राइटर : रूणा रश्मि ‘दीप्त’
Emotional Hindi Story : जब से संदीप को पैरालिटिक अटैक आया था और उस का कामकाज बंद सा ही हो गया था, तब से परिवार की आर्थिक स्थिति डांवांडोल रहने लगी थी. वैसे तो उस की पत्नी काजल बहुत ही सम?ादार और संतुलित महिला थी, हिसाबकिताब से घर चलाना उसे आता था, किसी से सहयोग लेना भी उसे पसंद नहीं था. लेकिन संयम और संतुलन भी तो एक सीमा तक ही संभव है.
अपनी बहन की स्थिति भला भाई की नजरों से कैसे बच सकती थी. सूरज हमेशा आर्थिक मदद के लिए आगे आता था जिसे संकोच के साथ काजल को स्वीकार करना ही पड़ता था. उस की भाभी सुधा भी काजल के इस संकोच को समझती थी. सदैव यही सोचती रहती थी कि ऐसा किस प्रकार का सहयोग कर सकें वे लोग कि काजल के परिवार की आर्थिक दशा भी सुधर सके और उन्हें शर्मिंदगी भी महसूस न हो सके.
इसी विचारविमर्श के दौरान सुधा को सूरज ने बताया कि काजल बहुत ही कुशल नृत्यांगना हुआ करती थी. अपने स्कूलकालेज के दिनों में उस ने नृत्य में न जाने कितने ही इनाम जीते थे.
छोटी बहन होते हुए भी काजल का विवाह पहले हो गया था. अत: सुधा को ऐसी कुछ बातें नहीं पता थीं. ये सारी बातें सुनतेसुनते ही सुधा के मन में कुछ विचार उत्पन्न हुए.
‘‘क्यों न हम लोग काजल दीदी को फिर से डांस करने के लिए प्रेरित करें? अगर वे डांस क्लासेज आरंभ कर लेंगी तो आर्थिक मदद तो हो ही जाएगी, साथ ही नृत्य तो मानसिक तनाव दूर करने का भी अति उत्तम साधन है. घर बैठे काम भी हो जाएगा और संदीपजी की देखभाल भी हो जाएगी.’’
‘‘अरे नहीं, वह कहां तैयार होगी और अभी तो उसे फुसत भी नहीं होगी, कहां से डांस सिखा पाएगी?’’
‘‘क्यों नहीं तैयार होगी?’’ सुधा ने पूछा.
सूरज ने बताया, ‘‘जब काजल डांस सीख रही थी तो उस की बूआ और मौसी ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि यह तो कोठे वालियों का काम है. उन की बेटियों की शादी कैसे होगी अगर चचेरी बहन डांस कर रही है? पिताजी ने हथियार डाल दिए. कालज को बहुत दुख हुआ. वह आज भी बूआ और मौसी के घर कम जाती है. वह तैयार होगी, इस में शक है.’’
सुधा ने फिर कहा, ‘‘पूछ कर तो हम देख ही सकते हैं.’’
‘‘ठीक है, तुम पूछना चाहती हो तो पूछ कर देख लो. मु?ो तो अच्छा नहीं लगेगा पूछने में. कहीं वे लोग ऐसा न समझें कि हमें उन की सहायता करनी पड़ रही है इसलिए हम ऐसा प्रस्ताव ले कर जा रहे हैं. कभीकभी खून के गहरे रिश्ते भी छोटी सी गलतफहमी और आशंका में बिगड़ने लगते हैं और मैं नहीं चाहता कि मेरी बहन के साथ हमारा रिश्ता बिगड़े, उस में किसी प्रकार की गलतफहमी उत्पन्न हो सके.’’
‘‘नहींनहीं. आप निश्चिंत रहिए, ऐसा कुछ भी नहीं होगा. मैं एक बार जरूर बात करने का प्रयास करूंगी. ऐसा करती हूं, मैं आज शाम को ही उन लोगों से मिलने चली जाती हूं. अकेली ही जाऊंगी, आप मत जाना. आप बस औफिस से वापस आते वक्त मु?ो लेते आना.’’
