महात्मा गांधी कहते थे … ईच वन टीच वन. महात्मा गांधी के इस फलसफे को अपने जीवन में आत्मसात कर चुके दिल्ली में परचून की दुकान चलाने वाले राजेश हर उस बच्चें को शिक्षित करने की मुहिम चला रहे हैं जिनकी आंखों में भविष्य के सपने तो हैं लेकिन उन सपनों को पूरा करने का साधन और रास्ता नहीं. “फ्री स्कूल अंडर द ब्रिज” के नाम से ये स्कूल बिल्कुल फ्री हैं.

राजेश कुमार शर्मा यमुना बैंक के पुल के नीचे झुग्गी के बच्चों को पढ़ाते हैं. राजेश ने दो बच्चों को पढ़ाने से इसकी शुरुआत की थी. जिसकी संख्या आज 300 तक पहुंच गई है. राजेश कुमार से बात करने पर उन्होंने बताया कि, “किसी वजह परेशान होने की वजह से वो यमुना बैंक के पास घुमने गए थे जहां उन्होंने दो बच्चों को धूल-मिट्टी में खेलते हुए देखा. उन्होंने बताया कि उन बच्चों के पास पूरे कपड़े भी नही थे. उन्होंने उन बच्चों के मां-बाप से बात करने की कोशिश की पर उन्होंने कहा कि पढ़ाना तो हम चाहते है पर पेट भरने के लिए खाना पहले जरूरी है और हमारे पास इतने पैसे नहीं है. राजेश कुमार ने बताया कि उन्हें लगा कि इन बच्चों के लिए अगर दिन का एक घंटा भी हम दे तो इनकी जिदंगी सवंर जाएगी.

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दिल्ली में रोज़गार की तलाश में आए गरीब परिवारों के बच्चे अक्सर 2 वक्त की रोटी के लिए अपने सुनहरे भविष्य का गला घोंट देते हैं. रोज़गार की तलाश या तो उन्हें बाल श्रमिक बना देती हैं या फिर उन्हें कुछ ऐसी आदतें लग जाती हैं जो उन्हें उनके सुनहरे भविष्य से दूर ले जातीं हैं. देश के नौनिहालों के सामने ऐसी स्थिति न आए, इसलिए कुछ लोग फरिश्ते बन कर आते हैं और देश के भावी भविष्य को संवारने में अपना योगदान देते हैं.

राजेश कुमार ने बताया कि, मैंने उनके मां-बाप से बात कि और कहा कि इन जैसे और भी बच्चे हो तो उन्हें भी मैं बढ़ाना चाहूंगा और मैंने एक पेड़ के नीचे बैठकर इन बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे बच्चे बढ़ते चले गए और फिर मेरे साथ और लोग भी बच्चों को फ्री में पढ़ाने के लिए सामने आए.

राजेश कुमार के द्वारा वसंत कुंज में फुटपाथ के किनारे शुरू हुए स्कूल में बच्चे अपना भविष्य संवार रहे हैं. यह स्कूल पिछले 10 वर्षों से चल रहा है. इस स्कूल में आठ शिक्षक जो रोज जिस समय वो पढ़ाने के लिए आ सकते है आकर इन्हें पढ़ाते हैं. यहां पर बच्चे पढ़ते भी हैं और भरपेट खाना भी खाते हैं. ऋचा प्रसांत इस स्कूल को चलाती हैं. ये पहले एक आईटी कंपनी में एचआर डिपार्टमेंट में थीं, लेकिन अब इन गरीब बच्चो के लिए काम कर रही हैं. इस उम्मीद के साथ कि यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा और महात्मा गांधी का ईच वन टीच वन का फलसफा आगे बढ़ता रहेगा.

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