एक समय था जब लोग साहित्य और काव्य पढ़ते थे, नामचीन प्रसिद्ध लेखकों की किताबें पढ़ कर आत्मसंतुष्टि पाते थे. नोवेल और पौकेट बुक्स के जरीए कई पाठक दुनिया की गहराई में छिपी भिन्नभिन्न कहानियां और घटनाएं पढ़ कर हर तरह की जानकारी भी पाते थे।

पत्रिकाओं में छपी इन कहानियों में न सिर्फ कई लोगों को मार्गदर्शन मिलता था बल्कि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए उचित शब्दों का चयन भावनाओं को व्यक्त करने का ज्ञान भी मिलता था. जो व्यक्ति जितना ज्यादा अच्छी किताबें पढ़ता था उतना ही उस के व्यवहार में शालीनता, बात करने में विनम्रता, प्यार का इजहार करने में शायराना अंदाज आदि कई सारे बदलाव अपनेआप ही आ जाते थे और किताबों का ज्ञान, मनपसंद लोगों से मिलना, कई लोगों से उन की जिंदगी के बारे में दिलचस्प बातें जानना, चाय पर चर्चा या घर के फंक्शन में अपनों के साथ वक्त बिताना लोगों को बहुत पसंद आता था।

उस दौरान लोग न सिर्फ एकदूसरे से मिल कर दिल की बातें करते थे, बल्कि पार्टी मनोरंजन के लिए ढेर सारी तैयारी भी करते थे.

मनोरंजन या बीमारी

लेकिन बाद में एक दौर ऐसा आया कि इंटरनैट का जादू सब पर छा गया। स्पैशली फ्री डाटा मिलने के बाद लोग मोबाइल में ही मनोरंजन ढूंढ़ने लगे। लोग आपस में मिलने के बजाय मोबाइल पर एकदूसरे को मैसेज करने लगे। यहां तक कि त्योहार पर भी एकदूसरे के घर जा कर मिलने के बजाय, फोन पर ही विश करने की परंपरा की शुरुआत हो गई।

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एक समय तो यह भी आ गया कि किसी पार्टी फंक्शन में अगर 10 लोग बैठे हैं तो औपचारिक बातों के अलावा हरकोई मोबाइल के अंदर ही घुसा हुआ पाया जाता है। पास बैठे लोगों से बात करने के बजाय मोबाइल के जरीए दूर बैठे दूसरे से बात कर रहा है या अपने मनोरंजन के लिए मोबाइल पर रील या शौर्ट्स देखने में व्यस्त है. हालात इतने खराब हो चुके हैं कि आज एक इंसान की जिंदगी मोबाइल प्रेम के चलते 20 से 60 सैकंड के बीच में फंस चुकी है, क्योंकि लगातार 60 सैकंड तक की रील या शौट्स देखने की वजह से आज एक व्यक्ति का कंसंट्रेशन उतने तक ही सीमित रह गया है. 20 से 60 सैकंड के बीच वह इंसान जितना समझ सकता है समझ लेता है, वरना स्वैप कर के दूसरी कोई चीज देखने में व्यस्त हो जाता है।

कैद होती जिंदगी

ऐसे में, कहना गलत न होगा कि आज इंसान की जिंदगी 20 से 60 सैकंड के बीच कैद हो गई है. मोबाइल ने उस का शरीर ही नहीं दिल और आत्मा को भी अपने कब्जे में कर लिया है। यही वजह है कि आज इंसान सब से ज्यादा फिक्र अपने मोबाइल की करता है। अगर किसी वजह से उस का मोबाइल उस से दूर हो जाए तो वह कुछ समय के लिए सोचनेसमझने की शक्ति तक खो बैठता है.

लगातार मोबाइल से चिपके रहने की वजह से और कई घंटों तक मोबाइल में ध्यान केंद्रित करने की वजह से आज इंसान मोबाइल से बाहर नहीं आ पाता।

मोबाइल की कैद में गिरफ्तार आज का इंसान अपनी जिंदगी में क्या खो रहा है

जैसेजैसे देश तरक्की कर रहा है, मंगलग्रह और चांद पर जाने की बातें हो रही हैं, वैसेवैसे तेजी से इंसान मशीन के ऊपर निर्भर हो कर खुद मशीन बनता जा रहा है।नेटवर्क और सोशल मीडिया के जमाने में 6 इंच के छोटे से मोबाइल में वह सबकुछ देखा जा सकता है जो आप देखने के इच्छुक हैं, जिस का नतीजा यह हुआ है कि लोग छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बात की जानकारी मोबाइल से ही लेते हैं। पैसा कमाने और इंटरनैट पर जाने के चक्कर में और व्यूज और सब्सक्राइब बढ़ाने के चक्कर में लड़कियां अधनंगी और अश्लीलतापूर्ण तरीके से कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं। नाम और शोहरत पाने के चक्कर में आम इंसान रील्स बनाने के लिए इतना ज्यादा पागल हुआ पड़ा है कि वह जान जोखिम में ही नहीं डालता, बल्कि जान गंवा भी देता है।

