकर चली जाती है. हालांकि सवि कहीं नही जाती. लेकिन वह अपनी मां के बारे में पूछना शुरु कर देती है. लेकिन विराट कोई न कोई बहाना बनाकर उसे बहला देता है. दूसरी तरफ सई अपनी रिहाई के लिए कमिश्नर के आगे हाथ जोड़ती हुई नजर आती है.

सई के खिलाफ विराट करेगा केस

 

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अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि कमिश्नर सई को छोड़ने के लिए विराट से कहेंगे. लेकिन विराट, सई के खिलाफ एफआईआर का केस दर्ज करने की बात कहेगा. वहीं कमिश्नर साहब, सई को इंतजार करने और उसके लिए एक वकील करने की बात कहेंगे. दूसरी तरफ सई के लिए विराट की बढ़ती नफरत और सवि के लिए प्यार देखकर पाखी परेशान नजर आएगी. वहीं विराट को समझाने की कोशिश करती दिखेगी.

जेल से भागेगी सई

 

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अपनी बेटी से दूर होकर सई, कमिश्नर की बात मानने से इंतजार करती हुई दिखेगी. दरअसल, अपकमिंग एपिसोड में सई पुलिस स्टेशन से भागकर अपनी बेटी सवि के पास जाने की कोशिश करेगी. वहीं सवि, विराट और विनायक से उसकी मां के पास ले जाने के लिए कहेगी. इसी के साथ वह अपनी मां से मिलने का फैसला करेगी. लेकिन एक बार फिर उसे रोकने के लिए बहाना बनाता नजर आएगा.

पारिवारिक सुगंध – भाग 1 : परिवार का महत्व

रिश्तों की सुगंध ही जीवन में सुखशांति लाती है. लेकिन राजीव अपनी धनदौलत के घमंड में डूबा रहता. रिश्तों की अहमियत उस के लिए कोई माने नहीं रखती थी. परिवार, सगेसंबंधी होते हुए भी वह खाली हाथ था. साथ था तो केवल एक दोस्त.

अपने दोस्त राजीव चोपड़ा को दिल का दौरा पड़ने की खबर सुन कर मेरे मन में पहला विचार उभरा कि अपनी जिंदगी में हमेशा अव्वल आने की दौड़ में बेतहाशा भाग रहा मेरा यार आखिर जबरदस्त ठोकर खा ही गया.

रात को क्लिनिक कुछ जल्दी बंद कर के मैं उस से मिलने नर्सिंग होम पहुंच गया. ड्यूटी पर उपस्थित डाक्टर से यह जान कर कि वह खतरे से बाहर है, मेरे दिल ने बड़ी राहत महसूस की थी.

मुझे देख कर चोपड़ा मुसकराया और छेड़ता हुआ बोला, ‘‘अच्छा किया जो मुझ से मिलने आ गया पर तुझे तो इस मुलाकात की कोई फीस नहीं दूंगा, डाक्टर.’’

‘‘लगता है खूब चूना लगा रहे हैं मेरे करोड़पति यार को ये नर्सिंग होम वाले,’’ मैं ने उस का हाथ प्यार से थामा और पास पड़े स्टूल पर बैठ गया.

‘‘इस नर्सिंग होम के मालिक डाक्टर जैन को यह जमीन मैं ने ही दिलाई थी. इस ने तब जो कमीशन दिया था, वह लगता है अब सूद समेत वसूल कर के रहेगा.’’

‘‘यार, कुएं से 1 बालटी पानी कम हो जाने की क्यों चिंता कर रहा है?’’

‘‘जरा सा दर्द उठा था छाती में और ये लोग 20-30 हजार का बिल कम से कम बना कर रहेंगे. पर मैं भी कम नहीं हूं. मेरी देखभाल में जरा सी कमी हुई नहीं कि मैं इन पर चढ़ जाता हूं. मुझ से सारा स्टाफ डरता है…’’

दिल का दौरा पड़ जाने के बावजूद चोपड़ा के व्यवहार में खास बदलाव नहीं आया था. वह अब भी गुस्सैल और अहंकारी इनसान ही था. अपने दिल के दौरे की चर्चा भी वह इस अंदाज में कर रहा था मानो उसे कोई मैडल मिला हो.

कुछ देर के बाद मैं ने पूछा, ‘‘नवीन और शिखा कब आए थे?’’

