राइटर – डा. के. रानी

फौजी अपने दोस्त को छोड़ने रेलवे स्टेशन गया था. वह फौज में कार्यरत था. लौटते समय उस की नजर रास्ते में उन 4 मनचलों पर पड़ी जो सड़क किनारे एक अकेली लड़की को परेशान कर रहे थे. वह  झट से उन के बीच पहुंच गया.

‘‘हाथ लगाया तो काट दूंगी,’’ मीता की कांपती आवाज मनचलों की हंसी में डूब रही थी और उन की हंसी तेज हो गई थी.

‘‘अरे वाह, पहले किनारे राहगीरों का इंतजार करती है और अब धमकी दे रही है.’’

‘‘2 मिनट साथ चल, तु झे जितना पैसा चाहिए ले लेना.’’ दूसरा बोला.

मीता की आंखों में शर्म, डर और टूटे हुए सपनों की धुंध साफ दिख रही थी तभी पीछे से एक सख्त, ठहरी हुई आवाज गूंजी, ‘‘बहुत बहादुर बन रहे हो सब मिल कर एक अकेली लड़की के सामने.’’

चारों लड़के पलटे. सामने साधारण कपड़ों में एक लंबा, चौड़े कंधों वाला आदमी खड़ा था. आंखों में गजब की ठंडक लेकिन भीतर ज्वाला साफ  झलक रही थी.

‘‘तू कौन है?’’

‘‘जो तुम्हें यहां से उठा कर सड़क पर फेंक सकता है.’’

कुछ सैकंड का तनाव फिर धक्कामुक्की और अगले ही पल चारों भागते हुए भीड़ में गायब हो गए. मीता कांपती हुई सिर  झुकाए खड़ी रही.

‘‘डरो मत, अब कोई कुछ नहीं कहेगा,’’ राघव ने कहा.

वह कुछ बोल नहीं पाई. बस उस की आंखों से आंसू टपक कर जमीन पर गिरते रहे.

‘‘लगता है पहली बार इस तरह घर से बाहर आई हो?’’

मीता ने सिर हिलाया और कहा, ‘‘मजबूरी थी.’’

‘‘कोई अकेला ऐसे हाल में यहां नहीं पहुंचता. कोई कहानी है पीछे?’’

वह चुप रही.

कुछ दूरी पर चाय का ठेला था. राघव चाय के 2 कप ले आया, ‘‘डरो मत. सवाल नहीं करूंगा जब तक तुम खुद न चाहो.’’

मीता ने कांपते हाथों से कप लिया. चाय की भाप से उस की लाल हुई आंखें और भर आईं. कुछ पल का सन्नाटा फिर जैसे भीतर का बांध टूट गया…

‘‘मैं घर से भाग कर शहर आ गई, जिस के लिए भागी उस ने ही मु झे यहां अकेला छोड़ दिया.’’

राघव ने उस की ओर ध्यान से देखा.

‘‘पढ़ीलिखी हो?’’

मीता ने आंचल आंखें पोंछीं, ‘‘मैं ने इंटर पास किया है राज के प्यार में पागल हो कर घरबार छोड़ दिया. घर से जो थोड़ेबहुत गहने, रुपए ले कर आई थी उन्हें भी वह ले कर चला गया. अकेले में मु झे डर लगने लगा था इसलिए भीड़भाड़ वाली जगह पर आने का साहस जुटाया,’’ कहतेकहते उस का गला भर आया और वह फिर से रोने लगी.

राघव चुपचाप उस की बातें सुनता रहा. कुछ पल बाद बोला, ‘‘तुम पढ़ीलिखी हो, बोलना आता है, सम झ है फिर भी तुम अपनेआप को इस स्तर तक ले आई?’’

‘‘जब भरोसा टूटता है तो सम झ भी साथ छोड़ देती है.’’

‘‘राज ने तुम्हें सिर्फ छोड़ा नहीं है मीता, उस ने तुम्हें तोड़ा भी है और टूटे लोग सब से पहले खुद को ही सजा देने लगते हैं. दिक्कत यह है कि तुम जैसी लड़कियों ने सिर्फ मोबाइल और सिनेमा को दुनिया का सच सम झ लिया है. असली जानकारी शब्दों में होती है, छपे हुए शब्दों में, बोले हुए में नहीं.’’

‘‘राज शुरू में बहुत अच्छा था. हर छोटी बात पर ध्यान देता, मेरी पसंद, मेरी नापसंद सबकुछ. धीरेधीरे उस ने मु झे घर से दूर कर दिया. कहता था तेरे घर वाले हमारे बीच दीवार हैं और मैं इतनी अंधी हो गई कि मैं ने उस दीवार को ही गिरा दिया.’’

