Gen Z : सुनील वर्मा का बीपी कभी ऊपर तो कभी नीचे होता रहता है. जिस की वजह उन का बिगड़ता स्वास्थ्य नहीं बल्कि उन का 27 वर्षीय निठल्ला बेटा है
जो पहले तो कालेज की मौजमस्ती में अच्छी प्लेसमैंट से पीछे रह गया और फिर जब जौब मिली तो यह कह छोड़ बैठा कि इस में जौब सैटिस्फैक्शन नहीं है, मैंटल पीस नहीं है. फिर जब उसे नई जौब देखने को कहा तो उस ने कहा कि मैं अब किसी की नौकरी नहीं करूंगा. मैं भी इन्फ्लुएंसर बनूंगा.’’ और तब से यह इन्फ्लुएंसर महाशय दिनरात स्क्रौलिंग करते रहते हैं.
इस में कोई दो राय नहीं है कि जेन जी पीढ़ी पूरी तरह से सोशल मीडिया की दीवानी बनी फिर रही है. इस पीढ़ी में अधिकांश संख्या सिर्फ औडियंस है, फिर कुछ फालतू के क्रिएटर और जो थोड़ेबहुत बच गए हैं उन में कुछ ने थोड़ी ढंग की पढ़ाई कर ठीकठाक सी नौकरी पकड़ रखी है. लेकिन कुछ नया या आधुनिक काम केवल नाम मात्र के ही कर रहे हैं. अब यहां हमारा अर्थ नया और आधुनिक से किसी नए कंटैंट से नहीं बल्कि इनवैंशन या क्रिएशन से है. पर अफसोस आज की जेन जी क्रिएशन के नाम पर सिर्फ रील क्रिएट करने में लगी है.
जेन जी की दीवानगी
जिस टैक्नोलौजी की यह जेन जी दीवानी बनी फिर रही है अगर उसी की बात की जाए तो भी यह पीढ़ी कुछ नया निर्माण करने की तुलना में उपभोग अधिक रही हैं क्योंकि मौडर्न डिजिटल प्लेटफौर्म टैक्नोलौजी के कुछ ऐसे नमूने सामने रख चुकी है जहां यह डैवलपिंग के बजाय यूजिंग में बंध कर रह गई है. जैसे डिजिटल ऐप और सोशल प्लेटफौर्म की आसान खरीदारी, फ्री डाउनलोडिंग और उस पर नौनस्टौप स्क्रौलिंग. और इस तरह यह जेन जी पीढ़ी डिजिटल टैक्नोलौजी के सैक्टर में केवल एक यूजर बन कर रह गई है.
यहां भी यदि इन्हें अपनी पसंदीदा टैक्नोलौजी में काम करने को कहा जाए या कुछ भी टैक्निकल पूछ लिया जाए तो इन का डब्बा गोल ही होगा क्योंकि इस के अध्ययन के समय तो ये एक क्रिएटर के रूप में सिर्फ अपनी ऊलजलूल रील्स बनाने में और एक यूजर के रूप में उसे देखने में इतने व्यस्त थे कि उस की पढ़ाई करने का समय इन्हें मिला ही नहीं और अपनी इसी मूर्खतापूर्ण व्यस्तता के चलते ये 27-28 साल की उम्र तक बेरोजगार, दिशाहीन घूम रहे हैं.
फ्री के ऐप ने इन के दिमाग के पेच भी फ्री कर दिए है और पेड ऐप की बात की जाए तो मातापिता के पैसे हैं न इन पर उड़ाने के लिए. यह भी देखने को मिलता है कि इन के लिए भविष्य के लिए गए ऐजुकेशन लोन चाहे वह मांबाप ने लिया हो या इन युवाओं के गारंटर बन उन्हें ऐजुकेशन लोन दिया हो, उस लोन की भरपाई तो मातापिता ही कर रहे होते हैं क्योंकि कालेज से निकलने के बाद भी बहुत से बेरोजगार ही रहते हैं.
जिस के कुछ मुख्य कारण हैं
पहला कि ग्रैजुएशन के बाद भी इन्हें नहीं पता कि करना क्या है, दूसरा कि सोशल मीडिया पर इन्हें भी इन्फ्लुएंसर बनने की ओर दौड़ना है, तीसरा मनचाही जौब नहीं मिल रही और कुछ ऐसे भी हैं जो मिली जौब को छोड़ कर घर बैठे हैं क्योंकि वहां अच्छी वाइब, कूल बौस, हाई पर्कस नहीं हैं. इसलिए उन्होंने एडजस्ट करने के बजाय नौकरी छोड़ना ही ठीक सम?ा.
ऐसे भी आजकल सोशल मीडिया पर ‘क्विट माई कौरपोरेट जौब,’ ‘कौरपोरेट डीटौक्स’ ‘बी योर ओन बौस’ जैसे ट्रेंड बहुत जोरशोर से चल रहे हैं.
यहां यह जैनरेशन देखादेखी में अपनी सू?ाबू?ा तो खो देती है, साथ ही कुछ एडजस्टमैंट और मेहनत से बचने के लिए भविष्य में आने वाले या मिलने वाले अवसर भी गवा देती है. इस का बहुत बड़ा कारण यह सोशल मीडिया और डिजिटल सुविधाएं ही हैं. आज एक क्लिक पर हर चीज उपलब्ध है. राशन, दवा, खाना, सिनेमा मनोरंजन हर चीज तो डिजिटल हो चुकी है. तो किसी भी चीज के लिए मेहनत करना, कुछ कदम चलना भी नहीं रहा. अब यह आराम इतना पसंद आ चुका है कि यह लत बन गई है और इस लत का इतना प्रभाव हुआ है कि सब इस पर निर्भर हो चुके हैं.
