Hindi Stories : ‘‘वह मु झे तेरी तरह छोड़ कर कभी नहीं जाती थी.’’ ‘‘इसीलिए हमेशा के लिए तुम्हें छोड़ कर चली गई.’’

‘‘उस की कोई मजबूरी रही होगी.’’

‘‘अक्लमंद निकली… किसी अमीर आदमी की बीवी बन कर ऐश कर रही होगी,’’ एक तीर सी चुभती बात निकली और तड़ाक…वह जब भी उसे छोड़ कर जाती सिद्धार्थ ताने देता और फिर यही होता. जैसे ही सिद्धार्थ का पीना शुरू होता इस से पहले कि बात और बढ़े वह अपनी मम्मी के पास चली जाती. उन के बेटे की जिम्मेदारी नानी ने ही संभाली. एक ही शहर में होने के फायदे थे. मांबेटे का काम तो चल जाता पर अकेलेपन में घिर कर सिद्धार्थ और पीने लगता. उस से अकेला न रहा जाता. वह तो हमेशा से दोस्तों से घिरे रहने वाला प्राणी था.

‘‘जा रही हो तो जाओ पर जातेजाते सुनती जाओ कि उस का नाम लेने का हक तुम्हें नहीं. उस के सामने तुम कुछ भी नहीं.’’

जैसेजैसे नशा चढ़ता वह उस के प्रेम में आकंठ डूबता जाता. ऐसे में शराब सिर चढ़ कर बोलती.

‘‘अकेले रहो, यही तुम्हारी सजा है. जो पहले ही छोड़ गई उस का नाम ले कर लड़ते रहो… मु झ से शादी क्यों की जब उसे भूल ही नहीं पाए थे?’’

देखते ही देखते शैली आंखों से ओ झल हो गई. वह सोचने लगा आखिर क्यों की थी उस ने शादी? शायद उस में मैथिली की  झलक पाता था. वह शैली में मैथिली को ढूंढ़ रहा था. यही तो उस की निराशा की सही वजह थी. सोचतेसोचते आंखें लग गईं.

सुबह होते ही खाली घर काटने को दौड़ रहा था. वह ये सब क्यों करता है? इस से हासिल क्या होता है? अभी शैली को लेने ससुराल जाए या नहीं. खुद गई है तो उसे खुद ही आना होगा… पर उस पर हाथ नहीं चलाना चाहिए था. रात में उसे कहां होश था… गलती उस की भी थी. फिर सोचने लगा कि क्या शैली की कोई गलती नहीं थी. उसे अच्छी तरह पता है कि मैथिली उस का पहला प्यार ही नहीं बल्कि उस की सब से बड़ी कमजोरी भी है. आज वह जो कुछ भी बन पाया और जो न बन पाया सब के पीछे वही है. आखिर उसे हासिल करने के लिए ही तो मेहनत की थी. उसे ही दिलोजान से चाहा था. उस का नाम उछाल कर शैली ने जानतेबू झते गलती की थी.

मन व दिमाग लड़ने लगे. अब भी दिल के अंतरंग क्षेत्र में आधिपत्य जमाए मैथिली बैठी थी पर दिमाग तो शैली के पक्ष में था. उस की पत्नी है. अपने पति के मुंह से किसी और की तारीफ भला कैसे सहे. ठीक है औफिस से लौटते वक्त उसे लेता आएगा. कुछ ऐसे ही जीवननैया पार लग रही थी.

शैली आज के जमाने की आधुनिक युवती थी. उसे बचपन से ही शांति की आदत थी. अपनी पढ़ाईलिखाई के सिवा किसी बात से कोई लेनादेना न था. तभी तो उस के घर वालों ने उसे पसंद किया. शादी से कोई आपत्ति न हुई. मम्मी की लाडली थी अब पति की लाडली रहेगी. घर के कामकाज के लिए कुक व मेड होंगे. शुरुआत में इतनी तनख्वाह कहां होती है कि नौकरचाकर लगा लेते. काम को आराम से करने की उस की आदत के कारण अकसर औफिस भी लेट ही पहुंचती.