यही विचारविमर्श कर के दोनों पतिपत्नी अपनेअपने कार्य में लग गए. दोपहर बाद तक घर के सारे काम निबटा कर सुधा काजल के घर के लिए निकल पड़ी. सामान्य हालचाल की बातें करते हुए बातों ही बातों में सुधा ने कहना आरंभ किया, ‘‘अरे काजल दीदी, आप तो बहुत अच्छी डांसर रही हो, आज ही मु?ो पता चला.’’
डांस का नाम सुनते ही काजल की आंखों में चमक आ गई, ‘‘हां भाभी, डांस तो मैं
करती थी लेकिन कब का बूआ और मौसी के दकियानूसीपन के कारण छोड़ दिया मैं ने. अब तो सब भूल भी गई हूं.’’
‘‘हां, छोड़ दिया तो क्या हुआ? फिर से आरंभ भी तो कर ही सकती हो?’’
‘‘अरे नहींनहीं, अब कहां आरंभ होगा और अभी तो आप देख ही रही हैं कि घर की स्थिति कैसी है.’’
‘‘वही तो मैं भी कहना चाह रही हूं. पहले अपने शौक से किया अब आप घर की स्थिति
को देखते हुए भी कर सकती हो. डांस क्लासेज शुरू करो, पूरा दिन घर में बैठे रहना पड़ता है तो आप का टाइम भी अच्छा पास हो जाएगा, साथ ही पैसों की आमदनी से आर्थिक आधार भी मजबूत हो सकेगा.’’
काजल ने थोड़े अनमने भाव से कहा, ‘‘देखती हूं, सोचती हूं.’’
थोड़ी इधरउधर की अन्य बातें भी हुईं. तभी सूरज भी आ गया. सुधा सूरज के साथ घर वापस आ गई. लेकिन उस का ध्यान तो वहीं लगा हुआ था कि क्या सोच रही होगी, क्या निर्णय लेगी?
काजल की स्थिति डांवांडोल थी. नृत्य के नाम पर मन ?ाम तो रहा था,
लेकिन इतने वर्षों के पश्चात पुन: आरंभ करना वह भी ऐसी दशा में जब संदीप की शारीरिक हालत ऐसी है और उस की मनोस्थिति भी अच्छी नहीं है, उसे सम?ा में नहीं आ रहा था क्या करें? वैसे बच्चे तो बड़े हो गए थे अपना काम स्वयं ही कर लेते थे और उन का समय तो स्कूल में ही व्यतीत हो जाता था. दिन में तो काजल को पर्याप्त समय मिल ही जाता था. काफी सोचविचार के पश्चात और संदीप के बहुत जोर देने के बाद उस ने निर्णय ले ही लिया.
सब से पहले अपनी भाभी को फोन कर के यह बात बताई. सुनते ही भैयाभाभी दोनों खुश हो गए. व्यवधान तो बहुत सारे थे लेकिन जब आगे बढ़ने का निश्चय लिया तब आरंभ तो करना ही था.
किसी भी मंजिल पर पहुंचने के लिए उस राह पर प्रथम कदम तो बढ़ाना ही पड़ता है. फिर काजल की यह मंजिल तो नई थी किंतु राहें तो जानीपहचानी ही थीं. इस राह पर चलना तो कभी उसे अति प्रिय हुआ करता था.
अगले दिन ही सब मिल कर एकसाथ बैठे, योजनाओं पर विचारविमर्श हुआ. सूरज ने अपने एक मित्र के सहयोग से परचियां छपवाईं जिन्हें दैनिक अखबार के साथ आसपास के महल्लों में बंटवा दिया गया.
जैसाकि हमारे समाज का नियम ही है, किसी की नई पहल की सराहना करने वालों से अधिक उस की खिल्ली उड़ाने वाले ही मिल जाते हैं. बूआ और मौसी अभी भी नाराज ही थीं. जहां कुछ लोगों ने जीवन की इन विषम परिस्थितियों में भी उस के इस साहसिक कदम की सराहना की तो वहीं कितने ही रिश्तेदारों और पासपड़ोस के लोगों ने यह कह कर उस का मजाक भी बनाया कि पति बिस्तर पर पड़ा है और इसे अपना नृत्य का शौक पूरा करने की पड़ी है.