अपने बेटेबहू का नाम सुन कर चोपड़ा चिढ़े से अंदाज में बोला, ‘‘नवीन सुबहशाम चक्कर लगा जाता है. शिखा को मैं ने ही यहां आने से मना किया है.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘अरे, उसे देख कर मेरा ब्लड प्रेशर जो गड़बड़ा जाता है.’’

‘‘अब तो सब भुला कर उसे अपना ले, यार. गुस्सा, चिढ़, नाराजगी, नफरत और शिकायतें…ये सब दिल को नुकसान पहुंचाने वाली भावनाएं हैं.’’

‘‘ये सब छोड़…और कोई दूसरी बात कर,’’ उस की आवाज रूखी और कठोर हो गई.

कुछ पलों तक खामोश रहने के बाद मैं ने उसे याद दिलाया, ‘‘तेरे भतीजे विवेक की शादी में बस 2 सप्ताह रह गए हैं. जल्दी से ठीक हो जा मेरा हाथ बंटाने के लिए.’’

‘‘जिंदा बचा रहा तो जरूर शामिल हूंगा तेरे बेटे की शादी में,’’ यह डायलाग बोलते हुए यों तो वह मुसकरा रहा था, पर उस क्षण मैं ने उस की आंखों में डर, चिंता और दयनीयता के भाव पढ़े थे.

नर्सिंग होम से लौटते हुए रास्ते भर मैं उसी के बारे में सोचता रहा था.

हम दोनों का बचपन एक ही महल्ले में साथ गुजरा था. स्कूल में 12वीं तक की शिक्षा भी  साथ ली थी. फिर मैं मेडिकल कालिज में प्रवेश पा गया और वह बी.एससी. करने लगा.

पढ़ाई से ज्यादा उस का मन कालिज की राजनीति में लगता. विश्वविद्यालय के चुनावों में हर बार वह किसी न किसी महत्त्वपूर्ण पद पर रहा. अपनी छात्र राजनीति में दिलचस्पी के चलते उस ने एलएल.बी. भी की.

‘लोग कहते हैं कि कोई अस्पताल या कोर्ट के चक्कर में कभी न फंसे. देख, तू डाक्टर बन गया है और मैं वकील. भविष्य में मैं तुझ से ज्यादा अमीर बन कर दिखाऊंगा, डाक्टर. क्योंकि दौलत पढ़ाई के बल पर नहीं बल्कि चतुराई से कमाई जाती है,’ उस की इस तरह की डींगें मैं हमेशा सुनता आया था.

उस की वकालत ठीक नहीं चली तो वह प्रापर्टी डीलर बन गया. इस लाइन में उस ने सचमुच तगड़ी कमाई की. मैं साधारण सा जनरल प्रेक्टिशनर था. मुझ से बहुत पहले उस के पास कार और बंगला हो गए.

हमारी दोस्ती की नींव मजबूत थी इसलिए दिलों का प्यार तो बना रहा पर मिलनाजुलना काफी कम हो गया. उस का जिन लोगों के साथ उठनाबैठना था, वे सब खानेपीने वाले लोग थे. उस तरह की सोहबत को मैं ठीक नहीं मानता था और इसीलिए हम कम मिलते.

हम दोनों की शादी साथसाथ हुई और इत्तफाक से पहले बेटी और फिर बेटा भी हम दोनों के घर कुछ ही आगेपीछे जन्मे.

चोपड़ा ने 3 साल पहले अपनी बेटी की शादी एक बड़े उद्योगपति खानदान में अपनी दौलत के बल पर की. मेरी बेटी ने अपने सहयोगी डाक्टर के साथ प्रेम विवाह किया. उस की शादी में मैं ने चोपड़ा की बेटी की शादी में आए खर्चे का शायद 10वां हिस्सा ही लगाया होगा.

रुपए को अपना भगवान मानने वाले चोपड़ा का बेटा नवीन कालिज में आने तक एक बिगड़ा हुआ नौजवान बन गया था. उस की मेरे बेटे विवेक से अच्छी दोस्ती थी क्योंकि उस की मां सविता मेरी पत्नी मीनाक्षी की सब से अच्छी सहेली थी. इन दोनों नौजवानों की दोस्ती की मजबूत नींव भी बचपन में ही पड़ गई थी.

‘नवीन गलत राह पर चल रहा है,’ मेरी ऐसी सलाह पर चोपड़ा ने कभी ध्यान नहीं दिया था.

‘बाप की दौलत पर बेटा क्यों न ऐश करे? तू भी विवेक के साथ दिनरात की टोकाटाकी वाला व्यवहार मत किया कर, डाक्टर. अगर वह पढ़ाई में पिछड़ भी गया तो कोई फिक्र नहीं. उसे कोई अच्छा बिजनेस मैं शुरू करा दूंगा,’’ अपनी ऐसी दलीलों से वह मुझे खीज कर चुप हो जाने को मजबूर कर देता.

