Hindi Short Stories : अपने मनपसंद कैफे ‘फन कौर्नर’ की ओपन स्पेस के एक कोने में बैठी ब्लैक शर्ट और क्रीम पैंट पहने हुए लंबे स्ट्रेट बाल 28 साल की सुंदर सी माहिका बारबार मोबाइल में टाइम देख रही थी. बेचैन थी, दोस्त अभी तक नहीं आए थे.
यह कांजुरमार्ग का एक शौपिंग कौंप्लैक्स है जिस का यह ‘फन कौर्नर’ अपने यमी स्नैक्स के लिए बहुत मशहूर है. यहां अकसर युवा जोड़े ही दिखते हैं. अंदर तो बहुत से ग्राहक थे पर माहिका का मन था कि इस समय थोड़ी खुली जगह में बैठे. पहले वह अंदर गई थी पर उसे कुछ ड्रिंक्स की स्मैल आई तो वह बाहर आ कर बैठ गई. वैसे उसे इस तरह की स्मैल से कभी कोई परेशानी नहीं हुई पर आज उसे यह स्मैल अच्छी नहीं लगी.
मुंबई के ज्यादातर युवाओं को इस तरह की स्मैल की आदत होती है. जो नहीं पीते आदत उन्हें भी हो जाती है क्योंकि मुंबई में क्या, हर जगह यह कल्चर अब बहुत आम है. अब यह किसी को नहीं खलता. प्यारी सी, मासूम चेहरे वाली माहिका बैठ कर माहौल का जायजा लेती रही.
तभी उस ने देखा कि कबीर अपनी वेंटो पार्क कर रहा है. इस ह्वाइट वेंटो को तो वह
हजारों गाडि़यों में पहचान सकती है. पिछले 3 सालों में वह इस वेंटो में कितने घंटे बैठ चुकी होगी, इस का हिसाब भी नहीं लगाया जा सकता.
कबीर की कार से अब तक अर्जुन, प्रियम और रुद्र भी उतर कर खड़े हो चुके थे. माहिका की दिशा में देखा तो उस ने हाथ ऊपर कर के हिला दिया. चारों उस की तरफ मुसकराते हुए आ रहे थे. कबीर को देख कर उस ने एक ठंडी सांस ली. चारों ने आ कर उस से हाथ मिलाते हुए लगभग एकसाथ ही पूछ लिया, ‘‘क्या हुआ?’’
‘‘सांस तो ले लो. पहले कुछ और्डर कर लें, मझे भूख लगी है.’’
कबीर हंसा, ‘‘तुम और तुम्हारी भूख… देखने में इतनी स्लिमट्रिम हो, कौन कहेगा हमारे गु्रप में सब से ज्यादा तुम ही खाती हो.’’
अर्जुन भी हंसने लगा, ‘‘यार हम 10 साल पुराने दोस्त हैं, कभी ऐसा नहीं देखा कि तुम्हें भूख न लगी हो.’’
‘‘ऐसा नहीं है, कईकई बार दिल टूटने पर मैं ने पूरापूरा दिन कुछ नहीं खाया है,’’ माहिका ने भी हंस कर कहा तो कबीर ने उसे घूरा, वह गंभीर हो गई.
रुद्र ने वेटर को बुला कर सब से सब की पसंद पूछपूछ कर और्डर दे दिया, फिर कहा, ‘‘अब बताओ, माही इतनी जल्दी मिलने के लिए क्यों कहा? परसों ही तो मिले थे. वीकैंड का भी इंतजार नहीं किया. सीधे औफिस से आ रहे हैं?’’
‘‘क्या करूं? मेरी कोई और फ्रैंड्स तो हैं नहीं, मैं तो तुम्हारे गु्रप में ही रहती हूं, अपनी परेशानी किस से शेयर करती?’’
‘‘जल्दी बताओ?’’
‘‘मैं प्रैगनैंट हूं.’’
‘‘क्या?’’ सब जैसे चीख ही पड़े, फिर आसपास के लोगों पर उड़ती सी नजर डालते हुए धीरे से बोले, ‘‘क्या बकवास कर रही हो?’’ सब के चेहरे उतर गए थे.
माहिका और अर्जुन ने एकदूसरे को गहरी नजरों से देखा, अभी सब चुप थे.
