जहां पर सवेरा हो-भाग 3 : उसे क्यों छोड़ना पड़ा अपना ही देश

दोनों ही यंत्रणा और दुख  झेल रहे थे. कभी विद्रोही तो कभी हताश हो उठते. जीवन

के कुरूप यथार्थ का सामना कर रहे थे दोनों. कुछ दिन पहले वाली घटना से भी वे बहुत डर गए थे.

‘‘यहां रहना खतरे से खाली नहीं. कहीं और बसते हैं.’’

‘‘दूसरा ठिकाना ढूंढ़ लेंगे, लेकिन अभी कुछ दिन तो यहीं रहना होगा. महीनेभर का किराया दिया है. फिर फ्लैट खाली करने से पहले 1 महीने का नोटिस भी जरूरी है.’’

‘‘जयश्री ऐसे में किराए की फिक्र नहीं की जाती. हमें तुरंत नया ठिकाना ढूंढ़ना होगा.’’

मानवतावादी दृष्टिकोण के अभाव में मुख्यधारा से अलग किया तबका कितना दुख  झेलता है. यह फ्लैट उन के लिए कई मामलों में एक सुरक्षित स्थान था. हजारों, लाखों फ्लैट के मालिक खुद वहां नहीं रहते और जातिधर्म के नाम पर किराएदारों की तहकीकात भी नहीं करते. उन्हें तो बस पैसा चाहिए और अपना घर सलामत. लेकिन रातदिन गुंडों के साए में जीना मुश्किल था. क्या पता फिर कभी आ धमकें… इसलिए औनलाइन घर की तलाश शुरू हो गई.

कुछ ही दिनों में दोनों ने फिर घर बदल लिया. इस बार सोसाइटी में न जा कर आबादी वाले एरिया में किसी घर में खाली सिंगल रूम सैट को अपना ठिकाना बनाया. वैरिफिकेशन, एडवांस पेमैंट और सिक्यूरिटी की सारी औपचारिकताएं और शर्तें एजेंट के माध्यम से पूरी हो गईं.

रमन सोचता कि एक ओर उस के पास रखी पुस्तकों में मार्क्स, लेनिन, गांधी, सुकरात जैसे नाम हैं, उन की समानतावादी नीति है, दूसरी तरफ अमानवतावादी दृष्टिकोण. वह नफरत करे तो किस से… क्या ये किताबें  झूठी हैं या समाज ने इन्हें पढ़ा नहीं और अगर पढ़ा तो गुना क्यों नहीं? यह सोचतेसोचते देर रात उस की आंख लग गई.

अगली सुबह उसे एक नई कंपनी में जौइन करना था. जयश्री की आवाज से उस की नींद टूटी, ‘‘रमन उठो, औफिस जाना है. पहले दिन एक सैकंड भी लेट नहीं चलेगा.’’

कुछ दिनों तक जिंदगी ठीकठाक चली. रमन का औफिस भी बढि़या चल रहा था. जयश्री हायर स्टडी के लिए ऐग्जाम की तैयारी कर रही थी. इसी बीच मालकिन को सम झ में आ गया कि ये लोग लिव इन में रहते हैं और युवक दलित वर्ग से है. फिर क्या था. उस ने भी फिकरे कसने शुरू कर दिए.

रमन तो किसी तरह खुद को संभाल लेता पर जयश्री बहुत विचलित हो जाती. उदासी में दिन काट रहे थे. रमन अकसर कहता कि उस के वर्तमान के लिए इतिहास जिम्मेदार है.

तभी अचानक दिन मेहरबान हुए. रमन को माइक्रोसौफ्ट

कंपनी से ही जौब का औफर आ गया. उसे वाशिंगटन जाना था. दोनों के वीरान चेहरों पर मुसकराहट खिल उठी.

देश और क्रांति में से जब एक को चुनने की नौबत आई तो उन्होंने पलायन और क्रांति को चुना. अपनी संस्कृति और मातृभूमि को अपनाने पर अपने प्रेम की बलि देनी होती जो उन्हें कदापि मंजूर नहीं था और संस्कृति की रक्षा तो विदेश में रह कर भी की जा सकती है. फिर जो सभ्यता जिंदगी की गारंटी ना दे पाए, उस के संरक्षण की भला युवा कैसे सोच सकते हैं? कुछ ही समय पहले डेढ़ लाख डालर का औफर ठुकराने वाला युवा अब खुशीखुशी विदेश जाना चाहता था.

उसे लेनिन का कथन याद आया, ‘‘कल बहुत जल्दी होता और कल बहुत देर हो चुकी होगी, समय है आज.’’

जयश्री को साथ ले जाने के लिए शादी करना जरूरी था. आननफानन ने दोनों ने दोनों ने कोर्ट में शादी कर ली. कुछ समय बाद रमन यूएसए के लिए रवाना हो गया पर जयश्री को जाने के लिए कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी थीं. कुछ समय बाद उस ने भी अप्लाई कर दिया. लगभग 6 महीने बाद उसे भी प्लेसमैंट मिल गया.

जयश्री ने रमन को खुशखबरी सुनाने के लिए वीडियोकौल पर उस ने नहीं उठाया. जयश्री को बहुत चिंता होने लगी. तभी कुछ देर बाद रमन ने उसे कौल किया.

‘‘सौरी डियर, नींद आ गई थी. बायोलौजिकल क्लौक सैट होने में अभी समय लगेगा.’’

मुसकरा कर बोली, ‘‘तुम्हें व्हाट्सएप मैसेज किया है. देखो.’’

‘‘वाह जयश्री, मुबारक. अब जल्दी से मेरे पास आ जाओ.’’

जयश्री मुसकरा दी. आज उस की निर्भीक मुसकान देख कर रमन को विदेश बसने के फैसले पर गर्व हो रहा था. एक और प्रतिभा देश छोड़ कर जाने वाली थी. वीजा तैयार था. वह दूसरी औपचारिकताएं पूरी करने की तैयारी में लगी थी. भारत की प्रतिभा अमेरिका में अपना जलवा दिखाने जा रही थी. हमें तो ब्रेनड्रेन की आदत है. रूढि़यां बची रहें,  ढकोसले बचे रहें. एकता और समानता की बात कर रहे संविधान के शब्द भी अपनी सार्थकता खोते दिखाई दे रहे थे.

जयश्री दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर अपनी फ्लाइट का इंतजार कर रही थी. पुराने दिनों की यादें उस के स्मृतिपटल पर लगातार हथौड़े सरीखे वार कर रही थीं. उसे याद आ रहा था कि आईआईटी दिल्ली में चयन होने पर जब एक पत्रकार ने भविष्य को ले कर सवाल किया था तो इंटरव्यू में उस ने कहा था कि अपने देश के लिए काम करूंगी. तकनीकी के क्षेत्र में अपने देश को अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों से आगे ले जाने का सपना है मेरा. फ्लाइट तैयार थी. जयश्री खिड़की से बाहर देखा और फिर अनमने से भाव ले कर उड़ गई अपने सपनों का आसमान पाने के लिए.

जहां पर सवेरा हो- भाग 2 : उसे क्यों छोड़ना पड़ा अपना ही देश

पढ़ाई के अलावा उन दोनों को कुछ और सू झता ही कहां था. हां, उन के प्रेम प्रसंग पर कालेज के कुछ लड़केलड़कियां चुटकियां जरूर लेते. कभी वह सोचती कि ये कालेज में उन के सीनियर तो नहीं थे. पर रमन ने सीनियर्स के होने की संभावना से इनकार कर दिया.

तभी जयश्री को ध्यान आया कि उस के घर और गांव में भी इस अंतरजातीय  प्यार का बहुत विरोध हुआ था.कही उस के गांव के लोग तो नहीं? मगर उन के पास दिल्ली का पता कहां से आएगा? वह सोचविचार में मग्न थी. तभी उसे याद आया कि एक बार पासपोर्ट के लिए अप्लाई करने पर उस के कुछ जरूरी कागजात वैरिफिकेशन के लिए गांव गए थे. इस के लिए उस ने अपना दिल्ली का पता दिया था.