कुछ देर तक दोनों के बीच सन्नाटा रहा. वे सड़क पर दूर निकल गए थे. ऐसा लग रहा था जैसे पता नहीं वे एकदूसरे को कब से जानते हों. तभी सड़क के उस पार एक छोटा सा महिला आश्रयगृह दिखाई दिया. राघव ने बताया कि यहां उसे रहने की जगह मिल सकती है.

मीता ने पूछा, ‘‘अगर वहां भी किसी ने मु झे ठुकरा दिया तो?’’

‘‘तो मैं तुम्हारे लिए रास्ता ढूंढ़ने में मदद करूंगा.’’

वह उसे देखने लगी.

‘‘आप का कौन सा रिश्ता है मु झ से?’’

‘‘इंसान होने का.’’

मीता की आंखें भर आईं. आश्रयगृह के गेट पर पहुंच कर वह डर कर रुक गई.

अंदर से एक प्रौढ़ महिला शीला देवी निकलीं. राघव ने संक्षेप में सारी बात बताई. महिला ने मीता का हाथ थाम लिया, ‘‘बिटिया, यहां कोई किसी को धक्का दे कर नहीं निकालता. यहां टूटे हुए लोग आते हैं और धीरेधीरे खुद को जोड़ना

सीखते हैं.’’

शीला देवी ने उसे भीतर ले लिया. मीता कुछ कदम आगे बढ़ी फिर अचानक पीछे मुड़ी. राघव गेट के पास खड़ा था.

‘‘यहां से आगे की लड़ाई तुम्हारी है. तुम्हें जब जरूरत होगी, मैं यहीं मिलूंगा.’’

मीता की आंखों से आंसू बहने लगे. रात के दूसरे पहर मीता बिस्तर पर लेटी थी लेकिन नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. राज का चेहरा बारबार सामने आ रहा था. उस के  झूठे वादे उसे राघव की बात याद आ रही थी, ‘‘तुम कमजोर नहीं हो.’’

पहली बार मीता को लगा कि शायद वह सच में खड़ी हो सकती है. अगले कुछ दिनों में मीता ने वहां सलाई सीखनी शुरू की.

शुरू में उंगलियां कांपती थीं. सूई बारबार चुभ जाती. हर दर्द उसे राज की याद दिलाता. एक दिन राघव फिर आया. हमेशा की तरह वह उस के लिए कुछ किताबें, पत्रिकाएं भी लाया. मीता ने उस की बात को गंभीरता से लिया और हर किताब को कईकई बार पढ़ा.

‘‘कैसी चल रही है तुम्हारी नई जिंदगी?’’ राघव ने मजाक में पूछा.

मीता हलकी सी मुसकराई.

‘‘अब भी दर्द होता है लेकिन डर नहीं लगता.’’

‘‘दर्द जरूरी है मीता. वह याद दिलाता है कि तुम जिदा हो. अपने पर भरोसा रखो.’’

‘‘भरोसा एक बार टूट जाए तो फिर दोबारा जुड़ता नहीं बस उस में गांठ पड़ जाती है. मैं अब कभी किसी पर भरोसा नहीं कर पाऊंगी.’’

‘‘कर पाओगी लेकिन आंखें खुली रख कर.’’

कुछ ही महीनों बाद मीता आश्रयगृह में बाकायदा काम करने लगी. वह नोट कर रही थी कि उस के साथ रहने वाली शारदा अकसर बु झीबु झी सी रहती है. उसे यहां रहते हुए 4 साल हो गए थे. बहुत कुरेदने पर वह बोली, ‘‘अभी तुम नई हो इसीलिए तुम्हें कुछ पता नहीं. धीरेधीरे सब सम झ जाओगी.’’

‘‘क्या सम झूंगी बताओ तो सही?’’

‘‘खुद ही देख लेना, मैं क्या कहूं?’’ कह कर शारदा ने बात टाल दी.

पुराने अनुभव से उसे इतना एहसास हो गया था कि यहां पर भी सबकुछ ठीक नहीं है खासकर जवान लड़कियों के लिए. गनीमत है कि उसे सुंदर होने के बावजूद छेड़ा नहीं गया क्योंकि उस ने सिलाई का काम बहुत सीख लिया और वह दूसरों को सिखाती थी. उसे जानकारी हो गई थी कि इस तरह के आश्रमगृहों में क्या हो सकता है और लोग उस से थोड़े सतर्क रहते थे. पढ़ाई उस का कवच बन गई थी. सिलाई से उसे छोटी सी आमदनी होने लगी.

