कश्मीर में 40 अर्धसैनिकों की दुखद मृत्यु के बदले आतंकवादियों और उन्हें शह देने वाले पाकिस्तान के खिलाफ जिस तरह की भाषा का उपयोग एक वर्ग कर रहा है, वह स्पष्ट करता है कि जिस महान संस्कृति, सभ्यता, ज्ञान, धैर्य, सदाचार, सत्यवचन का बखान हम हर पल करते हैं, वह कम से कम इस वर्ग में तो नहीं है, जो असल में संस्कृति का स्वयंभू ठेकेदार बना हुआ है.

न केवल पाकिस्तानी सरकार, बल्कि प्रधानमंत्री, पाकिस्तान में खुलेआम घूमते आतंकवादियों के नेताओं को मांबहन की गालियां ट्विटर, व्हाट्सऐप और फेसबुक पर दी जा रही हैं, हर उस भारतीय को भी दी जा रही हैं जो भावनाओं की जगह सोचीसमझी नीति अपनाने की वकालत कर रहा है. यह कट्टर वर्ग न केवल आतंकवादियों के खिलाफ आग उगल रहा है, आतंकवादियों के लपेटे में हर कश्मीरी को भी ले रहा है और लड़कियों तक को नहीं छोड़ रहा.

केवल यह सुझाव देने पर कि पाकिस्तान या आतंकवादियों से समझौतों से भी शांति लाई जा सकती है, यह कट्टर वर्ग उग्र हो उठता है. यह वर्ग भूल रहा है कि इसकी इस कट्टरता के बावजूद इस के पुरखे मुट्ठीभर यूनानियों, हूणों, पार्शियों, मुसलमानों, अफगानों, मुगलों, फ्रैंच, ब्रिटिश, डच से हारते रहे हैं. भारत का इतिहास इन हारों से भरा हुआ है, क्योंकि हम बोलने और गाली देने में तो दक्ष हैं पर कुछ करने में निकम्मे.

आज मोबाइल की सुविधा के कारण कुछ शब्दों में गाली देना इतना आसान हो गया है जितना अपने घर के सामने खड़े हो कर गुजरते राहगीर को देना. ताकत तो वह होती है जब संख्या में कम होते हुए भी हमला करने वालों को हराया जा सके.

मांबहनों की भद्दी गालियां असल में चरित्र की सही पहचान करा रही हैं, हमारा बल नहीं दिखा रहीं. मोबाइल के पीछे छिप कर वार करना पेड़ या शिखंडी के पीछे से तीर मारने की तरह है. पर जो समाज उसे सही और दैविक मानता हो, उस से और क्या अपेक्षा की जा सकती है?

जहां जरूरत है कि पूरा देश आतंकवादियों के हौसले पस्त करे, वे जहां पनप रहे हैं, जहां प्रशिक्षण ले रहे हैं, वहां उन्हें रोकें, उन्हें देश में घुसने न दें. अगर होम ग्रोथ यानी अपने ही देश की पैदावार हों तो या तो उन्हें पकड़ लें या समझा कर राह पर ला सकें.

आतंकवाद बहुत गंभीर समस्या है और हमें उसे रोकने में बहुत चतुराई की जरूरत होगी. अंधभक्ति और गालियों से काम नहीं चलेगा चाहे वह किसी धर्म के प्रति हो या व्यक्ति विशेष के प्रति.

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