husband wife equality : “पति का ये काम नहीं है, अगर उसे घर के ये काम ही करने होते तो वो शादी क्यों करता, आपको क्यों लाता”?

“अगर आपने पति से ये सब काम करवाया, तो आपको पूर्णिमा, करवाचौथ जैसे व्रत का लाभ नहीं मिलेगा”.

आपने कभी न कभी किसी न किसी बाबा या घर के बड़ों से सुनी ही होगी?

आइए जानें कौन से धर्मगुरु ये बकवास करते हैं-

चर्चित कथावाचक और धार्मिक वक्ता-

अनिरुद्धाचार्य महाराज

इनके शादी-ब्याह, पति-पत्नी के रिश्तों, सास-बहू के कर्तव्यों और महिलाओं के घर के कामों पर दिए गए बयान सबसे ज्यादा वायरल होते हैं. “पति की सेवा”, “लड़कियों को क्या करना चाहिए” जैसे विषयों पर इनके क्लिप्स इंस्टाग्राम पर ट्रेंड करते हैं.

पंडित प्रदीप मिश्रा (सिहोर वाले)

व्रत, पूजा-पाठ और पारिवारिक जीवन के ऐसे कई नियम और ‘उपाय’ बताते हैं, जिनके क्लिप्स काटकर रील्स के रूप में फैलाए जाते हैं.

देवकीनंदन ठाकुर

पारंपरिक स्त्री-पुरुष भूमिकाओं और घरेलू व्यवस्था पर दिए गए इनके भाषणों के हिस्से अक्सर रील्स में उपयोग होते हैं.

एआई (AI) वॉइसओवर और थीम आधारित इंस्टाग्राम पेजेस-

इन्हीं पेजों पर सबसे ज्यादा बिना सिर-पैर की बातें जैसे “पति से चूल्हा मत जलवाना” या “पति के हाथ की चाय पाप है” पोस्ट होती हैं. इनमें किसी व्यक्ति का चेहरा नहीं होता, बल्कि पृष्ठभूमि में मंदिर या एआई-जनरेटेड तस्वीरें होती हैं और पीछे रोबोटिक आवाज में ये बातें कही जाती हैं.

उदाहरण के तौर पर- @sanatan_gyan_108, @dharmik_vichar_official, @sanskar_pravachan, @hindu_sanatan_path जैसे नाम वाले दर्जनों पेजेस.

दरअसल, ये सब बातें धर्मगुरु कहते हैं और जनता को या पत्नियों को उनके काम समझाते हैं. लेकिन ऐसा कहते वक्त वे ये भूल जाते हैं कि ये पति ही चाहते हैं कि पत्नियां बाहर जाकर नौकरियां करें, तो फिर वे नौकरी के साथ घर कैसे संभालेंगी.

वे ये क्यों नहीं कहते कि छोड़ो कमाने का काम मेरा है, तुम बस घर देखो.

तब तो उन्हें पत्नियों के द्वारा लाई गई मोटी सैलरी दिखती है.

जब कमा दोनों रहे हैं, तो घर का काम दोनों क्यों नहीं कर सकते?

क्यों पुरुष और महिला बराबर नहीं हो सकते?

इसी वजह से तलाक बढ़ रहे हैं?

आज दोनों कपल वर्किंग हैं, तो दोनों को मिल-बांटकर घर का काम करना चाहिए या नहीं ?

लेकिन ये बाबा गलत पाठ पढ़ाते हैं और पतियों को बरगलाकर आपस में पति-पत्नी की लड़ाई करवाते हैं? इनसे कैसे निपटें?

धर्म नहीं, बल्कि कुप्रथा है ये

इन बाबा या कहें कि मनोभाव के अनुसार अगर पत्नी ने पति से चाय बनवाकर पी ली तो वह जहर का काम करेगी और अगर खुदा न खास्ता आप बच भी गए तो इन महाराजों के ताने तो आपको जरूर ही मार देंगे. ये सब बकवास बातें ही तो ये बाबा औरतों के दिमाग में डालते हैं, जिसका नतीजा होता है पुरुष खुद को सबसे ऊपर मानने लगता है और पति-पत्नी का रिश्ता बराबरी का नहीं बल्कि मालिक और कर्मचारी का हो जाता है. इस बात को बहुत सी गृहणियां महसूस भी करती हैं. साथ ही घरों में सास नाम का जो प्राणी होता है उसकी नजर भी हर वक्त बस यहीं पर होती है कि कहीं बहू मेरे बेटे से एक गिलास पानी भी मंगवा के न पी ले, वरना घर में महाभारत पक्की है.

तर्क क्या कहता है- जबकि सच ये है कि कोई भी धर्म यह नहीं सिखाता कि थकी हुई पत्नी को एक कप चाय बनाकर पिलाने से किसी के व्रत निष्फल हो जाएंगे. और अगर निष्फल हो भी जाएँ व्रत तो वह भी पति की लंबी आयु के लिए रखती है अपनी लंबी आयु के लिए नहीं. इससे सो कॉल्ड अगर किसी को नुकसान होगा तो पति को ही होगा, पत्नी को नहीं, फिर इस बारे में क्या सोचना. जबकि सच तो यह है कि एक-दूसरे की मदद करना, सम्मान करना और पीड़ा समझना ही सबसे बड़ा कर्म और असली ‘पुण्य’ है.

पति-पत्नी के रिश्ते में सच्चा धर्म एक-दूसरे का सम्मान करना, समानता रखना और एक-दूसरे की तकलीफ को कम करना है. अगर पत्नी थकी हुई है, तो उसकी मदद करना पति का ‘धर्म’ है. जो नियम या उपदेश एक इंसान को दूसरे पर हावी होना सिखाए या शोषण करे, वह धर्म नहीं, बल्कि कुप्रथा है.

पति अपनी नौकरी या घर के काम से थकी हुई पत्नी के लिए प्यार से चाय बनाता है या घर के कामों में हाथ बंटाता है, तो उसकी नीयत में ‘प्रेम और परवाह’ होती है. किसी जरूरतमंद या थके हुए इंसान, चाहे वह अपनी ही पत्नी क्यों न हो, को आराम देना सबसे श्रेष्ठ कर्म है.

कहते हैं औरत का काम घर संभालना है-

जब कोई बाबा या समाज का कोई तबका उनसे कहता है कि “औरत का काम घर संभालना है,” तो उनका अहंकार संतुष्ट होता है. उन्हें लगता है कि वे जीवन के एक बड़े संघर्ष (घर के उबाऊ और बिना वेतन वाले थकाऊ कामों) से बच गए हैं और उन्हें इसके लिए कोई मेहनत भी नहीं करनी पड़ी.

सच तो यह है कि पुरुषों की यह मानसिकता रातों-रात नहीं बनी है; यह सदियों की पितृसत्तात्मक सोच का नतीजा है. कई बाबाओं के प्रवचन उन्हें इसलिए सही लगते हैं क्योंकि वे उन्हें उनके ‘विशेषाधिकार’ का एहसास कराते हैं. इसका मुकाबला सिर्फ लगातार तार्किक बात करने और अपने आत्मसम्मान के लिए स्टैंड लेने से ही किया जा सकता है.

क्या करें कि गृहस्थी अच्छे से चले-

यह आप दोनों पति-पत्नी को तय करना है कि आपको अपना घर कैसे चलाना है? पति आपको चाय दे या न दे, इसका फैसला कोई बाबा नहीं बल्कि आप दोनों को लेना है. अपने काम बांटने हैं. आप दोनों ही काम पर जाते हैं, दोनों ही थक कर आते हैं. फिर घर संभालने की जिम्मेवारी किसी एक की हो ही नहीं सकती.

आपका घर कैसे चलेगा, यह आपके और आपके पति के वर्किंग शेड्यूल और सुविधा पर निर्भर करता है, न कि किसी सोशल मीडिया वीडियो या प्रवचन पर. अपने घर के नियम खुद बनाएं. ऐसे वीडियो या उपदेशों को इग्नोर करें या घर में उनका बजना कम करें, जो बिना बात के आपके रिश्ते में कड़वाहट घोल रहे हों.

बहस या झगड़े के बजाय शांत माहौल में यही तर्क अपने पति के सामने रखें. उन्हें समझाएं कि अगर शादी में एक साथी से आर्थिक जिम्मेदारी बांटने की उम्मीद की जाती है, तो दूसरे को घरेलू जिम्मेदारी भी बांटनी होगी. साझेदारी पिक-एंड-चूज़ नहीं हो सकती.

शादी एक टीम वर्क है, कोई मालिक और कर्मचारी का रिश्ता नहीं. जब दोनों साथी एक-दूसरे की थकान को समझेंगे, तभी रिश्ते में असली जुड़ाव आएगा और तलाक जैसी नौबत नहीं आएगी.

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