जयश्री का शक यकीन में बदलने लगाऔर शक की सूई दिल्ली में रहने वाले अपने पड़ोसी गांव के सुनील की ओर घूम गई. इस से पहले भी जब वह गांव गई थी तो कितना अपमान सहना पड़ा था उसे. न जाने कैसे गांव के लोगों को खबर लग गई कि वह अपने सहपाठी के प्रेम में पड़ गई है. प्रेमी के बारे में पूछताछ हुई. लड़का दलित जाति का है, यह पता लगने पर तो मां बाप और भाइयों ने उसे बहुत ताने सुनाए. दरअसल, पास के गांव का ही एक लड़का दिल्ली में रह कर नौकरी कर रहा था और एक बार जयश्री के मातापिता ने उस के लिए गांव से कुछ सामान भेजा, वहीं से उसे इस बात की खबर लग गई थी. गांव में तो इस तरह की बातें आग की तरह फैलती हैं. मांबाप तो पढ़ाईलिखाई छुड़ाने को ही आमादा थे. वह तो उस ने किसी तरह गिड़गिड़ा कर उन से विनती करी तो चेतावनी दे कर छोड़ दिया गया.

उत्तराखंड का सुदूर पर्वतीय अंचल. सामाजिक बंधन बहुत कड़े थे. मान्यताओं, परिपाटियों को वर्षों से बिना किसी बदलाव के और तार्किक विचार के निभाया जाना हमेशा से ग्रामीण अंचल की विशेषता रही है. इस गांव में सिर्फ ब्राह्मण परिवार ही रहते थे. पंडितजी की बेटी जयश्री बहुत मेधावी थी. 8वीं कक्षा में एकीकृत परीक्षा में उत्तीर्ण करने पर शहर के स्कूल में एडमिशन मिल गया. कुछ दिन दुविधा के  झूले में  झूलने के बाद पिता और अन्य परिवार वाले उस भेजने पर सहमत हो गए.

गांव में सुखसुविधाओं का अभाव था, लेकिन शहर पहुंच कर जयश्री को खुला आकाश मिल गया. मेधावी तो वह थी ही, उस की योग्यता को पहचान कर फिजिक्स के शिक्षक ने उसे आगे चल कर जेईई परीक्षा की तैयारी करने की प्रेरणा दी, साथ में परीक्षा के बारे में जानकारी भी दी. उन दिनों हौस्टल में रहने वाले बच्चों के लिए स्कूल के बाद ऐक्स्ट्रा क्लासेज भी होती थीं, जिस में उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पढ़ाया जाता था.

आईआईटी परीक्षा पास करना जयश्री ने अपना लक्ष्य बना लिया था. खूब मेहनत की थी उस ने और देखते ही देखते परिणाम वाला दिन भी आ गया. मैंस और एडवांस दोनों ही परीक्षाओं में उस ने बेहतरीन प्रदर्शन किया था. आखिरकार उस ने जेईई एडवांस के माध्यम से आईआईटी में होने वाले दाखिले को ही चुना.

जयश्री की खुशी का तब कोई ठिकाना न रहा जब उसे आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रौनिक्स ऐंड कम्युनिकेशन ब्रांच मिली. गांव की वह पहली बेटी थी जो आईआईटी में पढ़ने जा रही थी. इस से कई वर्षों पहले पड़ोस के गांव के मात्र एक लड़के ने आईआईटी की परीक्षा पास की थी. गांव में खुशी का माहौल था. अधिकतर ग्रामीण आईआईटी संस्थान के बारे में कुछ नहीं जानते थे. बस इतना पता था कि पंडितजी की बेटी किसी बड़ी परीक्षा में पास हो गई है और 4 साल बाद बड़ी इंजीनियर बनेगी. स्कूल से अपनी मार्कशीट और ट्रांसफर सर्टिफिकेट ले कर वह जरूरी सामान लेने अपने गांव गई और कुछ समय बाद बड़े भाई के साथ काउंसलिंग के लिए रवाना हो गई.

 

जयश्री को गर्ल्स हौस्टल में कमरा भी मिल गया. दीपक बड़े भाई होने का फर्ज निभाते हुए उसे कुछ जरूरी निर्देश देने के बाद गांव लौट गया.कुछ दिनों में कालेज में पढ़ाई भी शुरू हो गई. जयश्री का परिवार इस बात को लेकर निश्चिंत था कि लड़की का भविष्य सुरक्षित हो गया. फिर भी परिवार वाले डरते और उस से सिर्फ पढ़ाई और पढ़ाई में ही ध्यान देने की सलाह बारबार देते.

 

कालेज में पढ़ने वाली एक जवान लड़की जहां साथ में बहुत सारे लड़के भी हों, ऐसा कैसे संभव हो सकता कि वह सिर्फ पढ़ाई पर ही ध्यान देती? इंट्रोडक्शन वाले दिन उस की जानपहचान कंप्यूटर साइंस के छात्र रमन से हुई. आईआईटी दिल्ली में कंप्यूटर साइंस मिलना गौरव की बात थी. बातों ही बातों में जयश्री को पता चला कि रमन को तो आईआईटी मद्रास में कंप्यूटर साइंस मिल रही थी परंतु उस के मातापिता के लिए उतनी दूर भेजना संभव नहीं था. गाजियाबाद के पास ही किसी गांव में उस का घर था, इसलिए उसे दिल्ली में एडमिशन लेने के लिए राजी करा लिया गया.

गाजियाबाद के पास एक गांव जहां पर अधिकतर दलित परिवार रहते थे, पक्के मकान बहुत कम थे. छपरों में गुजारा होता था. लोगों की धर्म में भी बहुत अधिक आस्था नहीं थी क्योंकि जिस धर्म में जीने की आज़ादी मिल जाए उसी का अनुसरण कर लेते थे. अंधाधुंध फ्लैट्स के निर्माण की वजह से खेती तो अब बची नहीं थी. यहां के मर्द कोई भी छोटामोटा काम पकड़ लेते और महिलाएं सोसाइटी में जा कर लोगों के घरों में काम करतीं क्योंकि वहां पर रहने वाले युवावर्ग को इन की बहुत जरूरत थी और जातिपाती पर भी उन का कोई विश्वास नहीं था.

इसी गांव से निकला था गुदड़ी का लाल रमन. चिथड़ो में पलाबढ़ा पर ठान लिया था कि जिस आईटी इंजीनियर के घर उस की मां  झाड़ूपोंछा, बरतन करने जाती है, उसी के बराबर बनूंगा और जब लगन लग जाए तो मंजिल पाने से कौन रोक सकता है… सरल स्वभाव का यह मेधावी छात्र जयश्री के मन को भा गया. समय के साथसाथ ये जानपहचान अच्छी दोस्ती में बदल गई और पता भी न चला कि कब प्यार में. तभी जयश्री को पता चला कि रमन दलित परिवार से है और उस का परिवार आर्थिक मामले में भी काफी पिछड़ा हुआ. लेकिन प्यार ये सब कहां देखता है? आखिर प्यार है कोई व्यापार नहीं. हां, कभीकभी घरपरिवार का डर उसे सताना कि कभी तो बताना ही पड़ेगा. कैसे बता पाएगी… जैसे कई सवाल उस के मन को परेशान करने लगे.

एक कट्टरवादी ब्राह्मण परिवार दलित लड़के को अपने दामाद के रूप में स्वीकार कर पाएगा यह कहना मुश्किल था. लेकिन उसे यह भी डर था कि अगर इन सब बातों में उल झी रहेगी तो वह अपने लक्ष्य से भटक जाएगी. लक्ष्य यही था कि अच्छे सीजीपीए से बैचलर डिगरी मिले और आगे की राह आसान हो जाए.

थर्ड ईयर के आखिरी सेमैस्टर में रमन को माइक्रोसौफ्ट कंपनी से इंटर्नशिप का औफर मिला और वह यूएसए चला गया. जय श्री समर वैकेशन में बैंगलुरु जा कर इंटर्नशिप करने लगी. दोनों का ही आगे पढ़ने का विचार था. इस दौरान कुछ समय नौकरी कर पैसा बचा लेना चाहते थे क्योंकि घर वालों से और उम्मीद करना उचित नहीं था. 4 साल तो होस्टल में कट गए थे. आगे रहने का इंतजाम खुद ही करना था. दोनों यह फ्लैट ले कर रहने लगे और जयश्री के गांव के गुंडे यहां भी पहुंच गए.