नारी सशक्तिकरण के बारे में क्या कहती हैं नीना गुप्ता, पढ़ें इंटरव्यू

बौलीवुड अदाकारा नीना गुप्ता की गिनती सदैव स्ट्रौंग व करेजियस महिला के रूप में होती है. कुछ लोग उन्हे बोल्ड और करेजियस ओमन भी मानते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि उन्होने क्रिकेटर विवियान रिचर्ड से रिश्ते रखे और बिना शादी किए बेटी मासाबा को जन्म देने के साथ ही उसका ‘सिंगल मदर’ के रूप में पालन पोषण भी किया. आज की तारीख में मासाबा न सिर्फ एक अभिनेत्री हैं,बल्कि मशहूर फैशन डिजायनर भी हैं. लेकिन सिंगल मदर के रूप में नीना गुप्ता को पग पग पर तकलीफें सहनी पड़ी. उनका संघर्ष  उनके लिए काफी तकलीफ देह रहा. पर उन्होने कभी हार नही मानी. उन्होने अपने सिद्धांतो से कभी समझौता भी नही किया. लगभग 49 वर्ष की उम्र में उन्होने विवेक मेहरा से विवाह रचाते हुए अभिनय से दूरी बनायी थी. पर वह खुद को अभिनय से ज्यादा समय तक दूर नहीं रख पायी. टैबू समझे जाने वाले विषय पर बनी फिल्म ‘‘बधाई हो’’ से उन्होने वापसी. तब से उनका कैरियर तेज गति से भाग रहा है. इन दिनों वह सूरज बड़जात्या निर्देशित फिल्म ‘‘उंचाई’’ को लेकर उत्साहित हैं. जो कि ग्यारह  नवंबर को प्रदर्शित हुई है.

नीना गुप्ता से उनके संघर्ष और ‘सिंगल मदर’ बनने की सलाह आदि पर लंबी बातचीत हुई. जो कि इस प्रकार रही. . .

चालिस वर्ष के कैरियर के टर्निंग प्वाइंट्स क्या रहे?

-मुझे सबसे पहले शोहरत मिली हॉकिंस की विज्ञापन फिल्म से. उसके बाद टीवी सीरियल ‘‘खानदान’’ की लोकप्रियता के चलते मुझे भी शोहरत मिली. उसके बाद टर्निंग प्वाइंट्स आया दूरदर्शन से. मैने खुद ‘दर्द’,‘सांस’, ‘पलछिन’, ‘सिसकी’,‘सोनपरी’, ‘सांझ’, ‘क्यों होता है प्यार’ जैसे सीरियलों का निर्माण किया. इनमें से ‘संास’ का निर्माण,लेखन व निर्देशन किया. ‘दर्द’ का भी निर्देशन मैने ही किया था. ‘पलछिन’ व ‘सिसकी’ का भी निर्देशन किया था. लेकिन टीवी सीरियल ‘‘सांस’’ को सबसे अधिक सफलता मिली और इससे मुझे फायदा भी मिला. ‘सांस’का निर्माण,लेखन व निर्देशन कर मुझे संतुष्टि मिली. मैंने इससे नाम व धन दोनों कमाया. इसके बाद काम भी मिला. मैने कई सीरियल किए. उसके बाद मैने शादी कर ली और सोचा कुछ समय आराम करुंगी. क्योंकि मैं इतने वर्षों से लगातार दिन रात काम करती आ रही थी. मगर कुछ दिन में ही समझ में आ गया कि आराम करना मेरे वश की बात नही है. मुझे तो काम करने की लत लग चुकी है. मैं पुनः काम करना चाहती थी. पर कोई अच्छा काम मिल नही रहा था. एक दिन मैने फेशबुक पर अपनी पीड़ा व्यक्त की और मुझे सबसे पहले बोल्ड कंटेंट वाली फिल्म ‘‘बधाई हो’’ करने का अवसर मिला. तो ‘बधाई हो’’ मेरे कैरियर का टर्निंग प्वाइंट रहा. यदि मुझे ‘बधाई हो’’करने का अवसर न मिला होता,तो आज आप मेरा इंटरव्यू न कर रहे होते.

आपने 1982 में जब कैरियर की शुरूआत की थी,तब आप बतौर हीरोईन फिल्में कर सकती थीं,पर ऐसा नहीं हुआ?