समय की बरबादी

आज का युवा मोबाइल पर रील स्वाइप करतेकरते या यूट्यूब पर शौट्स देखतेदेखते कितने घंटे बिता देता है उस को खुद ही पता नहीं चलता. ऐसे में कहना गलत न होगा कि आज इंसान आत्मनिर्भर होने के बजाय पूरी तरह मोबाइल पर निर्भर है।

आज लोगों के पास सहूलियत ज्यादा है और समय कम है, जिस वजह से लोग लंबी या गहरी बात को कुछ पलों या सैकंड में समझाना चाहते हैं क्योंकि आज न तो किसी के पास टाइम है न सब्र है कि वह कुछ मिनट भी महत्त्वपूर्ण चीज देखने के लिए समय निकाल सके.

आज इंसानों की जिंदगी पूरी तरह से मोबाइल के इर्दगिर्द घूमती है। खुशी या गम का मौका हो, लोग मोबाइल को अपने से दूर नहीं रखते इनफैक्ट छाती से लगा कर रखते हैं। हद तो तब है कि अगर कुछ समय के लिए पूजापाठ में स्वांग करते समय मोबाइल अपने से दूर भी रख दे तो पूजा खत्म होते ही मोबाइल की तरफ ऐसे दौड़ते हैं, जैसे भगवान प्रसाद ग्रहण करने का ओटीपी भेज रहा हो।

भटकता ध्यान

मोबाइल स्क्रीन से लगातार जुड़े रहने की वजह से लोगों का कंसंट्रेशन कम हो रहा है और अपने इसी कंसंट्रेशन को सही करने के लिए लोग योग और मेडिटेशन करते हैं लेकिन मोबाइल को छोड़ने को तैयार नहीं हैं जबकि सारे फसाद की जड़ मोबाइल ही है।

मोबाइल की बदौलत आज के समय में इंसान की कीमती जिंदगी 60 सैकंड के अंदर ही कैद हो कर रह गई है, जिस के चलते भावनाएं और काम करने की क्षमता धीरेधीरे खत्म हो रही है. मोबाइल देखतेदेखते कब घंटों निकल जाते हैं पता ही नहीं चलता। ऐसा लगता है जैसे दिमाग कुंद हो गया हो। आज इंसान मोबाइल के पीछे इतना पागल है और आदी हो गया है कि वह खाना खाते समय भी एक हाथ में मोबाइल ले कर और दूसरे हाथ से खाना खाता है। जिस खाने को बनाने में घंटों लगते हैं वही खाना मोबाइल देखतेदेखते वह कुछ सैकंडों में खत्म कर देता है.

हालात कुछ ऐसे हैं कि आज इंसान मोबाइल में 20 से 60 सैकंड तक जुड़े रहने की वजह अपना ध्यान उतना ही केंद्रित कर पाता है, अगर उस से ज्यादा ध्यान केंद्रित करना पड़े तो उस का ध्यान भटक जाता है और इसी चक्कर में एक्सिडैंट होते हैं क्योंकि ड्राइवर भी लंबे समय तक अपना ध्यान ड्राइविंग पर केंद्रित नहीं कर पाता, यहां तक की बच्चे मांबाप से डांट खाते समय भी लंबे समय तक मांबाप की बातों पर ध्यान नहीं दे पाते क्योंकि 60 सैकंड के अंदर जो मोबाइल की वजह से आदत हो गई है, ऐसे में ध्यान दूसरी तरफ चला जाता है क्योंकि सामने वाले की बात सुनने के बजाय मोबाइल के स्क्रीन पर क्या है उस में ज्यादा दिलचस्पी होती है.

जरूरी है इस से बाहर निकलना

ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम सभी मोबाइल की मोहमाया से बाहर निकलें और मोबाइल पर सारा वक्त बिताने के बजाय जिंदगी के अन्य खूबसूरत पहलुओं पर ध्यान दें, तभी आप को पता चलेगा कि जिंदगी कितनी खूबसूरत है और मोबाइल की दुनिया से कही ज्यादा सुंदर है.

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