Social Media : पब्लिक और पौलिटिकल जीवन में महिलाओं के खिलाफ बयानबाजी, डबल स्टैंडर्स और विरोध करने पर मिलने वाली सोशल बैकलैस समाज में गहराई से जड़ें जमा चुकी पितृसत्ता का नतीजा है.
गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में जहां 82 फीसद मैडल महिलाओं ने अपने नाम किए थे, आनंदीबेन कहती हैं कि महिला को पहले घर संभालना और अच्छी मां बनना सीखना चाहिए. महिला चाहे आईएएस अधिकारी बन जाए या डाक्टर उस की प्राथमिक उपयोगिता केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित है.
कर्नाटक विधान सभा में खड़े हो कर कांग्रेस के नेता के. आर. रमेश कुमार ने कहा था कि जब बलात्कार अपरिहार्य हो तो लेट जाओ और इस का आनंद लो. सार्वजनिक मंचों से महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों और पीडि़ताओं इतना असंवेदनशील.
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रावत ने कहा था रिपड जींस पहनने वाली अच्छी नहीं. वे अपने बच्चों को अच्छे संस्कार नहीं दे पाएंगी.
यहां महिला के कपड़ों से उस के चरित्र, उस की योग्यता या उस की मां बनने की क्षमता को जोड़ा जाता है. इतनी महिला विरोधी बातों के बाद भी कोई विरोध नहीं दिखता. महिलाएं सोशली और पौलिटिकली लीड करने को आगे ही नहीं आतीं. ज्यादातर महिलाओं के पास फाइनैंशियल फ्रीडम नहीं होती. समाज बचपन से ही महिलाओं को यह सिखाता है कि सहनशीलता और चुप्पी ही अच्छी महिला की पहचान है.
व्यक्तिगत जीवन को निशाना
जब पुरुष राजनीति या सामाजिक मुद्दों पर विरोध करते हैं तो उन्हें वैचारिक बुद्धिजीवी कहा जाता है. लेकिन जब कोई महिला जैसे नेहा बोरा पर स्याही फेंकी गई, कोई अन्य सामाजिक कार्यकर्ता विरोध करने सड़कों पर उतरती है तो सब से पहले उस का चरित्रहनन किया जाता, पहनावे और व्यक्तिगत जीवन को निशाना बनाया जाता है.
इस का सीधा उद्देश्य महिलाओं की फ्रीडम, पहनावे और शरीर पर नियंत्रण बनाए रखना होता है. जब कोई महिला समाज द्वारा तय किए गए ‘पारंपरिक सांचे’ से बाहर निकलती है तो उसे चरित्रहीन कहा जाता है.
समाज ने एक आदर्श महिला की परिभाषा तय कर दी है जो शांत हो, घर की सीमाओं में रहे, त्याग करे और धार्मिक अनुष्ठानों में लगी रहे.
सीजेपी प्रोटैस्ट में एक 15 साल की लड़की को गाली देने के लिए पब्लिकली माफी मांगवाई. पुरुषों के लिए गालियों को अकसर आक्रोश या सामान्य बोलचाल मान कर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि महिलाओं द्वारा आवाज उठाने पर उन्हें नीचा दिखाने के लिए उन का चरित्रहनन करने या सार्वजनिक माफी का दबाव बनाने जैसे तरीके अपनाए जाते हैं.
इसे समाजशास्त्र में ‘इंस्टिट्यूशनल बैकलैस’ कहा जाता है. इस का मकसद किसी एक महिला को सजा देना नहीं बल्कि अन्य सभी महिलाओं के मन में यह डर पैदा करना होता है कि अगर वे स्थापित व्यवस्था या पुरुषों के प्रभुत्व को चुनौती देंगी तो उन का हश्र भी यही होगा.
सुरक्षित दायरा
धार्मिक पितृसत्ता और आंतरिक अधिन्ता राजनीति, प्रशासन और लीडरशिप को समाज ने हमेशा पुरुषों का क्षेत्र मान कर महिलाओं के लिए कठिन बनाया है. यहां कदम रखने पर महिलाओं को चरित्रहनन, ट्रोलिंग, हिंसा और पारिवारिक समर्थन नहीं मिलता है.
महिलाओं को ज्यादातर धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में भागीदारी को समाज सामाजिक स्वीकृति देता है. इसे महिलाओं के लिए एक सुरक्षित दायरा बताया जाता है, जहां जाने पर उन के चरित्र या पारिवारिक निष्ठा पर सवाल नहीं उठाए जाते.
धार्मिक अनुष्ठानों, व्रतत्योहारों और पूजापाठ में महिलाओं की भागीदारी अकसर नेतृत्व के रूप में भी नहीं बल्कि वहां भी उन्हें दासी की तहर ही सम?ा जाता है. यहां भा उन की भूमिका अनपेड सेवा के रूप में होती है जैसे उपवास रखना, भोजन बनाना, सजावट करना और व्यवस्था संभालना.
बचपन से ही महिलाओं की सामाजिक कंडीशनिंग इस तरह की जाती है कि वे त्याग, सेवा और धर्मरक्षा को ही अपनी सर्वोच्च पहचान मान लें, जबकि निर्णय लेने की शक्ति और धार्मिक नेतृत्व जैसे पुजारी, मठाधीश अभी भी बड़े पैमाने पर पुरुषों के पास ही रहता है.
महिलाएं उस व्यवस्था के भीतर ही अपनी जगह और सम्मान ढूंढ़ने की कोशिश करती हैं जो उन्हें मिलता है. धर्म और पूजापाठ एक ऐसा क्षेत्र बन जाता है जहां उन्हें अपने घर से बाहर निकलने, अन्य महिलाओं से जुड़ने और सामाजिक मान्यता पाने का अवसर मिलता है.
राजनीति और सामाजिक नेतृत्व में भागीदारी के लिए जिस आर्थिक स्वतंत्रता, सुरक्षा और सहयोग की जरूरत होती है, समाज पारंपरिक रूप से महिलाओं को उस से वंचित रखता है, जबकि धार्मिक गतिविधियों में उन की उपस्थिति से पुरुषप्रधान व्यवस्था को कोई खतरा नहीं होता.