-इसकी दो वजहें रहीं. पहली वजह यह रही कि मैने बॉलीवुड में प्रवेश करते ही गलत फिल्म व गलत किरदार चुन लिया था. मैने फिल्म ‘साथ साथ’ में एक लल्लू लड़की का किरदार निभाया,जो कि मुझे नहीं निभाना चाहिए था. कुछ समय बाद एक पार्टी में गिरीश कर्नाड जी ने मुझसे कहा था कि अब मुझे हीरोईन की भूमिका कभी नही मिलेगी. दूसरी वजह यह रही कि मुझे सलाह देने या राह दिखाने वाला कोई नहीं था. उस वक्त मुझे किसी निर्माता या निर्देशक से किरदार या फिल्म मांगने में शर्म आती थी. जबकि बॉलीवुड में तो बेशर्म होना पड़ता है. काम पाने के लिए लोगों के पीछे पड़ना पड़ता है. पर मैं सोचती थी कि बार बार फोन करुंगी,तो उन्हे बुरा लगेगा. इन्ही वजहों से मैं कभी हीरोइन नही बन सकी. जबकि मेरे अंदर हीरोईन बनने के सारे गुण थे. अभिनय प्रतिभा भी थी.

आपने भारतीय फिल्मों में अभिनय करने के साथ ही तमाम इंटरनेशनल फिल्में की,पर इसे आप भुना नही पायी?

-जी हां!मैं अपना प्रचार करने में काफी कमजोर हूं. मुझे लग रहा थाकि में विदेशी फिल्मों में छोटे किरदार निभा रही हूं,पर बाद में देखा तो लगभग सभी भारतीय कलाकार इंटरनेशनल फिल्मों में छोटे किरदार ही निभारहे हैं,पर वह इस बात का हौव्वा खड़ा कर खुद को महान बताने पर उतारू हैं. पर मुझे अपनी वाह वाही करनी नही आती. मेरा अपना कोई नही है,जो मेरा प्रचार करे. मेरे पति को तो फिल्म इंडस्ट्री की समझ ही नही है. सच कह रही हूं. मैं पीआर में बहुत निकम्मी हूं. मैं पीआर करने में असफल हूं. मैं पीआर नही कर सकती. जबकि ऐसा करना बहुत जरुरी है. अन्यथा लोग आपको भूल जाते हैं. मैं आपको उदाहरण देती हूं. एक बार लेखक अश्विनी धीर,जिनका मैं एक सीरियल कर चुकी थी. वह ल्मि बना रहे थे. उनकी फिल्म की शूटिंग शुरू हो चुकी थी. मुझे पता चला कि उन्होंने मेरी उम्र की एक अन्य अभिनेत्री को अपनी फिल्म में लिया है. मैं एकदम शॉक्ड रह गयी. तो मैने उन्हे फोन करके पूछा कि तुमने मुझे क्यों नहीं लिया? जबकि वह हमेशा कहा करते थे कि मैं बहुत अच्छी अभिनेत्री हूं. मेरे फोन करने पर उन्होने अफसोस जताते हुए कहा कि वह भूल गए. तो ऐसा भी होता है. इसलिए में कहती हूं कि मैं खुद को याद दिलाते रहने में असफल रही हूं. जबकि हमें भी पता है कि यहां हम जितना काम करते हैं,उससे कहीं अधिक ‘शोबाजी’करनी पड़ती है.

आपने अपनी आत्मकथा रूपी किताब लिखी. उसके बाजार में आने के बाद किस तरहह की प्रतिक्रियाएं मिली?

-लोगों को मेरी किताब बहुत अच्छी लगी. लोगों को पता नही था कि मेेरे निजी जीवन में भी काफी संघर्ष रहा है. इमोशनल रिस्पांस तो काफी मिले.

जब आप अपने निजी जीवन के संघर्ष को किताब का रूप देने के लिए लिख रही थी,उस वक्त आपको कितनी पीड़ा हो रही थी?

-बहुत पीड़ा हुई. खासकर जब मैने अपने परिवार के संबंध में लिखा,तब कुछ ज्यादा ही पीड़ा हुई. हकीकत में लिखने के बाद उसे बार बार ठीक करने के लिए पढ़ना पड़ा. प्रूफ रीडिंग के समय पढ़ना पड़ा. तब कुछ ज्यादा ही तकलीफ हुई. एक वक्त वह आया जब पैंग्विन वाले मेरे पास करेक्शन करने के लिए भेजते थे,तो मैं नहीं पढ़ पायी. मैने उनसे कहा कि आप देख लें और खुद ही ठीक कर लें.  क्योंकि मुझे मेरा अपना संघर्ष व जीवन में जो कुछ घटा वह बहुत पीड़ा देता है.