एक शाम वह राघव से बोली, ‘‘राज ने मु झे सड़क पर ला छोड़ा था और आप ने मु झे

फिर से जमीन दे दी.’’

‘‘मैं ने कुछ नहीं किया तुम खुद उठी हो.’’

‘‘अगर उस दिन सड़क पर आप न मिले होते…’’

राघव ने बात काट दी, ‘‘तो कोई और मिलता. लेकिन अब यह मत सोचो कि क्या हो सकता था यह सोचो कि अब क्या बन सकता है.’’

मीता ने कहा, ‘‘मैं भी किसी की मदद करना चाहती हूं. उन लड़कियों की जो राज जैसे मर्दों पर भरोसा कर बैठती हैं.’’

राघव ने उसे गर्व से देखा, ‘‘तब तुम्हारी कहानी सिर्फ दर्द की नहीं रहेगी ताकत की बन जाएगी.’’

मीता ने यह बात बहुत सोचसम झ कर कही थी. शारदा की बातें और बेरौनक चेहरा देख कर उस ने जल्द ही यह जगह छोड़ने का मन बना लिया था. शीला देवी जरूरत से ज्यादा लाड दिखा कर उसे अपने करीब करना चाहती थी लेकिन मीता अंदर से सजग थी. कई दिनों से उस के भीतर यह हिम्मत धीरेधीरे आकार ले रही थी. एक शाम उसने राघव से कहा, ‘‘मैं यहां से बाहर जाना चाहती हूं.’’

महिला आश्रयगृह की संचालिका शीला देवी भी पास ही बैठी थीं. ‘‘बिटिया, अभी तो तुम सुरक्षित हो. बाहर की दुनिया आसान नहीं है.’’

मीता ने कहा, ‘‘मां ने भी मु झे हमेशा सुरक्षित ही रखा था लेकिन तब मैं मजबूत नहीं थी. अब मैं डर कर नहीं जीना चाहती.’’

राघव ने पूछा, ‘‘तुम अकेले रह सकोगी?’’

‘‘उस दिन सड़क पर भी मैं अकेली ही थी. फर्क बस इतना था कि तब मैं टूटी हुई थी और अब जुड़ी हुई हूं.’’

‘‘कहां जाओगी?’’

‘‘यहीं शहर में एक बुटीक में काम भी मिल जाएगा. मालकिन ने मेरी सिलाई देखी है.’’

शीला देवी ने कहा, ‘‘मु झे डर लग रहा है तुम दुनिया का सामना कैसे करोगी?’’

‘‘आप ने मु झे इस काबिल बना दिया है.’’

‘‘अभी तुम्हारे व्यवहार में परिपक्वता

नहीं आई है. तुम्हें यहां रह कर बहुत कुछ

सीखना चाहिए.’’

‘‘परिपक्वता तो मैं ने उन महिलाओं में भी नहीं देखी जो यहां सालों से रह रही हैं,’’ मीता कटाक्ष करते हुए बोली तो शीला देवी चुप हो गई. फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह अपने को संयत कर के बोली, ‘‘मु झे तुम पर गर्व भी हो रहा है मीता. तुम जैसी लड़कियां जब बाहर जाती हैं तभी हमारी मेहनत सफल कहलाती है.’’

‘‘आप लोगों ने मु झे सड़क से उठाया अब मैं उसी सड़क पर सिर उठा कर चलना चाहती हूं.’’

जिस दिन मीता ने आश्रयगृह से निकली उस के पास थोड़ा सा सामान था और भीतर

एक बहुत बड़ी लड़ाई जीतने की जिद. राघव उसे छोड़ने आया.

‘‘डर लग रहा है?’’ उस ने पूछा.

‘‘हां बहुत. लेकिन अब यह डर मु झे रोक नहीं रहा.’’

राघव हलका सा मुसकराया, ‘‘यही सुनना चाहता था.’’

मीता के लिए बाहर की दुनिया आसान नहीं थी. पहला महीना बहुत कठिन रहा. सुबह जल्दी उठना, दिनभर मशीन पर  झुके रहना, रात को थकी देह के साथ उस छोटे से कमरे में लौटना. कई बार दीवारें उसे राज की याद दिला देतीं.

एक शाम दुकान बंद करते समय मालकिन ने कहा, ‘‘मीता तुम सिलाई अच्छी करती हो. तुम सिर्फ कारीगर नहीं हो, तुम अपने काम में जान डाल देती हो. तुम ये ढेर सारी किताबें और पत्रिकाएं पढ़ती हो, इन से तुम्हारा विजन बहुत बड़ा हो गया है.’’

मीता को पहली बार लगा कि उसे पहचान मिल रही है.

