पुरुष सत्तात्मक समाज में महिलाओं को शमशान घाट जाने की कभी इजाजत नहीं होती, लेकिन अगर कोई महिला पिछले 3 साल से लावारिस लाशों और अब कोविड महामारी में जान गवां चुके हजारों लाशों को पूरे जतन से वैकुण्ठ धाम के लिए ले जाकर, उनके दाह संस्कार करने में मदद करने वाली महिला के लिए, समाज के विशिष्ट वर्ग क्या सोचते है, इसका ध्यान वह नहीं देती. यही वजह है कि आज संकट की इस घड़ी में, ऐसे कठिन काम को अंजाम देने वाली, लखनऊ की संस्था ‘एक कोशिश ऐसी भी’ की 42 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्त्ता वर्षा वर्मा, है. उन्होंने कोविड महामारी के बीच परेशान गरीब जरुरत मंदो के लिए सुबह 9 बजे से शाम 8 बजे तक लगातार काम कर रही है.

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