कैरियर के शुरूआती दिनों में आपकी ईमेज स्ट्रांग ओमन की रही है?

-यह ईमेज मीडिया ने बनायी थी. स्ट्रांग का मतलब वह जो अपनी बात निडरता से कह सके. पर मैं तो अपनी बात कभी कह ही नही पायी. मैं एक भी ऐसे इंसान को नहीं जानती,जो वह कह या कर सके,जो उसका मन कहता है. तमाम लोग दावा करते है कि वह अपनी शर्तों पर जीता हैं?कौन अपनी शर्तों पर जीता है. सभी रबिश बातें करते हैं. यह सारी अच्छी अच्छी लाइने सिर्फ बोलने के लिए हैं. मगर है कुछ भी नहीं.

पर ज्यादातर अभिनेत्रियां इसी तरह की बाते करती हैं?

-यह उनकी मर्जी वह चाहे जो बातें करें. मुझे इससे कोई लेना देना नहीं. . . .

जब आपको राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म ‘‘उंचाई’’ का आफर मिला,तो आपको किस बात ने इस फिल्म को करने के लिए इंस्पायर किया था?

-कभी हम इसी ‘राजश्री प्रोडकन’ के दफ्तर के बाहर से चक्कर काटा करते थे. पर मुझे अंदर आने को नहीं मिला था. जब दफ्तर में सूरज बड़जात्या जी ने मुझे बुलाकर ‘उंचाई’ में एक बेहतरीन किरदार निभाने के लिए कहा,तो उसके बाद कुछ कहने या सोचने को रह ही नही गया था. वह कहानी व किरदार सुना रहे थे और मैं हवा में उड़ रही थी. राजश्री प्रोडक्शन में और सूरज बड़जात्या के निर्देशन में काम करना अपने आप में बहुत बड़ी बात है. फिल्म भी अच्छी, किरदार भी अच्छा. निर्माण कंपनी व निर्देशक भी अच्छा.

फिल्म ‘‘उंचाई’’ के अपने किरदार के बारे में क्या कहना चाहेंगी?

-मैने शमीना सिद्दिकी का किरदार निभाया है,जो कि जावेद सिद्किी की पत्नी है. जावेद सिद्किी के किरदार में बोमन ईरानी हैं.  वह किताबों की दुकान चलाते हैं. शमीना की जिंदगी उसके पति के इर्द गिर्द घूमती है. मुझे लगता है कि औरतें मेरे किरदार के साथ आईडेंटीफाई करेंगी. क्योंकि हमारे देश में निन्यानबे प्रतिशत औरतों की जिंदगी सिर्फ उनके पति, परिवार व बच्चों के ही इर्द गिर्द तक सीमित है. पति से कहना कि यह मत खाना. तुमको डाबिटीज है,तो पार्टी में शराब मत पीना वगैरह. वगैरह. . यही मेरा किरदार है. मगर अंत में सूरज जी ने मेरे किरदार को एक नया रोचक मोड़ दिया है.

आप अपने पुराने सीरियल ‘सांस’ का दूसरा सीजन लेकर आने वाली थी?

-क्या करुं.  ‘स्टार प्लस’ ने रिजेक्ट कर दिया. जबकि स्क्रिप्ट पसंद आने के बाद ‘स्टार प्लस’ ने ही इसका पायलट एपीसोड बनाने के लिए पैसे दिए थे. मैने बडक्ष्ी मेहनत व ईमानदारी से बनाया. मगर वहां पर एक व्यक्तिऐसा था,जिसे पसंद नहीं आया. लेकिन मैने हार नही मानी है. मैं इसे बनाउंगी. वास्तव में चैनलो में एमबीए की पढ़ाई कर ऐसे लोग आकर बैठगए हैं,जिन्हे सिनेमा या टीवी की समझ ही नही है. कारपोरेेट वालों को सिनेमा की कोई समझ ही नहीं है. जब मैने पहले ‘सांस’ बनायी थी,उस वक्त रथिकांत बसु जैसे समझदार इंसान थे. एक बार विषय व पटकथा पर चर्चा हुई और सहमति बन गयी. उसके बाद कभी भी उन्होंने लेखक या निर्देशक के तौर पर मुझे विचार विमर्श करने के लिए नहीं बुलाया. अब तो वह यहां तक डिक्टेट करते हैं कि लाल नहीं नीले रंग की टी शर्ट पहनो.

