मिस इंडिया यूनिवर्स का खिताब जीत कर मौडलिंग और फिल्मों में काम करने वाली अभिनेत्री तनुश्री दत्ता झारखंड के जमशेदपुर की हैं. हिंदी फिल्म ‘आशिक बनाया आप ने’ उन की पहली फिल्म थी. तनुश्री बेहद साहसी हैं. हर बात को खुल कर कहती हैं. 2008 में फिल्म ‘हौर्न ओके प्लीज’ के दौरान उन्होंने नाना पाटेकर के खिलाफ आवाज उठाई थी, क्योंकि नाना पाटेकर का गलत तरीके से छूना और फिल्म में इंटिमेट सीन की मांग करना उन्हें खराब लगा था. वे फिल्म को बीच में ही छोड़ कर अमेरिका चली गई थीं, क्योंकि उन की बात को न सुना जाना उन के लिए डिप्रैशन का कारण बना था. ‘मीटू मूवमैंट’ में उन्होंने अपनी बात एक बार फिर से सब के सामने रखी, जिसे ले कर बहुत हंगामा हुआ. पिछले दिनों जब तनुश्री से मिलना हुआ, तो वे शांत, सौम्य और धैर्यवान दिखीं. पेश हैं, उन से हुए कुछ सवाल-जवाब:

फिल्म इंडस्ट्री में अच्छी तरह तालमेल बैठाने के बाद आप विदेश क्यों चली गईं और वहां क्या कर रही हैं?

‘हौर्न ओके प्लीज’ फिल्म की इस घटना ने मुझे हिला दिया था. अभिनेता नाना पाटेकर, निर्माता समीर सिद्दीकी, निर्देशक राकेश सारंग और कोरियोग्राफर गणेश आचार्य ने मिल कर मुझे परेशान किया था. इस के बाद मेरी इच्छा बौलीवुड में काम करने की नहीं रही थी. मैं ने जो फिल्में साइन की थीं, उन्हें पूरा किया. कुछ नई फिल्में भी साइन की थीं पर बाद में उन्हें करने की इच्छा नहीं हुई. हालांकि मैं उस समय अच्छा अभिनय कर रही थी. मैं ने फिल्मों का चयन करना भी सीख लिया था, लेकिन इस घटना से मैं डर गई थी. मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मेरे साथ ऐसा कुछ हो सकता है. हैरसमैंट के अलावा महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के गुंडे बुला कर मेरी गाड़ी भी तुड़वा दी. उस से मुझे बहुत धक्का लगा. उस समय मेरे साथ मेरे मातापिता भी थे. वे मुझे उस माहौल से निकालने के लिए आए थे. इस के बाद मुझे इस माहौल में नहीं रहना था.

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आज से 10 साल पहले जब ये सारी बातें कहीं गई थीं, तो इन्हें न सुनने की वजह क्या थी?

मैंने उस समय पूरे साहस के साथ सारी बातें कही थीं. टीवी पर कई दिनों तक मेरा इंटरव्यू चलता रहा. उस समय मेरी उम्र कम थी, जोश बहुत था, लेकिन मीडिया और लोग बहुत अलग थे. सोशल मीडिया इतना ताकतवर नहीं था. लोगों में जागरूकता कम थी. हैरसमैंट को लोग सीरियसली नहीं लेते थे. उन का कहना था कि थोड़ा परेशान कर दिया तो क्या हुआ, रेप तो नहीं किया? भूल जाओ. ‘मीटू कैंपेन’ का शुरुआती दौर बहुत मजबूत था, लेकिन अब यह कुछ धीमा पड़ने लगा है.

क्या आप को नहीं लगता कि इस के अंजाम तक पहुंचने की जरूरत है?

इस का अंजाम हो चुका है, क्योंकि लोगों में जागरूकता बढ़ी है, जो मैं चाहती थी. पहले ये सारी बातें यों ही बातोंबातों में कही गई थीं. अब यह एक अभियान बन चुका है. मुझे जो कहना था वह मैं ने कह दिया है. यह कोई फिल्म नहीं जिस का प्रमोशन हो रहा है और बाद में लोग हाल में जा कर इसे देखेंगे. पहले भी मैं ने अपनी बातें कहने की कोशिश की थी, लेकिन अब अधिक सुनी गईं और इस की वजह लोगों में जागरूकता बढ़ना है.

क्या इस मुहिम से पुरुषों की मानसिकता में कुछ बदलाव आएगा?

आना तो चाहिए, क्योंकि महिलाओं को सम्मान देने की काफी बातें धर्मग्रंथों में कही गई हैं, जिन्हें कोई नहीं सुनता. जब सीधी उंगली से घी नहीं निकलता है, तो उंगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है. अगर मुझे पता होता कि इतनी परेशानी और लांछन इतने सालों बाद भी झेलने पड़ेंगे, तो शायद मैं इस चक्कर में नहीं पड़ती, लेकिन मैं खुश हूं कि मेरे कहने के बाद कई महिलाओं ने अपनी बात कहने की हिम्मत जुटाई.

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इस दौरान परिवार ने कैसा सहयोग दिया?

मेरे मातापिता बहुत परेशान थे, क्योंकि पहले भी जब मैं ने कहने की कोशिश की थी तो किसी ने नहीं सुना था. मेरे मातापिता खुश थे कि मैं अमेरिका चली गई हूं. उन्होंने मुझे तनाव में देखा है और नहीं चाहते थे कि मैं फिर से इस से जुडूं. मैं यहां छुट्टियां बिताने आई थी. यहां पर अपने उतारचढ़ाव के बारे में मैं ने थोड़े इंटरव्यू दिए थे, जिन के द्वारा मैं मानसिक तनाव को ठीक करना चाहती थी और हो भी रहा था. ऐसे में ऐसी घटना हुई. पहले तो वे परेशान हुए, पर इस मुहिम को देख कर वे खुश हैं.

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