3 महीने बाद वह पहली बार राघव से अपने नए कमरे में मिली. छोटा सा कमरा, एक मेज, एक सिलाई मशीन और दीवार पर टंगी मां की तसवीर. राघव ने चारों ओर देखा, ‘‘तो यही है तुम्हारी नई दुनिया?’’

‘‘हां छोटी है लेकिन मेरी है.’’

‘‘राज की कोई खबर?’’ राघव ने हिचकते हुए पूछा.

‘‘नहीं और अब फर्क भी नहीं पड़ता. उस ने जो छीना था वह मैं ने खुद से वापस ले लिया है.’’

राघव उसे देखता रहा, ‘‘तुम बदल गई हो, मीता.’’

‘‘मैं लौट आई हूं अपने पास.’’

बुटीक में काम करतेकरते मीता की दिनचर्या सधी हुई हो गई थी. सुबह

मशीन की आवाज, दोपहर को कपड़ों की तहें, शाम को थकी हुई देह और रात को अपने छोटे से कमरे में सन्नाटा.

इन्हीं दिनों एक युवक परेश अकसर दुकान पर आने लगा था. वह स्थानीय होलसेलर के यहां काम करता था. शुरू में दोनों की बातचीत बस काम तक सीमित थी. लेकिन परेश बाकी लड़कों जैसा नहीं था. न ताक झांक और न मीठीमीठी बातें. बस आंखों में एक साफ सी सचाई थी.

एक दिन परेश ने पूछा, ‘‘आप रोज इतनी देर तक मशीन पर बैठती हैं थकान नहीं होती?’’

मीता ने बिना नजर उठाए कहा, ‘‘काम से ज्यादा डर थकाता है.’’

परेश थोड़ा चौंका, ‘‘किस बात का डर?’’

मीता चुप हो गई. अपने अतीत के दरवाजे वह हर किसी के सामने नहीं खोलती थी. धीरेधीरे उन में पहचान बढ़ने लगी. कभी बारिश में वह बाहर खड़ा हो कर दुकान बंद होने का इंतजार

कर लेता ताकि मीता को औटो मिल जाए. कभी बिना बताए चाय रख जाता. लेकिन मीता हर एहसान के बाद भीतर ही भीतर एक दीवार और ऊंची कर लेती.

एक शाम परेश ने यों ही कहा, ‘‘आप बहुत कम हंसती हैं.’’

‘‘जो ज्यादा रो चुका हो वह हंसना भूल जाता है.’’

परेश ने पहली बार उसे गौर से देखा, ‘‘लगता है आपके भीतर बहुत कुछ दबा है.’’

‘‘हर किसी के भीतर कुछ न कुछ दबा होता है. फर्क बस इतना है कि कुछ लोग उसे दिखा देते हैं और कुछ उसे ढ़क लेते हैं .’’

परेश सम झ गया मीता सवालों से बच रही है. उस ने बात बदल दी. कुछ दिनों बाद मीता बीमार पड़ी. तेज बुखार. दुकान बंद कर वह लड़खड़ाते कदमों से कमरे की ओर जा रही थी तभी बाहर परेश मिल गया, ‘‘आप ठीक नहीं लग रहीं.’’

मीता ने  झूठी मजबूती दिखाते हुए कहा, ‘‘मैं ठीक हूं.’’

अचानक उस की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. वह गिरतेगिरते बची लेकिन परेश ने उसे थाम लिया.

‘‘आप चल भी नहीं पा रहीं और कह रहीं ठीक हूं?’’

मीता ने अपना हाथ धीरे से छुड़ाते हुए कहा, ‘‘मु झे आदत है गिर कर खुद उठने की.’’

उस दिन परेश मीता को उसे कमरे तक छोड़ आया. दवा रख दी. पानी भर दिया. बिना कोई सवाल किए चला गया. उस रात मीता बहुत देर तक छत को ताकती रही.

‘कुछ लोग मदद इसलिए नहीं करते कि बदले में कुछ पाएं,’ यह खयाल उसे बेचैन कर गया. अगले कई दिनों तक परेश ने दूरी बनाए रखी.न जरूरत से ज्यादा बात न अनचाहा सहारा. यह दूरी ही मीता को सब से ज्यादा हैरान कर रही थी.

एक दिन उस ने खुद पूछ लिया, ‘‘अब आप चाय नहीं लाते?’’

परेश हलका सा मुसकराया, ‘‘आप ने कभी मांगी ही नहीं.’’

मीता कुछ पल चुप रही फिर हौले से बोली, ‘‘मांगने से डर लगता है क्योंकि कभी सबकुछ मांग कर भी खाली हाथ रह गई थी.’’

