21वीं सदी के साल 2021 में दुनिया कदम रख चुकी है. बीती सदियों में कई बदलाव हुए, मगर एक चीज जो जस की तस है वह है समाज में महिलाओं की स्थिति. हजारों वर्षों से दुनिया में एक रूढि़वादी अवधारणा अपनी जड़ें जमाए हुए है, जो कहती है कि पौराणिक समय से ही भगवान व प्रकृति ने महिलापुरुष के बीच भेद किया है, जिस कारण पुरुष का काम अलग और महिलाओं का काम अलग है. यह धारणा हमेशा कहती रही है कि आदिम समाज को जब भी खाना जुटाने जैसा कठोर काम करना पड़ा, चाहे वह पुराने समय में शिकार करना हो या आज के समय में बाहर निकल कर परिवार के लिए पैसा जुटाना हो, पुरुष ही इस का जुगाड़ करने के काबिल रहे हैं और महिलाओं की शारीरिक दुर्बलता के कारण उन के हिस्से घर के हलके काम आए हैं.

इस लैंगिक भेद में महिलाओं का बाहर निकल कर काम न करने का एक बड़ा तर्क उन की शारीरिक दुर्बलता को बताया गया. उन की शारीरिक बनावट को पुरुष के मुकाबले कमजोर और अशुद्ध बताया गया. उन पर रोकटोक लगाई गई. इस बात का एहसास उन्हें खुद ही महसूस करवाया गया कि वे पुरुषों के मुकाबले शारीरिक तौर पर दुर्बल हैं, बाहर का काम करने योग्य नहीं हैं और परिवार का भरणपोषण नहीं कर सकती हैं.

यही कारण रहा कि आज लिंग आधारित असमानता पर दुनियाभर में एक बहस खड़ी हुई, इस बहस में एक बड़ा हिस्सा महिलाओं की शारीरिक दुर्बलता का भी रहा. हालिया इसी बहस के बीच वैज्ञानिकों ने दक्षिण अमेरिका के ऐंडीज पर्वतमाला में 9000 साल पुराने एक ऐसे स्थान का पता लगाया है, जहां महिला शिकारियों को दफनाया जाता था. इस खोज से लंबे समय से चली आ रही इस पुरुष प्रधान अवधारणा को चुनौती मिली है.

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