मगर काजल के बढ़े हुए कदम अब पीछे मुड़ने वाले नहीं थे. उस के इस नए सफर में उस के पति और बच्चों का पूर्ण सहयोग के साथ ही भैयाभाभी की भी समस्त शुभकामनाएं प्राप्त थीं.
आरंभ में तो 1-2 छात्र ही नृत्य की शिक्षा ग्रहण करने आए किंतु जैसेजैसे बात फैलती गई, उस के पुराने मित्र और रिश्तेदार जो उस की नृत्य कला की दक्षता से भलीभांति परिचित थे, उन लोगों ने भी अपने आसपास के सभी लोगों को भी बताया और इस प्रकार छात्रों की संख्या बढ़ती चली गई.
1-2 बच्चों से आरंभ होता हुआ काजल का यह अभियान जोर पकड़ता हुआ अब दसियों बच्चों तक पहुंच चुका था. संदीप भी आरंभ में तो बिस्तर पर पड़ेपड़े ही और बाद में स्वास्थ्य सुधार के साथ व्हीलचेयर पर चलते हुए उस के इस काम में पूर्ण सहयोग करते रहे. दोनों की आपसी सम?ा तथा सूरज और सुधा की सपोर्ट का ही परिणाम था कि 4 वर्ष बीततेबीतते ही काजल को अपने नृत्य शिक्षण के लिए एक नई जगह की तालाश की आवश्यकता पड़ने लगी और सालभर के भीतर ही उसे एक समुचित स्थान पर एक सुंदर भवन भी मिल गया जहां आज उस की नृत्यशाला का उद्घाटन होने वाला था.
स्वयं काजल इस उद्घाटन समारोह के लिए अपने भैयाभाभी को आमंत्रित करने आई थी. सुधा से गले मिल कर तो भावुक ही हो गई, ‘‘भाभी, आप ने ही मुझे एक नया लक्ष्य दिया और इस नई मंजिल की तरफ बढ़ने के लिए प्रेरित भी किया. आप का तो जितना भी शुक्रिया अदा करूं कम ही है.’’
उसी उद्घाटन समारोह में जाते हुए बहन की सफलता से गौरवान्वित सूरज, काजल की जिंदगी के बीते 5 वर्षों के उतारचढ़ाव भरी यादों में खोया हुआ था कि उसे पता भी नहीं चला और गंतव्य आ गया. आंखों के सामने नृत्यशाला का वह सजीला भवन था जिस पर ‘काजलदीप नृत्य कला केंद्र’ का बड़ा सा बोर्ड चमक रहा था.
सूरज की आंखें सजल हो गईं. यह तो उस की मां का ही सपना था जो अधूरा रह गया था और वे अकस्मात ही इस दुनिया से चल बसी थीं. काजल के नृत्य छोड़ने से सब से ज्यादा वही
दुखी थीं. लेकिन जब काजल स्वयं ही नहीं चाहती थी तब उस की मां भी चुप ही रह गईं और बेटी के उस निर्णय को बुझे मन से ही मौन स्वीकृति दे दी थी.
शायद उन का ही आशीर्वाद फलीभूत हो रहा था जो काजल की कुशल कला और मेहनत का इतना सफल परिणाम प्राप्त हुआ था.
सूरज को अपनी पत्नी सुधा पर भी गर्व हो रहा था जिस ने छोटेमोटे आर्थिक सहयोगों से ऊपर उठ कर काजल के लिए ऐसा मार्ग प्रशस्त किया जिस ने उस की दबी हुई प्रतिभा को तो पुन: उजागर किया ही, साथ ही अनजाने में ही सही दिवगंत मां के सपनों को भी पूरा कर दिया. काजल की उन विषम परिस्थितियों में वास्तविक सहयोग तो यही था.
मजेदार बात यह रही कि नए स्कूल में एडमिशन दिलाने के लिए बूआ की बेटी अपनी बेटी और मौसी अपनी भतीजी को भी लाई थीं. काजल ने दोनों का मान रखते हुए दोनों बच्चों से फीस लेने से साफ इनकार कर दिया.