कारपोरेट के चलते सिनेमा भी गड़बड़ हुआ?

-कारपोरेट तो अभी भी है. पर सिनेमा अब बेहतर हो गया है. कोविड के चलते दो वर्ष तक घर में रहने के कारण लोगों की सिनेमाघर जाने की आदत छूट गयी है. क्योकि अब उन्हे आराम से घर पर बैठकर ओटीटी पर फिल्में देखने की आदत हो गयी है. जबकि सिनेमाघरों व ओटीटी पर फिल्म देखने के अनुभव बहुत अलग होते हैं. मैं हर इंसान से कहना चाहूंगी कि वह ‘उंचाई’ को सिनेमाघरों में ही जाकर देखें अन्यथा सिनेमा देखने का असली अनुभव पाने से वह वंचित रह जाएंगे. इसके विजुअल का आनंद ओटीटी पर आ ही नही सकता.

पिछले कुछ वर्षों से ‘वूमन इम्पॉवरमेंट’ की बातें हो रही है.  क्या असर हो रहा है?

-ज्यादा कुछ नहीं हो रहा है. केवल एक शुरूआत हुई है. शुरूआत यह हुई है कि अब ज्यादा औरतें कमाने लगी हैं. और वह भी बड़े महानगरों में. मेरी राय में नारी सशक्तिकरण तभी होगा जब नारी आर्थिक रूप से सबल होगी. इस हिसाब से फिलहाल नारी इम्पॉवरमेंट का रेशियो बहुत छोटा है. पर मैं आशावादी हूं कि शुरूआत तो हुई है,भले ही महानगरों से हुई हो.

सिंगल मदर के रूप में आपने मासाबा की परवरिश की. जिसके चलते आपका लंबा संघर्ष रहा. उन अनुभवों के बारे में बताएंगी और उन अनुभवों के आधार पर आप नई पीढी की लड़कियों या औरतों से क्या कहना चाहेंगी?

-मैंने उन अनुभवो को अपनी किताब में लिख दिया है. हर किसी से कहूंगी कि वह मेरी किताब पढ़ लें. अब मैं अपने संघर्ष व तकलीफों का रोना बार बार नहीं रोना चाहती. लेकिन मैं आपके दूसरे सवाल का जवाब देना चाहूंगी. मैं हर लड़की व औरत से कहना चाहूंगी कि मैने जो किया,उसमें मेरी अपनी परिस्थितियां थी. लेकिन मेरी परिस्थितियों से आपकी परिस्थितियां अलग हो सकती है. इसलिए मैं हर लड़की और हर औरत से कहना चाहूंगी कि आप वह मत करना, जो मैने किया. अगर आपकी मजबूरी है. आपकी बहुत ज्यादा इच्छा है. यदि आपको लगता है कि आप उसके परिणाम को सहन कर पाएंगी,तभी करें. वरना न करें. मेरी तो यही सलाह है. मैने जो कदम उठाया,उसमें बहुत तकलीफ होती है. यदि किसी नारी को लगता है कि हालात बदले हुए हैं. अब सुप्रीम कोर्ट ने ‘लिव इन रिलेशनशिप’ को मान्यता दे दी है. तो भी बहुत तकलीफ होनी है. हकीकत मे कुछ नही बदला है. समाज की सोच नही बदली है. सिर्फ बड़ी बड़ी बातें हो रही हैं.

आपकी बेटी मासाबा का कैरियर किस दिशा में जा रहा है?

-उसने कुछ वेब सीरीज में अभिनय किया है. बेहतरीन अदाकारा है.  वह तो आगे भी अभिनय करते रहना चाहती है.

छुटकारा – भाग 1 : नीरज को क्या पता था

जिस क्षणिक सुख के लिए वह अपनी पत्नी अनुराधा को छोड़ संगीता के प्यार में पागल था, वहीसंगीता उसे गहरी मुसीबत में डालने की योजना बना रही है… अपनी प्रेमिका संगीता के साथ उस के फ्लैट में घंटाभर गुजारने के बावजूद नीरज का मूड उखड़ा सा ही बना रहा. उस ने न मौजमस्ती करने में रुचि ली, न खानेपीने में.‘‘जो घट चुका है उस के बारे में सोचसोच कर दिमाग खराब करना नासम झी है, स्वीट हार्ट. आज तो तुम्हें ढंग से मुसकराता देखने को तरस गई हूं मैं,’’

नीरज के बालों में प्यार से हाथ फिराते हुए संगीता ने शिकायत सी करी.‘‘उस बेवकूफ लड़की ने बिना बात नौकरी से त्यागपत्र दे कर दिमाग खराब कर दिया है. अरे, 75 हजार की नौकरी अपनी जिद के कारण छोड़ देने की क्या तुक हुई?’’ नीरज अपनी पत्नी अनुराधा के बारे में बोलते हुए एक बार फिर से भड़क उठा.नीरज और अनुराधा की शादी एक तरह से प्रेमविवाह था.