माहिका ने कहा, ‘‘मु?ो अबौर्शन करवाना है. मेरी हैल्प करो.’’
‘‘हम क्या हैल्प करें?’’
‘‘2 महीने से पीरियड्स नहीं हुए तो मैं आज लंच टाइम में औफिस से हाफ डे ले कर डाक्टर के पास गई थी. मु?ो भी आज ही पता चला है. अर्जुन, पता है कि अभी तुम शादी तो करने के मूड में नहीं हो न. मैं भी तुम पर शादी का कोई प्रैशर नहीं डाल रही हूं, तुम्हारा जब मन होगा, हम तभी शादी करेंगे पर अब गलती हो गई है. मु?ो भुगतना ही पड़ेगा. पर इस मामले में सब को मेरी हैल्प तो करनी ही होगी.’’
रुद्र ने कहा, ‘‘बोलो, क्या हैल्प करें?’’
‘‘मु?ो औफिस से 5-7 दिन की छुट्टी लेनी होगी, घर में बताना होगा कि औफिस की किसी मीटिंग में पुणे जा रही हूं. यहां मुंबई में मैं यह सब नहीं करवा सकती. मम्मीपापा को पता चल गया तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी. अबौर्शन के बाद वहां किसी होटल में रुक जाएंगे, पता नहीं कितना खर्चा होगा?’’
रुद्र ने कहा, ‘‘खर्च की चिंता न करो, हम सब बांट लेंगे.’’
प्रियम ने चिढ़ कर कहा, ‘‘सब क्यों शेयर करेंगे? माहिका और अर्जुन शेयर करें. यह उन की पर्सनल प्रौब्लम है, यार. कोई पार्टी थोड़े ही है कि सब शेयर करेंगे.’’
रुद्र ने कहा, ‘‘हमारे गु्रप में अब ये सब छोटी बातें होंगीं? अर्जुन की जगह कभी तुम भी हो सकते थे. क्या माहिका इस गु्रप में बस यूज एंड थ्रो वाली चीज है?’’
माहिका ने रुद्र को प्यार भरी नजरों से देखा.
रुद्र ने आगे कहा, ‘‘कभी कबीर कभी तुम, कभी मैं.’’
माहिका की आवाज भर गई तो सब बोल पड़े. ‘‘डौंट वरी माही जैसा रुद्र कहेगा, हो जाएगा. पर सब का जाना तो जरूरी नहीं है न? बेकार में होटल का खर्चा ही होगा. कोई एक भी तुम्हारे साथ जाएगा तो संभाल लेगा. अर्जुन, तुम ही जाओ. खर्चा शेयर कर लेंगे.’’
माहिका ने सोचने में बस एक पल ही लिया, बोली, ‘‘ठीक है. कबीर
और अर्जुन तुम दोनों चलो. मु?ो होने वाली तकलीफ तो तुम लोग शेयर नहीं कर सकते पर सब मेरे साथ टाइम शेयर कर लेना.’’ कहते हुए माहिका और कबीर की नजरें मिलीं तो माहिका की आंखों में पल भर के लिए नमी आ गई जिसे उस ने बड़ी चतुराई से अपने गले में ही उतार लिया. इस नमी से गला नमकीन सा हुआ पर दिल यह सोच कर कुछ संभल भी गया कि कबीर कुछ समय साथ रहेगा. इश्क के दीवानों की बात ही निराली है.
वहीं बैठेबैठे आगे के प्लान बनते रहे. माहिका ने गूगल पर ही देख लिया कि पुणे में किस डाक्टर को दिखाना है, कहां रुकना है.
कबीर ने कहा, ‘‘माही, परसों का ही अपौइंटमैंट ले लो, कल शाम को निकल जाते हैं. वीकैंड के 2 दिन भी मिल जाएंगे, औफिस से ज्यादा छुट्टियां नहीं लेनी पड़ेंगी.’’
‘‘सोचना पड़ेगा, मम्मी कहेंगी वीकैंड को औफिस की कौन सी मीटिंग है?’’
‘‘बोल देना, बाहर से कुछ कलीग्स आ रहे हैं, उन्हें लोनावला, खंडाला घुमाने की जिम्मेदारी तुम ने ली है,’’ कबीर ने कहा तो माहिका ने पूछा, ‘‘तुम दोनों अपने घर में क्या कह कर निकलोगे?’’