लिवइन में रहने का फैसला यों ही नहीं ले लिया. आर्थिक पहलू तो था ही. अपना बचाव भी जरूरी था क्योंकि कालेज में भी कई तथाकथित रसूखदार छात्रछात्राएं उन के प्रेम का मखौल बनाते. विदेशी कंपनियों से रमन के लिए औफर आना उन्हें फूटी आंखें नहीं सुहाता.

इसी बीच रमन को डेढ़ लाख डालर का औफर विदेशी कंपनी से मिला पर उसे धुन थी अपने परिवार के साथ रहने की, अपने देश के लिए कुछ करने की. वह नहीं गया. इस पर भी कुछ साथी छात्र उसे आरक्षण की बैसाखी का तंज कसते, कभी प्रोफैसरों की कृपा का पात्र होने का. जबकि सचाई यह थी कि उस ने आरक्षण लेने के बावजूद बहुत मेहनत की थी और अपने संबंधित प्रोफैसरों के साथ भी वह कुछ न कुछ नया सीखने के लिए ही जीजान से लगा रहता. प्रोजैक्ट के नाम पर प्रोफैसरों के पास विदेशी कंपनियों से काफी  आर्थिक सहायता आती, जिस का वितरण प्रोजैक्ट में काम करने वाले छात्रों खासकर रिसर्च स्टूडैंट्स के बीच में होता. इन के साथ रमन को भी छोटीछोटी आर्थिक सहायता हो जाती तो उस का खर्च चलाना आसान हो जाता.

बेजबानों को भी जीने का हक है

मीट खाना अपनी पसंदनापसंद पर निर्भर करता है और जिंदा पशुओं के प्रति दया या क्रूरता से इस का कोई मतलब नहीं है. मुंबई हाई कोर्ट ने कुछ जैन संगठनों की इस अर्जी को खारिज कर दिया कि मीट के खाने के विज्ञापन छापें भी न जाएं और टीवी पर भी न दिखाए जाएं क्योंकि ये मीट न खाने वालों की भावनाओं को आहत करते हैं.

पशु प्रेम वाले ये लोग वही हैं जो गौपूजा में भी विश्वास करते हैं पर उस के बछड़े का हिस्सा छीन कर उस का दूध पी जाते हैं. ये वही लोग हैं जो वह अन्न खाते हैं जो जानवरों के प्रति क्रूरता बरतते हुए किसानों द्वारा उगाया जाता है. ये वही लोग हैं जो पेड़ों से उन फलों को तोड़ कर खाते हैं जिन पर हक तो पक्षियों का है और उन की वजह से पक्षी कम हो रहे हैं.

यह विवाद असल में बेकार का है कि मीट खाने या न खाने वालों में से कौन बेहतर है या कौन नहीं. अगर एक समाज या एक व्यक्ति मीट नहीं खाता तो यह उस की निजी पसंद पर टिका है और हो सकता है कि यह पसंद परिवार और उस के समाज ने उसे विरासत में दी हो. पर इस जने को कोई हक नहीं कि दूसरों को अपनी पसंद के अनुसार हांकने कीकोशिश करे.

पिछले सालों में सभी में एक डंडे से हांकने की आदत फिर बढ़ती जा रही है. पहले तो धर्म हर कदम पर नियम तय किया करते थे और किसी को एक इंच भी इधरउधर नहीं होने देते थे, पर जब से स्वतंत्रताओं का युग आया लोगों को छूट मिली है कि वे तर्क, तथ्य और सुलभता के आधार पर अपनी मरजी से अपने फैसले करें और तब तक आजाद हैं जब तक दूसरे के इन्हीं हकों को रोकते हैं, तब से समाज में विविधता बढ़ी है.

आज खाने में शुद्ध वैष्णव भोजनालय और चिकन सैंटर बराबर में खुल सकते हैं और खुलते हैं पर कुछ कंजर्वेटिव धर्म के गुलाम दूसरों पर अपनी भक्ति थोपने की कोशिश करने लगे हैं. भारत को तो छोडि़ए, स्वतंत्रताओं का गढ़ रहा अमेरिका भी चर्च के आदेशों के हिसाब से गर्भपात को रोकने की कोशिश कर रहा है, जिस का असल में अर्थ है औरत की कोख पर बाहर वालों का हमला.

मीट खाना अच्छा है या बुरा यह डाक्टरों का फैसला होना चाहिए धर्म के ठेकेदारों का नहीं, जो हमेशा सूंघते रहते हैं कि किस मामले में दखल दे कर अपना  झंडा ऊंचा किया जा सकता है. यह तो पक्की बात है कि जब भी कोई धार्मिक मुद्दा बनता है, चंदे की बरसात होती है. यही तो धर्म को चलाता है और यही मीट खाने वालों को रोकने के प्रयासों के पीछे है.

प्रैग्नेंसी की गलत दवाई खाने से हेल्थ से जुड़ी कौनसी परेशानी होगी?

सवाल-

मैं 24 वर्षीय युवती हूं. मेरा अपने बौयफ्रैंड के साथ कई बार शारीरिक संबंध बन चुका है. इसी के चलते इस बार मैं गर्भवती हो गईं. मैं ने कैमिस्ट से दवा ले कर खा ली, जिस से मुझे लगातार 2 महीने तक रक्तस्राव होता रहा. मैं जानना चाहती हूं कि इस से मुझे किसी तरह की स्वास्थ्य संबंधी परेशानी तो नहीं होगी?

जवाब-

गर्भ ठहर जाने के बाद आप को किसी स्त्रीरोग विशेषज्ञा की सलाह से दवा लेनी चाहिए थी. खासकर तब जब आप को लगातार 2 माह तक रक्तस्राव होता रहा. यदि भविष्य में माहवारी नियमित रूप से न आए या और कोई दिक्कत आए तो तुरंत डाक्टर से मिलें.

ये भी पढ़ें- 

मैं बच्चों के माटेसरी हाउस, वीस्कूल की निदेशक और संस्थापक हूं. मैंने वाणिज्य में विशेषज्ञता रखते हुए चेन्नई से स्नातक की पढ़ाई पूरी की है. इसके अलावा, मैंने बच्चों को उनकी अधिकतम क्षमता तक बढ़ने में मदद करने की इच्छा के साथ भारतीय माँटेसरी प्रशिक्षण केंद्र (आईएमटीसी) से प्राथमिक मोंटेसरी डिप्लोमा भी उत्तीर्ण किया है.

बच्चों की व्यापक सीखने की प्रक्रिया को बदलना और शैक्षिक विधियों में प्रारंभिक दृष्टिकोण विकसित करने, हमने एक ऑनलाइन गर्भावस्था का कोर्स बनाया है. गर्भावस्था, प्रसव और पितृत्व जीवन के प्रमुख विकल्प हैं जो चीजों को कई तरह से बदलते हैं. जब आप माता-पिता बनते हैं तो जीवन नाटकीय रूप से बदल जाता है, इसलिए केवल यह सम झ में आता है कि जब आप प्रसव पूर्व देखभाल के बारे में सोच रहे हों तो आप गर्भावस्था के भौतिक पक्ष से अधिक पर विचार करना चाहेंगे. समग्र दृष्टिकोण वह है जिस पर महिलाएं बढ़ती संख्या में विचार कर रही हैं, क्योंकि इस दृष्टिकोण में शरीर, मन और आत्मा शामिल है, जिससे महिलाओं को एक से अधिक तरीकों से स्वस्थ गर्भावस्था का आनंद लेने में मदद मिलती है.

पूरी खबर पढ़ने के लिए- प्रैग्नेंसी एक महिला के शरीर में महत्वपूर्ण परिवर्तनों का समय है, पढ़ें खबर

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

10 Tips: कुछ ऐसे करें नेलपेंट को रियूज

आमतौर पर नेल पेंट का उपयोग उंगलियों की सुंदरता को निखारने के लिये किया जाता है. लेकिन नेल पेंट का उपयोग अन्य कार्यों के लिये भी किया जा सकता है. घर में अगर कोई खराब नेल पेंट पड़ी हुई है तो, उसे इन कामों के लिये उपयोग जरुर करें.

