किसी देश की अर्थव्यवस्था अच्छी चल रही है या नहीं  यह लिपस्टिक के ब्रैंडों की बिक्री से पता चल सकता है. अगर बिक्री बढ़ रही हो तो अर्थ है कि लोगों के पास पैसा है और वे लिपस्टिक जैसी लग्जरी चीज पर खर्च कर सकते हैं. देश में सबकुछ ठीकठाक है यह दर्शाने के लिए कुछ भक्त अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि भारत में अच्छे ब्रैंडों की कलर लिपस्टिक की बिक्री बढ़ रही है और इस का मतलब है कि बेकारी, मंदी, कर्जों की बात केवल विपक्षी दुष्प्रचार है.

असलीयत यह है कि देश में लिपस्टिक ही नहीं अंडरवियर भी बिकेंगे और खूब बिकेंगे, चाहे अर्थव्यवस्था कैसी क्यों न हो. इस का कारण है कि देश में एक बहुत बड़ी संख्या में लड़कियां अब प्राइमरी स्कूलों से सीनियर स्कूलों में जा रही हैं जहां वे अपने आत्मविश्वास और अपनी ब्यूटी को दिखाने के लिए लिपस्टिक को पहली और सस्ती जरूरत मानती हैं.

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लिपस्टिक लगाई लड़की का व्यक्तित्व अलग होता है. होंठों पर कुछ पैसों की लगी लिपस्टिक बताती है कि लड़की वर्जनाओं और जंजीरों से मुक्त है. बहुत सी लड़कियां लिपस्टिक छिपा कर रखती हैं और घर में घुसने से पहले पोंछ लेती हैं पर बाहर निकलते ही फिर लगा लेती हैं.

लिपस्टिक क्यों और कैसे औरतों का रंगरूप बदल देती है यह तो समाजशास्त्रियों को ढूंढ़ना होगा पर इतना स्पष्ट है कि इस की आजादी मूलभूत है. सदियों से धर्म, रीतिरिवाजों, घरों की दीवारों, परंपराओं में कैद लड़कियों को लिपस्टिक के अधिकार को हरगिज नहीं खोना चाहिए और तरहतरह के रंगों की लिपस्टिक इस्तेमाल कर अपने वजूद को बनाए रखना चाहिए. यह सस्तेपन की निशानी नहीं है, स्वतंत्रता की निशानी है.

स्वतंत्रता जो आज लड़कियों को मिली है बड़ी मुश्किल से आई है और सिर्फ आर्थिक संकट के चलते इसे निछावर नहीं करना चाहिए. एक फैशनेबल ड्रैस, सैंडल, हेयरडू, ब्यूटीपार्लर की विजिट से साधारण छिपाई जा सके लिपस्टिक बहुत महत्त्व की है और देश की अर्थव्यवस्था का इस से कुछ लेनादेना नहीं. यह तो सामाजिक व्यवस्था की निशानी है. जम कर लगाएं, दूसरों को जला कर राख करिए.

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