‘‘अरे, हम तो कुछ भी बोल देंगे, बोल देंगे कि दिल्ली जा रहे हैं, दोस्त की शादी है. हम से इतने सवाल नहीं पूछे जाते.’’
‘‘हां, यह तो हम लड़कियों के साथ ही होता है. सारे सवालजवाब हमारे लिए ही तो हैं.’’
प्रियम ने कहा, ‘‘फिर भी माही तुम्हें काफी छूट मिली हुई है.’’
‘‘हां, शायद मैं उस का गलत फायदा उठा रही हूं. और यह सारी परेशानी भी ?ोल रही हूं,’’ कहतेकहते माहिका उदास हो, चुप हो गई.
तब अर्जुन ने कहा, ‘‘यार, तुम उदास मत हुआ करो, हमारे गु्रप की जान हो तुम.’’
‘‘गु्रप क्या, एक रोटेशन क्लब सा हो गया है,’’ माहिका ने एक ठंडी सांस भरी और कबीर को देखा. उस ने आंखें चुरा लीं.
वेटर और्डर ले आया. सबकुछ न कुछ खाते रहे. बीचबीच में थोड़ा हंसीमजाक,
कभी कोई गंभीर बात चलती रही. माहिका हमेशा की तरह चहक नहीं रही थी, अनमैरिड लड़की के लिए अबौर्शन इतना सहज, सरल भी नहीं होता. होता तो मैरिड के लिए भी नहीं पर उसे परिवार का सहयोग अकसर मिल ही जाता है. उस के पास भावनात्मक संबल होते हैं. वहां सब खुश होते हैं. यहां इस समय सब के सब अनाड़ी. सब ने बस फिल्मों में ही देखा था या अब गूगल पर देख रहे थे. बिल आया, सब ने हमेशा की तरह शेयर किया.
कबीर ने पूछा, ‘‘सब घर ही चल रहे हो न?’’
सब ‘हां’ कहतेकहते कबीर की कार की तरफ ही चल पड़े. माहिका जानबू?ा कर कार में कबीर के बराबर में आगे ही बैठ गई, कबीर ने उस पर एक नजर डाली, कहा कुछ नहीं. दिल की बातें थीं, दोनों को कुछ कहनेसुनने की जरूरत नहीं थी.
अर्जुन ने पीछे बैठते हुए कहा, ‘‘माहिका, मजाक एक तरफ पर मु?ो सचमुच तुम्हारी फिक्र हो रही है, तुम्हें ज्यादा तकलीफ तो नहीं होगी?’’
‘‘क्या पता मैं कोई अबौर्शन ऐक्सपर्ट तो हूं नहीं. तुम एक बार प्रैगनैंट हो कर देखो.’’
उस ने कुछ इस ढंग से कहा कि कबीर को छोड़ कर सब के चेहरे पर हंसी आ गई.
माहिका ने कहा, ‘‘कबीर, तुम सारी लाइफ हंसने में ऐसे ही कंजूस रहोगे?’’
अब कबीर जरा सा मुसकराया तो माहिका पुणे जाने की बात करने लगी. उस के बाद सब ने अपने खयालों में खोएखोए भांडुप पहुंचने तक कार में गाने सुने, थोड़ा हंसीमजाक किया. सब वहीं आसपास ही रहते थे. कालेज से दोस्त थे अब जौब कर रहे थे. सब अनमैरिड थे.
घर पहुंच कर माहिका फ्रैश हुई, शारीरिक और मानसिक तौर पर कुछ निढाल सी थी. उस के पेरैंट्स नलिनी और सुधांशु उसी की प्रतीक्षा कर रहे थे. माहिका सोफे पर बैठी अपनी मम्मी की गोद में सिर रखते हुए कुछ इधरउधर की बातें करने लगी, फिर कहा, ‘‘मम्मी, कल सुबह पुणे जा रही हूं. औफिस की मीटिंग है.’’
‘‘पर कल तो शनिवार है?’’
‘‘मेरे कुछ कलीग्स मेरे अच्छे दोस्त हैं, उन्हें लोनावला, खंडाला दिखाते हुए जाऊंगी. वे बाहर से आ रहे हैं.’’
सुधांशु ने कहा, ‘‘वापस कब तक आओगी?’’
‘‘वीकैंड तक आ जाऊंगी. काम जल्दी खत्म हुआ तो उस से पहले ही आ जाऊंगी. लौटने का अभी पक्का नहीं है.’’
