राज पास आ कर माथे पर एक किस दे कर सैंडविच खाता बाय कर के चला गया. राज को जाते देख कर राघवी ठगी सी रह गई. उस के गुस्से में आंसू निकल आए. राघवी अपनी शादी के पहले के दिनों को याद करने लगी कि कैसा होता था हमारा मिलना. कभी फ्लाइट की ड्यूटी कर लौटती पर्स कंधे से उतार भी न पाती थी कि फोन की घंटी मीठी धुन सी मन में हलचल मचा देती थी और राघवी के चेहरे पर एक लंबी सी मुसकराहट खिल उठती थी. उसे गर्व हो आता अपने प्यार पर. कैसे स्वप्निल दिन थे. मदमाते खिलखिलाते, मयूरी सी थिरकन… तो क्या अब वह प्यार नहीं रहा? राज की व्यस्तता उसे अब अकसर परेशान कर जाती.
पिछली रात से राघवी की सोच हर बार एक ही बात पर अटक जाती कि आखिर राज कितना बदल गए हैं.
पहले जब भी राघवी औफिस से आती तो चाहती राज के साथ चाय का कप ले कर थकान उतारते हुए कुछ बातें करे. इस से उस की दिनभर की थकान उतर जाती थी. शादी के शुरू में हमेशा ऐसा होता था बल्कि राज ही राघवी को चाय बनाने से मना कर देता था और खुद चाय बना कर लाता था.
मजाक में कहा भी, ‘‘अजी जब आप का सेवक मौजूद है तो आप क्यों कष्ट उठाओगे जनाब?’’
राघवी हंसते दोहरी हो जाती. दोनों की लव मैरिज थी. एकदूसरे का ध्यान रखते जीवन के हर पल को गुनगुना रहे थे.
1 साल कब गुजर गया, राघवी और राज को पता ही नहीं चला. पर अब अकसर राज औफिस से आता और आते ही टीवी और कर सोफे पर पैर पसार कर अधलेटा सा हो मोबाइल में काम करते खो जाता.
‘‘सुनो राज, आज बाहर से खाना और्डर कर लें? बहुत थक गई हूं. कुछ भी आज छुट्टी पर है.’’
पिछली रात लंबे ट्रिप सिंगापुर से आई थी. इस बार 2 दिन बाद घर लौटी राघवी ने 2-3 बार राज से कहा पर ऐसा लगा राज ने कुछ सुना ही नहीं.
राघवी ने गुस्से में आ कर कहा, ‘‘मैं कुछ कह रही हूं और तुम मोबाइल में ही
व्यस्त हो?’’
‘‘अरे यार टूर का शैड्यूल देख रहा था. मैं खा लूंगा जो भी मंगाना हो मंगा लो.’’
‘‘अच्छा फोन छोड़ कर मेरी एक बात सुन लो प्लीज.’’
‘‘हां कहो डार्लिंग, सुन रहा हूं. मैं टिकट बुक कर रहा हूं,’’ उस ने फोन पर ही नजरें जमाए हुए कहा.
‘‘अच्छा तुम अभी काम कर लो हम सुबह बात करते हैं,’’ राज की बेरुखी से उदास मन से राघवी उठ गई.
सुबह जब तक राघवी उठी थी, राज औफिस के लिए तैयार था. उस ने थकी राघवी को नहीं उठाया बल्कि उस के लिए भी सैंडविच बना कर रख दिए थे. राघवी ने नींद से अलसाए हुए आंखें खोलीं तो राज को तैयार पा उसे अपनी ऐनिवर्सरी वाली बात याद आई. उस ने जल्दी से पलंग से उतरते हुए कहा, ‘‘एक मिनट राज मेरी बात सुन लो. हमारी ऐनिवर्सरी आ रही है. इस बार कहीं पहाड़ों पर चल कर मनाते हैं. बहुत दिन हो गए हैं साथ समय बिताए, मिल कर बात किए हुए.’’
‘‘यार मैं ने तुम्हें कहा था कल रात, आज बाहर से कुछ क्लाइंट आ रहे हैं, 1-2 दिन व्यस्तत हूं. फिर बात करते हैं न,’’ राज ने जल्दी से सैंडविच हाथ में उठा कर चलते हुए कहा.
‘‘अरे, इस में सोचना क्या है? एक हां ही तो करनी है.’’
‘‘नहीं डियर, अभी हां नहीं कह सकता. तुम जानती हो सालभर में मांपापा भी इसी दिन का इंतजार करते हैं. जब सब साथ मिल कर ऐंजौय करते हैं. मैं अकेला बच्चा हूं उन का, साथ रह रहे होते तो भी ठीक था. लेकिन तुम जानती हो, हम अलग रह रहे हैं.’’