उस के लिए भी यही आसान था कि वह मायके से ही औफिस जाए.

हां, यह जरूर था कि इन सब बातों में सिद्धार्थ की तनहाई बढ़ रही थी. ऐसे में शराब और मैथिली की यादें यही तनहाई के साथी थे. सिद्धार्थ क्यों परेशान था इस तरह से किसी ने सोचा ही नहीं. 3-4 दिनों तक पीता हुआ जब होश में आता तब बीवीबच्चे को लाने सही पते पर पहुंच जाता. प्यार कम तो नहीं था पर हां एक गलती जरूर थी कि वह गाहेबगाहे शैली की तुलना मैथिली से कर बैठता. मैथिली उस की जिंदगी का वह अधूरा ख्वाब थी जिसे अपनी पलकों पर बैठाए फिर रहा था.

आज भी उसे अच्छी तरह याद है… भोली सूरत वाली चंचल सी मैथिली को उसने पहली बार फ्रैशर पार्टी में देखा था. सब से अलग थी वह सांवलीसलोनी लड़की. कभी तेजतर्रार तो कभी मासूम छोटी बच्ची सी. जाने कितने ही रूप थे उस के. अनजानों के लिए कड़ा रूप और दोस्तों के लिए मोम सी. उस के साथ जो जैसा होता वह वैसे ही ढल जाती.

मैथिली को सुंदर नहीं कह सकते पर स्मार्ट बहुत थी. गर्ल्स कालेज में तो उस की तूती बोलती थी. हां. यूनिवर्सिटी में आने के बाद थोड़ी शांत जरूर हो गई थी.जहां देखो लोग दोस्ती का हाथ बढ़ाते नजर आते तो वह एक कदम पीछे हट जाती पर सिद्धार्थ के प्रस्ताव को ठुकरा न सकी. लोग प्यार को सब से बड़ी खुशी मानते हैं. शायद वह पहली लड़की थी जो प्यार को खो न दे, इस चिंता में उदास थी. किसी ने उन के प्यार की बात मैथिली के मातापिता को बता दी. बस तभी से सभी पीछे पड़ गए. उस की खुशी को सम झने के बजाय सब ने अपनेअपने अंदाज में उसे उस की चाहत से दूर करने की युक्ति लगाई. 20 की उम्र में ही बिछोह का दर्द देखना पड़ा.

जब संवाद मौन हो जाए तो भावनाएं भी शांत होने लगती हैं. इन की आपस में बातचीत पर कड़ा पहरा था. फोन पर भी रोक थी. वह उस के गाए गीतों की तरन्नुम में उसे ढूंढ़ा करती. इस के ठीक विपरीत सिद्धार्थ को बस उस की आलोचनाएं ही सुनने में आतीं.

‘‘पढ़ने वाले स्टूडैंट थे. लड़की के चक्कर में बरबाद हो गए,’’ यूनिवर्सिटी में ऐसी बातें आम थीं. खून का घूंट पी कर रह जाता सिद्धार्थ. किसकिस का मुंह बंद करता. घर में भी वही बातें होतीं. मैथिली को कोसते लोग यही सोचते कि उस के दर्द पर मरहम लगा रहे हैं पर कहीं न कहीं उस के घावों को कुरेद कर असफलताएं ही याद दिलाते थी.

क्या सचमुच मैथिली अपराधिनी थी? यूनिवर्सिटी के साथी और सिद्धार्थ के परिवार वाले सभी उसे ही गलत ठहरा रहे थे.

क्या सचमुच सारी गलती उसी की थी? उस के कानों में सिद्धार्थ की कही बातें गूंजतीं.

‘‘कितनों को प्यार मिलता है. कई बार लोग एकतरफा मुहब्बत करते हैं, जबकि हम दोनों ही प्रेम में हैं. हमें मिलने से कोई नहीं रोक सकता बस मेरी यूपीएससी परीक्षा निकल जाए फिर कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए.’’