वह उसे लखनऊ में अपने चाचा की बड़ी बेटी की शादी में मिला था. उस की चचेरी बहन की सहेली थी अनुराधा, पढ़ने में तेज, सुंदर पर रहने में बिलकुल सिंपल. शादीमें भी वह बिलकुल साधारण कपड़ों में थी पर सारी सहेलियां उस की इज्जत करती थीं क्योंकि वही सब को हर साल पढ़ा कर ऐग्जाम में पास कराती थी. उसे एमवीए में आसानी से एडमिशन मिल गया था पर उस का पहनावा, रंगढंग नहीं बदला था.नीरजके मांबाप को वह बहुत पसंद आई थी. नीरज  सामने अपनी प्रेमिका संगीता का भूत चढ़ा था पर कई बार कहने पर भी वह शादी को तैयार नहीं हुई थी. जब संगीता को अनुराधा का पता चला तो उस ने एकदम नीरज को शादी करने को कहा और सम झाया कि सीधीसादी पत्नी होगी तो वे दोनों अपनी जिंदगी इसी तरह प्रेम रस में डूब कर चलाते रहेंगे.

फिर अनुराधा दिल्ली आ गई शादी कर के. नीरज के मातापिता लखनऊ में रहते थे. अनुराधा को अच्छी नौकरी मिल गई और उन का एक बेटा भी हो गया. उसे संगीता के बारे में पता चल गया था पर 1-2 बार बोल कर चुप रह गई. उस का सारा पैसा हर माह नीरज तो लेता था.‘‘वैसे है तो यह हैरानी की बात कि तुम्हारी सीधीसादी पत्नी ने इतना महत्त्वपूर्ण फैसला तुम से बिना सलाह किए हुए ले लिया.’’

‘‘दिमाग में भूसा भरा है उस बेवकूफ के.’’‘‘मु झे लगता है कि जब कुछ दिनों के बाद उस का घर में रहने का शौक पूरा हो जाएगा, तो वह बोर हो कर फिर से नौकरी करने लगेगी.’’‘‘अब उस ने कभी नौकरी करने का नामभी लिया मेरे सामने तो मैं उस का सिर फोड़दूंगा.

अब तो सारी जिंदगी रसोई में ही खटना पड़ेगा उसे.’’‘‘जब तुम ने ऐसा फैसला कर ही लिया है, तो फिर इतना गुस्सा क्यों हो रहे हो? मेरा कुसूर क्या है जो तुम सप्ताह में 1 बार मिलने वाले प्यार करने के इस मौके को अपना मूड खराब रख कर गंवा रहे हो?’’संगीता की आंखों में उभरे उदासी के भावों को नीरज ने फौरन पकड़ा. अपनी चिड़ व गुस्से को भुलाते हुए उस ने संगीता को अपने नजदीक खींच लिया.अपनी प्रेमिका के सुडौल बदन से उठ रही महक को मादक एहसास फौरन ही उस के रोमरोम को उत्तेजित करने लगा. प्यार के मामले में संगीता उस की हर जरूरत, रुचि और खुशी को पहचानती थी.

अगले 1 घंटे तक उस के जेहन में अपनी पत्नी अनुराधा से जुड़ा कोई खयाल पैदा ही नहीं हो पाया.वह करीब 10 बजे अपने घर पहुंचा. अपनी पत्नी पर नजर पड़ते ही उस का दिमाग फिर से भन्ना उठा.‘‘कैसा लगा आज सारा दिन घर में बिताना. जरा मैं भी तो सुनूं कि किस महान कार्य को निबटाया है तुम ने घर बैठने के पहले दिन?’’

नीरज के लहजे से साफ दिख रहा था कि वह अनुराधा से  झगड़ा करने के लिए पूरी तरह से तैयार है.अनुराधा ने लापरवाही से जवाब दिया, ‘‘छोटेछोटे कामों से फुरसत मिलती, तो ही किसी महान कार्य को करने की सोचती न. वैसे एक बात जरूर सम झ में आ गई.’’‘‘कौन सी?’’