कुछ दिनों से न कभी राज छुट्टी लेने को तैयार होता है, न ही अब उसे छुट्टियां मिल पातीं. राज के आनेजाने का समय और उस के आनेजाने का समय अकसर अलग होता. एअर होस्टेस की नौकरी का सपना बचपन से था. आसमान में उड़ते परिंदों सा प्लेन में उड़ना और उड़ते ही रहना. फिर राज का उस की सहेली की पार्टी में मिलना. यों लगा कि राज से जन्मों का नाता है. पसंद भी एक सी थी दोनों की. उस की प्लेट में भी वही सबकुछ था जो राघवी ने अपनी प्लेट में लिया था.
‘‘अच्छा यह बताओ राघवी, तुम्हें मीठे में क्या पसंद है? मैं तो सिर्फ ब्राउनी ही लूंगा और वह भी हौट चौकलेट में, तुम्हारे लिए भी ले आता हूं.’’
आश्चर्य से मुंह देखती रह गई राघवी. उसे भी तो ब्राउनी ही पसंद है
हौट चौकलेट में, ‘‘मेरे लिए भी यही ले आओ.’’
राघवी ने कहा, ‘‘अरे नहीं, बता दो जो पसंद हो, मैं ले आऊंगा.’’
‘‘नहीं कुछ और नहीं, हैरानी है कि मु झे भी मीठे में यही पसंद है जो तुम्हें पसंद है,’’ कहते ही सतरंगी हंसी खिलखिला पड़ी थी राघवी.
‘‘क्या बात है, यह भी सेम टू सेम,’’ और ठहाका लगा कर राज भी हंस पड़ा.
ब्राउनी ले कर राज लौटा तो राघवी के पास ही बैठ गया. बरात आ गई थी. सभी उस में व्यस्त हो गए थे. लेकिन वह गुलाबी फरवरी की ठंड आसमान में तारों संग एक नई कहानी लिखने बैठी थी. राघवी के दिल की हलचल, राज की आंखों की शरारत मौसम को खुशगवार बना रही थी.
‘‘तुम ने जो यह यैलो शरारा पहना है. तुम्हारी पसंद का कलर भी यही है?’’
‘‘हां राज, क्या तुम्हारा भी?’’
‘‘हां जी, जब सब एक सा है तो फिर कलर की पसंद भी तो एक हो इस में कोई आश्चर्य नहीं.’’
और शुरू हो गई एक नई प्रेम कहानी एक इंजीनियर और एअर होस्टेस के बीच.
‘‘मां, आप का बो झ मैं ने हलका कर दिया? और उस दिन पार्टी से लौट कर सोफे पर अधलेटी चमकती आंखों से राघवी ने मां से कहा तो सब्जी काटती मां ने छुरी वहीं रख दी और बेटी के पास चली आई. मां थी तो आखिर राघवी की ही, बेटी क्या बोल रही है उस का आशय सम झ गई थी.
‘‘तो चल विस्तार से बता सब मु झे, मैं भी सुनूं वह कौन सा हीरा है जो मेरी जौहरी बेटी ने परखा है.’’
‘‘अरे मां, तुम भी सुनोगी तो खुश हो जाओगी, जानती हो हमारी पसंदनापसंद बिलकुल एक सी ही है.’’
‘‘चल मैं चाय ले कर आती हूं. फिर दोनों आराम से बातें करते हैं.’’
मां ने चाय का कप राघवी के हाथ में दिया और खुद चाय भी चुसकी लेते हुए कहा, ‘‘पसंद तो ठीक है बेटा, पर नौकरी क्या है लड़के की?’’
‘‘मां जानती हो, हमारी जाति भी एक ही है,’’ राघवी ने उत्साह से कहा.
‘‘पर बेटा मैं जाति नहीं उस की नौकरी पूछ रही हूं?’’
‘‘मां वह इंजीनियर है, मार्केटिंग में है, टूरिंग जौब ज्यादा है,’’ कह कर राघवी चुप हो गई.
जानती थी मां हमेशा कहती थी कि तेरी नौकरी का समय अलग रहता है तू अगर कोई लड़का पसंद करती है तो तालमेल अवश्य रहे. इस बात का ध्यान रखना.
‘‘क्या तुम ने उसे अपनी जौब के बारे में बता दिया है?’’
‘‘हां मां, सब बता दिया है. मैं भी यही चाहती हूं कि शादी होने के पहले वह भी अच्छी तरह से सब सोचसम झ ले. सब जानने के बाद ही उस ने खुद ही विवाह का प्रस्ताव मु झे दिया है. हम दोनों की अब एक ही मंजिल है.’’