परेश का चेहरा गंभीर हो गया, ‘‘तो फिर भरोसे से भी डर लगता होगा.’’

मीता ने सीधे उस की आंखों में देखा, ‘‘हां बहुत.’’

महीनों बाद दोनों एक शाम दुकान के बाहर खड़े थे. शहर की चहलपहल,

ट्रैफिक का शोर और सड़क पर भागती जिंदगी.

परेश ने अचानक कहा, ‘‘मीता, मैं आप को पसंद करता हूं.’’

मीता का दिल जोर से धड़क उठा. उस का मन तुरंत पीछे लौटने लगा. वह बहुत देर तक चुप रही. उस ने रूखे लेकिन ईमानदार स्वर में कहा, ‘‘मु झे अब रिश्तों से ज्यादा अपनी सांसों की फिक्र है. मैं कोई वादा नहीं कर सकती.’’

‘‘और यही बात मु झे सब से ज्यादा अच्छी लगी आप में. आप किसी के लिए खुद को खोना नहीं चाहतीं. आप खुद को बचाना चाहती हैं. यह बहुत जरूरी होता है.’’

मीता की आंखें नम हो गईं, ‘‘आप मेरे जैसे टूटे इंसान से क्यों जुड़ना चाहते हैं?’’

‘‘क्योंकि आप टूटी नहीं हैं आप फिर से गढ़ी गई हैं और गढ़ी हुई चीजेंज़्ज्यादा मजबूत होती हैं.

उस रात पहली बार मीता को डर नहीं लगा. बस एक नई अनुभूति ने जन्म लिया संभावना. उस ने खुद से कहा कि मैं किसी पर अपनी दुनिया नहीं टिका सकती लेकिन शायद किसी को अपनी दुनिया में थोड़ी सी जगह दे सकती हूं. वह अभी इस के लिए तैयार नहीं थी. लेकिन अब वह यह भी नहीं कहना चाहती थी कि उस की जिंदगी में फिर कभी कोई आएगा ही नहीं.

मीता ने खिड़की से बाहर  झांका. सड़क वही थी पर इस बार उसे अकेलापन नहीं लग रहा था बस सावधानी लग रही थी. इसी दौरान राघव का यहां से ट्रांसफर हो गया था और वह यहां से जा रहा था. मीता को अच्छा नहीं लग रहा था. उसे राघव पर बड़ा भरोसा था. वह उसे जिंदगी की ऊंचनीच सम झाता रहता. एक फौजी होने की उस ने पूरी जिम्मेदारी निभाई थी. मीता ने उसे परेश वाली बात बता दी. राघव के पास हफ्ते का समय था शहर छोड़ने के लिए, ‘‘मु झे जाना पड़ रहा है.’’ उस ने बहुत साधारण तरीके से कहा था जैसे कोई रोजमर्रा की बात हो. लेकिन मीता के भीतर कुछ टूट कर गिर गया. उस दिन वह देर तक कुछ नहीं बोली. बस चुपचाप राघव को देखती रही. वही शांत चेहरा, वही स्थिर आंखें जिन्होंने कभी उसे सहारा दिया था.

‘‘तुम अब अपने पैरों पर खड़ी हो. यह मेरे जाने से नहीं. बदलेगा,’’ राघव ने कहा.

मीता की पलकों से आंसू टपक पड़े, ‘‘आप जातेजाते भी मु झे सम झा रहे हैं.’’

‘‘क्योंकि यही मेरी ड्यूटी थी और है.’’

मीता ने कहा, ‘‘मैं ने आप को परेश के बारे में बताया था…’’

राघव के चेहरे पर हलकी मुसकान आ गई, ‘‘तुम नहीं जानती यह सुन कर मु झे गर्व हुआ मीता. इसलिए नहीं कि कोई इंसान तुम्हारी जिंदगी में आया है बल्कि इसलिए कि तुम फिर से किसी के साथ के बारे में सोच रही हो. यह बहुत बड़ा कदम होता है.’’

मीता ने सिर  झुका लिया, ‘‘लेकिन मैं अभी भी डरती हूं.’’

‘‘डर अच्छा है. जो डरता है वही संभल कर चलता है. बेखौफ लोग ही अकसर फिर टूटते हैं,’’ कहते हुए राघव की आवाज भारी हो गई.

जाने से एक दिन पहले दोनों नदी किनारे बैठे थे. उसी जगह जहां मीता कभी उसे

अपनी पहली कमाई की रसीद दिखाने लाई थी.

‘‘परेश कैसा इंसान है?’’ राघव ने पूछा.

‘‘न ज्यादा बोलता है न एहसान जताता है. कभीकभी डर लगता है कि कहीं यह चुप्पी भी राज की तरह न हो.’’