1. चाभियों पर पहचान बनायें

शायद आपको चाभियों को लेकर समस्या हो. आपकी सभी चाभियां- घर की, दराज की या आलमारी की, सभी एक लगती हैं. हर चाभी को अलग-अलग रंग की नेल पेंट से चिन्हित करने से काम आसान हो जाता है.

2. मसालों को नामांकित करना

धनिया पाउडर, जीरा पाउडर और पिसा गरम मसाला एक जैसे दिखते हैं. क्यों न इन्हें नामांकित कर दिया जाये. नामांकित करने के बाद उनपर पारदर्शी नेल पेंट लगा दें जिससे नामांकन सुरक्षित रहे.

3. लिफाफा चिपकाना

जब आपको लिफाफा चिपकाने की जरूरत पड़े और गोंद ना मिले तो लिफाफे के किनारों पर नेलपेंट लगाने से काम हो जायेगा.

4. सुई में धागा डालना

सुई में धागा डालने के लिये हमें काफी मशक्कत करनी पड़ती है. धागे के सिरे को नेल पेंट में हल्के से डुबोयें. इससे धागा सख्त हो जायेगा और आसानी से सुई में चला जायेगा.

5. गहनों से सुरक्षा

हम सभी को आर्टिफिशियल गहने काफी पसंद होते हैं लेकिन ये सभी की त्वचा के लिये अनुकूल नहीं होते. क्या आपने ध्यान दिया है कि इस प्रकार की अंगूठी या हार पहनने के बाद आपकी त्वचा हरी हो जाती है. इसे रोकने के लिये उन गहनों के त्वचा के सम्पर्क में आने वाली सतह पर पारदर्शी नेलपेंट की परत लगायें. कई कपड़ों पर के स्टोन काफी नाजुक होते हैं, उन्हें गिरने से बचाने के लिये पारदर्शी नेलपेंट की परत लगायें. आप यह परिधानी गहनों के लिये बी कर सकती हैं.

6. जूते के फीते चिपकाना

जूते के फीते के सिरे अक्सर खराब हो जाते हैं तो उन्हे ठीक करने के लिये या तो उन्हे हल्का सा जलाया जा सकता है या फिर नेल पेंट लगाई जा सकती है. मजे के लिये एक बार पारदर्शी नेलपेंट को छोड़कर रंगीन नेलपेंट अपनायें.

7. ढीले पेचों को कसना

याद है, आपके टूल बॉक्स के पेंच अकसर ढीले हो जाते हैं. पेंच को कसने के बाद उनपर नेलपेंट की परत लगायें. वे कभी नहीं गिरेंगें.

8. अपने जूते के तलवों को रंगें

अपने पुराने साधारण जूतों के तलवों को रंगबिरंगे रंगो में रंग कर नया जीवन प्रदान करें. फिरोजी, नारंगी या लाल रंग अपनायें.

9. फटने से रोकना

घर से निकले के बाद आपने देखा कि आपकी लेगिंग में छोटा सा छेद हो गया है. अब आप क्या करेंगी. पारदर्शी नेलपेंट को फटे भाग के किनारों पर लगायें. इससे वह छेद और बड़ा नहीं होगा.

10. बदरंग होने से बचाये

बेल्ट के बकल पर पारदर्शी नेलपेंट की परत लगाने से वे बदरंग नहीं होगें.

टेलीफोन: कृष्णा के साथ गेस्ट हाउस में क्या हुआ

crime story in hindi crime story in hindi

सतरंगी रोशनी: निर्वेद को क्या मिला उपहार

दीवाली का त्योहार पास ही था, इसलिए कभीकभी पटाखों की आवाज सुनाई दे जाती थी. मौसम काफी सुहाना था. अपने शानदार कमरे में आदविक आराम से सो रहा था. तभी उस के फोन की घंटी बजी. नींद में ही जरा सी आंख खोल कर उस ने समय देखा. रात के 2 बज रहे थे. इस वक्त किस का फोन आ गया.

सोच वह बड़बड़ाया और फिर हाथ बढ़ा कर साइड टेबल से फोन उठाया बोला, ‘‘हैलो.’’

‘‘जी क्या आप आदविक बोल रहे हैं?’’

‘‘जी आदविक बोल रहा हूं आप कौन?’’

आदविकजी मैं सिटी हौस्पिटल से बोल रहा हूं, क्या आप निर्वेद को जानते हैं? हमें आप का नंबर उन के इमरजैंसी कौंटैक्ट से मिला है.’’

‘‘जी निर्वेद मेरा दोस्त है. क्या हुआ उस को?’’ बैड से उठते हुए आदविक घबरा कर बोला.

‘‘आदविकजी आप के दोस्त को हार्टअटैक हुआ है.’’

‘‘कैसा है वह?’’

‘‘वह अब ठीक है… खतरे से बाहर है…

‘‘मैं अभी आता हूं.’’

‘‘नहीं, अभी आने की जरूरत नहीं है. हम ने उन्हें नींद का इंजैक्शन दे दिया है. वे सुबह से पहले नहीं उठेंगे. आप सुबह 11 बजे तक आ जाइएगा. उस वक्त तक डाक्टर भी आ जाएंगे. आप की उन से बात भी हो जाएगी.’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर आदविक ने फोन रख दिया और बैड पर लेट कर सोने की कोशिश करने लगा, लेकिन नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. उस का मन बेचैन हो गया था. वह आंखें बंद कर के एक बार फिर सोने की कोशिश करने लगा. मगर नींद की जगह उस की आंखों में आ बसे थे 20 साल पुराने कालेज के वे दिन जब आदविक इंजीनियरिंग करने गया था. मध्यवर्गीय परिवार का बड़ा बेटा होने के नाते आदविक से उस के परिवार को बहुत उम्मीदें थीं और वह भी जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा हो कर अपने भाईबहनों की पढ़ाई में मातापिता की मदद करना चाहता था.

कालेज में आ कर पहली बार आदविक का पाला उस तबके के छात्रों से

पछ़ा, जिन्हें कुदरत ने दौलत की नेमत से नवाजा था. उन छात्रों में से एक था निर्वेद, लंबा कद, गोरा रंग और घुंघराले घने बालों से घिरा खूबसूरत चेहरा. निर्वेद जहां एक ओर आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक था वहीं दूसरी ओर पढ़ाईलिखाई में भी अव्वल था. अमीर मातापिता की सब से छोटी संतान होने के नाते दौलत का सुख और परिवार का प्यार हमेशा ही उसे मिला. हर प्रकार की कला के प्रति उस की पारखी नजर उस के व्यक्तित्व को एक अलग ही निखार देती थी.

अपनी तमाम खूबियों के कारण निर्वेद लड़कियों में पौपुलर था. कालेज की सब से सुंदर और स्मार्ट लड़की एक डिफैंस औफिसर की बेटी अधीरा थी और कालेज के शुरू के दिनों से ही निर्वेद को बहुत पसंद करती थी.

निर्वेद को देख कर कभीकभी सामान्य रंगरूप वाले आदविक को ईर्ष्या होती थी. उसे लगता था कि जैसे कुदरत ने सबकुछ निर्वेद की ही  झोली में डाल दिया है. दोनों में कहीं कोई समानता नहीं थी. कहां आदविक एक मध्यवर्गीय परिवार का बड़ा बेटा तो निर्वेद एक अमीर परिवार का छोटा बेटा. दोनों में कहीं कोई समानता नहीं थी.

फिर भी इन दोनों की अच्छी दोस्ती हो गई थी. पहले साल दोनों रूममेट्स थे क्योंकि फर्स्ट ईयर में रूम शेयर करना होता है. उन्हीं दिनों इन दोनों की दोस्ती इतनी गहरी हो गई कि बाकी के 3 साल अगलबगल के कमरों में ही रहे. दोनों की दोस्ती बड़ी अनोखी थी. एक अगर सोता रह तामा तो मैस बंद होने से पहले दूसरा उस का खाना रूम तक पहुंचा देता.