बड़े शहरों में युवा बच्चों को आजकल पेरैंट्स खुल कर जीने की आजादी देने लगे हैं तो
ज्यादा सवालजवाब नहीं हुए. सब ने साथ खाना खाया. माहिका ने अपने रूम में जा कर अपना सामान पैक किया, औफिस में छुट्टी का मेल डाला और अपने रोटेशन क्लब पर चारों दोस्तों से चैट की, कल निकलने का फाइनल प्रोग्राम बनाया. माहिका ने ही इस व्हाट्सऐप्प ग्रुप का नाम हंसीमजाक में रोटेशन क्लब रखा था. पर इस नाम में उस का दर्द छिपा था जिसे सिर्फ वह और कबीर ही जानते थे.
माहिका सोने लेटी पर अगले आने वाले 2-3 दिनों के बारे में सोच कर नर्वस थी. कोई ऐसी लड़की दोस्त नहीं थी जिस से अपनी परेशानियां डिसकस कर लें. सालों से इसी गु्रप में रहती. जितनी भी लड़कियां दोस्त थीं, वे कहीं और बिजी थीं, किसी की शादी हो गई थी, कोई विदेश में थी, किसी से ज्यादा दिन बनी नहीं थी पर जब से इस गु्रप में आई थी. कबीर से ऐसा मोह हुआ कि दिल कहीं और बंधा ही नहीं. किसी की कभी कोई जरूरत ही महसूस नहीं हुई. सालों से कबीर की मुहब्बत में दीवानी सी घूम रही थी. पता नहीं कबीर के लिए कौनकौन से इम्तिहान से कितनी बार गुजरती. कौन कहता है कि आजकल सब जल्दी मूव औन कर जाते हैं, अच्छी बात है कि करना भी चाहिए, जरूरी भी होता है पर यहां तो माहिका के दिल की सूई कबीर पर अटकी है. उस का दिल है कि मानता नहीं.
पिछले 3-4 सालों का समय उस की बंद आंखों के आगे किसी रील की तरह घूमने लगा. कबीर और उसे एकदूसरे से बेतहाशा प्रेम हुआ, दोनों प्रेम दीवाने से कभी कालेज में, कभी कहीं और साथ ही देखे जाते.
कबीर के दोस्त प्रियम, अर्जुन और रुद्र उस के भी दोस्त हो गए. वे तीनों भी अपनीअपनी गर्लफ्रैंड्स के साथ आते और एक बड़ा सा गु्रप बन गया. एकदूसरे के साथ तन मन से जुड़े, खूबमौज मस्ती के दिन थे. जो भी प्रोग्राम बनता, सब एकसाथ होते.
मुंबई से बाहर घूमने जाते तो होटल में 4 रूम बुक होते. वह एक साल ऐसा यादगार हो गया जिस की यादें शायद कोई जल्दी न भूल पाए. सब अपनेअपने प्रेम के साथ खुश थे. ऐसे ही सब एकसाथ शिमला गए थे तो कबीर की बांहों का अनमना सा ढीलापन माहिका को चौंका रहा था. उस ने कबीर के गाल पर किस करते हुए पूछा. ‘‘क्या हुआ, कबीर? उल?ोउल?ो से क्यों हो?’’
पहले कबीर नानुकुर करता रहा, फिर बोला, ‘‘माही, तुम्हें बताना चाहता हूं कि घर
में तुम्हारी बात चली तो पापा ने साफ कह दिया कि मैं तुम से शादी न करूं. मैं ने उन से काफी बहस की पर वे अपनी ही बिरादरी में मेरी शादी करेंगे नहीं तो मु?ा से कोई संबंध नहीं रखेंगे और मैं लाइफ में यह सब स्ट्रैस नहीं लेना चाहता. अभी मेरा कैरियर बनाने का टाइम है, मैं शांति से जीना चाहता हूं.’’
‘‘तो तुम्हें मेरा प्यार भूलना ज्यादा आसान लग रहा है? किस जमाने की बातें हैं ये?’’
‘‘मम्मी बीमार रहती हैं, कह रही थीं, सब रिश्तेदार आसपास ही रहते हैं, वे उन की बातों को इग्नोर नहीं कर सकतीं. तुम्हें इतना तो पता ही है कि हमारी ट्रैडिशनल फैमिली है. सब शादियां अपनी जातबिरादरी में ही हुई हैं.’’