‘‘यह दुनिया इतनी सरल कहां सिद्धार्थ…’’ अकसर बड़बड़ाती हुई… रोतेरोते ही सोती… कभी मां आ कर खिला जातीं तो कभी यों ही पड़ी रहती… क्या उस ने सिद्धार्थ को पाने की कोशिश नहीं की होगी? बल्कि उस ने वह सब किया जो कर सकती थी. वह भी तो प्रेमदीवानी थी. मातापिता से मानमनुहार कर जब पूरी तरह थक गई तब बहनभाइयों से मदद मांगी. मगर किसी ने साथ न दिया. उस मौके पर सब अपने स्वार्थ में लिप्त थे. सब उस से छोटे थे और आर्थिक रूप से पेरैंट्स पर आश्रित भी.

मैथिली से जितना प्यार सिद्धार्थ करता था, उतना ही परिवार वाले भी करते थे

मगर अपने सम्मान की फिक्र ज्यादा थी जैसा 90 के दशक में होता था. तभी तो उस की हालत देख कर किसी को उस पर दया न आई. अगर उस ने घर वालों की नहीं सुनी तो सिद्धार्थ को जान से हाथ धोने पड़ेंगे ऐसी धमकी सुनते ही सहम गई और इसी बात का फायदा उठा कर उस के हाथ पीले कर दिए गए. उस ने भी थक कर सम झौता कर लिया. सिद्धार्थ को हमेशा के लिए खो देने से दोनों का जीवित रहना बेहतर समाधान लगा. सिद्धार्थ को पता ही नहीं चला कि मैथिली हमेशा के लिए चली गई है.

कुछ समय बाद एक दिन एक रजिस्टर्ड चिट्ठी मैथिली के घर आई. सिद्धार्थ के मोतियों से अक्षर दूर से ही पहचान गई. उस की मेहनत रंग लाई थी. आईएएस के लिए सलैक्ट हो गया था. हर ओर खुशी की लहर थी और उस का मन बस मैथिली के इर्दगिर्द घूम रहा था.

सिद्धार्थ की ट्रेनिंग शुरू हो गई थी. यहीं से जीवन में बड़ा बदलाव आया. उस के जीवन में एक बेहतरीन मित्र शैली का प्रवेश हुआ. वह भी आईएएस के लिए सलैक्ट हुई थी. पहले दोस्त बनी. उस का भोलापन, निश्छल हंसी मैथिली की याद दिलाती. उस से घंटों अपने दुख सा झा करते हुए दोनों की नजदीकियां बढ़ने लगीं.

एक रोज सभी पिकनिक के लिए गए तो इन की गाड़ी भयंकर दुर्घटना का शिकार हुई. सिद्धार्थ गंभीर रूप से जख्मी हो गया. 3 महीने तक बैडरैस्ट में रहना पड़ा. जिंदगी वापस ट्रैक पर लाने में शैली का बड़ा योगदान रहा. इसी दौरान दोनों और करीब आए. बेशक वही वह लड़की थी जिस ने मैथिली की कमी पूरी की थी. उन्होंने एकदूसरे को उन के अतीत के साथ स्वीकार किया और घर वालों की इजाजत से शादी भी हो गई. इस बार सिद्धार्थ को पिता की इजाजल आसानी से मिल गई क्योंकि दोनों ही आईएएस थे.

परिवार का संतुष्ट होना और प्रेम का सफल होना 2 अलग बातें हैं. बहुत जल्दी सिद्धार्थ को सम झ में आ गया कि शैली मैथिली की प्रतिछाया नहीं बल्कि एक अलग व्यक्तित्व है. मैथिली को वह भुला नहीं पा रहा था. जब कभी पी लेता गाहेबगाहे अतीत वर्तमान पर भारी हो जाता और फिर वही सब दोहराता. परिणामस्वरूप शैली का घर छोड़ कर जाना और उस का उसे मना कर लाना एक रूटीन सा हो गया था.