एक का प्रोजैक्ट अधूरा देख कर दूसरा उसे बिना कहे ही पूरा कर देता था. दोनों एकदूसरे को सपोर्ट करते. अगर एक पढ़ाई में ढीला पड़ता तो दूसरा उसे पुश करता. कभी कोई  झगड़ा नहीं, कोई गलतफहमी नहीं. उन के सितारे कालेज के शुरू के दिनों से ही कुछ ऐसे अलाइन हुए थे कि दोनों के बीच आर्थिक, सामाजिक, रंगरूप जैसी कोई भी असमानता कभी नहीं आई. दोनों अपने बाकी मित्रों के साथ भी समय बिताते, घूमतेफिरते, लेकिन आदविक निर्वेद की दोस्ती कुछ अलग ही थी.

कभी दोनों एकदूसरे के साथ घंटों बैठे रहते और एक शब्द भी न बोलते तो कभी बातें खत्म होने का नाम ही नहीं लेतीं. एक को दूसरे की कब जरूरत है यह कभी बताना नहीं पड़ता था.

एक बार छुट्टियों में आदविक को निर्वेद के घर जाने का अवसर मिला. पहली बार उस के परिवार से मिलने का मौका मिला था. उस के मातापिता और 2 बड़े भाइयों के साथ 2 दिन तक आदविक एक पारिवारिक सदस्य की तरह रहा. खूब मजा किया और पहली बार पता चला कि समाज के इतने खास लोगों का व्यवहार इतना सामान्य भी हो सकता है. आदविक ने देखा कि इतना पैसा होने के बाद भी निर्वेद के परिवार वालों के पैर जमीन पर ही टिके थे. उस की दोस्ती निर्वेद के साथ क्यों फूलफल रही थी यह बात उसे अब सम झ में आ गई थी. वापस आने के बाद भी आदविक उस के परिवार के साथ खासकर उस की मां के साथ फोन पर जुड़ा रहा.

एक बार सैमैस्टर की फाइनल परीक्षा आने वाली थी. हर छात्र मस्ती भूल कर पढ़ाई में डूबा था. आदविक पढ़तेपढ़ते निर्वेद के कमरे से कोई किताब उठाने गया तो देखा कि वह बेहोश पड़ा था. माथा छुआ तो पता चला कि वह तो बुखार में तप रहा है. आदविक ने बिना वक्त गंवाए तुरंत दोस्तों की मदद से उसे अस्पताल पहुंचाया. वहां डाक्टर ने जाते ही इंजैक्शन दिया और कहा कि अभी इन्हें एडमिट करना पड़ेगा. बुखार काफी तेज है, इसलिए एक रात अंडर औब्जर्वेशन में रखना होगा. सुबह तक हर घंटे में बुखार चैक करना होगा.

‘‘मैं इस का ध्यान रखूंगा और जरूरत पड़ने पर डाक्टर को भी बुला लूंगा. अब तुम लोग जा सकते हो,’’ आदविक ने दोस्तों से कहा तो सभी दोस्त हौस्टल चले गए.

सुबह जब निर्वेद की आंख खुली तो देखा कि आदविक भी वहीं बराबर वाले बैड पर सो रहा था, ‘‘अरे तू यहां क्या कर रहा है? तु झे तो रातभर पढ़ना था न,’’ निर्वेद ने हैरानी से पूछा.

‘‘अरे नहीं यार, सोना ही तो था सो गया.’’

तभी नर्स और डाक्टर दोनों साथ कमरे में दाखिल हुए. नर्स डाक्टर से बोली, ‘‘सौरी डाक्टर रात को नींद लग गई तो हर घंटे बुखार चैक नहीं कर सकी, लेकिन मैं ने इंजैक्शन दे दिया था.’’

डाक्टर ने निर्वेद के पीछे से चार्ट उठाते हुए कहा, ‘‘लेकिन चार्ट में तो हर घंटे की रीडिंग है.’’

इस के साथ ही निर्वेद की निगाहें आदविक की ओर घूमीं तो वह आंखें मीच कर

मुसकरा दिया. थोड़ी देर में निर्वेद की मां का फोन आया, ‘‘बेटा अब कैसी तबीयत है?’’

‘‘ठीक है मां, लेकिन आप को कैसे पता चला?’’

‘‘आदविक का फोन आया था… बहुत ही प्यारा लड़का है. आज मैं तु झे भी बोल रही हूं हमेशा उस का भी ध्यान रखना, उसे कभी भी परेशानी में अकेला मत छोड़ना,’’ मां ने कहा.

वक्त की रफ्तार कालेज में कुछ ज्यादा ही तेज होती है. 4 साल पलक  झपकते ही बीत गए. कालेज के इन 4 सालों में सभी को इंजीनियरिंग की डिगरी दे कर उन के पंखों को नई उड़ान के लिए मजबूत कर दिया था और इस एक नए आकाश पर अपने नाम लिखने के लिए छोड़

दिया था.

निर्वेद और अधीरा की खूबसूरत जोड़ी के प्यार का पौधा भी अब तक एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका था. हरकोई अपने कैरियर के चलते कहांकहां जा बसा, बता पाना मुश्किल हो गया. धीरेधीरे सब की शादियां होने लगीं.

आदविक की शादी एक मध्यवर्गीय परिवार की पढ़ीलिखी लड़की खनक से हो गई. दोनों की अच्छी निभ रही थी. एक साल बाद खनक ने बेटे को जन्म दिया तो ऐसा लगा कि घर खुशियों से भर गया. उधर निर्वेद और अधीरा दोनों को भी अच्छी नौकरी मिल गई थी, लेकिन दोनों अभी शादी नहीं करना चाहते थे. कुछ और दिन अपनी बैचलर लाइफ ऐंजौय करना चाहते थे.

उधर आदविक अपनी घरगृहस्थी की जिम्मेदारियां निभा रहा था. लेकिन अपने प्यारे से बेटे को गोद में ले कर जब आदविक उसे प्यार करता तो उस के सामने दुनिया की हर नेमत

छोटी लगती. अगले साल बड़ी धूमधाम से निर्वेद और अधीरा की भी शादी हो गई. शादी के कुछ दिनों बाद निर्वेद को किसी असाइनमैंट के लिए विदेश जाना पड़ा. फिर पता नहीं क्यों और कैसे, लेकिन वापस आते ही अधीरा ने उस के सामने तलाक की मांग रख दी. निर्वेद का प्यार आज तक उस की किसी मांग को नकार नहीं सका था, लिहाजा इस मांग को भी उस की खुशी मान कर न नहीं कर पाया. यह शादी उतने दिन भी नहीं चली जितने दिन उस की तैयारियां चली थीं. गलती किस की थी, क्या थी इन सब बातों की फैसले के बाद कोई अहमियत नहीं रह जाती. तलाक हो गया.

निर्वेद का तलाक हुए काफी वक्त बीत चुका था. सभी के सम झानेबु झाने के

बाद भी निर्वेद का मन किसी की ओर नहीं  झुका. अधीरा से टूटे हुए रिश्ते ने उस को इस कदर तोड़ दिया था कि फिर वह किसी से जुड़ ही नहीं सका. निर्वेद की उम्र पैसा कमाने और दोस्तों से मिलने में ही बीत रही थी.

निर्वेद का मिलनसार व्यवहार और गाने का शौक हर महफिल में जान डाल देता था. अपने हर दोस्त के घर उस का स्वागत प्यार से होता था. अपने कलात्मक सु झाव और मस्तमौला अंदाज के कारण वह दोस्तों के परिवार के बीच भी उतना ही पौपुलर था जितना दोस्तों के बीच. दुनिया के न जाने कितने देशों में अपने काम के सिलसिले में निर्वेद का जाना हुआ लेकिन आज भी वह अपने आलीशान मकान में अकेला रह रहा था. सारी रात आदविक इन्हीं यादों में डूबता तैरता रहा.

सुबह की पहली किरण के साथ जब आदविक की पत्नी खनक की आंख खुली तो उस ने आदविक को खिड़की के पास खड़ा पाया जो बाहर देख रहा था. जल्दी उठने का कारण पूछने पर आदविक ने पूरी कहानी खनक को बता दी फिर जल्दी तैयार हो कर वक्त के कुछ पहले ही वह अस्पताल पहुंच गया और आईसीयू की विंडो से निर्वेद को देखता रहा. डाक्टर से बात कर के उसे पता चला कि करीब रात एक बजे उसे अस्पताल लाया गया था. हार्ट अटैक सीवियर था, लेकिन समय पर सहायता मिल गई. अब स्थिति काबू में है. बता कर डाक्टर चला गया. आदविक पूछता ही रह गया कि डाक्टर उसे अस्पताल लाया कौन था?