राघव ने उस की ओर देखा, ‘‘राज तुम्हें जीतना चाहता था लेकिन परेश तुम्हें सम झना चाहता है. दोनों में फर्क है.’’

‘‘और अगर मैं फिर गलत हो गई…?’’ मीता की आवाजं कांप गई.

‘‘तो भी तुम टूटोगी नहीं क्योंकि इस बार तुम्हारे भीतर सहने की ताकत भी है और छोड़ देने का साहस भी. मैं ने तुम्हें कभी कमजोर लड़की की तरह नहीं एक सिपाही की तरह देखा है जो जमीन पर गिर कर भी उठना जानती है.’’

राघव को सुबह सीधे कैंप से ड्यूटी की गाड़ी में बैठ कर जाना था. मीता उसे कैंप के गेट पर मिलने आई. उस ने अपने थैले से एक कमीज निकाली, ‘‘यह मैं ने खुद सिली है आप के लिए.’’

राघव कुछ पल उस कपड़े को देखता रहा. उस की आंखों में पहली बार गहरी नमी आई, ‘‘फौजी के पास यादें रखने की जगह बहुत कम होती है मीता लेकिन यह कमीज उन सब में सब से ऊपर रहेगी.’’

मीता की आवाज कांप गई, ‘‘अब मु झे कौन सम झाएगा?’’

राघव ने बहुत मजबूती से कहा, ‘‘कोई नहीं, अब तुम खुद को सम झाती हो.’’

गाड़ी स्टार्ट हुई. मीता तब तक कैंप के गेट पर खड़ी रही जब तक धूल के गुबार में राघव ओ झल नहीं हो गया. आंसू बह रहे थे लेकिन अब वे कमजोरी के नहीं भरोसे के थे. राघव के जाने के बाद मीता को सब से ज्यादा डर खामोशी से लगा. वह आदमी जो उसे बिना शर्त सही दिशा दिखाता रहा अब दूर था.

रात को मीता ने राघव को सिर्फ एक लाइन का संदेश भेजा, ‘‘आज मेरा सब से बड़ा

सहारा शहर छोड़ कर चला गया.’’

कुछ देर बाद उत्तर आया, ‘‘और तुम्हारा सब से बड़ा सहारा अभी भी तुम्हारे भीतर है मीता.’’

मीता ने मोबाइल सीने से लगा लिया. राघव उसे रोज फोन नहीं करता था. हफ्ते में बस 1 बार. कैसी हो? काम ठीक चल रहा है? खुद का खयाल रख रही हो न? बस इतना. न कोई हुक्म न कोई दखल. मीता को यह एहसास बहुत सुकून देता था कि सहारा अब धरातल से नहीं भीतर से आता है. किसी की आवाज दूर से भी ताकत दे सकती है.

परेश अब भी उसी तरह दुकान पर आता था. लेकिन अब मीता की नजरें उस से बचती नहीं थीं पर रुकती जरूर थीं.

एक दिन परेश ने बहुत शांत स्वर में कहा, ‘‘अगर कभी आप को लगे कि मैं बेवजह पास आ रहा हूं तो आप बे िझ झक रोक देना.’’

मीता का हाथ पलभर को रुक गया, ‘‘आप ऐसा क्यों बोलते हैं कि जैसे मु झे अधिकार देना चाहते हों?’’

‘‘क्योंकि अधिकार तो आप का ही है. हर रिश्ते पर पहला हक खुद इंसान का होता है.’’

मीता की पलकें  झुक गईं. धीरेधीरे बातें बढ़ने लगीं. छोटीछोटी. कभी बारिश तो कभी थकान के बारे में, कभी बचपन की अधूरी खुशियों के बारे में. लेकिन मीता अब भी अपने अतीत की दीवार पूरी तरह गिराने को तैयार नहीं थी.

एक शाम परेश ने कहा, ‘‘आप मु झे अपना नंबर देंगी?’’

मीता कुछ पल चुप रही. यह छोटा सा प्रश्न उस के लिए बहुत बड़ा था. नंबर देना मतलब किसी को अपनी आवाज तक रास्ता देना.

‘‘क्यों?’’ उस ने सीधे पूछा.

‘‘ताकि जब दुकान बंद हो तो भी आप अकेली न रहें,’’ परेश ने कहा.

मीता को राज की बातें याद आईं. वही मीठी शुरुआत, वही भरोसे की पहली सीढ़ी. उस के दिल कांप उठा, ‘‘मैं आसानी से भरोसा नहीं करती.’’