‘‘लेकिन बेटा मु झे लगता है तुम्हारी टाइमिंग सही नहीं होगी. राज की भी टूर की ही जौब है और अपना तो तुम्हें पता ही है.’’
‘‘हम आपस में सब एडजस्ट कर लेंगे, आप बिलकुल चिंता मत करो. आप और पापा तो बस आशीर्वाद दे दो.’’
प्रेम में आकंठ डूबी बेटी को मां आगे कुछ न सम झा सकीं.
‘‘मां, आप को एक और खुशखबरी दूं… हम ने अपनी दोनों की कुंडली कंप्यूटर में मिला ली है. 26 गुण मिल रहे हैं. आप तो खुश हो जाओ,’’ राघवी मां के चक्कर में हर तरह के अंधविश्वास को अपना लेती थी कि इसे मान लेने में हरज क्या है? वह आखिर हमारे पुरखों ने कुछ सोच कर ही ये रीतिरिवाज बनाए होंगे.
वह कहती थी कि जन्म कुंडली के बजाय कर्म कुंडली पर विचार आवश्यक है. प्यार तो
जरूरी है ही लेकिन धरातल की सचाई भी आवश्यक है. उस का डाइवोर्स हो चुका था जबकि शादी कुंडली मिला कर की गई थी. उस ने कहा था, तुम जब घर आओगी तब राज टूर पर होगा और वह जब घर पर होगा तब तुम्हारी ड्यूटी होगी यह विचार अवश्य करना, गृहस्थी की गाड़ी में तालमेल आवश्यक है वरना बिना मिले दूरी आने से झगड़े होते हैं और फिर उन्हें सुल झाने का समय नहीं मिलता है.
मां की अनुभवी आंखों ने एक प्रयत्न किया अपनी लाड़ली को सम झाने का. आज सच में यही हो रहा था. जब भी राघवी कुछ कहती राज काम में व्यस्त होता और जब राज कुछ कहना चाहता तब राघवी व्यस्त होती. इतनी व्यस्तता में प्यार के रंग न जाने कहां खोने लगे.
बहुत दिनों से राज और राघवी कहीं घूमने नहीं गए थे तो राघवी चाहती थी ऐनिवर्सरी पर कहीं साथसाथ समय बिताया जाए. राघवी सही सोच रही थी लेकिन राज भी सही था. वह अपने मम्मीपापा को भी साथ शामिल करना चाहता था.
आज राघवी को इतना तेज गुस्सा आया कि सामान उठा कर मां के यहां चली आई. राज और राघवी दिल्ली में ही थे और राघवी का मायका भी दिल्ली में ही था.
असमय बेटी को आया देख मां की चिंता बढ़ गई. ये आजकल के बच्चे भी बड़ों की सुनना ही नहीं चाहते हैं. मां भी कुछ दिन से राघवी की बातों में राज के लिए शिकायत सुन रही थी, मौका ढूंढ़ रही थी कि दोनों को साथ में बैठा कर सम झा सके. बोली, ‘‘राघवी, राज को औफिस से यहीं बुला ले.’’
‘‘नहीं मां मेरा मन नहीं है उसे फोन करने का.’’
‘‘फिर मैं ही उसे फोन करती हूं,’’ कहते हुए मां ने राज को फोन मिला दिया, ‘‘राज, आज औफिस से सीधे यहां आ जाना बेटा. राघवी को भी बुला लिया है. मैं ने तुम्हारी मनपसंद खीर बनाई है. खाना भी यहीं खा लेना.’’
‘‘ठीक है मम्मीजी, मिलते हैं शाम को डिनर पर.’’
शाम को मनपसंद खाना टेबल पर देख राज खुश हो गया और खाने की प्लेट यह कह कर उठा ली, ‘‘भई आज तो बहुत दिनों बाद भर पेट खाऊंगा,’’ और फिर राघवी को देख हंस पड़ा.
‘‘अरे बेटा पहले हाथ तो धो लो,’’ मां ने कहा.
मगर राज की खाने के लिए व्यग्रता व उस के वचन राघवी को व्यंग्य लगे. उस का मुंह गुस्से से लाल हो गया. उस ने आक्रोशित स्वर में कहा, ‘‘क्यों मैं तुम्हें मनपसंद खाना नहीं देती?’’
‘‘देती हो पर आधे दिन तो बाहर से आता है.’’
‘‘हां तो, मेरी जौब ही ऐसी है कि मैं खुद थक जाती हूं… यह बात तो तुम्हें शादी के पहले से पता थी.’’