तभी आदविक ने देखा कि एक औरत उसी डाक्टर को आवाज लगाती हुई आई और उस से निर्वेद के बारे में पूछताछ करने लगी. आदविक हैरानी से उस की ओर देख रहा था. वह करीब 39-40 साल की खूबसूरत औरत थी जो भारतीय नहीं थी. उस का फ्रैच जैसा अंगरेजी बोलना यह बता रहा था कि वह इंग्लिश स्पीकिंग देश से भी नहीं है. नैननक्श से अरबी लग रही थी. आदविक खुद भी काम के सिलसिले में कई देशों में रह चुका था, इसलिए वह पहचान गया.

तभी नर्स ने आ कर कहा कि आप रोगी से मिल सकते हैं. उन्हें रूम में शिफ्ट कर दिया गया है. आदविक रूम में पहुंचा तो वह महिला पहले से ही निर्वेद के बैड के पास कुरसी पर बैठी थी. उस की हालत ठीक लग रही थी.

निर्वेद ने उस से मिलवाते हुए कहा, ‘‘आदविक, यह मेरी दोस्त आबरू है और आबरू यह मेरा दोस्त आदविक.’’

आबरू की आंखों में निर्वेद के लिए  झलकते चिंता के भाव काफी कुछ

कह रहे थे. निर्वेद की तबीयत अब ठीक लग रही थी, आदविक उन दोनों को अकेला छोड़ कर डाक्टर से बात करने के बहाने वहां से चला गया और बाहर बैंच पर बैठ गया. आदविक की कल्पना की उड़ान इस कहानी के सिरे ढूंढ़ने लगी. उसे यह तो पता था कि निर्वेद करीब 4 साल पहले किसी फौरेन असाइनमैंट के लिए इजिप्ट गया था और वहां वह 2 साल रहा था पर यह आबरू की क्या कहानी है?

तभी डाक्टर को सामने से आता देख आदविक उन से निर्वेद के अपडेट्स लेने लगा. डाक्टर ने दवाइयों और इंस्ट्रक्शंस की लिस्ट के साथ घर ले जाने की आज्ञा दे दी.

कमरे में आ कर आदविक ने सब बताते हुए निर्वेद से कहा, ‘‘तू मेरे घर चल, मैं तु झे अकेले नहीं छोड़ूंगा.’’

निर्वेद ने सवालिया निगाहों से आबरू की तरफ देखा तो वे अपनी फ्रैंच इंग्लिश में बोली, ‘‘आदविक आप निर्वेद की चिंता बिलकुल न करें मैं उस का ध्यान रखूंगी. कोई जरूरत हुई तो आप को बता दूंगी.’’

आदविक ने हैरानी और परेशानी से निर्वेद की ओर देखा, ‘‘यार यह कैसे संभालेगी? न तो यह यहां की भाषा जानती है न ही इसे यहां का सिस्टम सम झ आएगा.’’

आबरू उन की हिंदी में हो रही बातचीत को न सम झ पाने के कारण कुछ असमंजस में थी सो बोली, ‘‘आप यहां बैठो मैं तब तक डाक्टर से मिल कर आती हूं.’’

उस के जाते ही आदविक ने अपने प्रश्नों भरी निगाहें निर्वेद की तरफ मोड़ीं.

निर्वेद अपनी सफाई देते हुए बोला, ‘‘तु झे पता है मैं कुछ साल पहले इजिप्ट गया था और वहां 2 साल रहा था. आबरू वहीं मेरी ही कंपनी में काम करती थी. यह वहां के एक जानेमाने परिवार की है. इस का उसी दौरान तलाक हुआ था. इसीलिए इस का नौकरी से भी मन उचट गया था और काफी परेशान रहने लगी थी. फिर इस ने नौकरी छोड़ दी.

‘‘तो फिर अब क्या करती है?’’

‘‘इसे कला और कलाकृतियों की काफी अच्छी परख है और यही उस का शौक भी था. तु झे तो पता ही है कि मु झे भी कला से काफी लगाव है. तो बस इस के नौकरी छोड़ने के बाद भी हमारे शौक समान होने के कारण हमारी दोस्ती बरकरार रही. फिर मेरी सलाह पर इस ने भारतीय कलाकृतियां भी रखनी शुरू कर दीं.’’

‘‘पर तु झे तो आए 2 साल हो गए, फिर अब यह यहां कैसे?’’

‘‘यहां से भारतीय कलाकृतियां को ले जाने के लिए यहां आई हुई है. अभी उस का काम पूरा नहीं हुआ है इसलिए यहीं है. लेकिन जैसा तू सम झ रहा है वैसा कुछ भी नहीं है,’’ निर्वेद ने नजरें  झुका कर कहा.

निर्वेद और आबरू निर्वेद के घर लौट गए, 1-2 बार आदविक उस से मिलने निर्वेद के घर भी गया और उस के चेहरे की लौटती रौनक देख कर आबरू द्वारा की जा रही देखभाल से आश्वस्त हो कर लौट आया.

आज छोटी दीवाली का दिन था. आदविक के पास सुबहसुबह निर्वेद का फोन

आया, ‘‘क्या तू कल सुबह 9 बजे मेरे घर आ सकता है… मु झे अस्पताल जाना है.’’

‘‘क्या हुआ, सब ठीक तो है न?’’

‘‘हांहां सब ठीक है. चैकअप के लिए बुलाया है.’’

‘‘ठीक है.’’

जब आदविक अगले दिन उस के घर पहुंचा तो उसे निर्वेद और आबरू दोनों कुछ ज्यादा ही अच्छे से तैयार लगे. वह सम झ न पाया कि अस्पताल जाने के लिए भला इतना तैयार होने की क्या जरूरत है. फिर सोचा छोड़ो यार जैसी इन की मरजी. बाहर निकले तो निर्वेद बोला, ‘‘गाड़ी मैं चलाऊंगा.’’

‘‘अरे लेकिन मैं हूं न.’’

‘‘नहीं मैं ही चलाऊंगा. अब तो मैं ठीक हूं,’’ वह जिद करने लगा.

हार कर आदविक ने उसे गाड़ी की चाबी देते हुए कहा, ‘‘ओके, यह ले.’’

मगर थोड़ी देर में गाड़ी को अस्पताल की तरफ न मुड़ते देख आदविक बोला, ‘‘अरे यार अस्पताल का कट तो पीछे रह गया तेरा ध्यान कहां है?’’

निर्वेद मुसकराते हुए बोला, ‘‘ध्यान सीधा मंजिल पर है.’’

‘‘मंजिल कौन सी…’’ आदविक का वाक्य पूरा भी नहीं हो पाया था कि उस ने देखा गाड़ी मैरिज रजिस्टरार के औफिस के सामने जा रुकी.

‘‘निर्वेद यार यहां क्यों, कैसे…’’

‘‘अरे यार मैरिज के लिए और कहां जाते हैं,’’ निर्वेद ने गाड़ी से निकलते हुए ठहाका लगाया.

‘‘मैरिज किस की, कैसे?’’

गाड़ी से निकल कर निर्वेद और आबरू ने एकदूसरे की बांहों में बांहें डालते हुए हाथ पकड़ कर एकसाथ कहा, ‘‘ऐसे और हमारी,’’ और दोनों खिलखिला उठे.

आदविक ने आबरू की ओर देखा तो उस के शर्म से लाल चेहरे से नईनवेली दुलहन  झलक रही थी?

‘‘अच्छा तो यह बात है तो फिर यह भी बता दो कि इस बेचारे गरीब की दौड़ क्यों लगवाई सुबहसुबह?’’

‘‘तो क्या गवाह हम खुद ही बन जाते?’’ मुसकराते हुए निर्वेद ने अपने उसी अंदाज में कहा.

आदविक सोचने पर मजबूर हो गया कि जिस की जिंदगी जीने की किरण भी बु झ गई

थी, जिस की किश्ती किनारे पर डूब गई थी उसे पार भी लगाया तो उजाले के साथ, दीयों के साथ, ऊपर से उसे दीवाली की सतरंगी रोशनी से लबरेज भी कर दिया. यह सतरंगी रोशनी वाली प्यार की दुनिया तु झे बहुतबहुत मुबारक हो मेरे दोस्त. दीवाली के पटाखों की आवाजें चारों तरफ से आ रही थीं सभी प्रसन्न थे. निर्वेद भी दीवाली के उपहार के रूप में आबरू को पा कर प्रसन्न था.