घड़ी का अलार्म बजा. अरे यह क्या? आज पूरी रात आंखों में कट गई. ‘दफ्तर जाने का टाइम हो गया. जो भी हो अब तय कर लिया है कि शैली को मना कर वापस लाएगा और उस से कभी नहीं लड़ेगा. उसे किसी तरह की तकलीफ नहीं होने देगा. कहते हैं न मारने वाले से बचाने वाला ही बड़ा होता है. उस ने उसे तब संभाला था जब उस के परिवार वाले भी छोड़ चुके थे. उस से बेहतर इंसान कहां मिलता. प्यार में टूट चुका था तब शैली ने ही संभाला था. अब वह उसे कभी दुखी नहीं करेगा.

इधर शैली क्षुब्ध बैठी थी. उस ने तय किया था कि जब तक वह अपने अतीत को भुलाएगा नहीं वह साथ नहीं आएगी. पुराने दोस्त, पुरानी बातें और पुराने रिश्ते सब छोड़ना था, साथ ही शराब भी.

सिद्धार्थ भी इस मृगमरीचिका से तंग आ गया था. अपने ही हाथों अपने जीवन को कितना बरबाद करता. उस ने शैली की सभी शर्तें मान लीं. उसे पता चल गया कि शैली है तो जीवन है. वह नहीं तो कुछ भी नहीं. सही ही कहती है शैली कि उस के वर्तमान में मैथिली नहीं है. कहीं भी नहीं.

मगर सचाई यह है कि मैथिली है. वह जानता था कि वहीं है. दिल पर सब के अपराधबोध ले कर जीती हुई. आखिर दुनिया में तो है. मैथिली के घर वाले उसे गलत सम झते हैं क्योंकि उस ने प्यार किया था. शादी के 10 वर्ष बाद भी अपनी गृहस्थी में रमी नहीं क्योंकि उस के अपराधबोध ने उसे नए रिश्ते में बंधने नहीं दिया. प्यार निभा न सकी थी इसलिए सिद्धार्थ व उस के घर वाले उसे गलत सम झते रहे पर वह खुद की सचाई अपने ही अंदर समेटे लोगों की नजरों में एक  झूठ का जीवन जीती हुई बस जीए जा रही थी. आखिर कब तक घुटती?

इस लोकतांत्रिक देश में बंदी प्रत्यक्षीकरण का अधिकार है तो क्या उसे अपनी बात कहने का मौका नहीं मिलेगा? पर कैसे? कुछ भी हो अपनी बात कहने का हक उसे भी है. परिवार के एक शादी के फंक्शन में शरीक होने के साथसाथ अपनी दुविधाओं से बाहर आने की सोच कर वह बनारस आई और हर उस स्थान पर, उन स्मृतियों में अपने सवालों के जवाब ढूंढ़ने लगी जहां दोनों साथ बैठा करते थे.

दिल में एक ख्वाहिश जन्म ले रही थी. क्या पता कुदरत उसे एक बार फिर सिद्धार्थ से मिला दे. इस बार हाथ जोड़ कर अपने किए की माफी मांग लेगी. अतीत की अग्नि में आखिर कब तक जलेगी? वर्तमान पर उस का भी कुछ हक है. यही सब सोचती वह भटकती रही. विश्वविद्यालय, गंगाघाट, काशी चाट भंडार, ललिता कैफे होती हुई संकटमोचन पहुंची. काशी विश्वनाथ के दर्शन कर वापस जाने का प्रोग्राम था. वही चिरपरिचित गली, वही फूल, प्रसाद बेचने वाली दुकानें देख फिर बीती बातों में उल झ गई…

यहीं मैथिली ने सिद्धार्थ से कहा था, ‘‘बहुत बोलते हो… थोड़ी देर चुप रहने का क्या लोगे?’’ और वह बिलकुल चुप हो गया था.

‘‘पता है ये सोने की पत्तियां हैं पूरे गुंबद के चारों ओर…’’

‘‘फिर ये चोरी नहीं होतीं डैड?’’