जिस जैनरेशन को इस टैक्नोलौजी में नया डैवलपर और इनोवेटर बनना था वह सिर्फ एक कस्टमर बन कर रह गई है.
एक क्लिक में खरीदारी की, टिकटौक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफौर्म में रील्स बनाते हैं, डेटिंग एप राइटलैफ्ट स्वाइप करते रहता हैं, नौनस्टौप स्क्रौलिंग में दिन के 9-9 घंटे लगे हैं. डिजिटल टैक्नोलौजी में नई कोडिंग, कंप्यूटर प्रोग्रामिंग, इनोवेशन करने, सीखने के विपरीत केवल उसे देखने या खरीदने की रेस में अपना नंबर लगाए हुए है क्योंकि यह सब लिखनापढ़ना तो एक जटिल कौशल या कहें ऐक्स्ट्रा हार्डवर्क और डैडीकेशन की बात है.
ऐप बनाना या सौफ्टवेयर कोड लिखना वर्षों के कठिन अध्ययन का परिणाम होता है जो हमारी जेन जी के कंफर्ट को खराब कर सकता है.
कंपीटिटीव माहौल
किसी कोडिंग में घंटों तक निराशाजनक समस्या समाधान करना पड़ता है. कोई इनवैंशन, कोई नई जांच, मैडिसन रिसर्च आदि में पूरी जिंदगी का परिश्रम लगता है और इतना सब हमारी जेन जी भला कैसे करेगी. उसे तो इन्फ्लुएंसर बनने से समय ही नहीं मिल रहा. आखिर कौन सा स्ट्रीट फ्रूड अच्छा है, किस की कौमेडी कौपी करनी है, अपनी बौडी को ऐक्सपोज कर फैमिनिज्म की बात करना, प्राइवेट पिक्चर शेयर कर कपल को रिलेशनशिप एडवाइस देना जैसे सोशल मैसेज देना भी तो इन के लिए बहुत जरूरी है. यदि यह सब जेन जी छोड़ देगी तो समाज का भला और उन का भविष्य कैसे बनेगा? कैसे मातापिता का लिया लोन या कर्ज भरा जाएगा?
जहां हर समय खानेपीने की चीजें महंगी हो रही हैं, मकान की कीमतें बढ़ रही हैं, किराया बढ़ रहा है, मार्केट में जौब्स कम हो रही हैं, ऐजुकेशन सैक्टर में एडमिशन नहीं हो रहा, हर जगह कंपीटिशन है, लोन से हर इंसान दबा पड़ा है. वहां ये सारी चिंताएं केवल मातापिता के मथे मढ़ यह जैनरेशन रील्स बना रही है, फालतू के मियां मिट्ठू बने सोशल मीडिया क्रिएटर्स के पीछे भाग रही है या डेटिंग ऐप में डूबी पड़ी है. यह अपने हर घर की नींव खुद खोद रही है. मांबाप की सेविंग को उड़ा कर अपनी जवानी के साथ उन का बुढ़ापा भी खराब कर रही है.
बदलाव और परिश्रम
इस में कोई शक नहीं है कि यह जैनरेशन सिर्फ एक उपभोगता जैनरेशन है निर्माता नहीं. यदि पिछले दशकों पर नजर डाली जाए तो मिलेगा कि टैक्नोलौजी के सैक्टर में बड़े निर्माण नहीं हुए हैं. हां लेकिन इस बात को भी झूठलाया जा सकता कि मिलेनियल्स द्वारा दी गई डिजिटल टैक्नोलौजी में इन्होंने काफी बदवाल किए हैं. लेकिन यह कोई इनवैंशन नहीं है. यहां ये एक लिंक की तरह काम कर रहे हैं. मौजूदा डिजिटल टैक्नोलौजी में नए फेरबदल कर उसे डिजिटल सेवाओं में उपलब्ध करा रहे हैं.
आम भाषा में अधिकांश जेन जी उस तरह काम कर रही है जैसे कोई रिटेलर, होल सेलर काम करता है न कि क्रिएटर. जेन जी दूसरे के क्रिएशन पर अपनी पोस्ट, रील बना कर के उछल रही है. दूसरे की बनाई सोशल साइट, ऐप, वैबसाइट आदि को इस्तेमाल करना कोई इनोवेशन नहीं कहलाता.
अगर हम इस बदलाव में भारत की जेन जी का परिश्रम देखें तो सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों के किए बदलाव और परिश्रम ही नजर आएगा. जो काफी नहीं है. देश में करीब 40 करोड़ की आबादी जेन जी की है यानी डिजिटल टैक्नोलौजी के 40 करोड़ उपभोगता तो सीधे दिख रहे हैं, जिन में 16.5% तो बेरोजगार ही हैं और यदि इसी तरह से ये टैक्नोलौजी से कुछ सीखने, इस में कुछ नया करने या किसी सैक्टर में कुछ नया करने के बजाय सिर्फ डिजिटल उपभोगता बने रहेंगे तो यह बेरोजगारी का आंकड़ा बड़ा होता जाएगा.