Winter Special: सर्दी-जुकाम में इन 4 टिप्स से जल्द मिलेगा आराम

सर्दी-जुकाम ऐसा संक्रामक रोग है जो जरा सी लापरवाही ही लोगों को अपने गिरफ्त में ले लेता है. यह इंसानों में सबसे ज्यादा होने वाला रोग है. सर्दी या फिर जुकाम कोई ऐसी गंभीर बीमारी नहीं है जिसकी वजह से परेशान हुआ जाए. साल भर में वयस्कों को दो से तीन बार और बच्चों को छः से बारह बार जुकाम की समस्या होना आम है.

सामान्य जुकाम के लिए कोई खास उपचार नहीं होता लेकिन इसके लक्षणों का इलाज किया जाता है. इसके आम लक्षणों में खांसी, नाक बहना, नाक में अवरोध, गले की खराश, मांसपेशियों में दर्द, सर में दर्द, थकान और भूख का कम लगना शामिल हैं. ये लक्षण 7 – 8 दिनों तक शरीर में दिखाई पड़ते हैं. ऐसे कई घरेलू उपचार हैं जो सर्दी-जुकाम से राहत दिलाने में आपकी मदद कर सकते हैं. तो चलिए आज  ऐसे ही कुछ घरेलू नुस्खों के बारे में आपको बताते हैं.

1. अदरक और तुलसी का काढ़ा

अदरक के यूं तो स्वास्थ्य संबंधी अनेक फायदे होते हैं लेकिन सर्दी-जुकाम को दूर करने में इसका अहम रोल होता है. अदरक जुकाम के लिए सर्वोत्तम औषधि है. थोड़े से अदरक को एक कप पानी के साथ उबालें और इसमें तुलसी की 10-12 पत्तियां डाल दें. इस मिश्रण को तब तक उबाले, जब तक पानी आधा न रह जाए. अब इस काढ़े का सेवन करें. यह सर्दी को जड़ से ठीक करने में काफी फायदेमंद है.

2. शहद

शहद खांसी के बेहतरीन इलाज में से एक है. इसमें एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-माइक्रोबियल गुणों से भरपूर होता है. गले की खराश और दर्द से राहत पाने के लिए नींबू की चाय मे शहद मिलाकर पीना चाहिए इसके अलावा दो चम्मच शहद में एक चम्मच नींबू का रस एक ग्लास गर्म पानी या गर्म दूध में मिलाकर पीने से काफी लाभ होता है, लेकिन एक साल से कम के बच्चों को शहद नहीं देना चाहिए.

3. भाप लें

गर्म पानी के बर्तन के ऊपर सिर रखकर नाक से सांस लें. आप चाहे तो इसमें जरूरत के हिसाब से मिंट मिला सकती हैं. अब सिर को किसी हल्के तौलिए से ढककर कटोरे से तकरीबन 30 सेंटीमीटर की दूरी से भाप लें. इससे बंद नाक से राहत मिलती है.

4. ज्यादा से ज्यादा पेय पदार्थो का सेवन

सर्दी और जुकाम की बीमारी में ज्यादा से ज्यादा तरल पदार्थों का सेवन श्वांसनली को नम रखता है और आपको डिहाइड्रेट होने से भी बचाता है. ऐसे में गर्म पानी, हर्बल चाय, ताजा फलों के जूस और अदरक की चाय का सेवन सर्दी और खांसी दोनों से ही राहत दिलाते हैं.

स्नेह से दूर करें बच्चों का अकेलापन

हम आज ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां लोग सिर्फ भाग रहे हैं और यह भागमभाग सिर्फ भौतिकवादी सुखों को पाने की है. हम सभी इस दौड़ का हिस्सा इसलिए बनते हैं कि हम अपने बच्चों को बेहतर सुखसुविधा और बेहतर भविष्य दे सकें, उन का जीवन आसान व आरामदायक बना सकें, आर्थिक स्थिरता ला कर उन के सपने पूरे कर सकें. लेकिन इस भागदौड़ में हम नहीं समझ पाते हैं कि इतना सब पाने में हम कुछ अत्यंत महत्त्वपूर्ण यानी अपने बच्चों से दूर हो रहे हैं.

अपने दैनिक कार्यों और बच्चों के लिए समय के निकालने के बीच में संतुलन बनाना कईर् कामकाजी अभिभावकों के लिए चुनौती होता है. व्यस्त समय में अभिभावक बच्चों को पूरा समय नहीं दे पाते. नतीजे में अभिभावकों के प्रति बच्चों में आत्मीय लगाव खत्म होने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है. अकेलापन दूर करने के लिए बच्चे मोबाइल, कंप्यूटर या लैपटौप आदि संसाधनों में समय बिता रहे हैं. इस से बच्चों में चिड़चिड़ाहट तथा हीनभावना बढ़ रही है. अधिकांश परिवारों में मातापिता दोनों काम पर जाते हैं, ऐसे में उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि वे अपने बच्चों के लिए रोजाना थोड़ा समय जरूर निकालें.

दरअसल, बच्चों के मन में कई तरह के सवाल होते हैं और हर सवाल का हल उन के पास नहीं होता है. इसलिए उन्हें हमारी जरूरत होती है. जिस तरह से आप अपनी औफिस मीटिंग के लिए समय निकालते हैं उसी तरह बच्चों के लिए भी समय निकालें. उन्हें एहसास होने दें कि आप के लिए वे महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि आप के बच्चों को आप के तोहफों से ज्यादा आप की मौजूदगी की जरूरत है.

आइए जानते हैं शैमरौक प्रीस्कूल्स की एग्जीक्यूटिव डायरैक्टर और शेमफोर्ड फ्यूचरिस्टिक स्कूल्स की फाउंडर डायरैक्टर मीनल अरोड़ा के कुछ ऐसे टिप्स जिन से आप अपने बच्चों के साथ बेहद प्रभावी व गुणवत्तापूर्ण तरीके से समय बिता सकें.

छोटे कदम, बड़े परिणाम

हमारे छोटेछोटे कदम बच्चों के मस्तिष्क पर बहुत प्रभाव डालते हैं. बच्चों को गुडमौर्निंग, गुडआफ्टरनून, गुडनाइट विश करना, स्कूल जाते समय गुड डे कहना, उन्हें गले लगा लेना, उन्हें गोद में उठा लेना, उन्हें देख कर प्यार से मुसकराना, अपने बच्चे के गाल पर किस करना आदि बच्चों के साथ की गई अभिभावकों की छोटीछोटी ये क्रियाएं दर्शाती हैं कि ‘मुझे तुम्हारा खयाल है.’ ये छोटीछोटी बातें बच्चों के लिए उस की दुनिया होती हैं और बच्चों को हमेशा अभिभावकों का साथ चाहिए होता है, सुकून चाहिए होता है. चाहे आप उन से कितना ही नाराज क्यों न हों, उन्हें हर दिन बताएं कि आप उन से कितना प्यार करते हैं. सब के पसंदीदा बौलीवुड अभिनेता शाहरुख खान की एक पिता के रूप में बेहतरीन छवि है. वे भले ही कितने ही व्यस्त क्यों न हों, दिन में 2-3 बार अपने बच्चों से जरूर बातें करते हैं.

भोजन का वक्त खुशियों का वक्त

पेरैंट्स को चाहिए कि वे दिन में कम से कम एक समय का भोजन बच्चे के साथ बैठ कर करें और बेहतर होगा डिनर करें क्योंकि यही वह समय होता है जब सभी सदस्य काम से लौट कर दिनभर की थकान के बाद एकसाथ बैठते हैं. पूरे परिवार के  साथ बैठ कर बातें करने को अपनी दिनचर्या का जरूरी हिस्सा बनाएं और उन से दिनभर के काम व उपलब्धियों के बारे में बात करें. इस दौरान यदि आप का बच्चा कहता है कि उसे आप से कुछ कहना है, तो इस बात को गंभीरता से लें, और सब काम छोड़ कर उस की बात को ध्यान से सुनें. बच्चे को उस की सफलताओं और उपलब्धियों के लिए बधाईर् दें. बच्चों की सफलता  के लिए उन की तारीफ करें क्योंकि इस से उन्हें आगे बढ़ने में मदद मिलेगी. डिनर करते समय अपने बच्चों को परिवार व उन से संबंधित चर्चाओं में शामिल करें. उन की बेहतरी से संबंधित मामलों में उन की भी राय लें. इस से न सिर्फ उन्हें पारिवारिक मुद्दे समझने में मदद मिलेगी बल्कि उन में अपना खुद का नजरिया विकसित करने का आत्मविश्वास भी आएगा.