‘‘और मैं आप से भरोसा मांग भी नहीं रहा. बस इतना चाहता हूं कि आप मु झे पूरी तरह अजनबी न बनाए रखें.’’

मीता ने अपना नंबर बता दिया. रात को परेश का फोन देर से बजा, ‘‘मैं परेश बोल रहा हूं. बस यह सुनिश्चित कर रहा था कि नंबर सही है. आप परेशान तो नहीं हुईं?’’

‘‘नहीं बस चौकन्नी हूं.’’

फोन के उस पार हलकी हंसी सुनाई दी.

‘‘चौकन्ना रहना अच्छी बात है लापरवाह रहना नहीं.’’

अगले कुछ महीनों में दोनों की दुनिया बहुत धीरेधीरे पास आ रही थी. न

तेज कदम, न बड़े वादे. कभी देर रात काम से लौटते हुए सिर्फ यह पूछता, ‘‘घर पहुंच गई?’’

कभी रविवार की छुट्टी पर सिर्फ यह कहता, ‘‘आज आप थकी हुई लग रही हैं.’’

‘‘हां लेकिन अब मैं थकान से डरती नहीं.’’

मीता फोन रखते हुए अकसर सोचती कि यह रिश्ता है या टाइम पास.

एक दिन दुकान पर एक ग्राहक ने मीता से बदतमीजी कर दी. परेश वहीं मौजूद था. वह चुप नहीं रहा. न  झगड़ा किया, न तमाशा. बस उस आदमी को शालीनता के साथ बाहर करने में मदद कर दी. उस के बाद मीता देर तक चुप रही.

‘‘आप ठीक हैं?’’ परेश ने पूछा.

मीता ने हां में सिर हिलाया.

‘‘आज पहली बार मु झे किसी का साथ अच्छा लगा लेकिन डर की वजह से नहीं.’’

‘‘यह भरोसे की शुरुआत होती है.’’

उसी रात मीता ने राघव को फोन किया. उस ने थोड़ी देर बाद बात आगे बढ़ाई, ‘‘परेश अच्छा इंसान लगता है.’’

फोन के उस पार कुछ क्षण की खामोशी रही. फिर राघव की गंभीर आवाज आई, ‘‘अच्छा लगना और सही होना दोनों में फर्क होता है मीता. लेकिन अगर तुम्हें खुद पर भरोसा है तो फैसला भी तुम्हारा ही होना चाहिए.’’

‘‘मैं डरती हूं अब भी.’’

‘‘डर के साथ लिया गया फैसला अकसर सही होता है,’’ वह मीता की दुविधा सम झ रहा था लेकिन मन में कहीं हूक भी उठ रही थी कि अगर उस ने परेश को चुन लिया तो जल्द ही वह उस से दूर हो जाएगी.

कुछ दिन बाद परेश ने उस से बहुत सीधे शब्दों में कहा, ‘‘मीता मैं आप से रिश्ता चाहता हूं पर कोई जोर नहीं डालूंगा. अगर आप चाहें तो हम सिर्फ दोस्त भी रह सकते हैं.’’

‘‘मु झे दोस्ती से शुरुआत करनी है और धीरेधीरे चलना है.’’

परेश की आवाज में राहत थी, ‘‘मु झे यह मंजूर है.’’

उस रात मीता देर तक अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखती रही. शहर वही

था, शोर वही था लेकिन अब उस की जिंदगी में ठहराव था. वह खुद अपने कदमों से आगे बढ़ रही थी और पास चलता हुआ कोई उसे रोक नहीं रहा था. बस साथ दे रहा था. पहली बार मीता को लगा शायद यही सुरक्षित प्रेम की सब से सही परिभाषा होती है.

मीता कई दिनों से अपनेआप से जू झ रही थी. परेश का साथ उसे अच्छा लगने लगा था. उस की खामोशी, उस का संयम और उस का बिना शर्त पास रहना. लेकिन इसी के साथ एक डर भी था कि अगर मैं उस से अपना अतीत छिपाऊंगी तो राज और परेश में कोई फर्क कैसे कर पाऊंगी? उस शाम दुकान जल्दी बंद हो गई थी. बाहर हलकी बारिश थी. सड़क पर पीली रोशनी फैल रही थी.

मीता ने कहा, ‘‘परेश क्या हम 2 मिनट बैठ सकते हैं?’’

वे पास की चाय की दुकान पर बैठ गए. 2 कप चाय आ गई लेकिन मीता ने कप उठाया ही नहीं. उस के हाथ कांप रहे थे.

‘‘आप ठीक हैं?’’ परेश ने पूछा.

‘‘मैं आप को अंधेरे में नहीं रखना चाहती.’’