‘‘पुलिस का पहरा रहता है देखो उधर…’’

वही गंभीर आवाज… सहसा कानों पर जैसे यकीन ही नहीं हुआ. एकसाथ 2-3 सीढि़यां चढ़ती पहले फ्लोर पर पहुंची. जैसे उस के मन की बात मन तक पहुंच गई थी.

आंखों के सामने बापबेटे नजर आए और सिद्धार्थ पर नजर पड़ते ही एक पल के

लिए जैसे संसार थम गया. उस ने भी पहचान लिया. चेहरे की लाली अलग ही थी. धड़कते मन ने पैरों को जड़वत कर दिया. बमुश्किल खुद को संभाला तो थरथराती आवाज निकली, ‘‘तुम… यहां?’’

‘‘तू यहां कैसे?’’

‘‘एक शादी में आई थी…’’

‘‘अच्छा… बेटे की छुट्टियां थीं तो मम्मीपापा से मिलाने ले आया…’’ देशविदेश घूमते मगर बनारस आने का मतलब साफ है कि वह भी कुछ पुरानी यादें समेटे है.

‘‘क्या आप की इन से शादी हुई थी?’’ जैसे बच्चे ने चेहरे के सारे भाव पढ़ लिए हों.

‘‘नहीं बेटे, हम क्लासमेट्स थे…’’

सिद्धार्थ ने पहली बार परिचय छिपाया. गौर से उस चेहरे की ओर देखा. बिलकुल

बदल गया था, काफी संयत और मर्यादित दिख रहा था. अब वह उस का नहीं किसी और का हो चुका था. जिस की जीतीजागती खूबसूरत निशानी उस के साथ थी. यहीं पर उस की तलाश खत्म हो गई. आज तक जिसे ढूंढ़ रही थी वह उस का 22 साल का युवा प्रेमी था. जिस के मन व वचन में अंतर न था, मगर जो मिला वह एक प्रतिष्ठित उच्च अधिकारी था जिसे अपनी व अपने परिवार के सम्मान की रक्षा करनी थी.

मैथिली जिस रिश्ते की खोज में जी नहीं पाई वह उन रिश्तों के चोलों को पीछे छोड़ आगे बढ़ चुका था. अब पहले सी नमी नहीं थी कहीं. सूखी भावनाविहीन आंखों में कुछ भी शेष न था.

तुरंत सहचर के पनीले नयन याद आ गए कि यहां कुछ न धरा मैथिली… पति के प्रेम पर अधिकार छोड़ किस मृगमरीचिका में भटक रही है. वापस लौट जा. खुद को सम झाती हुई भारी मन से कदम उठाती वह एअरपोर्ट पहुंची. तभी टैक्सी ड्राइवर ने छुट्टे लौटाते हुए एक परची पकड़ाई.

‘‘प्यार में जीयो मैथिली… अपनों के प्यार में… मैं भी वही कर रहा हूं…’’

सिद्धार्थ की लिखावट थी. उस के लघु संदेश में सबकुछ था. साथ न होते हुए भी उस की उदासी भांप ली थी यह भी कम न था. उस शौर्ट नोट को पढ़ते ही दिल से सारा बो झ हट गया.

सिद्धार्थ आजकल शैली के साथ रह रहा था. रह क्या रहा था दोनों एकदूसरे को निभा रहे थे. सिद्धार्थ ने पीना कम कर दिया था पर शैली जानती थी कि मैथिली कभीकभार उन दोनों के बीच साए की तरह खड़ी रहती है. सिद्धार्थ ने अब साए से पार जीना सीख लिया था.

स्त्री प्रेम को प्रेम सम झती है, उस से बंधी रहना चाहती है जबकि पुरुष प्रेम को कर्तव्य से जोड़ता है. जिस के संग 7 वचन लिए वही उन का आज है और कल भी. वैसे भी प्रेम पाने का नहीं अपितु देने का नाम है. सिद्धार्थ और मैथिली दोनों ने एकदूसरे को अपने अतीत से आजादी दे दी थी. पक्षी अपनेअपने घोंसलों की ओर उड़ चले. यही उन की मुहब्बत को हासिल था.

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