समय को लमहों से मापें

बच्चों के साथ समय बिताने के लिए तरीके ढूंढ़ें. उन्हें घर के छोटेछोटे काम करने के लिए प्रोत्साहित करें. इस से न सिर्फ आप को उन के साथ ज्यादा समय बिताने में मदद मिलेगी बल्कि  इस से उन में जिम्मेदारी का एहसास भी आएगा. इस के साथ ही यह बच्चे व आप के बीच खुशनुमा और दुखभरी बातें साझा करने के लिए भी सही समय होगा.

जब आप घर पहुंचते हैं और घर के काम व डिनर आदि निबटाने की जल्दी में होते हैं तो अपने बच्चे को अपने कामों में जोड़ें और उन की मदद लें. साथ ही, उन की मदद के लिए उन्हें धन्यवाद भी दें. इन कामों के साथसाथ अपने बच्चे से बातचीत करते रहें और उसे कुछ सिखाने की कोशिश भी. कपड़े धोने जैसे कामों के बीच आप उस से उस की दिनभर की गतिविधियों और उस के मन की बातें जान सकते हैं. हफ्तेभर आप ठीक से बच्चों के लिए यदि समय न निकाल सकें तो वीकेंड पर आप उन्हें कुछ खास महसूस करा सकते हैं और उस के साथ जुड़ सकते हैं. बच्चों को बाहर घूमने जाना पसंद होता है, जैसे किसी मौल में या ऐतिहासिक जगह पर या परिवार के साथ पिकनिक पर जाना आप को उस  के साथ ढेरों बातें करने का मौका दे सकता है.

कहानी सुनाएं, समां बाधें

बच्चों के साथ किताबें पढे़ं. बच्चों को नई कहानियां हमेशा रोमांचक लगती हैं. उन को नई किताबों से परिचित कराएं, उन के साथ बैठ कर खुद भी कुछ नईर् अच्छी कहानियों से जानपहचान करें. इस से आप और आप के बच्चे जानकारी भी हासिल कर पाएंगे और साथ में अच्छा समय भी व्यतीत कर पाएंगें. इन खुशनुमा लमहों को उन के सपनों तक ले जाएं. उन के सपनों की दुनिया में उन के साथ कदम रखें. उन्हें काल्पनिक कहानियां सुनाएं, उन की कल्पना को बढ़ावा दें. उन के भीतर छिपे हुए प्रतिभाशाली लेखक को बाहर लाएं और कहानियों के अंत पर उन की राय लेने की कोशिश करें. उन्हें इन भूमिकाओं को निभाने के लिए प्रोत्साहित करें और अच्छी तरह अपना किरदार चुनने में उन की मदद करें.

सन डे, फन डे, हौलिडे

अपने परिवार के साथ आउटिंग पर जरूर जाएं, फिर चाहे यह बड़ी हो या छोटी. और हां, अपने गैजेट्स साथ ले कर नहीं जाएं. आउटिंग पर उन के साथ बातचीत करें, मस्तीभरे खेल खेलें और जीवन को खुल कर जिएं. अपने बचपन के दिनों को याद करें, बचपन की यादें ताजा करें और अपने बचपन में खेले जाने वाले खेलों को बच्चों के साथ फिर खेलें. सप्ताह के दौरान जीवन में आने वाली एकरूपता को तोड़ने का सब से अच्छा तरीका है, फिर से बच्चा बन जाना.

जश्न और उल्लास

त्योहार और विशेष अवसर तब और खास बन जाते हैं जब वे परिवार के साथ मिल कर मनाएं जाते हैं. यह ऐसा समय होता है जब पूरा परिवार साथ रहता है और साथ में मस्ती करता है. इस अवसर का लाभ उठाएं. आप अपने बच्चे के सब से अच्छे दोस्त व शुभचिंतक बनें. बच्चों के साथ हम जो समय बितातेहैं वह सब से कीमती होता है. इन लमहों को नजरअंदाज नहीं करें क्योंकि ये वे मजेदार पल होते हैं, जो आप के व बच्चों के चेहरों पर मुसकान लाते हैं और पेरैंट्स व बच्चों को खुशहाल व संतुष्ट बनाते हैं. कभी अपने बच्चों को अमीर बनने के लिए शिक्षित नहीं करें बल्कि उन्हें खुश रहने के लिए शिक्षित करें, जिस से उन्हें चीजों की अहमियत पता हो, उन की कीमत नहीं.

Winter Special: सर्दियों में ऐसे करें स्किन की देखभाल

त्वचा की नियमित देखभाल करना मेकअप से ज्यादा जरूरी है. सर्दियों में त्वचा की देखभाल और जरूरी हो जाती है. अपनी कुछ आदतों को बदलकर आप इस मौसम में होने वाली त्वचा संबंधी परेशानियों से आसानी से निपट सकती हैं.

– चेहरे की सफाई पर नियमित ध्यान देना जरूरी है.

– सुबह-शाम फेसवाश से चेहरा धोएं और बाहर से लौटकर चेहरे की सफाई का खास ध्यान रखें क्योंकि बाहर का प्रदूषण चेहरे को नुकसान पहुंचा सकता है.

– चेहरा धोने के बाद चेहरे पर मॉइश्चराइजर लगाना न भूलें. मुलायम हाथों से चेहरे पर मसाज करें और अतिरिक्त मॉइश्चराइजर को कॉटन या टिश्यू पेपर से पोछ लें.

– क्लेंजिंग, टोनिंग व मॉइश्चराइजिंग का सिद्धांत कभी न भूलें. बाहर से घर लौटने पर चेहरा अवश्य साफ करें और सुबह-शाम त्वचा की अच्छे से सफाई करें.

– क्लेंजिंग के लिए कच्चे दूध का इस्तेमाल करें. कच्चे दूध में कॉटन डुबोकर चेहरे को साफ करने से भी त्वचा की बेहतर सफाई की जा सकती है.

– सप्ताह में कम से कम एक बार स्क्रब का इस्तेमाल करें.

– घर पर भी स्क्रब बनाया जा सकता है. इसके लिए चीनी में थोड़ा-सा शहद और बादाम का तेल डालकर स्क्रब बना लें. इसे चेहरे पर लगाएं और हल्के-नर्म हाथों से नीचे से ऊपर की ओर मसाज करें. इसके अलावा नमक और चीनी को जैतून के तेल साथ मिलाकर भी स्क्रब की तरह प्रयोग किया जा सकता है. इससे मृत त्वचा आसानी से हट जती है.

– दिन भर में सात-आठ गिलास पानी अवश्य पिएं. जाड़ों में अक्सर लोग पानी पीना कम कर देते हैं. पानी से त्वचा को कुदरती चमक मिलती है.

– खूबसूरत और दमकती त्वचा के लिए खानपान पर भी ध्यान देना जरूरी है. फलों और हरी सब्जियों को अपनी डाइट में शामिल करें. जूस व दूध का प्रयोग भी भरपूर मात्रा में करें. इससे त्वचा और चेहरे में प्राकृतिक निखार बढ़ेगा.

– व्यायाम व योग को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं. इससे रक्त संचार तेज होता है और चेहरे की चमक बढ़ती है.

– खानपान में पर्याप्त फल और सब्जियों को शामिल करें. त्वचा व शरीर को भरपूर पोषण देने के लिए ओमेगा 3 फैटी एसिड युक्त आहार लें. मछली और बादाम विटामिन ई और ओमेगा-3 का अच्छा स्रोत हैं.

– घर से बाहर निकलते वक्त एसपीएफ युक्त सनस्क्रीन का प्रयोग करें.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें