पुरुषवादी समाज ने कभी महिला को देह से हट कर सोचा ही नहीं. पुरुषवादी सोच या तो महिलादेह की शुद्धता पर केंद्रित रही या उसे भूखे भेड़िए की तरह नोचने के लिए हवस भरती रही. जब ऊंचाई पर महिला पहुंचती, उसे स्वीकार करने से पुरुषसत्ता हमेशा बचती रही. यह पुरुषसत्ता स्त्री को स्वतंत्रता का भ्रम दे कर, उस की देह को केंद्र में रख कर, उस की हमेशा दोयम हैसियत को ही सुनिश्चित करती रही.

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