‘‘मैं हैरान हूं कि तुम इतनी आसानी से यह सब कह पा रहे हो.’’
‘‘मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता, प्यार करता हूं तुम से पर शादी होती नहीं दिख रही है.’’
‘‘और मैं चाहती हूं कि हमेशा तुम से जुड़ी रहूं, तुम्हारे आसपास रहूं.’’
उस रात दोनों समझ गए थे कि यह साथ में उन की आखिरी रात है. सब को धीरेधीरे सम?ा भी आ गया कि कुछ ब्रेकअप जैसा हुआ है पर कुछ बाकी भी है. 6 महीने के अंदर हालात कुछ ऐसे हुए कि अर्जुन, प्रियम और रुद्र का भी ब्रेकअप हो गया. अब सब फिर साथ में उठनेबैठने लगे. माहिका के मन में आया कि इस गु्रप के सभी लड़के अच्छे हैं, उस के दोस्त हैं, कबीर साथ नहीं तो क्या, सामने तो है. उसे देख कर दिल को एक सुकून तो मिलता है, यही बहुत है.
कबीर की तरफ से दिल टूटा था. वह उदास रहती तो प्रियम उसे हंसाता, उस के साथ रहता. धीरेधीरे प्रियम और वे करीब आने लगे. प्रियम के लिए यह एक आम बात थी पर माहिका के लिए यह सिर्फ कबीर के पास रहने का बहाना था. वह इन में से किसी के साथ रहती तो कबीर को भी आने के लिए कह देती. वह भी आ जाता. ये सब उस के अच्छे दोस्त थे. प्रियम माहिका को बहुत हलके में ले रहा था. 6 महीने उस ने माहिका के साथ टाइम बिताया पर दोनों जैसे एकदूसरे के लिए नहीं बने हैं, यह भी सम?ाने में ज्यादा देर नहीं लगी.
ऐसे ही माहिका और रुद्र जब करीब आने लगे तो एक दिन कबीर माहिका से मिलने
उस के औफिस से निकलने के टाइम चला आया. माहिका उसे देख बुरी तरह चौंकी. कबीर के साथ पास के ही एक कैफे में बैठते हुए उस ने कहा, ‘‘आज मेरी याद कैसे आई?’’
‘‘तुम यह एक के बाद एक बौयफ्रैंड क्यों बना रही हो? वह भी हम में से
ही किसी एक को. यह क्या पागलपन है?’’
‘‘कबीर, तुम मूवऔन कर गए, मैं नहीं कर पा रही हूं, तुम्हारे ग्रुप में तभी आसानी से रह सकती हूं जब किसी न किसी से जुड़ी रहूंगी. मैं तुम्हारे आसपास रहना चाहती हूं, कबीर,’’ कहतेकहते माहिका का गला भर्रा गया.
कबीर को बहुत दुख हुआ. वह अपनेआप को काफी असहाय महसूस कर रहा था पर उस की सम?ा में नहीं आ रहा था कि क्या करे. वह प्रैक्टिकल हो कर सोच रहा था, वह जानता था कि अपने पेरैंट्स के बिना वह कुछ नहीं कर सकता.
‘‘ऐसा नहीं है. तुम दोस्त बन कर भी हमारे साथ रह सकती हो. अपनी लाइफ के साथ यह अच्छा नहीं कर रही हो.’’
माहिका ने फिर कुछ नहीं कहा था पर बात यही सच थी कि कबीर के लिए इसी ग्रुप में कभी इस के साथ, कभी उस के साथ घूमती रही थी और आज यह नौबत आ चुकी थी कि कल अबौर्शन करवाने जा रही है. करवटें बदलबदल कर उस ने सारी रात बिताई. आंखों की कोरों से आंसू न जाने कितनी बार बह गए.
पेट पर हाथ रख फिर वह अर्जुन के बारे में सोचने लगी. एक बार भी उस ने नहीं कहा कि अबौर्शन मत करवाओ, हम शादी कर लेते हैं. इन में से किसी को फर्क नहीं पड़ता कि उस के तनमन पर क्या बीत रही है. कबीर से प्यार क्या किया, लट्टूकी तरह घूमती ही जा रही है जैसे किसी रोटेशन क्लब की मैंबर हो. शांति से सो रहे उस के पेरैंट्स उस पर कितना विश्वास करते हैं, दोबारा कोई सवाल नहीं करते. उन्हें पता है कि उन की बेटी कुछ गलत नहीं करेगी.