इस के आगे बच्चों में और बहस होती ही मां ने बात का रुख मोड़ दिया, ‘‘अच्छा कल इतवार है. कल कोई कहीं नहीं जाएगा. हम सब बैठ कर बात करेंगे. जाओ बच्चो अब तुम दोनों आराम करो. मैं भी अपना मनपसंद सीरियल देखूंगी.’’
दोनों बच्चे सोने चले गए तो मां सोचने लगी कि यह समस्या केवल राघवी की ही
नहीं अपितु आजकल की सारी नवयुवा पीढ़ी की है. हर कार्य में अधीरता, करते पहले हैं सोचते बाद में हैं. उस की बचपन की फ्रैंड ने भी कितना सम झाया था राघवी को कि दोनों की ही टूर वाली नौकरी है. तालमेल के लिए खुद ही समय निकालना होगा. बहुत सम झदारी से चलना होगा. एकदूसरे की मनोस्थिति देख कर चलना होगा.
यह पीढ़ी हर समय मोबाइल में घुसी रहती है और जीवन की गंभीरता को नहीं सम झती. विवाहतलाक तो होते रहते हैं पर तुनकमिजाजी बेबात की वजह है. किताबों में लिखा एकदूसरे से शेयर करने में आनंद आता है. मोबाइल में पढ़ा जब तक दूसरे को दिखाओ, गायब हो जाता है. सब फिलौसफी ही भरी होती है पर 10 मजाक की या अंधविश्वास की.
दूसरे दिन इतवार था. राज और राघवी बहुत देर तक सोते रहे. मां ने भी नहीं उठाया. चाहती थी कुछ सम झाने के पहले बच्चे मन से शांत हों ताकि बात सम झ सकें.
सुबह राज और राघवी उठ कर आए तो मां टैरेस में बैठी धूप का आनंद ले रही थी.
‘‘गुडमौर्निंग मम्मा.’’ दोनों ने एकसाथ खुशी भरे स्वर में कहा तो मां को बहुत अच्छा लगा. अपने पास कुरसी पर दोनों को बैठने को कहा. राघवी अपने और राज के लिए चाय और नाश्ता से ले आई जो मां ने पहले ही बना दिया था.
‘‘देखो बच्चो, मेरी बात ध्यान से सुनो, तुम दोनों ही व्यस्त रहते हो…’’
‘‘हां मम्मी, जब मैं राज से कुछ कहती हूं तो राज मेरी बात पर ध्यान ही नहीं देते जैसे कुछ सुना ही न हो.’’
‘‘और तुम ही कौन सा ध्यान देती हो मेरी बातों पर’’, राघव भी बोल पड़ा.
‘‘पहले तुम दोनों चुप हो जाओ और ध्यान से सम झो मैं क्या कहना चाहती हूं. यह समस्या तुम दोनों की ही है, एक की नहीं है. अच्छा यह बताओ तुम दोनों एकदूसरे को प्यार करते हो न?’’
दोनों ने हां में सिर हिला दिया.
‘‘समस्या यह है कि तुम दोनों को आपस में एकदूसरे को समय
देना है. जब राज चाहता है कि ऐनिवर्सरी पर मम्मीपापा शामिल हों तो उन्हें भी शामिल करो और एकदूसरे के साथ भी समय बिताओ. इस से मन की भावनाएं सम झ आएंगी. केवल अपनी तरफ से ही नहीं सामने वाले की तरफ से भी बात सम झो. वीक में कुछ समय साथ बिताओ चाहे घर या बाहर. साथ रहने से ही नई उमंग, नया जोश वापस मिलता है.
‘‘समय साथ बिताने का मतलब है तीसरे को बीच में न आने देना, मोबाइलों को साइलैंट मोड पर रख कर बातें करना. बेटा, विवाह सिर्फ साथ रहने के लिए नहीं किया जाता. आप दोनों एकदूसरे के पूरक हो. नाराज हो तो मनाना, जानना जरूरी है. जिम्मेदारियां एकसाथ मिल कर पूरी करना ही प्यार का असली नाम है. हर समय दूसरों को अपने से जोड़े रखना विवाह को कमजोर करता है,’’ मां ने समझाया.
दोनों बच्चे शांत हो कर सुन रहे थे और एकदूसरे को देख कर मुसकरा भी रहे थे. अपनी बात कह कर मां बच्चों की प्रतिक्रिया सम झने की कोशिश कर रही थी, वक्त भी देना चाहती थी.
थोड़ी देर में राघवी तैयार हो कर आई और मुसकराते हुए बोली, ‘‘मां मैं घर जा रही हूं. आज बाहर नहीं घर पर ही हम दोनों समय बिताएंगे.