‘‘पहले तुम मेरे औफिस से लौटने का इंतजार करते थे और आज वही काम मु झे करना पड़ा. इस में कोई शक नहीं कि इंतजार करते हुए वक्त के खिसकने की रफ्तार बड़ी धीमी प्रतीत होती है. कहां अटक गए थे?’’ ‘‘पहले ही दिन से किसी बेवकूफ गृहिणी की तरह पूछताछ शुरू कर दी न,’’

नीरज की आवाज में व्यंग्य के भाव उभरे.‘‘तुम छिपाना चाहते हो, तो छिपा लो,’’ लापरवाही से कंधे उचकाने के बाद अनुराधा रसोई की तरफ चली गई.गुस्से से भरे नीरज ने खाना खाने से इनकार कर दिया. वैसे उसे भूख भी नहीं थी क्योंकि उस ने संगीता के साथ पिज्जा खा रखा था.खामोश बनी अनुराधा जल्द ही अपने6 वर्षीय बेटे रोहित के साथ सोने चली गई.

नीरज ने मोबाइल खोला और सोफे पर थकाहारा सा पसर गया.मोबाइल या टीवी में आ रहे किसी भी कार्यक्रम को देखने में उस का मन नहीं लग रहा था. मन की चिंता व बेचैनी के चलते उस की आंखों में नींद की खुमारी आधी रात के बाद ही पैदा हुईर्.अगले दिन रविवार की छुट्टी थी. इसी दिन से नीरज की परेशानियों और मुसीबतों का लंबा सिलसिला आरंभ हो गया.अनुराधा ने स्वादिष्ठ गोभी व आलू के पकौड़ों का नाश्ता उसे कराया. रोहित के साथ खेलते हुए वह काफी खुश नजर आ रह थी. नीरज की नाराजगी भरी खामोशी उस के जोश और उत्साह को कम करने में नाकामयाब रही थी.

सुबह 11 बजे के करीब अनुराधा ने उसे महीने भर के सामान की लंबी लिस्ट पकड़ा दी.‘‘इस का मैं क्या करूं?’’ नीरज ने चिड़कर पूछा.‘‘बाजार जा कर सब खरीद लाइए, हुजूर,’’ अनुराधा ने मुसकराते हुए जवाब दिया.‘‘मैं ने यह काम पहले कभी नहीं किया है, तो अब क्यों करूं?’’ ‘‘मैं घर का सारा काम संभालूंगी तो बाहर के कामों की जिम्मेदारी अब आप की रहेगी.’’

‘‘ये सब मु झ से नहीं होगा.’’ ‘‘घर में सामान के आए बिना खाना कैसे बनेगा, वो मु झे जरूर सम झा देना,’’

कह कर अनुराधा रोहित के साथ लूडो खेलने लगी.‘‘मैं ही मरता हूं,’’ नीरज  झटके से उठ खड़ा हुआ, ‘‘सामान लाने के लिए रुपए दे दो.’’‘‘रुपए मेरे पास कहां से आएंगे अब?’’‘‘क्यों? तुम्हें पगार तो मिली है न?.’’‘‘मिली है और मैं ने 8 साल लगातार जो नौकरी करी है उस की आखिरी पगार को मैं ने अपने व रोहित के जरूरी कामों के लिए बचा कर रखने का फैसला किया है.’’‘‘इस बार तो यह खर्चा तुम ही उठाओ.’’‘‘सौरी, डियर.’’‘‘गो टू हैल,’’ नीरज जोर से चिल्लाया और फिर फर्श को रौंदता हुआ बाजार जाने को घर से निकल गया. अगले शनिवार की शाम को जब वह संगीता से मिला, उस समय तक उस की चिंताएं व तनाव जरूरत से ज्यादा बढ़ चुके थे.वे दोनों एक महंगे होटल में डिनर कर रहे थे, लेकिन नीरज स्वादिष्ठ भोजन का आनंद लेने के बजाय अपनी पत्नी की बुराइयां करने में ज्यादा ऊर्जा बरबाद कर रहा था.‘‘कार और फ्लैट की किश्तें… घर का सामान इधर अखबार का खर्चा, रोहित कीफीस. बिजलीपानी का बिल, ये सब खर्चे मु झे पिछले हफ्ते में करने पड़े हैं, संगीता. मेरी सारी पगार उड़नछू करवा दी है उस पागल ने,’’ इन बातों को याद कर के नीरज बुरी तरह से जलभुन रहा था.