पता नहीं कल होने वाली तकलीफ का डर था या सचमुच अब कबीर के प्यार की तासीर कम हो रही थी, वह बारबार यही सोचने लगी कि उसे अपनी भावनाओं पर लगाम कसनी होगी. जब साफसाफ कबीर से रिश्ता खत्म हो गया है, उस के आसपास रहने के लिए किसी से भी जुड़ जाना हद दर्जे की बेवकूफी के अलावा कुछ भी नहीं. बहुत हो चुका, कबीर को भूलना जरूरी है. आगे बढ़ना होगा. पर कैसे, कबीर को देखे बिना चैन कहां आता है? कैसा दिल है जो मानता ही नहीं.
अचानक माहिका रोने लगी, खूब रोई पर जब चुप हुई तो दिल
हलका हो चुका था. अचानक कबीर का नाम उस के मोबाइल की स्क्रीन पर चमका, दिल खिल उठा पर इस बार उस ने दिल को जैसे डांट कर चुप करवा दिया और फोन बंद कर दिया. बस कबीर अब यह पागलपन और नहीं होगा. सोच कर उस ने नई सुबह के साथ कई नए फैसले भी कर लिए थे. यह अलग बात है कि दिल उस के मजबूत फैसले को सम?ा कर कुछ सुस्त सा हो गया था.
बस अब अबौर्शन हो जाए तो सब नए सिरे से शुरू करेगी, यह विचार ही उसे एक नए उत्साह से भर रहा था. कबीर और अर्जुन के साथ वह तय समय पर पुणे के लिए निकली. कबीर ने कार चलाते हुए एक तिरछी सी नजर उस पर डाली. कबीर को अफसोस हुआ कि उस के आसपास रहने के लिए माहिका क्याक्या ?ोल रही है पर उस में सचमुच अपने पेरैंट्स के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं थी. अर्जुन भी बेजार सा अपने फोन में ही बिजी था.
माहिका चुपचाप सोच रही थी कि बहुत हो गई मौज, कबीर के मोह ने कहां से कहां पहुंचा दिया. अब और नहीं. यह एक बेवकूफी के सिवा और कुछ भी नहीं.
पुणे पहुंच कर तीनों सीधे डाक्टर सुरेखा गुप्ता के क्लीनिक पहुंचे. माहिका अपौइंटमैंट ले चुकी थी, टैक्नोलौजी ने हर काम आसान कर ही दिया है. डाक्टर ने चैकअप के बाद प्रैगनैंसी कन्फर्म की.
डाक्टर करीब 50 साल की थीं, अनुभवी आंखों ने केस को परख कर सम?ा लिया कि यह युवाओं की मौजमस्ती वाला अबौर्शन है. इन से ऐक्स्ट्रा पैसा लिया जा सकता है. रिसैप्शन पर खूब मोटी फीस जमा करने के लिए कहा गया. तीनों सिर जोड़े बैठे थे. माहिका ने कहा, ‘‘यह तो लूट रही है, यह अबौर्शन तो बहुत महंगा पड़ेगा.’’
उस का मन कर रहा था अभी भी अर्जुन कह दे कि छोड़ो, अब शादी कर लेते हैं पर अर्जुन का मूड कुछ और ही था.
वह बोला, ‘‘अरे, दे देंगे पैसे. ?ां?ाट खत्म करो और वापस चलते हैं. पैसे तो शेयर कर लेंगे.’’
माहिका के अंदर कुछ चटक गया. कबीर चुप रहा. फीस जमा करवा दी
गई. माहिका को एडमिट कर लिया गया. जैसे ही उस के कपड़े बदलवाए गए, उस का हौसला टूट गया, वह सिसक पड़ी, नर्स सब सम?ा गई, उस ने उस का सिर सहलाया, नर्स के कोमल स्पर्श ने उसे राहत तो दी पर उस की आंखों से आंसू बह निकले. अपने मातापिता का विश्वास तोड़ वह आज यहां लेटी है. वह इस गिल्ट से इतना भर गई कि उस का सिर फटने लगा.