‘‘आप जो भी कहना चाहें मैं आराम से सुनूंगा.’’

मीता की आंखें भीग गईं.

‘‘जिस राज का जिक्र मैं कभीकभी करती हूं वह सिर्फ मेरा पुराना रिश्ता नहीं था वह मेरी बहुत बड़ी भूल थी.’’

परेश कुछ नहीं बोला. बस सामने बैठा रहा.

‘‘मैं उस के साथ घर से भाग गई थी सबकुछ छोड़ कर. उस ने शादी का  झूठा सपना दिखाया और फिर मु झे अकेला छोड़ दिया,’’ उस की आवाज भर्राने लगी.

‘‘उस वक्त जिस हालत में मैं थी वहां से उठने में मु झे बहुत समय लगा,’’ मीता ने कांपती आवाज में आगे कहा, ‘‘मैं सड़क पर आ गई थी भूखी और डरी हुई. सबकुछ दांव पर लगाने तक की नौबत आ गई थी. आज जो मैं हूं वह बहुत दर्द और तकलीफ सहकर बनी हूं,’’ उस की आंखों से आंसू गिरने लगे. ‘‘मैं यह सब इसलिए बता रही हूं क्योंकि मैं इस दोस्ती को  झूठ की नींव पर खड़ा नहीं करना चाहती. गलती सरासर मेरी थी.’’

परेश ने पहली बार उसे टोका, ‘‘आप ने भरोसा किया था. गलती भरोसे में नहीं होती गलती उसे तोड़ने में होती है.’’

मीता अवाक रह गई, ‘‘आप को मु झसे नफरत नहीं हो रही?’’ उस ने डरते हुए पूछा.

‘‘अगर किसी का टूटना नफरत की वजह बनता तो इस दुनिया में कोई भी इज्जत के काबिल न होता.’’

मीता की सिसकियां तेज हो गईं, ‘‘मु झे डर है कि आप भी मु झे उसी नजर से देखेंगे जैसे दुनिया देखती हैं.’’

परेश ने बहुत स्पष्ट और दृढ़ स्वर में कहा, ‘‘मैं आप को उस नजर से देखता हूं जैसे कोई इंसान उस औरत को देखता है जिस ने जिंदगी से हार मानने से इनकार कर दिया हो.’’

मीता ने पहली बार सिर उठा कर उसे ठीक से देखा, ‘‘लेकिन मैं आप से यह वादा नहीं कर सकती कि मैं जल्दी भरोसा कर पाऊंगी.’’

‘‘और मु झे यह वादा चाहिए भी नहीं. मु झे सिर्फ इतना चाहिए कि आप  झूठ न बोलें और आज आप ने वह कर दिखाया.’’

मीता की आवाज कांप गई, ‘‘तो आप मु झ से दूर नहीं जाएंगे?’’

परेश ने बहुत सादगी से कहा, ‘‘मैं यह सुन कर आप के और पास आया हूं क्योंकि अब मैं आप को आधाअधूरा नहीं पूरी तरह जानता हूं.’’

मीता की आंखों से आंसू रुक ही नहीं रहे थे.

‘‘हम दोनों धीरे चलेंगे ताकि कोई फिर

गिरे नहीं.’’

यह सुन कर मीता ने राहत की सांस ली. उस रात मीता ने राघव को फोन किया और सबकुछ बता दिया. राघव कुछ देर चुप रहा फिर बोला, ‘‘आज तुम ने अपने अतीत से नहीं अपने डर पर जीत हासिल की है.’’

मीता की आवाज कांप गई, ‘‘और परेश ने मु झे ठुकराया नहीं.’’

‘‘क्योंकि इस बार तुम किसी लालची के नहीं, एक सच्चे इंसान के सामने खड़ी हो,’’ राघव ने कहा.

कहने को तो राघव कह गया लेकिन अंदर ही अंदर उसे यह बात विचलित भी

कर रही थी कि कल तक जो मीता अपनी सब बातें केवल उस के साथ सा झा करती थी अब उसे दूसरा राजदार मिल गया. आखिर वह भी एक मर्द है. वह जानता है कि धीरेधीरे परेश से नजदीकियां मीता को उस से दूर ले जाएगी और वह उस के जीवन में एक गौडफादर बन कर ही रह जाएगा.

मीता राघव की भावनाओं से अनजान थी. अपनी बात कह कर वह हलकी हो गई थी. उसे सच बता कर उस के दिल से बड़ा बो झ उतर गया था. वह खुश थी कि परेश उसे उठाने की जगह साथ चलने को तैयार था. आज वह अपने को धन्य सम झ रही थी जहां उसे परेश के रूप में एक सच्चा हमसफर मिल गया था.

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