अबौर्शन से पहले उस का बीपी चैक किया गया तो बीपी इतना हाई था कि डाक्टर ने बाहर बैठे कबीर और अर्जुन से आ कर कहा, ‘‘पेशैंट का बीपी इतना हाई है कि अभी उसे 1-2 दिन एडमिट रखूंगी, कुछ दवाई दूंगी, फिर बीपी नौर्मल होने पर अबौर्शन होगा.’’
डाक्टर भी जानती थीं कि इन युवाओं के पास अभी कोई और चारा भी नहीं है. अभी 1-2 दिन एडमिट कर के और पैसा कमाया जा सकता है.
कबीर और अर्जुन एकदूसरे का मुंह देखते रह गए. कबीर के मुंह से बस इतना ही निकला, ‘‘डाक्टर, मतलब हमें आज रुकना पड़ेगा?’’
‘‘और क्या? कल या परसों तक माहिका जा पाएगी. आप उस से मिल सकते हैं, बात कर सकते हैं. मैं अब शाम को उसे देखूंगी, नर्स है ही.’’
अर्जुन और कबीर ने हां में सिर हिला दिया, दोनों उतरे चेहरों के साथ माहिका के रूम में पहुंचे, हौस्पिटल का गाउन पहने माहिका उदास सी लेटी थी, नर्स ‘‘अभी आती हूं,’’ कह कर बाहर निकल गई.
‘‘कैसी हो, माही?’’ कबीर ने पूछा तो माहिका ने ‘‘ठीक हूं’’ इतना ही कहा.
‘‘डाक्टर कह रही है, अबौर्शन कल या परसों करेगी, उस के बाद कुछ रैस्ट तो करना ही होगा, रुकना होगा यहां अभी.’’
‘‘मैं तो सोच कर आई थी, आज हो जाएगा, कल आराम कर के फिर चले जाएंगे.’’
‘‘हां, जितना आसान सोच रहे थे, उतना आसान यह सबकुछ है नहीं.’’
माहिका चुप रही, दोनों की तरफ अनमने भाव से देखा. दोनों सम?ा गए कि गलतियां हुई हैं. दोनों माहिका से नजरें नहीं मिला पाए. ‘‘तुम आराम करो, माही. हम कोई होटल बुक कर लेते हैं.’’
माहिका ने कोई जवाब नहीं दिया. नर्स आई, माहिका का बीपी चैक किया, बोली, ‘‘क्या सोच रही हो? इतनी टैंशन में क्यों हो? रिलैक्स रहो, तभी सब ठीक से होगा. अभी भी बीपी हाई है. इतने हाई बीपी में तुम लोगों का काम नहीं होगा,’’ कबीर और अर्जुन पर एक तंज कसते हुए कह कर नर्स फिर निकल गई.
तीनों को नर्स के इस तरह से कहने पर एक अपमान सा महसूस हुआ, पर क्या करते.
अर्जुन ने कहा, ‘‘माही, तुम आराम करो, भूख लगी है, हम कैंटीन में कुछ खा कर आते हैं. तुम्हारा खाना यही लोग देंगे?’’
‘‘हां.’’
परेशान से कबीर और अर्जुन कैंटीन की तरफ चले गए, दोनों ने एकएक
थाली ली, हाथ धोए और चुपचाप खाने लगे. कुछ देर बाद अर्जुन ने कहा, ‘‘यार, यह सब मस्ती जितनी आसान लगती है, उस के परिणाम उतने ही भयंकर हैं न?’’
‘‘हां. माही की लाइफ में आज का दिन नहीं आना चाहिए था. बहुत बुरा लग रहा है. गलती हो गई, यार.’’
हौस्पिटल के बैड पर लेटी हुई माहिका की आंखों के कोरों से आंसू बह रहे थे. मन हो रहा था, उड़ कर अपने मातापिता के पास पहुंच जाए और उन से लिपटलिपट कर रोए, सम?ा रही थी कि जिंदगी हमेशा एक स्ट्रेट लाइन में नहीं चलती और उसे इस तरह के उतारचढ़ाव अपनी लाइफ में नहीं चाहिए कि वह एक लड़के की चाहत में किसी रोटेशन क्लब की मैंबर बन कर रह जाए. अब ऐसी गलती वह लाइफ में कभी दोबारा नहीं करेगी, यह तय था.
